Friday, June 21, 2013

सुनो! मृगांका:37: यहु तन जालों मसि करों

भरत के हाव भाव से मृगांका को कुछ-कुछ संकेत तो मिल ही चुके थे।

डॉक्टरों ने बताया कि अभिजीत को अभी बहुत सावधानी से डॉक्टरी निगरानी में रखे जाने की जरूरत है। हालांकि, होश आया था लेकिन बहुत क्षणिक था वो।

मृगांका ने अभिजीत को बढ़ी हुई दाढ़ी के साथ देखा था..। कितना लापरवाह रहा है खुद को लेकर।

शाम ढलने को आई थी। लेकिन अंधेरा कल जैसा घना न था। न हमेशा उजाला बना रहता है ना अंधेरा शाश्वत होता है। उजाले के बाद अंधेरा, अंधियारे के बाद उजियारा, अमावस्या-पूर्णिमा, दिन रात...कुदरत के नियम हैं।

मृगांका अपने कमरे में बैठी डायरी में कुछ लिख रही थी। उसकी लिखावट को चूम लिया करता था अभिजीत। अभिजीत, देखो न फिर से डायरी लिख रही हूं मैं...

डियर डायरी,
आज मेरा अभिजीत, अस्पताल पर बैठा जिंदगी के उस किनारे पर खड़ा है, जहां से एक रास्ता उस तरफ भी जाता है जहां से कोई कभी वापस नहीं आता। लेकिन, एक कहानी सुनाई थी कभी, अभिजीत ने ही...मिथिला की। कहानी थी, बिहुला की। बिहुला ने पति को मौत की मुंह से खींच निकाला था।

बिहुला और बिषहरी की पूजा का सामाजिक संदर्भ बताया था अभि ने...लेकिन मुझे भी अभि को हर हाल में जिंदा रखना है। चाहे मुझे अपनी जान देनी पड़ी।

कबीर याद आ रहे हैं, अभिजीत...

यहु तन जालों मसि करों, लिखों राम का नाउं ।
लेखणिं करूं करंक की, लिखि-लिखि राम पठाउं ॥

इस तन को जलाकर स्याही बना लूंगी, और जो कंकाल रह जायगा, उसकी लेखनी तैयार कर लूँगी । उससे प्रेम की पाती लिख-लिखकर अपने प्यारे अभि को भेजती रहूँगी ।

अभि, उठो ना मुझे तुमसे बात करनी है...तुम्हारी सांसों की गरमाहट को अपने कंधों पर, तुम्हारे हाथों को अपनी कलाईयों पर महसूस करने के लिए कितनी उतावली हुई जा रही हूं...देखो न मैं फिर अपना वो फोटो मेल करती हूं तुम्हें...तुम्हें बताया था न मैंने...पीले रंग का...वो सूट।

तुम जिंदगी से गए तो लिबास पहनना ही बंद कर दिया मैंने...।

मैं कहती थी ना, हमारा जन्मों का बंधन है, तुम्हारी आवाज खींच लाई तुम तक मुझे...।

डायरी के पन्ने बंद हो गए। याद आया मृगांका को, कैसे पूछा था पहली बार अभि ने...ये मृगांका कौन है। तभी देखा था कनखियों से मृगांका ने...एक दम बदहवास किस्म की शख्सियत थी अभिजीत की।

लेकिन पहली ही बार  देखा तो लगा अरे, इसे तो कहीं देखा था। कॉन्वेंट में पढ़ी-लिखी मृगांका और भदेस घुमक्कड़ अभिजीत के पहले कभी मिलने की संभावना सिफ़र थी।

तब से उसने महसूस किया था अभिजीत की निगाहें पूरे दफ्तर में उसकी तरफ ही होती रहतीं। और खुद उसकी...? मृगांका उसे नहीं देखती तो दफ्तर सूना-सा लगता।

और, उस स्लम की कवरेज। चाय वाली घटना उफ़्...। कितना प्यारा लग रहा था अभि। कार मुड़ी थी तो मृगांका को याद है वह पीछे देख रही थी, अभि किसी को फोन पर कह रहा था--बाद में पता चला प्रशांत को--खंभा ले आना आज सेलिब्रेट करेंगे।

मृगांका अंदर तक प्रसन्न थी उस दिन।

 अभिजीत को लेकर कभी लगा ही नहीं कि वो दूसरा है। दोनों के दूसरे को एक ही मानते रहे...अभि ही मृगांका था, मृगांका ही अभिजीत थी।

अभिजीत में पहली नजर में कोई आकर्षण नहीं था, लेकिन कुछ ता जो खींचता था उसे। उसके चेहरे की हर सलवट को पहचान गई थी मृगांका।

***

पंद्रह दिन बीत गए थे। हफ्ते भर पहले से मृगांका ने दफ्तर जाना भी शुरु कर दिया था। अभिजीत की हालत में सुधार तो आया था। लेकिन, हालात ठीक भी नहीं कहे जा सकते थे। अभिजीत आंखें खोलता था, चीजें देखता था, पहले तो पहचानता भी नहीं था। अब पहचानने लगा था।

अभिजीत का बायां हिस्सा लकवे का शिकार बन चुका था। बायां हाथ, बाईं तरफ के अंदरूनी अंग काम करना बंद कर चुके थे। दाहिने हाथ में हरकत बाकी थी।

***

अभिजीत डॉक्टरों की निगरानी में था। मां थी। पापा थे। मम्मी थी। भरत किस्कू, एक बार जाकर आ गया था। मृगांका को साथ लेने। मृगांका ने तैयारी कर ली थी। कैमरामैन तैयार था।

मृगांका अस्पताल में अभिजीत से मिलने गई, तो अभिजीत की आंखों में अरसे बाद चमक देखी थी उसने। दाहिने हाथ में जुंबिश हुई। कागज पर लिखे गए हरफ़ एक बार फिर वही थे...मृगांका, लव मी वेन आई लीस्ट डिजर्व इट...बिकॉज़ दैट्स वेन आई रियली नीड इट।

मृगांका ने अपने हाथ अभिजीत के माते पर रख दिया। अभि, आई लव यू मोर दैन एनिथिंग इन द वर्ल्ड।

दरअसल, ये यही लफ़्ज थे जो मृगांका ने तब कहे थे, जब अभिजीत का एक्सीडेंट हुआ था। और उससे पहले वाली शाम, अभिजीत ने फोन पर कहा था मृगांका से, अगर दिल में कोई बात हो तो कह देनी चाहिए। आखिर, जिंदगी इतनी छोटी-सी तो है।

जिंदगी सचमुच काफी छोटी है। ऐसा उस दिन भी लगा था मृगांका को, जब न्यूज़ रूम में उसे पता लगा था, अभि का एक्सीडेंट हुआ है। रवि के साथ भागी-भागी गई थी वो, अभिजीत को देखने। कहा भी था, पीकर मत चलाना गाड़ी, डॉक्टर ने बताया था...पी कर नहीं चला रहे थे।

मृगांका...ये शब्द संजीवनी की तरह काम कर रहा था अभिजीत के लिए।

मृगांका उसी शाम चल दी थी...उस जगह जहां की हर शै पर अभिजीत की छाप थी। जहां भरत उसे लिए जा रहा था। झारखंड।

....जारी












2 comments:

सुनीता said...

अद्‌भुत...

कहानी में ग़जब का सम्मोहन है , अति उत्तम

तुषार राज रस्तोगी said...

आपकी यह पोस्ट आज के (२२ जून, २०१३, शनिवार ) ब्लॉग बुलेटिन - मस्तिष्क के लिए हानि पहुचाने वाली आदतें पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई