Saturday, April 27, 2013

सुनो! मृगांका:32: जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब सांस आए

कांच के ख़्वाब है बिखरी हुई तनहाई में...

मृगांका, अभी भी काफी अपसेट थी। लेकिन, अंदर ही अंदर बहुत कुछ चल रहा था। 'प्रशांत एक काम तो कर दो...'

'जी भाभी...'
जितनी जल्दी का हो सके, पटने की फ्लाइट का टिकट ले लो...
'जी भाभी ये रहा...'

तीन टिकट थे...फ्लाइट शाम के 8 बजे की थी, ठीक वक्त पर उड़ी तो रात के दस-साढ़े दस बजे पटना...और पटने से कितना वक़्त लगेगा?'----मृगांका ड्राइव कर रही थी। प्रशांत आगे की सीट पर बैठा था और मां पीछे बैठी थी...हमेशा की तरह खामोश।

"...अगर, कोई ठीक सी गाड़ी मिल गई तो आज के हालात में रात के कम ट्रैफिक में सुबह -सुबह पहुंच जाएंगे।'

क्यों, 6 घंटे लगेंगे...?
हां, पटना से निकल कर महात्मा गांधी सेतु पार करने में ही वक्त लग जाता है...वनवे है। वहां से फिर पांच घंटे...'
ज्यादा भी लग सकते हैं...

मृगांका चाहती थी कि पंख लगाए और सीधे पहुंचे, गांव। अभिजीत के पास। उसके पास अभिजीत से जुड़ी यादें हैं, इंसान के पास गर अच्छी यादें हों तो वो कम तल्ख़ होता है।

प्रशांत के फ्लैट पर पहुंचकर मृगांका ने सीधे अभिजीत का कमरा खोला। अभिजीत और प्रशांत इस फ्लैट में साथ रहते थे...कमरा अब भी तकरीबन वैसा ही था। झाड़-पोंछ रखा था प्रशांत ने। लेकिन किताबों पर धूल की हल्की परत थी। ह्विस्की की बोतलें, गोल्ड-फ्लेक सिगरेट की खाली और आधा भरी डिब्बियां...

...मृगांका, अभिजीत की कुछ किताबें, डायरियां पलटती रही। दराज़ में अभिजीत का मोबाइल फोन पड़ा था। मृगांका ने बैटरी को चार्ज पर लगा दिया। डायरियों में उसके साथ गुजारे पलों का इतिहास भरा पड़ा था।

हर किताब के पहले पन्ने पर अभिजीत के हस्ताक्षर थे। कोमल...खूबसूरत हस्ताक्षर। कुछ पर कुछ पंक्तियों का नोट भी था। ऐसे ही एक हस्ताक्षर पर मृगांका ने उंगलियां फेरीं, तो उसे लगा कि सारी यादें ताज़ा हो गईं हों।

दोपहर का सूरज नीचे ढलने लगा था। मोबाईल की बैटरी इतनी चार्ज हो चुकी थी कि उसे ऑन किया जा सके। मृगांका ने मोबाइल ऑन किया...नोकिया के सिग्नेचर म्युजिक के साथ मोबाइल ऑन हुआ।

मिस्ड कॉल्स...सिर्फ दो। उसी के मोबाइल से। इनबॉक्स में गई...तो उसी के मेसेज सेव्ड थे। ड्राफ्ट में भी, और इनबॉक्स तो खैर भरा ही था....आखिरी मेसेज....जस्ट फॉरगेट द पास्ट।

मृगांका एकबारगी चौंक गई...। जस्ट फॉरगेट द पास्ट...? मैने ऐसा मेसेज कब भेजा...कभी नहीं। मृगांका स्मृतियों पर जोर डालने लगी...ना...कभी नहीं। विदेश से लौटने के बाद, और न्यूज़ चैनल फिर से जॉइन करने के बाद उसने बारहा कॉल किए थे अभिजीत को...कहां मिला था वो। हमेशा फोन स्विच्ड ऑफ ही मिला था। कैसे खो गया उसका अभि...ये एक तिलिस्म था।

लेकिन, ये मेसे...। उसने तुरंत फोन लगाया।

'हलो पापा..'
जी बेटे
आप जल्दी से प्रशांत के फ्लैट पर पहुंचो...
कोई खास बात एक बिजनेस मीटिंग में हूं, शाम को पहुंचूं
नही पापा, टाइम नहीं है, जल्दी आइए

मृगांका ने अभिजीत का मोबाइल रखा तो स्क्रीन पर उसी की वॉल फोटो थी...स्क्रीन सेवर भी मृगांकी की ही तस्वीर थी। वॉल फोटो उसके घनों केशों वाली ब्लैक एंड वाइट फोटो, जिसे देखकर अंतरंग क्षणों में अभिजीत ने उसके अनगिनत बोसे लिए थे...और स्क्रीन सेवर वही फोटो जिसमें मृगांका के ब्रा के स्ट्रेप्स दिखते थे। अभिजीत को ये दोनों तस्वीरें खूब पसंद थीं।

घर में भारीपन-सा तारी था। अचानक मृगांका  जोर-जोर से हंसने लगी। मां की प्रश्नवाचक निगाहें  उठीं...तो मृगांका शर्मा-सी गई। मां को मृगांका ने सीने से लगा लिया, मुस्कुराते हुए बोली, अम्मां, हम आपके बेटे से बहुत प्यार करते हैं...हमेशा मैथिली सिखाने की कोशिश की, अभि ने...मैंने सोचा था आपसे पहली बार मिलूंगी आपसे तो मैथिली में बातें करूंगी...लेकिन..

