Thursday, March 25, 2010
अरुणाचल का सौन्दर्य - तस्वीरों में
Wednesday, March 24, 2010
फोटॉग्रफर गुस्ताख़- ब्रह्मपुत्र की तस्वीरें
Tuesday, March 23, 2010
गुस्ताख खुश है आज...
निश्चित रुप से मैं कविता वाचक्नवी, बी एस पावला और डॉ अनुराग का आभारी रहूंगा जो मेरे विषाद के ॿणों में मेरे साथ वर्चुअल वर्ल्ड में खडे रहे।
तो दोस्तों, तैयार हो जाइए, गुस्ताख तैयार है फैर (फायर) करने के लिए, आप तैयार हो जाइए कमेंट के लिए..।
Saturday, March 20, 2010
ब्लॉग की तकनीकी खराबी से परेशान हूं...
राजस्तान का दौरा बेहद एकाकी था। अकेलापन..काट खाने को दौड़ता रहा। और उसके बाद ब्लॉग खोने का सदमा...लेकिन जिंदगी रुक जाने का नाम नहीं है। तो फिर से वापस आया हूं अपनों के पास..।
अगर फांट साइज़ बढाने और ब्लॉग की सेंटिग ठीक करने में कोई साहब तकनीकी सहायता कर पाएं..तो बहुत उपकार मानूंगा।
Tuesday, February 16, 2010
मेरी पसंदीदा फिल्मे-२ खानेह ये दस्त कोज़स्त

फिल्म- वेयर इज़ द फ्रेंड्स होम ( खानेह ये दस्त कोजस्त)
ईरान/१९८७/रंगीन/९० मिनट
निर्देशन और पटकथा- अब्बास कियारोस्तामी
कास्ट- बेबाक अहमदपुर, अहमद अहमादापुर
ब्रेदलेस पर कई (महज तीन) टिप्पणियां आई और दुरुस्त आईं। मिश्रा जी ने जिस फ्रेंच अभिनेता का नाम लिया उसकी फिल्म नहीं देख पाया हूं, और हां मैं बहुत खुशमिजाज़ क़िस्म का इंसान हूं, ऐसे मेरे नज़दीकी मित्र कहते हैं। गुस्ताख़ तो खैर हूं ही।
बहरहाल, अनुराग जी ने लिखा है कि ईरानी फिल्में देखी हैं या नहीं... तो एफटीआईआई की दया से मैंने बहुत सारी ईरानी जो बेहतरीन भी लगीं फिल्में देखी हैं। पसंदीदा फिल्मों की अपनी सीरीज़ में एक-एक कर उनपर लिखूंगा, जो मेरे दिल के बहुत करीब हैं।
इस बार ईरानी फिल्म वेयर इज़ माई फ्रेंड्स होम के बारे में जानकारी दे रहा हूं। यह मैंने एनएफऐआई के बेहतरीन ऑडिटोरियम में देखी थीँ।
एक छोटा लड़का एक दिन स्कूल से लौटकर जब अपनी होमवर्क करने बैठता है। तो देखता है कि उसने गलती से अपने दोस्त की कॉपी भी अपने बस्ते में डाल ली है। चूंकि, उसका क्लास टीचर चाहता है कि सारे होमवर्क एक ही कॉपी में किए जाएं, ऐसे में वह लड़का माता-पिता के मना करने पर भी पड़ोस के गांव में रहने वाले छात्र के यहां जाकर कॉपी वापस करना चाहता है। लेकिन वह अपने दोस्त के पिता का नाम या पता नहीं जानता।
ऐसे में वह उसे खोजने में नाकाम रहता है।
आखिरकार, कई लोगों की मदद और ग़लत घरों में घुसने के बाद लड़का अपने गांव वापस लौटकर उस लड़के का भी होमवर्क पूरा करने का फ़ैसला करता है।
पूरी पटकथा निर्दोष है। किस्सागोई का एक अलग अंदाज़..जिसमें ईरान में आई इस्लामी क्रांति का असर देखा जा सकता है।
क्रांति के पहले का ईरान कुछ और था। सभ्यता के कुछ और मायने थे। रूमी की कविताओं की शानदार पंरपरा थी। लेकिन इस्लामी क्रांति ने पहरे बिठा दिए। लेकिन इन परंपराओं का असर फिल्म पर पूरी तरह देखा जा सकता है।
कड़ी बंदिश के बाद फिल्मकारो ने इतिहास और परिस्थियों को मेटाफर के तौर पर दिखाना शुरु कर दिया। आम तौर पर किरियोस्तामी जैसे निर्देशकों ने बच्चों को लेकर फिलमें बनाई और बच्चों को ईरान के नागरिक का प्रतीक और मेटाफर ( ध्यातव्यः प्रतीक और मैटाफर में बुनियादी अंतर होता है) के तौर पर इस्तेमाल करना शुरु कर दिया।
