Tuesday, April 30, 2013

इतिहास का भूगोल, भूगोल का इतिहासः सुशील झा

 
सुशील झा, पत्रकार

सुशील झा, पेशे से तो पत्रकार हैं, लेकिन उनके अंदर एक रचयिता भी है। सामाजिक विषयों खासकर, समाज के वंचित तबके को लेकर उनकी कविताएं जोरदार तरीक़े से अपनी बात कहती है, गद्य भी कविता की शैली में लिखते हैं, यूं तो वर्चुअल स्पेस में लगातार लिखते हैं, लेकिन लेखन की उनकी शैली दिल को बाग-बाग कर देती है। इतिहास और भूगोल के मेटाफर के इस्तेमाल करते हुए,फेसबुक पर स्टेटस के तौर पर लिखा गया उनका ये अद्भुत लेखन पेशे-नज़र है---- 



1. हर लड़की का इतिहास होता है और हर लड़के का भूगोल...वैसे, हर लड़की को लडके के इतिहास में और हर लड़के को लड़की के भूगोल में रुचि होती है...इन भूगोल-इतिहास की चट्टानों पर प्रेम की दूब उग जाती है...इधर उधर छितर बितर।

2. इतिहास और भूगोल की लड़ाई जहां खत्म होती है वहां दर्शन पैदा होता है....बाल-दर्शन।

3.मैं इतिहास में पीछे था...वो भूगोल में आगे थी...दूब ने दोनों को पीछे छोड़ दिया...और हम फ्रायड की बांहों में झूल गए.

4. धड़कते-धड़कते दिल दीवार हुआ जाता है...लिखते लिखते लिखना लाचार हुआ जाता है...। हम तो पड़े थे उसके भूगोल में, और वो अब इतिहास हुआ जाता है।

5. भूगोल में बैठ कर इतिहास लिखना कैसा होता होगा...और इतिहास में बैठ कर भूगोल के बारे में सोचना

6. एक दिन इतिहास ने भूगोल को गोल कर दिया...भूगोल के गोल होते ही दोनों गार्डन के इडेन में पहुंच गए......
भूगोल के गोल होने से दूब सूख गई और फिर गोल गणित का जन्म हुआ जिससे फिर आगे चलकर लॉजिक, फिजिक्स और मेटाफिजिक्स की शुरुआत हुई।

7. बड़े शहर में हर बात छोटी होती है और छोटे शहर में हर बात बड़ी......वैसे बड़े शहर में हर बात भूगोल पर अटकती है....छोटे शहर में हर बात इतिहास पर।

8. भूगोल बदलता है तो इतिहास बनता है और नया भूगोल पुराना इतिहास ज़रूर पूछता है लेकिन इतिहास को सिर्फ भूगोल में रुचि होती है. इतिहास भूगोल का इतिहास कभी नहीं पूछता। 

9. इतिहास की नियति है भूगोल के पीछे भागना..उसे पकड़ना और फिर उसे इतिहास में बदल देना

10. एक दिन इतिहास ने भूगोल के सामने अपने इतिहास के पन्ने पलटने शुरु किए. भूगोल ने ये देखकर अंगड़ाई ली और अपना जुगराफिया बदला. जुगराफिया बदलते ही इतिहास का मुंह खुला का खुला रह गया और फिर दोनों मिलकर दूब उगाने लगे..

11. ...और फिर एक दिन भूगोल ने कहा इतिहास से कि मुझे तुम्हारा इतिहास पढ़ना है. इतिहास के पास इसका कोई जवाब नहीं था. उसे अपने पुराने भूगोल की याद सताने लगी और वह सामने के भूगोल को ताकते हुए सोचने लगा काश कि दूब उगने लगे फिर से...

12 .नया भूगोल मिलते ही इतिहास अपना पुराना इतिहास भूलना चाहता है लेकिन भूगोल को हमेशा इतिहास के पुराने इतिहास में रुचि होती है

13. इतिहास हमेशा भूगोल भूगोल खेलना चाहता है और भूगोल हमेशा इतिहास इतिहास . इस खेल में नुकसान हमेशा दूब का होता है.

14. भूगोल इतिहास की रगड़ में सबकुछ खत्म हो चुका था. बरसों बीत गए थे. झुर्रियों पड़े हाथों में हाथ थे. इतिहास भूगोल के इतिहास में गुम था और भूगोल इतिहास के भूगोल के इश्क में उलझा हुआ-सा था.






Saturday, April 27, 2013

सुनो! मृगांका:32: जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब सांस आए

कांच के ख़्वाब है बिखरी हुई तनहाई में...

मृगांका, अभी भी काफी अपसेट थी। लेकिन, अंदर ही अंदर बहुत कुछ चल रहा था। 'प्रशांत एक काम तो कर दो...'

