Friday, April 17, 2009

नरक में मार्च एंडिंग


मैं आजकल नरक में हूं। नरक में रहना कोई बहुत पापकर्म रहा नहीं। नरक में भी मौज है। मर्त्यलोक में हमारे कर्मों का लेखा-जोखा करने के बाद और हमारे चरित्र का विश्लेषण करने के बाद चित्रगुप्त जी महाराज ने बहियां जला दीं क्योंकि उन्हें डर है कि इस सेंसरशिप के बगैर आने वाली पीढियां हमारी तरह ही गुस्ताख और बददिमाग़ हो लेंगी।

बहरहाल, मौज में हूं। नरक में जितना फंड बजट के बाद आया था, खर्च नहीं हो पाया। पता नहीं क्यों। जिस कड़ाह में तेल डाल कर हम जैसे पापियों को उबालते-तलते थे, उसकी तली में छेद हो गया है। कड़ाह खरीदा नहीं गया है, एक पुराना कड़ाह कबाड़ में रखा तो है लेकिन न तो कोयला है जलाने के लिए और न ही तेल आ पाया है। इस काम के लिए फंड नहीं था।


जिस आरे से पापियों को चीरा जाता रहा है, उस आरे की दांतें घिस गई हैं। गोया उस आरे से चोट तो लग सकती है लेकिन चीरा नहीं जा सकता। सारे हरबे-हथियार पुराने पड़े हुए हैं, संग्रहालय में रखने लायक हो चुके हैं। हम सारे पापी उस हथियारखाने की ओर से गुज़रते हैं तो सादर थूक समर्पित करते हुए जाते हैं।


नरक में पूछताछ के कमरे, अपराधी के सिर पर जलने वाला जो ढाई सौ वॉट का बिजली का बल्ब लगा होता है, वह फ्यूज़ हो चुका है और चेहरे पर फेंकने के लिए गंदे पानी की सप्लाई भी रोकी हुई है। ऐसे में पापियों से पूछताछ रुकी हुई है। स्टे ऑर्डर लगा हुआ है पूछताछ पर। पापी चक्की भी नहीं पीस पा रहे... चक्की चलाएं तो कैसे, पीसने के लिए अनाज भी नहीं आया।


ये सारा मामला फरवरी के आखिरी दिनों तक ही था। मार्च के शुरुआती दिनों में एडमिन( नरक प्रशासन) की नींद खुली। अतिरिक्त महानिदेशक ने डायरेक्टर से, डायरेक्टर ने जॉइंट डायरेक्टर, जॉइँट डायरेक्टर ने डिपुटी डायरेक्टर से यानी बड़े अधिकारी ने छोटे अधिकारी से और उस अधिकारी ने एकांउंटेंट से जानकारी मांगी।


कहा, फंड खरचना ज़रूरी है वरना अगले वित्त वर्ष में फंड कम हो जाएगा। अब नरक में मच गई अफरातफरी। निविदाएं मंगाई जाने लगीं। अधिकारियों के कमरे में एसी बदल दिए गए। पूरे नर्क प्रशासन भवन की पुताई की गई, साइन बोर्ड, बदल दिए गए। सेंट्रलाइज्ड एसी को दुरुस्त करने के बहाने ढेर खर्च किया गया।


मज़बूत दीवार को तोड़ने में कई मजदूर लगाए गए...फिर उसे तोड़कर कमजोर और डिजाइनदार दीवार बनाई गई। अतिरिक्त महानिदेशक और संयुक्त सचिव को पसंद नहीं आई। नतीजतन दीवार तोड़ दी गई और उसकी जगह नामी कंपनी का बना कांच लगाया गया।


नरक के लॉन में खुदाई करके नर्सरी से मंगाई गई घास रोपी गई। किनारे-किनारे मंहगी इंटें गाड़कर फूलों के पौधे लगाने की जगह बनाई गई। साइकस और मनीप्लांट के मंहगे पौधे मंगाए गए। सात-आठ सौ पौधे, जिनमें पानी न डालने की सख्त हिदायत दी गई है। लोगबाग उसे थूकदान की तरह इस्तेमाल करते हैं।


सभी अधिकारियों के कमरों में नए सोफे लगाए गए और वैसे लोग जो सोफे के काहिल नही उनके कमरे में नए कवर वाले पुराने सोफे डाल दिए गए। फर्श की घिसाई की गई.. मतलब सारे पैसे खर्च हो गए, अब चपरासियों को वेतन नहीं मिला है और कड़ाह वगैरह की खरीद नहीं हो पाई है। पानी की सप्लाई दुरुस्त नहीं हो पाई है, तेल बेचने वाला कोई अधिकारी का रिश्तेदार नहीं निकल पाया सो निविदा भी नहीं निकल पाई। आरा अब भी दांत के इंतजार में है। हरबे हथियारों के ज़रुरत ही नहीं है, उसका इस्तेमाल करना कौन चाहता है।


