Monday, June 4, 2012

राउडी राठौड़ः खालिस मनोरंजन, नो दिमाग़

फिल्म के बारे में कुछ लिखने से पहले आपको वैधानिक चेतावनी देना जरूरी हैः इस फिल्म को देखते वक्त दिमाग को घर पर ही छोड़ कर आएं, और तभी आप इस फिल्म का मज़ा ले पाएंगे।

राउडी राठौड़ खालिस फॉर्म्युला फिल्म है। सबसे बेहतर बात की आप प्रभु देवा से अनुराग कश्यप या हबीब फैसल जैसी उम्मीद लगा कर जाते भी नहीं है। फिल्म खालिस मनोरंजन की अपील करती है और कई हद तक उसे पूरा भी करती है।

फिल्म की कहानी में कुछ भी नया नहीं है।  शिवा यानी चोर बने अक्षय कुमार की कारस्तानियां भी कई फिल्मों का बासी कूड़ा लगता है। लेकिन फिल्म में उन लोगों के लिए बहुत कुछ है जो फिल्मों से कुछ उम्मीदें लगाकर नहीं जाते। यह रेडी, दबंग, बॉडीगार्ड और सिंह इज किंग के कतार की फिल्म है।

फिल्म शुरु होती है एक चोर की कारस्तानियों और पटना से आई एक लड़की से उसके प्रेम के शुरु होने से। जब अक्षय कुमार फिल्म में सोनाक्षी सिन्हा से इश्क़ कर रहे होते हैं तब तक परदा बहुत सुहाना लगता है।

अक्षय कुमार की लगातार पिट रही फिल्मों के दौर से भी यही फिल्म सुहाना अहसास दिलवाएगी। कम से कम अक्षय इसमें अपने खिलाड़ी और एक्शन इमेज की झलक तो देते हैं। इस फिल्म की कॉमिडी में भी वो अपनी ही किसी पुरानी फिल्म का दोहराव भी नहीं लगते।

लेकिन देखा जाए तो पूरी फिल्म बॉलिवुड स्टीरियोटाइप से भरी पड़ी है, जिसमें गुंडो की अनंत फौज है। हालांकि फिल्म में गोलियां बहुत कम चलाई गई हैं, लेकिन असीम मारकाट है। एक अतिरेकी शक्तियों के स्वामी की तरह अपने दो अवतारों में (अक्षय का डबल रोल है) अक्षय लगभग अठारह अक्षौहिणी सेना का वध कर डालते हैं।

फिल्म का खलनायक पक्ष बेहद कमजोर है। घटनाएं पटना के आसपास के किसी देवगढ़ की रची गईं हैं। कोई भी दृश्य कहीं से भी बिहार का नहीं लगता। खलनायक बिहारी हैं,लेकिन निर्देशक के फैसले के मुताबिक बोलते समय लार टपकाने और प्राय- थूकते रहने वाले मुख्य खलनायक (नासिर) जब मुंह खोलते हैं तो दक्षिण भारतीय लगते हैं। बाकी के खलनायक मुंह नहीं खोलते। वे या तो स्त्रियों के साथ बलात्कार या हीरो के साथ मारकाट में रत रहते हैं।


अक्षय कुमार ने पूरी फिल्म अपने कंधों पर ढोई है। एक हद तक वो इसमें कामयाब भी रहे हैं। पीठ दर्द से परेशान रहे अक्षय को फिर से राउंड किक लगाते देखना पुराने दिनों की याद की ताजा करने जैसा है।

फिल्म बहुत लाउड है। इसका संगीत सामान्य है। और एक दो गाने जो पहले ही लोकप्रिय हो गए हैं, बाकी के गाने बेदम हैं। यहां तक आइटम सॉन्ग भी शोरगुल से ज्यादा कुछ नहीं है, जिसमें कॉरियोग्रफर ने जरूरत से ज्यादा भीड़ इकट्ठी कर ली है।

फिल्म पहले ही हिट हो चुकी है, लेकिन छोटे सेंटर्स पर इसे दर्शकों की तालियां और सीटियां दोनों मिलेंगी। फौलाद की औलाद, मैं जो कहता हूं वो करता हूं और जो नहीं कहता वो तो डेफिनेटली करता हूं जैसे संवाद तालीबटोरू हैं।

