Monday, May 14, 2012

अथ मुर्गोपाख्यानम्

जब भी वैशाली मेट्रो स्टेशन से उतरकर घर की ओर प्रयाण करता हूं, सेक्टर चार के मार्केट में छिले-छिलाए मुर्गे नजर आते हैं। उनको भून कर पकाने वाले ने उनके छड़ घुसेड़कर उल्टा लटका रखा होता है। मानो इंसानों ने जान ले कर ही संतोष नहीं किया। मुर्गे को खाने से पहले इतनी बेइज्ज़ती का क्या तात्पर्य? तय किय़ा कि अगला जन्म अगर हुआ तो कसम ईश्वर की मुर्गा तो नहीं बनूंगा। 


मुर्गा एक ऐसा प्रजाति है कि क्या कहें। जितने दलित-वंचित ये पक्षी होते हैं कोई और हो भी नहीं सकता। प्रियदर्शन जी की एक कविता गाहे-बगाहे याद हो आती है लेकिन उसका ज़िक्र बाद में। मुर्गों की नस्ल को न्याय दिलाना मेरा प्रथम कर्तव्य है।

आखिर जब भी हम मोर कहते हैं तो एक पंख फैलाए सावन की घटाओं में नाचता पक्षी हमें याद आता है। कौआ कहते ही काले रंग का तेज तर्रार परिंदा, जो इतने तेज माने जाते हैं कि इंद्र के लौंडे जयंत को भी सीता को छेड़ना हुआ तो वह कौआ ही बना। हम तोता कहते हैं तो हरे रंग की चिडि़या याद आती है, किंगफिशर से नीलकंठ याद आता है। जो कभी बारिश का तो कभी डूबते हुए एयर लाईन का तो कभी विजय माल्या का तो कभी बीयर की बोतल की याद दिला जाता है। वैसे है बहुत खूबसूरत पंछी।

लेकिन कभी आपने मुर्गे को चिड़िया की तरह याद किया है? मुर्गा को हम खुद उसके नाम से याद नहीं करते। हम कहते हैं चिकन। मुर्गा भी कहते ही हमें एक परिंदे की बजाय एक व्यंजन याद आता है खासकर जो मुर्गे के बच्चों का नाम होता है। इतसपर भी हमने ज्यादातर मुर्गों की पहचान उसके रानों यानी लेग पीस से बना रखी है। कैसा शोषण है ये।

वैसे एडल्ट मुर्गे का नाम कॉक होता है। वयस्क साहित्य से परिचित और रेलगर पाठक के लिए इस शब्द का अर्थ ही विशेष होता है और इस शब्द से जुड़ी ध्वनियां भी।

हमने एक पूरी चिड़िया बिरादरी को एक व्यंजन में बदल दिया है। क्या  इसे सामाजिक न्याय का हक नहीं? वक्त आ गया है कि मुर्गों को हक मिले। ब्रायलर का चिकन हो, सफेद सफेद या फिर देसी मुर्गे। विविधता के बावजूद दोनों नस्लों की नियति कड़ाही ही है। हद तो ये है कि मु्र्गियों के अंडों को बिना फर्टिलाइज़ हुए ही दुकानों पर तमाम विधियों से बेचा जा रहा है। बिना मुर्गियों की पीड़ा समझे...जिनके अजन्मे बच्चों की बद्दुआ का हकदार हमीं लोग हैं।

मुझे ये पोस्ट लिखने की प्रेरणा प्रियदर्शन की कविता से मिली है। इसके लिए मैं प्रियदर्शन जी का आभारी हूं।


लेकिन, उम्मीद है कि आप इस बिरादरी के चर्चे को महज मुर्गा नहीं मान रहे होंगे।

Saturday, May 12, 2012

सुनो! मृगांका-भाग तीन

आने वाला पल जाने वाला है...

खट्...खट्...खट्। कुल्हाड़ियां चल रही थीं। हरे बांस पर।

पिता का शव आंगन में तुलसी चौरे के पास रखा था। मां दहाड़ें मारकर रो रही थी। अभिजीत महज चार साल का था। कुल्हाड़ियां बस बांस पर नहीं चल रही थीं। अभिजीत के वर्तमान और भविष्य दोनों पर कुल्हाड़ी चल गई थी।

उसके पिता एक सरल इंसान थे। सीधे-सादे स्कूल मास्टर। टीचरों की औकात तब भी कुछ नहीं थी। आज भी नहीं। बजाय इसके कि समाज ने उन के कंधों पर देश की भावी पीढ़ी तैयार करने की महान् जिम्मेदारी दी है और उसके एवज़ में स्कूल मास्टरों से नैतिक होने की उम्मीद की जाती है।

अभिजीत के पिता बहुत नैतिक थे। कभी ट्यूशन नहीं पढ़ाई। सरस्वती की साधना करते रहे। इसलिए लक्ष्मी कभी उनके द्वार पर फटकी तक नहीं।

कुछ ही दिनों में नौबत फ़ाकाकशी की आ गई। मास्टर की जमापूंजी की औकात ही क्या। रिटायरमेंट के बाद मिलने वाला पैसा श्राद्ध में खर्च करना पड़ गया। सबसे बड़े भाई साब भी दसवीं पास नहीं थे। भाई साब ने उसके बाद जिंदगी को बहुत करीब से देखा। धीरे-धीरे पैसे के महत्व को समझते चले गए। कहते, पैसा है तो सब हैं। पैसा नहीं तो कोई नहीं।

