Thursday, December 16, 2010

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे...

सुना था हम्माम में सभी नंगे नहाते हैं। लेकिन नंगे नहाते-नहाते लोग सड़को पर उतर आए हैं। राडिया, राजा...कलमाड़ी, महेन्द्रू..दरबारी...पंडित सुखराम, शीला कौल, लालू, मधु कोड़ा...सूची इतनी लंबी और विस्तृत है कि लिख नही पा रहा।

 ये लोग भ्रष्टाचार के एक प्रतीक के रुप में सामने आए हैं। गुस्ताख आज गुस्से की जगह शान से खड़ा था।
गुस्ताख के दूसरी तरफ हीरो जी और एक ओर कक्का जी खड़े थे। कक्काजी ने जब से सुना है कि बिहार में विधायक फंड खत्म किया जा रहा है--बड़े उदास-उदास से हैं।

क्या कक्का जी, आप तो कहते रहे कि आपके जमाने मं ये. आपके जमाने में.वो..अब बताएं..ऐसा महाभ्रष्ट संसार रहा था क्या..।

कक्का जी के बोल फूटे तो लगा बिग बॉस सीरियल में बिग बॉस का प्रवक्ता अंतेवासियों को राशन और काम बांट रहा हो, ऐसा नही था जी..हमारे जमाने में भी हुआ ता घोटाला..। जीप घोटाला..फिर वर्दी घोटाला, फिर...बाद में बोफोर्स.फिर चीनी घोटाला...यूरिया घोटाला..टीवी अलकतरा घोटाला।

बस बस कक्का जी, महाजुगाडू हीरोजी आज मूड में थे। जब से बिहार चुनाव संपन्न करवा कर लौटे हैं, तब से मूड सही नही रह रहा। खुद भी हारे, अपनी काकी को दो जगह से हरवा आए। मुंह लटक कर अंग्रेजी  के आठ की तरह दिख रहा है।

लेकिन अचानक मूड में आ  गए है हीरो जी। मुंह पर नकली रे बेन का गॉगल्स फिट करते हुए उचारते भये, कक्का जी, आप तो अपना युग सन 47 से लेकर मौनी बाबा के काल तक खींच लाए..हमारे हिस्से रहने दिया पोस्ट बाबरी एरा...?

कक्का डी घबरा गए। गुस्ताख ने टोका, कोई बात नही हीरोजी, लाइसेंस राज के बाद के दौर में भी हमें समेट तो तो भी हम कोई कम नही।

शुरुआत चारे से करे तो स्कूटर पर भैंस ढोने से लेकर, पंजाब लोकसेवा आयोग में धांधली, नए नवेले झारखंड को खंड-खंड कर कोयला खान खरीद लेने वाले मुख्यमत्रियों से लेकर...वेल्थ को कॉमन बना देने वाले कॉमनवेल्थ खेल तक..और अब 2-जी स्पैक्ट्रम तक...हर घोटाले की रकम इतनी है जितनी आजादी के वक्त भारत का सकल घरेलू उत्पाद न रहा हो।

कक्का जी बैक फुट पर खड़े थे, अचानक उछल पडे।

सुनो बेटा जी, ऐसा लगा उन्हे दिव्यज्ञान हुआ हो, ईमानदारी जो है वो थोपी हुई नैतिकता है। हमें ईमान के खांचे में खुद को फिट करना होता है। वैसे, आदिम रुप से आदमी, हर आदमी बेईमान ही होता है। बेईमान होने के लिए आदमी को मेहनत नही करनी होती। आप स्वतः बेईमान हो सकते है..स्वतः ईमानदार नही हो सकते। तो फिर भ्रष्टों को क्यों दे गाली।

आखिर जो लोग ऊंचे पदो पर हैं , वहा तक पहुंचने में उन्हे कलदार खर्च करने पड़े होगे। मंत्री पद तक पहुंचने वाले सांसदो,  और सांसदी जीतने वाले प्रत्याशी संसद तक ऐसे ही नही पहुंच गए। खादी के झंडे से लेकर लकड़ी के डंडे, और कागजी मैनिफेस्टो से लेकर कागजी वायदे तक में अशर्फिया खर्च होती है।

आखिर अगले चुनाव के लिए तैयारी नही करनी होगी क्या...और रुपयों की भूख का कोई अंत तो होता नहीं..। तभी तो हमने सोने की चिडि़याके पंख नोंच लिए हैं...हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे....कोई आए कोई जाए..करता जाए वारे न्यारे...