लब्बोलुआब ये कि अधिकारी वित्त वर्ष खत्म होने से पहले खुले हाथों से फंड की रकम खर्च करने में व्यस्त हैं। यमराज ये देखने में लगे है कि उसकी बाईट किस चैनल पर कितने देर चली। और हम पापी नरक में मज़े ले रहे हैं।


Tuesday, April 14, 2009

एक ग़ज़ल

शामिल तेरी हयात मेरी शायरी में है
अब पूरी कायनात मेरी शायरी में है।

ये नज़्म, ये ग़ज़ल, ये क़ता ये रुबाईयां,
ख्वाबों की इक जमात मेरी शायरी में है।

दिन भर की दौड़-धूप, थकन और बेकसी
उसपर सितम की रात, मेरी शायरी में है।

मेरे अदब से सारे फरिश्ते सहम गए,
ये कैसी वारदात मेरी, शायरी में है।

गुस्ताख़ लग रहा है ज़माने को फलसफ़ा,
लेकिन ज़रा-सी बात मेरी शायरी में है।

Monday, April 13, 2009

सन्नाटा

सन्नाटा
यह कैसा सन्नाटा है,

जो कान फोड़ता है

यह सन्नाटा भी कितने

सवाल बोलता है

यह कैसा सन्नाटा हैं

जिसमें इतनी आवाज़ें हैं

हर गली हर मोड़ पर

हर शख्स परेशान है

यह सन्नाटा है ऐसा

यह सन्नाटा है ऐसा भेड़िया हो झपटने को तैयार

या ज़मीन हो जाए लाल

यह सन्नाटे की शाम है या

सन्नाटे की भोर है

ये भरी दोपहर है या

रात के अंतिम छोर है

यह कैसा सन्नाटा है जो कान फोड़ता है

यह सन्नाटा भी कितने सवाल बोलता है।

अगिया बैताल भी शांतिदीप के प्रशंसक है। बैताल ने ये कविता कमेंट के ज़रिए भेजी है। जाहिर है, इसे छापना मेरे लिए उतना ही ज़रूरी है। बैताल के राज में उसी से वैर..गुस्ताख हूं तो क्या उतनी हिम्मत थोड़े ही है।

Saturday, April 11, 2009

अंतर्गाथा- साला मैं तो एंकर बन गया।

अंतर्गाथा- मैं सिफारिशी लाल बोल रहा हूं


मेरा नाम है सिफारिशी लाल। आज कल मैं एंकर हूं, प्रतिष्ठित चैनल में... पहले मैं कबाड़ खरीदने बेचने का काम करता था। लेकिन उस बात को दिल पर न लें। क्योंकि उससे भी पहले मैं जनपथ पर लुंगी और रुमाल बेचा करता था।


बहरहाल, आज मेरी एंकरिंग का पहला दिन है। मैंने एक दम झक्क नया कोट-पैंट खरीदा है। मूंछें करीने से कुतरवाई हैं, शेव को सीधा-उल्टा दोनों तरह से मारा है। स्लमडॉग की तरह एक लड़की इम्प्रैस करनी है आज।


चेहरे पर ढेरों मेक-अप पुतवा कर नकली चेहरा लाना और नकली शालीनता लाना ज़रुरी है। हमारे चैनल की खासियत है शालीनता। ओढी हुई। मेरे चश्मे का एक रिम टेढा़ हो चुका है, लेकिन ुसे सीदा करने का वक्त नहीं है। दुनिया को टेढी़ निगाह देखना ज़रूरी हो गया है।


मैं तैयार हूँ। ८ बस बजने ही वाले हैं। टीम ने स्क्रिप्ट लिख दी होगी। उसपर नज़र डालकर होगा क्या? सीधे टेलि-प्रॉम्प्टर से पढेंगे। ऊपर से प्रसन्न दिखने की चेष्टा कर रहा हूं। अंदर से दिल धक्क-धक्क और सांसे फक्क-फक्क कर रही हैं। सिर्फ मैं ही जानता हूं कि ८ बजे का प्राइम टाइम पाने के लिए कितनी टंगड़ी मारनी पड़ी है मुझे।


