Friday, April 17, 2009

नरक में मार्च एंडिंग


मैं आजकल नरक में हूं। नरक में रहना कोई बहुत पापकर्म रहा नहीं। नरक में भी मौज है। मर्त्यलोक में हमारे कर्मों का लेखा-जोखा करने के बाद और हमारे चरित्र का विश्लेषण करने के बाद चित्रगुप्त जी महाराज ने बहियां जला दीं क्योंकि उन्हें डर है कि इस सेंसरशिप के बगैर आने वाली पीढियां हमारी तरह ही गुस्ताख और बददिमाग़ हो लेंगी।

बहरहाल, मौज में हूं। नरक में जितना फंड बजट के बाद आया था, खर्च नहीं हो पाया। पता नहीं क्यों। जिस कड़ाह में तेल डाल कर हम जैसे पापियों को उबालते-तलते थे, उसकी तली में छेद हो गया है। कड़ाह खरीदा नहीं गया है, एक पुराना कड़ाह कबाड़ में रखा तो है लेकिन न तो कोयला है जलाने के लिए और न ही तेल आ पाया है। इस काम के लिए फंड नहीं था।


जिस आरे से पापियों को चीरा जाता रहा है, उस आरे की दांतें घिस गई हैं। गोया उस आरे से चोट तो लग सकती है लेकिन चीरा नहीं जा सकता। सारे हरबे-हथियार पुराने पड़े हुए हैं, संग्रहालय में रखने लायक हो चुके हैं। हम सारे पापी उस हथियारखाने की ओर से गुज़रते हैं तो सादर थूक समर्पित करते हुए जाते हैं।


नरक में पूछताछ के कमरे, अपराधी के सिर पर जलने वाला जो ढाई सौ वॉट का बिजली का बल्ब लगा होता है, वह फ्यूज़ हो चुका है और चेहरे पर फेंकने के लिए गंदे पानी की सप्लाई भी रोकी हुई है। ऐसे में पापियों से पूछताछ रुकी हुई है। स्टे ऑर्डर लगा हुआ है पूछताछ पर। पापी चक्की भी नहीं पीस पा रहे... चक्की चलाएं तो कैसे, पीसने के लिए अनाज भी नहीं आया।


ये सारा मामला फरवरी के आखिरी दिनों तक ही था। मार्च के शुरुआती दिनों में एडमिन( नरक प्रशासन) की नींद खुली। अतिरिक्त महानिदेशक ने डायरेक्टर से, डायरेक्टर ने जॉइंट डायरेक्टर, जॉइँट डायरेक्टर ने डिपुटी डायरेक्टर से यानी बड़े अधिकारी ने छोटे अधिकारी से और उस अधिकारी ने एकांउंटेंट से जानकारी मांगी।


कहा, फंड खरचना ज़रूरी है वरना अगले वित्त वर्ष में फंड कम हो जाएगा। अब नरक में मच गई अफरातफरी। निविदाएं मंगाई जाने लगीं। अधिकारियों के कमरे में एसी बदल दिए गए। पूरे नर्क प्रशासन भवन की पुताई की गई, साइन बोर्ड, बदल दिए गए। सेंट्रलाइज्ड एसी को दुरुस्त करने के बहाने ढेर खर्च किया गया।


मज़बूत दीवार को तोड़ने में कई मजदूर लगाए गए...फिर उसे तोड़कर कमजोर और डिजाइनदार दीवार बनाई गई। अतिरिक्त महानिदेशक और संयुक्त सचिव को पसंद नहीं आई। नतीजतन दीवार तोड़ दी गई और उसकी जगह नामी कंपनी का बना कांच लगाया गया।


नरक के लॉन में खुदाई करके नर्सरी से मंगाई गई घास रोपी गई। किनारे-किनारे मंहगी इंटें गाड़कर फूलों के पौधे लगाने की जगह बनाई गई। साइकस और मनीप्लांट के मंहगे पौधे मंगाए गए। सात-आठ सौ पौधे, जिनमें पानी न डालने की सख्त हिदायत दी गई है। लोगबाग उसे थूकदान की तरह इस्तेमाल करते हैं।


सभी अधिकारियों के कमरों में नए सोफे लगाए गए और वैसे लोग जो सोफे के काहिल नही उनके कमरे में नए कवर वाले पुराने सोफे डाल दिए गए। फर्श की घिसाई की गई.. मतलब सारे पैसे खर्च हो गए, अब चपरासियों को वेतन नहीं मिला है और कड़ाह वगैरह की खरीद नहीं हो पाई है। पानी की सप्लाई दुरुस्त नहीं हो पाई है, तेल बेचने वाला कोई अधिकारी का रिश्तेदार नहीं निकल पाया सो निविदा भी नहीं निकल पाई। आरा अब भी दांत के इंतजार में है। हरबे हथियारों के ज़रुरत ही नहीं है, उसका इस्तेमाल करना कौन चाहता है।


लब्बोलुआब ये कि अधिकारी वित्त वर्ष खत्म होने से पहले खुले हाथों से फंड की रकम खर्च करने में व्यस्त हैं। यमराज ये देखने में लगे है कि उसकी बाईट किस चैनल पर कितने देर चली। और हम पापी नरक में मज़े ले रहे हैं।


Tuesday, April 14, 2009

एक ग़ज़ल

शामिल तेरी हयात मेरी शायरी में है
अब पूरी कायनात मेरी शायरी में है।

ये नज़्म, ये ग़ज़ल, ये क़ता ये रुबाईयां,
ख्वाबों की इक जमात मेरी शायरी में है।

दिन भर की दौड़-धूप, थकन और बेकसी
उसपर सितम की रात, मेरी शायरी में है।

मेरे अदब से सारे फरिश्ते सहम गए,
ये कैसी वारदात मेरी, शायरी में है।

गुस्ताख़ लग रहा है ज़माने को फलसफ़ा,
लेकिन ज़रा-सी बात मेरी शायरी में है।

Monday, April 13, 2009

सन्नाटा

सन्नाटा
यह कैसा सन्नाटा है,

जो कान फोड़ता है

यह सन्नाटा भी कितने

सवाल बोलता है

यह कैसा सन्नाटा हैं

जिसमें इतनी आवाज़ें हैं

हर गली हर मोड़ पर

हर शख्स परेशान है

यह सन्नाटा है ऐसा

यह सन्नाटा है ऐसा भेड़िया हो झपटने को तैयार

या ज़मीन हो जाए लाल

यह सन्नाटे की शाम है या

सन्नाटे की भोर है

ये भरी दोपहर है या

रात के अंतिम छोर है

यह कैसा सन्नाटा है जो कान फोड़ता है

यह सन्नाटा भी कितने सवाल बोलता है।

अगिया बैताल भी शांतिदीप के प्रशंसक है। बैताल ने ये कविता कमेंट के ज़रिए भेजी है। जाहिर है, इसे छापना मेरे लिए उतना ही ज़रूरी है। बैताल के राज में उसी से वैर..गुस्ताख हूं तो क्या उतनी हिम्मत थोड़े ही है।