'जी भाभी...'
जितनी जल्दी का हो सके, पटने की फ्लाइट का टिकट ले लो...
'जी भाभी ये रहा...'

तीन टिकट थे...फ्लाइट शाम के 8 बजे की थी, ठीक वक्त पर उड़ी तो रात के दस-साढ़े दस बजे पटना...और पटने से कितना वक़्त लगेगा?'----मृगांका ड्राइव कर रही थी। प्रशांत आगे की सीट पर बैठा था और मां पीछे बैठी थी...हमेशा की तरह खामोश।

"...अगर, कोई ठीक सी गाड़ी मिल गई तो आज के हालात में रात के कम ट्रैफिक में सुबह -सुबह पहुंच जाएंगे।'

क्यों, 6 घंटे लगेंगे...?
हां, पटना से निकल कर महात्मा गांधी सेतु पार करने में ही वक्त लग जाता है...वनवे है। वहां से फिर पांच घंटे...'
ज्यादा भी लग सकते हैं...

मृगांका चाहती थी कि पंख लगाए और सीधे पहुंचे, गांव। अभिजीत के पास। उसके पास अभिजीत से जुड़ी यादें हैं, इंसान के पास गर अच्छी यादें हों तो वो कम तल्ख़ होता है।

प्रशांत के फ्लैट पर पहुंचकर मृगांका ने सीधे अभिजीत का कमरा खोला। अभिजीत और प्रशांत इस फ्लैट में साथ रहते थे...कमरा अब भी तकरीबन वैसा ही था। झाड़-पोंछ रखा था प्रशांत ने। लेकिन किताबों पर धूल की हल्की परत थी। ह्विस्की की बोतलें, गोल्ड-फ्लेक सिगरेट की खाली और आधा भरी डिब्बियां...

...मृगांका, अभिजीत की कुछ किताबें, डायरियां पलटती रही। दराज़ में अभिजीत का मोबाइल फोन पड़ा था। मृगांका ने बैटरी को चार्ज पर लगा दिया। डायरियों में उसके साथ गुजारे पलों का इतिहास भरा पड़ा था।

हर किताब के पहले पन्ने पर अभिजीत के हस्ताक्षर थे। कोमल...खूबसूरत हस्ताक्षर। कुछ पर कुछ पंक्तियों का नोट भी था। ऐसे ही एक हस्ताक्षर पर मृगांका ने उंगलियां फेरीं, तो उसे लगा कि सारी यादें ताज़ा हो गईं हों।

दोपहर का सूरज नीचे ढलने लगा था। मोबाईल की बैटरी इतनी चार्ज हो चुकी थी कि उसे ऑन किया जा सके। मृगांका ने मोबाइल ऑन किया...नोकिया के सिग्नेचर म्युजिक के साथ मोबाइल ऑन हुआ।

मिस्ड कॉल्स...सिर्फ दो। उसी के मोबाइल से। इनबॉक्स में गई...तो उसी के मेसेज सेव्ड थे। ड्राफ्ट में भी, और इनबॉक्स तो खैर भरा ही था....आखिरी मेसेज....जस्ट फॉरगेट द पास्ट।

मृगांका एकबारगी चौंक गई...। जस्ट फॉरगेट द पास्ट...? मैने ऐसा मेसेज कब भेजा...कभी नहीं। मृगांका स्मृतियों पर जोर डालने लगी...ना...कभी नहीं। विदेश से लौटने के बाद, और न्यूज़ चैनल फिर से जॉइन करने के बाद उसने बारहा कॉल किए थे अभिजीत को...कहां मिला था वो। हमेशा फोन स्विच्ड ऑफ ही मिला था। कैसे खो गया उसका अभि...ये एक तिलिस्म था।

लेकिन, ये मेसे...। उसने तुरंत फोन लगाया।

'हलो पापा..'
जी बेटे
आप जल्दी से प्रशांत के फ्लैट पर पहुंचो...
कोई खास बात एक बिजनेस मीटिंग में हूं, शाम को पहुंचूं
नही पापा, टाइम नहीं है, जल्दी आइए

मृगांका ने अभिजीत का मोबाइल रखा तो स्क्रीन पर उसी की वॉल फोटो थी...स्क्रीन सेवर भी मृगांकी की ही तस्वीर थी। वॉल फोटो उसके घनों केशों वाली ब्लैक एंड वाइट फोटो, जिसे देखकर अंतरंग क्षणों में अभिजीत ने उसके अनगिनत बोसे लिए थे...और स्क्रीन सेवर वही फोटो जिसमें मृगांका के ब्रा के स्ट्रेप्स दिखते थे। अभिजीत को ये दोनों तस्वीरें खूब पसंद थीं।

घर में भारीपन-सा तारी था। अचानक मृगांका  जोर-जोर से हंसने लगी। मां की प्रश्नवाचक निगाहें  उठीं...तो मृगांका शर्मा-सी गई। मां को मृगांका ने सीने से लगा लिया, मुस्कुराते हुए बोली, अम्मां, हम आपके बेटे से बहुत प्यार करते हैं...हमेशा मैथिली सिखाने की कोशिश की, अभि ने...मैंने सोचा था आपसे पहली बार मिलूंगी आपसे तो मैथिली में बातें करूंगी...लेकिन..