कक्का जी गाते हुए निकल लिए।

Sunday, December 5, 2010

पुरुष देह में स्‍त्री मन- जस्ट अनदर लव स्टोरी

बांगला के बहुचर्चित फिल्‍मकार ऋतुपर्णो घोष ने जस्ट अनदर लव स्टोरी फिल्‍म से अभिनय में शानदार शुरूआत की है। ऊपर से देखने पर यह फिल्‍म समलैंगिकता के विषय को कई कोणों से उठाती है। लेकिन हकीकत यह है कि यह फिल्‍म इससे आगे जाकर प्रेम, विवाह, सैक्‍स, कला और घरेलू जीवन के कई पक्षों के साथ-साथ मनुष्‍य मात्र की आजादी और सीमाओं के बारे में बात करती है। 

आखिर उस व्‍यक्ति का क्‍या किया जाये जिसका सब कुछ – मन, आत्‍मा, स्‍वभाव और संस्‍कार – स्‍त्री का है और शरीर पुरुष का। हमारा समाज आज भी इस जटिल स्थिति का सामना विवेकपूर्ण ढंग से नहीं कर पा रहा है। ऐसे व्‍यक्तियों को या तो अपमान मिलता है या पुरुष वेश्‍या की गाली।

‘जस्‍ट एनादर लव स्‍टोरी’ बांगला रंगमंच के पहले समलैंगिक कलाकार चपल भादुड़ी के अतीत और वर्तमान की मार्मिक गाथा है जो अब 70 साल के हो चुके हैं। उन्‍हें कोलकाता में लगभग भुला दिया गया है और उनके जीने का सहारा केवल उनकी यादें हैं। 
 
अपने जमाने में वे स्‍त्री पात्रों की भूमिका निभाने वाले अकेले सबसे बड़े कलाकार थे। मंच पर उनका स्‍त्री का अभिनय जादू पैदा करने वाला था। आज का एक सफल फिल्‍मकार अभिरूप सेन उनके जीवन पर एक वृत्‍तचित्रनुमा फीचर फिल्‍म बनाना चाहता है। 
 
अभिरूप सेन घोषित रूप से खुद एक समलैंगिक व्‍यक्ति है। चूंकि वह बहुत अमीर और प्रभावशाली है इसलिए उसको वह सब कुछ नहीं झेलना पड़ता है जिसे चपल भादुड़ी ने झेला था। फिल्‍म में चपल भादुड़ी ने खुद अभिनय किया है और उनके अतीत का चरित्र ऋतुपर्णो घोष ने निभाया है।  
 
ऋतुपर्णो घोष ने इस चरित्र के साथ-साथ समलैंगिक फिल्‍मकार का चरित्र भी निभाया है। वे दोहरी भूमिका में हैं और उनकी दोनों भूमिकाएं अतीत और वर्तमान के बीच एक पुल का काम करती हैं।

इस फिल्‍म में ऋतुपर्णो घोष ने दोनों भूमिकाओं में विलक्षण काम किया है। एक निर्देशक के रूप में अपनी कई फिल्‍मों – उनीशै एप्रिल, चोखेरबाली, दोसोर आदि – से विशिष्‍ट पहचान बनाने वाले ऋतुपर्णो घोष की स्‍पष्‍ट छाप इस फिल्‍म पर दिखाई देती है। 
 
फिल्‍म का एक-एक फ्रेम एक-एक एक्‍शन, एक-एक संवाद और एक-एक कट ऋतुपर्णो घोष का लगता है। चपल भादुड़ी और ऋतुपर्णो घोष के चरित्रों की टकराहट उनके बीच एक अद्भुत बहनापा पैदा करती हैं, जो उनकी अमीरी और छद्म आजादी के कवच को तोड़ती हुई उन्‍हें उनकी नियति तक ले जाती है। उनकी नियति है समाज में हाशिये की जिंदगी जीना और जीवन भर भावनात्‍मक संघर्ष झेलना। 
 
चपल भादुड़ी अपने जमाने में अपना अधिकतर समय अपने पुरुष प्रेमी की पत्‍नी के साथ सह-अस्तित्‍व की खोज में गंवा देता है, तो अभिरूप सेन को आज के उत्‍तर आधुनिक समाज में भी वही सब दोहराना पड़ता है।
 
 
फिल्‍म के अंतिम दृश्‍यों में अभिरूप सेन (ऋतुपर्णो घोष) के पुरुष प्रेमी की पत्‍नी गर्भवती है और वह अपने हक के लिए उनसे एक आत्‍मीय बातचीत करती है। एक मार्मिक संवाद है जिसमें अभिरूप पूछता है कि यदि वह शरीर से औरत होता तो भी क्‍या उसे यही प्रतिक्रिया झेलनी पड़ती।  जाहिर है तब इस प्रेम त्रिकोण का एक दूसरा ही रूप होता। 
 
फिल्‍म बिना कोई फुटेज बर्बाद किये इस प्रेम त्रिकोण के एक-एक सामाजिक और भावनात्‍मक पक्षों पर दार्शनिक अंदाज में विचार करती है। ऋतुपर्णो घोष की यह फिल्‍म अपने अनोखे विषय के कारण नहीं, अपनी सिनेमाई कलात्‍मकता और समझ के कारण महत्‍वपूर्ण है।