पैसा नहीं तो कोई नहीं पास रहता। कभी मृगांका ने पूछा था उससे, 'तुम पत्रकार ही क्यों बने?' उसने बताया था कि वह पत्रकार अपनी मर्जी से बना था, कि वह इंजीनियर है, कि इंजीनियरिंग उसके मिजाज़ से मेल नहीं खाता, कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई उसने उस वक़्त की थी, जब उसकी जिंदगी के सारे फ़ैसले कोई और ले रहा था।

जिस दिन इंजीनियरिंग की पढ़ाई खत्म करने के बाद उसने दिल्ली जाने का फ़ैसला किया था...नौकरी करने के लिए नहीं, शायद पत्रकार बनने के लिए। भाई ने उसके आगे हाथ जोड़ लिए थे।

बड़े भाई ने साफ कह दिया था। उस साफ़गोई में थोड़ी मुलायमियत भी थी, थोड़ी मासूमियत भी, थोड़ी चालाकी भी और थोडी बेचारगी भी। भाई साहब ने टुकड़े-टुकड़ों में जो कहा था, उसका लब्बोलुआब था कि चूंकि उनका खुद का भी परिवार है और उनकी आमदनी बहुत कम है, ऐसे में दिल्ली जाने पर वह घर से किसी किस्म की मदद-खासकर आर्थिक मदद- की उम्मीद न रखे।

उसके बाद से अभिजीत ने किसी से कोई उम्मीद नहीं रखी। लेकिन मृगांका ने आकर पता नहीं क्यों उम्मीदें जगानी शुरु कर दी थीं। मृगांका की होठ दबाकर मुस्कुराने की अदा पर वह कसमें खा-खाकर निहाल होता रहता।

न्यूज़ रूम में भी मृगांका को देखना धीरे-धीरे उसकी आदत बनती चली गई थी। मृगांका भी नजर बचाकर देख ही लेती, यह बात दोनों पर ज़ाहिर थी कि दोनों चोरी-चोरी एक दूसरे को देख रहे हैं कुछ फिराक़ के शब्दों में ऐसे कि--

री महफ़ि‍ल में हर इक से बचा कर
तेरी आँखों ने मुझसे बात कर ली
...सारा ध्यान मृगांका की ओर रखते हुए भी वह सावधान रहता कि कोई उसे इस तरह नरम पड़ते न देख ले। आखिर बदतमीजों का भी अपना ईमान होता है, एक छवि होती है। अपनी छवि से बाहर आए नही कि बस लोग ताड़ लेंगे और आपसे डरना बंद कर देंगे।

लेकिन अभिजीत किसी से नही डरता था...मौत से भी नही। लेकिन यह कहने की बातें थीं...अब जब मौत दरवाजे पर खड़ी-सी है, उसे डर-सा लगने लगा है।

कई सारे बचे हुए काम याद आने लगे हैं...।

अपने तमाम करिअर मे, और कॉलेज के दिनों में- जब से प्रशांत उसे जानता है- अभिजीत हमेशा हंसने-हंसाने छींटाकशी करने, मजाक उड़ाने की विचारधारा का प्रतिबद्ध सिपाही रहा है...लेकिन पिछले कुछ दिन अभिजीत को बदल रहे हैं।

अप्रैल के आखिरी दिनों में- जब तेज धूप होनी चाहिए थी, दिल्ली में काले बादल छाए हैं। हुमक-हुमक कर बारिश हो रही है।

कॉमिडी शोज़, हिलेरी क्लिंटन की भारत यात्रा 
और ऐसी ही तमाम खबरों के बीच कोई शाकालनुमा बाबा टीवी पर नमूदार हो जाते हैं..। अभिजीत संजीदगी की सीमाओं को पार कर जा रहा है।

आज पता नहीं क्यों अतीत घूम-घूमकर अभिजीत के सामने आ जा रहा है। अतीत जिसने उसे यहां ला पटका है।

जस्ट फॉरगेट द पास्ट...।

अभिजीत ने सामने बालकनी में रखी कुरसी पर जमते हुए अख़बार फैला दिए। तमाम तरह की आशंकाओं से भरा अखबार...किसी भी भाषा में पढ़ो, सबसे पहले आशंकाओं की खबरें।

कोई अच्छी खबरें क्यों नही छापता फ्रंट पेज पर..फ्लायर बना कर..एकदम आठ कॉलम में..??

कोई तो अच्छी खबर हो...कि मृगांका ने तमाम शिकवे-शिकायतें नजरअंदाज करते हुए वापस लौटने का फैसला कर दिया है...कि मृगांका ने काली-घनेरी जुल्फों से उसका सिर ढंक दिया है..कि डॉक्टर ने जो कुछ कहा है वो रिपोर्ट गलत है, कि एक बाप का साया सिर से उठ जाने की वजह से उसे जो जिंदगी में सारे समझौते किए हैं, उसके लिए एक अन-डू का बटन आ गया है...कि लोग अपने अतीत में टाइम मशीन के जरिए लौट सकते हैं, कि स्टीफन हॉपकिन्स ने अतीत में जाकर अपना अतीत सुधार सकने का समीकरण दुनिया के सामने रख दिया है।

लेकिन ऐसा समीकरण नहीं बना अब तक। जिंदगी की पटकथा में जो शूट हो चुका उसमें परिवर्तन मुमकिन नहीं।