मां को कुछ समझ में आय़ा, कुछ तो सीखा होगा बेटा आपने
हां अम्मां, हमरा भूख लागल अछि..बस इतना ही...मृगांका की मुस्कुराहट विगलित होकर आंसुओं में तब्दील हो गई, मां भी हिचकिया लेने लगीं, प्रशांत का गला रूंध गया।



ख्व़ाब ने टूटे कोई, जाग न जाए कोई...

जब सुबह बिसेसर दोबारा आय़ा तो सूरज सिर पर चढ़ चुका था। उसने देखा, रात का रखा खाना अब भी वहीं पड़ा है। बारामदे के तख्त पर अभिजीत पीठ के बल सीधा लेटा है, आंखें आधा खुलीं...आधा बंद। एक दम शांत। नाक के पास एक-दो मक्खियां उड़ रही थीं।

बिसेसर को थोड़ा शक हुआ...उसने  अभिजीत को निगाहों से तौला...एकदम सीधे कैसे सोए हैं  सर जी, हमेशा तो पेट के बल सोते थे...आज...और इस वक्त तक तो जग ही जाते थे...

बिसेसर और पास गया...नाक के पास हाथ ले गया, उसे कोई हलचल नहीं लगी। सांसें बंद थीं।

बिसेसर चिल्लाया, 'महंत जी....' ---और दौड़कर उनके घर की तरफ भागा।

...रास्ता इत्ता लंबा तो न था!

फ्लाइट जब पटना एयरपोर्ट पर लैंड हुई तो रात के साढे ग्यारह बज चुके थे। प्रशांत ने पहले ही एक गाड़ी बुक करा रखी थी। मृगांका के साथ उसके पापा भी थे। एयरपोर्ट पर मृगांका को कई निगाहों ने पहचाना भी, और मुस्कुराहट भी मिला। लेकिन मृगांका के पास कोई प्रत्युत्तर नहीं था।

पापा ने निराश किया था। उसके मोबाइल से पापा ने ही मेसेज किया था, जस्ट फॉरगेट द पास्ट...और मृगांका और अभिजीत दोनों का फ्यूचर खराब हो गया। पापा ने स्थिति स्पष्ट की थी कि अभिजीत ने खुद बताया था कि उसे एक गंभीर बीमारी है, जिसमें उसके अंदरूनी अंगों की डिकेइंग हो रही है, आहिस्ता-आहिस्ता।

लीवर जैसा अंग भी रि-जनरेट नहीं पा रहा...। मेडिकल रिपोर्ट उन्हीं के पास थी, ऐसे में अभिजीत और मृगांका दोनों को अलग कर देना ही बेहतर था।

लेकिन पापा हम अलग तो नहीं हा पाए ना....पापा निरूत्तर थे, अब इस लंबे सफर में साथ थे, जो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था।

जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब सांस आए...

महंत जी अभिजीत के घर पहुंचे, तो स्थिति स्पष्ट हो चुकी थी। अभिजीत की देह नहीं रही...। महंत जी के होठों पर कुछ मंत्रों की बुदबुदाहट हुई। शायद अभिजीत की रूह को इससे शांति मिलने वाली थी।

लेकिन, जिसके पूरे साहित्य की जान तीन डॉट रहे हों, वहां शांति की संभावना तो थी ही नहीं। शांति की एक ही सूरत थी...मृगांका।

गांव की औरते जमा हो गई थी। बिसेसर की बीवी ने अभिजीत को भैया कहना शुरू कर दिया था। रोना आ रहा था उसे। औरतों में फुसफुसाहट थी कि अभिजीत तो कल शाम को ही डगमगाते हुए साइकल चला रहे थे...रात भर में क्या हो गया।

बारिश के बाद मौसम साफ निकल आया था। बादलों के तीन टुकड़े, तीन डॉट की तरह आसमान में बिखरे थे। चिकनी मिट्टी वाले गांव में सड़क से लेकर हर तरफ कीचड़-कादो था।

मां और मृगांका कीचड़ सने गाड़ी से निकल कर घर की तरफ तकरीबन भागती आ रही थी...। मां ने देखा, दरवाजे पर औरते थीं, मुंह को आंचल से ढंके। अभिजीत की मां को देखते ही रुलाई फूट पड़ी...जोर से।

मृगांका, ठहरकर स्थिति समझने की कोशिश कर रही थी...

