Monday, June 10, 2013

सुनो! मृगांका :36: अचल होहि अहिबात तुम्हारा

अपने मांग के कोने में सिंदूर क्या डाली मृगांका ने, सिंदूर फैल कर आसमान में बिखर गया। आसमान सारा का सारा सिंदूरी हो उठा। सिंदूरी आसमान, हवा भी हौले-हौले चलने लग गई। हवा में ठंडक आई तो मृगांका के दिल को भी।

डॉक्टर ने आकर कहा कि अभिजीत को होश आ गया है और आप दूर से उसे देख सकती हैं।

आईसीयू के कांच के दरवाजे के बाहर से देखा मृगांका ने...बिस्तर पर लेटे अभिजीत की धड़कनों को कोई मशीन माप रही थी। उन्हीं धड़कनों को जिनको अपनी छाती से लगाकर कभी उसने मापा था। अभिजीत होश में आने के बाद एक बार फिर से सो गया था।

चेहरे पर दाढ़ी, मानो महीनों से न बनाई गई हो। सफेद शर्ट का कॉलर, किनारे से तुड़ा-मुड़ा,। कितना मासूम लग रहा है...यही चेहरा जिसे देखने के लिए मैं न जाने कब से तरस रही हूं...

उसे लगा पीछे कोई खड़ा है। मां थीं। अभिजीत की मां। 'बेटा, तुम्हारा सुहाग जिंदा है और जबतक गंगा-यमुना में पानी रहेगा, बना रहेगा...'

'जबतक गंग-जमुन जलधारा, अचल होहि अहिबात तुम्हारा'

प्रशांत आ गया था। उसने सुझाव दिया कि अब जबकि अभिजीत ख़तरे के बाहर है क्यों न एक्जीबिशन रोड के होटल में चलकर मृगांका थोड़ा आराम कर ले। पापा और आंटी तो आ ही गए हैं।

भरत किस्कू बाहर ही खड़ा था। एक गाड़ी अस्पताल में ही छोड़ दी गई। भरत किस्कू के साथ मृगांका होटल चली। प्रशांत भी पिछली सीट पर था, भरत ड्राइवर के साथ आगे बैठा था।

'ये लो...'प्रशांत ने सुनो, मृगांका की एक प्रति मृगांका को दी। मृगांका मुस्कुरा उठी-- 'ये कॉपी मुझे क्यों दे रहे हो..?'

'भाभी, आखिर देखो तो सही, उसने लिखा क्या है...'

भरत की भी दिलचस्पी थी, उसने भी एक कॉपी मांग ली। प्रशांत ने बुरा मानते हुए अपनी वाली प्रति उसे सौंप दी।

उसी शाम, जब सूरज ढलने लगा था, और पापा, मां, प्रशांत और भरत सब बैठे थे, तो मां ने ही कहा था, मैंने तो लगता है जितिया का जो व्रत किया था इसी से मेरे बेटा वापस आया है मौत के मुंह से...लेकिन सच कहूं तो मेरी बहू ही उसको खींच लाई है यमराज के यहां से...।

भरत ने सिर हिलाया, 'हां, मौसी आप लोगों की वजह से वो कई बार बच निकले...'

सबकी प्रश्नवाचक निगाहें भरत की तरफ मुड़ीं। लेकिन, फिर मां ने भरत को भी बचा लिया, अच्छा बहू ये बताओ, पहली बार कहां मिली थी, तुम अभिजीत से...? मृगांका उम्र के उस पड़ाव पर थी नहीं, कि उसे अपने अभिजीत को लेकर शर्म आती लेकिन पता नहीं क्यों, वो शर्म से लाल हो उठी।

'बताऊँगा बाद में, जरा चाय के लिए बोलती हूं।' वो दरवाजा खोलकर बाहर निकली, और एकबार फिर वापस आकर भरत से बोली, 'भरत भैया, जरा आना तो इधर।'

भरत भागकर बाहर की तरफ गया। उसके तिल जैसे काले चेहरे पर भाव कोमलता के ही थे...।

पीछे प्रशांत बुड़बुड़ा रहा था, यहां से रिशेप्शन पर फोन करती तो सीधे वेटर चाय लेकर आता..।

बाहर जाते ही मृगांका भरत से मुखातिब हुई, '...और कहां-कहां बचाया है मैंने अभिजीत को बताओ तो जरा...? और तुम कैसे जानते हो अभिजीत को..और तुम हो कौन, कैसे जानते हो अभिजीत को इतना, कि तुमलोग गाड़ी लेकर हमारा पीछा तक करने लग गए?'

'दीदी, इसके लिए आपको हमारे साथ चलना होगा, पूरी परिचय अपना दूं, ये मुनासिब होगा नहीं। आप चलें हमारे साथ, अभिजीत भैया कहते थे आप भी पत्रकार हैं, तो आपके लिए अच्छा ही होगा दौरा...'

'साफ साफ बताओ।'

'चलिए, सारी कहानी बताएंगे आपको। '

'ठीक है, जरा अभिजीत को ठीक होने दो।'

भरत ने कहा, 'तो हमने कब कहा कि अभी चलिए। कैमरा-कूमरा ले लीजिएगा अपना। तब चलेंगे।'

भरत के हाव-भाव और बोली-बानी ने मृगांका का शक पक्का कर दिया।


जारी

2 comments:

सुनीता said...
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सुनीता said...

रोचक...रोचक...रोचक... बहुत रोचक , कहानी बहुत ही खूबसूरती से आगे बढ़ रही है !

बेहतरीन कहानी के लिये हम सभी पाठको की तरफ से "शुक्रिया" .

अभिजीत बहुत ही खुसक़िसमत है जो मृगांका उसे मिली है.