Wednesday, January 27, 2010

ब्लडी बास्‍टर्ड बनाम आई विल गो फर्स्ट


पिछले दिनों कोलकाता में था। ज्योति बसु के अंतिम दिनों की कवरेज के लिए। उन्हीं दिनों एक खबर आई थी, हमारे सम्माननीय पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा ने अपने विपक्षी नेता कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदुयरप्पा को ब्लडी बास्टर्ड कहा।


जिन ज्योति बसु की पार्टी की ऐतिहासिक भूल की वजह से देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बने थे, वहीं देवेगौड़ा की इस जानबूझ कर की गई ऐतिहासिक गलती का दूसरा पक्ष भी सामने आया। पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ज्योति बाबू का हाल-चाल लेने एएमआरआई अस्पताल पहुंचे।


नीचे, अपने काफिले को पीछे छोड़ते हुए वह अकेले ही मीडिया के पास आए, भर्राए गले में कहा कि राजनैतिक रुप से दो ध्रुवों पर रहते हुए भी पिछले साठ साल से हम अच्छे दोस्त हैं। मैंने ज्योति से वादा किया है कि ...आई विल गो फर्स्ट....


अब सिद्धार्त शंकर रे अपने वायदे पर खरे तो नहीं उतर पाए, और ज्योति दा पहले चले गए। लेकिन राजनीति का एक नया कोण मेरे लिए छोड़ गए। जिसमें एक ओर तो देवेगौड़ा खड़े थे, दूसरी तरफ रे। तीसरा कोण भी सामने आया जब ममता बनर्जी ज्योति दा के निधन के बाद मातमपुर्सी में आई और मीडिया के सामने गला फाड़ कर बोल गई कि ज्योति बुस वाज़ फर्स्ट एंड लास्ट चैप्टर ऑफ लेफ्ट पॉलिटिक्स इन वैस्ट बंगाल...।


मैं चित्त हो गया था। ये तीसरा कोण आज की राजनीति है। पहले भी राजनीति ऐसे हो होती होगी। लेकिन तीनो कोण तीनों अलग एंगल से ...और इसके क्या निहितार्थ हो सकते हैं..इस पर विचार किया जा सकता है।

Tuesday, January 5, 2010

नॉलेज इकॉनमी का सही अर्थ बतर्ज कक्का जी

कक्का जी आज क्रांतिकारी मूड में है। आर्थिक सुधारों को लेकर उनके नज़रिए की हम बहुत क़द्र करते हैं। कहते हैं दुनिया का सबसे निजीकरण वाला देश भारत ही है।

गुस्ताख़ भी सहमत है।

क्या कक्का कैसे?

अरे बचुकिया, पुलिस वाले को अपनी रक्षा के लिए जैसे ही तुम सौ का क़ड़कड़िया नोट देते हो, लाल बत्ती टपक के ट्रैफिक वाले को बीस की लाल परी देते हो, स्कूल से सर्टिफिकेट के लिए क्लर्क को सुविधा शुल्क देते हो... जैसे ही अपने निजी काम के लिये सरकारी कर्मचारी को आपने पैसे दिए...यह निजीकरण हुआ या नहीं... हमने हामी भरी।

कक्का जी निराश भी है, हताश भी..नया साल आ गया है कुछ नहीं बदला.. अमेरिका वाले नाश्ते में दस और खाने में पंद्रह बम फोड़ ही रहे हैं, और भारत का क्या होगा..नया साल आ गया लेकिन नक्सल से लेकर विधायकों की खरीद फरोख्त तक हर चीज पहले की तरह जारी है...।

गुस्ताख़ ने विरोध दर्ज कराना चाहा, अरे कक्का जी आप इतने हताश मत होइए..हम इक्कीसवीं सदी में सबसे तेज़ अर्थव्यवस्था होने वाले हैं।

अरे तुम चुप करो जी, जानते चाटते कुछ नहीं, लबरई किए जा रहे हो.. ये तो आईएमएफ का लॉलीपॉप है।

कक्का हम नॉलेज इकॉनमी हैं..

अच्छा ठीक है यह संभावना है। लेकिन सुधारों की बहुत ज़रुरत है। आंकड़ों की बाजीगरी में मत पड़ो। अच्छा बताओ लेटेस्ट डेटा के लिहाज से हमारी साक्षरता कितनी है?

