Monday, June 30, 2008

फुरसतिया दिनों की याद

गुस्ताख़ को पिछले फुरसत के दिन याद आ रहे हैं। क्यों याद आ रहे हैं॥इसका जवाब भी है कि शनिवार को दफ्तर में सत्रह घंटे तक लगातार काम करने के बाद आराम के दिन याद आने ही थे।


मेरा जो गृहनगर है॥झारखंड का छोटा-सा क़स्बा.. लाल मिट्टी वाला। सुबह उठने के विषाणु (वायरस) मुझमें कभी नहीं थे। बड़े भाई साहब जूता लेकर दचकने उठते थे, तब ही बिस्तर छोड़ता था। आंखे मलता बाहर निकलता तो देखता कि हर घर के मुखिया हाथों में खुरपी लेकर घास खोद रहे हैं, बागीचे में पानी दे रहे हैं, आंगन में झाड़ू दे रहे हैं या यूं ही फुरसतिए कि तरह क्रोटन के पौधों से सूखी पत्तियां ही नोच रहे हैं। अस्तु.. थोडी़ देर बाद उनकी जब ये काम खत्म होता तो किसी एक के घर के बाहर सब जमा होते... कुरसियां डल जातीं।


घर के स्वामी छोटी बिटिया या मेरे जैसे नाकारा बेटे को चाय का आदेश देते। चाय आ जाती। आकाशवाणी पर समाचार सुने जाते। पहले दिल्ली वाले, पटना वाले फिर रांची से मतलब कम-अज-कम दो बुलेटिन तो सुने ही जाते। फिर बीबीसी वाले समाचारों का चर्वण होता। गांव की राजनीति से फिलीस्तीन मसला सब सुलझा लिया जाता। कुछ भाईबंद खेल के जानकार होते। नए लड़के सचिन के क्रिकेटिय टैलेंट की बात होती। कपिल के इनस्विंगर की॥ रवि शास्त्री के धीमे खेलने की.. ऐसी ही बातें। विधायक जी के चावल चुराने से लेकर स्थानीय एमपी साहब पहले कोयले की मालगाडियो से कोयले चुराया करते थे इसका रहस्योद्घाटन भी।


ऐसी ही बातों में चाय का एक और दौर चलता। बातों के अंतहीन सिलसिले... जो तभी टूटता जब गृहस्वामिनी परदे के पीछे से डांटने की-सी मुद्रा में कहती - क्यों जी स्कूल (या दफ्तर जो भी लागू हो) नहीं जाना। फिर जमात धीरे-धीरे बिखरती । अपने-अपने घर में नहाने खाने के बाद एक हाथ से साइकिल और दूसरे से धोती का छोर पकड़ के लोगबाग दफ्तर को निकल लेते।


दप्तर में काम की कमी या काम करने की इच्छा की कमी के मद्देनज़र पहले शान से कुरसी झड़वाई जाती। स्कूल के केस में मास्टर साहब प्रार्थना के बाद या उसेक दौरान ही पहुंचते। मुझे याद है प्रार्थना के दौरान मास्टर साहब लोग आंखे मूंद कर पता नहीं किसके खयालों में खो जाते थे। संभवतः अपने इष्ट के खयाल में। लेकिन लड़के इस अवसर का फायदा उठाते। कुछ तो घर को फूट लेते ॥ बाकी जो फूट नहीं सकते वे आपस में लड़कर,एक दूसरे को गाली देकर या पादकर ही अपनी भड़ास निकालते।


फिर हर दो पीरियड के बाद चाय के दौर होते। शाम के वक्त॥यानी पांच बजे दफ्तर के लोग दो हिस्सों में निकलते।। एक जो सब्जी बाजार होते हुए घर लौटेंगे। और दूसरे जिनकी बीवियां वित्त मंत्री हुआ करतीं। लौंडे खेल के मनौदान की तरफ... बरसात होती तो फुटबॉल खेला जाता, जाडों में क्रिकेट और गरमियो में बेल तोड़कर खाए जाते। जिसके अंदर का गोंद हमारे मुंह पर लगा जाया करता था। गरमियों में आम तौर पर हम पतंगे उड़ाते, गोली खेलते या फिर गिल्ली डंडा खेलते। अब तो मौसम के हिसाब से खेल का चलन खत्म हो गया है और बरसात हो या गरमी क्रिकेट ही खेली जाती है।


