Thursday, October 4, 2007
प्याज महंगे होने का सकारात्मक पहलू.
लोग प्याज के मंहगे होने पर चिल्ला रहे हैं। कह रहे हैं सरकार को ध्यान देना चाहिए। सरकार ध्यान दे रही है। सरकार कामकाज छोड़कर प्याज बिकवा रही है। अब पुलिस वाले घर-घर जाकर प्याज बांटेंगे। धमकाकर कहेंगे.. प्याज ले जा किलो भर वरना थाने आकर हाजिरी बजानी होगी, हफ़्ते में दो बार। लोग पहले प्याज काट कर रोते थे। अब प्याज खरीदते वक्त रोते हैं। रोना लोगो की आदत में शुमार है। हर वक्त रोना , सरकार कुछ करे तब भी, ना कर तब तो रोएंगे ही। बहरहाल, ग्लास के खाली होने की तरह क्यों नहीं लेते हम इस घटना को। सरकार असली रामभक्त है। जय श्री राम रमेश की तरह। हिंदू धर्म का मर्म जानने वालों से पूछिए... प्याज गरम भोजन माना जाता है। विधवाओं के लिए प्याज पहले ही वर्जित है। मांस बनाएंगे तो प्याज डाले बिना काम चलेगा क्या? प्याज महंगा होगा तो लोग खरीदेंगे नहीं। सरकार को प्याज विदेशो में बेचने के लिए मुहैया हो जाएगा। देश में विदेशी मुद्रा की आमद बढ़ेगी। देश का विकास होगा। और आप कैसे देश भक्त हैं जो देश का विकास नहीं चाहते। प्याज न खरीद कर आप जिन रुपयों की बचत करेंगें उसे बैंक में डाल दें। मुंडी में बात घुसी कूढ़मगज....प्याज के दाम ब़ढ़ेंगे तो किसानों का फायदा होगा। भारत गांवों और किसानों का देश है, शषहर का पैसा दल्लो क मार्फत किसानों तक पहुंचेगा। धन का विकेंद्रीकरण होगा। लेनिन के केशविशेषों, देखो सरकार गरीबों के हित में किस तरह से काम कर रही है। चोरी-चोरी, चुपके-चुपके। किसी को पता भी नहीं चलेगा और छिपे छिपे देश का विकास भी होता रहेगा। प्याज-लहसुन नहीं खाना, मांसाहार न करना, मदिरापान न करना ये सब तो हिंदू धर्म की प्रमुख निशानियां हैं। सरकार उसी को बढ़ावा दे रही है। यह वही सरकार है, जिसने कुछ साल पहले राम लला के मंदिर का ताला खुलवाया था। जिसके एक और मुखिया ने विवाद्स्पद ढांचे के गिरने पर चुप्पी साध ली थी। अब वही सरकार प्याज मंहगा करके तुम्हे जीवन शैली की शुद्ध हिंदूवादी शैली सुझ रही है। और तुम हो कि मानने को तैयार नहीं, हल्ला मचाने वाले बेवकूफों सरकार की मंशा को समझो..... प्याज मंहगा होने दो। देश केविकास में अपना मौन योगदान दो।
Wednesday, October 3, 2007
कुछ और भी...इच्छाएँ जो छूट गईं..
सुशांत झा एक संवेदनशील पत्रकार हैं। मेरी गांधीगीरी.. पर उनने कुछ और जोड़ा है, हम सादर उनकी उन इच्छाओं को जो मेरी भी हैं, और कलमबद्ध होते-होते रह गई थीं- और जिसे उनने लिख भेजा है-छाप रहे हैं।
भाई कुछ और क़समें रह गई हैं..जैसे..मैं डीलमेकर बनूंगा. हाईवे से लेकर डिफेंस तक में कुलांचे भरूंगा. मैं हार्स ट्रेडिंग करूंगा। मैं मिशन (???) पत्रकारिता करूंगा। मैं क्रिश्चियन से लेकर .. संघ के कुनबे तक की सैर करूंगा...और कम से कम एक अदद एनजीओ तो होगा ही..जिसकी मेंबर सिर्फ मेरी पत्नी और मेरी मां होगी..