लेकिन फिल्म की सबसे खूबसूरत बात, सोनाक्षी सिन्हा रहीं। उनका रोल महज तीन या चार रीलों में सिमटा है जहां वो अक्षय के साथ गाने गाती हैं और रोमांस-सा कुछ करती हैं। कैमरे की तरफ लुक देती हैं, मुस्कुराती हैं। सोनाक्षी उन फिल्मों में ज्यादा जमेंगी जहां अभिनय करने की कोई खास जरूरत न हो। मसलन, दबंग और राउडी राठौड़।

वैसे, कटरीना के कंटीले सौन्दर्य के मुकाबले यह बिहारी बाला भी खूबसूरती के पैमान गढ़ती है। दबंग में हम उनके मस्त-मस्त नैन देख चुके हैं। इस फिल्म में उनकी मादक कमर को निशाना बनाया गया है। कई बार पूरा कैमरा ज़ूम होकर उनकी कमर पर टिक जाता है। खासी मादक कमर है।

फिल्म में अक्षय ने जबर्दस्त मूंछें रखी हैं। मूंछे मरोड़ते हुए कई दफा वे अपना नाम विक्रम राठौड़ दोहराते हैं। यह अदा भाती है, लेकिन बारिश के वक्त एक्शन के एक दृश्य में मूंछे मरोड़ते वक्त साफ हो जाता है कि मूंछें नकली हैं। मेकअप मैन की इस नाकामी को और संपादक की इस गलती को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस दृश्य को डीवीडी में कई दफा देखें तो साफ हो जाएगा।

फिल्म का एक्शन जबर्दस्त है। यही फिल्म की यूएसपी भी है। तो अगर आप फिल्म देखने जाएँ और अपने जॉनर की इस ईमानदार फिल्म को देखें (क्योंकि कहीं से भी यह फिल्म कला पक्ष या कथा तत्व का दावा नहीं करती) तो कृपया दिमाग़ का इस्तेमाल न करें।


Saturday, June 2, 2012

इट्स टू हॉट ना!

सुना दिल्ली का पारा 46 को पार कर गया। आलोक पुराणिक ने 45-45-45 लिखा है। हम कहते हैं दिल्ली का फीगर 47-45-46 हो गया है। एक दम भरी-पूरी काया...गरमी इतनी मादक भी हो सकती है क्या?

गरमी में लोग परेशां-परेशां से घूमते हैं। इशकज़ादे का गाना गुनगुनाते हुए..मैं परेशां, परेशां, परेशां...। लेकिन इस गरमी ने हमें तपस्वियों वाला बाना दे दिया है। कुछ ऐसी समां बंध गई है कि दफ्तर से निकलने का मन ही नहीं करता। दिन भर एसी में बैठने का मजा। बाहर निकलें,तो लगे कि बस भई किसी ने गरम् तवे पर या ओवन में बिठा दिया हो।

इसका भी मज़ा है। घर जाता हूं। कूलर खराब है। (मानो ठीक होता तो घर को स्विट्ज़रलैंड बना देता।) पंखे की पंखुडियां भारत की विकास दर की तरह सुस्त पड़ गई हैं। वैसे एक बात है, पंखे हो या कूलर, या एसी चलते बिजली से हैं।

हम वैशाली वाले है, यूपी वाले। हमारी बहुत चिंता है युवा मुख्यमंत्री को। कहते हैं बिजली की खपत कम करो। कम एसी चलाओ, कम पंखे चलाओ,कम कूलर चलाओ। आप को बिजली मिलेगी तो आप कहां से मानने वाले रहे। आप तो चलाओगे ही, तो अखिलेश ने आदेश देकर बिजली कटवानी शुरु कर दी है।

सुना है कि शीला जी ने भी दिल्ली वालों की आदत बिगड़ने से बचाने के लिए बिजली काटते रहने के आदेश दिए हैं। बहरहाल, अंधेर में रहने की आदत कुछ यूं हो गई है कि वैशाली में बिजली आती है तो आंखें चौंधिया जाती हैं। ये कहां आ गए हम...टाइप गाना गाने की इच्छा हो उठती है।

तपस्वियों का क्या है। गरमी सहते हैं। हमने भी हठय़ोग ठान लिया है। बिजली रहती नहीं, गैस की बत्ती जला देते हैं. इससे कमरे का तापमान पचास तक पहुंचने में मदद मिलती है। फिर, नंगाझोली होकर अर्थात् सिर्फ लंगोट में हम सिद्धासन में लैपटॉप के सामने बैठ जाते हैं।

फिर तो धाराप्रवाह पसीना बहता रहे। कोई परवाह नहीं। अखिलेश ने कहा है यूपी को सुधार देंगे। सच्चे गुरु। सुधार दिए। सबकी आदतें खराब हो रही थीँ। एसी वगैरह से बीमारियां भी हो जाती हैं। किसी को कहां परवाह।