अखबार के पन्ने उसके अतीत के साथ डिजॉल्व होते चले गए। अबिजीत का मन हो रहा था कि वह अपनी जिंदगी को दोबारा एडिट करे। उसकी कॉपी दोबारा लिखे। चाहता था कि सीन 12 को बदल दे। लेकिन जिंदगी  की कहानी ऐसी कसी होती है कि जैसे ही आप कम खुशगवार सीन 12 को बदलते हैं तो जिंदगी का सबसे खुशगवार सीन 32 में काट देना पड़ेगा। 12 हटाया तो 32 भी हटाना पड़ेगा। उफ़्।

इसी को तो कहते हैं डेस्टिनी।

बाप की मौत के बाद नास्तिकता की ओर बढ़ता लड़का सोचते-समझते हुए पक्का नास्तिक बन जाता है। घरवालों ने कम्युनिस्ट कह कर लगभग रिश्ते काट लिए। भाई बहन पैसे की जरूरत होती है तभी याद करते हैं। 

यही भाई बहन जिनके साथ बचपन के सबसे दुश्वार साथ गले से गले मिलकर रहे। अंधेरे से डरने वाली बहन जो महज ग्यारह साल की थी, मंझले भाई जो 9 साल के...अंधेरे से कभी नहीं डरा तो अभिजीत। अपने बड़े भाई बहनों को सहारा देने वाले अभिजीत के लिए अब इनके यहां कोई जगह नहीं। 

डेस्टिनी। 

जारी 

Thursday, May 10, 2012

वेन यू आर इन शिट्

आज एक कहानी सुनाने का मन कर रहा है। बहुत शिक्षाप्रद कथा है। नाम है गुस्ताख लेकिन कसम बादलों के पीछे बैठे पत्थर के मूरतों की...कहानी धांसू है।

हुआ यूं कि एक बार एक कबूतर रहा। बहुत मांसल। बहुत मुलायम। फरों वाला। खूबसूरत भी। बहुत दिनों से एक बिल्ली उस पर नजर गड़ाए बैठी थी। बिल्ली की नजर उसे मांस पर थी। उसके मुलायम मांस की सोचते ही बिल्ली के मुंह से लार की अजश्र धारा फूट निकलती। वह कल्पना करती कि इस कबूतर के खूबसूरत फरों को यूं खींचकर अलग कर दूंगी...फिर खाऊंगी।

बिल्ली अपनी ताक में...कबूतर भांप गया।

उस साल दिल्ली में बहुत ठंड  पड़ी थी। इतनी कि आदमी तो खैर अकड़ कर मरे ही, कबूतर तक गिर कर मरने लगे।

तापमान जीरो डिग्री तक...। कबूतर बचा रहा।

लेकन कबूतर की अम्मां कब तक खैर मनाती...एकदा सड़क पर फैले दाने चुगने में कबूतर कुछ व्यस्त था। व्यस्त इसलिए था क्योंकि अब दाने लोगों के पेट की बजाय सड़कों पर पड़े मिलते थे। देश में रामराज्य नहीं आया था. मोहन और मोंटी का राज था।

दाने सड़ा दिए जाते थे। लेकिन दाने-दाने को मोहताज लोगों को नहीं दिए जाते। बाजार में कल्याण का भाव नहीं होता। अस्तु। दाने सड़ रहे थे। सड़े हुए दाने सड़क पर फिंक जाते। फेंक नहीं दिए जाते। सड़े हुए दाने नीलाम होते। बीयर बनाने वाली कंपनियां खरीद ले जातीं। लाने ले जाने में कुछ दाने फिंक जाते। गिर जाते। कबूतरों को चुनने की छूट थी। कबूतर, कबूतर थे आदमी जो नहीं थे।

बहरहाल, कबूतर सड़क पर फैले दाने चुगने में व्यस्त था। पेट भर गया था। लेकिन इस दौरान उस कड़ाके की ठंड से वो अकड़ गया। अकड़कर गिर गया।

बिल्ली आगे बढ़ी। झपट्टा मारने। लेकिन ये क्या...वहां से गुजरती एक गाय ने ऐसे शिट् (गोबर) किया कि कबूतर उससे ढंक गया। बिल्ली के भागों जो छींका टूटने वाला था उसपर गोबर...शिट्।

बिल्ली हताश।

लेकिन कबूतर को गोबर की गरमी मिली। ठंड की अकड़ जाती रही। कबूतर गोबर के भीतर से ही गुनगनाने लगा। उधर से गुजरते एक आदमी ने शिट् से गुनगुनाने की आवाज सुनी तो कबूतर को गोबर से निकाल कर बाहर कर दिया।

गोबर से बाहर निकालना था कि घात लगाई बिल्ली ने कबूतर पर हाथ साफ कर दिया।

वायदे के मुताबिक मुझे आपको बताना है कि आखिर इस किस्से से क्या शिक्षा मिलता हैः

1. आप पर शिट् करने वाला हर कोई आपका दुश्मन नहीं होता
2. आपको शिट् से निकालने वाला हमेशा आपका दोस्त नहीं होता
और,
3. जब आप शिट् में हों गाना-गुनगुनाना अच्छा नहीं, बल्कि नुकसानदेह होता है।

Monday, May 7, 2012

सुनो! मृगांका-पूछो न मैंने कैसे रैन गुजारी...

एकः पूछो न मैंने कैसे रैन गुजारी...