मैं किसी एजुकेशनल ट्रस्ट से लेकर कृषि विकास केंद्र तक का चेयरमैन हो सकता हूं...उम्र के अंतिम दशक में मैं किसी मास क़ॉम इंस्टिट्यूट में प्रोफेसर या किसी पॉलिटिकल पार्टी या नामी पॉलिटिशयन का स्पोकपर्सन भी हो सकता हूं। मैं शपथ खाता हूं कि मैं अपने हिंदी मीडियम में पढ़ने का कलंक धो दूंगा और मेरे बच्चे किसी स्कॉलरशिप पर विदेशी डिग्री ही हासिल करेंगे। मेरी एक मात्र अंतिम इच्छा राज्य सभा में मनोनीत सदस्य बनने की है। या नहीं तो प्रसार भारती के मेंबरशिप से भी मैं संतुष्ट हो सकता हूं।
मैं बहुत लालची नहीं हूं...मैं चाहूंगा कि लोग मुझे मरने के बाद एक प्रसिद्ध बुद्धिजीवी के रूप में याद करें जिसने समाज और पत्रकारिता को नई ऊंचाईयां दी...और कि मेरे मरने के बाद ये शून्य लोगों को बहुत खलेगा...आमीन।।
भाई कुछ और क़समें रह गई हैं..जैसे..मैं डीलमेकर बनूंगा. हाईवे से लेकर डिफेंस तक में कुलांचे भरूंगा. मैं हार्स ट्रेडिंग करूंगा। मैं मिशन (???) पत्रकारिता करूंगा। मैं क्रिश्चियन से लेकर .. संघ के कुनबे तक की सैर करूंगा...और कम से कम एक अदद एनजीओ तो होगा ही..जिसकी मेंबर सिर्फ मेरी पत्नी और मेरी मां होगी..
मैं किसी एजुकेशनल ट्रस्ट से लेकर कृषि विकास केंद्र तक का चेयरमैन हो सकता हूं...उम्र के अंतिम दशक में मैं किसी मास क़ॉम इंस्टिट्यूट में प्रोफेसर या किसी पॉलिटिकल पार्टी या नामी पॉलिटिशयन का स्पोकपर्सन भी हो सकता हूं। मैं शपथ खाता हूं कि मैं अपने हिंदी मीडियम में पढ़ने का कलंक धो दूंगा और मेरे बच्चे किसी स्कॉलरशिप पर विदेशी डिग्री ही हासिल करेंगे। मेरी एक मात्र अंतिम इच्छा राज्य सभा में मनोनीत सदस्य बनने की है। या नहीं तो प्रसार भारती के मेंबरशिप से भी मैं संतुष्ट हो सकता हूं।
मैं बहुत लालची नहीं हूं...मैं चाहूंगा कि लोग मुझे मरने के बाद एक प्रसिद्ध बुद्धिजीवी के रूप में याद करें जिसने समाज और पत्रकारिता को नई ऊंचाईयां दी...और कि मेरे मरने के बाद ये शून्य लोगों को बहुत खलेगा...आमीन।।
मुहब्बत की राह में...
आज हमने टीवी पर एक एंकर को देखा। टीवी दे्खे तो एंकर ही दिखती है। एकर पुलिंग भी हैं, और स्त्रीलिंग भी। लेकिन मज़ा सिर्फ स्त्रीलिंग को ही देखने में आता है। हमारे एक दोस्त हैं, बेसाख्ता उनके मुंह से कुछ असंसदीय निकल गया। स्त्री-पुरुष संबंधों पर उनके बेबाक बयानों और उन अंतरंग क्षणों का विवरण सुनकर कान मधुमय ोह जाते हैं. लब्बोलुआब ये कि हमारे जिगर पर छुरी चल गई।
लड़कों के पास एक अदद जिगर होता है। जो आम तौर पर छुरियों के नीचे पड़ा होता है। लड़की देखी नहीं कि जिगर पर छुरी चल जाती है। मेरे एक और दोस्त है। (मेरे दोस्तों की संख्या पर कृपया सवाल खड़े न करें, वे बहुत सारे और बहुत तरह के हैं।) तो हजरत, मेरे दोस्त लड़कियों को लेकर बहुत उत्साहित रहते हैं। कैंटीन ले जाकर उन लड़कियों को चाहे वे इंटर्न ही क्यों न हो चाय पिलाना उनका शगल है। ये बात दीगर है कि हमें ये हमारी तरह के लद्दू दूसरे लड़कों को उन्होंने पानी तक के लिए नहीं पूछा है। अस्तु, लड़की ने उन्हें देखा, लड़की ने जींस पहनी है, लड़की ने खांसा, लड़की के बाल लंबे हैं, लड़की के बाल छोटे हैं, लड़की सलवार सूट में है, लड़की छत पर आई, लड़की ने दुपट्टा पहना है, नहीं पहना है, लड़की ने उन्हें देख कर थूका नहीं, लड़की ने समय बताया, लड़की लड़की है. बस इतना ही काफी है। लड़की का लड़की होना ही काफी है, बाकी उद्दीपन वे खुद स्थापित कर लेते हैं।
लड़कियों को हम भी टापते रहे उम्र भर। लेकिन किसी ने घास नहीं डाली। उनमें क्या कला है, कि वे सीधे लड़कियों को लेकर अंसल प्लाजा का रुख कर लेते हैं। हम फ्रस्टिया रहे हैं। फ्रस्टियाए भी क्यों न... दरअसल, उम्र के एक खास मोड़ तक आदमी हीर-रांझा, लैला-मजनूं के उल्टे-सीधे किस्से पढ़कर इसी गफलत में रहता है कि प्यार किया नहीं जाता हो जाता है। लेकिन बाद में जब लड़कियां धड़ाधड़ दूसरे लोगों की बांहो इत्यादि में जाने लगती हैँ। तो उसे इस बात का , इस शाश्वत सत्य का भान होता है कि प्यार होता नहीं, वरन तिकड़म और जुगाड़ की हद तक जाकर किया जाता है। उसके लिए फील्डींग करवानी होती है। प्यार हो जाना एक बात है और उसे निभा पाना जिसे खराब भाषा में खींच पाना दूसरी बात है। क्यों कि इसमें पैसे लगते हैं।
महर्षि मार्क्स ने बहुत पहले कह दिया था कि लव इज़ मॉडिफाइड इकॉनमिक रिलेशन... यानी प्यार रूपांतरित आर्थिक संबंध हैं। आपका क्या विचार है?....