बाहर अर्थी बनाई जा रही थी। कुल्हाड़ी, हरे बांस पर चल रही थी।

खट्...खट्...खट्।



Friday, April 26, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः कुशीनारा, जहां बुद्ध ने ली थी अंतिम सांस


बनारस के बाद हमारा अगला पड़ाव था, कुशीनगर। हमारी महापरिनिर्वाण एक्सप्रैस तो गोरखपुर में जाकर रूक गई। और इस दफा अलसभोर में ही पहुंच गई। बस से हम कुशीनगर पहुंचे। 
प्राचीनकाल में कुशीनगर का नाम कुशीनारा था।
 
ईसा से 483  साल पहले भगवान बुद्ध ने यहां पर अपनी देहत्याग की थी। इस घटना को महापरिनिर्वाण कहा जाता है। 

कुशीनगर में सबसे प्रमुख स्तूप है वो है निर्वाण स्तूप। ईंट और रोड़ी से बने इस विशाल स्तूप को 1876 में कार्लाइल ने खोजा था। इस स्तूप की ऊंचाई पौने तीन मीटर है। 

खुदाई से यहां एक एक तांबे की नाव मिली। इस नाव में खुदे अभिलेखों से पता चलता है कि इसमें महात्मा बुद्ध की चिता की राख रखी गई थी।


महानिर्वाण या निर्वाण मंदिर कुशीनगर का प्रमुख आकर्षण है। इस मंदिर में महात्मा बुद्ध की 6.10 मीटर लंबी प्रतिमा स्थापित है। 1876 में खुदाई के दौरान यह प्रतिमा प्राप्त हुई थी। यह सुंदर प्रतिमा चुनार के बलुआ पत्थर को काटकर बनाई गई थी। प्रतिमा के नीचे खुदे अभिलेख के पता चलता है कि इस प्रतिमा का संबंध पांचवीं शताब्दी से है। कहा जाता है कि हरीबाला नामक बौद्ध भिक्षु ने गुप्त काल के दौरान यह प्रतिमा मथुरा से कुशीनगर लाया था।
महात्मा बुद्ध की लेटी प्रतिमा, कुशीनारा


दरअसल, इस प्रतिमा की खासियत है कि इसमें बुद्ध लेटे हुए हैं। पैर की तरफ से देखे तो वह मृत शरीर की भंगिमा वाली है, जिसे निर्वाण मुद्रा कहते हैं। छाती के पास से देखें, तो बुद्ध आशीर्वाद देने की मुद्रा में नजर आते हैं, और सिर की तरफ से देखे तो यह प्रतिमा मुस्कुराती हुई नजर आती है।

यहीं से थोड़ी दूर पर, माथाकौर मंदिर भी है। 

भूमि स्पर्श मुद्रा में महात्मा बुद्ध की प्रतिमा यहां से प्राप्त हुई है। यह प्रतिमा बोधिवृक्ष के नीचे मिली है। इसके तल में खुदे अभिलेख से पता चलता है कि इस मूर्ति का संबंध 10-11वीं शताब्दी से है। इस मंदिर के साथ ही खुदाई से एक मठ के अवशेष भी मिले हैं।

बुद्ध के काल में कुशीनगर, बाद में कसिया बन गया। यह मल्लों की राजधानी थी, जिसका वर्णन महाभारत के भीष्म पर्व में भी है।
निर्वाण स्तूप का अगला हिस्सा, कुशीनगर


बौद्ध साहित्य में कुशीनगर का विशद वर्णन मिलता है। इसमें कुशीनगर के साथ 'कुशीनारा, कुशीनगरी और कुशीग्राम  जैसे दूसरे नामों का भी उल्लेख है। बुद्ध-पूर्व युग में यह कुशावती के नाम से विख्यात थी। 

बुद्ध को भी कुशीनगर से कुछ ज्यादा ही लगाव था। कुछ बौद्ध साहित्यों में सात बोधिसत्वों के रूप में बुद्ध ने मल्लों की इस राजधानी पर शासन किया था। आखिरी बार जब बुद्ध यहां आए को मल्लों ने उनका खूब स्वागत किया और उनके स्वागत-सत्कार में शामिल न होने वाले पर 500 मुद्राओं का दंड निर्धारित किया गया था।

गौरतलब है कि बुद्ध के निर्वाण के संदर्भ में कई किस्से चलते हैं। लेकिन वहां के स्थानीय गाइड ने हमें बताया कि बुद्ध को एक लुहार के हाथों शूकर (इसके दो अर्थ हैं, सू्अर का मांस और शकरकंद) खाने से अतिसार हो गया। 