पसीना आ रहा है पेशानी पे। ब्लड का बहाव तेज़ हो गया है। टीम के सारे लोग दुश्मन लग रहे हैं। स्क्रिप्ट में स, श और ष का अनुप्रास जानबूझकर डाल दिया है चू.. यो ने। सोच रहा हूं कि अपना अजेंडा कैसे पेल दूं कार्यक्रम में, आखिर जिन आकाओं ने मुझे यहां तक पहुंचाया, उनसे वफा करना ही होगा।
इस ज़माने में वफा की उम्मीद करना बेकार है, लेकिन हम उन लोगों में हैं जो वफादार है। हो भी क्यों न कोई और चारा ही नहीं। पैर छू-छू कर तो यह पद मिला है। जितने सांसदों -विधायको-पार्षदों को जानता हूं, सबके चरण घिस दिए हैं छू-छू कर मैंने।


कईयों ने तो अपने चरणों का देसी इस्तेमाल किया है मेरे लिए। मतलब मुझे लात भी मारी है। लेकिन दुधारु गाय की तो लात भी सहनी पड़ती है, है ना। सो उनके चरणों को मैं चरणामृत समझ कर सादर ग्रहण करता हूं, किया है आज तक।


एडीटोरियल टीम के मेरे लोग गदहे हैं। बड़े आदमी की अहमियत नहीं समझते। मै कितना बड़ा हूं इसका कत्तई अंदाजा नहीं है इन्हें। बहरहाल, मैंने रनडाउन देख लिया है। मेरा तो कहीं नाम ही नहीं है। इतने बड़े आदमी का नाम तो कार्यक्रम से भी बड़ा होना चाहिए।


कार्यक्रम की शुरुआत ही होनी चाहिए... नमस्कार....। मैं हूं सिफारिशी लाल, और मेरे साथ हैं मेरे को-एंकर हरफनमौला.. मेहमान है घुन्ने लाल. चर्चा करेंगे हॉलैंड में अकालपीडितों पर। सबसे आखिर में बोलूंगा कार्यक्रम का नाम.. न्यूज़ आठ बजे।


लेकिन लाइट्स जल चुकी हैं, कैमरा ऑन हो चुका है, मुझे घबराहट वैसी ही हो रही है, मेरा साथ एंकर हरफनमौला मुझसे ज्यादा तेज़ है। शुरु मुझे करना है, शुरु कैसे किया जाए????


हां, आइसक्रीम की फेरी वाले की तरह चीख कर, सावधान मुद्रा में... नमस्काआआआआआआआर। इससे आईबीएन-७ वाले आशुतोष वाला पुट भी आ जाएगा। कबाडी खरीदते वक्त भी मैं ऐसे ही फेरियां लगाया करता था। जिंदाबाद मिल गया... यूरेका।


लो जी कार्यक्रम हो गया शुरु। थोड़ा सा अटक गया मै लेकिन कोई बात नहीं देश की जनता के लिए नहीं अपनी प्रेमिका की आंख और आकाओँ के चरणों में समर्पित मेरी ये एंकरिंग.. बस स, श और ष सही से कहना है।


....नमश्कार, मैं हूं शिपारिसी लाल और मेरे शाथ हैं मेरे शाथी एंकर हरफनमऊला जी, ......

एडिटोरिल वाले गधे कान में कुछ कह रहे हैं टॉक बैक के ज़रिए, चूतियों को कहने दो, साला मैं तो एंकर बन गया। सवाल दर सवाल पूछते चलो। मतलब चाहे उसका कुछ न हो।

Tuesday, April 7, 2009

''अच्छे-अच्छे काम करते जाना-3

वरुण देवता का प्रसाद गांव अपनी अंजुली में भर लेता था.

और जहां प्रसाद कम मिलता है? वहां तो उसका एक कण, एक बूंद भी भला कैसे बगरने दी जा सकती थी. देश में सबसे कम वर्षा के क्षेत्र जैसे राजस्थान और उसमें भी सबसे सूखे माने जाने वाले थार के रेगिस्तान में बसे हजारों गांवों के नाम ही तालाब के आधार पर मिलते हैं. गांवों के नाम के साथ ही जुड़ा है 'सर'. सर यानी तालाब. सर नहीं तो गांव कहां? यहां तो आप तालाब गिनने के बदले गांव ही गिनते जाएं और फिर इस जोड़ में 2 या 3 से गुणा कर दें.