कल शाम मेट्रो में एक कन्या अपने छैले से कह रही थी, इट्स टू हॉट ना।


हमको बहुत शरम आई। इ कौनो हॉट मौसम थोड़े ही ना है। इस मौसम में तो रिक्शे से ऑटो तक और पैदल से मेट्रो तक सारी सुंदरियां मुंह ढंककर दस्यु सुंदरियों में बदल गई है। कहां रहा हॉट? वैसे हॉट कहते ही सन्नी लियोनी और हमेशा निर्वस्त्र होने की धमकी देने और सिर्फ फोटो जारी करने वाली पूनम पांडे की छवि घूमती है।
हमको बहुत शिकायत है पूनम पांडे से...ऐसे क्या छिप-छिपा के अपनी धमकी पूरा करती हो। है दम तो यू ट्यूब पर जारी करो।

वैसे मर्दो वाली हो या महिलाओं वाली, मरी गरमी में फेयरनेस क्रीमों का मार्केट जोरों पर है और हकले शाहरुख के फूल जिसमें कूल रहते हों वो वाला पाउडर भी खूब बिक रहा है।

बिजली अब भी नहीं आई है। शरीर में पानी की कमी हो रही है....इट्स टू हॉट ना!

Friday, June 1, 2012

सुनो! मृगांकाः तुम बिन जीवन कैसा जीवन

भिजीत आगे बढ़ता रहा। यह सब कुछ कितने दिनों के बाद आया है इस इलाके में। अपने देश की माटी। एक सपना-सा लग रहा है उसे।

सपना तो उसे मृगांका भी लगी थी। उसके जीवन में कोई भी ऐसा क्षण नहीं आया था जब उसे मृगांका बेहद खूबसूरत न लगी हो। अभि को हमेशा उसका सौन्दर्य सांस रोक देने वाला लगा था। यह करीब-करीब तिलस्मी सौंदर्य लगता था उसे। अपनी जिंदगी में प्यार के लिए जितने भी रंग सोच रखे थे, मृगांका में सब मौजूद थे।

वह एक सपना थी। बल्कि सपने से भी बेहतर। कोई इतना निर्दोष और संपूर्ण सपना भी नहीं देख सकता था। कुछ भी हो जाए, लेकिन प्लास्टिक सर्जन ईश्वर का मुकाबला नहीं कर सकते। ईश्वर नाम लेते ही अभिजीत को ठेस सी लगी। सड़क पर कोई ईँट सीधी खड़ी थी।

वो झील सी साफ़-शफ़्फ़ाफ़ आंखे, जो दूसरों को पता नहीं कितनी खूबसूरत लगती थीं, लेकिन अभिजीत का मन होता था कि वह बस इन्हें देखता ही रहे। उसका होंठों को दांतो दले दबाकर मुस्कुराना...अभिजीत को उसकी यह अदा एकदम  से भा गई।

सकी आंखे, एक महीने के बच्चे जैसी थी। साफ और अपनी ओर खींचने वाली। एकदम तीखी सुतवां नाक। बेदाग गुलाबी चमकीले गुलाबी होठ। एकदम गोरी-चिट्टी, इतनी गोरी कि फोटोशॉप सॉफ्टवेयर भी शर्मा जाए।

अभिजीत ने पहली बार उसके सौंदर्य पर गौर किया,तो उसे लगा कि इतनी खूबसूरत लड़की, उफ़् ये मुझसे तो बात भी नहीं करेगी। इसेस पहले उसने कभी उसकी सुंदरता पर गौर नहीं किया था।

लेकिन मृगांका क सुंदरता की तारीफ करना उसे हमेशा रोकता रहा। लगा कि सुंदरता की तारीफ की जाए तो यह महज उसके बाहरी व्यक्तित्व की तारीफ होगी। आत्मा...प्रेम तो आत्मा से होता है। अभिजीत उस आत्मा की ओर खिंचता जा रहा था।

अभिजीत सड़क पर चलता जा रहा था। शायद बस स्टॉप की तरफ़। अतीत फ्लैश बैक में और कभी-कभार डिजॉल्व के रूप में दिमाग में चलता जा रहा था। उसकी नजर सामने रेहड़ियों और जमीन पर बोरे बिछाकर बनाई गई दुकानों पर गई।

लोहे की जाली...या फिर कोयले के चूल्हे पर लिट्टी बनाए जा रहे हैं। लिट्टी पकाने वाली लड़की लगातार उस अंगीठी में हवा किए जा रही है। सोंधी-सी खुशबू हवा में तिर रही है। सड़क पर टुनटुनाती घंटियो वाले रिक्शों की आवाजाही बदस्तूर जारी है। झालरों से सजे रिक्शे..ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर पहिए ईंटों के टुकड़ों पर फिसलते हैं तो रिक्शों की छतरी की जगह लगाई गई बांस की फट्टियों के आपस में टकराने से एक खास किस्म की आवाज़ होती है।

..खट्ट..खट्ट..खटाक्..