सूरजमुखी जैसी उस लड़की का घोषणापत्र था, मैं ही हूं मृगांका। 

इस आत्मविश्वास भरे घोषणापत्र के जवाब में
उस वक्त अभिजीत के पास कहने के लिए कुछ खास था भी नहीं, ना दिमाग में, ना ही ज़बान पर। मन ही मन नाम दोहराता वह सीढियों की ओर निकल गया। नीचे चाय की दुकान पर...दफ्तर के सामने ही, सप्तपर्णी के पेड़ हैं। जिनके नीचे बैठ कर चाय पीने का मजा ही कुछ और है।

सितंबर अक्तूबर में सप्तपर्णी उमक कर प्रेमासक्त नायिका की तरह खिलती है। उसकी मदमाती गंध अभिजीत को शुरु से पसंद रही है। आज वो गंध पता नहीं क्यों उसे बेहद याद आ रही थी। सप्तपर्णी पेड़ों के तने से टिककर सिगरेट सुलगाने और हरे-काले बैकग्राउंड में सफेद धुआं छोड़ने का मजा ही कुछ और है।

जब से सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान की मनाही हुई है, यह काम अभिजीत को बार-बार करने का मन करता है।

भिजीत को बचपन से ही हर ऐसे काम से रोका जाता रहा। बड़े भाई खानदान के पहले एमए पास थे। उन्हें पता था कि किस तरह की पढाई करने से दुनिया में चीजें मिलती हैं। बचपन से ही डॉक्टर बनने के ख्वाहिशमंद लड़के को गणित की ओर धकेला गया...अभिजीत को चित्रकारी का शौक था..बड़े भाई को लगता था कि पेंटिंग-वेंटिंग वक्त और करिअर दोनों की बरबादी है....।

अभिजीत की बरबादी वहीं से शुरु हुई थी...और आज मेट्रो, बसों और उनसे भी ज्यादा कारों की रेलमपेल से भरे शहर में एक मेसेज ने औपचारिक रुप से उसकी बरबादी का ऐलान कर दिया। हालांकि, यह सब कुछ बहुत दिनों से चल रहा था।

...
जस्ट फॉरगेट द पास्ट...

स्साला, जितना भी निकलना चाहो अतीत पीछा ही नही छोड़ता। उसे प्यास लग आई थी। ऐसी प्यास ...जिसे न दारू बुझा पाई..पानी-वानी से तो खैर ऐसी प्यासों का रिश्ता ही नहीं होता।

भिजीत लड़खड़ाते कदमों से किचन तक गया..फ्रिज से बोतल निकाल कर गटक गया। उसे लगा कि एक बार बाथरुम भी हो ही आना चाहिए। उसने पेट में जलन को नजरअंदाज करते हुए भी सोचा, "स्साला, अल्कोहल चीज ही ऐसी है।" यूरिनल में धार गिर रही थी और वह सोच रहा था....."अल्कोहल...वेसोप्रेसिन..एटीडाययूरेटिक....हाहाहा...नशे में हंसना कितना नशीला होता है...अतीत भी नशा ही है, शराबनोशी की तरह अतीत भी पीछा नही छोडती।

एक मेसेज से तमाम रिश्ते..तमाम वायदे...साथ गुजारे लम्हे..नही भुला सकते। मेसेजेज डिलीट किए जा सकते हैं...यादों को डिलीट करने का सॉफ्टवेयर है क्या किसी इंटेल-फिंटेल के पास..?."

अभिजीत ने दवाओं के ढेर की तरफ देखा। वह हंसा। रात को तो दवा लेना भूल ही गया था। मृगांका..होती तो भड़क जाती, होती क्या ...है ही...दो साल से ज्यादा हो गए...पता नहीं कहांहो। बाल-बच्चेदार होगी...ढेर सारी कड़वाहट उसकी ज़बान पर उतर आई..लगा किसी ने खाली पेट में ही नीट पिला दिया हो।

ड़े भाई और भाभी के सामने उसकी रुह कांपती थी। उसकी मां को अचारों के मर्तबान, लाल मिर्ची, दालों और चनों को धूप में रखने, शाम को वापस छत से उतार लाने, और व्रत उपवास अंजाम देने के सिवा दुनिया से कोई और मतलब नही था।

मेट्रिक और फिर बारहवी में वह कुछ ठीक-ठाक नंबरों से पास हो गया था। भाई साहब ने डिमांड रखी, आईआईटी की परीक्षा में बैठो। लेकिन परीक्षा में शामिल होना एक बात होती है, उसमें कामयाब होना दूसरी। अभिजीत को न कामयाबी मिलनी थी और ना ही मिली।

एआई ट्रिपल ई में फिसड्डी रैंक के बावजूद दोयम दर्जे के कॉलेज में इंजीनियरिंग में दाखिला मिल ही गया। यह दाखिला भी उसके लिए कोई यातना से कम न था..लेकिन घर के माहौल से, घुटन से मुक्ति थी। एक उजास-सा आ गया कॉलेज के हॉस्टल में आने से।

पूरब में उजास छा रहा था। अभि की नींद खुल गई। सिर दर्द से भारी हो रहा था। प्रशांत आज तो नही आएगा। आज वह अकेला हो जाएगा फिर..से...

और अकेले में खाना बहुत बड़ी मुश्किल होती है। डॉक्टर की तमाम हिदायतों के बावजूद वह हर तरह का खाना खा लेता है क्योकि ढाबों के मेन्यू में सादा खाना बमुश्किल ही शामिल होता है।

तो अकेले में खाना बहुत मुश्किल होता था...

