Monday, February 25, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः नए-नवेले देवता के गांव में


भुवनेश्वर से हमारी ट्रेन हमें गया जंक्शन ले आई। इसके बाद हमें राजगीर और नालंदा देखने जाना था। ट्रेन को वैसे तो सुबह ही पहुंचना था, लेकिन भारतीय रेल की वही पुरानी कहानी, हम तकरीबन तीन बजे गया स्टेशन पहुंचे।

गया स्टेशन पर उतरे, तो हमारी टीम के दो भयंकर किस्म के लोग, प्लेटफॉर्म के दूसरे छोर पर जाकर खड़े हो गए। एक थे पीटीआई के संवाददाता और दूसरे अमर उजाला के चंडीगढ़ रिपोर्टर। हमारी मैथिली में कहावत है ना, कानी गाय के भिन्ने बथान।

इसका खामियाज़ा उन्हें भुगतना भी पड़ा। वो लोग प्लेटफॉर्म पर ही रह गए। खैर, बाकी की टीम बसों में बैठकर नालंदा की ओर चली। विदेशी तीर्थयात्रियों के लिए दो बसें थीं, हमारे लिए एक सुविधाजनक छोटी बस।

हमारी बस में कुछ अंग्रेजीदां महिला पत्रकार भी थीं, जिनने पहले कभी गांव नहीं देखा था। वो गया के बाहर निकलते ही खेत-खेत चीखने लगीं, और साथ में गरीबी-गरीबी भी। 

लेकिन मैंने उनको बताया कि बिहार का यह हिस्सा, बल्कि बिहार शरीफ, नालंदा, गया का इलाका सब्जी उत्पादन खासकर आलू की पैदावार में अगुआ है तो वो चौंक गए। खैर...गया से नालंदा जाएं, रास्ते का भूगोल छोटानागपुर के पठारी इलाके की झलक देता है।

इसी इलाके में हम एक जगह रूकते हैं...जगह है गहलौर। पहाड़ का सीना चीरकर रास्ता निकाल दिया गया है।

ये गांव दशरथ मांझी का है, जिसने पत्नी के लिए एक पहाड़ को बीचों बीच सिर्फ छेनी हथौड़े से काट डाला। वक्त बाईस साल का लगा...दशरथ मांझी की पूरी जिंदगी लग गई इसमें।

लेकिन शाहजहां के ताजमहल का जबाव एक आम आदमी इससे बेहतर क्या दे सकता था भला।

गहलौर का नाम बदलकर, अब दशरथनगर कर दिया गया है। गया से नालंदा जाने में हमें वैसे 105 किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता, लेकिन अब महज 85 किलोमीटर। 

दशरथ मांझी नहीं रहे, लेकिन उनकी समाधि स्थल बना दी गई है, किसी ने खड़िए से लिख भी दिया है दशरथ बाबा। पता नहीं, दशरथ बाबा कब देवता में तब्दील हो जाएं, मुमकिन है कुछ मन्नतें भी पूरी कर दें। लेकिन इतना तय है हिंदुओं के 33 करोड़ देवताओं में से सबसे कर्मठ देवता तो दशरथ मांझी ही होंगे। 

मेरी कहानी को  आशिमा वगैरह मुंह बाए सुनते रहे थे। फिर, उनने हिंदू धर्म शास्त्रों की विवेचना शुरुकर दी, जिसमें आस्था का इतना गहरा पुट था कि मेरे लिए नामुमकिन था उसमें हिस्सा लेना। दोयम, इस विषय पर मैं और सुशांत और ऋषि इतनी दफ़ा और इतने तरीके से बात कर चुके हैं पिछले सात साल में कि इसपर इन लोगों को कन्विंश करना बेकार और बेवजह था। 

शाम ढलते रही थी, सूरज का रंग भी पीले से ललछौंह में बदल गया था। लाल तो खैर क्या मान लीजिए कि तोड़ा पानी मिलाइए सूरज की किरनों में बस, गिलास में ढल जाने लायक हो जाए।

बहरहाल, सड़क को दोनों तरफ अब पुराने अवशेषों के चिह्न नज़र आने लगे थे। नालंदा, और राजगीर ये दोनों जगहें भारतीय इतिहास के सबसे पुराने पन्ने हैं।