लड़कों के पास एक अदद जिगर होता है। जो आम तौर पर छुरियों के नीचे पड़ा होता है। लड़की देखी नहीं कि जिगर पर छुरी चल जाती है। मेरे एक और दोस्त है। (मेरे दोस्तों की संख्या पर कृपया सवाल खड़े न करें, वे बहुत सारे और बहुत तरह के हैं।) तो हजरत, मेरे दोस्त लड़कियों को लेकर बहुत उत्साहित रहते हैं। कैंटीन ले जाकर उन लड़कियों को चाहे वे इंटर्न ही क्यों न हो चाय पिलाना उनका शगल है। ये बात दीगर है कि हमें ये हमारी तरह के लद्दू दूसरे लड़कों को उन्होंने पानी तक के लिए नहीं पूछा है। अस्तु, लड़की ने उन्हें देखा, लड़की ने जींस पहनी है, लड़की ने खांसा, लड़की के बाल लंबे हैं, लड़की के बाल छोटे हैं, लड़की सलवार सूट में है, लड़की छत पर आई, लड़की ने दुपट्टा पहना है, नहीं पहना है, लड़की ने उन्हें देख कर थूका नहीं, लड़की ने समय बताया, लड़की लड़की है. बस इतना ही काफी है। लड़की का लड़की होना ही काफी है, बाकी उद्दीपन वे खुद स्थापित कर लेते हैं।
लड़कियों को हम भी टापते रहे उम्र भर। लेकिन किसी ने घास नहीं डाली। उनमें क्या कला है, कि वे सीधे लड़कियों को लेकर अंसल प्लाजा का रुख कर लेते हैं। हम फ्रस्टिया रहे हैं। फ्रस्टियाए भी क्यों न... दरअसल, उम्र के एक खास मोड़ तक आदमी हीर-रांझा, लैला-मजनूं के उल्टे-सीधे किस्से पढ़कर इसी गफलत में रहता है कि प्यार किया नहीं जाता हो जाता है। लेकिन बाद में जब लड़कियां धड़ाधड़ दूसरे लोगों की बांहो इत्यादि में जाने लगती हैँ। तो उसे इस बात का , इस शाश्वत सत्य का भान होता है कि प्यार होता नहीं, वरन तिकड़म और जुगाड़ की हद तक जाकर किया जाता है। उसके लिए फील्डींग करवानी होती है। प्यार हो जाना एक बात है और उसे निभा पाना जिसे खराब भाषा में खींच पाना दूसरी बात है। क्यों कि इसमें पैसे लगते हैं।
महर्षि मार्क्स ने बहुत पहले कह दिया था कि लव इज़ मॉडिफाइड इकॉनमिक रिलेशन... यानी प्यार रूपांतरित आर्थिक संबंध हैं। आपका क्या विचार है?....
Tuesday, October 2, 2007
मेरी गांधीगीरी.....