आश्‍चर्य है कि बंगाल के इस जीनियस फिल्‍मकार की नई फिल्‍म ‘नौकाडूबी’ को इस फिल्‍मोत्‍सव में बहुत अच्‍छी प्रतिक्रिया नहीं मिली है। सुभाष घई की कंपनी मुक्‍ता आर्ट्स ने इसे प्रोड्यूस किया है। बांगला फिल्‍मों के सुपर स्‍टार माने जा रहे प्रसेनजीत चटर्जी और राइमा सेन जैसे कलाकारों ने इसमें मुख्‍य भूमिका निभाई है। 



यह फिल्‍म रवीन्‍द्रनाथ टैगोर की एक प्रेम कहानी पर आधारित है। जो 1920 के बंगाल में घटित होती है। उसी दौरान इस पर एक मूक फिल्‍म भी बनी थी। बाद में सुनील दत्‍त और तनूजा अभिनीत ‘मिलन’ फिल्‍म में इसी कहानी को दोहराया गया था।


---अजित राय

Friday, December 3, 2010

लिट्ल रोज़ः प्रेम की परतों का उद्घाटन करती फिल्म

(लि़टिल रोज़, प्रेम के वास्तविक परतो को उधेड़ती है..लिख रहे हैं अजित राय) 


भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह के प्रतियोगिता खंड में दिखाई गई पौलेंड के सुप्रसिद्ध फिल्‍मकार जान किदावा ब्‍लोंस्‍की की नई फिल्‍म ‘लिटल रोज’ एक दिलचस्‍प प्रेमकथा का त्रिकोण है। जिसमें इतिहास की कुछ कटु स्‍मृतियां शामिल हैं। 
इजरायल ने 1968 में जब फिलिस्‍तीन पर हमला किया था तो पौलेंड के कम्‍युनिस्‍ट शासकों ने इस अवसर का इस्‍तेमाल यहूदी और कई दूसरी राष्‍ट्रीयताओं वाले नागरिकों को देशनिकाला देने में किया था। उसी दौरान 1968 के मार्च महीने में पौलेंड की राजधानी वारसा में अभिव्‍यक्ति की आजादी को लेकर लेखकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और विश्‍वविद्यालयों के छात्रों ने एक बड़ा आंदोलन किया था जिसे सरकार ने बेरहमी से कुचल दिया। इसी पृष्‍ठभूमि में कम्‍युनिस्‍ट सुरक्षा सेवा का एक सीक्रेट एजेंट रोमन अपनी प्रेमिका कैमिला को एक सत्‍ता विरोधी लेखक एडम के पीछे लगा देता है। जिस पर शक है कि वह यहूदी है। 

एडम एक प्रतिष्ठित लेखक है और लगातार शासन की तानाशाही के खिलाफ आंदोलन का समर्थन करता है। कैमिला उसकी जासूसी करते हुये अंतत: उसके प्रेम में पड़ जाती है क्‍योंकि उसे लगता है कि एडम का पक्ष मनुष्‍यता का पक्ष है। इसके विपरीत उसका प्रेमी रोमन सिर्फ सरकार की एक नौकरी कर रहा है और सरकारी हिंसा और दमन को सही ठहराने पर तुला हुआ है। 

जब पहली बार कैमिला को इस रहस्‍य का पता चलता है तो उसे सहसा विश्‍वास ही नहीं होता कि सरकारी दमन और हिंसा में शामिल खुफिया पुलिस का एक दुर्दांत अधिकारी किसी स्‍त्री से प्रेम कैसे कर सकता है। वह यह भी पाती है कि प्रोफेसर एडम के ज्ञान और पक्षधरता का आकर्षण उसे एक नये तरह के प्रेम में डुबो देता है। 

अपने पहले प्रे‍मी के साथ उसे हमेशा लगता रहता है कि वह रखैल बनकर केवल इस्‍तेमाल होने की चीज है। उसकी न तो कोई पहचान है और न अस्तित्‍व। वह बिस्‍तर में अपने प्रेमी को सुख देने की वस्‍तु बनकर रह गई है। एडम से मिलने के बाद उसे जिंदगी में पहली बार अपने होने का अहसास होता है। 

‘लिटल रोज’ के लिए जान किदावा ब्‍लोंस्‍की को मास्‍को अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में 32वें मास्‍को अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में सर्वश्रेष्‍ठ निर्देशक का पुरस्‍कार मिल चुका है। यह फिल्‍म एक प्रेम कथा के माध्‍यम से 1968 के पोलैंड की नस्‍लवादी राजनीति का वृतांत प्रस्‍तुत करती है। 

फिल्‍म के अंत में पर्दे पर वारसा रेलवे स्‍टेशन से आस्ट्रिया की राजधानी विएना जाने वाली एक ट्रेन छूट रही है। जिसमें देशनिकाला पाये हजारों लोग भेजे जा रहे हैं। पर्दे पर हम पढ़ते हैं कि कितनी संख्‍या में किस तरह के लोगों को पोलैंड से जबर्दस्‍ती निकाल बाहर किया गया था। कम्‍युनिस्‍ट सरकार को लगता था कि इन लोगों के रहते हुए पोलैंड में समाजवाद सुरक्षित नहीं रह सकता।

