Monday, June 30, 2008

फुरसतिया दिनों की याद

गुस्ताख़ को पिछले फुरसत के दिन याद आ रहे हैं। क्यों याद आ रहे हैं॥इसका जवाब भी है कि शनिवार को दफ्तर में सत्रह घंटे तक लगातार काम करने के बाद आराम के दिन याद आने ही थे।


मेरा जो गृहनगर है॥झारखंड का छोटा-सा क़स्बा.. लाल मिट्टी वाला। सुबह उठने के विषाणु (वायरस) मुझमें कभी नहीं थे। बड़े भाई साहब जूता लेकर दचकने उठते थे, तब ही बिस्तर छोड़ता था। आंखे मलता बाहर निकलता तो देखता कि हर घर के मुखिया हाथों में खुरपी लेकर घास खोद रहे हैं, बागीचे में पानी दे रहे हैं, आंगन में झाड़ू दे रहे हैं या यूं ही फुरसतिए कि तरह क्रोटन के पौधों से सूखी पत्तियां ही नोच रहे हैं। अस्तु.. थोडी़ देर बाद उनकी जब ये काम खत्म होता तो किसी एक के घर के बाहर सब जमा होते... कुरसियां डल जातीं।


घर के स्वामी छोटी बिटिया या मेरे जैसे नाकारा बेटे को चाय का आदेश देते। चाय आ जाती। आकाशवाणी पर समाचार सुने जाते। पहले दिल्ली वाले, पटना वाले फिर रांची से मतलब कम-अज-कम दो बुलेटिन तो सुने ही जाते। फिर बीबीसी वाले समाचारों का चर्वण होता। गांव की राजनीति से फिलीस्तीन मसला सब सुलझा लिया जाता। कुछ भाईबंद खेल के जानकार होते। नए लड़के सचिन के क्रिकेटिय टैलेंट की बात होती। कपिल के इनस्विंगर की॥ रवि शास्त्री के धीमे खेलने की.. ऐसी ही बातें। विधायक जी के चावल चुराने से लेकर स्थानीय एमपी साहब पहले कोयले की मालगाडियो से कोयले चुराया करते थे इसका रहस्योद्घाटन भी।


ऐसी ही बातों में चाय का एक और दौर चलता। बातों के अंतहीन सिलसिले... जो तभी टूटता जब गृहस्वामिनी परदे के पीछे से डांटने की-सी मुद्रा में कहती - क्यों जी स्कूल (या दफ्तर जो भी लागू हो) नहीं जाना। फिर जमात धीरे-धीरे बिखरती । अपने-अपने घर में नहाने खाने के बाद एक हाथ से साइकिल और दूसरे से धोती का छोर पकड़ के लोगबाग दफ्तर को निकल लेते।


दप्तर में काम की कमी या काम करने की इच्छा की कमी के मद्देनज़र पहले शान से कुरसी झड़वाई जाती। स्कूल के केस में मास्टर साहब प्रार्थना के बाद या उसेक दौरान ही पहुंचते। मुझे याद है प्रार्थना के दौरान मास्टर साहब लोग आंखे मूंद कर पता नहीं किसके खयालों में खो जाते थे। संभवतः अपने इष्ट के खयाल में। लेकिन लड़के इस अवसर का फायदा उठाते। कुछ तो घर को फूट लेते ॥ बाकी जो फूट नहीं सकते वे आपस में लड़कर,एक दूसरे को गाली देकर या पादकर ही अपनी भड़ास निकालते।


फिर हर दो पीरियड के बाद चाय के दौर होते। शाम के वक्त॥यानी पांच बजे दफ्तर के लोग दो हिस्सों में निकलते।। एक जो सब्जी बाजार होते हुए घर लौटेंगे। और दूसरे जिनकी बीवियां वित्त मंत्री हुआ करतीं। लौंडे खेल के मनौदान की तरफ... बरसात होती तो फुटबॉल खेला जाता, जाडों में क्रिकेट और गरमियो में बेल तोड़कर खाए जाते। जिसके अंदर का गोंद हमारे मुंह पर लगा जाया करता था। गरमियों में आम तौर पर हम पतंगे उड़ाते, गोली खेलते या फिर गिल्ली डंडा खेलते। अब तो मौसम के हिसाब से खेल का चलन खत्म हो गया है और बरसात हो या गरमी क्रिकेट ही खेली जाती है।