गांधी जी की जय। मेरी भी। गांधी जी का जन्मदिन सारे देश ने मनाया। लोगों ने भाषण दिए। मेरी मां भी मेरा जन्मदिन मनाती है। खीर और गाजर का हलवा हर हिंदी फिल्म के नायक की तरह मुझे भी पसंद है, सो वह बना देती है। कहती है, निठल्ले ठूंस ले। मैं कहता हूं कि अम्मां, अब मैं निठल्ला नहीं ठहरा.. काम करता हूं। लेकिन दूसरों की तरह मेरी मां भी मेरे काम को अहमियत नहीं देती। बहरहाल, मेरी गांधीगीरी वहीं से शुरु होती है। मैं सारे का सारा मयगाली के खा जाता हूं। बिना शिकायत किए।
तो गांधी की इस जयंती पर मैं अपनी गांधीगिरी चालू रखने की कसम खाता हूं। मैं कसम खाता हूं कि मैं हमेशा दूसरे चैनलों के भूत-प्रेत, नाग-नागिन, हनुमान के आंसू, भीम की शर्ट-पैंट, नालियों में हिरे-पड़े बच्चों, मियां-बीवी की बेडरूम में होने वाली लड़ाईयों की, झांसी की रानी के पुनर्जन्म की कहानियों पर आधारित आधा घंटा खिंचाऊं घंटा टाइफ प्रोग्रामोंं की न सिर्फ निंदा करूंगा। बल्कि खिल्ली उड़ाने की हद तक करूंगा। साथ मन ही मन मैं उस चैनल में काम करने की जुगत भिडा़ता रहूंगा। मैं हमेशा उन्हें यह कह कर कोसूंगा कि चूतियों ने पत्रकारिता का तिया-पांचा कर रखा है। लेकिन मैं हर महीने अपना सीवी उनके चैनल हैड को फारवर्ड किया करूंगा।
मैं ये भी कसम खाता हूं कि राइटर्स से आने वाले फीड में शकीरा और ब्रिटनी स्पियर्स जासी मादक मादाओं के गुदाज़ बदन का, उनके मांसल बदन का सिर्फ एडिट बे में छिपकर लाग किया करूंगा, गो कि यह हमारे चैनल में दिखाया नहीं जा सकता। बाद में मैं सीना ठोंक कर कह सकता हूं कि बहन..चो.. हम उल्टा-सीधा नहीं दिखाते।
बाद में जब मैं सीनियर हो जाऊंगा, तो अपने जूनियरों को यह कह कर हड़काऊंगा कि जो कवरेज जो रिपोर्ट हमने की तुम क्या तुम्हारे पुरखे भी नहीं कर सकते। अगर जूनियर २३-२४ साल का हुआ तो उसे यह कहूंगा कि जितनी तुम्हारी उमर नहीं, उतने दिनों से तो मैं मीडिया में कवरेज कर रहा हूं। मैं कोशिश करूंगा कि सभी मंत्रियों, सभासदो, पार्षदों, सांसदों, विधायकों, उन सबकी पत्नियों, सालों, बहनोईयों के चरण रज का वंदन किया करूं, ताकि वक्त आने पर वो मुझे बाईट दे दिया करें।
मैं ये भी कसम खाता हूं कि कभी किसी प्रकाश झा की तुलना राम गोपाल वर्मा से करके अपनी भद नही पिटवाऊंगा। ताकि दोनों के प्रशंसक मुझसे नाराज़ न हों। और मेरी हर जगह पैठ बनी रहे। आगे से मैं जो भी लिखूंगा, लोगों को खुश करने के लिए लिखूंगा। किसी को नाराज़ नहीं करूंगा। हां, मशहूर होने के लिए रचनाएं ( अच्छी हो या बुरी, कोई फरक नहीं पड़ता) चुरा कर छपवाऊंगा, क्योकि कि पुरस्कार लोगों को मशहूर बनाता है। इसके लिए मैं हिंदी का क्षेत्रीय भाषाई होने का पुरस्कार भी बिना विरोध किए ले लूंगा, क्योंकि मुझे तो मशहूर बनना है।
हां एक और आइडिया है.. सार्वजनिक मंचो पर और नोबेल प्राप्त सर विदिया की तरह बापू की बुराई करके भी मैं मशहूर हो सकता हूं। तो आप मेरे मशहूर होने का इंतज़ार कीजिए। मैं किसी अच्छी रचना की जुगाड़ में हूं।
तो गांधी की इस जयंती पर मैं अपनी गांधीगिरी चालू रखने की कसम खाता हूं। मैं कसम खाता हूं कि मैं हमेशा दूसरे चैनलों के भूत-प्रेत, नाग-नागिन, हनुमान के आंसू, भीम की शर्ट-पैंट, नालियों में हिरे-पड़े बच्चों, मियां-बीवी की बेडरूम में होने वाली लड़ाईयों की, झांसी की रानी के पुनर्जन्म की कहानियों पर आधारित आधा घंटा खिंचाऊं घंटा टाइफ प्रोग्रामोंं की न सिर्फ निंदा करूंगा। बल्कि खिल्ली उड़ाने की हद तक करूंगा। साथ मन ही मन मैं उस चैनल में काम करने की जुगत भिडा़ता रहूंगा। मैं हमेशा उन्हें यह कह कर कोसूंगा कि चूतियों ने पत्रकारिता का तिया-पांचा कर रखा है। लेकिन मैं हर महीने अपना सीवी उनके चैनल हैड को फारवर्ड किया करूंगा।