तब उन्हें लग गया कि विदाई की वेला आन पड़ी है। फिर, बुद्ध ने महापिरनिर्वाण हासिल किया। तब उनके शरीर को सात दिनों तक दर्शनो के लिए रखा गया और फिर मुकुटबंधन चैत्य के स्थान पर उनका दाह संस्कार किया गया। 

दाह-संस्कार के पश्चात् अस्थि-विभाजन के संदर्भ में विवाद उत्पन्न हो गया। इस अवसर पर उपस्थित लोगों में वैशाली के लिच्छवी, कपिलवस्तु के शाक्य, अल्लकप के बुली, रामग्राम के कोलिय, पावा के मल्ल, मगधराज अजातशत्रु तथा वेठ-द्वीप (विष्णुद्वीप) के ब्राह्मण मुख्य थे। कुशीनगर के मल्लों ने विभाजन का विरोध किया। 

प्रतिद्वंद्वी राज्यों की सेनाओं ने उनके नगर को घेर लिया। युद्ध प्राय: निश्चित था, किन्तु द्रोण ब्राह्मण के आ जाने से अस्थि अवशेषों का आठ भागों में विभाजन संभव हुआ। विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि अस्थि अवशेषों को अपनी राजधानियों में ले गए और वहाँ नवर्निमित स्तूपों में उन्हें स्थापित किया गया।

आवारेपन का रोज़नामचा जारी है, कुछ कुशीनगर का किस्सा कुछ लुंबिनी का, जहां बुद्ध का जन्म हुआ था।

Tuesday, April 23, 2013

सुनो! मृगांका:31: मैं तन्हा था मगर...इतना नहीं था

प्रशांत ने सुनने से पहले फोन रख दिया। अभिजीत का आधा नशा उतर गया...लेकिन मृगांका...एक ऐसा नशा... जो ताउम्र उस पर तारी थी। मारिजुआना से भी गजब का नशा...वह थोड़ा डरा हुआ था, थोड़ा खुश। वह चाहता भी तो था मृगांका को जीभर देख पाए...

कितना वक्त बीत गया...दो साल तीन महीने और पंद्रह दिन...यानी आठ सौ पैंतीस दिन यानी...बीस हज़ार चालीस घंटे...यानी... इससे आगे का हिसाब अभिजीत नहीं लगा पाता।

ठीक ही तो कहा था मृगांका ने चीखते हुए...आई कांट गेट यू इन दिस लाइफ़....और शायद इसी लिए मेसेज आया था उसके इन बॉक्स में, जस्ट फॉरगेट द पास्ट

बारिश के आसार घने हो गए थे...अभिजीत को लगा, सारे गहरे कराए गए तालाब, जिनकी गाद निकाल कर खेतों में डाल दी गई थी, बारिश के बाद लबालब भर जाएंगे। ठूंठ हो चले पेड़ों में हरे पतों की जगह बनेगी...लेकिन उसके दिल का पोखरा, जिसकी कमलिनी थी मृगांका...सूखा ही रहेगा।

अभिजीत सोच रहा था कि आखिर अब मृगांका से मिल भी पाएगा या नहीं।

उसे प्रशांत की बातें याद आईं...जीवन में पहली बार उसने अपने पब्लिशर को हाथ से लिखी कॉपी दी थी। छपने  के लिए उसने हमेशा सॉफ्ट कॉपी को तरज़ीह दी थी।

लैपटॉप पर लिखते-लिखते उंगलियां कीबोर्ड की अभ्यस्त हो गई, और लिखावट बगुले की टांग सरीखी। लेकिन, वही लिखावट मृगांका को पसंद थी। वह जो बिंदु लगाता था किसी शब्द पर, उसका घेरा, उसकी परिधि, बड़ी-सी हुआ करती। मृगांका को वह भी पसंद था।

अभिजीत ने कभी नहीं बताया था मृगांका को, कि बिंदु को इतना बड़ा घेरा, उसके मन की शून्यता का प्रतीक है।

बारिश होने लगी, बूंदे गिरने लगी। माटी से सोंधी खुशबू आने लगी। बारिश की बूंद आंगन में ह जगह टपा-टप, टपा-टप...आम के पेड़ पर, अंगने की लता पर...महुए पर, कदंब के कुंज पर, बांसवार (बांस का झुंड)...अब गांव में फिर से बोलेंगे दादुर और मेंढक...अब फिर झींगुरों की तान में उदासी की जगह खुशी का राग होगा, अब फिर से मेघ-मल्हार होगा... मन कहीं और उड़ चला, दिल्ली की तरफ... ।


उधर, दिल्ली में,

प्रशांत अस्पताल से आकर बस फ्रेश ही हुआ था...कि दरवाज़ा धड़ाम से खुला। अवाक् प्रशांत ने देखा कि अभिजीत की मां और मृगांका दोनों सामने खड़े थे। कोड़े की तरह सड़ाक् से सवाल आया मृगांका का, 'ये क्या है?'