फट्ट..फट्ट..फटाक..अंगीठी पर ऱखे कच्चे कोयले में से कोई कोयला फूट रहा है।

पोखरे में डूबते हुए सूरज की रौशनी पड़ रही है। अभिजीत ने साफ देखा सूरज ने पश्चिम के पानी में डूब कर आत्महत्या कर ली, पर खून से पानी पहले ललछौंह हो गया और फिर वो पीलेपन में बदल रहा है।

पान की दुकानों में लाउडस्पीकर से बेहद लाउड बज रहे कबीर के पदों और मुकेश की आवाज़ में रिकॉर्ड हनुमान चालीसा की जगह चुपके से मनोज तिवारी के भोजपुरिया गीतों ने ले ली। पास ही कहीं गुड्डू रंगीला भी पूरी शिद्दत से अश्लीलता के रंग बिखेर रहे हैं। ..कछु चाहीं नाहि हमारा और.. हमरा हऊ चाही...पान दुकानों में ट्यूब लाईटों की रौशनी जगमग हो उठी। पास ही कहीं इन रौशनी के इंतजाम में व्यस्त जनरेटर गड़गड़ा रहा था।


...जारी

Wednesday, May 30, 2012

लहू का लहू, पानी का पानी

आज गुस्ताख अज्ञानी बन गया, उसने फेसबुक पर पूछ डाला कि क्या डीएनए जांच के लिए खून का नमूना लेना ही जरूरी है। जिस खून लेने पर तिवारी बबा अड़े हुए हैं कि नहीं देगें, और अदालत कहती है कि लेवे करेंगे...उसी पर कई बौद्धिकों की बड़ी खुलकर बातचीत हुई है।

सवाल नैतिकता का नहीं है, सवाल थोड़ा सामाजिक भी है और राजनीतिक भी। बाल की खाल उतारी गई है, धैर्य से पढ़ें। और फेसबुक पर अलक्षित सवालों के बीच मीडिया की निगाहों से बच गए इस सवाल पर गौर फरमाएं- गुस्ताख।

अज्ञानी का यक्ष प्रश्नः क्या डीएनए जांच के लिए ब्लड सैंपल ही जरूरी है?


Arbind Jha iseke liye kisi doctor se rai lena padega ho

Sushant Jha i dont think so...perhaps DNA is present in every cell...be its skin or sperm...!

Manjit Thakur Arbind Jha: सुना है डीएनए तो हर कोशिका में होता है तो बालों में भी होता होगा। उसके तो समूचे नस में रक्त की जगह वी* ही भरा है। रक्त कहां से मिलेगा

Manjit Thakur Sushant Jha: तुम सत्य उचार रहे हो

Sushant Jha +2 तक अपन ने भी डॉक्टर बनने के चक्कर में विज्ञान की पढ़ाई की थी...धुंधला सा याद है...।

Arbind Jha ee ekdam thik bole, budhaw ke pass ab khoon kaha


Manjit Thakur तो अदालते में काहे नहीं बाल नोंच लिए झपट्टा मार के...एक मुट्ठी धवल उज्जवल केश तो आ ही जाते


Praveen Kumar Jha नहीं भाई साहब ! अंतरात्मा की आवाज से भी पता कर सकते है

Arbind Jha Praveen bhaiya antraaatma bacha kaha hai budhe ke pass

Deepika Lal bacche ki pahchan ke DNA blood se hi pata chal sakta hai.... actually Blood me hi mata pita dono ke dna hote hai.... sharir ke kisi hisse me DNA mata pita dono ka ek sath nahi milta....... i think

Manjit Thakur Praveen Kumar Jha: अंतरात्मा...आपके पास होगी। तिवरिया के पास तो कत्तई नहीं होगी। नहीं तो अब तक मान चुका होता। आंध्र के राज्यपाल थे, तब कुछ सीडी जारी हुआ था...उऩकी अंतरात्मा वहीं बर्न हो गई होगी, सीडी के साथ ही