राजगीर को पहले सुमतिपुर, वृहद्रथपुर, गिरिब्रज और कुशग्रपुर और राजगृह कहा जाता था।
घाटियों में बसा यह शहर सात पहाड़ों वैभरा, रत्ना, सैल, सोना, उदय, छठा और विपुला से घिरा है।

भगवान कृष्ण के कुख्यात मामा कंस के ससुर जरासंध, राजगृह के ही राजा थे।

जरासंध खुद बहुत प्रतापी और शक्तिशाली राजा था, उसने कृष्ण जैसे अवतार को मथुरा छोड़ने पर मजबूर कर दिया। उसके बाद कृष्ण ने गुजरात के तटीय इलाके में कुश क्षेत्र में द्वारका नगरी बसाई।

जरासंध पहलवान भी था, और इसका सुबूत है राजगीर में खुदाई से निकला जरासंध का अखाड़ा।

लिखित सुबूतों के लिहाज से भी राजगृह का इतिहास ईसा के जन्म से एक हज़ार साल तक पीछे जाता है।

जब मगध ने लोहे के दम पर ताक़त हासिल करनी शुरु की और प्राचीन भारत के सोलह महाजनपदो में सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बनकर उभरा तो उसके ताक़त का प्रतीक था उसकी राजधानी गिरिव्रज। लेकिन महात्मा बुद्ध के समकालीन राजा बिम्बिसार ने शिशुनाग या हर्यक वंश के राजाओं की पुरानी राजधानी को छोड़कर एक नई राजधानी पुराने शहर की दीवारों से बाहर बसाई, और नाम दिया राजगृह।

राजगीर गौतम बुद्ध की पसंदीदा जगहों में से एक था। आज के शहर पर भी बौद्ध धर्म की छाप को आसानी से देखा जा सकता है।

धर्म के लिहाज से राजगृह बौद्धों, जैनों और हिंदुओं के लिए बराबर अहमियत रखता है। इस जगह की मिट्टी में जैन और बौद्ध धर्म के संस्थापकों की यादें खुशबूओं की तरह मिली हुई हैं।

राजगीर में गृद्धकूट पर्वत है, जिसपर भगवान बुद्ध ने अपने उपदेश दिए थे। यहां के वेणुवन में महात्मा बुद्ध अपने वर्षाकाल का चातुर्मास बिताते थे। राजगीर ही वो जगह है जहां अजातशत्रु के शासनकाल में पहली बौद्ध संगीती यानी बौद्ध सम्मेलन हुआ था।


राजगीर के ही बगल में ही है....नालंदा।

किताबों और पढाई-लिखाई से जुड़े किसी भी शख्स के लिए एक सपनीली जगह।

प्रारंभिक बौद्ध साहित्य में नालंदा के लिए नल, नालक, नालकरग्राम आदि नाम आते हैं, और यहां बुद्ध के प्रमुख अनुयायी सारिपुत्त की जन्मभूमि होने का धुंधला साक्ष्य भी प्राप्त होता है।

देखने में तो नालंदा का ये अवशेष ईंटो का ढेर लगता है, लेकिन गौर से देखिए तो यहां की हर ईंट के पास कहने के लिए एक कहानी है।

नालंदा की स्थापना पांचवी सदी में गुप्तकाल के दौरान शक्रादित्य या कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल में की गई थी।

चीनी यात्री ह्वेनसांग संस्कृत और भारतीय बौद्ध धर्म का विशिष्ट अध्ययन करने के लिए 630 ई. के तुरंत बाद नालंदा विहार के विद्यापीठ में पहुंचा। सम्मानित विदेशी विद्वान होने के नाते नालंदा विहार के प्रमुख आचार्य शीलभद्र ने उसका स्वागत किया।

एक दूसरा चीनी यात्री इत्सिंग जो 673 ई. के आसपास भारत आया, नालंदा में रहकर बौद्ध धर्म से संबंधित पुस्तकों का गम्भीरतापूर्वक अध्ययन किया।