Saturday, April 11, 2009

अंतर्गाथा- साला मैं तो एंकर बन गया।

अंतर्गाथा- मैं सिफारिशी लाल बोल रहा हूं


मेरा नाम है सिफारिशी लाल। आज कल मैं एंकर हूं, प्रतिष्ठित चैनल में... पहले मैं कबाड़ खरीदने बेचने का काम करता था। लेकिन उस बात को दिल पर न लें। क्योंकि उससे भी पहले मैं जनपथ पर लुंगी और रुमाल बेचा करता था।


बहरहाल, आज मेरी एंकरिंग का पहला दिन है। मैंने एक दम झक्क नया कोट-पैंट खरीदा है। मूंछें करीने से कुतरवाई हैं, शेव को सीधा-उल्टा दोनों तरह से मारा है। स्लमडॉग की तरह एक लड़की इम्प्रैस करनी है आज।


चेहरे पर ढेरों मेक-अप पुतवा कर नकली चेहरा लाना और नकली शालीनता लाना ज़रुरी है। हमारे चैनल की खासियत है शालीनता। ओढी हुई। मेरे चश्मे का एक रिम टेढा़ हो चुका है, लेकिन ुसे सीदा करने का वक्त नहीं है। दुनिया को टेढी़ निगाह देखना ज़रूरी हो गया है।


मैं तैयार हूँ। ८ बस बजने ही वाले हैं। टीम ने स्क्रिप्ट लिख दी होगी। उसपर नज़र डालकर होगा क्या? सीधे टेलि-प्रॉम्प्टर से पढेंगे। ऊपर से प्रसन्न दिखने की चेष्टा कर रहा हूं। अंदर से दिल धक्क-धक्क और सांसे फक्क-फक्क कर रही हैं। सिर्फ मैं ही जानता हूं कि ८ बजे का प्राइम टाइम पाने के लिए कितनी टंगड़ी मारनी पड़ी है मुझे।


पसीना आ रहा है पेशानी पे। ब्लड का बहाव तेज़ हो गया है। टीम के सारे लोग दुश्मन लग रहे हैं। स्क्रिप्ट में स, श और ष का अनुप्रास जानबूझकर डाल दिया है चू.. यो ने। सोच रहा हूं कि अपना अजेंडा कैसे पेल दूं कार्यक्रम में, आखिर जिन आकाओं ने मुझे यहां तक पहुंचाया, उनसे वफा करना ही होगा।
इस ज़माने में वफा की उम्मीद करना बेकार है, लेकिन हम उन लोगों में हैं जो वफादार है। हो भी क्यों न कोई और चारा ही नहीं। पैर छू-छू कर तो यह पद मिला है। जितने सांसदों -विधायको-पार्षदों को जानता हूं, सबके चरण घिस दिए हैं छू-छू कर मैंने।


कईयों ने तो अपने चरणों का देसी इस्तेमाल किया है मेरे लिए। मतलब मुझे लात भी मारी है। लेकिन दुधारु गाय की तो लात भी सहनी पड़ती है, है ना। सो उनके चरणों को मैं चरणामृत समझ कर सादर ग्रहण करता हूं, किया है आज तक।


एडीटोरियल टीम के मेरे लोग गदहे हैं। बड़े आदमी की अहमियत नहीं समझते। मै कितना बड़ा हूं इसका कत्तई अंदाजा नहीं है इन्हें। बहरहाल, मैंने रनडाउन देख लिया है। मेरा तो कहीं नाम ही नहीं है। इतने बड़े आदमी का नाम तो कार्यक्रम से भी बड़ा होना चाहिए।


कार्यक्रम की शुरुआत ही होनी चाहिए... नमस्कार....। मैं हूं सिफारिशी लाल, और मेरे साथ हैं मेरे को-एंकर हरफनमौला.. मेहमान है घुन्ने लाल. चर्चा करेंगे हॉलैंड में अकालपीडितों पर। सबसे आखिर में बोलूंगा कार्यक्रम का नाम.. न्यूज़ आठ बजे।


लेकिन लाइट्स जल चुकी हैं, कैमरा ऑन हो चुका है, मुझे घबराहट वैसी ही हो रही है, मेरा साथ एंकर हरफनमौला मुझसे ज्यादा तेज़ है। शुरु मुझे करना है, शुरु कैसे किया जाए????


हां, आइसक्रीम की फेरी वाले की तरह चीख कर, सावधान मुद्रा में... नमस्काआआआआआआआर। इससे आईबीएन-७ वाले आशुतोष वाला पुट भी आ जाएगा। कबाडी खरीदते वक्त भी मैं ऐसे ही फेरियां लगाया करता था। जिंदाबाद मिल गया... यूरेका।


लो जी कार्यक्रम हो गया शुरु। थोड़ा सा अटक गया मै लेकिन कोई बात नहीं देश की जनता के लिए नहीं अपनी प्रेमिका की आंख और आकाओँ के चरणों में समर्पित मेरी ये एंकरिंग.. बस स, श और ष सही से कहना है।


....नमश्कार, मैं हूं शिपारिसी लाल और मेरे शाथ हैं मेरे शाथी एंकर हरफनमऊला जी, ......