Arbind Jha hahahhahaaaaaaaa

Sushant Jha वैसे तिवारी बाबा डीएनए टेस्ट को बाबरी मस्जिद बनाना चाहते थे...। वैसे मामले का अगला चरण तब मजेदार होगा जब बाबा को अपनी कोठी, मर्सीडिज और स्विस बैंक अकांउट बेटे से शेयर करना होगा...। वैसे रोहित शेखर को प्राथमिक जीत मिल चुकी है। हिंदुस्तान की जनता उसे तिवारी का बेटा मान चुकी है।

Manjit Thakur Deepika Lal: देख छोटी, मामले के तकनीकी पहलू समझ। तिवरिया के खून में जो डीएनए होगा उसमें रोहित शेखर की मां का डीएनए कहां से आएगा। यह तो रोहित शेखर के खून में होना चाहिए। दोयम, तिवारी का डीएऩए का ढांचा खून में भी वही होगा, जो उसके बाल में होगा। हर इंसान के साथ ऐसा ही होता है। तीसरे, रोहित शेखर के जिस्म का हर डीएनए स्ट्रैंड उसके मां और जैविक पिता दोनों के न्यूक्लिक एसिड से बना होगा। मेरा खयाल है कि इस तकनीकी पेचो-खम में कोई जानकार आदमी ही प्रकाश डाल सकता है। शायद कोई डॉक्टर...

Deepika Lal bilkul sahi kaha apne......doctor ko dundhe.....

Arbind Jha Nikesh bhaiya ise pr aap roshni daaliye ho

Arbind Jha Manjit bhaiya nikesh bhaiya ko tag kar chuke hai

Samar Anarya दुनिया इतनी आगे निकल गयी है और आप अब भी डाक्टर ही खोज रहे हैं! कमाल है ठाकुर साहब.. अरे गूगल चाची से पूछ लेते वही बता देतीं.. आपो न...

Arbind Jha samar ji kuch to aap bhi kijiye n ho

Praveen Kumar Jha Manjit aap kahe to Recovery software use karke sab wapas la du

Arbind Jha praveen bhaiya phir to corrupt he batayega data base

Sushant Jha वैसे तिवारी को मान गए...पट्ठे ने बुढ़ौती में भी खूब तिकड़म लगाई। जवान रहता तो पक्का रोहित शेखर को आतंकी करार करवा चुका होता।

Arbind Jha ab tak bhi to sala kitna aatank machaya hai

Manjit Thakur डॉक्साब, Anurag Arya इस मसले पर रौशनी डालिए

Deepika Lal par yaha ab bhi sawaal barkrar hai.......

Samar Anarya ये लीजिए मिल न गया! मार फेसबुक को हलकान किये पड़े थे...

Samar Anarya Comparing the DNA sequence of an individual to that of another individual can show whether one of them was derived from the other. Specific sequences are usually looked at to see whether they were copied verbatim from one of the individual's genome to the other. If that was the case, then the genetic material of one individual could have been derived from that of the other (i.e., one is the parent of the other). Besides the nuclear DNA in the nucleus, the mitochondria in the cells also have their own genetic material termed the mitochondrial genome. Mitochondrial DNA comes only from the mother, without any shuffling.

Arbind Jha Tiwariya ke naam ke saath roshni ka bhi naam

Sushant Jha अनार्या जी को साधुवाद।

Pingal Court आप तो ऐसे परेशान हैं जैसे आपसे भी सैंपल माँगा गया हो....???

Deepika Lal aap sabhi ek sadharan sa uttar de... kripya google se copy karke yaha paste na kare.... science language aam insaan nahi samajh sakta

Arbind Jha Jajmaan aap bhi line mae hai kya?

Sushant Jha पिंगल- मंजीत का सैंपल सीएम बनने के बाद....!

Anurag Arya Manjit Thakur...,बाल या शरीर के किसी सिक्रिशन से भी आप पता लगा सकते है .

Deepika Lal are neta ji ka blood sample manga gaya hai...... neta desh ke liye khoon dete hai na ki blood sample ke liye.. mamla gambhir hai

Manjit Thakur Samar Anarya: आपका जितना धन्यवाद किया जाए उतना थोड़ा है पंडिज्जी। वैसे अब यह बात साबित हो गई कि तिवारी के बालों से भी पता चल सकता है तो खून की जरूरत क्या है

Deepika Lal wahi to.... dr sahab tiwari ke khoon ki kya jarurat?????

