Sunday, January 16, 2011

मन की बात- कविता

मन की बात,
किसी से कहकर,
मुस्कुरा लिया जाए,
तो...
यही प्रति-उत्तर होगा,
वक्त की गर्वीली अट्टहासों का,
हां मैं,
दिखा दूंगा ये,
कि आदमी कांच नहीं,
जो टूट जाए,
हल्की-सी चोट से।


नोटः तत्वसेवन आदमी की रचनाशीलता को बढा देता है, यह बात पुख्ता हो गई। बतौर सुबूत यह ताजा कविता है, जो रात को मुंदती हुई आंखो से लिखी गई है। बाकी के गवाह विकास सारथी खुद हैं.

4 comments:

राकेश पाठक said...

मुझे यकीं है
चंद दबी आवाज़ें भी फ़ना होंगी कभी
आदमी के गिर्द लिपटी धुंध
पिघलेगी इन्हीं आवाज़ों से...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सुन्दर अभिव्यक्ति ...आदमी में बहुत कुछ सहने की क्षमता होती है ...

नया सवेरा said...

... umdaa !!

rinku said...

मन की वेदना पर भी हंसी आ जाये
और चोट पर व्यक्ति मुस्कुराने को मजबूर हो जाये
ऐसे वीभत्स वर्णन चोट का केवळ गुस्ताख ही कर सकता हैं