वह मैदान लड़कियों के स्कूल का पिछवाड़ा था। और उस दौरान हम प्यार-मुहब्बत के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे। जब जान गए तो अपना एक पीरियड गोल कर पहले ही मैदान पहुंच जाते थे। टापने। कईयों को उस दौरान ट्रू-लव (सच्चा प्यार) भी हुआ। हमारा चैहरा ही इतना चूतियाटिक था, कि लड़कियां घास नहीं डालती थी।(राज की बात ये कि आज भी नहीं डालती) फिर दसवीं के इम्तिहान के बाद लड़के छिटक गए। कोई पटना कोई रांची निकल गया। एक दोस्त की प्रेम कहानी बडी़ मार्मिक है। वह दसवीं के बाद लखनऊ चला गया। उसकी प्रेमकथा इतनी मार्मिक है कि दिल पर पत्थर रखकर लिखना पड़ेगा। बड़ा पत्थर चाहिए होगा, खोज रहा हूं मिलते ही फिर बताऊगा। लेकिन अभी तो वो पल याद आ रहे हैं, जब चिंता नाम की चीज़ नहीं थी। एक ही चिंता हुआ करती थी संस्कृत की परीक्षा में पास होने की।

Saturday, June 28, 2008

नौकरी- एक कविता


मैं फिर से मां की आंखों का तारा हो गया हूं,
बहनों का दुलारा हो गया हूं,
झिड़कियां थमती नहीं थी जिनकी,
नौकरी मिली,

तो उन सबका प्यारा हो गया हूं।

Tuesday, June 24, 2008

सौमित्र च‍टर्जी को दादा साहेब फाल्के


ताज़ा खबर ये है कि बांगला फिल्मों के जानेमाने अभिनेता सौमित्र च‍टर्जी को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार दिया जा सकता है। इस बारे में बाज़ार में खय्याम और प्राण के नामों पर भी विचार चल रहा था। लेकिन सूत्रों के मुताबिक बांगाली कार्ड कारगर हो गया है। और इस साल सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार भी मुंह फुला कर स्वीकारकरने वाले सौमित्र को दादा साहेब दिया जाएगा। बहरहाल ,हम उनकी काबिलियत पर शंका नहीं कर रहे और जानते हैं कि वह इसके काबिल हैं और उन्हें बहुत पहले ऐसे पुरस्कार मिल जाने चाहिए थे। आखिर सत्यजित रे के साथ उन्होंने १४ फिल्में की हैं।

Monday, June 23, 2008

कैसे बने कामयाब पति- कुछ नुस्खे


आज के दौर में हर शादीशुदा या गैरशादीशुदा इंसान जिस समस्या से जूझ रहा है वह है कामयाब पति कैसे बनें की जद्दोजहद-- कक्का जी ने सोफे पर पसरते हुए बयान दिया। कक्का जी का चेहरा भव्य है और पीआर करने में माहिर हैं, उनकी मूंछे यूपीए गठबंधन की तरह खिचडी हैं। नाक के बाल बीएसपी की तरह कभी समर्थन देते हैं, कभी खींच लेते हैं।


गुस्ताख हैरान रह गया। शादीशुदा तो खैर समझ में आता है कि परेशां होंगे लेकिन गैर शादीशुदा॥?यार वो भी कभी शादीशुदा होंगे कि नहीं-- कक्का जी ने बात साफ़ की। देखते नहीं कि कनाडा में बठे उड़नतश्तरी तक पत्नी से घबराते हैं। पत्नी होती ही घबराने वाली चीज़ है। कविता या कहानी में किसी स्त्री की जिक्र हो जाए, तो पत्नी एयर ले लेती है। कौन है? किस पर लिखा है इतना रोमांटिक ? हम पर तो कभी नहीं लिखा? अब आप जनाब देते रहे दुहाई-- तुमको मैं अपनी जान कहूँ या नील गगन का चाँद कहूँ।

गुस्ताख घबराया - यार कक्का कोई तो नुस्खा होगा कामयाब पति बनने का। कक्का जी फूले -सुनो बचवा हमारे हमारे पास इस बारे में अगाध नॉलेज है। गुस्ताख ने पूछा - पति बनने का? पर हमारे खयाल से आप भी बेलन नहीं तो कम-अज-कम बातों से पसली तो रोज़ाना तुड़वाते ही हैं। कक्का जी ने रजनीश को बहुत पढ़ा है।