एडिटोरिल वाले गधे कान में कुछ कह रहे हैं टॉक बैक के ज़रिए, चूतियों को कहने दो, साला मैं तो एंकर बन गया। सवाल दर सवाल पूछते चलो। मतलब चाहे उसका कुछ न हो।

Wednesday, April 8, 2009

कविता- जिंदगी चाय है



जितना आसान था सवाल मेरा,


उससे भी आसान उनका जवाब आया,


जिंदगी क्या है??


चाय की प्याली हाथ में लेकर


मासूमियत से उनने चुस्की ली और फरमाए-----


चाय जिंदगी है।


अटपटा लगा उनका जवाब


पूछ बैठा, कैसे भला


जिंदगी कड़वाहट है, चाय पत्ती की तरह


जिंदगी मीठी है शक्कर जैसी


जिंदगी हौले से जिओगे तो जी जाओगे


जल्दी-जल्दी में जल जाओगे


कहकर दुबारा लेने लगे चाय की चुस्की


एक दम आसान-सी जिंदगी की तरह


मुझे कर दिया था अपनी बातों से कायल उनने


लगने लगी थी मुझे भी


चाय की इच्छा..


चहास।।



शांतिदीप आजकल मेरे साथ जनादेश में काम कर रहे हैं। मंदी के इस दौर में नौकरी की तलाश कर रहे हैं। तेवर पत्रकारों वाले लेकिन कविता के वायरस भी हैं उनके अंदर। चाय पर चर्चा के एक विशेष सत्र के बाद उनने ये कविता मुझे दी है। छापने से रोक नही पा रहा--गुस्ताख़


Tuesday, April 7, 2009

''अच्छे-अच्छे काम करते जाना-3

वरुण देवता का प्रसाद गांव अपनी अंजुली में भर लेता था.

और जहां प्रसाद कम मिलता है? वहां तो उसका एक कण, एक बूंद भी भला कैसे बगरने दी जा सकती थी. देश में सबसे कम वर्षा के क्षेत्र जैसे राजस्थान और उसमें भी सबसे सूखे माने जाने वाले थार के रेगिस्तान में बसे हजारों गांवों के नाम ही तालाब के आधार पर मिलते हैं. गांवों के नाम के साथ ही जुड़ा है 'सर'. सर यानी तालाब. सर नहीं तो गांव कहां? यहां तो आप तालाब गिनने के बदले गांव ही गिनते जाएं और फिर इस जोड़ में 2 या 3 से गुणा कर दें.

जहां आबादी में गुणा हुआ और शहर बना, वहां भी पानी न तो उधार लिया गया, न आज के शहरों की तरह कहीं और से चुरा कर लाया गया. शहर ने भी गांवों की तरह ही अपना इंतज़ाम खुद किया. अन्य शहरों की बात बाद में, एक समय की दिल्ली में कोई 350 छोटे-बड़े तालाबों का जिक्र मिलता है.गांव से शहर, शहर से राज्य पर आएं. फिर रीवा रियासत लौटें. आज के मापदंड से यह पिछड़ा हिस्सा कहलाता है. लेकिन पानी के इंतज़ाम के हिसाब से देखें तो पिछली सदी में वहां सब मिलाकर कोई 5000 तालाब थे.

नीचे दक्षिण के राज्यों को देखें तो आज़ादी मिलने से कोई सौ बरस पहले तक मद्रास प्रेसिडेंसी में 53000 तालाब गिने गए थे. वहां सन् 1885 में सिर्फ 14 जिलों में कोई 43000 तालाबों पर काम चल रहा था. इसी तरह मैसूर राज्य में उपेक्षा के ताजे दौर में, सन् 1980 तक में कोई 39000 तालाब किसी न किसी रूप में लोगों की सेवा कर रहे थे.

इधर-उधर बिखरे ये सारे आंकड़े एक जगह रख कर देखें तो कहा जा सकता है कि इस सदी के प्रारंभ में आषाढ़ के पहले दिन से भादों के अंतिम दिन तक कोई 11 से 12 लाख तालाब भर जाते थे- और अगले जेठ तक वरुण देवता का कुछ न कुछ प्रसाद बांटते रहते थे. क्योंकि लोग अच्छे-अच्छे काम करते जाते थे.

आज भी खरे हैं तालाब एक किताब पढी है हाल में... गांधी शांति प्रतिष्ठान की, जानकारी भी बढ़ी। ऐसी जानकारियां जो मेरे घर की हैं लेकिन खुद नहीं जानता था मैं... सो सोचा कुछ आप लोगो से भी बांट
लूँ


अच्छे-अच्छे काम करते-2

समाज ने जिस काम को इतने लंबे समय तक बहुत व्यवस्थित रूप में किया था, उस काम को उथल-पुथल का वह दौर भी पूरी तरह से मिटा नहीं सका. अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के अंत तक भी जगह-जगह पर तालाब बन रहे थे.

लेकिन फिर बनाने वाले लोग धीरे-धीरे कम होते गए. गिनने वाले कुछ जरूर आ गए पर जितना बड़ा काम था, उस हिसाब से गिनने वाले बहुत ही कम थे और कमजोर भी.


इसलिए ठीक गिनती भी कभी हो नहीं पाई. धीरे-धीरे टुकड़ों में तालाब गिने गए, पर सब टुकड़ों का कुल मेल कभी बिठाया नहीं गया. लेकिन इन टुकड़ों की झिलमिलाहट पूरे समग्र चित्र की चमक दिखा सकती है.



लबालब भरे तालाबों को सूखे आंकड़ों में समेटने की कोशिश किस छोर से शुरू करें? फिर से देश के बीच के भाग में वापस लौटें.




आज के रीवा ज़िले का जोड़ौरी गांव है, कोई 2500 की आबादी का, लेकिन इस गांव में 12 तालाब हैं. इसी के आसपास है ताल मुकेदान. आबादी है बस कोई 1500 की, पर 10 तालाब हैं गांव में. हर चीज़ का औसत निकालने वालों के लिए यह छोटा-सा गांव आज भी 150 लोगों पर एक अच्छे तालाब की सुविधा जुटा रहा है. जिस दौर में ये तालाब बने थे, उस दौर में आबादी और भी कम थी. यानी तब ज़ोर इस बात पर था कि अपने हिस्से में बरसने वाली हरेक बूंद इकट्ठी कर ली जाए और संकट के समय में आसपास के क्षेत्रों में भी उसे बांट लिया जाए. वरुण देवता का प्रसाद गांव अपनी अंजुली में भर लेता था.


