Wednesday, April 8, 2009

कविता- जिंदगी चाय है



जितना आसान था सवाल मेरा,


उससे भी आसान उनका जवाब आया,


जिंदगी क्या है??


चाय की प्याली हाथ में लेकर


मासूमियत से उनने चुस्की ली और फरमाए-----


चाय जिंदगी है।


अटपटा लगा उनका जवाब


पूछ बैठा, कैसे भला


जिंदगी कड़वाहट है, चाय पत्ती की तरह


जिंदगी मीठी है शक्कर जैसी


जिंदगी हौले से जिओगे तो जी जाओगे


जल्दी-जल्दी में जल जाओगे


कहकर दुबारा लेने लगे चाय की चुस्की


एक दम आसान-सी जिंदगी की तरह


मुझे कर दिया था अपनी बातों से कायल उनने


लगने लगी थी मुझे भी


चाय की इच्छा..


चहास।।



शांतिदीप आजकल मेरे साथ जनादेश में काम कर रहे हैं। मंदी के इस दौर में नौकरी की तलाश कर रहे हैं। तेवर पत्रकारों वाले लेकिन कविता के वायरस भी हैं उनके अंदर। चाय पर चर्चा के एक विशेष सत्र के बाद उनने ये कविता मुझे दी है। छापने से रोक नही पा रहा--गुस्ताख़


8 comments:

mehek said...

जिंदगी हौले से जिओगे तो जी जाओगे

जल्दी-जल्दी में जल जाओगे
bahut sahi kaha sunder rachana.mithi chai ki tarah.

Rachna Singh said...

achchii lagii yae soch

आलोक सिंह said...

बहुत सुन्दर
जिंदगी कड़वाहट है, चाय पत्ती की तरह
जिंदगी मीठी है शक्कर जैसी

यती said...

wa ! ustad wa !!

अनिल कान्त : said...

maza aa gaya bhai ....achchha tha ye bhi

संगीता पुरी said...

बहुत बढिया लिखा है बधाई।

media narad said...

हिंदी मीडिया जगत पर नई वेबसाइट लॉन्च हुई है. कृपया आप भी नजर डाले. आपके सुझावों और आपके विचारों का स्वागत है. वेबसाइट है www.medianarad.com

अगिया बेताल said...

शांतिदीप की एक और कविता है। इसे भी जगह दें।

सन्नाटा

यह कैसा सन्नाटा है जो कान फोड़ता है

यह सन्नाटा भी कितने सवाल बोलता है

यह कैसा सन्नाटा है जिसमें इतनी आवाज़ें हैं

हर गली हर मोड़ पर हर शख्स परेशान है

यह सन्नाटा भेड़िए के झपटने के पहले का है

या फिर ज़मीन के लाल हो जाने के बाद का है

यह सन्नाटा शाम का है या भोर का

दोपहर का है या रात के अंतिम छोर का

यह कैसा सन्नाटा है जो कान फोड़ता है

यह सन्नाटा भी कितने सवाल बोलता है।