उनकी बातचीत में सेक्स बहुत बार प्रयोग होता है। कुछ महिला विमर्श भी पढ़ रखा है। सेकेंड सेक्स भी पढ़ने दिया था। साइकोलजी पढ रखी है। कहा- तुन्हें अभिनय आना चाहिए वह भी बेदाग। रोने लगो तो राजेंद्र कुमार फेल हो जाना चाहिए। भावप्रवण अभिनय करो॥ राजकपूर की तरह.. लगे कि यह जो बंदा है सच्चा है और आरोप लगे तो अभी मैच फिक्सिंग में फंसे कपिल की तरह दहाड़ें मार कर रो पड़ेगा।

दूसरा, झूठ बालना आना चाहिए। पत्नी को बिला शक बॉस मानते हुए बहाने बनातर हमेशा तैयार रखों। बहाने भी एक दम फिट एन फाईन हों? यार आज तो लाईफ़ एँड डेथ का मामला था। इस टाइप का॥कक्का जी कुछ बोलने ही वाले थे कि भीतर से काकी ने आवाज़ लगाई..कक्का बाहर निकले तो कुछ और नुस्खें बताएं। हम भी इंतजार में हैं।

Friday, June 20, 2008

मेरी अभिलाषा- कविता

मैं होना चाहता हूं पेड़
ताकि कोई ले जाए तोड़कर मेरी शाख़
और मुझे जलाकर पकाए अपनी रोटियां
उसकी फूंकों के संग बन कर उडुं राख

मैं होना चाहता हूं चुटकी भर नमक
या कि हल्दी
कि मेरे होने से किसी के खाने में आ जाए स्वाद
किसी की पीली हो जाए दाल
और मुस्कुराहटों से भर जाए उसके गाल

मैं होना चाहता हूं घास
कि मुझे खाकर कोई गाय
बना दे दूध
या कि गोबर सही
कि किसी के चूडी़ भरे हाथों से दुलरा का दीवारों पर ठोंक दिया जाऊं
उपले बनकर चूल्हे में जलूं
पर कुछ होने की खुशी पाऊं

Wednesday, June 18, 2008

तपन सिन्हा को लाईफ टाईम अचीवमेंट

ताजा समाचार ये है कि इस बार भारत का पहला लाईफ़ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार तपन सिन्हा को दिया जाएगा। २० जून को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी न्यू अलीपुर के उनके मकान पर जाकर उन्हें ये पुरसकार देंगे। साथ में सूचना और प्रसारण मंत्री प्रिय रंजन दास मुंशी भी होंगे। लाईफ टाईम अचीवमेंट श्रेणी को पहली बार राष्ट्रीय पुरस्करों में शामिल किया गया है। और भारत की आजा़दी की साठवीं सालगिरह पर इसे शुरु किया गया है।

तपन सिन्हा की पहली फिल्म उपहार थी जो १९५५ में रिलीज़ हुई थी। १९५६ मे रिलीज़ हुई फिल्म काबुलीवाला दूसरी फिल्म थी।इसके गाने तो आज तक लोगो की ज़बान पर हैं। इसके अलावा एक डॉक्टर की मौत, सगीना और आदमी और औरत तपन दा की बेहतरीन फिल्मों में गिनी जाती हैँ। आपने बावर्ची जैसी कई फिल्मों की कहानी भी लिखी है।

Friday, June 13, 2008

सस्ता शेर

"उन्हें याद करने का ये रीज़न था

कि मर जाए निगोडी़ हिचकी लेते-लेते।।"


नोट- महिलाएं अपने पुरुष मित्रों के लिए 'निगोडा़' शब्द इस्तेमाल करें।

Thursday, June 12, 2008

ईरानी फिल्म- वेयर इज़ द फ्रेंड्स होम( खानेह ये दस्त कोजस्त


फिल्म- वेयर इज़ द फ्रेंड्स होम ( खानेह ये दस्त कोजस्त)
ईरान/१९८७/रंगीन/९० मिनटनिर्देशन और पटकथा- अब्बास कियारोस्तामी

