Monday, July 19, 2010

बेख़बरी का फ़ायदा


लबलबी दबी – पिस्तौल से झुँझलाकर गोली बाहर निकली.
खिड़की में से बाहर झाँकनेवाला आदमी उसी जगह दोहरा हो गया.
लबलबी थोड़ी देर बाद फ़िर दबी – दूसरी गोली भिनभिनाती हुई बाहर निकली.
सड़क पर माशकी की मश्क फटी, वह औंधे मुँह गिरा और उसका लहू मश्क के पानी में हल होकर बहने लगा.
लबलबी तीसरी बार दबी – निशाना चूक गया, गोली एक गीली दीवार में जज़्ब हो गई.
चौथी गोली एक बूढ़ी औरत की पीठ में लगी, वह चीख़ भी न सकी और वहीं ढेर हो गई.
पाँचवी और छठी गोली बेकार गई, कोई हलाक हुआ और न ज़ख़्मी.
गोलियाँ चलाने वाला भिन्ना गया.
दफ़्तन सड़क पर एक छोटा-सा बच्चा दौड़ता हुआ दिखाई दिया.
गोलियाँ चलानेवाले ने पिस्तौल का मुहँ उसकी तरफ़ मोड़ा.
उसके साथी ने कहा : “यह क्या करते हो?”
गोलियां चलानेवाले ने पूछा : “क्यों?”
“गोलियां तो ख़त्म हो चुकी हैं!”
“तुम ख़ामोश रहो....इतने-से बच्चे को क्या मालूम?”

मंटो की लघुकथा

Wednesday, July 14, 2010

तेरे लिए-कविता

 सुना है 
तुम रेत पर चलती हो, 
बरहना-पा,
रेत के रंग की हो,
सुनहरी, 
सुना है-
तुम्हारी आंखों के काजल,
बादल को मात देते हैं..
सुना है,
तुम्हारी देह में आदिम रात्री की महक है..
महज सुना ही है..

Monday, July 5, 2010

इसलाह

"कौन हो तुम..?
तुम कौन हो?"
"हर हर महादेव"!
"हर हर महादेव"!
हर हर महादेव!
"सुबूत क्या है?"
सुबूत! मेरा नाम धर्मचंद है...
"यह कोई सुबूत नहीं"
"चार वेदों में कोई बात मुझसे पूछो"
 'हम वेदों को नहीं जानते, सुबूत दो"
"क्या...?
"पायजामा ढीला करो"
पायजामा ढीला हुआ तो शोर मच गया
मार डालो, ...मार डालो
ठहरो,! ठहरो! मैं तुम्हारा भाई हूं-- भगवान की कसम मैं तुम्हारा भाई हूं!

मंटो की लघुकथाओं से

Sunday, June 20, 2010

तारीफ और हक़ीक़त

आज शहंशाह का जन्मदिन था। एक चमकता हुआ दिन..। एक पुरानी रस्म के मुताबिक हर महीने जन्म दिन वाली तारीख को सभी वजीर, ओहदेदार, आलिम और शायर इकट्ठा होते थे और शहंशाह की तारीफ करने में होड़ करते थे । इनमें से जो अव्वल आता उसे इनाम इकराम मिलता, मनसबदार बना दिए जाते।


बहरहाल, उस दिन, दिन भर तमाम तरह के और हरेक के कसीदा पढ़ने के बावजूद अमीर को तसल्ली नहीं हुई। वह बोले, -- पिछली दफा भी तुम लोगों ने यही बातें बोली थीं। हम देखते हैं कि तारीफ करने में तुम लोग माहिर और मुकम्मल नहीं हो। तुम लोग अपने दिमागो पर ज़ोर डालने को तैयार नहीं हो। लेकिन आज हम तुमसे काम लेकर मानेंगे। हम सवाल करेंगे और तुम्हें इस तरह का जवाब देना है कि हमारी तारीफ भी हो और जवाब में सचाई का पुट भी हो।

ग़ौर से सुनो, हमारा सवाल है कि अगर हम इतने ही बड़े हैं, कतवर हैं और जैसा कि तुम लोगों का दावा है, तानाकाबिले-फतह हैं, तो पड़ोसी सूबे की महारानी ने और तमाम देशो के सुल्तानों ने  हमारी शहंशाहियत मानकर अपनी उम्दा सौगातें क्यों नहीं भेजीं। हम तुम्हारे जवाबों का इंतजार कर रहे हैं। कहकर शहंशाह ने अपनी राजमाता की तरफ देखा, जिनके गरवीले चेहरे पर बेटे की ताकत और बुद्धि का दर्प था।

