Thursday, February 26, 2026

AI के भय और इसके अत्यधिक इस्तेमाल पर छोटी टीप

आजकल कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) पर लिखा जाने वाला लगभग हर दूसरा लेख किसी मर्सिए की तरह लगता है. हर किसी का ऐलान है, यह तकनीक आपकी नौकरी छीन लेगी, आपका दिमाग़ खोखला कर देगी या पूरी सभ्यता की ज्ञान-प्रणाली को ही ध्वस्त कर देगी और कुछ लेखों में तो तीनों काम एक साथ होने का पूर्वानुमान भी है. सोशल मीडिया इन अंदेशों को तेजी से फैलाता है, भले ही खुद सोशल मीडिया एआइ के दम पर उड़ान भरता है.

लेकिन सोचिए जरा. लोग वास्तव में क्या कर रहे हैं? लोग इन दिनों लगभग हर काम के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं. जो लेखक ‘मौलिक सोच के खात्मे’ की चेतावनी देते हैं, वही इससे ईमेल लिखवाते हैं और लेख संपादित कराते हैं. जो पेशेवर विशेषज्ञता के पतन का रोना रोते हैं, वही इससे कानूनी धाराएं और टैक्स से जुड़े सवाल पूछते हैं. यहां एक विरोधाभास है, और इससे भागने के बजाय इस पर ठहरकर सोचने की ज़रूरत है.

 

यह स्थिति सहज नहीं है. कभी तो इसका भाषा मॉडल ज्ञान-कर्म, लेखन और शायद मानव चिंतन की नींव को ही कमजोर करता लगता है और कभी उसी की मदद से लोग डॉक्टर की पर्ची समझने की कोशिश कर रहे होते हैं। यह तो सचमुच अद्भुत है.

तकनीकी डर कोई नई बात नहीं है. इतिहास में नई तकनीकों को लेकर घबराहट की लंबी और कुछ हद तक हास्यास्पद परंपरा रही है. जब 1830 के दशक में ब्रिटेन में रेल आई, तो डॉक्टरों ने गंभीरता से चेतावनी दी कि मानव शरीर इतनी गति सह नहीं पाएगा. ‘रेलवे मैडनेस’ जैसी बीमारी की खबरें छपने लगीं. एक अमेरिकी यात्री तो कथित पागलों से बचने के लिए रिवॉल्वर लेकर चलता था.

रानी विक्टोरिया ने भी 1842 में पहली रेल यात्रा के बाद लिखा कि उन्हें यह बहुत पसंद आई, लेकिन वे गति से चिंतित थीं. उन्होंने दिन में 40 और रात में 30 मील प्रति घंटा की सीमा तय कर दी.

किताबों के आने पर भी ऐसी ही चिंता हुई थी. 1481 में वेनिस के संपादक हियरोनिमो स्क्वार्सियाफिको ने कहा था कि छपाई अशिक्षित लोगों के हाथों में पड़ गई है और सब कुछ बिगाड़ रही है. उन्होंने लिखा कि किताबों की अधिकता लोगों को ‘कम अध्ययनशील’ बना देती है और यह बात उन्होंने एक छपी हुई किताब में लिखी.

बीसवीं सदी में टेलीविजन को लेकर भी ऐसी ही बातें और गप चली. न्यूटन मिनो ने 1961 में इसे हिंसा और मूर्खता से भरा बताया. बाद में उन्होंने कहा कि वे असल में ‘लोकहित’ की याद दिलाना चाहते थे.

इसका मतलब यह नहीं कि डर बेबुनियाद थे. हर बदलाव में कुछ नुकसान भी हुए. इंग्लैंड के हथकरघा बुनकरों की दुनिया ही खत्म हो गई थी. नुकसान असली थे. असली सवाल यह है कि समाज सुरक्षा-व्यवस्था बनाता है या नहीं. एआई के मामले में तकनीक आ चुकी है, लेकिन नियम नहीं. असली समस्या यही है.

एक और भ्रम यह है कि हम औज़ार और उसके उपयोग को एक मान लेते हैं. चाकू रोटी भी काट सकता है और हत्या भी कर सकता है. दोष चाकू का नहीं, इस्तेमाल करने वाले का होता है. एआई भी ऐसा ही है.