Sushant Jha यह सवाल मीडिया को उठाना चाहिए था। चूक गया। भारी चूक। चौरसिया कहां हैं..?

Samar Anarya और ई न देखिये.. कि अगर मेल चाइल्ड है, जो को रोहित शेखर हैं, तो Y क्रोमोजोम का तुलना कर लीजिए हो गया. अगर कापी हो गया.. माने एकदम्मे मैच कर गया टो दोनों में से एक बाप है एक बेटा.. अब रोहित शेखर तिवारी जी के बाप तो हो नहीं न सकते हैं, तो अगर इस केस में सैम्पल मैच किया तो तिवारी जी शेखर साहब के बाप हुए.. बस इति सिद्धम...

Manjit Thakur Pingal Court: बाबू सुशांत के मुंह में घी शक्कर। पीएम बनने की जिस उम्मीद पर जी रहे हैं, उसमें तिवारी जी ने एक तजुर्बा तो दे ही दिया। कुछ ऐसा करो ताकि आगे डीएनए सैंपल न मांगा जा सके। इतना तो एड आता है टीवी पर

Manjit Thakur पंडिज्जी- तिवारी को कम न समझिए ऊ कहेगा कि रोहितवे उसका बाप है।

Dunia Live Extracting DNA from blood is very easy in a laboratory nowadays. The sample of blood is treated with detergants to break open the cell membrane spilling the contents. Enzymes are now used to break down all the protein, RNA, sugars and fats in the solution. Ethanol (alcohol) is often used in the final stages of DNA extraction as under the right conditions as DNA will dissolve into it but other componants of the cell will not allowing the separation of DNA to be used for analysis.

The only DNA in blood would be the DNA contained in white blood cells as red blood cells have no nucleus and therefore no DNA.

Samar Anarya @दीपिका लाल जी.. खून की जरूरत इसलिए कि उसकी जांच भी कॉफी आसान है, भंडारण भी और उसे प्रिजर्व करके रखना भी. पर इन सबसे कहीं आगे, यह सबसे कम आपत्ति और अपमान जाना है. जैसे सोचिये कि खून तो आदमी डायबिटीज की जांच के लिए भी दता है मगर अगर बाल मांगना होता तो? डीएम् साहब क्या कैंची से तिवारी जी का बल काटते हुए कैसे लगते? और कोई सिक्रीशन तो. अरे छोडिय न.. इ सब बस तिवरिया के बस का बात है...

Manjit Thakur और जो कहीं नसों में से खून न निकला तो...कुछ और ही निकल आया तो? तिवारी पर तो शक है कि उसकी नसों में भी खून की जगह सपर्म ही न हो

Deepika Lal are ee t uhe gup ho gaya n..... hum to khana muh se khane ko kah rahe hai lekin ee naseri pipe se khane ko utaru hai....

Sushant Jha अनार्याजी....तिवारी जैसे आर्यपुत्र को आपने अंडरस्टीमेट किया है। मै आपत्ति दर्ज करता हूं...!

Manjit Thakur Sushant Jha: मेरी आपत्ति अनार्य की तुम्हारी हिज्जे को लेकर है। तुम अंग्रेजों की तरह अनार्या क्यों लिखते हो

Deepika Lal सवाल यथावत..... जब बाल से काम चल सकता है तो खून क्यों.........

Manjit Thakur तिवारी का बस चलता तो देश की 122 करोड़ में से 100 करोड़ आर्यपुत्र उसी के होते

Samar Anarya क्या अंडरएस्टीमेट किया है Sushant भाई?

Sushant Jha मंजीत- सोहबत का सवाल है। अनार्या सुनने में ग्लैमरस लगता है...जैसे मिश्र नहीं मिश्रा..।

Manjit Thakur अनार्य जी ने इसका बहुत सही उत्तर दिया है दीपिका शायद अपमान कम होता है। खून निकालने में। इसे प्रतीक के तौर पर लो..नेता लोग भले ही जनता का खून पी जाएं...लेकिन वक्त आता है तो उन्हें भी अपना खून देना पड़ता है भले ही सीरिंज से देना पड़े।

Deepika Lal तो फिर इतना दफा ब्लड सेंपल नहीं देते भाई..... एके बार में त बाप बाप करत बा.....

Sushant Jha अरे समर भाई-आपकी पिछली टिप्पणी की आखिरी पंक्ति तिवारी की अजस्र क्षमता पर सवाल उठाती है। उसी संदर्भ में कहा था...!

Deepika Lal 100 करोड़ में तो तिवारी की नैया डूबी......

