Wednesday, October 3, 2007

ये हम नही

अश्विनी मिश्र हमारे सहयोगी है.. चेहरे से देखें तो विचारक की सी शांति पसरी हुई होती है. अस्त-व्यस्त दाढी, लेकिन विचारधारा और काम में कोई अस्त-व्यस्तता नहीं। कविता में दिल की बात कह जाते हैं, उनकी हालिया लिखी कविता पढ़ी तो लगा कि जनाब खुद भी शायद ( मेरा तो मानना है यकीनन..) मुहब्बत में हैं। बदकिस्मती से अगर उन्हें इश्क़ नहीं हुआ हो तो यह लड़कियों की खराब किस्मत मानी जानी चाहिए...आप भी कविता पढ़े और खुद फैसला करें... गुस्ताख़


किसी के इतने पास न जा

कि दूर जाना खौफ़ बन जाये,

एक कदम पीछे देखने पर

सीधा रास्ता भी खाई नज़र आये

किसी को इतना अपना न बना

कि उसे खोने का डर लगा रहे

इसी डर के बीच एक दिन ऐसा न आये

कि तू पल पल खुद को ही खोने लगे

किसी के इतने सपने न देख

कि काली रात भी रन्गीली लगे

और......जब आंख खुले तो बर्दाश्त न हो

जब सपना टूट टूट कर बिखरने लगे..............

किसी को इतना प्यार न कर

कि बैठे बैठे आंख नम हो जाये

उसे गर मिले एक दर्दइधर जिन्दगी के दो पल कम हो जाये

किसी के बारे मे इतना न सोच

कि सोच का मतलब ही वो बन जाये

भीड के बीच भी लगे तन्हाई से जकडे गये

किसी को इतना याद न कर

कि जहा वो ही नज़र आये...

रह देख देख कर कही ऐसा न हो

जिन्दगी पीछे छूट जाये

ऐसा सोच कर अकेले न रहना,

किसी के पास जाने से न डरना

न सोच अकेलेपन मे कोई गम नही,

खुद की परछाई देख बोलोगे.........

"ये हम नही

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