Thursday, February 17, 2011

सरमाया- कविता

प्यार,
प्यार कोई पाखी तो नहीं,
कि तुमने गुलेल चलाया..
और फुर्र-से उड़ गया वो।

प्यार,
प्यार कोई रोटी तो नहीं,
तुमने पकाया-खाया,
और फट् से फना हो गया वो।

प्यार,
प्यार कोई शब्द तो नहीं,
तुमने पूछा, मैंने बताया
और शब्दकोष या स्क्रीन पर,
चस्पां हो गया वो।

प्यार,
प्यार तो कोई बीज है शायद,
उस पेड़ की, जिसकी जड़े बडी गहरी हैं,
हममें-तुममें जो नदी के वेग-सा समाया है,
हमारा-तुम्हारा असली सरमाया है।

3 comments:

अंतर्मन said...

प्रेम को शब्दों में कहने की कोशिश बहुत लोगो ने की बहुत तरह से की,
कुछ लोगो की कोशिश कामयाब लगती है
जब कोई दूसरा उसी स्तर पर आकर उन शब्दों को समझने की कोशिश करता है
गुरुदेव आपकी कोशिश कामयाब लोगो की फेहरिस्त में शामिल करने लायक है...............

"प्यार तो कोई बीज है" असरदार है ..........

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

प्यार,
प्यार तो कोई बीज है शायद,
उस पेड़ की, जिसकी जड़े बडी गहरी हैं,
हममें-तुममें जो नदी के वेग-सा समाया है,

प्यार पर बहुत गहन अभिव्यक्ति ...सुन्दर रचना ..

डॉ .अनुराग said...

दूसरा पहलू दरअसल ये है ठाकुर .....