Friday, July 30, 2010

मेरी इच्छाएं-कविता लघु रुप में

बेहद मामूली हैं मेरी इच्छाएं,
एक कप दूध,
सिरहाने मनचाही किताबें,
कमरे में महकती अगरबत्तियां,
कुछ मशहूर चित्रकारों के चित्र,
खिड़की से झांकता हरी घासवाला लॉन,
फूलों से लदी क्यारियां-
और ताड़ के कुछ पेड़।।


बेहद मामूली हैं मेरी इच्छाएं,

फिर भी अगर ईश्वर मुझे सुख देना चाहता है तो,
उसे करनी होगी मेरे लिए व्यवस्था-
एक और सुख की।
कि ताड़ के उन पेड़ों से
मेरे छह-सात दुश्मन ज़रूर लटकते दिखाई दें

सही है कि हमें अपने दुश्मनों को माफ कर देना चाहिए
मगर तभी,
जब उन्हें सूली पर लटकाया जा चुका हो।


बेहद मामूली हैं मेरी इच्छाएं।।

(हेनरीख हाईन की कविता का अनुवाद)

5 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

यह तो बहुत ज़बरदस्त इच्छाएं हैं मामूली कहाँ ?

अच्छी अभिव्यक्ति

सहसपुरिया said...

GOOD

Udan Tashtari said...

आज के जमाने में मामूली के साथ साथ मासूम इच्छायें भी बोलना पड़ता है, तब तथास्तु मिलती है.

गहरी बात!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मंगलवार 3 अगस्त को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ .... आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

नीरज गोस्वामी said...

भाई वाह..आप की मासूम इच्छाएं जल्दी पूरी हों...खास तौर पर ताड़ के पेड़ से दुश्मनों के लटकने वाली...:))
नीरज