आपने मेरी तस्वीर, जिसे मैं प्यार से फोटू कहता हूं, देख ही ली होगी। इस तस्वीर को खिंचवाने में बहुत मेहनत करनी पड़ी मुझे। मुझे लगा कि ऐसी तस्वीर के ज़रिए लोग मुझे भी बुद्धिजीवी समझने लगेंगे। मैं सीधे तोप हो जाऊंगा। टाइमबम। किसी ने छेड़ा नहीं कि सीधे फट पड़ने वाला...। तो श्रीमानों, महानुभावों, श्रीमंतों, कृपानिधानों नौजवानों ऐसा अभी तक तो हुआ नहीं है अभी तक।
दरअसल, तस्वीर खिंचवाने और मन की स्थिति को बुद्धिजीवियों के स्तर तक लाने में बहुत झख मारनी पड़ती है। लेकिन मन में बैठी उस बात का क्या किया जाए। बचपन से देखता आया हूं कि जिस किसी को भी मन ही मन यह यक़ीन हो कि उसमें भी इंटेलेक्चुअलत्व है ज़रा भी। वह अपनी खुद की प्रायोजित किताब में ऐसी ही तस्वीरें चस्पां करवाते हैं। जितने विचारक जाति के लोग हैं, साहित्यकारनुमा लोग, प्रोफेसर इत्यादि हैं, वह ऐसी ही तस्वीर खिंचवाते हैं। हाथ गाल पर.. ठुड्डी पर। आंखें उधर .. जिधर फोटोग्राफर के स्टूडियों में कंघी-शीशा टांगने की जगह होती है।
पहले तो मैंने भी वैसा ही करने का पूरा प्रयास किया था। हाथ को ठुड्डी पर टिकाया, लेकिन ससुरा टिका ही नहीं। हाथ और ठुड्डी में यदुरप्पा और देवेगौड़ा जैसा रिश्ता...। मेरे चेहरे पर दाढ़ी भी वैसे ही उगती है, जैसे चुनाव के ऐन पहले क्षेत्रीय पार्टियां उग आती हैं। ये पार्टियां जैसे जीतनेवाले मजबूत उम्मीदवारों की आंखों में गड़ती हैं ना, वैसे ही दाढीं के कड़े बाल मेरे हथेलियों में गड़ने लगे। बुद्धिजीवी की तरह त्स्वीर खिंचवाने के मेरे प्रण का कौमार्य भंग होने लगा।
मुट्ठी खोलने की कोशिश की तो हथेलियों से चेहरा छिपने लगा, कैमरावाला मोबाईल फोन हाथ में लिए दोस्त फिकरा कसने लगा, यार मनोज कुमार की तरह लग रहे हो। अब ये मत बोलना कि हमारे देश की हर लड़की मां है, बहन है, बेटी है...। मै पस्त हो गया। लेकिन मैं भी बुद्धिजीवी बनने के लिए उतारू था।
हाथ में कलम लेकर उपर की तरफ ताकना..शून्य में निहारना..मानों दुनिया में सुकरात के अब्बा और अफलातून के दादा मेरे कंधो पर सारी दुनिया की समस्याओं का बोझ डालकर निंश्चिंत हो गए हों, निश्चिंत होकर ज़न्नत की अप्सराओं के साथ चांदनी रात में नौका विहार कर रहे हों..। मेरा स्वबाव भी कुछ ऐसा ही ऐं-वईं हंसी आने लगती है। सोनिया माताश्री, आडवाणी (सावधान, पिताश्री नहीं बोल रहा हूं उन्हें.. अपनी तरफ से कुछ भी बाईट मत सोच लिजिए.. कलाकार हैं आपलोग कुछ भी कर सकते हैं। वरना झज्जर की सभा में माताश्री के बयानों को तोड़-मोड़ कर ऐसे पेश नहीं करते कि यूपीए और वाम दलों में कबड्डी मैच आयोजित करवाने की ज़रूरत पड़ने लगती।) , प्रकाश करात जैसे बिना ज़िम्मेदारी के सत्तासुख का पान करने वाले महादेशभक्त और मधुकोड़ा जैसे छींका टूटने से सत्ता पाने वाले से लेकर हरकिशन सिंह सुरजीत पर ऐसे ही हंसी आने लगती हैं।