६७ फीसदी।

ठीक..। अच्छा बताओ साक्षरता की परिभाषा क्या है?

कोई आदमी अगर अपना नाम लिख ले..या रेलवे स्टेशन का नाम पढ़ ले... हमने जवाब दिया। ...लेकिन अपनी ही मातृभाषा में... कक्का जी ने जोड़ा। हमारे पास बात मानने के सिवा कोई चारा नहीं था।

अच्छा पता है, देश में कितने प्रतिशत लोग पाचवी पास हैं या अखबार पढ़ सकते हैं?

हमारे पास जवाब नहीं था...

२७ फीसद.... जबाव आया। ये बताओ कितने लोग मैट्रिक हैं यानी दसवीं पास हैं? उनका प्रतिशत कितना है हमारी कुल आबादी का?

हम निरुत्तर। महज तीन फीसद..कक्का जी ने गहरी सांस ली। और ग्रेजुएट? कक्का जी का अगला सवाल था।

पता नहीं.. यह प्रतिशत हैं महज डेढ़। यानी सिर्फ डेढ़ करोड़ लोग ग्रेजुएट हैं। इन ग्रेजुएट्स में आधे ऐसे विषयों से हैं जिन्हे कुशल(स्किल्ड) नहीं माना जा सकता। तो ४० लाख कुशल लोगों के साथ तुम नॉलेज इकॉनमी की बात कर रहे हो? धत्.. उन्होंने करीब-करीब घृणा भरी निगाहों से मुझे देखा।

लेकिन कक्का जी को मैंने समझाना चाहा हममें बहुत संभावनाएं हैं... सोच लो तीन करोड़ लोग ग्रेजुएट हो जाएं तो दुनिया में हमारी क्या पजिशन होगी।

तभी होगी जब बुनियादी स्तर पर तुम सुधारों को शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र में लागू करोगे.. समझे। सुधारों को लागू हुए बीस बरस होने को आए, इस पर सोचना ज़रुरी है। कक्का जी ने कहा और हनहनाते हुए आगे निकल गए।

मैं सोच रहा हूं आप भी?

Tuesday, December 29, 2009

सतभाया का शेष


उड़ीसा के केंद्रपाड़ा में एक पंचायत है सतभाया..। इस पंचायत में कभी सात गांव हुआ करते थे। और रकबे की ज़मीन थी ३२० वर्ग किलोमीटर। अब बचे हैं डेढ़ गांव और सौ वर्ग किलोमीटर से भी कम का रकबा।

अपने साप्ताहिक धारावाहिक डॉक्युमेंट्री शूट करने के दौरान वहा गया तो दिल धक्क से रह गया। वहां की हालत देखकर। अब वहां गोविंदपुर, खारीकुला, महनीपुर और सारापदा समेत पांच गांव पूरी तरह समुद्र की पेट में जा चुके हैं। कानपुरु आधा डूब चुका है और सतभाया आखिरी सांस लिए समंदर के आगे बढ़ जाने की बाट जोह रहा है।

समुद्र ने गांव की खेती लायक १०६१ एकड़ ज़मीन, घर-बार सबकुछ निगल लिया है। और अब भी वह रुका नही है दिन ब दिन आगे ही बढ़ रहा है। दुनिया ग्लोबल वॉर्मिग की वजह से मालदीव किरिबाती तुवालू और पापुआ न्यू गिनी के डूब जाने का खतरा शायद कुछ दशक दूर हो, लेकिन सतवाया के गांव वाले चढ़ते समंदर का कोप झेल रहे हैं और यह विपदा शायद और भी घनी हो, जबकि उत्सर्जन के लिहाज से यह गांव बिलकुल पाक साफ है।

गांब में बिजली नहीं पहुंची है। एक मोटरसाइकिल तक नहीं। लेकिन आगे बढ़ते समंदर का कोपभाजन बना हुआ है गांव। सतवाया के लोग ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में ज़रा भी योगदान नहीं करते.। फिर भी हाशिए पर पड़े इन लोगों पर कुदरत की मार पड़ी है। गांव रके बुजुर्ग बताते हैं कि पहले उन्हें समुद्र देखने के लिए तीन मील आगे जाना होता था, लेकिन अब समुद्र गांव के लिए खतरा बन गया है।