गलत सूचना और प्रचार भी एआई की देन नहीं हैं. 1994 में रवांडा नरसंहार भड़काने वाला रेडियो स्टेशन साधारण तकनीक से चलता था.

एआई ने अमानवीयता नहीं बनाई, बस उसे नया मंच दिया है. इसलिए नियम ज़रूरी हैं. सवाल तकनीकी नहीं, राजनीतिक हैं. लेकिन एक बात जो अक्सर छूट जाती है: एआई जितना नुकसान कर सकता है, उतनी ही मुक्ति भी दे सकता है. अंग्रेज़ी लंबे समय तक ज्ञान के पहरेदार की तरह काम करती रही. अब एआई उस बाधा को तोड़ रहा है. जो लोग इसे ‘अप्रामाणिक’ कहते हैं, वे वही हैं जिनके पास पहले से संसाधन थे. यह वर्गीय तर्क है.

हैलुसिनेशन यानी गलत जानकारी देना एक समस्या है, लेकिन टीवी चैनलों और सरकारों ने यह काम पहले से किया है. कम से कम एआई की गलतियों को पहचाना जा सकता है.

सबसे गंभीर समस्या है एआई का पक्षपात. नौकरी, कर्ज़, जमानत या इलाज में इसका इस्तेमाल भेदभाव को स्थायी बना सकता है. समाधान मशीन को दोष देना नहीं, व्यवस्था सुधारना है.

इससे मुझे एक बड़ा सवाल लगा—अगर हमारी बनाई प्रणालियां पहले ही यह सोचें कि सवाल ही गलत तो नहीं, तो क्या होगा?

यही असली बहस है. डर भी सच है, संभावना भी. सवाल यह है कि हम इसका इस्तेमाल कैसे करते हैं. इतिहास बताता है कि हम गलतियां करते हुए भी आगे बढ़ते हैं. यह लापरवाही का बहाना नहीं, बल्कि थोड़ी जिज्ञासा और कम डर के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा है.

(फ्रंटलाइन के संपादकीय लेख का अनूदित और संपादित अंश)

Wednesday, February 25, 2026

पलाश : वसंत की आग में दहकता सौंदर्य

आप कभी चलिए मेरे साथ मधुपुर. जैसे ही आप जमुई स्टेशन पार करेंगे और दोनों तरफ जंगलों और ऊंची-नीची घाटियों का इलाका शुरू होगा, आपको विलक्षण चीज दिखेगी. झाझा, सिमुलतला, जसीडीह और मधुपुर... इस पूरे रास्ते में रेल लाईन के दोनों तरफ घाटी जंगलों से भरी है और अब, फरवरी में गरमाहट आने के बाद इन जंगलों में खिलते हैं पलाश.

जैसे ही फाल्गुन की ठंडी सुबहें ढलने लगती हैं और हवा में वसंत की हल्की सुगंध घुलने लगती है, धरती पर एक अद्भुत चमत्कार घटित होता है. न जाने कहाँ से अचानक हमारे जंगलों, खेतों की मेड़ों, नदी किनारों और पथरीली भूमि पर लाल-नारंगी आग की लपटों से सुलग उठती है. यह अग्नि किसी विनाश की नहीं, बल्कि सौंदर्य और जीवन के उत्सव की होती है. यही है पलाश का फूल.




संस्कृत में किंशुक और ढाक तथा अंग्रेज़ी में फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट. वसंत का सबसे प्रखर उद्घोषक है. जब अधिकांश वृक्ष अभी पत्तियों के बोझ से मुक्त होकर निर्वस्त्र खड़े होते हैं, तब पलाश अपनी नग्न शाखाओं पर अग्नि-सा सौंदर्य ओढ़ लेता है. ऐसा लगता है मानो धरती ने खुद अपने लिए केसरिया वस्त्र बुन लिए हों.

संस्कृत साहित्य में पलाश का उल्लेख अत्यंत भावपूर्ण ढंग से मिलता है. अमरकोश में कहा गया है-

किंशुकः पलाशो ढाकः

कालिदास ने अपने काव्य में पलाश को वसंत का प्रतीक बनाकर बार-बार उकेरा है. ऋतुसंहार में वे लिखते हैं-

“प्रफुल्लकिंशुकवनानि शोभन्ते”

(फूलों से भरे किंशुक वन शोभायमान हो उठे हैं.)