जहां आबादी में गुणा हुआ और शहर बना, वहां भी पानी न तो उधार लिया गया, न आज के शहरों की तरह कहीं और से चुरा कर लाया गया. शहर ने भी गांवों की तरह ही अपना इंतज़ाम खुद किया. अन्य शहरों की बात बाद में, एक समय की दिल्ली में कोई 350 छोटे-बड़े तालाबों का जिक्र मिलता है.गांव से शहर, शहर से राज्य पर आएं. फिर रीवा रियासत लौटें. आज के मापदंड से यह पिछड़ा हिस्सा कहलाता है. लेकिन पानी के इंतज़ाम के हिसाब से देखें तो पिछली सदी में वहां सब मिलाकर कोई 5000 तालाब थे.

नीचे दक्षिण के राज्यों को देखें तो आज़ादी मिलने से कोई सौ बरस पहले तक मद्रास प्रेसिडेंसी में 53000 तालाब गिने गए थे. वहां सन् 1885 में सिर्फ 14 जिलों में कोई 43000 तालाबों पर काम चल रहा था. इसी तरह मैसूर राज्य में उपेक्षा के ताजे दौर में, सन् 1980 तक में कोई 39000 तालाब किसी न किसी रूप में लोगों की सेवा कर रहे थे.

इधर-उधर बिखरे ये सारे आंकड़े एक जगह रख कर देखें तो कहा जा सकता है कि इस सदी के प्रारंभ में आषाढ़ के पहले दिन से भादों के अंतिम दिन तक कोई 11 से 12 लाख तालाब भर जाते थे- और अगले जेठ तक वरुण देवता का कुछ न कुछ प्रसाद बांटते रहते थे. क्योंकि लोग अच्छे-अच्छे काम करते जाते थे.

आज भी खरे हैं तालाब एक किताब पढी है हाल में... गांधी शांति प्रतिष्ठान की, जानकारी भी बढ़ी। ऐसी जानकारियां जो मेरे घर की हैं लेकिन खुद नहीं जानता था मैं... सो सोचा कुछ आप लोगो से भी बांट
लूँ


अच्छे-अच्छे काम करते-2

समाज ने जिस काम को इतने लंबे समय तक बहुत व्यवस्थित रूप में किया था, उस काम को उथल-पुथल का वह दौर भी पूरी तरह से मिटा नहीं सका. अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के अंत तक भी जगह-जगह पर तालाब बन रहे थे.

लेकिन फिर बनाने वाले लोग धीरे-धीरे कम होते गए. गिनने वाले कुछ जरूर आ गए पर जितना बड़ा काम था, उस हिसाब से गिनने वाले बहुत ही कम थे और कमजोर भी.


इसलिए ठीक गिनती भी कभी हो नहीं पाई. धीरे-धीरे टुकड़ों में तालाब गिने गए, पर सब टुकड़ों का कुल मेल कभी बिठाया नहीं गया. लेकिन इन टुकड़ों की झिलमिलाहट पूरे समग्र चित्र की चमक दिखा सकती है.



लबालब भरे तालाबों को सूखे आंकड़ों में समेटने की कोशिश किस छोर से शुरू करें? फिर से देश के बीच के भाग में वापस लौटें.




आज के रीवा ज़िले का जोड़ौरी गांव है, कोई 2500 की आबादी का, लेकिन इस गांव में 12 तालाब हैं. इसी के आसपास है ताल मुकेदान. आबादी है बस कोई 1500 की, पर 10 तालाब हैं गांव में. हर चीज़ का औसत निकालने वालों के लिए यह छोटा-सा गांव आज भी 150 लोगों पर एक अच्छे तालाब की सुविधा जुटा रहा है. जिस दौर में ये तालाब बने थे, उस दौर में आबादी और भी कम थी. यानी तब ज़ोर इस बात पर था कि अपने हिस्से में बरसने वाली हरेक बूंद इकट्ठी कर ली जाए और संकट के समय में आसपास के क्षेत्रों में भी उसे बांट लिया जाए. वरुण देवता का प्रसाद गांव अपनी अंजुली में भर लेता था.


''अच्छे-अच्छे काम करते जाना,

''अच्छे-अच्छे काम करते जाना,'' राजा ने कूड़न किसान से कहा था. कूड़न, बुढ़ान सरमन और कौंराई थे चार भाई. चारों सुबह जल्दी उठकर अपने खेत पर काम करने जाते.


दोपहर को कूड़न की बेटी आती, पोटली से खाना लेकर. एक दिन घर से खेत जाते समय बेटी को एक नुकीले पत्थर से ठोकर लग गई. उसे बहुत गुस्सा आया. उसने अपनी दरांती से उस पत्थर को उखाड़ने की कोशिश की. और फिर बदलती जाती है इस लंबे किस्से की घटनाएं बड़ी तेजी से. पत्थर उठा कर लड़की भागी-भागी खेत पर आती है. अपने पिता और चाचाओं को सब कुछ एक सांस में बता देती है.