'क्या, क्या है?'---प्रशांत मन में समझ तो गया, जब प्रेस की छपाई की ताजी खुशबू वाली किताब मेज पर पटक दी थी मृगांका ने, लेकिन अनजान बना रहा। ..कांपते हाथों से प्रशांत ने किताब उठाई, मोटे हरफ़ो में छपा था, सुनो, मृगांका...अभिजीत को शब्दों के बाद के ये तीन डॉट बड़े पसंद थे।

तीन डॉट कई विकल्प खुला छोड़ जाते हैं।


'अभिजीत की डायरी को छाप दिया है गधे पब्लिशर ने...' अनजान बनने की कोशिश करते हुए प्रशांत ने जवाब दिया। आवाज़ उसका साथ नहीं दे रही थी।

'फ्लैप देखो, फ्लैप।' मृगांका गुस्से में थी। मां चुपचाप किनारे खड़ी थी।

प्रशांत ने फ्लैप देखा, अभिजीत के परिचय के ऐन ऊपर मोटे हरफों में लिखा था अभिजीत की आखिरी किताब...प्रशांत ने नजर नीचे किए हुए पढ़ा। '...नहीं भाभी, ये तो पब्लिशर ने इसलिए लिख दिया होगा, क्योंकि किताब बिकती है इससे। अंग्रेजी में भी साथ ही छपी है, पांच लाख कापियां पहले ही बिक चुकी हैं।'--- प्रशांत ने नजर चुराते हुए कहा।

'ये सब पता है मुझे, और किताब इसलिए नहीं बिक रहीं क्योंकि अभिजीत की आखिरी किताब है, बल्कि इसलिए बिक रही हैं क्योंकि....क्योंकि तुम आगे पढ़ो।' मृगांका की आवाज़ डोलने लगी थी।

....अभिजीत एक गंभीर बीमारी से ग्रस्त हैं और जीवन के चंद महीनों के मेहमान हैं, पेश है..उनकी निजी डायरी के अंश, सुनो, मृगांका...

'कहां है अभिजीत...? ' मृगांका की आवाज़ में गुस्से की जगह ले ली थी अब एक तरावट ने।

गांव...प्रशांत ने अब लाग-लपेट करना ठीक नहीं समझा।

मौसम विभाग ने भविष्यवाणी की थी, दिल्ली में मॉनसून आने की, सच हो रही थी, बाहर तेज हवा चल रही थी, दिल्ली में भी बारिश होने लगी थी। लेकिन बारिश हमेशा खुशियां लेकर नहीं आती।

हां...बारिश हमेशा खुशियां लेकर नहीं आती।

रात घिर आई, लेकिन बारिश जो एक बार शुरू हुई थी, तो लगा कि जितने दिनों तरसाया सबको पानी के लिए, सारी कसर आज ही पूरी कर देगी। बरसात शुरू हुई थी तो बच्चे क्या, जवान क्या, मर्द क्या औरतें क्या, सब..खूब नहाए थे...बिसेसर तो कीचड़ में लोट ही गया था।

महंत जी से लेकर गांव के मुखिया तक, सब ने बारिश का स्वागत किया था। प्यास तो सबको लगती है, बिसेसर हो दलित, या महंत हों पंडित।

लेकिन, नहा धोकर, थककर और खाकर जब गांव नींद के आगोश में चला गया, अभिजीत के लिए शायद आखिरी बुलावा आ चुका था।

पेट में तेज़ दर्द...वह तख्त पर औंधा लेट रहा बारामदे में...। चहकता हुआ बिसेसर छाता लालटेन लेकर खाना लाया था, तो उसकी छुटकी बेटी भांप गई थी।

'चच्चा, आपका तबियत ठीक नैं है का...?'
'हां बेटा...तबियत ठीक नहीं'
'खाना खा लीजिए'
'अभी मन नहीं कर रहा बच्चे, रख दो, खा लूंगा...'

बिसेसर ने इसरार किया कि वो यहीं रुक जाता है...लेकिन अभिजीत ने उसे वापस भेज दिया। खाना रख कर और भूख लगने पर खा लेने की हिदायत के साथ बाप-बेटी विदा हो गए।

अभिजीत ने देखा, ओसारे में जली लालटेन की लौ धीरे-धीरे कालिमा में छुप रही है। लग रहा था कि लौ बुझ जाने वाली है गोकि उसकी रौशनी थोड़ी तेज़ हो रही थी...