फिल्मोत्सव के आखिरी दिन लिट्ल रोज की नायिका मैग्लीना को सर्वश्रेष्ठ नायिका का पुरस्कार भी दिया गया। फिल्म की महत्ता पर यह एक मुहर की तरह है।

Thursday, December 2, 2010

एक दिन की प्रेमकथाः सर्टीफाइड कॉपी

(जिंदगी में जो असल दिखता है वह कल्पना का भ्रम है, और जो भ्रम है दरअसल वही वास्तविकता है। 'सर्टीफाइड कॉपी' अब्बास किरियोस्तामी की ताजा फिल्म है..इस पर विस्तार से लिख रहे हैं अजित राय)

अब्‍बास किरोस्‍तामी की नयी फिल्‍म ‘सर्टीफाइड कॉपी’ 2010 इस वर्ष कॉन फिल्‍मोत्‍सव का एक प्रमुख आकर्षण रही है। इस फिल्म में उत्‍कृष्‍ट अभिनय के लिए जूलियट बिनोचे को कॉन फिल्‍मोत्‍सव में सर्वश्रेष्‍ठ अभिेनेत्री का पुरस्‍कार मिल चुका है। 

भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में इसे देखने के लिए दर्शक इतने उतावले हो गए कि टिकट खिड़की खुलने के तुरंत बाद ही पहला शो हाउस फुल हो गया। दर्शकों, समीक्षकों और फिल्‍म-प्रेमियों की जबर्दस्‍त मांग पर आयोजकों को रात के 10 बजे वाले शो में इसका दोबारा प्रदर्शन रखना पड़ा। 
कहा जा रहा है कि इस विश्‍वप्रसिद्ध ईरानी फिल्‍मकार की यह पहली यूरोपीय फिल्‍म है, जिसे फ्रांस और इटली के सहयोग से उन्‍होंने पूरा किया है। फिल्‍म की भाषा अंग्रेजी और फ्रेंच है और यह केवल दो चरित्रों के आसपास बुनी गयी है। 

कहानी के नाम पर सिर्फ इतना है कि एक ब्रिटिश कला समीक्षक इटली के एक गांव में आर्ट गैलरी चलाने वाली एक महिला से मिलता है, दोनों 15 वर्षों से शादी शुदा हैं और एक दिन के लिए ऐसे मिलते हैं, मानो वे वास्‍तविक जीवन में पति-पत्‍नी हों। पूरी फिल्‍म उनकी एक दिन की मुलाकात की अनेक छवियों, मनोभावों, दृश्‍यों और उतार-चढ़ाव को प्रस्‍तुत करती है। आर्ट गैलरी की मा‍लकिन की भूमिका में जूलियट बिनोचे के अभिनय की दुनिया भर में तारीफ हो रही है।

अब्‍बास किरोस्‍तामी अपनी फिल्‍मों में सच्‍चाई और कल्‍पना के विभ्रम पैदा करने के लिए जाने जाते हैं। उनकी फिल्‍म ‘वेयर इज माई फ्रेंड्स हाउस’ (1990) ने उन्‍हें विश्‍व सिनेमा के एक महत्‍वपूर्ण फिल्‍मकार के रूप में स्‍थापित किया था। 

‘सर्टीफाइड कॉपी’ में आख्‍यान के तौर पर उन्‍होंने अपनी बहुचर्चित फिल्‍म ‘क्‍लोज-अप’ के अधूरे काम को पूरा किया है। ‘क्‍लोज-अप’ में एक व्‍यक्ति ईरान के मशहूर फिल्‍मकार मोहसिन मखमल बाफ बनकर एक फिल्‍म बनाने की कोशिश करता है। 

हालांकि हम यहां वांग कार वाइ की ‘इन द मूड फॉर लव’ को भी याद कर सकते हैं। 
‘सर्टीफाइड कॉपी’ में आर्ट गैलरी चलाने वाली एक फ्रेंच महिला (जूलियट बिनोचे) एक ब्रिटिश लेखक और कला समीक्षक (विलियम शिमेल) से उलझती हुई दिखाई गई है, जिसने अभी-अभी कलाकृतियों की कॉपी करने के चलन पर अपना लेक्‍चर पूरा किया है। 

ऊपर से देखने पर यह एक व्‍यस्‍क किस्‍म की रोमांटिक स्‍टोरी लग सकती है, जो किसी के साथ कहीं भी घटित हो जाता है। ध्‍यान से देखने पर पता चलता है कि इसमें किरोस्‍तामी का यह दर्शन छिपा हुआ है कि हमारी दुनिया और जीवन में दरअसल असली या वास्‍तविक कुछ भी नहीं होता, सब कुछ कहीं-न-कहीं से ‘कॉपी’ किया गया है।  

यूरोप के कुछ समीक्षक इस फिल्‍म को यूरोपीय कला फिल्‍मों की नकल भी बता रहे हैं, जो दरअसल असल से भी अधिक वास्‍तविक है।
फिल्‍म का एक दृश्‍य 
फिल्‍म में कैमरा इटली के एक पर्यटक ग्राम में लगातार दो चरित्रों के ही आसपास घूमता रहता है। 

