Friday, August 31, 2012

...और अब गर्भाशय घोटाला!

(रजनीश प्रकाश प्रखर पत्रकार हैं, पुरुषों में गर्भाशय की खोज और निकाले जाने की घटना के बाद से काफी झल्लाए हुए हैं, उनका एक लेख छाप रहे हैं।)
 
घोटाला , करप्शन , स्कैम सुनते सुनते माथा पक गया है । कभी-कभी दिमाग झल्ला उठता है तो लगता है होने दो साले को , कुछ तो कहीं हो रहा है।... लेकिन मंगल ग्रह का मामला होता तो चलो जाने दो कह के चाय की चुस्कियों में डूबते-उतराते, लेकिन मामला पास-पड़ोस का है... आंखों को कब तक ताखे पर रखा जाए। यहां तो साला क्या आकाश (स्पेक्ट्रम) , क्या पाताल (कोयला ) सबको लोग-बाग बेचने में लगे है , मानो मंगल का हाट है शाम-रात तक बेचकर रफूचक्कर होना है। 
 
समस्तीपुर मेरा गृह जिला है , कई रिपोर्टें देखी है कि डॉक्टरों और अधिकारियों ने मिलकर हजारों गर्भाशय निकाल लिए... लिंगभेद का आरोप न लगे इसलिए केवल महिलाओं के ही नही बल्कि ढूंढ़-ढ़ांढ़ कर 12 पुरुषों तक के गर्भाशयों को भी अपनी चपेट में ले लिया उन्होंनें। 
 
पहले किडनी चोरी का हो-हल्ला था , डर इतना कि हॉस्पीटल से डिस्चार्ज होने तलक लोग-बाग सर से पांव तलक टटोल लेते कही कुछ गायब तो नही है ,कोई सिलाई-विलाई तो नही है , धागे का कोई छोर शरीर से बाहर तो नही लटक रहा । खैर बात समस्तीपुर और बिहार की ... बीमारी का भूत दिखाकर डॉक्टरों ने 16000 गरीब महिलाओं का गर्भाशय गायब कर दिया (अधिकांश रिपोर्टों में अधिकांश मामले संदेहास्पद की ओर ही इशारा कर रहे हैं , कुछ जेनुइन भी हो सकते हैं) । वजह इंश्योरेंस के पैसे को गड़प करना था। 
 
मेडिकल सांइस की ज्यादा जानकारी तो नही है लेकिन मेरे क्षूद्र भेजे में अब तक समझ नही आया कि गर्भाशय ही क्यो ? हो सकता है शायद गर्भाशय का भी ट्रांसप्लाट होता हो या फिर उन्हे फॉरेन एक्सपोर्ट कर दिया जाता हो। खैर अपना कंसर्न यह नही है , वैसे डॉक्टरों और क्लिनिकों ने सरकार पर 12 करोड़ का बिल ठोक दिया। 
 
हालांकि आंकड़ों के आकलन में नौसिखिया जैसा हूं लेकिन मैने सोचा आखिर चपत कितने की लगी है , अपने तई कुछ जोड़-घटाव-गुणा-भाग किया जाए। बीते कुछ महीने-सालों से कैग का हो हल्ला है और प्रीजंपटिव लॉस का जिक्र ही माहौल को खलबला देता है। गणित का कोई ज्ञाता नही हूं लेकिन बारहवीं तक पढ़ी है। मेरे दिमाग में ख्याल आया कि ऐसे में जबकि कोल और स्पेक्ट्रम की ठेलाठेली में किसी के पास फुरसत नही है तो कही प्रीजंपटिव लॉस के प्रीविलेज से गर्भाशय घोटाला सम्मानित होने से न बच जाए।
 
 देखिए मेरी आगे की कोशिश सामान्य गणित का सामान्य छात्र होने की है ।विशेषज्ञों को आपत्ति हो सकती है और होगी तो जायज ही होगी । खैर आंकड़ों के अभाव में कुछ चीजों को मोटा-मोटी मान लेते हैं , वैसे अगर किसी के पास कोई परफेक्ट आंकड़ा हो तो बता दे एकुरेसी का भला हो जाएगा । 
 
खैर इस दुर्घटना की शिकार यंग, ओल्ड और अंडरएज महिलाओं को मिलाकर मान लिया जाए कि इसकी शिकार एक महिला की औसत आयु 25 थी तो फिर बात आगे बढ़ाई जाए। जैसा कि सर्वविदित है प्रजनन योग्य आयुवर्ग के तहत विकासशील देशों में 15-44 उम्र की स्त्रियों को लेते है और भारत में औसत जीवन प्रत्याशा 64 साल के करीब है। 
 
देखिए मैं पहले ही बता दूं कि मैं जो कर रहा हूं , उसमें त्रुटियों की आशंकाएं पूरी पूरी है और संशोधनों की पूरी-पूरी गुंजाइश। खैर 25 साल से 44 साल के बीच एक महिला 19 बच्चे अधिकतम जन्म दे सकती है (कभी-कभी जुड़वा बच्चों के जन्म को यहां कंसीडर नही कर रहे हैं) । 
 