''अच्छे-अच्छे काम करते जाना,

''अच्छे-अच्छे काम करते जाना,'' राजा ने कूड़न किसान से कहा था. कूड़न, बुढ़ान सरमन और कौंराई थे चार भाई. चारों सुबह जल्दी उठकर अपने खेत पर काम करने जाते.


दोपहर को कूड़न की बेटी आती, पोटली से खाना लेकर. एक दिन घर से खेत जाते समय बेटी को एक नुकीले पत्थर से ठोकर लग गई. उसे बहुत गुस्सा आया. उसने अपनी दरांती से उस पत्थर को उखाड़ने की कोशिश की. और फिर बदलती जाती है इस लंबे किस्से की घटनाएं बड़ी तेजी से. पत्थर उठा कर लड़की भागी-भागी खेत पर आती है. अपने पिता और चाचाओं को सब कुछ एक सांस में बता देती है.

चारो भाइयों की सांस भी अटक जाती है. जल्दी-जल्दी सब घर लौटते हैं. उन्हें मालूम पड़ चुका है कि उनके हाथ में कोई साधारण पत्थर नहीं है, पारस है. वे लोहे की जिस चीज़ को छूते हैं, वह सोना बन कर उनकी आंखों में चमक भर देती है.

पर आंखों की यह चमक ज्यादा देर तक नहीं टिक पाती. कूड़न को लगता है कि देर-सबेर राजा तक यह बात पहुंच ही जाएगी और तब पारस छिन जाएगा. तो क्या यह अच्छा नहीं होगा कि वे खुद जाकर राजा को सब कुछ बता दें.

किस्सा आगे बढ़ता है. फिर जो कुछ घटता है, वह लोहे की नहीं बल्कि समाज को पारस से छुआने का किस्सा बन जाता है. राजा न पारस लेता है, न सोना. सब कुछ कूड़न को वापस देते हुए कहता है : '' जाओ इससे अच्छे-अच्छे काम करते जाना, तालाब बनाते जाना.''

यह कहानी सच्ची है, ऐतिहासिक है- नहीं मालूम. पर देश के मध्य भाग में एक बहुत बड़े हिस्से में यह इतिहास को अंगूठा दिखाती हुई लोगों के मन में रमी हुई है. यहीं के पाटन नामक क्षेत्र में चार बहुत बड़े तालाब आज भी मिलते हैं और इस कहानी को इतिहास की कसौटी पर कसने वालों को लजाते हैं- चारों तालाब इन्हीं चारों भाइयों के नाम पर हैं. बुढ़ागर में बूढ़ा सागर है, मझगवां में सरमन सागर है, कुआंग्राम में कौंराई सागर है तथा कुंडम गांव में कुंडम सागर.

सन् 1907 में गजेटियर के माध्यम से इस देश का 'व्यवस्थित' इतिहास लिखने घूम रहे अंग्रेज ने भी इस इलाके में कई लोगों से यह किस्सा सुना था और फिर देखा- परखा था इन चार बड़े तालाबों को. तब भी सरमन सागर इतना बड़ा था कि उसके किनारे पर तीन बड़े-बड़े गांव बसे थे. और तीनों गांव इस तालाब को अपने-अपने नामों से बांट लेते थे. पर वह विशाल ताल तीनों गांवों को जोड़ता था और सरमन सागर की तरह स्मरण किया जाता था. इतिहास ने सरमन, बुढ़ान, कौंराई और कूड़न को याद नहीं रखा लेकिन इन लोगों ने तालाब बनाए और इतिहास को किनारे पर रख दिया था.

देश के मध्य भाग में, ठीक हृदय में धड़कने वाला यह किस्सा उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम- चारों तरफ किसी न किसी रूप में फैला हुआ मिल सकता है और इसी के साथ मिलते हैं सैकड़ों, हजारों तालाब. इनकी कोई ठीक गिनती नहीं है. इन अनगिनत तालाबों को गिनने वाले नहीं, इन्हें तो बनाने वाले लोग आते रहे और तालाब बनते रहे.

किसी तालाब को राजा ने बनाया तो किसी को रानी ने, किसी को किसी साधारण गृहस्थ ने, विधवा ने बनाया तो किसी को किसी आसाधारण साधु-संत ने- जिस किसी ने भी तालाब बनाया, वह महाराज या महात्मा ही कहलाया. एक कृतज्ञ समाज तालाब बनाने वालों को अमर बनाता था और लोग भी तालाब बना कर समाज के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते थे.

समाज और उसके सदस्यों के बीच इस विषय में ठीक तालमेल का दौर कोई छोटा दौर नहीं था. एकदम महाभारत और रामायण काल के तालाबों को अभी छोड़ दें तो भी कहा जा सकता है कि कोई पांचवी सदी से पन्द्रहवीं सदी तक देश के इस कोने से उस कोने तक तालाब बनते ही चले आए थे. कोई एक हज़ार वर्ष तक अबाध गति से चलती रही इस परंपरा में पन्द्रहवीं सदी के बाद कुछ बाधाएं आने लगी थीं, पर उस दौर में भी यह धारा पूरी तरह से रुक नहीं पाई, सूख नहीं पाई.

सुमन-शत्रुघ्न आमने सामने ये किसकी चाल है..


