Wednesday, April 30, 2008

कात्यायनी की एक कविताः प्यार के विरल बदहवास पलों के लिए

( कबीर की हिरना समझबूझ वन चरना. , कुमार गंधर्व की आवाज़ में सुनकर मिली प्रेरणा से)


हिरण हुए हम,
वन चरे समझबूझ कर,
परीक्षाएं काबिलियत से दीं,
इंटरव्यू में होशियारी दिखाई,
कंप्यूटर-मोबाईल खरीदने में रणनीतिकार हो गए,
टैक्स से बचने में झोंक दिया सारा दिमाग़,
और सारी नासमझियां बचा रखीं,
प्यार के विरल,
अप्रत्याशित और बदहवास पलों के लिए...।

(यह कविता एज-इट-इज नहीं है, याद्दाश्त के लिहाज से लिखी गई है, तो शायद-शब्दों का हेर-फेर हो।)

2 comments:

Udan Tashtari said...

बड़ी बारीक!!

संध्या नवोदिता said...

यह कविता कात्यायनी की है।