कैंटीन में खाना...शोरगुल। कैंटीन की हवा में खाने की बू होती थी। अभिजीत से बर्दाश्त नहीं होती थी ये बू। इस गंध में मसाल-डोसा से लेकर ऑमलेट तक सब शामिल होते थे। सामने वाली टेबल पर मृगांका बैठी थी...अपने दोस्तों के साथ। अभिजीत देखता रहा। मृगांका की आंखें भी उठीं, अभिजीत पर टिकी और टिकी ही रह गई। सिनेमा होता तो कट पर ये शॉट लगते।

कट टू मृगांका -लॉन्ग शॉट
कट टू अभिजीत- मिड शॉट
कट टू मृगांका -क्लोज अप 
कट टू मृगांका -एक्सट्रीम क्लोज अप

भिजीत देखता ही रह गया। सिनेमैटिक साइलेंस। दो मिनट तक। पलकें झुकी नहीं। पलके गिरी नहीं। पता नहीं क्यों पहले पलकें अभिजीत ही हटा ले गया। आमतौर पर बदतमीज माने जाने वाले अभिजीत से इस तरह लजाने की उम्मीद कोई भी नही करता था।

आमतौर पर बदतमीज माने जाने वाले अभिजीत से इस तरह लजाने की उम्मीद कोई भी नही करता था। पास में मेट्रो का निर्माण का काम चल रहा है। पत्थर तोड़ने का काम चल रहा है।

पेड़ भी काट डाले गए हैं। कुल्हाडियां चल रही हैं..खट्...खट्...खट्।

जारी...

सुनो! मृगांका...


(साल भर हुए नॉन फिक्शन लिखते-लिखते खुद को जांचने के लिए क्या मैं फिक्शन भी लिख सकता हूं..मैंने एक कथा लिखनी शुरु की थी। कथा चार किस्त से आगे नहीं बढ़ पाई। यह मेरे स्वभाव का हिस्सा है। अब लगा कि उसे पूरा करना चाहिए। अब उसे थोड़े परिवर्तन के साथ फिर से लिख रहा हूं...नाम भी बदल दिया है। नॉन फिक्शन लिखने के मामले में हमेशा अपनी क्षमता पर संदेह रहा है। ऐसे में अपनी पहली कथा एक प्रेम-कथा के रुप में लिख रहा हूं। मुझे इसकी गुणवत्ता और साहित्यकता पर भी संदेह हैं..लेकिन बस अपनी कहानी रचने की क्षमता का जांचने के लिए लिख रहा हूं। हां, ये भी बता दूं लगे हाथ की इस कहानी में वर्णित सभी पात्र काल्पनिक हैं। घटनाएं सत्य हैं लेकिन उनका किसी भी जीवित और मृत व्यक्ति से सीधा संबंध नही है- मंजीत)


सुनो! मृगांका...



बारिश भरी रात...बाहर बादलों का साम्राज्य था। बीच बीच में बिजली कड़क उठती। डॉप्लर प्रभाव का भौतिकी वाला सिद्धांत कोई भी पढ़ले...पहले रौशनी चमकती फिर जोर की गड़गड़ाहट। काले दिन भी गुजरे थे रातें भी काली ही थीं...बीच-बीच में झींगुरों का कोरस सुनाई दे रहा था। इन आवाजो से बेख़बर अभिजीत अभी-अभी सोया था। सोया क्या था..नींद की झोंके आए थे।

इन झोंके से ऐन पहले उसने प्रशांत के साथ एंटीक्विटी की एक बोतल खाली की थी। यह भूलते हुए कि डॉक्टर ने उसे दारु न पीने की उम्दा सलाह दी है। इस चेतावनी के साथ कि अगर उसे चार-पांच साल और जीना है तो सिगरेट और शराब से परहेज करना ही होगा।.

लेकिन पांच पैग के बाद प्रशांत पलंग के नीचे ही घुलट गया। उसे सुबह की शिफ्ट में दफ्तर जाना था। अभिजीत को बचपन से ही जल्दी नींद नही आती। आखिरी पैग के बाद भी उसके ज्ञानचक्षु खुले ही थे। कि बस वाइव्रेशन मोड में किनारे पड़ा मोबाइल घुरघुराया...मृगांका का संक्षिप्त मेसेज था...अभि, फॉरगेट द पास्ट...।

 
गोल्ड फ्लेक के धुएं के बीच अभिजीत ने दिमाग पर बहुत जोर डाला कि यह शब्द उसने कही और भी पढ़ा था। उसे से याद नहीं आया था। फिर एंटीक्विटी के लार्ज पेगों ने अपना असर दिखाना शुरु कर दिया था। नींद को झोंके आने लगे थे..मृगांका....

हालांकि बात करीब दो साल यानी सात सौ पैंतालीस दिन यानी सत्रह हजार आठ सौ अस्सी घंटे पहले मृगांका ने लगभग चीखते हुए कहा था...आई कांट गेट यू इन दिस लाइफ़। इस जन्म में मैं तुम्हे नहीं पा सकती। इतने लम्हों के बाद भी, जो सदियों की तरह भी लगते हैं और लगते हैं जैसे आज सुबह की ही बात हो।

मृगांका...। मृगांका...।

मृगांका उसकी जिंदगी का सबसे मुलायम लम्हा थी।

सबसे मुलायम गोकि अभिजीत की जिंदगी में मुलायम लम्हे कम ही आए थे। बेहद गरीबी में काटे दिन, पैसे-पैसे को मोहताज। कॉलेज के दिनों में ट्यूशन पढाकर अपनी पढाई पूरी करने वाले अभिजीत के लिए दिन मुलायम हो भी नही सकते थे।

पिता मास्टर थे, और उन्ही दिनों ईश्वर के पास चले गए, जब ऐसे घरों में फाकाकशी की नौबत आ जाने की पूरी आशंका होती है।

...जस्ट फॉरगेट द पास्ट..