चूंकि गर्भाशय निकालने के अधिकांश मामले या कहे तो लगभग पूरे के पूरे ग्रामीण इलाके के बीपीएल तबके का ही प्रीविलेज मालूम होता है तो इस न्यायपूर्ण व्यवस्था में इस बात की लगभग पूरी-पूरी उम्मीद है कि ये संभावित बच्चे राष्ट्र निर्माण को अपनी मजदूरी के जरिए मजबूती देगें... और यदि मान लिया जाय कि ये अजन्मे बच्चे 14 साल बाद मनरेगा से जुड़ते है और फिर इसके साथ अपने रिश्तों को इतना प्रगाढ़ कर लेते है कि मृत्यु ही इन्हें मनरेगा से इन्हें मुक्त करती है तो बात अब आगे की कि जाय ।अब चूंकि केवल 100 दिन ही इसके जरिए इन्हें रोजगार मिलना है तो फिर आखिर कितने पैसे ये कमा लेते। मैने सोचा क्यूं न पहले एक सिंपल सा गुणा-भाग कर लूं।

16000x19x50x100x150 = 40,00,00,00,00,000

देखिए ये रकम 50 सालों में प्रतिसाल केवल सौ दिनों की है और उसपर भी न्यूनतम मजदूरी । फिर आने वाले पचास सालों में मजदूरी भी कुछ न कुछ बढ़ेगी ही और फिर शायद कुछ दिन भी। फिर बाकी के दिन भी तो कुछ न कुछ कमाएंगें ही। एक बात और बिहार में अभी मुख्यतया तीन चार जिलों के ही मामले सामने आए है । यानि आशंका इस बात की है कि अकेलें बिहार में ही ये लाखों करोड़ों के नुकसान का मामला बनता है , पूरे देश को याद करके तो घिग्घी ही बंध जाती है।
 
क्या कोल और क्या स्पेक्ट्रम, सबकी इज्जत पानी में मिलाने की कूबत है इसमें।

पोस्टस्क्रिप्ट- पुरुषों में गर्भाशय ढ़ूंढ़ निकालने वाले सम्मान के पात्र है, जीव विज्ञान और चिकित्साविज्ञान को शायद नयी ऊंचाइआं मिले इससे ... और समाजशास्त्रियों और नृतत्वशास्त्रियों को भी नया रोजगार मिल जाएगा , स्त्री-पुरुष संबंधों को भी नए सिरे से व्याख्यायित करना होगा। 
 
विज्ञान और समाज विज्ञान दोनों को ही मूलभूत परिवर्तनों से जूझना होगा। एक बात और शादी ब्याह के समय पूछे जाने वाले सवालों में कुछ नए सवाल जुड़ सकते है। मसलन लड़के वाले पूछ सकते है कि आपकी बेटी के पास गर्भाशय तो है न , वही गर्भाशययुक्त पुरुषों को बिना गर्भाशय वाली महिलाओं की तलाश में जुटना होगा।
---रजनीश प्रकाश

Wednesday, August 29, 2012

नश्तरः चुभा क्या?

कार्टून सौजन्यः कुरील

Tuesday, August 28, 2012

सुनो ! मृगांका:20 : हादसों की ज़द पे हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें?

अब तक आपने पढ़ाः अभिजीत अपने सारे बैंक-बैलेंस वगैरह अपने रिश्तेदारों के नाम करके गांव लौट रहा होता है। खजली स्टेशन पर उसने रिक्शा पकड़ा, और जब घर गया तो पता चला गांव के बंद मकान की चाबी उसके पास नहीं..फिर वह रिक्शेवाले के ही घर पर रुकता है। रिक्शेवाले के घर पर सुबह उठकर अभिजीत गांव के पोखरे तक जाता है और महंत जी के घर के पास जाता है-मंजीत)
 
बिसेसर ने झुककर खाली चौकी को ही दंडवत् किया। 

उसे झुककर प्रणाम करता देख, अभिजीत के मन में एक अजीब सी भावना जगी। संभवतः उसके मन के किसी कोने में मृगांका की याद हो आई थी, और वह याद कुछ ऐसी थी कि उसका रोम-रोम मुस्कुरा उठा था। 

हादसों की ज़द पे है तो मुस्कुराना छोड़ दें
ज़लज़लों के ख़ौफ़ से क्या घर बनाना छोड़ दें,

तुमने मेरे घर न आने की कसम खाई तो है
आंसुओं से भी कहो आंखों में आना छोड़ दें.

बारिशें दीवार धो देने की आदी हैं तो क्या
हम इसी डर से तेरा चेहरा बनाना छोड़ दें! 

थोड़ी देर बाद अंदर से महंत जी आ गए। बिसेसर ने एक बार फिर से प्रणाम किया, शिष्टाचारवश अभिजीत के हाथ भी जुड़ गए। अभिजीत ने देखा महंत जी अब भी बहुत तेजस्वी व्यक्तित्व के स्वामी थे। 
 
अभिजीत ने हमेशा धार्मिक कर्मकांडो की खिल्ली उड़ाई थी, अपने जीवन में। हमेशा ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती दी थी। मंदिर देखकर उसे याद आया। 
 
किसी असाइनमेंट पर निकलने का वक्त था। अगले अलसभोर की कोई फ्लाइट थी, मृगांका ने उसे मिलने के लिए खान मार्केट बुलाया था। कैफे कॉफी डे में जब अभिजीत उससे मिलने के लिए पहुंचा, तब तक करीब एक घंटे इंतजार कर चुकी मृगांका का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया था। वैसे अगर कहावत में आठवें या नवें आसमान का ज़िक्र होता तो शायद गुस्सा भी वहां पहुंच गया होता। 
 