अभिजीत किसी तरह उठा, घड़े से पानी पिया...। लेकिन चैन नहीं, लग रहा था कि किसी ने पेट में जलता अंगारा डाल दिया हो...लेटा तो बचपन के सारे दिन याद आने लग गए, घर के पीछे जामुन का पेड़, मुहल्ले की मामी जी के आंगन का बेर का पेड़...वह यूकेलिप्टस का पेड़ जिसमें वो अनिल कपूर से लेकर हनुमान तक की आकृतियां खोज निकालता था...वह कटहल का पेड़, जिसे दोस्त की तरह उसने पाला पोसा था...बाबूजी का धुंधला सा चेहरा, हमेशा दूसरे कामों में व्यस्त पहने वाली मां...अपने भाई और भाभी...विजयनगर में प्रशांत, जिसने रहने का आसरा दिया था, उसके फाकाकशी के दिनों में...

और मृगांका...जो उसकी ज़िंदगी का सबसे मुलायम लम्हा थी।

काले-काले मेघ...बाहर पाकड़ के पेड़ पर बरसती बूंदे...बूंदो की रुन-झुन का साउंड इफैक्ट...उसके दफ्तर के सामने की चाय दुकान...मृगांका के साथ चाय पीना...दिल्ली के उस स्लम में मृगांका से मुलाकात...जहां मृगांका ने उसके लिए चाय भिजवाई थी...कभी स्टिल के कोलाज़ की तरह, तो कभी विजुअल मोंटाज़ की तरह गड्ड-मड्ड हो रहे थे।

अभिजीत की निगाहें आसमान की तरफ गईं...उसने इतनी कातर निगाहों से आसमान को कभी नहीं ताका, कभी मंदिर नहीं गया, भीख मांगने आए औघड़ों को भगाया, निगाहें सबसे बुरे दिनों में भी इतनी कातर और मार्मिक नहीं हुई थी...

मानता हूं कि मैं एक कॉकरोच हूं..लेकिन तेरे आगे झुकूंगा नहीं...वह बुदबुदाया। आंखें बंद होती चली गईँ। मृगांका..उफ़ मृगांका...कितना अकेला हूं मैं...तुम मेरी जिंदगी में नहीं थी, तब भी मैं अकेला था...लेकिन अब ज्यादा तन्हा हूं...

ये मेरा आख़िरी पयाम है...

बिसेसर को अभिजीत के घर से जाते वक्त ही लग गया था कुछ तो गड़बड़ है। देर रात बूंदाबांदी थोड़ी कम हुई तो वह अभिजीत के घर आया, बाहर का दरवाज़ा ऐसे ही खुला था। लालटेन की लौ बस नीली बिंदी सी बची थी।

बिसेसर ने देखा, अभिजीत को नींद आ रही है...अभिजीत सो रहा है। तो वो दबे कदमों वापस लौट गया।

अभिजीत सो गया, गहरी नींद। बहुत गहरी नींद।



Saturday, April 20, 2013

सुनो! मृगांकाः 30: झल्ला की लब्दा फिरे...


आसमान बादलों से घिरा था, लेकिन धरती प्यासी थी। धरती की प्यास और अभिजीत की प्यास का पैमाना तकरीबन एक सा था।

हवा तेज़ चल रही थी...। काले मेघ, इन्ही हवाओं से टकरा कर दूर चले जाने वाले थे।

अचानक न जाने क्या सूझा अभिजीत को...अंदर जाकर, अपनी ह्विस्की की बोतल उठा लाया। शाम होने में अभी देर थी। दिन अभी ढला नहीं था। अभिजीत को हैरत हो रही थी, अपनी इस दशा पर। गांव में अपने मन का बहुत कुछ किया था उसने।

पहला पैग अंदर गया। अभिजीत का अपने मन पर से नियंत्रण हट गया। ऐसी ही नम हवा चल रही थी, जेएनयू के अहाते में गंगा ढाबा के आसपास कहीं किसी पत्थर पर बैठकर चाय सुड़कते  हुए अभिजीत ने मृगांका को फोन किया था।

याद वहीं।

दूसरा पैग बना, खतम हुआ। याद आया कि एक बार मृगांका ने पूछा था, मेरी कौन सी तस्वीर तुमको अच्छी लगती है....खटाके से अभिजीत ने उसको बांहो में भरते हुए कहा था, जिसमें तुम्हारे ब्रा के स्ट्रेप्स दिखते हैं।