हृषिकेश विस्वाल गांव के ७८ साल के किसान हैं। उनके मुताबिक उनका गांव समुद्र में डूब चुका है। और वह बीस बरस पहले तक समुद्र देखने जाते तो वापसी में शाम हो जाया करती थी।

उत्कल विश्वविद्यालय में भूगोल विभाग के प्राध्यापक जी के पंडा कहते है कि सतभाया का डूबना ग्लोबल वार्मिंग का या दूसरे शब्दों में कहें तो जलवायु परिवर्तन का नतीजा है।

गांव का सवा सौ साल पुराना स्कूल, और बाकी इमारतें डूब गई हैं। अब कानपुरु के लोग भीतरकनिका नैशनल पार्क की सरहद में जंगल में नए बसेरे में रहते हैं,वहीं प्राइमरी स्कूल भी झोंपड़े में चलता है। लेकिन यह गांव भी समंदर की जद से दूर नहीं।

सतभाया और समंदर के बीच रेत का एक टीला है। लेकिन यह टीला कब तक गांव को बचा पाएगा? खुद टीले की रेत फूस के झोंपड़ों पर गिर कर नई मुसीबत बन रही है।पहले ही उड़ीसा का यह हिस्सा विकास की दौड़ में पीछे था लेकिन विकास की कुछ कोशिशें हुईं भी तो समंदर के पेट में चली गईं। पहले गांव में छह टयूब वेल थे लेकिन उनमें से पांच समंदर में समा गए।

ऐसे में गांव में पीने के पानी की समस्या पैदा हो गई हैं। बचे खुचे हैंड पंप पानी तो देते हैं लेकिन उनमें से निकलने वाला पानी भी नमकीन और खारा हो चुका है। आज पूरे गांव में फूस के ढांचे बचे हैं। पक्की इमारत के नाम पर बस ढाई सौ साल पुराना पंचवाराही मंदिर और नया बना पंचायत भवन हैं। हर साल तकरीबन 300 मीटर की दर से आगे बढ़ रहे समंदर के पानी ने सतवाया पंचायत के पांच गांवो को अपनी चपेट में ले लिया है। पिछले साल यह गांव के 80 मीटर ज्यादा पास आ गया आया था। धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए समंदर ने गोविंदपुर, खारीकुला, महनीपुर सारापदा समेत पांच गांवो को भारत के भौगोलिक नक्शे से मिटा दिया।

जारी

Thursday, December 17, 2009

कविताः ट्रिकल डाउन


हाथ फैलाए....
ढाई पसली की जनता को मिला आश्वासन
मनमोहिनी मुद्रा में,
दिया बयान
धनकुबेरों को होने दो और भी धनी
उनके टैंकर में जब भर जाएगा मनी,
रिस-रिसकर पहुंच जाएगा आखिरी आदमी तक भी.
.जैसे सरपंच-मुखिया के खेतों को सींचने के बाद,
कलुआ-मधुआ के खेतों तक भी पहुंच जाता है पानी,
सीधे न पहुंचे तो,
माटी से रिसकर पहुंच तो जाता ही है
एक दिन,
रुपयों की बारिश से
उफनकर आता पानी
भर देगा
हर घर के आंगन को,
फूस की छत से टपकेगें सिक्के,
चूएंगे डॉलर
हर आदमी के पास होगी,
पैसो की तलैया,
जैसे बंगाल के गांव में हर घर के पीछे होता है
छोटा-सा डबरा,
जिसमें तैरती रहती हैं बत्तखें
देश बन जाएगा
डॉलर का महासागर,
लेकिन महासागर के बीच में जा पाएंगे,
सिर्फ बड़े जहाज,
हम जैसे नारियल के सूखे फल...
किनारे पर पड़े लहरो से टकराते रहेगे,
कभी सूखी रेत पर
कभी पानी में
आते-जाते रहेगे,
लगता है
रिस-रिसकर रस पहुंचाने की थ्योरी
रसहीन और अनमेल है
डाउन थ्योरी में
डाउन जाने का सिस्टम फेल है।

Tuesday, December 1, 2009

कविता- तू मेरा इतिहास




मुझको ये अहसास रहा है, तू मेरे ही पास रहा है।


मन प्यासा है जिसकी खातिर, बनकर मेरी प्यास रहा है।


अपने अंदर पढ़ लो मुझको तू मेरा इतिहास रहा है।


ऊपर से मैं खुश हूं लेकिन, दूर-दूर मधुमास रहा है।



Sunday, November 22, 2009

गुस्ताख का रिटायरमेंट प्लान

कक्का जी हड़बड़ाए हुए जा रहे थे। क्या हुआ कक्का जी? गुस्ताख ने बड़ी अदा से पूछा। कक्का के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं, एक दम फक्क..। 'अरे रिटायरमेंट प्लान करने जा रहा हूं। ताकि अपनी पत्नी को सिंगापुर घुमाने ला जा सकूंम. बुढापे में। ता नहीं बाल-बच्चे कब लतिया कर घर से बाहर का दरवाजा दिखा दें?'