मैं ये भी कसम खाता हूं कि राइटर्स से आने वाले फीड में शकीरा और ब्रिटनी स्पियर्स जासी मादक मादाओं के गुदाज़ बदन का, उनके मांसल बदन का सिर्फ एडिट बे में छिपकर लाग किया करूंगा, गो कि यह हमारे चैनल में दिखाया नहीं जा सकता। बाद में मैं सीना ठोंक कर कह सकता हूं कि बहन..चो.. हम उल्टा-सीधा नहीं दिखाते।
बाद में जब मैं सीनियर हो जाऊंगा, तो अपने जूनियरों को यह कह कर हड़काऊंगा कि जो कवरेज जो रिपोर्ट हमने की तुम क्या तुम्हारे पुरखे भी नहीं कर सकते। अगर जूनियर २३-२४ साल का हुआ तो उसे यह कहूंगा कि जितनी तुम्हारी उमर नहीं, उतने दिनों से तो मैं मीडिया में कवरेज कर रहा हूं। मैं कोशिश करूंगा कि सभी मंत्रियों, सभासदो, पार्षदों, सांसदों, विधायकों, उन सबकी पत्नियों, सालों, बहनोईयों के चरण रज का वंदन किया करूं, ताकि वक्त आने पर वो मुझे बाईट दे दिया करें।
मैं ये भी कसम खाता हूं कि कभी किसी प्रकाश झा की तुलना राम गोपाल वर्मा से करके अपनी भद नही पिटवाऊंगा। ताकि दोनों के प्रशंसक मुझसे नाराज़ न हों। और मेरी हर जगह पैठ बनी रहे। आगे से मैं जो भी लिखूंगा, लोगों को खुश करने के लिए लिखूंगा। किसी को नाराज़ नहीं करूंगा। हां, मशहूर होने के लिए रचनाएं ( अच्छी हो या बुरी, कोई फरक नहीं पड़ता) चुरा कर छपवाऊंगा, क्योकि कि पुरस्कार लोगों को मशहूर बनाता है। इसके लिए मैं हिंदी का क्षेत्रीय भाषाई होने का पुरस्कार भी बिना विरोध किए ले लूंगा, क्योंकि मुझे तो मशहूर बनना है।
हां एक और आइडिया है.. सार्वजनिक मंचो पर और नोबेल प्राप्त सर विदिया की तरह बापू की बुराई करके भी मैं मशहूर हो सकता हूं। तो आप मेरे मशहूर होने का इंतज़ार कीजिए। मैं किसी अच्छी रचना की जुगाड़ में हूं।
संजय की लो ( वो वाला नहीं)..
आज ऐसा हुआ कि ... माफ कीजिए, भावनाओं में बहकर ५ डब्ल्यू और १ एच को भूल गया। प्राईवेट चैनलों की तरह। गुस्ताख़ जो हूं। बहरहाल, संजय दत्त को गांधीगीरी के लिए स्पाइस ने ग्लोबल स्प्लेंडर अवार्ड दिया। जगद्-गुरु शंकराचार्य दिव्यानंद को भी दिया। गांधी जी के विचारों को फैलाने के लिए ये पुरस्कार दिया जाता है। मोहसिना किदवई बूटा सिंह जैसे बुजुर्ग और ज्योतिरादित्य जैसे नौजवान नेता भी थे और विचारवान् संपादक मृणाल पांडे जैसी शख्सियत भी। प्राईवेट चैनलों में संजू बाबा को लाइव करने की होड़ मची थी। टिक-टैक के लिए मारा-मारी। नेताओं को लोग भूल गए। शंकराचार्य को बोलने का बुलावा मिला। चैनलों की सुंदर-युवा-कमसिन-नाजुक बदन-मीठी आवाज़ वाली-तेज़तर्रार रिपोर्टरों ने तुरंत हाथ.... माफ करें ऊंगलियों से कैंची बनाकर अपने कैमरामैन को रिकार्डिंग रोक देने को कहा। शंकराचार्य ने पहले संस्कृत में फिर अंग्रेज़ी मे धाराप्रवाह गांधीवादी विचारधारा पर बोलना शुरु किया। रिपोर्टर कहने लगी, बोल तो अच्छा रहा है, लेकिन इसे कवर करने में कोई न्यूज़ सेंस नहीं। खैर... थोड़ी देर बाद संजू बाबा वल्द सुनील दत्त मंच पर नमूदार हुए। रिपोर्टरों के बीच हल्ला मच गया। लो.. लो .. संजय की लो। मैंने कहा ले लो, ले लो, संजू की ले लो। लेकिन गुरु घंटालों, न्यूज़ की मत लो। संजय की जय। बाकी सब परास्त।
Monday, October 1, 2007
स्वयंवर के मेले में...
स्वयंवर के मेले में...