मृग, कॉफी?
नहीं पीनी कॉफी-वॉफी, पियो अपने दोस्त प्रशांत के साथ।
अरे ये क्या
दरअसल, प्रशांत, अभिजीत का खास दोस्त था। दोनों भयंकर दारूबाज़। लेकिन खासियत ये कि दोनों में से कोई कभी भी दारू का ग़ुलाम न था, न ही पी के कभी बहके दोनों, न किसी से गाली गलौज की। बल्कि, पीने के बाद दोनों के दोनों, शांत, संयत, सुशील और शिष्ट हो जाते थे। अभिजीत की सृजनात्मकता तत्वसेवन के बाद चरम पर आ जाती थी। खैर..ये तो किस्सा और है लेकिन फिलहाल प्रशांत के साथ लेट होने की वजह से मृगांका बहुत गरम थी।
 
बेहद मान-मनौव्वल के बाद मृगांका थोड़ी नरम पड़ी। लेकिन यह थोड़ी सच में थोड़ी ही थी। कैफे में सौ लोगों की मौजूदगी में कान पकड़ कर माफी मांगने के बाद ही अभिजीत छूट पाया था। साथ में, उस शाम की बातचीत में मृगांका ने जगत्, ईश्वर, ब्रह्म और चर अचर जैसे विषयों पर एक लंबा व्याख्यान दिया था। जबकि उस रोज अभिजीत की इच्छा मृगांका को अपने बांहों में समेट लेने की थी।

उसे लग रहा था कि मृगांका इतनी निष्ठुर कैसे हो सकती है। लेकिन सयाने अभिजीत ने देख लिया कि इन बातों से उसकी झुंझलाहट का वह पूरा मजा ले  रही है और अपनी ट्रेड मार्क होंठ दबा कर मुस्कुराने का कोई मौका नहीं छोड़ रही। बातों ही बातों में मृगांका की उंगलियां अपने ही केश की लटों से खिलवाड़ करने लग जातीं।

सीसीडी की सीढ़ियों से उतरते वक़्त अभिजीत ने उसकी कलाई पकड़ ली थी। सुनो, मृगांका...

हां, कहो अभि...
 
कुछ गिफ्ट लाना चाहता हूं तुम्हारे लिए...अभिजीत ने उसे और अपनी तरफ खींचते हुए कहा।
तो कुछ ऐसा लाना जिसकी तुमसे मुझे उम्मीद भी न हो।
 
जरूर, कुछ ऐसा लाऊंगा जिसकी तुम उम्मीद भी नहीं करती होओगी...कहकर अभिजीत ने हल्के से उसके गालों पर चुंबन ले लिया। मृगांका उसे परे धकेलती हुई सीढियों से नीचे ले गई। बहुत बड़े गधे हो तुम...पब्लिक प्लेस है ये।
 
जस्ट फॉरगेट द पास्ट। 
 
अभिजीत की आंखों में पूरा पानी भर गया। एक गलत समीकरण...और पूरा जीवन तहस-नहस। न सिर्फ उसका बल्कि मृगांका का भी। क्या लग रहा होगा...क्या कर रही होगी मृगांका। 

महंत जी के साथ चलता हुआ अभिजीत गांव की सड़क पर आ गया। कच्चा रास्ता...कभी धूप कभी छांव का सा माहौल था। माहौल में ऊमस थी। 

दोनों एक तालाब के मुहार पर खड़े हो गए। गांव के लोग इस भीड भी कहते हैं। उसी भीड़ पर एक स्कूल है और स्कूल के दूसरे तरफ चौक है। ऐसे चौक परंपरानुसार हर गांव में होते हैं। चौक की दुकानों पर जरुरत के कुछ सामान बिस्कुट, हवा-मिठाई और दालमोठ वगैरह मिल जाते हैं। चौक है तो चाय की दुकाने है और चाय है तो पान कैसे नहीं।

चाय और पान की इन दुकानों में विश्वस्तर की राजनीति पर चर्चा होती है। साथ ही यह गृह कलह निवारण केंद्र भी है। यहां स्थानीय राजनीति और ऐसे ही कई दूसरे शगल पूरे किए जाते हैं। 

गांव में पुस्तकालय भी है। गांव में एकाध पढे-लिखे बचे लोग और पढाकू बच्चे वहां पढ़ने जाते हैं-ऐसी मान्यता है। पढ़ने कौन जाता है, कब जाता है और क्या पढ़ता है, यह शोध का विषय है। हां, कुछ बच्चे ज़रुर कांख में लोटपोट, नंदन और चंपक जैसी पत्रिकाएं लेकर निकलते हैं। कुछ तो गुलशन नंदा और वेदप्रकाश शर्मा के शौकीन हैं। आजकल रीमा भारती और केशव पंडित का क्रेज़ है.. जैनेन्द्र और प्रेमचंद की कहानियां पाठ्य पुस्तकों में ही ठीक लगती हैं। कोई इस पर ध्यान नहीं देता।