Manjit Thakur मजे की बात, मेरे एक बड़े शानदार मित्र हैं डॉक्टर अनुराग आर्य, और एक बौद्धिक मित्र हैं समर अनार्य। सुशांत बाबू क्या मैं सेकुलर हूं...गुंजाइश बन रही हैं?P

Deepika Lal ई आप लोगन प्रतीकवा में ही मत मटियाइए.........

Sushant Jha हां..तुम कांग्रेसी टाईप के सेक्यूलर होते जा रहे हो...जहां मेरी भी निगाहें हैं।

Manjit Thakur ये समस्त मैथिलों को सेकुलर होने का चस्का लग गया है। उधर संदीप झा ने अपनी एक फोटो चस्पां की है,जिसमें वो एक दाढ़ी वाले सज्जन के साथ हैं

Manjit Thakur अपने अनार्य जी भी भारी सेकुलर हैं। प्रचंड बोद्धिक..मैं उनसे बहुत प्रभावित हूं। उनकी बात अंदर तक असर करती है

Samar Anarya @दीपिका लाल- जवाब भी यथावत है भाई. खून लेना देना सहज है. समाज में स्वीकार्य है. जरा सोचिये कि बाल लेना होता तो कैसे लेते? और समाज में बाल उखाड लेने से संदर्भित तमाम श्लील/अश्लील मुहावरों का क्या होता? और अगर बाल लेना ही होता तो वह लिया कैसे जाता? बाल नोचकर य काटकर? काटकर लिया जाता (क्योंकि नोच्वाना तो जरा मुशकि ठहरा वह भी तब जब मामला कोर्ट कचहरी का है) तो काटता कौन डाक्टर या डीएम या कोर्ट का रजिस्ट्रार? (हेयर ड्रेसर संभव नहीं हैं क्योंकि तब मामले में जाति का एक और एंगल भी जुड़ जाता, वैसे भारतीय कोर्ट और डीएम दोनों के भारी जातिवादी होने पर मुझे तो कोई शक नहीं है, फिर भी). अब बाल में इतनी दिक्कत है तो और कोई सिक्रीशन लेना तो और भी मुश्किल ठहरा.. इसीलिये...

Sushant Jha हम राजा जनक के टाईम से सेक्यूलर है...!

Deepika Lal दाड़ी वाले सिद्ध पुरष होते है भाई.... ऐसा मत कहिए.......

Sushant Jha अनार्य की बात तार्किक है।

Manjit Thakur वो दाढ़ी वाले सिद्ध पुरुषों की बिरादरी के नहीं थे। वैसे भी हमारे संदीप झा भी सुसिद्ध हैं।

Deepika Lal ये बाल तो नाक के समान हो गई........ कट गई तो जान गई.....

Manjit Thakur वैसे बाल में मिलावट का खतरा भी है। मुझे एक घटना याद आ रही है।

Sushant Jha बाल ने भारतीय राजनीति में कई बार भूचाल लाया है....

Manjit Thakur पता चला तिवारी जी ने अपने बालों में डीएम साहब का ही बाल नोंचकर मिला दिया...बस। -)

Deepika Lal अनार्य जी.... बाल नाक तो नहीं है.........

Manjit Thakur नेहरु जी सब भूचाल शांत कर देते थे

Sushant Jha उस समय कश्मीर के सीएम बख्शी गुलाम मोहम्मद थे...कहते हैं नेहरु ने फोन किया तो उसने तुरंत बाल बरामद कर दिए। विपक्षियों का कहना था कि ये किसी और के और कहीं और के बाल हैं। तो सीएम सबको बाल से खेलना आता ही है। वैसे भी तिवारी तो बड़ा सीएम रह चुका है।

Manjit Thakur इतना खोलकर नहीं लिखो। वैसे तिवारी की खासियत कि वो दो राज्यों का सीएम बन चुका है। उसकी महिमा अपरंपार है

Deepika Lal बहुत बढ़िया रही सुशांत जी बाल की कहानी......... प्रश्न यथावत...... बाल की बजाए ब्लड सेंपल क्यों......

Manjit Thakur अदालत ही इस बात का बढ़िया जवाब दे सकती है

Sushant Jha मुझको लगता है कि तिवारी फिर से घपला न कर दे...सिर्फ दिल्ली के रजिस्टार और रोहित को छोड़कर देहरादून में सब के सब तिवारी के मोहरे हैं। खेल न हो जाएं कहीं............