नालंदा का विश्वविद्यालय, हमेशा भारत का गौरव रहेगा। नालंदा पहुंचे तो बहुत शम घिर आई थी, राजगीर का वेणुवन हमने सबसे आखिर में रात में देखा...तालाब सा खुदा है एक। कुहरा छाया हुआ था...शांति ती। लेकिन वहां जाकर देख आना, मकसद तो आदा ही पूरी हो पाया।

जब तक आप इन जगहों पर शांति से बैठें नहीं तो क्या हासिल कर पाएंगे। नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहरों में मैने अजीब-सी शांति महसूस की थी। मन की साध थी, वहां जाकर नजदीक से देखने की वो पूरी हो गई थी। 
  
मुस्लिम इतिहासकार मिन्हाज़ और तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के मुताबिक, इस विश्वविद्यालय को तुर्कों के हमलों से बहुत नुकसान हुआ। तारानाथ के अनुसार तीर्थिकों और भिक्षुओं के आपसी झगड़ों से भी इस विश्वविद्यालय की गरिमा को भारी नुकसान पहुँचा। इसपर पहला आघात हुण शासक मिहिरकुल ने किया था। साल 1199 में हमलावर बख़्तियार ख़िलज़ी ने इसे जलाकर पूरी तरह नष्ट कर दिया।

लेकिन, आग बुझी नहीं...यहां का पुस्तकालय इतना समृद्ध था कि तीन महीनों तक आग जलती रही। आग को वो तपिश आज भी नालंदा के खंडहरों में महसूस की जा सकती है।

हमारे सफ़र का अगला पड़ाव है, बनारस और इसका ज़िक्र अगली पोस्ट में...


Sunday, February 24, 2013

बाप सरीखी धूप

दिल्ली में मौसम मां-बाप की लड़ाई सरीखा हो गया है।

दिल्ली की धूप हमारे जमाने के मास्टर की संटी सरीखा करंटी हुआ करता है। हमारे जमाने इसलिए कहा, काहे कि आज के मास्टर बच्चों को कहां पीट पाते हैं?

तो जनाब, दिन की धूप में बाप-सा कड़ापन आना शुरू ही हुआ था..कि सरदी बीच में मां के लाड़-सी  कूद पड़ती है। यों कि अब बाबू जी के अनुशासन और मां के लाड़ के खींचतान में बच्चे की तो दुविधा द्विगुणित हो जाए।

सर्द हवा की झोंकों, रात के तापमान में बरफीले अहसास और दिन में बाबूजी सरीखे आंखे लाल किए सूरज की छड़ीनुमा धूप के बीच बच्चा सरीखा आदमी ज्वर में कांपे, खांके, छींके...।

अब धूप का रंग  बाबूजी से मिला ही दिया है तो उसके भी कई तेवर हैं...सुबह की धूप, सुबह 11 बजे की धूप, दोपहर की सिर पर तैनात धूप...खेल के वक्त की कनपटी पर पड़ती धूप, ड्रिल मास्टर सरीखी...शाम की धूप विदा कहती प्रेमिका-सी, जाड़े की धूप, भादो के दोपहर की धूप...और न जाने कितने रंग हैं।


रघुवीर सहाय को ये रंग तो कई तरीके का नजर आया हैः

‘एक रंग होता है नीला,
 और एक वह जो तेरी देह पर नीला होता है,
 इसी तरह लाल भी लाल नहीं है,
 बल्कि एक शरीर के रंग पर एक रंग,
 दरअसल कोई रंग कोई रंग नहीं है,
 सिर्फ तेरे कंधों की रोशनी है,
 और कोई एक रंग जो तेरी बांह पर पड़ा हुआ है।’

धूप पिताजी के अवतार में है, पापा के भी, डैडी के भी...अलग अलग लोगों के लिए अलग-अलग संबोधन..अलग चरित्र। मोंटेक की धूप मनमोहन की धूप...मेरे, आपके और एक मजदूर की धूप में अंतर तो होगा ना।

धूप में पसीना बहाना...कुछ ऐसा मानो कह रहा हो, आदमी जब तक हारता रहता है जिंदा रहता है। जब जीतने लगता है आदमी नहीं रहता।

लेकिन सवाल अब भी अनुत्तरित ही है...धूप बाप-सा तीखा क्यों हो गया। जवाब भी होगा, सरदी की हवाओं ने मां जैसी नरमाई छोड़ी नहीं है अब तक।