तीत को भूलना इतना आसान भी नहीं होता। मृगांका कोई कंटीले सौंदर्य की मलिका नहीं थी। लेकिन अभिजीत ने देखा तो बस देखता ही रह गया था। लगा, इस को पहले कहीं देखा है।

अभिजीत ने सुना था कहीं कि मृगांका नाम की एक लड़की ने हाल ही में जॉइन किया है। अभिजीत के ही अखबार में, डेस्क पर। न्यूज़ रुम में एक कोने में क्वॉर्क एक्सप्रैस पर पेज बनाने में मशगूल डेस्क के पत्रकारों के हुजूम में उसने अपनी रिपोर्ट का जिक्र करते हुए यूं ही पूछ लिया था ये मृगांका कौन है?

सच तो ये था इस नाम का मतलब उसे नहीं पता था। मृगांका..जो हिरन को गोद में ले? उस वक्त वहां मौजूद कुछ समाचार संपादक हंस तो दिए, लेकिन इसका अर्थ बाद में मृगांका ने ही बताया था, चांद।

तीत के परते ऐसे ही खुलती जाती हैं प्याज की तरह। हर तह में आपको रुलाती हुई।

मेसेज भेजने से क्या होता है, जस्ट फॉरगेट द पास्ट? और उसका क्या कि आई कांट गेट यू इन दिस लाइफ़। इस जन्म में नहीं पा सकने का दर्द तो उसी को होगा ना जो पाने की हसरत को असीम ऊंचाईयों तक मन में पाल ले।

झींगुरों की आवाज तेज हो गई थी और बाहर बारिश भी।

"इस बार साली दिल्ली को बहा देंगे ये भैनचो..बादल। साली इसी को तो कहते हैं जलवायु परिवर्तन...अप्रैल हो गई बारिश देखते जाओ। इस दिल्ली का तो कुछ है नहीं अपना, शिमले में बर्फ गिरे तो दिल्ली अकड़ जाए, राजस्थान में गरमी हो तो लू दिल्ली में चले। अब कश्मीर की घाटी में डिस्टरबेंस है बारिश दिल्ली में। हद हो गई चूतियापे की।" प्रशांत बुड़बुड़ा रहा था। पर्यावरण प्रेम से ज्यादा ऑफिस पहुंचने में देरी से वह हलकान हो रहा था। 

पिक-अप की कैब अभी तक आई नही थी।

जैसे ही अभिजीत ने पूछा था ये मृगांका कौन है...सलज्ज आंखों के एक जोड़े ने उसका पीछा किया था। इस उत्तर के साथ,...देख लो मै ही हूं मृगांका।

मृगांका, चांद? हुंह। ये तो सूरज है...पीले कपड़ों और लाल दुपट्टे में सजी मृगांका उसे सूरज-सी लगी। तेजस्विनी। अभिजीत मुस्कुरा उठा फिर से। सूरज तो पुलिंग है, ये सूरजमुखी ठीक है।

उसके बाद से अब तक अभिजीत के मन में मृगांका की वही छवि बस-सी गई। सूरजमुखी वाली।

जारी..

Saturday, May 5, 2012

वर्तमान बनाम विस्मृति

भी हाल ही में घर गया था। झारखंड। मधुपुर। ढाई साल बाद जाने का मौका मिला। पता नहीं इतना इमोशनल क्यों हूं. अपने घर को, अपने शहर को नजदीक से निहारने का कोई मौका नहीं छोड़ता। लेकिन इस बार मेरे शहर ने मुझे बहुत निराश किया।

सुशांत कहते हैं कि लीडर, बड़ा लीडर कभी अतीत की ओर नहीं जाता। मैं जाता रहता हूं। तय हो गया कि मैं लीडर नहीं हूं। मुझे लीडर नहीं बनना है। मैं कृष्ण नहीं।

धुपुर में जितने चौक-चौराहे हैं, मूर्त्तियों ने घेर ली है जगह। मधुपुर के सबसे बीच के चौक में गांधी जी की मूर्ति किसी हड़बड़ी में दिखती है। कूदकर भागने को तैयार। हाथ की लाठी तक गतिमान् है। शायद नोआखली कीतरफ निकलने वाले हों। वैसे भी भारत में गुजरात से लेकर असम तक, तेलंगाना से लेकर अनंतनाग तक हर जगह नोआखली पैदा हो गया है। गांधी की मूर्त्ति की हड़बड़ी समझ  में आने लगी है। गांधी चौक शाश्वत है।

इससे थोड़ा दक्षिण आज का जेपी चौक है।

हले आर्य समाज मंदिर की वजह से यह आर्य समाज चौक कहलाता था। यहां सन् 86 में जेपी की मूर्त्ति लगा दी गई। आवक्ष प्रतिमा। नीचे नारा भी लिखा है, संपूर्ण क्रांति वाला। जिसमें भावी इतिहास हमारा कहा गया है। संपूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है। नारा शब्दों में, संगमरमर की पट्टिका पर दर्ज है। बस।