अधिकतर शॉट क्‍लोजअप में लिए गए हैं और फिल्‍म मंथर गति से दोनों चरित्रों के संवादों के माध्‍यम से आगे बढ़ती है। फिल्‍म बड़ी सूक्ष्‍मता से एक स्‍त्री और एक पुरुष के रिश्‍तों की हकीकत और उसके बाहरी आवरणों की पड़ताल करती है। 

बाहर से जो दिखता है वह तथा अंदर से दरअसल जो होता है वह, दोनों चरित्रों का यह संबंध दरअसल वैध विवाहित संबंध की कॉपी है। किरोस्‍तामी यहां बड़ी खूबसूरती से यह स्‍थापित करते हैं कि भले ही उस स्‍त्री के पास विवाहित होने की वैधानिक स्थिति नहीं है लेकिन पुरुष के प्रति उसकी सारी भावनायें वैध हैं।


यह फिल्‍म अच्‍छे अर्थों में ईरान के इस मास्‍टर फिल्‍मकार का एक सिनेमाई विचलन है, जो  इसे उनकी पहली फिल्‍मों से अलग करता है। उन्‍होंने लोकेशन का खूबसूरती से इस्‍तेमाल तो किया है लेकिन किसी टूरिस्‍ट गाइड की तरह नहीं। 

उनका सारा जोर अपने दोनों चरित्रों पर है। पटकथा इतनी कसी हुई है कि दर्शक कई बार संवादों को सुनते हुये अमूर्त और दार्शनिक किस्‍म की कल्‍पना में खो जाता है। जूलियट बिनोचे ने अपने चरित्र में कई तरह के मनोभावों को जिस कुशलता के साथ निभाया है, वह अभिनय के लिए एक क्रांतिकारी परिघटना बन जाती है।

एक और दृश्‍य 
यह एक ऐसी फिल्‍म है जिसे पहली बार में देखने पर बहुत सारी चीजें हमारी पकड़ से छूट जाती हैं। दूसरी बार देखने पर बहुत सारी चीजों के नये अर्थ खुलते हैं। 

जाहिर है यह अब्‍बास किरोस्‍तामी की फिल्‍म है जो सबके लिए नहीं है, इसका आनंद उठाने के लिए दर्शक को थोड़ा सा बौद्धिक और भावनात्‍मक रूप से संवेदनशील होना पड़ेगा। लेकिन यदि आप एक बार किरोस्‍तामी की सिनेमाई दुनिया में चले गये तो बीच में वे आपको उठने का मौका नहीं देंगे। 

किरोस्‍तामी की दूसरी फिल्‍मों की तरह इस फिल्‍म में भी कहानी का कोई निश्चित अंत नहीं किया गया है। यह काम दर्शकों पर छोड़ दिया गया है कि वे अपने हिसाब से इस कहानी को उसकी मंजिल तक पहुंचा दें।

Tuesday, November 30, 2010

भविष्य के सिनेमा का ट्रेलरः फिल्म सोशलिज़्म

(लेखक अजित राय विश्व सिनेमा के जानकार हैं। आजकल गोवा में भारत के ४१वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में फिल्मों का रसास्वादन कर रहे हैं)

विश्‍व के सबसे महत्‍वपूर्ण फिल्‍मकारों में से एक ज्‍यां लुक गोदार की नयी फिल्‍म ‘फिल्‍म सोशिएलिज्‍म’ का प्रदर्शन के भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह की एक ऐतिहासिक घटना है। 

पश्चिम के कई समीक्षक गोदार को द्वितीय विश्‍वयुद्ध के बाद का सबसे प्रभावशाली फिल्‍मकार मानते हैं। इस 80 वर्षीय जीनियस फिल्‍मकार की पहली ही फिल्‍म ‘ब्रेथलैस’ (1959) ने दुनिया में सिनेमा की भाषा और शिल्‍प को बदल कर रख दिया था। 




फिल्‍म सोशिएलिज्‍म’ गोदार शैली की सिनेमाई भाषा का उत्‍कर्ष है। इसे इस वर्ष प्रतिष्ठित कॉन फिल्‍मोत्‍सव में 17 मई 2010 को पहली बार प्रदर्शित किया गया। गोदार ने अपनी इस फिल्‍म को ‘भाषा को अलविदा’ (फेयरवैल टू लैंग्‍वेज) कहा है। 

अब तक जो लोग यह मानते रहे हैं कि शब्‍दों के बिना सिनेमा नहीं हो सकता, उनके लिए यह फिल्‍म एक हृदय-विदारक घटना की तरह है। इस फिल्‍म को दुनिया भर में अनेक समीक्षक उनकी आखि‍री फिल्‍म भी बता रहे हैं। 