आम आदमी हूं..आम आदमी अपनी बुरी दशा में भी हंसता है, नेताओं की चूतियागिरी पर हंसता है। हंसता नहीं होता तो हम खुश रहने वालों के सूचकांक में इतने ऊपर होते क्या। हमें तो रोटी के साथ नमक मिल जाता है तो हम खुश हो जाते हैं। ध्यान दीजिए. प्याज और तेल नहीं जोड़ा है मैंने। सरकार की महती कृपा से मैं पूर्णतया शाकाहारी हो गया हूं। सब्जियां उबालकर खा रहा हूं, मां को शक हो गया है कि घर के सभी लोगों को पेट की कोई गंभीर बीमारी हो गई है, जभी मैंने सबके तेल और प्याज खाने पर रोक लगा दी है। कौन समझाएगा कि बीमारी किसको हुई है पेट की.. बीजेपी की तरह मुझे एक बीमारी ज़रूर हो गई है, मुद्दे से भटकने की। माफी चाहूंगा...बात मैं कर रहा था, तस्वीर खिंचवाने की।
तो जनाब, तस्वीर खिंचवाने के लिए गंभीर होना सबसे बड़ी समस्या थी। वैसे किसी दोस्त ने सलाह दी कि कुरता पहनो , बुद्धिजीवा लगोगे..बुद्धिजीवी होने के लिए कुरता पहनना बहुत ज़रूरी है। लेकिन हमारे शरीर की ढब कुछ ऐसी है कि कुरता पहनूं तो लगता है, खूंटी में टांग दी गई है। सो यह ख़्याल हमने तत्काल प्रभाव से खारिज कर दी, ठीक वैसे ही जैसे सरकार बचाने के लिए कॉंग्रेस एटमी करार को ठंडे बस्ते में डालने पर राजी हो गी है। वैसे जहां तक गंभीरता का सवाल है, वह तो हम आजतक हुए ही नहीं.. बहुत कोशिश की गौतम गंभीर ही हो जाएं, कभी तोला कभी माशा की तरह टीम में रहें, कम से कम मेरे नाना के घर पर भी आयकर महकमे का एक छापा तो पड़ ही जाए। लेकिन आसमान को यह मंजूर ही नहीं।
गोया गंभीर हम तब हो गए, जब किसी खराब स्टोरी की कवरेज के लिए दबाव आया कि यह पीआर स्टोरी है, करनी ही है। जी नहीं चाहता था कुछ भी करने का, पीआर का मतलब.. ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान से दंडवत् करते हुए स्टोरी पेलना, और खराब स्टोरी इतने बड़े होने जा रहे यानी भावी बुद्धिजीवी से पीआर कवरेज करवाना न्याय है क्या? सुनकर हम गंभीर (संजीदा गुरु.. गोतम वाला नहीं) हो गए, दोस्त मेरा पियोर खांटी दोस्त है, इसी मौके की तलाश में था, चट् से फोटू टांक दी। तबसे हर जगह यही तस्वार टांकता चलता हूं, ताकि लोगों को लगता रहे कि यह जो चंट जैसा इंसान पिचके गालों को ढंकने के लिए चेहरे पर हाथ रखे हुए है, छंटा हुआ बुद्धिजीवी है।
Monday, October 15, 2007
पैगाम
दुर्गा मित्रा युवा लेखिका हैं, अंग्रेजी में कविताएं लिखती हैं। बंगलाभाषी होते हुए भी हिंदी में कविता लिखना हिंदी के लिए अच्छा शगुन है। उनकी ताज़ा कविता को छाप रहा हूं। प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार तो दुर्गा को भी होगा, मुझे भी। और हां, उनकी बेहद कम उम्र के मद्देनज़र कविता की शैली से कम-से-कम मैं बेहद प्रभावित हूं। पढ़ें और बताएं..
खुदा का करिश्मा है ये,
या क़िस्मत की इनायत..
लफ़्जों को सिखाया है बोलना उनका नाम,
जिनकी तस्वीर है इन आंखों में सुबह-शाम,
दिल से करते हैं हम उन्हें सलाम,
और भेज रहे हैं ये पैगाम,
ख़ुदा की खुदी भी क्या चीज़ है.
का नाम लिखा है इस इश्क़ के मयखाने में,
तोड़ बंदिशें याद करते हैं हम,
अफसानों में
खुदा का करिश्मा है ये,
या क़िस्मत की इनायत..
लफ़्जों को सिखाया है बोलना उनका नाम,
जिनकी तस्वीर है इन आंखों में सुबह-शाम,
दिल से करते हैं हम उन्हें सलाम,
और भेज रहे हैं ये पैगाम,
ख़ुदा की खुदी भी क्या चीज़ है.
का नाम लिखा है इस इश्क़ के मयखाने में,
तोड़ बंदिशें याद करते हैं हम,
अफसानों में
Thursday, October 11, 2007
क्षणिकाएं..
