ताज़ा समाचार यह है कि योजना आयोग ने बिहार में हो रहे विकास के कामों की तारीफ की है। अगले वित्तीय वर्ष के लिए बिहार सरकार ने १३ हज़ार ८ सौ करोड़ रूपए की मांग की थी। आयोग इसमें से १३००० करोड़ जारी करने पर राजी हो गई है। कामकाज ठीक रहा तो आयोग ५०० करोड़ और भी देने के लिए रजामंद है। आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने माना कि कुछ खामियों के बावजूद बिहर में विकास के काम की तारीफ की जानी चाहिए।
इसाक मतलब है कि पिछले कुछ बरस में पहली बार बिहार में कुछ अच्छा हो रहा है। कुछ बंधुओं को लगेगा कि सिर्फ बिजली, पानी और सड़क ही विकास नहीं होता। विकास इससे भी बढ़कर होता है। क्या हो रहा है और क्या और अधिक होना चाहिए? विकास के काम में सरकार किसे पीछे छोड़कर भुलाती जा रही है। मिलनेवाले १३,५०० करोड़ अगले साल बाबुओं के गोदामनुमा पेटों में तो नहीं समा जाएंगे?
बहुत सारी चिंताएं हैं, लेकिन हमारी चिंता यह है कि केंद्र में बैठे लालू मोंटेक की इस बात पर न जाने क्या प्रतिक्रिया देंगे। कहीं समर्थन ही न वापस लें लें। चिर प्रतिद्व्द्वी की इतनी तारीफ? उनके हिसाब तो तारीफ के काबिल तो महज लालू और उनकी रेल है। मैनेजमेंट पढ़ाने का गुर जो आ गया है उन्हें। तो फिर आपकी क्या राय है इस मुददे पर?
Wednesday, January 30, 2008
चोटी के पत्रकार
निखिल मेरे बेहद करीबी दोस्त हैं। आजकल दाढ़ी बढ़ा रहे हैं। उनका तर्क है अब मैं गंभीर पत्रकार बनना चाहता हूं। ठुड्डी पर हाथ टिका कर फोटों खिंचवाने के मेरे सद्प्रयास से शायद उन्हें प्रेरणा मिली है। रेगिस्तान में उगी यत्र-तत्र की झाडियों के मानिंद उनके मुखमंडल पर भी यहां-वहां दाढ़ी उगती है।
मेरे एक और मित्र हैं। वे चोटी के पत्रकार बनना चाहते हैं। लिहाजा उन्होंने बाल बढाने शुरु कर दिए हैं। उनकों बुरी तरह यकीन है कि बाल जब पूरी तरह बढ़ जाएंगे, चोटी गूंथने के लायक हो जाएंगे तो वह चोटी के पत्रकार कहलाने लग जाएंगे। हमने तो कई बार एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया हमारे बाल चोटी लायक नहीं हुए।
वैसे, चोटी की वजह से कई बार धोखा हो जाता है। बेहद दूर तलक चोटी वाली एक कन्या का पीछा करने और पीठ पीछे-पीछे कन्या के मुखमंडल की सुंदरता का अनुमान प्रक्षेपित करने के बाद जब चेहरे का दीदार हुआ तो पता चला कि चोटी वाली शख्सियत बहन जी नहीं, भाई साहब हैं। सोचो, क्या हुआ होगा मेरे मन का ...।
हाल में खबर सुनी-पढी-देखी कि हमारे चोटी के तीन पत्रकार पद्मश्री पा गए। अब दुआ साहब को तो हम बचपन से सुनते-गुनते आ रहे हैं। उनके चुनावी विश्लेषण पर हमें चुनाव आयोग से भी ज़्यादा भरोसा है।
राजदीप भी ऐसे ही हैं, विशवसनीय। बरखा जी से भी खबरों की बरसात भी हमने देखी। जब उन्होंने उचारा कि टेरर एन्ड वॉयलेंस रिटर्न्ड इन वैली। ( श्रीनगर में मोटर साइकिल बम विस्फोट के बाद) तो हमने यह जानते हुए भी टेरर ौर व़यलेंस वैली से कभी भी कहीं नहीं गया था। हमने मान लिया, चलो वापसी हो गई हिंसा की। लेकिन सरकार की खाल खींच लेने की ठसक भरी पत्रकारिता क्या सरकारी सम्मान के बाद भी बची रहेगी। क्या कहीं से यह नहीं लगेगा कि हम जिस सरकार को बे-कार बता रहे हैं। छब्बीस जनवरी को इसी ने हमें पद्म सम्मान दिया था? आगे से इनकी खबरों को भी इसी तरह पढ़ पाएंगे हम लोग?