बहरहाल, ताबीज पहनने की मेरी ज़िद के बाद हम मय गाड़ी दूरदर्शन अहमदाबाद पहुंचे। यह कहने में मुझे कोईगुरेज़ नहीं कि डीडी के इस केंद्र की स्थिति दूसरे रीज़नल न्यूज़ यूनिट के मुकाबले बेहतर है। मेरे कहने का गर्ज ये कि कैंटीन के खानें में मुझे काकरोच नहीं दिखे। खाने से बास भी नहीं आ रही थी। मुझे निराशा हुई। अहमदाबाद डीडी के गेस्ट हाउस में बहुत झिझकते हुए मुझे एक कमरा दे दिया गया। कमरा कोई खास तरह से साफ़ नहीं था। बरसात का मौसम था यह साफ दिख रहा था क्योंकि कमरे को खोलते ही कई मेंढक मेरी तरफ लपके।
खैर काफी जद्दोजहद करने के बाद मुझे तरनेतर- जो कि ज़िला सुरेंद्रनगर में है. राजकोट के पास- भेजने के लिए इंतज़ामात किए गए। उनका कहना था कि हमने इसे स्थानीय स्तर पर सन १९९४ में खूब कवर किया था और अब इसे दोबारा २००७ में कवर करने का कोई औचित्य नहीं। पर मेरे गुणसूत्रों का दोष.. मैंने फिर ज़िद पकड़ ली। कि यह सवरेज तो मुझे करनी बही है। मैं अपने बास से वादा कर आया था। एक नई तरह की रिपोर्टर्स डायरी देने का।
गाड़ी मिली। ड्राइवर भी। वही जिसने मेरे ताबीज पर बवाल काटा था। एक कैमरा-कम-लाइटिंग असिटेंट। एक साउंड तकनीशियन। और हां... एक उनींदा कैमरामैन .. जो सारी राह मुझे इस बेकार की मगजमारी में न पड़ने की सलाह देता रहा। धूप सीधे चेहरे पर पड़ती रही। शाम के वक्त हम तरनेतर पहुंचे। शानदार सड़क। चौड़ी। हरियाली..गो कि बरसात का मौसम था। लेकिन पेड़ ज़्यादा बड़े नहीं। नाटे। सीधे मेले की जगह पर पहुंचे। मेले की जगह में सुगबुगाहट शुरु हो चुकी थी। चरखियां लगने लगीं थी। दुकानों के लिए बल्लियां लगाई जा रही थी। लोग बाग एक खास तरह की गाड़ी छकड़े से आ जा रहे थे। आगे से मोटरसाइकिल, पीछे से उसमें तांगा जोड़ दिया जाए तो क्या दोगली गाड़ी बनेगी.. वही। एक गाडी में पचीस-सत्ताइस लोग। उस भीड़ में घुस कर पिसते हुए सफर करने का लुत्फ ही क्या है।
मेले की जगह पर ज़्यादा कुछ नहीं थी। हमें पीने का पीन भी नहीं मिला। जो भी था खारा। लेकिन लोग बड़े मीठे थे। बाहर से आया जानकर और अधिक मदद करते। दुकानें भी देखी। हर जगह मौदी के कट-आउट। बड़ी होर्डिंग्ज़। मौदीमय गुजरात। कहीं गांधी नहीं। मन बुझ गया।
जारी....
बहरहाल, ताबीज पहनने की मेरी ज़िद के बाद हम मय गाड़ी दूरदर्शन अहमदाबाद पहुंचे। यह कहने में मुझे कोईगुरेज़ नहीं कि डीडी के इस केंद्र की स्थिति दूसरे रीज़नल न्यूज़ यूनिट के मुकाबले बेहतर है। मेरे कहने का गर्ज ये कि कैंटीन के खानें में मुझे काकरोच नहीं दिखे। खाने से बास भी नहीं आ रही थी। मुझे निराशा हुई। अहमदाबाद डीडी के गेस्ट हाउस में बहुत झिझकते हुए मुझे एक कमरा दे दिया गया। कमरा कोई खास तरह से साफ़ नहीं था। बरसात का मौसम था यह साफ दिख रहा था क्योंकि कमरे को खोलते ही कई मेंढक मेरी तरफ लपके।
खैर काफी जद्दोजहद करने के बाद मुझे तरनेतर- जो कि ज़िला सुरेंद्रनगर में है. राजकोट के पास- भेजने के लिए इंतज़ामात किए गए। उनका कहना था कि हमने इसे स्थानीय स्तर पर सन १९९४ में खूब कवर किया था और अब इसे दोबारा २००७ में कवर करने का कोई औचित्य नहीं। पर मेरे गुणसूत्रों का दोष.. मैंने फिर ज़िद पकड़ ली। कि यह सवरेज तो मुझे करनी बही है। मैं अपने बास से वादा कर आया था। एक नई तरह की रिपोर्टर्स डायरी देने का।
गाड़ी मिली। ड्राइवर भी। वही जिसने मेरे ताबीज पर बवाल काटा था। एक कैमरा-कम-लाइटिंग असिटेंट। एक साउंड तकनीशियन। और हां... एक उनींदा कैमरामैन .. जो सारी राह मुझे इस बेकार की मगजमारी में न पड़ने की सलाह देता रहा। धूप सीधे चेहरे पर पड़ती रही। शाम के वक्त हम तरनेतर पहुंचे। शानदार सड़क। चौड़ी। हरियाली..गो कि बरसात का मौसम था। लेकिन पेड़ ज़्यादा बड़े नहीं। नाटे। सीधे मेले की जगह पर पहुंचे। मेले की जगह में सुगबुगाहट शुरु हो चुकी थी। चरखियां लगने लगीं थी। दुकानों के लिए बल्लियां लगाई जा रही थी। लोग बाग एक खास तरह की गाड़ी छकड़े से आ जा रहे थे। आगे से मोटरसाइकिल, पीछे से उसमें तांगा जोड़ दिया जाए तो क्या दोगली गाड़ी बनेगी.. वही। एक गाडी में पचीस-सत्ताइस लोग। उस भीड़ में घुस कर पिसते हुए सफर करने का लुत्फ ही क्या है।
मेले की जगह पर ज़्यादा कुछ नहीं थी। हमें पीने का पीन भी नहीं मिला। जो भी था खारा। लेकिन लोग बड़े मीठे थे। बाहर से आया जानकर और अधिक मदद करते। दुकानें भी देखी। हर जगह मौदी के कट-आउट। बड़ी होर्डिंग्ज़। मौदीमय गुजरात। कहीं गांधी नहीं। मन बुझ गया।
जारी....