हम भी वहीं खड़े थे,-" का कक्का, अमिताभ की बागबान देख आए हो क्या? "

-"अरे नहीं बचुकिया, दुष्यंत कुमार की एक ग़ज़ल पढ़ आया हूं..सो अचानक चिंता बढ़ गई है। "

"कौन सी ग़ज़ल कक्का?"

"अरे बुढापे पर बड़ी मार्मिक ग़ज़ल कही है, दुष्यंत ने। हमारे ज़माने के शायर थे। सुन लो....

लगने लगा है बिस्तर बाहर दालान में,
बूढे के लिए अब नहीं कमरा मकान में ,
दी थी जिन्हें ज़बान वो जवान हो गए ,
कहते हैं लगा लीजिए ताला ज़बान में,
रोटी बची है रात की सालन नहीं बचा
देकर गई है बेग़म कह कर ये कान में,
जान उसके जिस्म से जब निकल गई
बेटे ने मकबरा बनाया है शान में

हां कक्का कह तो आप सही ही रहे हैं...कनाडा वाले उड़नतश्तरी और दिल्ली वाले डॉ अनुराग को भी सुना दीजिए। मुमकिन है वह भी अपने बुढापे का कुछ इंतजाम कर लें।

कक्का मेरी तरफ मुडे, --"क्यों बे, अपनी सोच तूने क्या इंतजाम कर रखा है। उड़नतश्तरी और डॉ अनुराग की मत सोच। डॉक्टर तो फिर भी उम्रदराज़ (?) हैं, लेकिन उड़नतश्तरी तो माशाअल्लाह जवान हैं.. खुद बूढा़ हो रहा है, बाल तेरे सफेद हो गए, जो बचे हैं उनको लेमिनेट करवा ले। यादें रह जाएंगी तो देख-देख कर आहें तो भर पाएगा...

हम हुमक उठे, --"क्या कक्का, अभी तो हमने बड़ी-बड़ी शरबती आंखों और रेशमी जुल्फों वाली मादक मादा की खोज ही शुरु की है..बुढापे की बात मत करो। गोपालप्रसाद व्यास भी तो कह गए हैं..

हाय न बूढा कहो मुझे तुम,
शब्दकोष में प्रिये और भी
बहुत गालियां मिल जाएंगी

गुस्ताख मुस्कुरा उठा..। उम्र बढती है तो विनय बढ़ता है..।

बालों में छा रही सपेदी,
रोको मत उसको आने दो
मेरे सिर की इस कालिख को
शुभे स्वयं ही मिट जाने दो...
झुकी कमर की ओर न देखो,
विनय बढ़ रही है जीवन में
तन में क्या रखा है रुपसि,
झांक सको तो झांको मन में...

कक्का खिसिया गए, --बच्चा. अभी बच्चे हो मान लिया लेकिन रिटायरमेंट का प्लान तो करो...जो हम भुगतने से डरे और मरे जा रहे हैं तुम पर ना आए..

हमने कहा कक्का, अभी अरुणाचल गए थे। वहां देख आए हैं, दिहांग नद के किनारे झोंपडा बनाकर मछली मारुंगा.. गोवा में भी अच्छा है.. समंदर के किनारे टीन की शेड डाल दूंगा... जिदंगी कट जाएगी। वैसे अच्छा ऑप्शन तो बिहार के अपने गांव में लौटकर खटाल अर्थात् गऊशाला खोल देने का है। सात-आठ गायें और उतनी ही भैसे पोस लूंगा, दूध बेचेंगे घी खाएंगे....