सादर, ससम्मान
गुस्ताख
मेरे एक और मित्र हैं। वे चोटी के पत्रकार बनना चाहते हैं। लिहाजा उन्होंने बाल बढाने शुरु कर दिए हैं। उनकों बुरी तरह यकीन है कि बाल जब पूरी तरह बढ़ जाएंगे, चोटी गूंथने के लायक हो जाएंगे तो वह चोटी के पत्रकार कहलाने लग जाएंगे। हमने तो कई बार एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया हमारे बाल चोटी लायक नहीं हुए।
वैसे, चोटी की वजह से कई बार धोखा हो जाता है। बेहद दूर तलक चोटी वाली एक कन्या का पीछा करने और पीठ पीछे-पीछे कन्या के मुखमंडल की सुंदरता का अनुमान प्रक्षेपित करने के बाद जब चेहरे का दीदार हुआ तो पता चला कि चोटी वाली शख्सियत बहन जी नहीं, भाई साहब हैं। सोचो, क्या हुआ होगा मेरे मन का ...।
हाल में खबर सुनी-पढी-देखी कि हमारे चोटी के तीन पत्रकार पद्मश्री पा गए। अब दुआ साहब को तो हम बचपन से सुनते-गुनते आ रहे हैं। उनके चुनावी विश्लेषण पर हमें चुनाव आयोग से भी ज़्यादा भरोसा है।
राजदीप भी ऐसे ही हैं, विशवसनीय। बरखा जी से भी खबरों की बरसात भी हमने देखी। जब उन्होंने उचारा कि टेरर एन्ड वॉयलेंस रिटर्न्ड इन वैली। ( श्रीनगर में मोटर साइकिल बम विस्फोट के बाद) तो हमने यह जानते हुए भी टेरर ौर व़यलेंस वैली से कभी भी कहीं नहीं गया था। हमने मान लिया, चलो वापसी हो गई हिंसा की। लेकिन सरकार की खाल खींच लेने की ठसक भरी पत्रकारिता क्या सरकारी सम्मान के बाद भी बची रहेगी। क्या कहीं से यह नहीं लगेगा कि हम जिस सरकार को बे-कार बता रहे हैं। छब्बीस जनवरी को इसी ने हमें पद्म सम्मान दिया था? आगे से इनकी खबरों को भी इसी तरह पढ़ पाएंगे हम लोग?
सादर, ससम्मान
गुस्ताख
Tuesday, January 29, 2008
शर्म हमको मगर नहीं आती..
हाल के दिनों में ब्लॉग की दुनिया से लेकर टीवी और अखबारों तक एक बहस तेज़ रही है कि मादा होने का दर्द क्या है? मोहल्ले पर एक दीप्ति दूबे हैं, वो अपनी दर्द बयां करती नज़र आईं। शर्म आई .. सिर्फ मर्द जात पर नहीं .. पूरी इंसानियत पर कि यार एक ही गाड़ी के दूसरे पहिए के साथ ऐसा सुलूक क्यों?
लेकिन ग़ौर से देखें बंधु तो स्त्री जाति पर ज़ुल्म ढाने में हमारा यानी हमारी कथित उच्च आदर्शों वाली भारतीय संस्कृति का बड़ा शानदार ट्रैक रेकॉर्ड रहा है। हमारे यहां कहावत है कि यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता। यानी जहां नारी की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है। मान्यवर, जहां नारियां होंगी वहां देवता तो रहेंगे ही। देवताओं के मन में नारी को लेकर बडी शानदार अनुभूति रही है और गाहे-बगाहे हमारे देवता नारी को इस्तेमाल करने की चीज़ जानकर पर्याप्त मात्रा में बल्कि पर्याप्त से भी ज़्यादा उपभोग करते रहे हैँ।
ऐसा हमारी सभ्याता में तो है ही दुनिया की सभी सभ्यताओं में है। महिलाओं को देखते ही सभी संस्कृतियों के देवता बराबर रूप से स्खलित हो हैं। मामला डेन्यूब के देवता सुवोग का हो, जो देवी परंती के साथ संभोग में डूबे हैं या अपने परमपिता ब्रह्मा का जो अपनी बेटी सरस्वती पर आसक्त हो गए। औषधियों, तारागणों और ब्राह्मणों का देवता चंद्रमा तो देवताओं के गुरु वृहस्पति की पत्नी तारा पर इतना आसक्त हो गया कि उसने तारा को इंद्र के राजसूय यग्य से अपहृत कर लिया और उनके साथ बलात्कार करता रहा।
अब हमारे अंदर देवताओं वाले धर्म का पालन करने की इतनी अद्मय इच्छा है तो हम तो उनके स्त्री संबंधी विचारों का भी पालन करेंगे ही। क्या हमारे धर्म को बदलाव की ज़रूरत नहीं है, स्त्री से हमारे आचरण को लेकर?