यह अक्‍सर कहा जाता है कि सिनेमा की अपनी भाषा होती है और वह साहित्यिक आख्‍यानों को महज माध्‍यम के रूप में इस्‍तेमाल करता है। गोदार की यह फिल्‍म आने वाले समय में सिनेमा के भविष्‍य का एक ट्रेलर है, जहां सचमुच में दृश्‍य और दृश्‍यों का कोलॉज शब्‍दों और आवाजों से अलग अपनी खुद की भाषा में बदल जाते हैं। 


गोदार ने पहली बार इसे हाई डेफिनेशन (एच डी) वीडियो में शूट किया है। वे विश्‍व के पहले ऐसे बड़े फिल्‍मकार हैं, जो अपनी फिल्‍मों की शूटिंग और संपादन वीडियो फार्मेट में करते रहे हैं। यह उनकी पहली फिल्‍म है, जहां उन्‍होंने अपनी पुरानी तकनीक से मुक्ति लेकर पूरा का पूरा काम डिजीटल फार्मेट पर किया है। 



गोदार ने अपनी फिल्‍मों से आख्‍यान, निरंतरता, ध्‍वनि और छायांकन के नियमों को पहले ही बदल डाला था और हॉलीवुड सिनेमा के प्रतिरोध में दुनिया को एक नया मुहावरा प्रदान किया था। वे कई बार अमेरिकी एकेडेमी पुरस्‍कारों को लेने से मना कर चुके हैं। इस नयी फिल्‍म में उन्‍होंने शब्‍द, संवाद, पटकथा की भाषा आदि को पीछे छोड़ते हुए ‘विजुअल्‍स‘ की अपनी भाषाई शक्ति को प्रस्‍तुत किया है। इस प्रक्रिया में कई बार हम देखते हैं कि जो ध्‍वनियां हमें सुनाई देती हैं, दृश्‍य उससे बिल्‍कुल अलग किस्‍म के दिखाई देते हैं। इससे यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि यह केवल गोदार का एक कलात्‍मक प्रायोगिक और तकनीकी आविष्‍कार है। 


इस फिल्‍म की संरचना में उनका अस्तित्‍ववाद और मार्क्‍सवाद का राजनैतिक दर्शन पूरी तरह से घुला-मिला है। उन्‍होंने कहा भी है कि ‘’मानवता के लिए भविष्‍य का दृष्टिकोण प्रस्‍तुत करने का काम केवल सिनेमा ही कर सकता है क्‍योंकि हमारे अधिकतर कला-माध्‍यम अतीत की जेल में कैद होकर रह गए हैं’’। 
गोदार की नई कृति ‘फिल्‍म सोशिएलिज्‍म’ दरअसल तीन तरह की मानवीय गतियों की सिम्‍फनी है। फिल्‍म के पहले भाग को नाम दिया गया है ‘कुछ चीजें’। इसमें हम भूमध्‍य सागर में एक विशाल और भव्‍य क्रूजशिप (पानी का जहाज) देखते हैं, जिस पर कई देशों के यात्री सवार हैं और अपनी-अपनी भाषाओं में एक दूसरे से बातचीत कर रहे हैं। इन यात्रियों में अपनी पोती के साथ एक बूढ़ा युद्ध अपराधी है, जो जर्मन, फ्रेंच, अमेरिकी कुछ भी हो सकता है, एक सुप्रसिद्ध फ्रेंच दार्शनिक है, मास्‍को पुलिस के खुफिया विभाग का एक अधिकारी है, एक अमेरिकी गायक, एक बूढ़ा फ्रेंच सिपाही, एक फिलिस्‍तीनी राजदूत और एक संयुक्‍त राष्‍ट्रसंघ की पूर्व महिला अधिकारी भी शामिल है। 


गोदार ने समुद्र के जल की अनेक छवियां मौसम के बदलते मिजाज के साथ प्रस्‍तुत की हैं। जहाज पर चलने वाली मानवीय गतिविधियों का कोलॉज हमारे सामने एक नया समाजशास्‍त्र रचता हुआ दिखाया गया है। सिनेमॉटोग्राफी इतनी अद्भुत है कि रोशनी और छायाओं का खेल एक अलग सुंदरता में बदलता है। 
फिल्‍म के दूसरे हिस्‍से का नाम ‘अवर ह्यूमैनिटीज’ है जिसमें मानव-सभ्‍यता के कम से कम 6 लीजैंड बन चुकी जगहों की यात्रा की गई है। ये हैं मिश्र, फिलिस्‍तीन, काला सागर तट पर यूक्रेन का शहर उडेसा, ग्रीक का हेलास, इटली का नेपल्‍स और स्‍पेन का बर्सिलोना। 