अस्सी के दशक में राजनैतिक पारी शुरु करने वाले शत्रुघ्न ने सोचा न होगा कि बात-बात में पार्टी से नाराज़ॉ होने के बाद पटना साहिब टिकट उन्हें यूं मिलेगा। लेकिन कभी अमिताभ को चुनौती देने वाले बिहारी बाबू को अब एक और बिहारी बाबू टक्कर देने वाले हैं। काफी हील-हुज्जत के बाद उन्हें पटना साहिब का टिकट मिला है, ये सीट परिसीमन के बाद नया नवेला है और कायस्थ बहुल है। इस सीट पर रविशंकर प्रसाद की नज़र भी थी.।


लेकिन जाति की राजनीति वाले सूबे बिहार में जात की बेटी जात को जात का वोट जात को का नारा बेहद पॉप्युलर है और जाति पार्टी से भी बड़ा फैक्टर है। ऐसे में शत्रुघ्न के लिए पटना साहिब सीट ही सबसे ज्यादा मुफीद थी।

पिछली संसद में बिहार से कोई भी कायस्थ सांसद लोकसभा में नहीं पहुंचा था। क्योंकि न तो कोई सीट ऐसी थी जो कायस्थ बहुल हो और ना ही कोई ऐसा नेता कहीं और से जीत पाया था।


बिहार के संसदीय इतिहास में पहली बार बतर्ज मधेपुरा(यादव बहुल) बक्सर (ब्राह्मण बहुल) किशनगंज (मुस्लिम) कोई ऐसी सीट सामने आई है जो कायस्थ बहुल हो। कायस्थों के वोट को भुनान के लिए लालू पहले ही राजेंद्र नगर रेलवे स्टेशन के पास डॉ राजेंद्र प्रसाद की मूर्ति लगवा चुके हैं।

लेकिन असली खेल तो कांग्रेस ने खेला है। कांग्रेस ने पोल खोलने वाले शेखर सुमन को टिकट दे दिया है। बिहार प्रभारी इकबाल सिंह ने इसकी घोषणा भी कर दी है। लेकिन मुझे तो इसका एक अलग ही एंगल नज़र आ रहा है। शेखर सुमन रविशंकर प्रसाद के नजदीकी माने जाते हैं। दिल्ली आए थे तो सुमन राजीव शुक्ला के घर ठहरे थे। शुक्ला रविशंकर प्रसाद के बहनोई हैं। अब रवि शँकर प्रसाद को पटना साहिब का टिकट कायस्थ होने पर भी नही मिला तो उन्होंने यह खेल खेला है।


कांग्रेस का टिकट जोड़तोड़ कर सुमन को दिलवा दिया। दूसरी पार्टियों में इस स्तार आपके इतने दोस्त तो हो ही जाते हैं। तो सोचिए कहीं यह शत्रुघ्न का खेल बिगाड़ने की चाल तो नहीं है। हा भी, स्मॉल मैन बिग इगोज़...हम तो बस चुप ही रहेंगे.।

Monday, April 6, 2009

आपबीती- मेरा चमत्कारी फोन कॉल का इंतजार

आजकल जिंदगी अजीब हो गई है। हमेशा कुछ करने का मन करने लगा है ( ये बयान कहीं और भी सुना था) उसी वक्त कुछ न करने का भी मन करता है। जिंदगी के सूत्र उलझ से गए हैं। सब गड्ड-मड्ड सा लग रहा है।

रात को देर तक नींद नहीं आती... अल्लसुबह जाग जाता हूं, सैट मैक्स पर सुबह सवा तीन बजे से ही क्रिकेट मैच देखने लग जाता हूं। यकीन होता है किसी का मिस कॉल आएगा। पता नहीं किसका...नहीं आता। लगता है कॉल न भी आवे, कोई धड़कता-फड़कता हुआ मेसेज आएगा.. वह भी नहीं आता। दोस्तों ने भुला दिया लगता है।

पटना में अविनाश है, उस नाश की जड़ के मेसेज़ रात ११ बजे आकर ही खत्म हो जाते हैं। इलाहाबाद से प्रशांत मेसेज करता है... लेकिन पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि मुझे किसी और ही फोन का इंतजार है।

लेकिन वह जादुई फोन नहीं आता।

मामला कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसा बचपन में हम सोचते थे कि चांदनी रात में कोई परी या कोई मणि वाला इच्छाधारी नाग आएगा और हमें हर परेशानी से दूर करने वाला वरदान देकर जाएगा। ऐसा ही कुछ चाह रहा हूं। लेकिन वह चमत्कारी कॉल नहीं ही आता।

भगवान के अस्तित्व पर यकीन कभी पूरी तरह रहा नहीं। संशयवादी किस्म का इंसान हूं, साइंस पढी है लेकिन नास्तिक भी नहीं हूं। मानता हूं कि संसार के ६ अरब लोग किसी न किसी धर्म को मानते हैं। उन ६ अरब लोगों की सामुदायिक समझ अगर भगवान, अल्लाह, गॉड, या ऐसे ही किसी परम सत्ता को पूजती है त मैं क्या ६ अरब लोगों से ज्यादा बुद्दिमान हूं?

फिर लगता है कि भगवान की रेपुटेशन बहुत खराब हो गई है। अगर वो हैं तो उन्हें नहीं होना चाहिए। ऐसे में भगवान से कुछ मांगना जंचता नहीं। लेकिन एक शेर याद आ रहा है--

सुनते हैं कि हर चीज़ मिल जाती है दुआ से 
 एक रोज़ तुम्हें मांग कर देखेंगे खुदा से।

हमारे घर के लोग तो मुझे हाथ से निकल गया मानते हैं। बैष्णव घर का एक ऐसा लड़का जो मांसाहार करता है। भगवान को पूजता नहीं, मंत्र जानता है पर पढ़ता नहीं। (कृपया यह न समझे कि मै अपने आपको रेबेल इस्टेब्लिश करने की कोशिश कर रहा हूं।) लेकिन उन्हें यह पता नहीं कि मै धुआँ भी पीता हूं। पीने में क्या हर्ज है आखिर चीता भी पीता है।

बहरहाल, लिख देने से मगज का भार हलका हो जाता है। सो लिख देता हूं। आज तक किस्मत ऐसी रही कि कोई भी चीज़ समूची नहीं मिली। कोई न कोई हिस्सा बांटने वाला नमूदार हो ही गया। आज कल मेरे एक मित्र हर बात में मुझसे जय माता दी कहते हैं। मुझे बजरंगियों का जय श्री राम याद आता है। लेकिन जय श्री राम जैसा तीखापन और कड़वाहट नहीं उनके जय माता दी में, एक स्वस्ति का भाव रहता है। मैं सुन लेता हूं।

दोस्त में मां जैसा ममत्व है मेरे लिए, कुछ-कुछ प्रेमिका जैसे भाव भी हैं। एकसाथ ही...मैं भाव-विभोर हूं, लेकिन विचार के तौर पर असहमत हूँ। ये असहमति महज धर्म के मामले मे हैं। उनके जय माता दी पर मैं चुप लगा जाता हूं।