(दीप्ति से सहानुभूति जताकर खुद को महिला आंदोलन के समर्थक मानने वाले कई आंदोलनकारी खुद कितने दूध के धुले हैं, यह भी गुस्ताख को अखरता है।)
Sunday, January 27, 2008
गणतंत्र पर नायिकाओं की राय
इस बार बीकानेर जाने का मौका हाथ लगा। आधे घंटे का खास कार्यक्रम बनाने के वास्ते। लौटते वक्त जयपुर में आउटलुक पढ़ रहा था। सभी चीज़ों के साथ पत्रिका ने एक बहस की शुरुआत की है।
बहुत पुरानी और घिसी हुई बहस है जनाब.. देश में संसदीय प्रजातंत्र अच्छा या, अध्यक्षीय प्रजातंत्र। बहरहाल, बहस में हिस्सा लेने के लिए जिनके इंटरव्यू लिए गए थे। उससे मुझे बहुत अजीब सा लगा। आंखों को अच्छा लगा लेकिन दिल को नहीं। टीआरपी के लिए टीवी वालों को गरियाने में अत्यंत अग्रणी रहने वालों ने इस मसले पर ज्यादातर अभिनेताओं का इंटरव्यू लिया है। उनमें तो पांच बिंदास बालाएं हैं।
इनमें से एक अभिनेत्री के बारे में मेरा निजी अनुभव है कि उनका जेनरल नॉलेज अत्यंत उच्च कोटि का है। उन्होंने एक बार महाराष्ट्र की राज़धानी राजस्थान बताया था। मैं हैरान हूं कि आडवाणी, पवार, चंद्रबाबू नायडू, लालू, करुणानिधि, जयललिता, और अगली-पिछली पंक्ति के अंतहीन नेताओं के होते इन मादक मादाओं के साक्षात्कार की क्या महती आवश्यकता आन पड़ी थी। महान पत्रकार संपादक महोदय इस विषय पर मुझ नादान का मार्गदर्शन करें, तो अतीव कृपा होगी।
सादर,
गुस्ताख़
Saturday, January 19, 2008
पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण मिलेगा?
संसद के शीतकालीन सत्र के आखरी दिनों में जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट संसद में पेश करने और उस पर जल्द ही कार्रवायी करने की मांग उठी। इस पर किसी भी दल के मुस्लिम सांसदों ने उन्हें समर्थन नहीं दिया। इस पूरी प्रक्रिया पर प्रतिक्रिया जताते हुए ज़ी न्यूज के वरिष्ठ रिपोर्टर युसुफ अंसारी ने भाई संदीप के ब्लाग पर एक आलेख लिखा है।
अंसारी ने मिश्र आयोग की सिफारिशों का पुरज़ोर समर्थन करते हुए लिखा है कि- अगर ये सिफारिश अमल में आती है तो मुसलमानों की एक बड़ी आबादी को इसका सीधा फायदा पहुंचेगा। मुसलमानों में जुलाहा ( अंसारी ) , धोबी , हलालखोर , कुम्हार , बंजारे , फकीर समेत करीब चालीस से पचास जातियों के लोग दलित आरक्षण के तहत मिलने वाली तमाम सुविधाओं के हक़दार हो जाएंगे। अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण लोकसभा और विधानसभा सीटों पर मुसलमानों के चुनाव लड़ने का रास्ता भी खुल जाएगा। इससे हर क्षेत्र में मुसलमानों के पिछड़ेपन की समस्या काफी हद तक हल हो जाएगी।
यहां पर मेरा सवाल है कि क्या राजनीतिक कद बढाने से पिछड़े मुसमानों को वाकई फायदा होगा और मुसलमानों में दलितों की स्थिति को दलित क्यों माना जाए, जबकि उनका धर्म ऐसे किसी भेदभाव से इनकार करता है। इस मज़हब की खासियत है कि यह बराबरी और भाईचारे पर टिका धर्म है। ऐसे में अगड़े और पिछड़े मुसलमानों का सवाल ही बेमानी हो जाता है।
भई... मुझे तो सख्त आपत्ति है। बाकी सुविधाओं के लिए शरीयत का हवाला देने वाले लोग आरक्षण के लिए अपनी जाति बताने पर क्यों उतर आए हैं? और इस बात की क्या गारंटी है कि आरक्षण मिलने के बाद इसका फायदा वंचितों के बदले फुरकान अंसारी जैसा मलाईदार तबका नहीं उठा लेगा? और सोचिए ज़रा कि आखिर अंसारी जैसे पिछड़े(?) मुसलमानों ने अपनी बिरादरी के हक़ में अब तक किया क्या है?