और घी खाने के लिए चार्वाक की तरह कर्ज लेने की भी ज़रुरत नहीं पड़ेगी। कक्का, .. कहीं सचिन के एड वाले एक्शन प्लान से प्रेरित तो नहीं हो रहे आप? वैसे भी-पूत कपूत तो क्या धन संचय, पूत सपूत तो क्या धन संचय। अर्थात् पूत कपूत हो संचित धन की वाट लगा देगा। पूत सपूत हो चो उसके लिए धन संचित करने की ज़रुरत ही क्या।

कक्का को असह्य हो रहा था, सीधे सिर पर चपत मारी कहा, तुम उल्लू हो, गधे भी..और अपनी राह ले ली।

पाठकों आप ही बताइए, रिटायरमेंट का प्लान ज़रुरी है? अगर है तो क्या करना चाहिए ....

Friday, November 20, 2009

क्योतो से कोपनहेगन


क्योतो में जिन मुद्दों पर सहमति हुई थी, उस पर अंकल सैम का अड़ियल रवैया जारी है। चीन जाकर ओबामा ने भी कोपनहेगन से ज्यादा उम्मीदें न रखने की सलाह दे दी है। क्या था क्योतो नयाचार में...


ऐसा भी नहीं कि अपनी ही आबो-हवा को जहरीला और तवे की तरह गरम बना दे रहे इंसानों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। इसकी सबसे ताजी मिसाल है १९९७ क्योटो में हुआ सम्मेलन जिसमें दुनिया भर के 184 देशों ने हवा में शामिल हो रहे कुल कार्बन की मात्रा में ५.२ फीसद की कमी लाने का मसौदा तैयार किया।


अपनी ज़मीन और हवा को साफ-सुथरा रखने का यह पहला मामला नहीं था।


जिन दिनों इंगलैंड में आद्योगिक क्रांति अपने शबाब पर थी, उन्हीं दिनों 1824 में फ्रांस के साइंसदान जोसेफ फुरियर ने ग्रीन हाउस गैसों के बारे में बताया।


1896 में स्वीडन के रसायनशास्त्री स्वांते अरहेनियस हों या 1938 में ब्रिटिश इंजीनियर गे कैलेंडर, विद्वानों ने पर्यावरण के लिए नुकसानदेह ग्रीन हाउस इफैक्ट के प्रति आगाह करना शुरु कर दिया था।


सन 1965 में पहली बार किसी सरकार ने पर्यावरण पर सलाह देने का काम कि.या और अमेरिकी सलाहकार समिति ने ग्रीन हाउस गैसों को चिंता का कारण बताया।


1972 में स्टॉकहोम में पहला जलवायु सम्मेलन हुआ। पर्यावरण को लेकर जाकरुकता की शुरुआत भी हुई। फिर 1988 में मांट्रियल प्रोटोकॉल सामने आया, जिसमें सीएफसी यानी क्लोरोफ्लोरो कार्बन और एचएफसी यानी हाइड्रोफ्लोरो कार्बन के कम उत्सर्जन का संकल्प लिया गया था।


1992 में रियो डि जिनेरो मे पृथ्वी सम्मेलन हुआ, लेकिन चिंताएं बरकरार रही। फिर,मौसम परिवर्तन के ख़तरों से निपटने के लिए 1997 में जापान के क्योटो में यह तय हुआ कि अलग-अलग चरणों में विकसित, विकासशील और पिछड़े देश तापमान बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभाने वाले गैसों का ऊत्सर्जन कम करेंगे।


क्योटो प्रोटोकॉल के तहत चालीस औद्योगिक देशों के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए 1990 के आधार पर मानक तय किए गए । भारत और चीन जैसे विकासशील देशों पर यह पाबंदी बाध्यकारी नहीं थी। अब तक 184 देश इस पर अपनी सहमति जता चुके हैं। लेकिन ग्रीन हाउस गैसों का सबसे ज्यादा उत्सर्जन करने वाले अमेरिका ने अब तक क्योटो संधि को लागू नहीं किया है।


अमेरिका अब भी अपने पुराने रुख पर कायम है कि प्रोटोकाल के तहत विकासशील देशों के लिए भी लक्ष्य निर्धारित किए जाने चाहिए। उसकी दलील है कि चीन और भारत जैसे देशों पर भी बाध्यकारी पाबंदियां होनी चाहिए।


अमेरिका, कनाडा और जापान जैसे विकसित देश ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन कम करने की कोई तय सीमा मानने को तैयार नहीं, वहीं भारत,चीन और ब्राजील जैसे देश विकसित देशों की और उंगलियां उठा रहे हैं। ऐसे में मामला पहले आप-पहले आप पर फंसा हुआ है।


