Wednesday, June 4, 2008

कविता- क्यों कुछ लोग बड़े हो जाते हैं

नीरज कुमार सुपरिचित युवा कवि हैं। पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा करने के बाद विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपे हैं। कविता उनके अंदर के कशमकश से हमें रू-ब-रू कराती है। फिलहाल, एबॉर्शन ऑफ़ सोशलिज़म नाम की किताब लिखने में जुटे हैं।


क्यों कुछ लोग बड़े हो जाते है

बरगद बन जाते हैं

जामुन और बेर बन जाते हैं

क्यों.. क्यों कुछ लोग बड़े हो जाते है

शहर-शहर, गांव-गांव, क़स्बे-क़स्बे छा जाते हैं

हृदय को मूसल में डाल गिलठी बना लेते हैं

पाषाण बन अवरोधों को टालते हैं
क्यों कुछ लोग बड़े हो जाते है

अखबार के फ्रंट पेज पर छा जाते हैं।

इश्तहार से चिपक जाते हैं

टेलिविज़न के परदे पर शंखनाद करते हैं

बड़े-बड़े कटआउट में लंबं हो जाते हैं

क्यों कुछ लोग बड़े हो जाते है

अपनों से अपना पता पूछते हैं

सम्मेलन में खींसे निपोरते हैं

रोटी एकलिए तड़प रहे हरखुआ पर

काव्य प्रबंध लिकते हैं

और फिर गर्ल फ्रेंड के साथ आइसक्रिम खाते हैं

एक्सक्लूसिव होकर आइडिया पकाते हैं


क्यों कुछ लोग बड़े हो जाते है

उनकी हर चीज़ बडी़ हो जाती है

उन्हीं में सिमट कर

उनकी कविताएं

मूक लोगों से दूर हो जाती हैं

गांव के चौपाल पर नहीं सुनी जाती है

लेकिन गोष्ठियों मे धूम मचाती है

हां, क्यों कुछ लोग बड़े हो जाते है

ग्रहों के चक्कर में उपग्रह हो जाते हैं

नीचे उनहे धुंधले दृस्य नजर आते हैं

कुछ लोग बहुत, बहुत

बहुत बड़े बन जाते हैं।


6 comments:

बाल किशन said...

नीरज जी को एक अच्छी कविता के लिए बधाई.
और आपको भी.

कुमार आलोक said...

प्रयास किजीये आप भी बडे हो जाइयेगा......

Udan Tashtari said...

नीरज जी कविता पढ़वाने का आभार.

DR.ANURAG ARYA said...

bahut khobsurat kavita...neeraj ji hamari aor se badhai de....

राजीव रंजन प्रसाद said...

नीरज जी की बेहतरीन रचना पढवाने का बेहद आभार।

***राजीव रंजन प्रसाद

मुंहफट said...

रोटी एकलिए तड़प रहे हरखुआ पर

काव्य प्रबंध लिकते हैं

और फिर गर्ल फ्रेंड के साथ आइसक्रिम खाते हैं

एक्सक्लूसिव होकर आइडिया पकाते हैं

...बहुत खूब। अच्छी रचना। बधाई।