वहीं, एक सवाल और है कि आरक्षण का फायदा तो आप संविधान के तहत लेना चाहते हैं, लेकिन बाकी मसलों पर आपका धर्म आपको इस बात की इजाज़त नहीं देता। मसलन, एकसमान नागरिक संहिता आपको अपने अधिकारों का हनन लगता है, बहुविवाह आपको सांस्कृतिक परंपरा दिखती है, विवाह के पंजीकरण पर आपका रवैया ढुलमुल ही है। सिर्फ जाति आधारित आरक्षण के मामले में आप संविधान का हवाला क्यों देना चाहते हैं, यहां बराबरी की बात करने वाले धर्म को क्यों नज़रअंदाज करना चाहते हैं आप?
नहीं, पहले फैसला कीजिए कि आप मुसलमानों को मिलने वाली सुविधाओं का उपभोग करना चाहते हैं या पिछड़ों को मिलने वाली सुविधाओं का। दोनों हाथ में लड्डू नहीं चलेगा। वैसे आपकी मांग नाजायज़ भी नहीं मानी जा सकती, क्यों कि संसाधनों पर पहला हक़ तो बकौल प्रधानमंत्री, आपकी कौम का ही है। अपनी कौम और जाति के लिए आवाज उठाना बेहद ज़रूरी है युसुफ भाई लेकिन अपनी कमियों को दूर करना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी।
मुस्लिम वोट बैंक लिए एक बेहतर कौम -जो कम से कम जाति के स्तर पर बराबरी की बात तो करता है- जातियों में बांटना एक बेहतर विकल्प नहीं ही है।
वे आगे कहते हैं, आबादी के हिसाब से महिलाओं को आरक्षण की पुरज़ोर वकालत करने वालों का ध्यान कभी इस तरफ नहीं गया है या फिर इतनी बड़ी आबादी को माकूल राजनीतिक प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिल रहा है। महोदय इसके जवाब तो आपको खुद पता होने चाहिएं। जब तक कोई बिरादरी चाहे हिंदुओं की हो या फिर मुसमानों की , औरतों को घर से बाह निकल कर खुद के विकास करने के लिए रास्ता साफ नहीं करेगी, तबतक आंकड़े आपके मनमाफिक नहीं हो पाएंगे।
Friday, January 18, 2008
उत्तर भारतीय बनाम दक्षिण भारतीय ब्राह्मण
उत्तर भारत का ब्राम्हण, क्यों नहीं दक्षिण के अपने सजातीय की तरह विकास कर पाया? मुझे लगता है कि घूम-फिरकर इसकी वजह वहीं जातीय जडता है जिसका शिकार उत्तर का ब्राह्मण रहा है।
सवाल यहां यह है कि ऐसा उत्तर में क्यों हुआ, जवकि ब्राह्मण तो दक्षिण के भी समान रुप से कूप-मंडूक और ओर्थोडोक्स थे। यहां मुझे लगता है कि संख्याबल काफी महत्वपूर्ण रहा है ओर दूसरा है अंग्रजों और अंग्रेजी का सानिद्ध्य। यह बात लगभग स्थापित हो चुकी है कि आर्य बाहर से गंगा की घाटी में आए और तब वो दक्षिण की तरफ गए। जाहिर सी बात है कि आर्यों के स्वयंभू नेता ब्राह्मणों की आबादी उत्तर में ज्यादा है और यहीं आवादी उनकी जडता के लिए उत्तरदायी है।
दक्षिण में कम आर्यन और ब्राह्मण आवादी की वजह से सामाजिक परिवर्तन पहले हो गया और पचास के दशक में ही व्राह्मणों को सत्ता से बेदखल कर दिया गया या वो उचित स्तर पर आ गये। लेकिन उत्तर में एसा नहीं हो पाया।
दक्षिण में पिछडों और दलितो के सशक्तिकरण ने शिक्षा से लेकर तमाम क्षेत्रों में बढत हासिल कर ली और ब्राह्मण वर्ग गांव छोड कर पचास के दशक में ही शहर में जा बसा। ये भी इस वर्ग के लिए फायदे के सौदा हो गया। भागा था वो ब्राह्मण-विरोधी आंदोलन के डर से, लेकिन मद्रास से लेकर पूना और दिल्ली तक के तमाम आधुनिक ज्ञान के मंदिर उसके लिए खुलते चले गए। यह वर्ग तमिलनाडु में 69 प्रतिशत आरक्षण के चलते सिविल सेवा समेत तमाम केंद्रय सेवाओं में भर गया। और जव नव्वे के दशक में दक्षिण के राज्यों ने आइटी और उदारीकरण का फल चखना शुरु किया तो फिर से दक्षिण के ब्राह्मणों की चान्दी हो गयी।