भारत और चीन की दलील है कि उनका ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन विकसित देशों की बनिस्पत काफी कम है और इस वक्त उत्सर्जन पर रोक लगाना विकास पर पाबंदी जैसा होगा।


चीन और भारत दोनों का मानना है कि विकसित देशों और विकासशील देशों के लिए उत्सर्जन में कटौती के मानक अलग-अलग होने चाहिए, हालांकि विकासशील और विकसित देशों का यह विवाद पुराना है और जलवायु परिवर्तन की हर बैठक में उठता रहा है।


अमरीका और ऑस्ट्रेलिया ने संयुक्त राष्ट्र के क्योतो प्रोटोकॉल पर सिर्फ़ इसीलिए हस्ताॿर नहीं किए क्योंकि वे इस बात का विरोध कर रहे हैं कि इसमें भारत और चीन के लिए कार्बन गैस उत्सर्जन का कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किया गया है और यह भी एक सच है कि इस समय कार्बन गैसों के उत्सर्जन में चीन का नंबर अमरीका के बाद दूसरा है।


लेकिन चीन का तर्क है कि अमीर देशों के अब तक किए गए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की वजह से ही जलवायु परिवर्तन हुआ है.


इंटरगवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज,--आईपीसीसी-- में रखे गए अपने प्रस्ताव में चीन धनी देशों के ग्लोबल वार्मिंग में योगदान का उल्लेख रिपोर्ट में चाहता है। चीन के मुताबिक 1950 से पहले अमीर देश 95 प्रतिशत ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार थे, जबकि 1950 से 2000 के बीच वे 77 प्रतिशत गैसों का उत्सर्जन कर रहे हैं, ऐसे में उत्सर्जन कम करने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी विकसित देशों पर होनी चाहिए। उधर, विकसित देश चीन की इस दलील से सहमत नहीं हैं।


अमेरिका के साथ-साथ यूरोपीय संघ भी चाहता है कि विकासशील देशों को भी इस मामले में जिम्मेदारी लेनी चाहिए। यूरोपीय संघ मानता है कि विकासशील देश धनी देशों को दोषी ठहराना छोड़कर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कम करने के लिए प्रयास करना शुरु करें।


यानि मामला अब भी वहीं अटका है जहां क्योटो में था।


बहरहाल, क्योटो प्रोटोकॉल का पहला दौर 2012 में खत्म हो रहा है। विकसित देशों को जिम्मेदारी दी गई थी कि वह 2012 तक उत्सर्जन के स्तर को 1990 के स्तर से नीचे ले जाएं। इसके लिए नई तकनीकें अपनाने की पैरवी की गई है जिसके लिए क्योटो प्रोटोकाल में क्लीन डिवेलपमेंट मैनेजमेंट (सीडीएम) का प्रावधान है।


लेकिन उत्सर्जन अभी भी जारी है।


अब तक क्योटो प्रोटोकॉल पर भारत समेत 184 देशों ने दस्तखत किए हैं,जो कुल 70 फीसदी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं। 16 फरवरी 2005 से इसे दस्तख्वत करने वाले सभी देशों ने लागू कर दिया है। लेकिन दुनिया की 35 फीसदी ग्रीन हाउस उत्सर्जन करने वाले अमेरिका ने इसे लागू नहीं किया।


डेनमार्क के कोपेनहेगन में होने वाली युनाइटेड नेशंस क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस में अब तक के हालात की समीॿा के साथ आगे की कार्रवाई पर विचार होगा। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि इस साल अक्टूबर मेंो बैंकॉक में हुई क्लाइमेट चेंज टॉक में क्योटो प्रोटोकॉल को तकरीबन खारिज करने वाले अमेरिका का कोपेनहेगन में क्या रवैय्या रहता है।


भले ही देशों के बीच तकरार जारी है लेकिन इस बार अपने मतभेदों को दूर कर सबको इस बात पर सहमत होना चाहिए कि धरती को जलवायु परिवर्तन के बुरे असर से कैसे बचाया जाए।


उम्मीद करनी चाहिए की कोपनहेगन में देशों के बीच आम राय बनेगी, क्योंकि वक्त हाथ से निकला जा रहा है।