वह मैदान लड़कियों के स्कूल का पिछवाड़ा था। और उस दौरान हम प्यार-मुहब्बत के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे। जब जान गए तो अपना एक पीरियड गोल कर पहले ही मैदान पहुंच जाते थे। टापने। कईयों को उस दौरान ट्रू-लव (सच्चा प्यार) भी हुआ। हमारा चैहरा ही इतना चूतियाटिक था, कि लड़कियां घास नहीं डालती थी।(राज की बात ये कि आज भी नहीं डालती) फिर दसवीं के इम्तिहान के बाद लड़के छिटक गए। कोई पटना कोई रांची निकल गया। एक दोस्त की प्रेम कहानी बडी़ मार्मिक है। वह दसवीं के बाद लखनऊ चला गया। उसकी प्रेमकथा इतनी मार्मिक है कि दिल पर पत्थर रखकर लिखना पड़ेगा। बड़ा पत्थर चाहिए होगा, खोज रहा हूं मिलते ही फिर बताऊगा। लेकिन अभी तो वो पल याद आ रहे हैं, जब चिंता नाम की चीज़ नहीं थी। एक ही चिंता हुआ करती थी संस्कृत की परीक्षा में पास होने की।

Saturday, June 28, 2008

नौकरी- एक कविता


मैं फिर से मां की आंखों का तारा हो गया हूं,
बहनों का दुलारा हो गया हूं,
झिड़कियां थमती नहीं थी जिनकी,
नौकरी मिली,

तो उन सबका प्यारा हो गया हूं।

Tuesday, June 24, 2008

सौमित्र च‍टर्जी को दादा साहेब फाल्के


ताज़ा खबर ये है कि बांगला फिल्मों के जानेमाने अभिनेता सौमित्र च‍टर्जी को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार दिया जा सकता है। इस बारे में बाज़ार में खय्याम और प्राण के नामों पर भी विचार चल रहा था। लेकिन सूत्रों के मुताबिक बांगाली कार्ड कारगर हो गया है। और इस साल सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार भी मुंह फुला कर स्वीकारकरने वाले सौमित्र को दादा साहेब दिया जाएगा। बहरहाल ,हम उनकी काबिलियत पर शंका नहीं कर रहे और जानते हैं कि वह इसके काबिल हैं और उन्हें बहुत पहले ऐसे पुरस्कार मिल जाने चाहिए थे। आखिर सत्यजित रे के साथ उन्होंने १४ फिल्में की हैं।

Monday, June 23, 2008

कैसे बने कामयाब पति- कुछ नुस्खे


आज के दौर में हर शादीशुदा या गैरशादीशुदा इंसान जिस समस्या से जूझ रहा है वह है कामयाब पति कैसे बनें की जद्दोजहद-- कक्का जी ने सोफे पर पसरते हुए बयान दिया। कक्का जी का चेहरा भव्य है और पीआर करने में माहिर हैं, उनकी मूंछे यूपीए गठबंधन की तरह खिचडी हैं। नाक के बाल बीएसपी की तरह कभी समर्थन देते हैं, कभी खींच लेते हैं।


गुस्ताख हैरान रह गया। शादीशुदा तो खैर समझ में आता है कि परेशां होंगे लेकिन गैर शादीशुदा॥?यार वो भी कभी शादीशुदा होंगे कि नहीं-- कक्का जी ने बात साफ़ की। देखते नहीं कि कनाडा में बठे उड़नतश्तरी तक पत्नी से घबराते हैं। पत्नी होती ही घबराने वाली चीज़ है। कविता या कहानी में किसी स्त्री की जिक्र हो जाए, तो पत्नी एयर ले लेती है। कौन है? किस पर लिखा है इतना रोमांटिक ? हम पर तो कभी नहीं लिखा? अब आप जनाब देते रहे दुहाई-- तुमको मैं अपनी जान कहूँ या नील गगन का चाँद कहूँ।