सुधाकर दास दूरदर्शन न्यूज़ के घुटे हुए पत्रकार हैं। गृह मंत्रालय की बीट देखने के साथ कभी कभी कविता करने की कोशिश भी करते हैं, उनकी कुछ क्षणिकाएं पेश है, हंसी लगे तो भी न लगे तब भी, प्रतिक्रिया देंगे तो कभी किसी लफड़े में पड़ने पर वो आपका गृह मंत्रालय में काम करवा देंगे, इसका वायदा वो कर रहे हैं- गुस्ताख़
पत्नी
पत्नी,
अर्थात्-
पहले नरम,
फिर तनी
पत्नी
पत्नी,
अर्थात्-
पहले नरम,
फिर तनी
क्षणिकाएं..
पत्नी-2
फेरों में पति के पीछे रहना,
पत्नी को हुआ न सहन,
क्योंकि पत्नी है,
सौ मीटर की राष्ट्रीय चैंपियन।
Tuesday, October 9, 2007
प्यार के नाम कविता-२
प्यार की कई परिभाषाएं होती हैं,
कोई प्यार को जीना-
कोई जीने को प्यार समझता है,
सोच लो,
तुम किसे क्या समझते हो,
फिर अपनी जगह
इन ऐतिहासिक परिस्थितियों में तुम्हें मिल जाएगा।।
कोई प्यार को जीना-
कोई जीने को प्यार समझता है,
सोच लो,
तुम किसे क्या समझते हो,
फिर अपनी जगह
इन ऐतिहासिक परिस्थितियों में तुम्हें मिल जाएगा।।
कौन देशभक्त, कौन देशद्रोही...
लो जी लो... कर लो फैसला। कौन है देशभक्त और कौन देशद्रोही... महर्षि मार्क्स के चेले चपाटी कह रह हैं, अमेरिका से एटमी करार करने वाले देशद्रोही हैं। मयडम जी फरमा रही हैं, करार पर तकरार करने वाले देश के विरोधी हैं। गुरु हम तो नरभसा गए हैं। हम तो आज तक तय ही नहीं कर पाए कि हम एटमी करार के पक्ष में हैं या विपक्ष में। अमेरिका के साथ करार हो जाएगा, तो यकीन मानिए भारत के हर नागरिक को बिना लिंगभेद, बिना जाति भेद और बिना किसी अन्य भेदभाव के रोज़गार मिल जाएगा। रोटी, कपड़ा और मकान की समस्या हल हो जाएगी। दिल्ली की सड़कों पर ब्लू लाईन बसें तांडव नहीं मचाएंगी। हर पत्रकार के लिए एक प्लैट अलॉट किया जाएगा... हम्म।लेकिन ज़रा देशभक्त लोगों के बारे में, उनके अतीत के बारे में पढ़ता हूं तो दिमाग़ का शक्की कीड़ा कुलबुलाने लगता है। १९६२ में इन्होंने ही चीन के साथ जाने या फिर उसे नैतिक समर्थन देने की बात की थी ना। कहीं ऐसा तो नहीं कि चीन के ही सपोर्ट पर गुरुघंटाल लोग फिर समर्थन वापसी(?) का वितंडा खड़ा कर रहे हों? और समर्थन वापसी.. हिम्मत है क्या? अरे वापस लेना होता तो इंतज़ार किस बात का? जियांग जेमिन ने हरी झंडी नहीं दी है क्या? चलो मान लेते हैं कि करार गलत है, लेकिन इतने दिनों का इंतजार किस लिए? वोट पाकर मदमस्त हुए वामपंथियों .. जनता के बीच क्या कह कर जाओगे? सरकार किस लिए गिराई? प्याज मंहगे होने लगे हैं उस मुद्दे पर? राम सेतु पर संप्रदायवादियों के खिलाफ? गरीबों के कितने हितकारी-शुभाकांक्षी हो, नंदी ग्राम में देख चुका है पूरा भारत। कम्युनिस्ट हो, तो उसे जीवन में उतारकर दिखाओ यारों। बोतलबंद पानी पीकर, रीड एंड टेलर के सूट मेंसज कर किस विचारधारा (जो भी है, उधर की ही है) को फॉलो कर रहे हो, उसकी कलई खुल रही है। माफ करना महर्षि मार्क्स आपके चेले चपाटी आपके ही विरोध में हैं। अपने अनुयायियों से कहो आपके नाम की रोटी सेंकना बंद करें। आपके सच्चे चेले तो किसी बेर सराय में पागल कहे जाक अभिशप्त जीवन जीने को बाध्य हैं। (देखे राजीव की क़िस्सागोई)वैसे बिना ज़िम्मेदारी के सत्ता सुख पाने वाले काहिल वामपंथी नेताओं आपका अच्छा वक्त खत्म होता अब..।
यारों कोई कहे उनसे कि करार के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होने वाला आदमी द्रोही या भक्त नहीं है देश का। वह तो खालिस राजनेता हैं। देशभक्त तो सरहद पर शहीद होने वाले जवान हैं, संसद पर हमले के वक्त जान देने वाले सिपाही। ईमानदारी से देश के लिए सपने देखने और उसे साकार करने वाला हर कोई... डॉक्टर, इंजीनियर, सॉफ्टवे.यर प्रफेशनल, पत्रकार,...ट्रेन सही वक्त पर ले आने वाला ड्राईवर.. हर इंसान जो देश के सोचता है। ....