उसी पोखरे के किनारे एक मंदिर भी था, शिव का। अभिजीत को याद आया, ऐसे ही महाकाल के मंदिर का प्रसाद उसने अपने फोटोग्रफर के जरिए मंगवाया था। महाकाल के मंदिर के सामने मार्केट में  खड़े होकर वह सिगरेट फूंकता रहा। फोटोग्रफर थोड़ा अधेड़ था, इतना तो था ही कि मंदिर जाने के विचार मन में आने लगें (अभिजीत के हिसाब से)....वापस आकर उसने बताया कि महाकाल का जो प्रसाद लिया है वो चार-पांच दिन में खराब हो सकता है।

अभिजीत के लिए इस घटना की कोई  अहमियत नहीं थी, लेकिन बात मृगांका से जुड़ी थी। वापस लौटकर उसने मृगांका से कहा था, तुम्हारे लिए प्रसाद लाया हूं।

मृगांका चौंकी थीं...अच्छा, तुमने की पूजा?

पूजा तो नहीं की, प्रसाद लाया हूं लेकिन...

ठीक है, मैं ले लूंगी। कल आ जाना आईएऩए...दिल्ली हाट। ठीक पांच बजे शाम को। आजकल छुट्टी पर चल रही हूं...दीदी-जीजा आए हैं।

ओके

लेकिन अगले सात दिनों तक पांच नहीं बजा, रोज़ अभिजीत जाकर दिल्ली हाट पर खड़ा होता रहा, लेकिन कभी मृगांका आई नहीं। हर रोज़ अपने उस काले बैग को उठाए अभिजीत दफ्तर चला जाता, जिसमें प्रसाद भरा था। शाम को जाकर वह प्रसाद फिर से फ्रिज की शरण में रख दिया जाता। लेकिन भले ही भगवान् का हो, लेकिन उस प्रसाद का भी एक जीवन था, और जिसका जीवन होता है उसकी मृत्यु भी होती है।

प्रसाद आखिरकार सड़ गया। अभिजीत ने उसे कूड़े के हवाले कर दिया।

आठवें दिन मृगांका का फोन आया तो घर में चहलकदमी करते हुए अभिजीत ने उसे प्रसाद के खराब होने की बात बताई। मृगांका ने पूछा, फैंक दिया तुमने..?

नहीं, नहीं मृगांका फेंकता कैसे...खा लिया मिठाई समझ कर खा लिया।

महंत जी के साथ चलते -चलते अचानक अभिजीत को पेट में आग का तेज़ गोला बनता महसूस हुआ...लगा कि मौत नजदीक है। वह सड़क पर गिर पड़ा।


 
 

Sunday, August 26, 2012

अवतार कृष्ण का जाना, इतना सन्नाटा क्यों है भई?

अवतार कृष्ण हंगल की मौत को लोग एक 95 साल के बुजुर्ग अदाकार की मौत मानते होंगे। मैं नहीं मानता। ए के हंगल को मैं मौजूदा भारत में एक प्रतीक की मौत के तौर पर देखता हूं। आप अगर सिनेमाई भाषा से परिचित हैं तो आप मेटाफर और सिंबल यानी बिंब और प्रतीक से भी परिचित होंगे...आज सिनेमा जगत से एक धर्मनिरपेक्ष और बौद्धिक मार्क्सवादी प्रतीक चला गया।

आज के भारत को देखिए, कोकराझार है, मुंबई में उन्माद है, बेंगलुरु से पलायन करते पूर्वोत्तर के लोग हैं...धार्मिक चरमपंथ है, दिल्ली में प्रधानमंत्री के घर के सामने प्रदर्शन करते और पानी की बौछारें झेलते राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से भरे सामाजिक कार्यकर्ता हैं...देश अनिर्णय और संभ्रम का शिकार है। ऐसे ही वक्त में एक प्रतीक पुरुष आता है या फिर अंधियारे को और गहरा देने के लिए चला जाता है। अवतार कृष्ण हंगल की मौत ऐसे ही अमावस का प्रतीक है।

उन्माद को कम करने वाला वह बुजुर्ग मौलाना ही ए के हंगल है, जो गांववालों को कहता है कि पूछूंगा ख़ुदा से उसने मुझे गांव पर क़ुरबान करने के लिए दो-तीन और बेटे क्यों न दिए। यह एक दृश्य महज एक फिल्म का दृश्य नहीं, इसमें लेखक-निर्देशक ने चाहे जो सोच कर उनसे करवाया हो, लेकिन सच है कि यही बाव उनकी निजी जिंदगी का सच भी था।

उनकी आत्मकथा पढ़ रहा था, उनने ज़िक्र किया है संभवतः बाबरी विध्वंस की घटनाओं के दौरान किसी चमरपंथी ने कार्यकर्ताओं को कहा था कि ए के हंगल मत बनो और सदभावना के उपदेश मत झाड़ो, चलो आगे बढ़ो। यह वाकया ही ए के हंगल की छवि के लिए काफी है।

ऐसा नहीं कि ए के हंगल की यह सिनेमाई छवि बस परदे तक ही सीमित थी। निजी जिंदगी में भी उनके मकसद, उनकी विचारधारा हमेशा सांप्रदायिक सद्भाव की थी और वामपंथ के प्रति उनका झुकाव तो खैर जगजाहिर ही है। रंगमंच के लिए प्रतिबद्ध इस कलाकार ने हमेशा इप्टा के लिए काम किया, उसके लिए चंदा जुटाया और कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव से लगातार संपर्क में बने रहे थे।