सुपर्ब, फैंटास्टिक, माइंडब्लोइंग...चौथा क्या था...
सुपर्ब, फैंटास्टिक, माइंडब्लोइंग...चौथा क्या था... चौथा विशेषण जो एक रियलिटी शो के माननीय जज इस्तेमाल में लाते हैं वह खुद अपने लिए ही इस्तेमाल करें तो बेहतर। वैसे ज़ी टीवी का यह शो उसके मक़ाबले में खड़े दूसरे चैनलों की बनिस्पत ठीक है, लेकिन महोदय क्या ऐसे शो सचमुच टैलेंट यानी प्रतिभा की खोज कर सकते हैं।
जानकारों का (कु)तर्क होगा कि ऐसे ही एक शो की वजह से श्रेया घोषाल और कुणाल गंजावाला जैसी प्रतिभाएं आज लोगों की नज़र में आई हैं। अजी हजरत, उन शोज़ के जज कौन थे यह ग़ौर किया है कभी आपने? पं जसराज ौर रविशंकर जैसे संगीत के जानकार। वैसे हम ये भी नहीं मानते कि दुनिया का सबसे अच्छा संगीत भारतीय शास्त्रीय संगीत ही है, न ही हम ये मानते हैं कि पश्चिमी संगीत में कोई खामी है। लेकिन बड़ी संजीदगी से हम ये मानते हैं कि संगीत जैसी कठिन विधा के लिए रियाज़ की बहुत ज़रूरत होती है। ये सत्रह-अठारह साल के लौंडे कल .. माफ कीजिएगा आज ही इतने मशहूर हो गए हैं कि आज के बाद तो उन्हें लाइव कंसर्ट से फुरसत नहीं मिलेगी। रियाज़ कब करेंगे?
बहरहाल, बात जजों की...। ज़ी टीवी की बात पहले क्यों कि उसका शो टीआर पी रेंटिंग में मेरी जानकारी के मुताबिक अव्वल नंबर पर है। इसके जजेज़ थे, बप्पी लाहिरी, विशाल-शेखर, इस्माइल दरबार, हिमेश बाबा... जिनने अस्सी की दशक के फिल्मी संगीत को सुना है, उनको खयाल होगा कि भारतीय खासकर हिंदी फिल्मों में संगीत के स्तर पर गंद मचाने का सेहरा बप्पी दा के सिर पर ही सजेगा। धुन चोरी के उस्ताद। फिल्में अब कोई देता नहीं.. गुरु उनसे बड़े धुन चोर आ गए हैं इंडस्ट्री में ..ऐसे में कौन पूछेगा उनको? सो अब इन शोज़ के ज़रिए अपनी दुकान फिर सजाने की फिराक में हैं। अस्तु..
इस्माइल दरबार.. बाल बड़े कर लेने से कोई संगीतकार हो जाता तो हमारे गांव का फेंकू भी संगीतकार है। हारमोनियम पर जब दिल ही टूट गया पिछले चौदह साल से बजा रहा है। बाल उसके इस्माइल दरबार से भी बड़े हैं। दाढी भी बढी हुई है। जिस निंबूड़ा-निंबूड़ा गाने को अपना बना कर दरबार ने इंडस्ट्री में अपनी गोटी फिट कर ली है, वह राजस्थान की बहुत लोकप्रिय धुन और लोकगीत है। आने वाली फिल्म सांवरिया का संगीत भी उनने ही दिया है। टाइटस सांग तो साधारण ही लग रहा है मुझे।
विशाल-शेखर संगीत के मामले में इन सबके मुक़ाबले बेहतर हैं. लेकिन यह जज बनने की उनकी योग्यता साबित नहीं करता। बचे हिमेश बाबा.. घर पर चिमटा भूल आएं. तो जनाब से गुनगुनाया भी ना जाए। उनके संगीत को बेहद लोकप्रिय माना जाता है। है भी। लेकिन ज़्यादा नहीं.. ठीक तीन साल बाद उनके गाने कितने लोगों को याद रहेंगे.. हम भी देखेंगे। आप भी देखिएगा।
बचे प्रतियोगी। इन रि.यलिटी शोज़ ने उन्हें लोकप्रिय बेशक बनाया है। अलबत्ता, ये लोकप्रियतता कितने दिन कायम रहती है, ये देखना दिलचस्प होगा। क्या आपको पहले इंडियन आइडल का नाम याद है? और जो रनर अप रहा था उसका? इंडियन आइडल- द्वितीय के विजेता और रनर अप का? नहीं ना? तो इन लड़कों को भी उसी कतार में शामिल हुआ मान लीजिए। रियाज़ का कोई विकल्प नहीं। कामयाबी का कोई शार्टकट नहीं होता। आप परदे से गायब हुए और जनता बिसरा जाएगी उसको। देश के लिए जान देने वाले गांधी को भूलने में देर नहीं करती है हमारी जनता तो बीकानेर के राजा और लखनऊ के गुटखा साईज़ पावर प्लांट पूनम यादव को कौन याद रखेगा? हम तो नहीं...।