झल्ला...मृगांका चीखी थी। छीः शर्म नहीं आती तुम्हें।
 अभिजीत ने बिना शरमाए कहा था, तुमसे क्या शरमाना।  मृगांका नक़ली ग़ुस्से से दांत पीसती रही और अभिजीत का गाल चुंबनों से भर दिया था...अभिजीत के गालों पर लिपस्टिक के दाग़...और अभिजीत ने बहुत देर तक चेहरा नहीं धोया था।

यादों का विस्तार होता रहा, पांच पैग के बाद, हिचकी आने लगी। गला सूखने लगा। लगा कि ब्लाडर फट जाएगा। वह घर के पीछे खेत की तरफ गया। गांव में उसे उस सुनसान खेत में पेशाब करने में मजा आता था। आसमान में बादल अभी भी थे ही, लेकिन बारिश की संभावना खतम हो गई थी।

कुछ सोचकर वह डगमगाते कदमों से अपनी बाइक की तरफ बढ़ा। कांपते हाथों से बाइक में चाबी डाली...नहीं डली। बेतरह लड़खड़ाते हुए, अभिजीत ने अपनी साइकिल को देखा...। गांव की सड़क पर, डगमगाती साइकिल खजौली की तरफ बढ चली।

कभी मृगांका ने कहा था उससे, मुझे साइकिल की सवारी नहीं कराओगे...। अभिजीत समझ गया था कि मृगांका मज़े ले रही है। मृगांका ने बहुत संजीदगी से कहा था कि उसे साइकिल की सवारी करनी है...लेकिन गांव में लड़कियां साइकिल चलाती हैं, नीतीश कुमार ने हर लड़की को साइकिल दिया है सरकार की तरफ से...लेकिन गांव की बहू चलाएगी?

अभिजीत इसी सोच में चल रहा था। कमला नदी की एक उपधारा उसके गांव से होकर गुजरती है...गरमियो में वह भी सूख जाती है। थोड़ा सा पानी बचा रहता है जिसमें भैंसे लोटमलोट किया करती है। अभिजीत उसी पुल पर से पार कर रहा था।

पूरे गांव की औरतें अभिजीत को इस तरह डगमग साइकिल चलाते हुए देखकर हंस-हंस कर दोहरी हुई जा रही थीं। कुछ ने तो हंसी छिपाने के लिए पल्लू मुंह में ठूंस लिया था...। वो अभिजीत की हालत पर नहीं, उसके साइकिल चलाने के अंदाज़ पर हंस रही थी। वरना अभिजीत तो उनके लिए एक ऐसा प्रतिष्ठित शख्स बन चुका था, जिसने गांव की जाती हुई रौनक को करीब-करीब लौटा दिया था।

गांव का हर विद्यार्थी उसका छात्र बन चुका था। स्कल से लेकर खेती तक, और नई तकनीकों से लेकर पोखरे में जलकुंभी की सफाई तक, पिछले दो महीने में अभिजीत ने मिशन की तरह काम किया था। सही रास्ते पर लेकर आने वाला अभिजीत आज खुद डगमग था।

खजौली पहुंच कर अभिजीत ने सीधे एसटीडी बूथ से प्रशांत का नंबर डायल किया। वह सोचकर कुछ आया था, सोचा उसने वही था...सीधे मृगांका से बात करेगा। लेकिन बूथ में घुसकर हिम्मत नहीं हुई।

हलो
हलो
प्रशांत...
अबे...अभिजीत। कैसा है बे।
ठीक हूं, तू बता
अच्छा है
और...सब
सब क्या, मां दिल्ली आकर मृगांका के घर पर टिक गई हैं। कहती हैं बेटा और बहू को साथ देखकर वापस जाएंगी, मृगांका भी बहुत परेशान है...
ओह...
...और तूने जरूर पी रखी होगी
नहीं
तुम्हारा आवाज से लग रहा है साले...सुन..एक बात  हो गई है
क्या
तुम्हारे पब्लिशर ने तुम्हारी नई किताब पर कुछ उल्टा लिख दिया है, फ्लैप पर।
क्या
लिखा है कि अभिजीत की आखिरी किताब है...
तो
लिखा है इसके बाद नहीं लिखेगा
हा, सही है
अबे नहीं यार। लौट आ।लौट आ ना यार...प्रशांत रो पड़ा। ...और सुन मैं मां को और मृगांका को गांव भेज रहा हूं..अब कोई बात नहीं सुनूंगा। बस

अबे सुन तो..

प्रशांत ने सुनने से पहले फोन रख दिया। अभिजीत का आधा नशा उतर गया...लेकिन मृगांका एक ऐसा नशा थी जो ताउम्र उस पर तारी थी। मानिजुआना से भी गजब का नशा...वह थोड़ा डरा हुआ था, तोड़ा खुश। वह चाहता भी तो ता मृगांका को जीभर देख पाए।