उनकी अदाकारी कहीं से लाउड नहीं थी, संवाद रट कर अदा करने की बजाय हमेशा उसे समझ कर बोला हंगल साहब ने, अपने जीवन के शुरुआत में उन्होंने टेलरिंग में कौशल हासिल किया था। कताई की उनकी हाथ की सफाई उनकी अदाकारी में भी दिखती रही और निजी जीवन में भी, जहां आखिर तक एक भी वैचारिक सूत उनने उधड़ने न दिया।

अब जबकि सिनेमा में ज्यादातर औसत प्रतिभा वाले सितारों की भीड़ है और उनमें से भी अधिकतर की बौद्धिक क्षमता भी औसत से खराब ही है...ए के हंगल जैसे प्रतिबद्ध बौद्धिकों का जाना, सिनेमा का नुकसान भी है और रंगमंच का भी।

Thursday, August 23, 2012

कविताः पेड़ से लिपटी बेल

पेड़ के बारे में यूं तो सौ अफ़्साने थे.
बेल का कोई ज़िक्र नहीं था।
(फिर बेल कैसे अपनी बांहों में पेड़ के पूरे वजूद को संभाले उसकी जिंदगी का सहारा बनी हुई है?)

बेल अपनी बांहो में है पेड़ संभाले,
धीरे-धीरे
घायल शाख़ों पर,
पत्ते फिर से निकल रहे हैं,
धीरे-दीरे
नई जड़ें फूटी हैं,
और धरती में गहरे  उतर रही हैं,
बेल पे जैसे
एक नई मुस्कान के नन्हें फूल खिले हैं


(जावेद अख्तर, लावा में)

Wednesday, August 22, 2012

सुनो ! मृगांका: 19: है इश्क़ सलामत मेरा


अब तक आपने पढ़ाः अभिजीत अपने सारे बैंक-बैलेंस वगैरह अपने रिश्तेदारों के नाम करके गांव लौट रहा होता है। खजली स्टेशन पर उसने रिक्शा पकड़ा, और जब घर गया तो पता चला गांव के बंद मकान की चाबी उसके पास नहीं..फिर वह रिक्शेवाले के ही घर पर रुकता है।-मंजीत)

फिर सुबह हुई...

कंधे झिंझोड़ने से वह जाग गया। 'सुनो ...टुम डाग डाओ.. ' बिसेसर की छोटी बच्ची ने उसे
झिंझोडा़ था।

इहां पर टुमारा टाय रखा है( यहां पर तुम्हारी चाय रखी है) पी लो रे...बच्ची ने कपड़े के बाजू से अपनी बहती नाक पोंछने की नाकाम कोशिश की। अभिजीत ने लेटे-लेटे ही ग्लास उठा लिया। सफर की थकान अब भी तारी थी। स्टील की ग्लास में चाय तकरीबन पूरा ही भरा था।

"तुम्हारे बाबूजी कहां हैं..?" अभिजीत ने पूछा।

"खेट गए हैं...."

अभिजीत ने हैरत से देखा। सुबह अभी पूरी तरह से हुई भी न थी। लेकिन हवा में चूल्हा चलने की खुशबू तिर रही थी। जहां दालान पर वह लेटा था, वहां से सड़क तक दिखाई नहीं दे रही थी।

पूरा दृश्य ऐसा दिख रहा था मानो एक चित्रकार का सारा सफेद रंग कैनवास पर गिर गया हो और उसे ठीक करने के वास्ते उसने पेंसिल से लकीरें खींच दी हों।

"इतनी सुबह में 'खेट' क्यों गए हैं?"  अभिजीत ने लड़की के तुतलाते उच्चारण में बात करने की कोशिश की। उस यह उच्चारण भला लगने लगा था। "अरे, दीसा करने गए हैं रे.." कहकर लड़की खिलखिला पड़ी। वह अपने भाई से यह बताने में मशगूल हो गई कि शहर से आए आदमी को यह पता ही नहीं कि आदमी भोर में 'खेट' में 'दीसा' करने जाता है। लड़का ज्यादा चंट था। उसने अभिजीत को बताया कि दिशा करना या खेत जाने का मतलब सुबह-सुबह खेत में फसल
देखने जाने जैसी बेहद प्रतिबद्ध भकलोलबाजी और बेहूदगी नहीं बल्कि बेहद कूथकर संपन्न की जाने वाली निष्कासन क्रिया है।

"ऐ.." लड़की ने फिर टोका।

"हूं.."

"टुम टाय पीने से पहले मूं नहीं धोटा है क्या..?" लड़की ने दातुन की ओर इशारा किया। लड़की ने अभिजीत को दातुन दिया। दातुन करते-करते ही अभिजीत ने लड़की की तरफ देखा। उस बच्ची को देखते ही उसे अचानक मृगांका याद आ गई।

बेहद प्यार के पलों में उसके लिए ऐेसे ही चाय लाकर मृगांका ने पूछा था--ए अपने कितने बच्चे होगे।

कितने होने चाहिएं मृग? अभिजीत ने मु्सकुरा कर कहा था।
 कम से कम नौ। 
तुम्हें नहीं लगता कि देश की आबादी पहले से ही ज्यादा है।
अरे नहीं, हमारे सारे नेताओं को तो बच्चे पैदा करने की छूट है, हमें भी मिलनी चाहिए। मृगांका एकदम से बचकाने लाड़ से बोली थी।

लेकिन नौ? 
हां, नौ। आठ प्लांड और एक अनप्लांड।
अनप्लांड अभिजीत सुनकर हंसते-हंसते बेहाल हो गया। मृगांका भी अचानक शर्मा-सी गई। दातुन अभिजीत के मुंह से रखा था। स्थिर। 
ऐ इसको खाएगा क्या, चबाके कूची बनाओ ना, तभी ना दातुन करेगा। बिसेसर की बेटी उसे वापस वर्तमान में ले आई।

और वह दातुन को चबाकर कूची बनाने का काम कर ही रहा था कि मड़र अवतरित हुआ। अभिजीत ने उससे दिशा संपन्न करने की जगह पूछी तो मड़र ठठाकर हंस पड़ा, और खेतों की ओर उसे ले चला।

बिसेसर उसे उन खेतों की ओर ले चला, जो पोखरे के पास थे। सुबह-सुबह की इस अत्यावश्यक क्रिया से निपट कर अभिजीत कुछ और कहता तभी बिसेसर ने खुद कहा कि अब दोनों यहां के महंत के पास चलने वाले हैं, जो काशी हिंदू विश्विद्यालय में काफी पुराने ज़माने में पड़कर आए हैं और उनको ज़माने की हर बात पता है। इस गांव का इतिहास, भूगोल सब कुछ .. महंत जी हाथ की रेखाएं देखकर लोगों का भूत-भविष्य बतादेते हैं। बहुत पढे-लिखे हैं. महंतजी। 


अभिजीत को जो बात पता चली वह हे कि महंत जी गांव के मठ जिसे 'कुट्टी' भी कहा जाता है-के मालिक हैं। 'कुट्टी' यानी भव्य मंदिर के तहत पचासों बीघे ज़मीन है। उनका सारा प्रबंध खुद महंत जी करते हैं..इतनी उम्र होने पर भी महंत जी सक्रिय हैं।

"मठ कहां हैं.."

"यहीं पोखरे के मोहार (किनारे) पर मंदिर है.. इस पोखरे को महंतजी का पोखर..महंजी पोखर कहा
जाता है.. वहीं है।" मड़र ने इशारा किया। दोनो महंत जी के पोखरे की तरफ़ बढ़ चले। विशाल पोखरा... लेकिन ऐसा लगा रहा था कि साद भर रही है पोखरे में। किनारे बने हुए घाट को छोड़ दें, तो एक किनारा जलकुंभियों से अंटा था। सेवार और काई ..एक हिस्से में पुरैन (कमल) के फूल खिले थे.. जितने फूल नहीं उससे कहीं ज्यादा झाड़-झंखाड़।

वहां जाकर बिसेसर ने उसे बताना शुरु किया, ये जो पेड़ देख रहे हैं मालिक, पाकड का..ये हमारे ग्राम देवता हैं, भैरव बाबा। इसके चारों तरफ जो मैदान है पहले बहुत बड़ा था अब थोड़ा सिकुड़ गया है। भैरव बाबा से जो मनौती मांगिएगा, पूरा हो जाता है। हमरी दो-दो लड़कियां हो गईं, तो हमारी मां ने सोंगर कबूल किया। तब हमारा बचवा पैदा हुआ..।

सोंगर.. 
हां सोंगर माने लोहे का छड़ जैसा चीज़.. यहां यही चढाया जाता है भैरव बाबा को। साथ में कुछ परसाद भी चढ़ा दीजिए। गांव के लोग की हर मानता(मन्नत) पूरी करते हैं और रोग-सोक, मरनी-हरनी और दुख-दलिद्दर से दूर रखते हैं. सबको..
 
अच्छा.. अबिजीत को मड़र के अगाध विश्वास पर आश्चर्य हो रहा था। मड़र चालू रहा,
यहां से पश्चिम जो रेलवे लाईन है वो उत्तर की तरफ खजौली होते हुए जयनगर तक चला जाता है। दक्खिन में मधुबनी-दरभंगा तक। एक वक्त था जब इस लाईन पर जानकी एक्सप्रैस जैसी ट्रेन कोयले के इंजन से चलती थी। ...धुआं उड़ाती ट्रेन शुरु में तो सबके लिए मजा़ का चीज था लेकिन बाद में वह घड़ी का काम करने लगा। नौबजिया, दसबजिया और चरबजिया जैसे नाम पड़ गए रेलगाडियों के..। लोग बाग अपने काम रेल के आने-जाने के वक्त से तय करते थे। जैसे कि शाम में झाड़ा फीरना यानी दिशा-मैदान से फारिग होना चार बजे शाम की ट्रेन यानी चरभजिया से तय होता।

पाठकों को बता दें कि जिस रेलवे लाईन का ज़िक्र बिसेसर मड़र कर रहे हैं, उन दिनों यहां छोटी लाईन थी। खजौली, मधुबनी या दरभंगा-जयनगर जाने वाले वोग, छात्र, कुंजड़िनें(सब्जी वाली) मयसामान के, बिना टिकट, बड़ी सहूलियत से, गंतव्य तक बेरोकटोक जाते थे।