धर्म का यह स्तर मुझे पसंद नहीं। श्री सत्यनारायण और वृहस्पति की कथा में जो ज़ोर-जबरदस्ती है उससे भी असहमत हूं। लग रहा है कि मुद्दे से भटक रहा हूं। मैं कह रहा था कि जिंदगी के समीकरण गड़बड़ा गए हैं.. जो चाह रहा हूं वह हो नहीं रहा। जो होना चाहिए वो भी नहीं हो रहा.. बस वही हो रहा है जो मैं चाहता नहीं।

पत्ते बारिश में भींग कर धराशायी हो जा रहे हैं। दिल्ली की सूखी मिट्टी पर पड़ती बूंदे अपेन घर झारखंड जैसी खूशबू पैदा करने लगी हैं। बारिश में खुशबू पहली बार चैन चुरा ले जा रही है, पहले ऐसा नहीं होता था। पहले सिर्फ झारखंड और बिहार से प्यार था, अब मेरे प्यार का दायरा फैल गया है..अब केरल से लेकर महाराष्ट्र, असम, उत्तरांचल तक मुझे एक से लगने लगे हैं। भारत...।। शायद...मुमकिन है इसीलिए बेचैन भी हो रहा हूं।

पिछले दिनों दिल्ली में ही बारिश के दौरान हवा की गैर मामूली गंध से परिचय हुआ था। मैं ने हवा की उस नमी को अपना रुमाल भी दिया था, भींगापन पोंछने को...रुमाल का गीलापन गया नहीं है, उसमे बसी खुशबू भी बरकरार है..चाहता हूं बरकरार रहे जिंदगी..भर माटी की यह सोंधी खुशबू.. जीवन में सूनापन सा आ गया था..कुछ-कुछ भर रहा है।

लेकिन कई ज़ख्म अभी भी हरे हैं। आज की जिंदगी भी ज़ख्म दे रही है, लेकिन इस ज़ख्म के दर्द बड़े मीठे हैं, दुआ कीजिए हमारी जिंदगी में यह ज़ख्म हमारी नींद हमेशा ताजिदंगी हमारी नींद उड़ाता रहे। लेकिन कोई बताए यह मर्ज है क्या??.....

Friday, April 3, 2009

बाथरूम के साहित्यकार

आप सबने बाथरूम सिंगर शब्द ज़रूर सुना होगा। कई तो होंगे भी। बाथरूम में गाना अत्यंत सुरक्षित माना जाता है। न पड़ोसियों की शिकायत, न पत्नी की फटकार का डर..। लोगबाग भयमुक्त वातावरण में अपने गाने की रिहर्सल करते हैं।

बाथरूम ऐसी जगह है, जहां आप और सिर्फ आप होते हैं। कई मामलों में आप अकेले नहीं भी होते हैं, लेकिन हम अभी अपवादों की बात नहीं कर रहे। बहरहाल, हम मानकर चल रहे हैं कि बाथरूम में आप अकेले होते हैं। ठीक? चलिए... ।

शौचालय वह जगह है, जहां आप सोच सकते हैं। वहां कोई व्यवधान नहीं है। नितांत अकेलापन। आप और आपकी तन्हाई। हम तो मानकर चल रहे हैं कि शौचालय का नाम बदलकर सोचालय रख दिया जाए। प्रैशर को हैंडल करने का तरीका। आ रहा है तो अति उत्तम... नहीं आ रहा तो सोचना शुरु कर दीजिए।

नई कविता, नई कहानी, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद जैसे कई आंदोलनों ने शौच के दौरान कूखने की प्रक्रिया में ही जन्म लिया. ऐसा हमारा विश्वास है.। कई तरह की कविताएं.. जो एसटीडी बिलों पर लिखी जाती हैं, कहानी की नई विधाएं जो आम लोगों की समझ के बाहर हों, दूसरे प्रतिद्वंद्वी साहित्यकारों पर कीचड़ उछालने की नायाब तरकीबें... कल कौन सी लड़कियां छेड़ी जाएं, इसकी लिस्ट सब बाथरूम में ही तैयार की जाती हैं।

अस्तु, हम तो मानते हैं कि इस शब्द बाथरूम और शौचालय में थोड़ा अंतर है। ट्रेनों में बाथरूम नहीं होता। लेकिन वहां भी साहित्य रचना करने वाले धुरंधरों को भी हम बाथरूम साहित्यकारों के नाम से ही अभिहीत करते हैं। हिंदी में शब्दों का थोड़ा टोटा है। जगह की भी कमी है।

दिल्ली जैसे शहर में बाथरूम और टायलेट में अंतर नहीं होता। दोनों का अपवित्र गठबंधन धड़ाके से चल रहा है। इसे कंबाइंड कहते हैं। एलीट लोग कुछ और भी कहते हों, हम किराएदार तो यही कहते हैं। दिल्ली में तो क्या है, मकानमालिक यहां उत्तम पुरुष है... किराएदार अन्यपुरुष। बहरहाल, टायलेट और बाथरूम की इस संगति की वजह से नामकरण में मैने यह छूट ली है। बाद के साहित्यकार अपने हिसाब से वर्गीकरण कर लें।

तो बाथरूम साहित्यकारों का जो यह वर्ग है, जम्मू से कन्याकुमारी तक फैला है। मैं सिर्फ पतिनुमा बेचारे लेखकों की बात नहीं कर रहा। लेकिन भोपाल हो या गोहाटी अपना देश अपनी माटी की तर्ज़ पर टायलेट साहित्यकार पूरे देश में फैले हैं।

मैं अब उनकी बात नहीं कर रहा हूं...जो लेखन को हल्के तौर पर लेते हैं और जहां-तहां अखबारों इत्यादि में लिखकर, ब्लॉग छापकर अपनी बात कहते हैं। मैं उन लेखकों की बात कर रहा हूं, जो नींव की ईट की तरह कहीं छपते तो नहीं लेकिन ईश्वर की तरह हर जगह विद्यमान रहते हैं। सुलभ इंटरनैशनल से लेकर सड़क किनारे के पेशाबखाने तक, पैसेंजर गाडि़यों से लेकर राजधानी तक तमाम जगह इनके काम (पढ़े कारनामे) अपनी कामयाबी की कहानी चीख-चीख कर कह रहे हैं।