तीसरे भाग को ‘हमारा यूरोप’ कहा गया है जिसमें एक लड़की अपने छोटे भाई के साथ अपने माता पिता को बचपन की अदालत में बुलाती है और स्‍वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्‍व के बारे में कई मुश्किल सवाल करती है। 
गोवा फिल्‍मोत्‍सव में गोदार की ‘फिल्‍म सोशिएलिज्‍म’ बिना अंग्रेजी उपशीर्षकों के दिखाई गई। गोदार कुछ दिन बाद 3 दिसम्‍बर 2010 को अपनी उम्र के 81वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। उनकी कही गई एक बात, जिसका अक्‍सर उल्‍लेख किया जाता है, इस फिल्‍म को देखते हुए याद आती है। उन्‍होंने कभी कहा था कि ‘’सिनेमा न तो पूरी तरह कला है, न यथार्थ, यह कुछ-कुछ दोनों के बीच की चीज है।’’ इस फिल्‍म के कुछ दृश्‍य इतने सुंदर हैं कि उनके सामने विज्ञापन फिल्‍में भी शर्मा जाएं। 


संक्षेप में, हम इसे कला, इतिहास और संस्‍कृति का क्‍लाइडोस्‍कोपिक मोजे़क कह सकते हैं।


--अजित राय
 


Monday, November 8, 2010

ऐ लीलाधर सांवरे, ओबामा....

भला लीलाधर की लीला कोई समझ सका है..दुनिया का सबसे मजबूत देश उन पर ऐसे ही न्योछावर न हो गया। सांवरी सुरतिया वाले लीलाधर की मुस्कान देखी है- हम इसको चवन्निया मुस्कान से दो कदम आगे का बताते हैं।

दुनिया को मामा बनाने वाले ओबामा, भारत आए तो सौदागरों की भाषा में बतियाने लगे। हम इसे भी लीलाधर की लीला ही कहेंगे।

चवन्नी मुस्कान बहुत कुछ बेच लेती है।



ओबामा ने अपने भाषण की शुरुआत में ही ऐलान किया, कि भारत दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है ही, हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। उनके इस कथन का सीधा सा मतलब यही है कि, भारत दुनिया के लिए अहम हो ना हो..हमारे लिए बहुत अहम है। टेढा़ मतलब निकालें तो उनके भा्षण के अंशों को खंगालना होगा--महाबलि ओबामा उचारते है कि दोनों देशों के बीच व्यापार बहुत कम है, भारत के कुल आयात का महज 10 फीसद ही अमेरिका से आता है। और  अमेरिका के कुल निर्यात का महज दो प्रतिशत भारत में आता है।

तो यह सौदागर अपना निर्यात बढाने आया है। इस मुस्कान के पीछे मत जाइए। इसी ने आउटसोर्सिंग पर रोक लगाने वाले कानून पेश कर दिए हैं, अमेरिकी संसद में।

सेंट ज़ेवियर कॉलेज में एक छात्र ने जब पाकिस्तान के बारे में, यानी अमेरिका के लाडले के बारे में पूछा कि उसे आतंकवादी देश घोषित क्यों नही करते, तो मुझे तो हंसी आई।

माफ कीजिएगा, मैं कृष्ण के इस आधुनिक अवतार पर कैसे हंस सकता हूं।  और कृष्ण के अवतार वाली बात को आधे अर्थो में समझिएगा। गोपियों वाली सारी लीलाएं कृष्ण क्लिंटन महोदय के हिस्से कर गए और बाकी सौदगरी -महाभारती कलाएं ओबामा के नाम।

आज ओबामा की चौड़ी-चकली मुस्कान देखी तो मुझे कृष्ण नजर आ गए, बाकियों को मंजर नही दिखा होगा क्योंकि कृष्ण ने जब अपना स्वरुप दिखाया राजसभा में तो कहां नजर आया ता किसी को।

बहरहाल, मुझे हंसी आई थी उस नादान लड़के पर जिसने पाकिस्तान को आतंकवादी घोषित करने का सवाल कर दिया। भइए, कोई लाला अपने दो ग्राहकों में झग़ड़े फसाद करवा सकता है, लेकिन वह किसी  एक को माल बेचना बंद करनाअफोर्ड ही नही कर पाएगा।

पहले तालिबान को हथियार दिए, फिर पाकिस्तान से कहा इनका विनाश कर दो, फिर भारत से कहा आपके पड़ोस में अशांत पाकिस्तानआपके ही विकास के लिए खतरा होगा। और फिर पाकिस्तान में अपनी मजबूती बनाए रखना चाहते हैं क्योंकि ईरान पर निगाह कड़ी रखने के लिए पाकिस्तान में पांव मजबूती से जमे रहने चाहिए। उधर अफगानिस्तान भी है।

किसी नादान ने सांवरे बनवारी से अफगानिस्तान के बारे में भी पूछ दिया। ओए नादानों, इतना भी मालूम नहीं कि भारत भी नही चाहता कि 2011 को घोषित तारीख से अगर अफगानिस्तान से अमेरिका हट जाए तो सबसे ज्यादा मुश्किल भारत को ही होगी।

पाकिस्तान अपगानिस्तान में अपनी बदमाशियों में की गुना बढोत्तरी करेगा। भारत इसे झेल नही पाएगा, तो गुहार लगाएगा लीलाधर से।

हे नव-द्वारिका ( वॉशिंगटन-डीसी) में बैठे आकाओँ, देखों पड़ोसी लौंडा देश हमें छेड़ रहा है।