आखिर में, शाहरुख खान को याद कीजिए, हर घड़ी बदल रही है रूप जिंदगी, धूप है कभी कभी है छांव जिंदगी...जिंदगी में अभी धूप वाला दौर है।

Sunday, February 17, 2013

किसान ने राष्ट्रपति से की मौत की फ़रियाद

किसान आत्महत्या की खबरे सुनते हैं तो आमतौर पर बुंदेलखंड और विदर्भ याद आते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश आत्महत्या के मानक पर मुझे लगता था कि थोड़ा संपन्न है।

लेकिन, क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश, क्या मेवात, क्या बुंदेलखंड और क्या विदर्भ..देश भर में किसानों की हालत बदतर ही होती जा रही है। मुज़फ़्फ़रनगर से थोड़ी ही दूरी पर है शामली ज़िला। वहीं याहियापुर के दलित किसान हैं, चंदन सिंह।

चंदन सिंह ने भारत के राष्ट्रपति को अर्ज़ी भेजी है कि उन्हें सपरिवार आत्मदाह की अनुमति दी जाए। बुंदेलखंड के उलट याहियापुर के इन किसान चंदन सिंह की आत्महत्या की कोशिश की एक वजह कुदरत नहीं है।

चंदन सिंह गरीबी और तंत्र से हलकान हैं।

हुआ यूं कि सन् 1985 में ट्यूब वैल लगाने के लिए चंदन सिंह मादी ने भारतीय स्टेट बैंक से 10,000 रूपये कर्ज़ लिए। वो कर्ज़ मर्ज़ बन गया। उस रकम में से चार किस्तों में चंदन सिंह ने 5,700 रुपये का कर्ज़ चुका भी दिया था।

लेकिन, इसी वक्त केन्द्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बन गई। यूपी में मुलायम मुख्यमंत्री बने। सरकार ने ऐलान किया कि दस हज़ार रूपये से कम के सार कृषि ऋणों की आम माफ़ी की जाएगी। चंदन सिंह का बुरा वक़त वहीं से शुरू हुआ।

चंदन सिंह को लगा कि कर्ज माफी में उनका नाम भी आएगा। चंदन सिंह याद करते हुए बताने लगते हैं, कि किसतरह बैंक के लोगों ने उनसे दो हजा़र रूपये घूस के लिए मांगे थे। घूंघट की आड़ से उनकी पत्नी बताती हैं कि गांव का अमीन भी शामिल था। लेकिन, बहुत हाथ पैर मारने के बाद भी चंदन सिंह 700 रूपये ही जुगाड़ पाए।

जाहिर है, उनका नाम कर्ज माफी की लिस्ट में नहीं आ पाया।

चंदन सिंह इसके बाद किस्तें चुकाने में नाकाम रहे तो पुलिस उन्हें पकड़ कर ले गई। चौदह दिन तक जेल में भी बंद रहे। अनपढ़ चंदन सिंह को लगा कि जेल जाने से शायद कर्ज़ न चुकाना पड़े आगे।

लेकिन, अगले तीन साल तक कोई ख़बर नहीं आई।

सन् 1996 में, बैंक ने उनके 21 बीघे ज़मीन की नीलामी की सूचना उन्हें दी तो वो सन्न रह गए। फिर शुरू हुआ गरीबी का चक्र। कर्ज़ की रकम बढ़कर बीस हज़ारतक पहुच गई। 21 बीघे ज़मीन महज 90,000 रूपये में नीलाम कर दी गई।

भारतीय किसान यूनियन के स्थानीय नेता योगेन्द्र सिंह बताते है कि आत्महत्या के लिए गुहार का फ़ैसला बिलकुल सही है। अगर चंदन सिंह की जमीन उसे वापस ही नहीं मिली तो इसके 13 लोगों के परिवार का भरण-पोषण कैसे होगा। ये क्या, इसके साथ तो हमें भी मरना होगा।'

चंदन सिंह की पत्नी भी कहती है, जमीन न रही तो बच्चे फकीरी करेंगे, फकीरी से तो अच्छा कि मर ही जाएं। गला रूंध आता है। आंखों के कोर भींग आते हैं। मैं कैमरा मैन से कहता हूं, क्लोज अप बनाओ।