भारतीय रेल की छोड़ दें, दुनिया भर के किसी टीटीई की क्या मज़ाल की छात्रों और कुंजड़िनों से टिकट मांगने की गुस्ताखी कर दे। अगर किसी ने यह हिमाकत कर भी दी तो सब्ज़ी के टोकरों से भरे डब्बे में कुंजडि़नें मुमुनाना, भुनभुनाना और झगड़ा करने लगतीं। भुनभुनाहट सोलो यानी एकल शुरु होता और ड्युएट होते हुए कोरस पर ख़त्म होता। इस झगड़े में शाइस्तगी या पाकीज़गी जैसी बेहूदा चीजे सिरे से नदारद होतीं। होनी भी चाहिए।

झगड़े के इस महाप्रकरण में ऐसे शब्द होते जिन्हें महज असंसदीय कहना उनकी महत्ता को अपमानित करने जैसा होगा। टीटीई महोदय को भगिनीभंजक, मातृ-उत्पीड़क आदि कहना तो आम बात थी। यहां से शुरु कर कुंजड़िनें आहिस्ता-आहिस्ता उसके सात पुश्तों का उद्धार करती हुई  टीटीई के परिवार की तमाम स्त्रियों का संपर्क किसी अनजान क़िस्म के जानवर या अपने किसी प्रिय व्यक्ति से करवा देतीं। शब्द ऐसे जिन्हें सुनकर कानों में ख़ून उतर आए।

और छात्रों की बात... वे बेहद शरीफ हुआ करते हैं। उन पर कोई तोहमत लगाया ही नहीं जा सकता। वे चुपचाप कुंजड़िन- टीटीई कांड को स्थितप्रज्ञ भाव से देखते रहते हैं। एकबार ज्योहिं कुजडिनों का अध्याय समाप्त हुआ, वे अपनी पर उतरते हैं। 

इस इलाके में नोंक-झोंक में एक खास गाली (बेटी से जुड़ा).. सबकी जुबान पर आम है। इसे आपसी प्यार का

प्रतीक माना जाता है। मित्र या बाप से प्यार के स्तर पर इस पावन शब्द की वही महिमा है जो प्रेमी-प्रेमिका के बीच ताजमहल की है। सोटीटीई महोदय अगर छात्रो के हत्थे चढ़ गए तो ये पहले उनकी पुत्री अथवा भगिनी(बहन) से शब्दों के ज़रिए रिश्ता गांठते हैं और फिर दो-एक लप्पड़ रसीदकर छोड़ देते हैं कि आज तुमने टिकट मांगने की हिमाकत कर ली सो कर ली,. आगे से ऐसा कुकर्म नहीं होना चाहिए। कम शब्दों में यह रेल लाईन टीटीई के संक्रमण से मुक्त बेटिकट लोगों के स्वस्थ
विचरण का क्षेत्र था। 

उसी बेटिकट यात्रियों के अभयारण्य के रेलवे लाईन की पटरी के किनारे पड़े हर पत्थर से गांव वाले वाकिफ हो चुके हैं। नीचे उतरती पगडंडी के दोनों और मूंज की झाड़ से और नीचे पहले खेत हुआ करते थे, जिनमें गाव के लोग मूंग-मटर उगाया करते। पता नहीं किस अधिकारी के भेजे में कहां से दूरंदेशी की बात आ गई और उन्होंने वहां जंगल उगाने का फरमान जारी कर दिया। रेलवे या वन अधिकरी जो भी अपराधी हों, लेकिन उन्होंने पता नहीं यूकेलिप्टस बोया या गुलमोहर.. फिलहाल वहां बबूल का जंगल खड़ा है। 

इस इलाके के लिए न तो यूकेलिप्टस मुफीद है और ना ही गुलमोहर। यूकेलिप्टस तो पर्यावरण का समझें कि आतंकवादी ही है, ज़मीन को बंजर बनाने के लिए बेहतरीन विकल्प। जमीन की नमी चूसने उसकी जड़े पाताल तक जाती है और उसके पत्ते गिरकर अगल-बगल की मिट्टी को बंजर बना देती हैं। गुलमोहर भी ऐसा फूल कि.. न जानवरों के चारे लायक पत्ता , न लकड़ी का जलावन। तो समझिए कि गांव कि किस्मत अच्छी थी कि न गुलमोहर पनप पाया न यूकेलिप्टस.. पनपा तो क्या... बबूल। लेकिन गांववालों की इतनी अच्छी किस्मत कहां। अब गांववाले सांझढ़ले निबटने के लिए उसी जंगल में जाते हैं, लेकिन लहुलुहान होकर वापस आते हैं।

बबूल के उस जंगल के बाद कई खत्ते है, ये खत्ते सड़क बनाने के दौरान किए गए गड्ढे हैं,जिनमें बरसात में पानी भर जाता है। यए पानी मार्च के अंत तक भरा ही रहता है।

बबूल के जंगलों के रास्ेते जाने वाली पगडंडी भैरवथान के पास सड़क मे मिल जाती है। कोने पर कदंब का पेड़ सीना ताने खड़ा है। कदंब के इसी पेड़ की जड़ में बभनटोली के कुलदीपक अल सुबह या दोपहर को या जब भी सहूलियत हो-- मलत्याग की क्रिया सादर संपन्न करते हैं। कदंब का पेड़ यूं तो बरसात में ही फलता फूलता है।  बभनटोली के बच्चों के पीले-पीले गू थोड़ा गीला होकर फैल जाते हैं। घास में पड़े उन पाखानों पर नारंगी-पीले रंग के कदंब के फल और पुराने पत्ते गिरते रहते हैं। 

