Tuesday, April 23, 2013

सुनो! मृगांका:31: मैं तन्हा था मगर...इतना नहीं था

प्रशांत ने सुनने से पहले फोन रख दिया। अभिजीत का आधा नशा उतर गया...लेकिन मृगांका...एक ऐसा नशा... जो ताउम्र उस पर तारी थी। मारिजुआना से भी गजब का नशा...वह थोड़ा डरा हुआ था, थोड़ा खुश। वह चाहता भी तो था मृगांका को जीभर देख पाए...

कितना वक्त बीत गया...दो साल तीन महीने और पंद्रह दिन...यानी आठ सौ पैंतीस दिन यानी...बीस हज़ार चालीस घंटे...यानी... इससे आगे का हिसाब अभिजीत नहीं लगा पाता।

ठीक ही तो कहा था मृगांका ने चीखते हुए...आई कांट गेट यू इन दिस लाइफ़....और शायद इसी लिए मेसेज आया था उसके इन बॉक्स में, जस्ट फॉरगेट द पास्ट

बारिश के आसार घने हो गए थे...अभिजीत को लगा, सारे गहरे कराए गए तालाब, जिनकी गाद निकाल कर खेतों में डाल दी गई थी, बारिश के बाद लबालब भर जाएंगे। ठूंठ हो चले पेड़ों में हरे पतों की जगह बनेगी...लेकिन उसके दिल का पोखरा, जिसकी कमलिनी थी मृगांका...सूखा ही रहेगा।

अभिजीत सोच रहा था कि आखिर अब मृगांका से मिल भी पाएगा या नहीं।

उसे प्रशांत की बातें याद आईं...जीवन में पहली बार उसने अपने पब्लिशर को हाथ से लिखी कॉपी दी थी। छपने  के लिए उसने हमेशा सॉफ्ट कॉपी को तरज़ीह दी थी।

लैपटॉप पर लिखते-लिखते उंगलियां कीबोर्ड की अभ्यस्त हो गई, और लिखावट बगुले की टांग सरीखी। लेकिन, वही लिखावट मृगांका को पसंद थी। वह जो बिंदु लगाता था किसी शब्द पर, उसका घेरा, उसकी परिधि, बड़ी-सी हुआ करती। मृगांका को वह भी पसंद था।

अभिजीत ने कभी नहीं बताया था मृगांका को, कि बिंदु को इतना बड़ा घेरा, उसके मन की शून्यता का प्रतीक है।

बारिश होने लगी, बूंदे गिरने लगी। माटी से सोंधी खुशबू आने लगी। बारिश की बूंद आंगन में ह जगह टपा-टप, टपा-टप...आम के पेड़ पर, अंगने की लता पर...महुए पर, कदंब के कुंज पर, बांसवार (बांस का झुंड)...अब गांव में फिर से बोलेंगे दादुर और मेंढक...अब फिर झींगुरों की तान में उदासी की जगह खुशी का राग होगा, अब फिर से मेघ-मल्हार होगा... मन कहीं और उड़ चला, दिल्ली की तरफ... ।


उधर, दिल्ली में,

प्रशांत अस्पताल से आकर बस फ्रेश ही हुआ था...कि दरवाज़ा धड़ाम से खुला। अवाक् प्रशांत ने देखा कि अभिजीत की मां और मृगांका दोनों सामने खड़े थे। कोड़े की तरह सड़ाक् से सवाल आया मृगांका का, 'ये क्या है?'

'क्या, क्या है?'---प्रशांत मन में समझ तो गया, जब प्रेस की छपाई की ताजी खुशबू वाली किताब मेज पर पटक दी थी मृगांका ने, लेकिन अनजान बना रहा। ..कांपते हाथों से प्रशांत ने किताब उठाई, मोटे हरफ़ो में छपा था, सुनो, मृगांका...अभिजीत को शब्दों के बाद के ये तीन डॉट बड़े पसंद थे।

तीन डॉट कई विकल्प खुला छोड़ जाते हैं।


'अभिजीत की डायरी को छाप दिया है गधे पब्लिशर ने...' अनजान बनने की कोशिश करते हुए प्रशांत ने जवाब दिया। आवाज़ उसका साथ नहीं दे रही थी।

'फ्लैप देखो, फ्लैप।' मृगांका गुस्से में थी। मां चुपचाप किनारे खड़ी थी।

प्रशांत ने फ्लैप देखा, अभिजीत के परिचय के ऐन ऊपर मोटे हरफों में लिखा था अभिजीत की आखिरी किताब...प्रशांत ने नजर नीचे किए हुए पढ़ा। '...नहीं भाभी, ये तो पब्लिशर ने इसलिए लिख दिया होगा, क्योंकि किताब बिकती है इससे। अंग्रेजी में भी साथ ही छपी है, पांच लाख कापियां पहले ही बिक चुकी हैं।'--- प्रशांत ने नजर चुराते हुए कहा।

'ये सब पता है मुझे, और किताब इसलिए नहीं बिक रहीं क्योंकि अभिजीत की आखिरी किताब है, बल्कि इसलिए बिक रही हैं क्योंकि....क्योंकि तुम आगे पढ़ो।' मृगांका की आवाज़ डोलने लगी थी।

....अभिजीत एक गंभीर बीमारी से ग्रस्त हैं और जीवन के चंद महीनों के मेहमान हैं, पेश है..उनकी निजी डायरी के अंश, सुनो, मृगांका...