आम जनमानस में चौक अब भी आर्य समाज का ही है। जेपी की मूर्त्ति की नीचे एक और संगमरमर की पट्टिका लगी है। जिसमें मधुपुर शहर के वास्तुकार मोतीलाल मित्रा के होने का ऐलान है।

सके बाद थाना..और थाने के आगे एक तिराहा। तिराहे के एक कोने पर लोहिया जी की मूर्ति है। यह भी आवक्ष। संगमरमर की। लोहिया की मूर्ति के नीचे एक और घोषणा, ज़िंदा क़ौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करती। लोहिया जी इस लिहाज से हमारी क़ौम कब की मर चुकी है। हर पांच साल बाद अपनी जाति के लोगों को संसद, विधानसभा भेजकर अपने कलेजे पर दुहत्थड़ मार कर अरण्य रोदन करती रहती है। लोहिया की मूर्ति और विचार दोनों उपेक्षित हैं। वैसे, खुद लोहिया ने भी कहा था कि किसी नेता की मूर्त्ति उसके मरने के सौ साल बाद ही लगानी चाहिए। सौ साल में इतिहास उसकी प्रासंगिकता का मूल्यांकन खुद कर लेगा। बहरहाल, वह तिराहा अब भी थाना मोड़ ही है।

ड़क के साथ मुड़कर दक्षिण की ओर चलते चलें, तो आधा किलोमीटर बाद ग्लास फैक्ट्री मोड़ आता है। यह भी तिराहा है। झारखंड आंदोलन के दौरान शहीद हुए आंदोलनकारी निर्मल वर्मा के नाम पर इस चौक पर एक पट्टिका लगा दी गई। बदलते वक्त में ग्लास फैक्ट्री-जिसमें लैंप के शीशे से लेकर ज़ार और मर्तबान बनते थे, ग्लासें बनतीं थी-बंद हो गई। लोग बड़े पैमाने पर बेरोजगार हो गए। लेकिन ग्लास फैक्ट्री से लोगों का मोह भंग नहीं हुआ। निर्मल वर्मा के नाम पर उस तिराहे को कोई नहीं जानता।
वह मोड़ अब भी ग्लास फैक्ट्री मोड़ है।

सड़कों को नाम पंचमंदिर रोड हैं, हटिया रोड है, स्टेशन रोड हैं। हां, पता नहीं कैसे एक चौराहा जहां भगत सिंह की मूर्ति है ुसे भगत सिंह चौक ही कहा जाने लगा है। भगत सिंह बिरसा की तरह ही मधुपुर की अवाम के मन में बसे हैं।

र्य समाज चौक से दाहिनी तरफ सिनेमा हॉल है-सुमेर चित्र मंदिर। लेकिन उससे पहले एक कोने पर बंगालियों की संस्था तरुण समिति ने सुभाष चंद्र बोस की मूर्त्ति लगा दी है। आदमकद प्रतिमा ललकारती-सी लगती है। लेकिन बागी हो चुकी पीढी के लिए जिसके लिए आवारपन शगल है-बोस की प्रतिमा पर नजर देना भी वक्त की बरबादी लगने लगा है।

उधर, आर्य समाज चौक पर ही एक बहुत मशहूर बड़ा स्कूल है। उसके बोर्ड पर नजर गई तो बहुत बुरा लगा। पहले, यानी जब हम छात्र रहे थे तब वो स्कूल एडवर्ड जॉर्ज हाई स्कूल था, अब उसे डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी उच्च विद्यालय कर दिया गया है।

काश...नाम बदलने की बजाय सरकार स्कूल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर कोई पुस्तकालय शुरु कर देती। शहर के बदले मिज़ाज ने दुखी कर दिया।

जिस वक्त हम शहर छोड़ गए उस वक्त की यादों और आज के हालात में ज्यादा फर्क नहीं। विकास और तरक्की के नाम पर कुछ फैशनेबल दुकानों और मोबाईल टॉवरों के अलावा मधुपुर में कुछ नहीं जुड़ा। हरियाली  कम हो गई है, पानी का संकट खड़ा होने लगा है। हमेशा ताजा पानी मुहैया कराने वाले कुएं सूख चले हैं...बढ़ते शहर में मकानों ने पेड़ो की जगह ले ली है।

सांस्कृति रूप से समृद्ध रहे शहर में तनाव तारी है। यह तनाव सांप्रदायिक नहीं है, जीवन शैली का तनाव है।

दुखी होने के लिए इतना काफी है।

Wednesday, May 2, 2012

सूरजमुखी की याद में हरे पन्ने


अभी-अभी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन गोमोह से ट्रेन पकड़ी है। गोमोह पहले सिर्फ गोमोह था. अब इसके नाम के आगे नेताजी सुभाष का नाम भी है। कारण, नेताजी यहीं से अफ़गानिस्तान के लिए रवाना हुए थे। पुरुषोत्तम एक्सप्रैस हांफती हुई बढ़ रही है। चिलचिलाती धूप के बीच हरियाली का दीदार होता है। पारसनाथ की पहाड़ी गुजरती है। जैनों का बेहद प्रसिद्ध तीर्थ है यहां..।

पारसनाथ का इलाका आजकल लालखंडियों यानी माओवादी आतंकियों या नक्सलियों के गढ़ के रुप में मशहूर हो रहा है। तीर्थयात्रियों की आमद में हालांकि कमी नही आई है लेकिन आने वाले लोग कई बार राहजनी के शिकार होते हैं। आतंक का एक डर उनमें थोडा आ तो गया ही है। ये कमजोरों के लिए लड़ रहे नक्सल आंदोलन का दूसरा चेहरा है।