तुलना किजीए, उत्तर के ब्राह्मणों का इससे...नव्वे के दशक तो तमाम झा जी, तिवारी जी और दूवे जी खेती ही कर रहे थे। कुछ लोग सरकारी सेवा में थे..और बाकी की हालत अपने पिछडे समकक्षों से थोडी ही अच्छी थी और इसकी वजह थी कि जमीन पर इनका कव्जा था और पिछडो के पास जमीन न के बराबर थी।
यहां ब्राह्मण से मेरा मतलब तमाम ब्राह्मण-टाइप जातियों से है। हां, उत्तर में बंगाली ब्रह्मण कुछ अच्छे थे और इसकी बहुत कुछ वजह उनका अंग्रेजों से संपर्क, पहले नवजागरण और वामपंथ का उस राज्य में प्रभाव होना हो सकता है। बाद बाकी तो उत्तर का ब्राह्मण अपने जडता,सामंती मानसिकता और समय के साथ न चलने की प्रवृति के कारण सिर्फ इस काविल रह गया कि उसे कोई भी लालू या मायावती आकर उसे गलिया सकता था। और यह होना ही था क्योंकि यह इतिहास का एक आवश्यक अध्याय था दक्षिण के ब्राह्मणों ने भी इसे पचास के दशक में झेला था।
जो पीढीगत बढत दक्षिण के ब्राह्मणो को मिल गयी है वह शायद इतना बडा गैप बना गया है कि अब उत्तर के ब्राह्मण, दक्षिण के ब्राह्मणों के साथ तुलना के योग्य नहीं है। वो इंफोसिस और सत्यम बनाने के स्टेज में है जवकि हमारे पास ढंग के इंजिनियरिंग कालेज तक नहीं।
हालत तो ये है कि अव दक्षिण के पिछडे भी उत्तर के अग़डों से आगे हैं। और मजे की बात तो यह है कि उत्तर में भी सत्ता में रहते हुए तमाम व्राह्मण या सवर्ण मलाई नहीं खा पाए- अलवत्ता बदनाम सब हो गए। कुछेक हजार ठेकेदार किस्म के ब्राह्मण या राजपूत ही माल बना पाए-हां मूंछे सबने जरुर फरकाई थी।
<(सुशांत झा इनफॉरमेशन टीवी में काम करते हैं। राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है। उनका यह वक्तव्य दिलीप मंडल के मोहल्ले पर दिए एक पोस्ट की प्रतिक्रिया या कहे समर्थन में आया । हमें लगा कि यह गुस्ताख़ की सोच से मेल खाती है। ऐसे में सुशांत जी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए हम एक बहस की शुरुआत करना चाह रहे हैं।)
सवाल यहां यह है कि ऐसा उत्तर में क्यों हुआ, जवकि ब्राह्मण तो दक्षिण के भी समान रुप से कूप-मंडूक और ओर्थोडोक्स थे। यहां मुझे लगता है कि संख्याबल काफी महत्वपूर्ण रहा है ओर दूसरा है अंग्रजों और अंग्रेजी का सानिद्ध्य। यह बात लगभग स्थापित हो चुकी है कि आर्य बाहर से गंगा की घाटी में आए और तब वो दक्षिण की तरफ गए। जाहिर सी बात है कि आर्यों के स्वयंभू नेता ब्राह्मणों की आबादी उत्तर में ज्यादा है और यहीं आवादी उनकी जडता के लिए उत्तरदायी है।
दक्षिण में कम आर्यन और ब्राह्मण आवादी की वजह से सामाजिक परिवर्तन पहले हो गया और पचास के दशक में ही व्राह्मणों को सत्ता से बेदखल कर दिया गया या वो उचित स्तर पर आ गये। लेकिन उत्तर में एसा नहीं हो पाया।