वजीर की पगड़ी कमजोर होने लगी। जवाब के लिए वह बगले झांकने लगे। पहले वह वजीरे-खज़ाना हुआ करते थे, अब वजीर बने हैं, सो परेशानी में डूब गए।

वजीर और दूसरे दरबारी सीदा जबाव न देकर भिनभिनाने लगे, अकेला नसरु्ददीन बिना घबराए अपनी जगह बैटा रहा। उसकी बारी आई तो बोला,  अमीरे-आजम। मेरे हकीर लफ़्ज़ों को सुनने की मेहरबानी अता फरमाएं। शहंशाह के सवाल का जवाब आसान है। पड़ोस के सभी मुल्कों के सुल्तान हमारे आका की ताकत के डर से हमेसा कांपते रहते हैं। वे सोचते हैं कि अगर हम बढिया सौगात भेजेंगे तो बुखारे का तकतवर अजीमुश्शान अमीर समझेंगे कि हमारा मुल्क रईस है, जिससे उन्हें फौज लेकर यहां आने और हमारे मुल्क पर कब्जा करने का लालच होगा। लेकिन अगर हम उन्हें मामूली सौगात भेजेगे तो वह नाराज होकर अपनी फौज भेज देंगे। बुखारा के अमीर ताकतवर हैं, अजीमुश्शान हैं, सो हिफाजत इसी में है कि अपनी नाचीज हस्ती की उन्हें याद ही न दिलाई जाए।

( इस कहानी का भारत के युवराज राहुल बाबा के जन्मदिन से कोई संबंध न जोड़ा जाए। ऐसा करना बेतुका होगा)- गुस्ताख

Thursday, June 17, 2010

कविता-हवा का रुख

हवा का रुख़,
भांपते हैं रखे पेपरवेट,
और कलमें कर रही हैं,
काग़ज़ी आखेट।

सुरक्षित खुद को समझते,
पहनकर इस्पात,
राष्ट्र को संदेश, करते
सौ टके की बात।

सुनों उनकी,
अक्षरों से नहीं जिनकी भेंट
बोलती लू,
वनस्पतियों पर कठिन हमला,

किंतु उनका क्या कि जिनके
घर स्वयं शिमला

ये हरे हैं

भले सिर पर तप रहा हो जेठ

Monday, May 31, 2010

नवविवाहित जोड़े का आशीर्वाद दें..

कुछेक दिन पहले हमारे मित्र सुनील उर्फ साहिर की शादी हुई। वह रुद्रप्रयाग के रहने वाले हैं और उनका विवाह हुआ गुप्तकाशी में..हम उनकी शादी में शरीक होने मय कई मित्रों के, वहां तशरीफ ले गए, रास्ते में हमारे साथ जो घटा उसका विवरण अगली पोस्ट में, फिलहाल तो आप नवविवाहित दंपत्ति को शुभकामनाएं दें। तस्वीर चस्पां कर रहा हूं..

Tuesday, May 18, 2010

उड़ीसा में गुस्ताख- तस्वीरों में भीतरकनिका





गुस्ताख उड़ीसा गया था। कवरेज के सिलसिले में। वहां मैं भीतरकनिका नैशनल पार्क के भीतर गया था। उसकी तस्वीरों का लुत्फ उठाइए। भीतरकनिका नैशनल पार्क घड़ियालों के लिए मशहूर है। वे अक्सर शाम को किनारे निकलते थे।




भीतरकनिका में सूर्योदय और सूर्यास्त बेहद मनोरम है। अगर आप जंगल के अनछुए जीवन का आनंद लेना चाहते हैं तो वहां गुप्ती के इंस्पेक्शन बंगलो में रुक सकते हैं। यह भुवनेश्वर से महज 140 किलोमीटर उत्तर केंद्रापारा जिले में पड़ता है।
आप चाहे तो एक बार वहां घूम कर आ सकते हैं। उम्मीद है कि अनछुए कु
दरती सौंदर्य को चाहनेवाले वहां जाकर निराश नहीं होंगे।