जानकारों का (कु)तर्क होगा कि ऐसे ही एक शो की वजह से श्रेया घोषाल और कुणाल गंजावाला जैसी प्रतिभाएं आज लोगों की नज़र में आई हैं। अजी हजरत, उन शोज़ के जज कौन थे यह ग़ौर किया है कभी आपने? पं जसराज ौर रविशंकर जैसे संगीत के जानकार। वैसे हम ये भी नहीं मानते कि दुनिया का सबसे अच्छा संगीत भारतीय शास्त्रीय संगीत ही है, न ही हम ये मानते हैं कि पश्चिमी संगीत में कोई खामी है। लेकिन बड़ी संजीदगी से हम ये मानते हैं कि संगीत जैसी कठिन विधा के लिए रियाज़ की बहुत ज़रूरत होती है। ये सत्रह-अठारह साल के लौंडे कल .. माफ कीजिएगा आज ही इतने मशहूर हो गए हैं कि आज के बाद तो उन्हें लाइव कंसर्ट से फुरसत नहीं मिलेगी। रियाज़ कब करेंगे?
बहरहाल, बात जजों की...। ज़ी टीवी की बात पहले क्यों कि उसका शो टीआर पी रेंटिंग में मेरी जानकारी के मुताबिक अव्वल नंबर पर है। इसके जजेज़ थे, बप्पी लाहिरी, विशाल-शेखर, इस्माइल दरबार, हिमेश बाबा... जिनने अस्सी की दशक के फिल्मी संगीत को सुना है, उनको खयाल होगा कि भारतीय खासकर हिंदी फिल्मों में संगीत के स्तर पर गंद मचाने का सेहरा बप्पी दा के सिर पर ही सजेगा। धुन चोरी के उस्ताद। फिल्में अब कोई देता नहीं.. गुरु उनसे बड़े धुन चोर आ गए हैं इंडस्ट्री में ..ऐसे में कौन पूछेगा उनको? सो अब इन शोज़ के ज़रिए अपनी दुकान फिर सजाने की फिराक में हैं। अस्तु..
इस्माइल दरबार.. बाल बड़े कर लेने से कोई संगीतकार हो जाता तो हमारे गांव का फेंकू भी संगीतकार है। हारमोनियम पर जब दिल ही टूट गया पिछले चौदह साल से बजा रहा है। बाल उसके इस्माइल दरबार से भी बड़े हैं। दाढी भी बढी हुई है। जिस निंबूड़ा-निंबूड़ा गाने को अपना बना कर दरबार ने इंडस्ट्री में अपनी गोटी फिट कर ली है, वह राजस्थान की बहुत लोकप्रिय धुन और लोकगीत है। आने वाली फिल्म सांवरिया का संगीत भी उनने ही दिया है। टाइटस सांग तो साधारण ही लग रहा है मुझे।
विशाल-शेखर संगीत के मामले में इन सबके मुक़ाबले बेहतर हैं. लेकिन यह जज बनने की उनकी योग्यता साबित नहीं करता। बचे हिमेश बाबा.. घर पर चिमटा भूल आएं. तो जनाब से गुनगुनाया भी ना जाए। उनके संगीत को बेहद लोकप्रिय माना जाता है। है भी। लेकिन ज़्यादा नहीं.. ठीक तीन साल बाद उनके गाने कितने लोगों को याद रहेंगे.. हम भी देखेंगे। आप भी देखिएगा।
बचे प्रतियोगी। इन रि.यलिटी शोज़ ने उन्हें लोकप्रिय बेशक बनाया है। अलबत्ता, ये लोकप्रियतता कितने दिन कायम रहती है, ये देखना दिलचस्प होगा। क्या आपको पहले इंडियन आइडल का नाम याद है? और जो रनर अप रहा था उसका? इंडियन आइडल- द्वितीय के विजेता और रनर अप का? नहीं ना? तो इन लड़कों को भी उसी कतार में शामिल हुआ मान लीजिए। रियाज़ का कोई विकल्प नहीं। कामयाबी का कोई शार्टकट नहीं होता। आप परदे से गायब हुए और जनता बिसरा जाएगी उसको। देश के लिए जान देने वाले गांधी को भूलने में देर नहीं करती है हमारी जनता तो बीकानेर के राजा और लखनऊ के गुटखा साईज़ पावर प्लांट पूनम यादव को कौन याद रखेगा? हम तो नहीं...।
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