चंदन सिंह का परिवार अब दाने दाने को मोहताज है। बड़े बेटे ने निराशा में आकर आत्महत्या कर ली, बहू ने भी। चौदह साल की बेटी दो सला पहले, कुपोषण का शिकार होकर चल बसी।

चंदन सिंह दलित किसान हैं। लेकिन दलितों की नेता मायावती के वक्त में भी उनकी नहीं सुनी गई। कलेक्ट्रेट में ही उन्होंने आत्महत्या की कोशिश की थी। पखवाड़े भर फिर जेल भी रह आए, लेकिन सुनवाई नहीं हुई।

बाद में कमिश्नर के दफ्तर से उन्हें सत्तर हज़ार रूपये (नीलामी के बाद उनके खाते में गई रकम) की वापसी पर ज़मीन कब्जे का आदेश मिला। उन्होंने वो रकम वापस भी कर दी। लेकिन सिवाय उसकी रसीद के कुछ हासिल नहीं हुआ।  कमिश्नर का आदेश भी कागजो का पुलिंदा भर है।


अब चंदन सिंह अपने हाथों में मौत की फरियाद वाले हलफ़नामे लेकर खड़े हैं।

स्टील के गिलासों में चाय भरकर आती है। कैमरामैन अनिल चाय पीने से इनकार करने के मूड में है। मेरे कहने पर पी लेता है।

सूरज तिरछा होकर पश्चिम में गोता का रहा है। सामने खेत में गेहूं की फसल एकदम हरी है। लेकिन चंदन सिंह का मादी की निगाहें खेत को हसरत भरी निगाहों से देख रही है।

सूरज की धूप...पीली है, बीमार-सी।

Wednesday, February 13, 2013

इंद्रधनुषी कविताः आसमानी


आसमानी...
कुछ ऐसा ही रंग,
जैसे लफ़्ज हैं,
पंखुड़ी, तितली, रोली
जैसे तुलसी-दल,
या दूर्वादल

जैसे गौरेये का पंख खुजाकर उड़ना
जैसे मुस्कुराना नवजात का
मीठे सपने में..

सपनों को उड़ने दो
उड़ने को आसमान चाहिए
उड़ने को पंख नहीं, अरमान चाहिए
उनको पूरने को सामान चाहिए

जिनको जीतना है जग
जिनके सपने अरमानी है
सपनों का रंग
आसमानी है

Thursday, February 7, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः उड़ीसा से वापसी


 ट्रेन में बैठे तो गप्पबाज़ी शुरू हो गई। हमारे साथ वाले कूपे में बैठे ते शशि सहाय। गज़ब के फोटोग्रफर। दूसरी तरफ, विज्ञापन फिल्मों और फीचर फिल्मों में अभिनय़ कर चुके (और कर रहे) भूपिन्दर पंत।

भुवनेश्वर से निकले तो मन में यादें थी, बुद्ध के दांतों के अवशेष जो हमने म्यूज़ियम में देखे थे। सोने का ख़ज़ाना, जो खुदाई में हासिल हुआ था। महिलाएं इतना सारा गहना एक साथ देखकर अभिभूत थीं, और कुछ आधुनिका-अंग्रेज़ीदां पत्रकार आम महिलाओं के इस आभूषण-प्रेम पर छींटाकशी में व्यस्त।

हरहाल, बुद्ध से जुड़ी कथा शुरू हुई। कलिंग या उत्कल (पालि में उक्कला) या ओद्र से महात्मा बुद्ध का संबंध उनके जीवन काल में ही शुरु हो गया था। इसका ज़िक्र इसलिए भी, क्योंकि कई लोग मानते रहे हैं कि बुद्ध के महापरिनिर्वाण के दो सौ साल बाद अशोक के कलिंग पर हमले से ही बौद्ध धर्म और कलिंग का रिश्ता जुड़ता या शुरू होता है।