ज्योंहि आप टायलेट में घुसते हैं, बदबू का तेज़ भभका आपके नाक को निस्तेज और संवेदनहीन कर देता है। फिर आप जब निबटने की प्रक्रिया में थोड़े रिलैक्स फील करते हैं, त्योहि आप की नज़र अगल-बगल की गंदी या साफ-सुथरी दीवारों पर पड़ती है।

यूं तो पूरी उम्मीद होती है कि नमी और काई की वजह से आप को कुदरती चित्रकारी ही दिखेगी, अगर गलती से दीवार कुछ दीखने लायक हो.. तो आप को वहां गुमनाम शायरों की रचनाएं नमूदार होती हैं, कई चित्रकारों की भी शाश्वत पेंटिंग्स दिख सकती हैं। सकती क्या दिखेंगी ही। कितना वक्त होता है, बिल्कुल डेडिकेटेड लोग.। कलम लेकर ही टायलेट तक जाने वाले लोग। जी करता है उनके डेडिकेशन पे सौ-सौ जान निसार जाऊं।

इतना ही नहीं, आजकल मोबाईल फोन का ज़माना है, लोग अपना नंबर देकर खुलेआम महिलाओं को आमंत्रण भी देते हैं। इतना खुलापन तो खजुराहो के देश में ही मुमकिन है। इन लोगों के बायोलजी का नॉलेज भी शानदार होता है.. तभी ये लोग दीवारों पर नर और मादा जननांगों की खूबसूरत तस्वीरें बनाते हैं। पहले माना जाता था कि ऐसा सस्ता और सुलभ साहित्य गरीब तबके के सस्ते लोगों का ही शगल है। इसे पटरी साहित्य का नाम भी दिया गया था।

लेकिन बड़ी खुशी से कह रहा हूं आज कि इनका किसी खास आर्थिक वर्ग से कोई लेना देना नहीं है। राजधानी एक्सप्रेस में यात्रा करने वाले ठेलेवाले या रिक्शेवाले तो नहीं ही होते हैं, वैसे में इन ट्रेनों के टायलेट में रचना करने वाले सुरुचिपूर्ण साहित्यकारों की संख्या के लिहाज से मैं कह सकता हूं कि साहित्य के लिए कोई सरहद नहीं है। कोई वर्गसीमा नहीं है। अपना सौंदर्यशास्त्र बखान करने की खुजली को जितना छोटे और निचले तबके के सिर मढ़ा जाता है, उतनी ही खाज कथित एलीट क्लास को भी है।

इन तस्वीरों के साथ चस्पां शेरों को उद्धृत करने की ताकत मुझमें नहीं है। मेरी गुस्ताखी की सीमा से भी परे ऐसे महान, सार्वकालिक, चिरंतर गुमनाम लेकिन देश के हर हिस्से में पाए जाने वाले साहित्यकारों को मैं शत-शत नमन करता हूं।

Thursday, April 2, 2009

चुनावी नारे से वारे-न्यारे

जंग असली हो या चुनावी, नारों की अहमियत हमेशा बरकरार रहती है। नारे ही पार्टियों के चुनाव अभियान में दम और कार्यकर्ताओं में जोश भरने का काम करते हैं। हर पार्टी एक ऐसा नारा अपने लिए चाहती है जिससे वह वोटरों को लुभा सके।

उन्हीं में से कुछ नारे ऐसे निकल आते हैं, जो कई साल तक लोगों की जुबान पर चढे रह जाते हैं। इस बार स्लमडॉग... के ऑस्करी गाने जय हो का पट्टा कांग्रेस को मिल गया है, जो बीजेपी ने इसके मुकाबले फिर भी जय हो और भय हो जैसे नारे उतारे हैं।

पिछली बार भारत उदय की वजह से भाजपा अस्त हो गई थी और इंडिया शाइनिंग ने एनडीए की चमक उतार दी थी।

साठ के दशक में लोहिया ने समाजवादियों को नारा दिया था, सोशलिस्टों ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ.। ये महज नारा नहीं था बल्कि लोहिया की पूरी विचारधारा की ज़मीन थी। उस दौर में जनसंघ ने अपने चुनाव चिह्न दीपक और कांग्रेस ने अपने दौ बैलों की जौड़ी के ज़रिए एक दूसरे पर खूब निशाना साधा था।

जली झोंपडी़ भागे बैल,यह देखो दीपक का खेल

इसके मुकाबले कांग्रेस का नारा था-

इस दीपक में तेल नहीं, सरकार बनाना खेल नहीं

उसी तरह कांग्रेस का गरीबी हटाओं नारा भी खूब चर्चित रहा और भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज की एक ज़रुरत ने वोटरों पर खासा असर डाला। उसी दौरान रायबरेली से इंदिरा को हराने में भी नारों की अहम भूमिका रही। हालांकि चिकमंगलूर से उपचुनाव भी उन्होंने नारो के रथ पर ही जीता। एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर, चिकमंगलूर । इसी तरह 1980 के चुनाव में कई दिलचस्प नारे गढ़े गए। इनमें इंदिरा जी की बात पर मुहर लगेगी हाथ पर, तो कई लोगो की जुबान पर आज भी है।

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिराजी तेरा नाम रहेगा, जैसे नारे ने पूरे देश में सहानुभूति लहर पैदा की, और कांग्रेस को बड़ी भारी जीत हासिल हुई।

1989 में बीजेपी ने राम मंदिर से जुड़े नारे भुनाए, सौगंध राम की खाते हैं हम मंदिर वहीं बनाएंगे, और बाबरी ध्वंस के बाद ये तो पहली झांकी है, काशी मथुरा बाकी है (हालांकि ये चुनावी नारा नहीं था) तो वीपी सिंह को नारों में फकीर और देश की तकदीर बनाने वाला बताया गया। लेकिन कांग्रेस ने उन्हे रंक और देश का कलंक भी बताया था। 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद राजीव तेरा .ये बलिदान याद करेगा हिंदुस्तान सामने आया। और इसका असर भी वोटिंग पर देखा गया।