सिनैमेटौग्रफी- फ़रहाद साबा
कास्ट- बेबाक अहमदपुर, अहमद अहमादापुर


एक छोटा लड़का एक दिन स्कूल से लौटकर जब अपनी होमवर्क करने बैठता है। तो देखता है कि उसने गलती से अपने दोस्त की कॉपी भी अपने बस्ते में डाल ली है। चूंकि, उसका क्लास टीचर चाहता है कि सारे होमवर्क एक ही कॉपी में किए जाएं, ऐसे में वह लड़का माता-पिता के मना करने पर भी पड़ोस के गांव में रहने वाले छात्र के यहां जाकर कॉपी वापस करना चाहता है। लेकिन वह अपने दोस्त के पिता का नाम या पता नहीं जानता। ऐसे में वह उसे खोजने में नाकाम रहता है।


आखिरकार, कई लोगों की मदद और ग़लत घरों में घुसने के बाद लड़का अपने गांव वापस लौटकर उस लड़के का भी होमवर्क पूरा करने का फ़ैसला करता है।


पूरी पटकथा निर्दोष है। किस्सागोई का एक अलग अंदाज़..जिसमें ईरान में आई इस्लामी क्रांति का असर देखा जा सकता है। क्रांति के पहले का ईरान कुछ और था। सभ्यता के कुछ और मायने थे। रूमी की कविताओं की शानदार पंरपरा थी। लेकिन इस्लामी क्रांति ने पहरे बिठा दिए। लेकिन इन परंपराओं का असर फिल्म पर पूरी तरह देखा जा सकता है। कड़ी बंदिश के बाद फिल्मकारो ने इतिहास और परिस्थियों को मेटाफर के तौर पर दिखाना शुरु कर दिया। आम तौर पर किरियोस्तामी जैसे निर्देशकों ने बच्चों को लेकर फिलमें बनाई और बच्चों को ईरान के नागरिक का प्रतीक और मेटाफर ( ध्यातव्यः प्रतीक और मैटाफर में बुनियादी अंतर होता है) के तौर पर इस्तेमाल करना शुरु कर दिया। फिल्मों में लोग पूरे ईरान में घूमते हैं। और इस तरह फिल्मकारों ने समस्याओ को सामने रखने का अपना काम जारी रखा।इस फिल्म की बात करे ंतो इसमें बच्चे को अनेक अनिश्चितताओं के मेटाफर बनाकर पेश किया गया है। दोस्त मिलेगा या नहीं, लड़का घर कैसे ढूंढेगा और घर नहीं मिला तो लड़का क्या करेगा॥ये सवालात सहज ही दिमाग में उठते हैं।


औरतों की समस्या भी खासतौर पर रेखांकित की जा सकती है। गो कि बच्चे को सहज ही हर घर के भीतर प्रवेश मिलता है। और बच्चे का अपनी मां और अपने पिता के साथ रिशते भी खास तौर पर ध्यान दिए जाने लायक है।एक दृश्य में, बच्चे को जब उलझन रहती है कि रात घिर आने के बाद वह घर नहीं खोज पाया है और कॉपी भी उसे देनी ही है। वह एक खिड़की के सामने खड़ा होता.. और उसे तत्काल हल मिल जाता है। यह सीन कुछ इस तरीके से शूट किया गया है और परदे पर कुछ इस तरह दिखता है ..जैसे इस्लामी संस्कृति में ईश्वरीय शक्ति को उकेरा जाता है। जाली दार खिड़की और उससे छनकर आती बेहिसाब रौशनी..फिल्म में बच्चा बड़ों के लिए ताकत का प्रतीक बन कर उभरता है। वैसे बड़ों के लिए जो शासन और सत्ता से खतरे और धमकियों का सामना कर रहे थे। पाठकों को सलाह ये है कि ईरान की इस फिल्म को ज़रूर देखे।

Sunday, June 8, 2008

नल्लू पेन्नूगल और अडूर गोपाल कृष्णन


चार नहीं समाज की सभी औरतों की कहानी


गोवा में ही अजित राय ने अडूर की इस फिल्म की अहमियत समझा दी थी। मैं व्यस्तताओं की वजह से फिल्म देख नहीं पाया। टीवी में काम करना फिल्मोंत्सव कवरेज के दौरान भी फिल्म देखने की छूट कम ही देता है। बहरहाल, मन में साध थी, कि यह फिल्म देखूं। दिल्ली के जिस इलाके में रहता हूं वहां भी मलयाली लोग रहते हैं लेकिन सीडी किराये पर देने वाले के पास भी अडूर नहीं थे।