यारों कोई कहे उनसे कि करार के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होने वाला आदमी द्रोही या भक्त नहीं है देश का। वह तो खालिस राजनेता हैं। देशभक्त तो सरहद पर शहीद होने वाले जवान हैं, संसद पर हमले के वक्त जान देने वाले सिपाही। ईमानदारी से देश के लिए सपने देखने और उसे साकार करने वाला हर कोई... डॉक्टर, इंजीनियर, सॉफ्टवे.यर प्रफेशनल, पत्रकार,...ट्रेन सही वक्त पर ले आने वाला ड्राईवर.. हर इंसान जो देश के सोचता है। ....
Sunday, October 7, 2007
पाकिस्तानी लोकतंत्र के लड्डू
पाकिस्तान को नया राष्ट्रपति मिलने वाला है। राष्ट्रपति कितना नया होगा, वर्दी में होगा..( सेना की वर्दी जनाब, अपने दिमागड का कूड़ेदान न खोले कृपया) या बिना वर्दी का, इस सवाल का जवाब उतना ही साफ है, जितना बीजेपी का राम मुद्दा। भारत के लोग, भारत की मीडिया और भारत के नेता... एक साथ गला फाड़ कर चिल्लाते हैं, अमेरिका के सामने साबित करने पर तुले रहते हैं. देखिए मालिक... हम सबसे बड़े लोकतंत्र हैं। अबे..क्या खाक लोकतंत्र हैं? आपको चुनाव के ठीक बाद पता होता है कि किस उम्मीदवार को कितने फीसद वोट मिले हैं? नहीं पता ना....। अजी नज़रें पश्चिम पर रखने वालों बुद्धिमानों, देखों पाकिस्तान के मुख्य चुनाव आयुक्त को वोटिंग के ठीक बाद पता चल गया कि जनाब मुशर्रफ को सबसे ज़्यादा वोट मिलें हैं। जीतने वाले वही हैं। आपके माननीय चुनाव आयुक्त कैसे हैं... एक्जिट पोल करने तक पर गोपनीयता का पहरा बिठा रखा है। चैनलों को मनाही है। नहीं दिखा सकते। दिखाया तो कारण बताओ नोटिस जारी हो जाएगा। वैसे एक बात और .. कुछ बेकार के चैनलों को छोड़कर किसी को एक्जिट पोल दिखाने का वक्त भी नहीं। अरे यार, देखते नहीं रोज़ाना पब्लिक सड़क पर उतर रही है... हमें राखी सावंत को देखना है, राखी का इंटरव्यू हंसते हुए पत्रकार के साथ आए तो स्क्राल हटाओ. हमें देखने लायक और नहीं देखने लायक हर चीज़ देखने दो। बहरहाल, बात लोकतंत्र की हो रही थी। हमारे यहां लोकतंत्र बुढा गया है। साठ साल का हो गया है। सठिया रहा है यह। इसे सही राह पर ले जाने के लिए वाइग्रा की ज़रूरत है। कर्नाटकी नाटक देखिए.. वाइग्रा खाकर हमारा लोकतंत्र यौनाचार के नए आसन आजमा रहा है। पाकिस्तान में लोकतंत्र ओढ़ा जा रहा है, हम जन्मजात लोकतंत्र की चुसनी के साथ पैदा हुए हैं, उसे ही चुभला रहे हैं। टीवी चैनलों, एफएम चैनलों पर पाबंदियों के साथ हम अपने गणराज्य को वाइग्रा खिला रहे हैं...पाकिस्तान में अवाम बदल-बदलकर रस लेती है। कभी तानाशाही, कभी मूर्ख सियासयदां, जिनका अपनी ही फौज और अवाम पर कंट्रोल नहीं..कभी कभी लोकतंत्र की नौटंकी भी।हम ऐसे है कि विविधता से भरे हैं। केसरिया भारत अलग. हरा हिंदोस्तां अलग ..सफेद तो खैर अलग है ही...। हमारी जनता को भी कोई चूतिया नहीं बना सकता सिर्फ नेता उनकी जात का, तो फिर अवाम यह नहीं देखती कि चुना जाने वाला नेता किस पार्टी का है, उसकी पृष्ठभूमि क्या है। हमारे लोकतंत्र का फलक बेहद बड़ा है.. उनकी तरह नहीं। आमीन
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