दक्षिण में पिछडों और दलितो के सशक्तिकरण ने शिक्षा से लेकर तमाम क्षेत्रों में बढत हासिल कर ली और ब्राह्मण वर्ग गांव छोड कर पचास के दशक में ही शहर में जा बसा। ये भी इस वर्ग के लिए फायदे के सौदा हो गया। भागा था वो ब्राह्मण-विरोधी आंदोलन के डर से, लेकिन मद्रास से लेकर पूना और दिल्ली तक के तमाम आधुनिक ज्ञान के मंदिर उसके लिए खुलते चले गए। यह वर्ग तमिलनाडु में 69 प्रतिशत आरक्षण के चलते सिविल सेवा समेत तमाम केंद्रय सेवाओं में भर गया। और जव नव्वे के दशक में दक्षिण के राज्यों ने आइटी और उदारीकरण का फल चखना शुरु किया तो फिर से दक्षिण के ब्राह्मणों की चान्दी हो गयी।
तुलना किजीए, उत्तर के ब्राह्मणों का इससे...नव्वे के दशक तो तमाम झा जी, तिवारी जी और दूवे जी खेती ही कर रहे थे। कुछ लोग सरकारी सेवा में थे..और बाकी की हालत अपने पिछडे समकक्षों से थोडी ही अच्छी थी और इसकी वजह थी कि जमीन पर इनका कव्जा था और पिछडो के पास जमीन न के बराबर थी।
यहां ब्राह्मण से मेरा मतलब तमाम ब्राह्मण-टाइप जातियों से है। हां, उत्तर में बंगाली ब्रह्मण कुछ अच्छे थे और इसकी बहुत कुछ वजह उनका अंग्रेजों से संपर्क, पहले नवजागरण और वामपंथ का उस राज्य में प्रभाव होना हो सकता है। बाद बाकी तो उत्तर का ब्राह्मण अपने जडता,सामंती मानसिकता और समय के साथ न चलने की प्रवृति के कारण सिर्फ इस काविल रह गया कि उसे कोई भी लालू या मायावती आकर उसे गलिया सकता था। और यह होना ही था क्योंकि यह इतिहास का एक आवश्यक अध्याय था दक्षिण के ब्राह्मणों ने भी इसे पचास के दशक में झेला था।
जो पीढीगत बढत दक्षिण के ब्राह्मणो को मिल गयी है वह शायद इतना बडा गैप बना गया है कि अब उत्तर के ब्राह्मण, दक्षिण के ब्राह्मणों के साथ तुलना के योग्य नहीं है। वो इंफोसिस और सत्यम बनाने के स्टेज में है जवकि हमारे पास ढंग के इंजिनियरिंग कालेज तक नहीं।
हालत तो ये है कि अव दक्षिण के पिछडे भी उत्तर के अग़डों से आगे हैं। और मजे की बात तो यह है कि उत्तर में भी सत्ता में रहते हुए तमाम व्राह्मण या सवर्ण मलाई नहीं खा पाए- अलवत्ता बदनाम सब हो गए। कुछेक हजार ठेकेदार किस्म के ब्राह्मण या राजपूत ही माल बना पाए-हां मूंछे सबने जरुर फरकाई थी।
<(सुशांत झा इनफॉरमेशन टीवी में काम करते हैं। राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है। उनका यह वक्तव्य दिलीप मंडल के मोहल्ले पर दिए एक पोस्ट की प्रतिक्रिया या कहे समर्थन में आया । हमें लगा कि यह गुस्ताख़ की सोच से मेल खाती है। ऐसे में सुशांत जी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए हम एक बहस की शुरुआत करना चाह रहे हैं।)
व्यंग्य क्या है?
सभी देशों में व्यंग्य साहित्य के एक तीखे औजार के रूप में जाना जा रहा है। यह लेखकों को एक नई पहचान देती है। मार्क ट्वेन, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, चेखव और भारतेंदु से लेकर परसाई तक अपनी व्यंग्य शक्ति के लिए मशहूर रहे हैं। लेकिन ये तो कलात्मक साहित्य की बात हुई। दूसरी विधाओं खासकर राजनीतिक साहित्य में भी व्यंग्य एक मारक शक्ति है।
मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के साहित्य में तीखे व्यंग्य मिलते हैं। मार्क्स की 'पवर्टी ऑफ फिलॉसफी','एंगेल्स की ड्यूरिंग...' और लेनिन के विभिन्न लेखों में ऐसी शक्ति है, जो कई व्यंग्यकारो के यहां से नदारद है। इससे साबित होता है कि व्यंग्य सिर्फ साहित्यिक भाषा के कमाल का नाम नहीं है। तब प्रश्न यह उठता है कि व्यंग्य क्या है और कहां से आता है?
व्यंग्य क्या है?