अतएव, अमेरिका का अफगानिस्तान में भी बने रहना - जाहिर तौर पर भारत के हित में - ही होगा। बल्कि ओबामा का अमेरिका दुनिया के हर उस देश में पैर जमाने की कोशिश करेगा जहा तेल गैस है। तेल-गैस से बदहजमी होती है, अमेरिका कभी नही चाहेगा कि दुनिया को बदहजमी हो। तदर्थ, अमेरिका उन सभी देशों को, भू-भागों को अपने कब्जे में लेगा जहां ऐसे तेल गैस वगैरह घटिया चीजें है।

आधुनिक लीलाधर शिव की तरह हलाहल को कंठ में समो लेंगे।

ओबामा को मीडिया वाले भले ही मामा-मामा कहते हों, लेकिन सच यही है कि दुनिया नटचाने वाले ने भारत में रास रचा कर दिखा दिया, कि दिखाने को तो हम भारत में बच्चों के साथ सपत्नीक नाच सकते है, लेकिन हमसे तिजारत करो, सीदे-सीधे वरना नचा के मार देंगे।

वो काला एक .....भों... वाला..सुध बिसरा गया मोहि ...सुध बिसरा

Thursday, November 4, 2010

विपरीत रति

जिस तरह सिख धर्म में 'पंच-ककार' प्रसिद्ध है, उसी तरह  वामाचार में 'पंच-मकार' का भी स्थान है। पंच मकारों में भी  साधकों का असली जोर रहा, 'मुद्रा' यानी 'स्त्री' और 'मैथुन' पर। यहां मेथुन का अर्थ महज संभोग है, गर्भाधान नहीं।

गर्भाधान-विहीन रति के बारे में तथ्य चाहे जो हों, लेकिन एक प्रक्षेपण यह है कि इसके समाज में उठने और अध्यात्म के स्तर तक पहुंचने के पीछे कोई जानदार कारण रहा होगा।

बौद्ध धर्म के उत्थान के साथ ही, जब भिक्षुणियों को भी भिक्षुओं के साथ विहारों में रहने की अनुमति मिल गई, तब उनमें एक दूसरे के प्रति आकर्षण हुआ ही होगा। क्योंकि यौनाकर्षण प्रकृति-प्रेरित है, स्वाभाविक भी है। मुमकिन है, संघ  और मठों  का नाम विहार पड़ने के पीछे भी कुछ ऐसे ही प्रतीक हों।

विहारों में संतानोत्पत्ति पर रोक ने ऐसे उपाय खोजने की प्रेरणा दी होगी, जिसमें संभोग संभव लेकिन गर्भाधान असंभव हो। हठयोगी अभ्यासी से जिस दिन यह मुमकिन हुआ होगा, प्रकृति का पाश टूट गया होगा। पुरुष ने अपने को अच्युत पाया होगा। अच्युत- जो च्युत नही हुआ--गिरा नहीं--चुआ नहीं--स्खलित नहीं हुआ।  अच्युत केशवं--और यहीं से इस अनुभव को आध्यात्मिक उपलब्धि माना गया होगा।

इसी को विपरीत रति की संज्ञा दी गई होगी।

समरति में स्त्री वीर्य धारण कर गर्भवती होती है। विपरीत रति में पुरुष उर्ध्वरेता हो ब्रह्मपद प्राप्त करता है। आसन के अर्थ में विपरीत रति कामशास्त्रियों की सूझ होगी। उसके सौंदर्य पक्ष को स्वीकार करते हुए भी भक्त कवियों ने विपरीत रति के आध्यात्मिक संकेत ही दिए हैं। जयदेव लिखते हैं---

उरसि मुरारे उपहितहारे धन इव तरल बलाके
तडिदिवपीते रतिविपरीते राजसि सुकृत विपाके।।

यहां कृष्ण पुरुष-रुप और राधा प्रकृति-स्वरुपिणी है। पुरुष, कभी च्युचत होने वाला नहीं है। प्रकृति ही च्युत-चलित-स्खलित होती है।

यहां पुरुष हिरण्य धारण कर हिरण्यगर्भ बनता है--हिरण्य, सोना-रज---दोनों पीत--तडिदिवपीते। इसीलिए पुरुष प्रकृति का सहज संबंध, उनकी क्रीडा, उनकी लीला, विपरीत रति से ही व्यक्त की जा सकती है।

बुद्द ने अप्राकृतिक साधना को प्रतिष्ठित किया, भारतीय सनातनी मनीषा ने नर-नारी की प्राकृतिक मांग को फिर से समाज के बीच स्थापित किया। उसे अध्यात्म के स्तर तक उठाया, जिसमें वाम मार्ग का इतिहास छिपा है।

खासियत ये कि मार्ग में भ्रष्ट हुए तो सांसारिकता मिलेगी, और शुद्ध हुए तो आध्यात्मिकता।

(मूल पाठः नीड़ का निर्माण फिर, से)