चारो भाइयों की सांस भी अटक जाती है. जल्दी-जल्दी सब घर लौटते हैं. उन्हें मालूम पड़ चुका है कि उनके हाथ में कोई साधारण पत्थर नहीं है, पारस है. वे लोहे की जिस चीज़ को छूते हैं, वह सोना बन कर उनकी आंखों में चमक भर देती है.

पर आंखों की यह चमक ज्यादा देर तक नहीं टिक पाती. कूड़न को लगता है कि देर-सबेर राजा तक यह बात पहुंच ही जाएगी और तब पारस छिन जाएगा. तो क्या यह अच्छा नहीं होगा कि वे खुद जाकर राजा को सब कुछ बता दें.

किस्सा आगे बढ़ता है. फिर जो कुछ घटता है, वह लोहे की नहीं बल्कि समाज को पारस से छुआने का किस्सा बन जाता है. राजा न पारस लेता है, न सोना. सब कुछ कूड़न को वापस देते हुए कहता है : '' जाओ इससे अच्छे-अच्छे काम करते जाना, तालाब बनाते जाना.''

यह कहानी सच्ची है, ऐतिहासिक है- नहीं मालूम. पर देश के मध्य भाग में एक बहुत बड़े हिस्से में यह इतिहास को अंगूठा दिखाती हुई लोगों के मन में रमी हुई है. यहीं के पाटन नामक क्षेत्र में चार बहुत बड़े तालाब आज भी मिलते हैं और इस कहानी को इतिहास की कसौटी पर कसने वालों को लजाते हैं- चारों तालाब इन्हीं चारों भाइयों के नाम पर हैं. बुढ़ागर में बूढ़ा सागर है, मझगवां में सरमन सागर है, कुआंग्राम में कौंराई सागर है तथा कुंडम गांव में कुंडम सागर.

सन् 1907 में गजेटियर के माध्यम से इस देश का 'व्यवस्थित' इतिहास लिखने घूम रहे अंग्रेज ने भी इस इलाके में कई लोगों से यह किस्सा सुना था और फिर देखा- परखा था इन चार बड़े तालाबों को. तब भी सरमन सागर इतना बड़ा था कि उसके किनारे पर तीन बड़े-बड़े गांव बसे थे. और तीनों गांव इस तालाब को अपने-अपने नामों से बांट लेते थे. पर वह विशाल ताल तीनों गांवों को जोड़ता था और सरमन सागर की तरह स्मरण किया जाता था. इतिहास ने सरमन, बुढ़ान, कौंराई और कूड़न को याद नहीं रखा लेकिन इन लोगों ने तालाब बनाए और इतिहास को किनारे पर रख दिया था.

देश के मध्य भाग में, ठीक हृदय में धड़कने वाला यह किस्सा उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम- चारों तरफ किसी न किसी रूप में फैला हुआ मिल सकता है और इसी के साथ मिलते हैं सैकड़ों, हजारों तालाब. इनकी कोई ठीक गिनती नहीं है. इन अनगिनत तालाबों को गिनने वाले नहीं, इन्हें तो बनाने वाले लोग आते रहे और तालाब बनते रहे.

किसी तालाब को राजा ने बनाया तो किसी को रानी ने, किसी को किसी साधारण गृहस्थ ने, विधवा ने बनाया तो किसी को किसी आसाधारण साधु-संत ने- जिस किसी ने भी तालाब बनाया, वह महाराज या महात्मा ही कहलाया. एक कृतज्ञ समाज तालाब बनाने वालों को अमर बनाता था और लोग भी तालाब बना कर समाज के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते थे.

समाज और उसके सदस्यों के बीच इस विषय में ठीक तालमेल का दौर कोई छोटा दौर नहीं था. एकदम महाभारत और रामायण काल के तालाबों को अभी छोड़ दें तो भी कहा जा सकता है कि कोई पांचवी सदी से पन्द्रहवीं सदी तक देश के इस कोने से उस कोने तक तालाब बनते ही चले आए थे. कोई एक हज़ार वर्ष तक अबाध गति से चलती रही इस परंपरा में पन्द्रहवीं सदी के बाद कुछ बाधाएं आने लगी थीं, पर उस दौर में भी यह धारा पूरी तरह से रुक नहीं पाई, सूख नहीं पाई.