व्यंग्य अंग्रेज़ी के सटायर शब्द का हिंदी रूपांतर है। और इस आधार पर किसी व्यक्ति या समाज की बुराई को सीधे शब्दों में न कह कर उल्टे या टेढे शब्दों में व्यक्त किया जाना ही व्यंग्य है। बोलचाल में इसे ताना, बोली या चुटकी भी कहते हैं। हास्य, उपहास, परिहास, वाक्-वैदग्ध्य, पैरोडी, वक्रोक्ति, उपालंभ, कटाक्ष, विडंबना, अर्थ-भक्ष्य, ठिठोली, आक्षेप, निंदा-विनोद, रूपक, प्रभर्त्सना, स्वांग, अपकर्ष, चुहल, चुटकुला, मसखरी, भडैंती, ठकुरसुहाती, मज़ाक, दंतनिपौरी, गाली-गलौज ऐसे अनेक शब्द हैं, जो व्यंग्य को कमोबेश संप्रेषित करते हैं। फिर भी, इनमें से कोई शब्द व्यंग्य के व्यापकत्व को पूरी तरह निरूपित नहीं कर पाता। प्रत्येक शब्द किसी-न-किसी बिंदु पर व्यंग्य के समान होकर भी किसी अन्य बिंदु पर व्यंग्य से भिन्न हो जाता है।
ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के मुताबिक, व्यंग्य वह पद्यमय या गद्य रचना है, जिसमें प्रचलित दोषों या मूर्खताओँ का कभी-कभी कुछ अतिरंजना के साथ मज़ाक उड़ाया जाता है। इसका अभीष्ट किसी व्यक्ति विशेष या समूह का उपहास करना होता है। यानी, यह एक व्यक्तिगत आक्षेप के समान होता है।
इनसाक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के मुताबिक, साहित्यिक दृष्टि से व्यंग्य उपहासास्पद या अनुचित वस्तुओं से उत्पन्न विनोद या घृणा के भाव को समुचित रूप से अभिव्यक्त करने का नाम है। बशर्ते, उस अभिव्यक्ति में हास का भाव निश्चित रूप से विद्यमान हो तथा उक्ति को साहित्यिक रूप मिला हो। हास्य के अभाव में व्यंग्य गाली का रूप धारण कर लेता है। और साहित्यिक विशेषता के बिना वह विदूषक की ठिठोली मात्र बनकर रह जाता है।
डॉ रामकुमार वर्मा ने कहा है कि आक्रमण करने की दृष्टि से वस्तुस्थिति को विकृत कर उसमें हास्य उत्पनना करना ही व्यंग्य है। वहीं डॉ हजारी प्रसाद द्विदेदी कबीर में लिखते है कि व्यंग्य तभी होता है, जब कहने वाला अधरोष्ठ में हंस रहा होता है, सुनने वाला तिलमिला उठा हो, फिर भी जवाब देना खुद को उपहासास्पद बना लेना होता है। वैसे व्यंग्य में क्रोध की मात्रा आ जाए तो हास्य की मात्रा कम हो जाती है।
मशहूर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई अपनी किताब सदाचार का ताबीज की भूमिका कैफियत में व्यंग्य को जीवन की आलोचना करने वाला मानते हुए इसे विसंगतियों,मिथ्याचारों और पाखंडो का पर्दाफाश करने वाला मानते हैं। जीवन के प्रति वंय्ग्यकार की उतनी ही निष्ठा होती है, जितनी कि गंभीर रचनाकार की। बल्कि ज़्यादा ही। इसमें खालिस हंसना या खालिस रोना जैसी चीज़ नहीं होती।
यानी, व्यंग्य का वास्तविक उद्देश्य समाज की बुराईयों और कमजोरियों की हंसी उड़ाकर पेश करना होता है। मगर इसमें तहज़ीब का दामन मजबूती से पकड़े रहना जरूरी है। वरना व्यंग्यकार भडैंती की सीमा में प्रवेश कर जाएगा। फिर कुछ विद्वानों ने व्यंग्य में हास्य को एक अनिवार्य तत्व माना है तो कुछ ने नहीं। आखिर वास्तविकता क्या है? हास्य और व्यंग्य में आपसी रिश्ता क्या और कैसे है? हास्य और व्यंग्य की विभाजक रेखा आखिर क्या है? और व्यंग्य का काव्यशास्त्रीय आधार क्या है है भी या नहीं?
इसकी चर्चा अगले पोस्ट में करूंगा..
जारी
मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के साहित्य में तीखे व्यंग्य मिलते हैं। मार्क्स की 'पवर्टी ऑफ फिलॉसफी','एंगेल्स की ड्यूरिंग...' और लेनिन के विभिन्न लेखों में ऐसी शक्ति है, जो कई व्यंग्यकारो के यहां से नदारद है। इससे साबित होता है कि व्यंग्य सिर्फ साहित्यिक भाषा के कमाल का नाम नहीं है। तब प्रश्न यह उठता है कि व्यंग्य क्या है और कहां से आता है?