मां को कुछ समझ में आय़ा, कुछ तो सीखा होगा बेटा आपने
हां अम्मां, हमरा भूख लागल अछि..बस इतना ही...मृगांका की मुस्कुराहट विगलित होकर आंसुओं में तब्दील हो गई, मां भी हिचकिया लेने लगीं, प्रशांत का गला रूंध गया।



ख्व़ाब ने टूटे कोई, जाग न जाए कोई...

जब सुबह बिसेसर दोबारा आय़ा तो सूरज सिर पर चढ़ चुका था। उसने देखा, रात का रखा खाना अब भी वहीं पड़ा है। बारामदे के तख्त पर अभिजीत पीठ के बल सीधा लेटा है, आंखें आधा खुलीं...आधा बंद। एक दम शांत। नाक के पास एक-दो मक्खियां उड़ रही थीं।

बिसेसर को थोड़ा शक हुआ...उसने  अभिजीत को निगाहों से तौला...एकदम सीधे कैसे सोए हैं  सर जी, हमेशा तो पेट के बल सोते थे...आज...और इस वक्त तक तो जग ही जाते थे...

बिसेसर और पास गया...नाक के पास हाथ ले गया, उसे कोई हलचल नहीं लगी। सांसें बंद थीं।

बिसेसर चिल्लाया, 'महंत जी....' ---और दौड़कर उनके घर की तरफ भागा।

...रास्ता इत्ता लंबा तो न था!

फ्लाइट जब पटना एयरपोर्ट पर लैंड हुई तो रात के साढे ग्यारह बज चुके थे। प्रशांत ने पहले ही एक गाड़ी बुक करा रखी थी। मृगांका के साथ उसके पापा भी थे। एयरपोर्ट पर मृगांका को कई निगाहों ने पहचाना भी, और मुस्कुराहट भी मिला। लेकिन मृगांका के पास कोई प्रत्युत्तर नहीं था।

पापा ने निराश किया था। उसके मोबाइल से पापा ने ही मेसेज किया था, जस्ट फॉरगेट द पास्ट...और मृगांका और अभिजीत दोनों का फ्यूचर खराब हो गया। पापा ने स्थिति स्पष्ट की थी कि अभिजीत ने खुद बताया था कि उसे एक गंभीर बीमारी है, जिसमें उसके अंदरूनी अंगों की डिकेइंग हो रही है, आहिस्ता-आहिस्ता।

लीवर जैसा अंग भी रि-जनरेट नहीं पा रहा...। मेडिकल रिपोर्ट उन्हीं के पास थी, ऐसे में अभिजीत और मृगांका दोनों को अलग कर देना ही बेहतर था।

लेकिन पापा हम अलग तो नहीं हा पाए ना....पापा निरूत्तर थे, अब इस लंबे सफर में साथ थे, जो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था।

जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब सांस आए...

महंत जी अभिजीत के घर पहुंचे, तो स्थिति स्पष्ट हो चुकी थी। अभिजीत की देह नहीं रही...। महंत जी के होठों पर कुछ मंत्रों की बुदबुदाहट हुई। शायद अभिजीत की रूह को इससे शांति मिलने वाली थी।

लेकिन, जिसके पूरे साहित्य की जान तीन डॉट रहे हों, वहां शांति की संभावना तो थी ही नहीं। शांति की एक ही सूरत थी...मृगांका।

गांव की औरते जमा हो गई थी। बिसेसर की बीवी ने अभिजीत को भैया कहना शुरू कर दिया था। रोना आ रहा था उसे। औरतों में फुसफुसाहट थी कि अभिजीत तो कल शाम को ही डगमगाते हुए साइकल चला रहे थे...रात भर में क्या हो गया।

बारिश के बाद मौसम साफ निकल आया था। बादलों के तीन टुकड़े, तीन डॉट की तरह आसमान में बिखरे थे। चिकनी मिट्टी वाले गांव में सड़क से लेकर हर तरफ कीचड़-कादो था।

मां और मृगांका कीचड़ सने गाड़ी से निकल कर घर की तरफ तकरीबन भागती आ रही थी...। मां ने देखा, दरवाजे पर औरते थीं, मुंह को आंचल से ढंके। अभिजीत की मां को देखते ही रुलाई फूट पड़ी...जोर से।

मृगांका, ठहरकर स्थिति समझने की कोशिश कर रही थी...

बाहर अर्थी बनाई जा रही थी। कुल्हाड़ी, हरे बांस पर चल रही थी।

खट्...खट्...खट्।



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