फिल्मों में लोग पूरे ईरान में घूमते हैं। और इस तरह फिल्मकारों ने समस्याओ को सामने रखने का अपना काम जारी रखा।इस फिल्म की बात करें तो इसमें बच्चे की अनेक अनिश्चितताओं के मेटाफर बनाकर पेश किया गया है।
दोस्त मिलेगा या नहीं, लड़का घर कैसे ढूंढेगा और घर नहीं मिला तो लड़का क्या करेगा। ये सवालात सहज ही दिमाग में उठते हैं।
औरतों की समस्या भी खासतौर पर रेखांकित की जा सकती है। गो कि बच्चे को सहज ही हर घर के भीतर प्रवेश मिलता है। और बच्चे का अपनी मां और अपने पिता के साथ रिशते भी खास तौर पर ध्यान दिए जाने लायक दृश्य है।
बच्चे को जब उलझन रहती है कि रात घिर आने के बाद वह घर नहीं खोज पाया है और कॉपी भी उसे देनी ही है। वह एक खिड़की के सामने खड़ा होता.. और उसे तत्काल हल मिल जाता है। यह सीन कुछ इस तरीके से शूट किया गया है और परदे पर कुछ इस तरह दिखता है ..जैसे इस्लामी संस्कृति में ईश्वरीय शक्ति को उकेरा जाता है। जाली दार खिड़की और उससे छनकर आती बेहिसाब रौशनी..फिल्म में बच्चा बड़ों के लिए ताकत का प्रतीक बन कर उभरता है।
वैसे बड़ों के , जो शासन और सत्ता से खतरे और धमकियों का सामना कर रहे थे।
पाठकों को सलाह ये है कि ईरान की इस फिल्म को ज़रूर देखे।
Monday, February 15, 2010
मेरी पसंदीदा फिल्में- ब्रेदलेस

ब्रेदलेस, /फ्रांस,/ १९५९/ श्वेत-श्याम,/
अवधिः ८९ मिनट
निर्देशकः -जीन-लॉक godard
screen प्लेः फ्रांकुआ त्रुफ़ो, गोदार्द
सिनेमैटोग्रफ़ीः रोओल कोटार्ड
संपादनः सिसले डगलस
संगीतः मार्शल सोलल
ये कहानी एक युवा गैंगस्टर की है। संभवतः माफिया को उकेरने वाली यह पहली फिल्म है, जिसने एक खास स्टाइल को लोकप्रिय कराया। युवा गैंगस्टर मिशेल (जीन पॉल बेलमोंडो) एक कार चुरा कर पैरिस लौट रहा होता है, रास्ते में वह आदतन एक पुलिस वाले का क़त्ल कर देता है।
पुलिस मिशेल के पीछे पड़ जाती है। पैरिस में इधर-उधर धक्का खा रहे मिशेल की जेब में अधन्नी तक नहीं। वह अपनी अमेरिकी कन्या-मित्र पैट्रिशिया से इटली चलने का इसरार करता है। लेकिन जैसा कि हमारे कई दूसरे मिथकीय चरित्रों के साथ हुआ है उसकी प्रेमिका ही उससे धोखा करती है।
गोदार्द की पहली ही फीचर फिल्म है, जिसमें उन्होंने कड़वाहटों को और आपसी संबंधों को उपहासपूर्ण तरीके से उकेरा है। लेकिन सिनेमाई भाषा जितनी हो सकती है, उतनी आलंकारिक है। इस फिल्म को फ्रांस में नई धारा (फ्रेंच न्यू वेव) का अगुआ माना जाता है।
यह फिल्म फ्रांकुआ त्रुफो और चाब्रो के आइडिए पर आधारित है, इसके संपादन में भी तकनीकी सहायता त्रुफो ने दी थी।
तकनीक की बात करें तो फिल्म को गौदार्द ने एक कोलाज की तरह पेश किया है। इसमें समाज में स्थापित और चल रही परंपराओं के अक्स हैं, और संपादन की तकनीक में फिल्म में कई जम्प कट्स देखने को मिलते हैं। डिस्कंट्यूनिटी जिसे पहले कोई बेहतर निगाह से नहीं देखा जाता था।
चरित्रों का उलझाऊ व्यवहार, त्रासदी औक कॉमिडी की मिलावट, एक ही साथ यथार्थवाद और मेलोड्रामा दोनों की चाशनी...यह ऐसी शुरुआत थी जिसकी नकल या कहे कि प्रेरणा फिल्मकार आजतक करते-लेते रहे हैं।
नायक का सिगार पीने के दौरान खास तरीके सा होठों पर हाथ फेरना, एक स्टाइल स्टेटमेंट बन गया। दूसरी तरफ ट्रैक शॉट लेने के लिए व्हील चेअर का इस्तेमाल एक नई चीज़ थी।
कही मिले तो यह फिल्म ज़रुर देखे।