इस इलाके की वारदातों के बारे में सुनकर मुझे आंदोलन के बदलते स्वरुप पर माताटीला, पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी गांव में अपने तजुरबे की याद आई। नक्सलबाड़ी भी अब पहले सा कहां रहा...। वहां भी बदलाव ने पैर पसारे है। बहरहाल, मेरे मन में उमड़-घुमड़ रहे विचारों से बेखबर ट्रेन पटरी पर दौड़ी जा रही है।


कोडरमा की घाटी, लग रहा है, पीछे की ओर दौड़ रही है। हरियाली अपने सबसे उत्तेजक स्वरुप में है। तपती धूप में जोर से चलती हवा, जो फिलहाल लू नहीं है।

पहाड़ी ढालों पर महुआ के पेड़ों ने नए कपड़े पहने लिए है। मुझे नहीं मालूम कि अंग्रेजी के शब्द शेड्स के लिए हिंदी के किन शब्दों का इस्तेमाल होता है। या जो मैं कहना चाहता हूं उनपर हिंदी के शब्दों में विचारों के शेड्स आएंगे या नहीं...।


पर्वतपाद में बेर, अमलतास, आम, आसन, अर्जुन, कटहल, सखुआ, साल और ऐसे ही मॉनसूनी जलवायु वाले पेड़ों की भरमार है। जंगल कही-कहीं बहुत घना तो कहीं एकदम से विरल है। बस्तियां भी हैं..कभी-कभार ट्रेन पहाड़ के गर्भ से यानी सुरंग से होकर गुजरती है। पल भर को अंधेरा छा जाता है।


बोगी में भीड़ है। बोगी चने, चाय, मूंगफली, खाना, बिरयानी पानी की बोतल, खीरे बेचने वालों की आवाज से गुलज़ार है। हरापन आँखो को ताजगी दे रहा है। दिल्ली का हरापन एकरस है। यहां धानी रंग का हरापन है, सुनहरा है, पीला है, हल्का पीला, ललछौंह हरियाली है...सुग्गापंखी रंग है, हरे के ही हल्के और गहरे रंगों में इतने शेड्स हैं कि बस देखते रह जाएं। कोई शातिर कलाकार जिसने प्रयोग के नाम पर इतने शेड रच डाले। कुदरत का करिश्मा है।


बीच-बीच में खेत भी हैं। इन परती खेतों में धान की पिछली फसल की यादें मौजूद हैं। धान के पौधे की खूंटियां अतीत की तरह हैं। ताड़ के पेड़ों के झुंड जो कई किलोमीटर से ट्रेन का पीछा कर रही हैं।


कोडरमा की घाटी अब समतल खेतों में तब्दील हो गई हैं। मिट्टी में मैदानी सोफेस्टिकेशन की जगह आदिवासी सौन्दर्य है। एक दम कच्चापन, कंकड़ मिली खूबसूरती। रंग भी गहरा लाल। इन पेड़ों के बीच बड़ (बरगद) भी है, नीम भी, बेर भी, बांस की झुरमुटें भी। ताड़ लेकिन बहुसंख्यक हैं।


बांस की झुरमुटें यहां की ज्यादातर आबादी की तरह कुपोषण की शिकार हैं। पतली शाखाओं वाली, कम लंबी...पत्तीविहीन। नग्न। बरगद दिकुओ (बाहरी) की तरह हरे-भरे हैं। विशाल। ऐसा हा हाल मवेशियों का भी है। गाय, भैंस बकरियां भी कम मजबूत, कम ऊंची., कम ताकतवर। इनके हिस्से का सारा चारा कोई और खा जाता है, इनकी ताकत किसी और के हाथ में है।


मई शुरु ही हुआ है। लेकिन खेतों में सूरज ने सूखे को सूबेदार की तरह तैनात कर दिया है। घरौंदो की तरह बस्तियों में घर हैं। पॉलीथीन शीट्स और फूस की छतों वाले घर। घरों के आगे गोयठे (उपले) के भंडार हैं। जलावन के लिए गोयठा इस्तेमाल करते हैं। उऩका खाद के रुप में प्रयोग अब भी बेहद कम होता है।


दूर पृष्ठभूमि में नग्न हो चुके बेशरम पहाड़ दिख रहे हैं। जंगल लगाने की कोशिशों में सरकार ने कुछ यूकेलिप्टस लगाए हैं। कुछ वैसे ही जैसे पाकिस्तान ने कुछ आतंकी छोड़ रखे हैं। स्लेटी दिखते पहाड़ और हमारे बीच अब कुछ भी नहीं, एक मैदान के सिवा, जहां की घास जल चुकी है। बीच में एकाध हरे टुकड़े हैं।


गौर से देखना चाहता हूं किसी का चेहरा इन सबके बीच। वही मुस्कुराता चेहरा। जिसे मेरा हर जुस्तजू 'वेरी फनी' लगा करती है। जिसके चेहरे की मुस्कुराहट पर मैं तमाम जिंदगी न्यौछावर कर सकता हूं। हरियाली का हर शेड इसीलिए प्यारा लग रहा है कि मैं उसी का चेहरा हर शेड में देख पा रहा हूं। इस सूखी धरती में मैं सूरजमुखी का फूल क्यों तलाश रहा हूं...छोटू तुम कहां हो?


विचार श्रृंखला टूट रही है। सहयात्री कह रहा है, गया आने वाला है।