हरी-हरी घास पर बेलबूटों के समान यत्र-तत्र छितरे गू एक टुकड़े...।   अहा...कैसा मनोरम दृश्य होता है। सूर याद आते हैं- हरित बांस की बांसुरी। ठीक उसी गू-गडि़या के बगल से सड़क गुजरती है, जो उत्तर की तरफ जाकर पीपल के नीचे से गुजरती हुई रेलवे लाईन पार करती है और आगे सांप की जीभ की तरह दो फांक हो जाती है। उत्तर की तऱफ खजौली..और दूसरा सिरा कलुआही की ओर। लक्ष्मीपुर गांव भी सड़क का पीछा करता हुआ थोड़ी दूर तक चलता है  और फिर ठिठक जाता है।

यह गांव भी अनेकता में एकता के पांचवी क्लास के  बच्चों के निबंध की तरह विभिन्न जातियों और समुदायों का बना तो है, लेकिन यहां अनेकता के बावजूद एकता नहीं है। एकता भी होती है, पर कुछ खास मुद्दों पर..। आमतौर पर लोग आपस में लड़ते रहते हैं, विभिन्न मुद्दों पर। लडाई-झगड़े के मसले पर जाति कभी आड़े नहीं आती.. हर आदमी एक-दूसरे से लड़ने को आजाद है। जाति के भीतर लड़े, जाति से बाहर लड़े, फिरी (फ्री) है बिलकुल फिरी।

अभिजीत और बिसेसर मड़र शौचक्रिया से निबटकर और पोखरे में ही मिट्टी से लोटे को मांजकर पवित्र कर लेने के बाद कुट्टी की तरफ बढ़े। वहां एक नौकर महंत जी की चौकी पर कुश की आसनी बिछा रहा था।

बिसेसर ने खाली चौकी को ही दंडवत् किया।



 जारी.....

Tuesday, August 21, 2012

ये लक्ष्मण नहीं, कारीगर का संन्यास है...

मुझे नहीं पता कि ज्यादातर लोग वीवीएस लक्ष्मण की किस छवि को याद रखेंगे...मुझे उऩकी वही छवि याद है जो बल्ले के इस कलाकार के लिए सबसे मुफीद है। पीले हैंडल वाले बल्ले को एक हाथ से  और दूसरे में अपना हैलमेट उठाए हुए दर्शकों का अभिवादन स्वीकार करते हुए।

लक्ष्मण विजेता नहीं रहे, वो पूरी टीम के बिखर जाने  पर आखिर कोशिश कर रहे योद्धा रहे। जब क्रिकेट के बड़े बड़े सूरमा नाकाम हो जाते, तब किसी द्रविड़ के साथ लक्ष्मण  को जूझते देखा। ऑस्ट्रेलिया जैसी विजेता टीम के मंह से फॉलोऑन के बाद मैच खींच लेना बस लक्ष्मण  के बूते की ही बात थी।


लक्ष्मण हैदराबाद की कलाईयों के जादू की रवायत के हकदार रहे थे, उनके बाद अब कौन....

हमने उन्हें कभी छक्का उड़ाते नहीं देखा। शायद उड़ाया भी हो, लेकिन ऐसे लॉफ्टेट शॉट खेलना उनकी शैली के विपरीत था। हम तो उन्हे कलाईय़ों के जादूगर के रूप में जानते रहे। गेंद पैड की तरफ आई नहीं कि सीमारेखा के पार।

करिअर में कई बार चोटिल होने और टीम से बाहर होने के बाद लक्ष्मण को खुद की अहमियत साबित करने में वक्त लगा था। लेकिन एक बार जब स्थापित हो गए, तो लक्ष्मण टेस्ट टीम के लिए अपरिहार्य हो गए।

गांगुली की टेस्ट टीम को स्थापित करने में और माही की टीम के नंबर एक तक ले जाने मे लक्ष्मण की भूमिका पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। बस मुझे दिक्कत हुई तो यही कि अब जबकि 20-ट्वेंटी से हम जैसे क्रिकेट प्रशंसकों का मोह भंग हो गया है और वनडे में कोई मज़ा रहा नहीं, तो टेस्ट में ही क्रिकेट अपने शास्त्रीय रूप में मौजूद है।

लक्ष्मण जैसे कारीगर के, जो छेनी हथौड़ी से बारीकी से नक्शबंदी की तरह अपनी पारी की नक्काशी करते थे, उनके विलो के बल्ले के प्रहार और लेदर की गेंद के टकराहट से जो संगीत पैदा होता था, अब कहां मिलेगा। गेंद पर प्रहार सहवाग भी करते हैं, लेकिन उनके प्रहार में मारक कर्कशता होती है, लक्ष्मण के प्रहार में संगीत होता था।

लक्ष्मण का संन्यास लेना तय था। बढ़ती हुई उम्र आज नहीं तो कल, उन्हे संन्यास लेने पर मजबूर करती ही, लेकिन क्या ही अच्छा होता कि इतने बड़े खिलाडी़ को एक उम्दा पारी खेलने के बाद संन्यास लेने दिया जाता।