गुस्ताख घबराया - यार कक्का कोई तो नुस्खा होगा कामयाब पति बनने का। कक्का जी फूले -सुनो बचवा हमारे हमारे पास इस बारे में अगाध नॉलेज है। गुस्ताख ने पूछा - पति बनने का? पर हमारे खयाल से आप भी बेलन नहीं तो कम-अज-कम बातों से पसली तो रोज़ाना तुड़वाते ही हैं। कक्का जी ने रजनीश को बहुत पढ़ा है।

उनकी बातचीत में सेक्स बहुत बार प्रयोग होता है। कुछ महिला विमर्श भी पढ़ रखा है। सेकेंड सेक्स भी पढ़ने दिया था। साइकोलजी पढ रखी है। कहा- तुन्हें अभिनय आना चाहिए वह भी बेदाग। रोने लगो तो राजेंद्र कुमार फेल हो जाना चाहिए। भावप्रवण अभिनय करो॥ राजकपूर की तरह.. लगे कि यह जो बंदा है सच्चा है और आरोप लगे तो अभी मैच फिक्सिंग में फंसे कपिल की तरह दहाड़ें मार कर रो पड़ेगा।

दूसरा, झूठ बालना आना चाहिए। पत्नी को बिला शक बॉस मानते हुए बहाने बनातर हमेशा तैयार रखों। बहाने भी एक दम फिट एन फाईन हों? यार आज तो लाईफ़ एँड डेथ का मामला था। इस टाइप का॥कक्का जी कुछ बोलने ही वाले थे कि भीतर से काकी ने आवाज़ लगाई..कक्का बाहर निकले तो कुछ और नुस्खें बताएं। हम भी इंतजार में हैं।

Friday, June 20, 2008

मेरी अभिलाषा- कविता

मैं होना चाहता हूं पेड़
ताकि कोई ले जाए तोड़कर मेरी शाख़
और मुझे जलाकर पकाए अपनी रोटियां
उसकी फूंकों के संग बन कर उडुं राख

मैं होना चाहता हूं चुटकी भर नमक
या कि हल्दी
कि मेरे होने से किसी के खाने में आ जाए स्वाद
किसी की पीली हो जाए दाल
और मुस्कुराहटों से भर जाए उसके गाल

मैं होना चाहता हूं घास
कि मुझे खाकर कोई गाय
बना दे दूध
या कि गोबर सही
कि किसी के चूडी़ भरे हाथों से दुलरा का दीवारों पर ठोंक दिया जाऊं
उपले बनकर चूल्हे में जलूं
पर कुछ होने की खुशी पाऊं

Wednesday, June 18, 2008

तपन सिन्हा को लाईफ टाईम अचीवमेंट

ताजा समाचार ये है कि इस बार भारत का पहला लाईफ़ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार तपन सिन्हा को दिया जाएगा। २० जून को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी न्यू अलीपुर के उनके मकान पर जाकर उन्हें ये पुरसकार देंगे। साथ में सूचना और प्रसारण मंत्री प्रिय रंजन दास मुंशी भी होंगे। लाईफ टाईम अचीवमेंट श्रेणी को पहली बार राष्ट्रीय पुरस्करों में शामिल किया गया है। और भारत की आजा़दी की साठवीं सालगिरह पर इसे शुरु किया गया है।

तपन सिन्हा की पहली फिल्म उपहार थी जो १९५५ में रिलीज़ हुई थी। १९५६ मे रिलीज़ हुई फिल्म काबुलीवाला दूसरी फिल्म थी।इसके गाने तो आज तक लोगो की ज़बान पर हैं। इसके अलावा एक डॉक्टर की मौत, सगीना और आदमी और औरत तपन दा की बेहतरीन फिल्मों में गिनी जाती हैँ। आपने बावर्ची जैसी कई फिल्मों की कहानी भी लिखी है।

Friday, June 13, 2008

सस्ता शेर

"उन्हें याद करने का ये रीज़न था

कि मर जाए निगोडी़ हिचकी लेते-लेते।।"


नोट- महिलाएं अपने पुरुष मित्रों के लिए 'निगोडा़' शब्द इस्तेमाल करें।