व्यंग्य क्या है?
व्यंग्य अंग्रेज़ी के सटायर शब्द का हिंदी रूपांतर है। और इस आधार पर किसी व्यक्ति या समाज की बुराई को सीधे शब्दों में न कह कर उल्टे या टेढे शब्दों में व्यक्त किया जाना ही व्यंग्य है। बोलचाल में इसे ताना, बोली या चुटकी भी कहते हैं। हास्य, उपहास, परिहास, वाक्-वैदग्ध्य, पैरोडी, वक्रोक्ति, उपालंभ, कटाक्ष, विडंबना, अर्थ-भक्ष्य, ठिठोली, आक्षेप, निंदा-विनोद, रूपक, प्रभर्त्सना, स्वांग, अपकर्ष, चुहल, चुटकुला, मसखरी, भडैंती, ठकुरसुहाती, मज़ाक, दंतनिपौरी, गाली-गलौज ऐसे अनेक शब्द हैं, जो व्यंग्य को कमोबेश संप्रेषित करते हैं। फिर भी, इनमें से कोई शब्द व्यंग्य के व्यापकत्व को पूरी तरह निरूपित नहीं कर पाता। प्रत्येक शब्द किसी-न-किसी बिंदु पर व्यंग्य के समान होकर भी किसी अन्य बिंदु पर व्यंग्य से भिन्न हो जाता है।
ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के मुताबिक, व्यंग्य वह पद्यमय या गद्य रचना है, जिसमें प्रचलित दोषों या मूर्खताओँ का कभी-कभी कुछ अतिरंजना के साथ मज़ाक उड़ाया जाता है। इसका अभीष्ट किसी व्यक्ति विशेष या समूह का उपहास करना होता है। यानी, यह एक व्यक्तिगत आक्षेप के समान होता है।
इनसाक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के मुताबिक, साहित्यिक दृष्टि से व्यंग्य उपहासास्पद या अनुचित वस्तुओं से उत्पन्न विनोद या घृणा के भाव को समुचित रूप से अभिव्यक्त करने का नाम है। बशर्ते, उस अभिव्यक्ति में हास का भाव निश्चित रूप से विद्यमान हो तथा उक्ति को साहित्यिक रूप मिला हो। हास्य के अभाव में व्यंग्य गाली का रूप धारण कर लेता है। और साहित्यिक विशेषता के बिना वह विदूषक की ठिठोली मात्र बनकर रह जाता है।
डॉ रामकुमार वर्मा ने कहा है कि आक्रमण करने की दृष्टि से वस्तुस्थिति को विकृत कर उसमें हास्य उत्पनना करना ही व्यंग्य है। वहीं डॉ हजारी प्रसाद द्विदेदी कबीर में लिखते है कि व्यंग्य तभी होता है, जब कहने वाला अधरोष्ठ में हंस रहा होता है, सुनने वाला तिलमिला उठा हो, फिर भी जवाब देना खुद को उपहासास्पद बना लेना होता है। वैसे व्यंग्य में क्रोध की मात्रा आ जाए तो हास्य की मात्रा कम हो जाती है।
मशहूर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई अपनी किताब सदाचार का ताबीज की भूमिका कैफियत में व्यंग्य को जीवन की आलोचना करने वाला मानते हुए इसे विसंगतियों,मिथ्याचारों और पाखंडो का पर्दाफाश करने वाला मानते हैं। जीवन के प्रति वंय्ग्यकार की उतनी ही निष्ठा होती है, जितनी कि गंभीर रचनाकार की। बल्कि ज़्यादा ही। इसमें खालिस हंसना या खालिस रोना जैसी चीज़ नहीं होती।
यानी, व्यंग्य का वास्तविक उद्देश्य समाज की बुराईयों और कमजोरियों की हंसी उड़ाकर पेश करना होता है। मगर इसमें तहज़ीब का दामन मजबूती से पकड़े रहना जरूरी है। वरना व्यंग्यकार भडैंती की सीमा में प्रवेश कर जाएगा। फिर कुछ विद्वानों ने व्यंग्य में हास्य को एक अनिवार्य तत्व माना है तो कुछ ने नहीं। आखिर वास्तविकता क्या है? हास्य और व्यंग्य में आपसी रिश्ता क्या और कैसे है? हास्य और व्यंग्य की विभाजक रेखा आखिर क्या है? और व्यंग्य का काव्यशास्त्रीय आधार क्या है है भी या नहीं?
इसकी चर्चा अगले पोस्ट में करूंगा..
जारी
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