'कहां है अभिजीत...? ' मृगांका की आवाज़ में गुस्से की जगह ले ली थी अब एक तरावट ने।

गांव...प्रशांत ने अब लाग-लपेट करना ठीक नहीं समझा।

मौसम विभाग ने भविष्यवाणी की थी, दिल्ली में मॉनसून आने की, सच हो रही थी, बाहर तेज हवा चल रही थी, दिल्ली में भी बारिश होने लगी थी। लेकिन बारिश हमेशा खुशियां लेकर नहीं आती।

हां...बारिश हमेशा खुशियां लेकर नहीं आती।

रात घिर आई, लेकिन बारिश जो एक बार शुरू हुई थी, तो लगा कि जितने दिनों तरसाया सबको पानी के लिए, सारी कसर आज ही पूरी कर देगी। बरसात शुरू हुई थी तो बच्चे क्या, जवान क्या, मर्द क्या औरतें क्या, सब..खूब नहाए थे...बिसेसर तो कीचड़ में लोट ही गया था।

महंत जी से लेकर गांव के मुखिया तक, सब ने बारिश का स्वागत किया था। प्यास तो सबको लगती है, बिसेसर हो दलित, या महंत हों पंडित।

लेकिन, नहा धोकर, थककर और खाकर जब गांव नींद के आगोश में चला गया, अभिजीत के लिए शायद आखिरी बुलावा आ चुका था।

पेट में तेज़ दर्द...वह तख्त पर औंधा लेट रहा बारामदे में...। चहकता हुआ बिसेसर छाता लालटेन लेकर खाना लाया था, तो उसकी छुटकी बेटी भांप गई थी।

'चच्चा, आपका तबियत ठीक नैं है का...?'
'हां बेटा...तबियत ठीक नहीं'
'खाना खा लीजिए'
'अभी मन नहीं कर रहा बच्चे, रख दो, खा लूंगा...'

बिसेसर ने इसरार किया कि वो यहीं रुक जाता है...लेकिन अभिजीत ने उसे वापस भेज दिया। खाना रख कर और भूख लगने पर खा लेने की हिदायत के साथ बाप-बेटी विदा हो गए।

अभिजीत ने देखा, ओसारे में जली लालटेन की लौ धीरे-धीरे कालिमा में छुप रही है। लग रहा था कि लौ बुझ जाने वाली है गोकि उसकी रौशनी थोड़ी तेज़ हो रही थी...

अभिजीत किसी तरह उठा, घड़े से पानी पिया...। लेकिन चैन नहीं, लग रहा था कि किसी ने पेट में जलता अंगारा डाल दिया हो...लेटा तो बचपन के सारे दिन याद आने लग गए, घर के पीछे जामुन का पेड़, मुहल्ले की मामी जी के आंगन का बेर का पेड़...वह यूकेलिप्टस का पेड़ जिसमें वो अनिल कपूर से लेकर हनुमान तक की आकृतियां खोज निकालता था...वह कटहल का पेड़, जिसे दोस्त की तरह उसने पाला पोसा था...बाबूजी का धुंधला सा चेहरा, हमेशा दूसरे कामों में व्यस्त पहने वाली मां...अपने भाई और भाभी...विजयनगर में प्रशांत, जिसने रहने का आसरा दिया था, उसके फाकाकशी के दिनों में...

और मृगांका...जो उसकी ज़िंदगी का सबसे मुलायम लम्हा थी।

काले-काले मेघ...बाहर पाकड़ के पेड़ पर बरसती बूंदे...बूंदो की रुन-झुन का साउंड इफैक्ट...उसके दफ्तर के सामने की चाय दुकान...मृगांका के साथ चाय पीना...दिल्ली के उस स्लम में मृगांका से मुलाकात...जहां मृगांका ने उसके लिए चाय भिजवाई थी...कभी स्टिल के कोलाज़ की तरह, तो कभी विजुअल मोंटाज़ की तरह गड्ड-मड्ड हो रहे थे।

अभिजीत की निगाहें आसमान की तरफ गईं...उसने इतनी कातर निगाहों से आसमान को कभी नहीं ताका, कभी मंदिर नहीं गया, भीख मांगने आए औघड़ों को भगाया, निगाहें सबसे बुरे दिनों में भी इतनी कातर और मार्मिक नहीं हुई थी...

मानता हूं कि मैं एक कॉकरोच हूं..लेकिन तेरे आगे झुकूंगा नहीं...वह बुदबुदाया। आंखें बंद होती चली गईँ। मृगांका..उफ़ मृगांका...कितना अकेला हूं मैं...तुम मेरी जिंदगी में नहीं थी, तब भी मैं अकेला था...लेकिन अब ज्यादा तन्हा हूं...

ये मेरा आख़िरी पयाम है...

बिसेसर को अभिजीत के घर से जाते वक्त ही लग गया था कुछ तो गड़बड़ है। देर रात बूंदाबांदी थोड़ी कम हुई तो वह अभिजीत के घर आया, बाहर का दरवाज़ा ऐसे ही खुला था। लालटेन की लौ बस नीली बिंदी सी बची थी।

बिसेसर ने देखा, अभिजीत को नींद आ रही है...अभिजीत सो रहा है। तो वो दबे कदमों वापस लौट गया।

अभिजीत सो गया, गहरी नींद। बहुत गहरी नींद।



2 comments:

eha said...

आह कहानी का अंत कर दिया... नायक हमेशा बिना बोले ही सो भी जाता है। हजार सवाल और हजार जवाब साथ में लिए...उम्दा...

monali said...

Dont finish it lyk dis.. pls!!!