बहरहाल, रविवार को इंडिया हैबिटाट सेंटर में कवरेज के ही दौरान मैं दम साध कर कैमरामैन की तरफ बिना देखे.. पूरी फिल्म देख गया। कैमरामैन भी देख रहा था, मेरे ही साथ अगली सीट पर अडूर भी थे और नंदिता भी। नंदिता इस फिल्म में एक अहम रोल में हैं।


बहरहाल , नल्लू पेन्नूगल.. मेरे हिसाब से यही उच्चारण होना चाहिए ... यानी चार औरते केरल के एल्लेप्पी जिले के कुत्तांड के विभिन्न पृष्ठभूमि की चार महिलाओं की कहानी है। फिल्म टी शिवशंकर पिल्लई की चार अलग कहानियों पर आधारित है। अडूर ने कहा भी कि वह कहानियों से फिल्म बनाने में थोड़ी छूट ले गए हैं लेकिन यह छूट महज रचनात्मक छूट ही है। हर कहानी में आरोह, उत्थान और उपसंहार है । और हर कहानी आपको एक ऐसी जगह परले जाकर छोड़ देती है, जहां आप महज आह भरकर आगे की कल्पना ही कर सकते हैं।


पहली कहानी द प्रोस्टिट्यूट में वेश्या कुंजीपेन्नू की भूमिका में पद्मप्रिया हैं। कुंजीपेन्नू, पप्पूकुट्टी से शादी कर अपना धंधा छोड़कर आम जिंदगी जीना चाहती है। लेकिन समाज का दकियानूसी रवैया और शादी का कोई सुबूत न होना उनके गले की हड्डी बन जाता है। आखिरकार, पुलिस उन्हे पकड़ ले जाती है। जहां उन्हे ग़ैरक़ानूनी ढंग से यौन क्रिया का दोषी मानते हुए १५ दिन की जेल हो जाती है। अपने अच्छी ज़िंदगी(?) यानी मजदूरी के दौरान ठेकेदार का लोलुप रवैया और साथी मजदूरों की सहानुभूति कहीं न कहीं मार्क्सवाद के असर का परिणाम जान पड़ती है।


फिल्म में दूसरी कहानी है- द वर्जिन। फिल्म के इस हिस्से में गीता मोहन दास की मुख्य भूमिका है। वह धान के खेतों में काम करती है,और उपार्जित पैसे अपने दहेज के लिए बचा कर रखती है। लेकिन उसकी शादी एक ऐसे कंजूस और पेटू दुकानदार से हो जाती है। जिसे सेक्स में बिलकुल रुचि नहीं। और ेक दिन वह अचानक बिना कारण ही कुमारी को मायके छोड़ आता है। चरित्र पर बिना किसी तरह की सफाई दिए कुमारी फिर से खेतों में काम करने लग जाती है।


तीसरी कहानी एक घरेलू औरत की है। विवाह के कऊ साल बीत जाने के बाद भी मां नहीं बन पाती। ऐसे में उसका स्कूली दिनों का एक सीनियर आजा है। सीनियर उसका प्रैमी भी रहा होता है। वह उसे बच्चा होने का एक ऐसा तरीका बताता है, जिसे अनैतिक माना जाता है। बहरहाल, घरेलू स्त्री उसे नकार देती है और घर से निकल जाने को कहती है।


चौथी कहानी में काली कामाक्षी( नंदिता) के विवाह में आ रही अड़चनों का आख्यान है। उसे देखने आया लड़का उसीक छो़टी बहन को पसंद कर उससे विवाह कर लेता है। छोटे भाई की भी शादी हो जाती है, मां के मरने के बाद कामाक्षी अकेली हो जाती है। उसकी अपनी ही बहन अपने घर में पनाह देने को राजी नहीं, ऐसे में आखिर में कामाक्षी अपमी मर्जी से अकेलेपन को चुन लेती है।


पूरी फिल्म में कैमरा शानदार तरीके से वही दिखाता है,जिसकी कतहानी को ज़रूरत होती है। ज्यादा मूवमेंट किए बिना कैमरे में यथार्थवादी तरीके से किस्सागोई की गई है। अडूर का समांतर सिनेमा सोकॉल्ड बड़े फिल्मकारों की सोच से मीलों आगे है। और जो लोग अच्छी फिल्मों के दर्शकों के टोटे का रोना रोते हैं, उनके लिए तो अडूर एक सबक हैं। हमीं ने कभी अडूर से पूछा था, हिंदी में फिल्में क्यों नहीं बनाते.. सीधा जबाव था.. मलयालम में दर्शक मिल रहे हैं तो हिंदी के ढूंढने क्यों जाउँ?