कालिदास के लिए पलाश केवल वृक्ष नहीं, ऋतुओं का जीवंत चरित्र है. मेघदूत में भी वह प्रकृति के चित्रण में पलाश की आभा को समाहित करते हैं. उनके यहाँ पलाश प्रेम, विरह और सौंदर्य तीनों का साक्षी है.

हिमालय की तराइयों से लेकर दक्कन के पठार तक, राजस्थान की शुष्क भूमि से लेकर मध्य भारत के जंगलों तक, हर जगह पलाश ने अपने लाल-नारंगी दस्तख़त छोड़े हैं. बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के ग्रामीण अंचलों में तो पलाश मानो लोकजीवन का अभिन्न अंग है. बसंत आते ही गाँवों के बच्चे इसकी पंखुड़ियाँ बटोरते हैं और स्त्रियाँ इन्हें पूजा-पाठ में अर्पित करती हैं.

हमलोग होली के टाइम में खूब पलाश तोड़कर लाते थे. उनके फूलों को डंठल से अलग करते और फिर चूने का साथ मिलाकर पानी में उबालते थे. फिर जो ऐसा पक्का रंग तैयार होता था कि साइकिल पर झक्क सफेद कुरते-धोती में जाने वाले काका हों या कुरते-पाजामे में मौलाना चा, सब रंग जाते थे.

जिस पलासी के युद्ध ने भारत का इतिहास बदल दिया, असल में उसका नाम पलासी इसलिए ही पड़ा था क्योंकि उसके आसपास पलाश का बहुत घना जंगल था. हालांकि, अब इस इलाके में पलाश का जंगल छोड़िए, एक पेड़ तक नहीं बचा है.

हमारा जब उपनयन हुआ था तो भिक्षाटन के समय कौपीन पहने हमने हाथ में पलाश का दंड ही रखा था. पलाश दंड का ऋषियों के लिए अगर महत्व रहा है. वैदिक काल में पलाश की लकड़ी से यज्ञकुंडों के उपकरण बनाए जाते थे. शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख है कि पलाश को पवित्र वृक्ष माना जाता था. यज्ञ की अग्नि में पलाश की समिधा डालना शुभ समझा जाता था. यह वृक्ष तपस्या, साधना और संयम का प्रतीक बन गया.

प्राचीन भारत में पलाश से प्राकृतिक रंग बनाए जाते थे. होली के अवसर पर पलाश के फूलों से तैयार किया गया केसरिया रंग त्वचा के लिए सुरक्षित होता था. यह परंपरा आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में जीवित है. आधुनिक रासायनिक रंगों के बीच पलाश का प्राकृतिक रंग मानो हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण देता है.

लोकसाहित्य में पलाश का स्थान अत्यंत भावुक है. भोजपुरी, अवधी, बुंदेली और छत्तीसगढ़ी गीतों में पलाश प्रेम, विरह और प्रतीक्षा का प्रतीक है. कहीं यह प्रिय की लाल चुनरी बन जाता है, तो कहीं विरहिणी नायिका के हृदय की ज्वाला.

पलाश का फूल देखने वाला व्यक्ति अनायास ही ठहर जाता है. उसकी दृष्टि कुछ क्षणों के लिए संसार से कट जाती है. लाल-नारंगी पंखुड़ियों में जैसे सूर्य का अंश समा गया हो. यह रंग केवल आँखों को नहीं, आत्मा को भी आलोकित करता है.

पलाश की छाल, फूल और बीज आयुर्वेद में औषधि की तरह इस्तेमाल तो होते हैं ही, रक्तशोधक, सूजन-नाशक और त्वचा रोगों में इसका प्रयोग प्राचीन काल से होता आया है.

पलाश केवल एक पेड़ नहीं, एक ऋतु है. यह वसंत का घोष है, इतिहास की स्मृति है, साहित्य की पंक्ति है, लोकगीत की धुन है और साधना की अग्नि है. इसके फूलों में भारत की आत्मा झलकती है — रंगों में, विश्वास में, परंपरा में और सौंदर्य में.

जब अगली बार आप कहीं निर्जन पथ पर पलाश को दहकते देखें, तो क्षणभर ठहर जाइए. समझिए कि यह केवल प्रकृति का दृश्य नहीं, बल्कि सदियों से बहती भारतीय संस्कृति की मौन कविता है, जो बिना शब्दों के भी बहुत कुछ कह जाती है.