अंगुत्तरनिकाय के अनुसार, महात्मा बुद्ध के पहले शिष्यों में से, तपुसा और भल्लिका उक्कला के शहद-व्यापारी थे। वे लोग अपनी 500 बैलगा़ड़ियों में शहद भरकर मध्यदेश की यात्रा पर थे। तभी उनकी मुलाकात गया (आज के बोधगया) में बुद्ध से हुई, जो बोधि प्राप्ति के बाद बोधगया में अपने सातवें हफ़्ते में थे। दरअसल, उनका बोधगया में सातवें हफ्ते का वह आख़िरी दिन भी था।

तपुसा और भल्लिका ने उन्हे चावल और शहद भेंट किया था। महात्मा बुद्ध ने आठ अंजलि  भरकर अपने केश उन्हें उपहार में दिए थे। इन केशों को दोनों शिष्यों ने अपने गृहनगर में स्तूपों में सुरक्षित रख दिए थे। ये स्तूप केश-स्तूप कहलाए।

हाल में उड़ीसा के जाजपुर ज़िले में तारापुर में हुई खुदाई में ये केश-स्तूप निकले हैं। बौद्ध साहित्य तस्दीक करते हैं कि केश-स्तूप सबसे पहले बने स्तूपों में से थे। खुदाई में दो स्तंभ निकले हैं जिनपर केश-स्तूप और भिक्खू तपुसा दानम् खुदा है।

अब इस बात पर शोध चल रहा है कि क्या अपने पहले शिष्य के आमंत्रण पर बुद्ध स्वयं यहां आए थे, और यह स्थान बुद्ध के जीवनकाल में ही आकर्षण का केन्द्र बन चुका था।

वैसे, इतिहास के लिहाज से, कलिंग में आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्से भी शामिल थे। कलिंग की सबसे पुरानी बस्तियों में तोशाली कलिंगनगर (शिशुपालगढ़) थे।  कलिंगनगर आज भुवनेश्वर के पास ही में था। तीसरी सदी ईसापूर्व में कलिंगनगर को अशोक ने अपनी राजधानी बनाया था, (कलिंग सूबे का) और पहली सदी ईसापूर्व में तोशाली को खारवेल की राजधानी बनने का गौरव हासिल हुआ था।

खारवेल के वंशजों के दौरान इसी मध्य उड़ीसा के इलाके का जिक्र रोमना भूगोलवेत्ता प्लिनी ने पहली सदी ईसापूर्व में अपनी किताब में किया है।

प्लिनी लिखता है,कलिंग का राजकीय शहर पार्थालिस (तोशाली) है। इनके साम्राज्य में 60,000 पैदल, 1000 घुड़सवार, 700 हाथी हैं जो यु्द्ध के दौरान शहर की रक्षा करते हैं।

जातक कथाओं के मुताबिक, चौथी और तीसरी सदी ईसापूर्व में, कलिंग का राजधानी का जिक्र दंतापुरम् के नाम से है। दंतापुरम् से ही बौद्धों के सबसे महत्वपूर्ण अवशेष, महात्मा बुद्ध के दांत श्रीलंका ले जाए गए थे।

उत्तर-गुप्त काल में भारत के पूर्वी तट पर कई छोटे-छोटे राज्यों का प्रादुर्भाव हुआ। सातवीं सदी में, चीनी यात्री ह्वेन सांग ने पूर्वी भारत में तीन तटीय इलाकों का ज़िक्र किया है। ये थे, ऊ-चा (ओद्र, मध्य उड़ीसा), कोंग-ऊ-तो(कंगोडा, आज का गंजाम जिला) और कि-लिंग-किया (कलिंग)। इसके मुताबिक, उत्तरी उड़ीसा ओद्र था और मध्य उड़ीसा उत्कल।

कहानी में काफी कुछ बाकी था। शशि सहाय, कैमरे की लेंस पोछते हुए किस्सा जारी रखे हुए थे। कभी हिंदी में तो कभी अंग्रेजी में। उनके साथ का फ्रेंच अर्ध-पत्रकार मुंह बाए हुए सुन रहा था।

पटरियों की आवाज़ में आस्थावानों को ओम् मणि पद्मे हुं सुनाई देने लगा था। 

हमें तो अपने बिहार की याद आने लगी थी। हमको सुबह गया पहुंचना था...जहां से हमारी नालंदा और राजगीर की यात्रा शुरु होने वाली थी।