Wednesday, June 4, 2008

कविता- क्यों कुछ लोग बड़े हो जाते हैं

नीरज कुमार सुपरिचित युवा कवि हैं। पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा करने के बाद विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपे हैं। कविता उनके अंदर के कशमकश से हमें रू-ब-रू कराती है। फिलहाल, एबॉर्शन ऑफ़ सोशलिज़म नाम की किताब लिखने में जुटे हैं।


क्यों कुछ लोग बड़े हो जाते है

बरगद बन जाते हैं

जामुन और बेर बन जाते हैं

क्यों.. क्यों कुछ लोग बड़े हो जाते है

शहर-शहर, गांव-गांव, क़स्बे-क़स्बे छा जाते हैं

हृदय को मूसल में डाल गिलठी बना लेते हैं

पाषाण बन अवरोधों को टालते हैं
क्यों कुछ लोग बड़े हो जाते है

अखबार के फ्रंट पेज पर छा जाते हैं।

इश्तहार से चिपक जाते हैं

टेलिविज़न के परदे पर शंखनाद करते हैं

बड़े-बड़े कटआउट में लंबं हो जाते हैं

क्यों कुछ लोग बड़े हो जाते है

अपनों से अपना पता पूछते हैं

सम्मेलन में खींसे निपोरते हैं

रोटी एकलिए तड़प रहे हरखुआ पर

काव्य प्रबंध लिकते हैं

और फिर गर्ल फ्रेंड के साथ आइसक्रिम खाते हैं

एक्सक्लूसिव होकर आइडिया पकाते हैं


क्यों कुछ लोग बड़े हो जाते है

उनकी हर चीज़ बडी़ हो जाती है

उन्हीं में सिमट कर

उनकी कविताएं

मूक लोगों से दूर हो जाती हैं

गांव के चौपाल पर नहीं सुनी जाती है

लेकिन गोष्ठियों मे धूम मचाती है

हां, क्यों कुछ लोग बड़े हो जाते है

ग्रहों के चक्कर में उपग्रह हो जाते हैं

नीचे उनहे धुंधले दृस्य नजर आते हैं

कुछ लोग बहुत, बहुत

बहुत बड़े बन जाते हैं।


Monday, June 2, 2008

हिंदी स्लैंगकोष 3

कुछ शब्दों को आक्सफोर्ड डिक्शनरी ने भी चुरा लिया है। और कुछ बड़ी-बड़ी कंपनियाँ इन शब्दों को अपनें ब्रांड के रूप में भी यूज़ कर रही हैं। मसलन --

देखलुक - मतलब "देखना" - देख --- लुक (Look)-
किनले - मतलब "ख़रीद" - KINLEY (Pepsi Mineral Water)-
पैलियो - मतलब "पाया" - Palio (Fiat's Car)-
गुच्ची - मतलब "छेद" - Gucci (Fashion Products)

अब बिहार में आपका नाम कैसे बदल जाता है उसकी भी एक बानगी देखिए। यह इस्टेब्लिस्ड कनवेंशन है कि आपके नाम के पीछे आ, या, वा लगाए बिना वो संपूर्ण नहीं है। मसलन....

राजीव - रज्जीवा
सुशांत - सुशांतवा
आशीष - अशीषवा
राजू - rajuaa
संजय - संजय्या-
अजय - अजय्या
श्वेता - शवेताबा

कभी-कभी माँ-बाप बच्चे के नाम का सम्मान बचाने के लिए उसके पीछे जी लगा देते है। लेकिन इसका कतई यह मतलब नहीं कि उनके नाम सुरक्षित रह जाते हैं।

मनीष जी - मनिषजीवा
श्याम जी - शामजीवा
राकेश जी - राकेशाजीवा

अब अपने टाईटिल की दुर्गति देखिए।

सिंह जी - सिंह जीवा
झा जी - झौआ
मिश्रा - मिसरवा
राय जी - रायजीवा
मंडल - मंडलबा
तिवारी - तिवरिया
ठाकुर- ठकुरवा