1998 में अबकी बारी अटल बिहारी बीजेपी को खूब भाया और उसने इसका खूब इस्तेमाल भी किया। यूपी में पिछले विधानसभा चुनाव में बीएसपी ने अगड़े वोट लुभाने के लिए हाथी की तुलना भगवान गणेश से कर दी थी तो समाजवादी पार्टी ने जिसने कभी न झुकना सीखा उसका नाम मुलायम है से मुलायम को खूब हौसला दिया था।

लोकप्रिय नारे--

1-इस दीपक में तेल नहीं, सरकार बनाना खेल नहीं
2- जली झोंपडी़ भागे बैल,यह देखो दीपक का खेल
3- गरीबी ह‍टाओ
4- संजय की मम्मी बड़ी निकम्मी
5- बेटा कार बनाता है, मां बेकार बनाती है
6- एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर चिकमंगलूर
7- स्वर्ग से नेहरू रहे पुकार, अबकी बिटिया जहियो हार
8- इंदिरा लाओ देश बचाओ
9- आधी रोटी खाएंगे, इंदिरा को लाएंगे
10-इंदिरा जी की बात पर मुहर लगेगी हाथ पर
11- सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे
12- जिसने कभी न झुकना सीखा, उसका नाम मुलायम है
13- राजीव तेरा यह बलिदान याद करेगा हिंदुस्तान
14- अबकी बारी अटल बिहारी
15- जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिराजी तेरा नाम रहेगा
16- सोशलिस्टों ने बांधी गांठ पिछड़े पावैं सो में साठ

Wednesday, April 1, 2009

जिंदगी की तमाम हसरतें..(जो पूरी नहीं हुईं)

मेरे जीवन में दो चीज़े बड़ी प्रॉमिनेंट रहीं हैं, मैं थियेटर में आगे और कक्षा में पीछे बैठना ही पसंद करता हूं। लोगों को थोड़ा स्ट्रेंज लग सकता है, लेकिन है ये सच ही। वजह ये कि दोनों ही जगह पर एक्शन होता है। कक्षा में आगे बैठने वाले विद्यार्थी चुपचाप एकटक मास्साब के मुखमंडल को निहारा करते थे। हमारा इन चीज़ों में कोई भरोसा नहीं था। मैं और हमारे चार साथी साइंस की क्लास के सिवा हर क्लास में पिछली बेंचों पर बैठते थे।

मजा़ आता था। पिछली बेंच पर बैठकर हम आपस में इशारों में बातें करते। संस्कृत की किताब में भर कर इंद्रसभा और दफा ३०२ पढ़ते। दफा ३०२ में वैसे तो अपराध कथाएं होती थीं लेकिन हम खासतौर पर उन एकाध पैराग्राफ पर ध्यान जमाते जो ज़रा अश्लील होती थीँ। लेकिन वह अश्लीलता भी उतनी ही थोड़ी-सी थी, जितनी हमारे संस्कृत माटसा-ब की मूंछे।

माटसा-ब की मूछें नाक के पास तो दस-बारह बालों वाली होती थी, लेकिन होठों के कोर तक पहुंचते-पहुंचते उसकी आबादी वैसे ही घट जाती जैसे कि जर्मनी में इंसानों की घट रही है।

होठ जहां खत्म होते हैं वहा उनकी मूंछ में महज एक बाल बच पाता था. साइबेरिया निष्कासित सोवियत नागरिक-सा, या फिर किसी शापित एकांतवासी गंधर्व सरीखा। राजकुमार स्टाइल में मूंछें, करीने से तराशी हुई.। बहरहाल, बात महज उन मास्साब की नहीं, यूं ही याद आ गए तो लिख दिया।

बात मैं अपनी जिंदगी में प्रॉमिनेंट चीजों की कर रहा था। पता नहीं क्यों मुझे वह चीजे ही पसंद आती हैं, जो दूसरे के लिए पसंदीदा नहीं होती। मैंने जीवन में जो चाहा, अबी तक मिला नहीं, चाहा कि दुनिया से अंग्रेजी और संस्कृत जैसे विषयों के व्याकरण मटियामेट हो जाएं.. नहीं हुए। थकहार कर कामचलाऊ अंग्रेजी सीखी। संस्कृत से तौबा ही कर ली। आगे पढ़ने की ज़रुरत ही नहीं थी।

मन में जबरदस्त इच्छा थी, लंबा होने की। किशोरावस्था में क्रेज़ था, ६ फुट २ इंच लंबा होने का। लंबाई का यह ग़ैर-सरकारी मानक अमिताभ ने तय कर दिया था। हम उसमें भी पीचे छूट गए, लंबाई ५ फुट १० इंच पर जाकर टिक गई। चाहते थे कि लड़कियों से बात करें लेकिन उस ज़माने में हमारी शकल इस कदर बेवकूफाना थी और हम इस कदर लिद्दड़ थे कि लड़कियां हमसे दूर भागती थीँ।

क्रिकेटर बनने की हसरत तो एक क्रिकेट बॉल के दाम सुनने के बाद ही पूरे हो गए। एक्टर बनने का विचार मन में भी नही आया। हां, फिल्मों में पार्श्व गायक हम ज़रुर बनना चाहते थे लेकिन उसमें कुछ बुनियादी दिक्कतें थीं। ऐसा नहीं कि गाना नहीं आता था। बस सुर-ताल थोड़े कमजो़र थे। ईमानदारी से कहें तो थोड़े नहीं बहुत कमजो़र थे। बस हमें पता नहीं चलता था कि कमजोर हैँ। हम उधर गाना शुरु करते, उधर कौए पेड़ से उड़ जाते।


बहरहाल, हसरतें खत्म नहीं हुई हैं। दुनिया भर घूमने की इच्छा है। अब इच्छा है कि सही मायनेमें अच्छा इंसना बनूं लेकिन हालात-ये हालात ही हैं जो फिल्मों में भी नायको को प्रति-नायक बना देते हैं- बनने नहीं दे रहे। बस मुंह में ऊंगली डालकर लोग झूठ-सच बुलवा रहे हैं।