Wednesday, May 8, 2013

सुनो! मृगांका:33: कागा सब तन खाइया...

खट् खट् खट्

कुल्हाड़ी हरे बांस पर चल रही थी। मृगांका ठगी-सी घर के बाहर खड़ी थी। मां अंदर गई थीं, तो उनके दहाड़ मार कर रोने की आवाज आई।

बिसेसर ने कहा, मयडम जी सब कुछ खतम हो गया। गांव की औरतों ने एक साथ मातम गाना शुरू कर दिया था।

हमनी के छोड़ि के नगरिया ए बाबा
हमनी के छोड़ि के नगरिया ए बाबा
कि आ हो बाबा सुन ली कि छोड़ि दिहिअ घर परिवार 
कौन बनमा मइ गइली हो..

मृगांका...सहसा विश्वास नहीं कर पा रही थी। अभिजीत, जिसने उससे कहा था कि वह न जाने कितने जन्मों से उसका इंतजार कर रहा था, जो न्यूज़ रूम के कोने उसे निहारा करता था, जो कहता था...मृग, तुम तो मेरी सूरजमुखी हो...नहीं...नहीं।

मृगांका, दालान को पार कर अंदर गई। सफेद आधी आस्तीन की शर्ट, और नीली जींस...हमेशा की तरह। अभिजीत के चेहरे पर दाढ़ी उग आई थी। दाढ़ी और सर के खिचड़ी बाल। चश्मा किनारे रखा। मृगांका पिघल रही थी। पूरी देह में थरथरी हो आई।

तुमने तो कहा था ना अभि...कभी साथ नहीं छोडूंगा...पक्के निर्मोही निकले तुम।

निर्मोही शब्द का इस्तेमाल अभिजीत ने ही सिखाया था मृगांका को। तुम निर्मोही ठहरे अभिजीत...देखो ना मृग तुम्हारे सामने खड़ी है।

मृगांका ने अभिजीत की अधमुंदी आंखों की तरफ देखा। उन्ही आंखों को कभी विस्फोट के घायलों में खोज रही थी मृगांका। दिल्ली सीरियल ब्लास्ट में।

वो आंखे यहां है...नहीं अभिजीत...मेरे कितने सपनों के राजकुमार ते तुम। अपनी तमाम बदतमीजियों, तमाम किस्म के भदेसपन के बाद भी मां, पापा सबकी पसंद थे...एकतरफा फ़ैसला कैसे कर लिया तुमने। प्यार तो मैंने भी किया था ना...मृगांका चीख-सी पड़ी थी।

गउआं के लोगबा केहू केहू से ना बोले
छोटका लइकवा भोरहिं से आंखहि ना खोले
सुनसान भइली डगरिया ए बाबा
कि आ रे बाबा नीमई या हो गईले पतझार
कि कवन बनमा मइ गइली हो

मातम का गीत जारी था। मृगांका की आंखों के सामने सारे दृश्य घूम गए, फ्लैश बैक वाली फिल्म सरीखी। पहली बार एक्सीडेंट में प्यार के इज़हार के बाद से, भावी जीवन के तमाम सपने।

अभिजीत, तुम मर नहीं सकते...तुम मुझे यूं छोड़कर नहीं जा सकते।

मृगांका ने देखा, अभिजीत के चश्मे के बगल में एक काग़ज़ रखा था...टेढ़ी मेढ़ी अभिजीत की लिखावट में लिखा था, लव मी वेन आई लीस्ट डिजर्व इट...बिकॉज़ दैट्स वेन आई रियली नीड इट।

अभि...देखो ना, मैं तुम्हारे सामने खड़ी हूं....कितना इंतजार किया। मैं जरा बाहर क्या गई पढाई पूरी करने, दुनिया बदल गई...मैं तुम्हारे प्यार के बिना जिंदा कैसे रहूंगी...छोड़कर जाने से पहले एक बार तो सोचा होता...

कैसहूं ऐ बाबा हमरा मई से मिला दअ
सगरो तजा के हमरो अरज सुना दअ
छोटका के छोटेबा छोटे बा उमरिया ए बाबा
कि आरे बाबा परिलै हमर गत तोहार कबन गवनमा नई गइल हो 

काग़ज़ को हाथ में तोड़ते-मरोड़ते मृगांका ने रोते-रोते अभिजीत के सीने पर सिर रख दिया, कुछ वैसे ही जैसे बेहद तनाव के पलों में अभिजीत उसके सीने पर सर रख दिया करता था। और कई दफा उसने भी अपनी दुश्वारियां साझा की थीं...।

पापा की आंखें नम थीं। प्रशांत हिचकी ले रहा था। मां तकरीबन गश खा चुकी थीं।

प्रशांत भैया...मृगांका ने अचानक पुकारा।
हां भाभी..
भैया....अभि, जिंदा है...भीड़ में मृगांका की बातें सुनकर हलचल सी हुई। बिसेसर दो कदम आगे बढ़ आया।

प्रशांत तकरीबन दौड़ता हुआ आया...सीने पर हाथ रखा अभिजीत के...दिल धड़क रहा था...आहिस्ता...आहिस्ता।

प्रशांत ने जरा भी देर नहीं की। भाभी गाड़ी स्टार्ट करवाओ, हमें अभी अभिजीत को पटना लिए चलना है।

फौरन गाड़ी में अभिजीत को लिटा दिया गया। उसका सिर मृगांका की गोद में था। बिसेसर ने तुलसी के पत्तों और सिर के सामने जल रही अगरबत्तियों को लात मार कर छितरा दिया। रुंधी हुईं आवाज निकली, अभिजीत भैया जिंदा हैं...मरे नहीं हैं...अरे मातम बंद करो...

निर्मोही अभिजीत का दिल जिसके लिए धड़क रहा था, उसी की गोद में लेटा उसका सफर शुरू हो गया था।

अभिजीत मरा नहीं करते...अभिजीत मर नहीं सकते...जब तक मृगांका का प्यार जीवित हो।

...जारी


5 comments:

सुनीता said...

बहुत सुन्दर ...............सुकून मिला

सच है - "अभिजीत मरा नहीं करते...अभिजीत मर नहीं सकते...जब तक मृगांका का प्यार जीवित हो।"

(लेखक जी आप शब्दों के जादूगर है ,मानवीय संवेदनाओं को बेहद खूबसूरती से पिरोया है आपने )

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खुशी हुई की "सुनो मृगांका" अभि जारी है. ............

सुनीता said...

अगली कड़ी का बेसब्री से इंतज़ार है ................

उत्सुकता और भी बढ़ गयी है ..................

dr.mahendrag said...

sundar, abhi jit ki katha abhi jari rakhiye

eha said...

वो जिदा है...

सुनीता said...

खट्ट- खट्ट करने वाला पिटेगा .............. प्रशांत के हाथों !!!


(दिल देहला कर रख दिया था खट्ट -खट्ट की आवाज़ नें )