Manjit Thakur कांग्रेस ये नहीं चाहेगी कि तिवारी की भद (जो कि पहले ही पिट चुकी है) और ज्यादा पिटे....कांग्रेस बचा लेगी बुढऊ को

Deepika Lal अदालत बनेगी फिर डाक्टर.......

Sushant Jha वैसे मान लो वह रोहित को बेटा मान ही लेता तो क्या हो जाता...? अरे यहीं न संपत्ति देनी होती और दस लोगों में उठबैठ नहीं पाता।(वैसे भी कौन बैठ पाता है) इसके जवाब में एक पंडिज्जी ने कहा कि ऐसे कैसे मान ले...सवाल एक ही रोहित का थोड़े ही है...!

अमोल सरोज बीरन वाले ab is umar me sperm test jara mushkil hota

Siddhartha Srivastava नौछमी नरैना ------, वैसे मेरी जानकारी के अनुसार ब्लड से डीएनए की रिकवरी अच्छी होती है।

Manjit Thakur मेरी जानकारी कहती है कि नाखून तक से डीएनए रिकवरी हो सकती है

Siddhartha Srivastava रिकवरी तो किसी भी सेल से ह सकती है लेकिन मात्रात्मक रूप से रक्त से ज्यादा डीएनए (किसी अन्य सैंपल की तुलना मे) आसानी से मिल जाता है।


Manish Kumar Neurosurgeon any way to get a single viable cell - urine/ skin scrap/ a hair plugged from the root will do!

Manjit Thakur लेकिन सिद्धार्थ भाई, आरबीसी में तो न्यूक्लियस होता ही नहीं। तो डीएऩए कहां से मिलेगा। माइटोकॉन्ड्रिया का न्यूक्लिय तो मदर सेल से आता है। यानी मां का डीएऩए मिलेगा उसमें

Siddhartha Srivastava डबल्यू बी सी मे न्यूक्लियस होता है मंजीत जी।


Abhinav Garg Actually the mere fact that Tiwariji refused to undergo DNA test should have led the Delhi High Court and later the Supreme Court to draw an adverse inference and rule in favour of Rohit's paternity suit.

Vartika Tomer nahi

Tuesday, May 29, 2012

सुनो मृगांकाः माटी मेरे देश की

कांच का तकरीबन वैसा ही ग्लास लिए अभिजीत लकड़ी के एक मोढा-कम-बेंच पर टिका था। कत्थई चाय उसके होठों का इंतजार कर रही थीं। शाम उतरने के साथ ही जो हल्की-हल्की ठंडी हवा लजाई दुलहन की तरह पहले बाहर दरवाजे की ओट में खड़ी थी, अब झुटपुटा होते ही सीधे सामने आ गई थी।

अभिजीत अप्रैल में ऐसे गर्म मौसम में इस सुकूनबख्श हवा से तरोताजा होने लगा। पूरी भीड़ में वही एक था, जिनके पास शहरी कहने लायक कपड़े थे। ऐसा नहीं था कि बाकी लोगों के कपड़े कुछ बेहद देहाती किस्म के रहे हों, लेकिन अभिजीत के कपड़ो में एक सलीका था, जो उसे भीड़ से अलग कर रहा था।

भीड़ से अलग कर देने वाले इन कपड़ों से उसे कुछ याद आया।

पता नहीं क्यों उसे हर बात में मृगांका की याद क्यों हो आती है। मृगांका की एक सहेली थी। दफ्तर में जॉइन करते ही सहेली बनना भी लाजिमी ही थी। उस सहेली से नजर बचाकर कभी-कभी अभिजीत उसकी आंखों में झांकने की कोशिश कर लेता था।

अभिजीत के दिमाग़ में एक्सट्रीम क्लोज-अप में सिर्फ मृगांका थी। जो मुस्कुराती थी तो लगने लगता कि मोतियों की बारिश होनी शुरु हो गई है। जो उसे कभी अमलतास तो कभी कचनार जैसी लगती थी।

अभिजीत को वह दिन कभी नहीं भूलेगा जब मृगांका से उसकी बातचीत शुरु हुई थी। बातें न जाने कहां से शुरु हुई थीं, जो किताबों, मौसम, खबरों, ए राजा, सेंसेक्स से होती हुई कविताओं वगैरह पर खत्म हुई। अभिजीत बहुत खुश था। उसके खुश होने की कुछ खास वजहें हुआ करती थीं। आज तो उन सब वजहों के ऊपर एक नई वडह पैदा हुई थी...मृगांका।

अकेले में वह इस नाम को बार-बार दुहराता रहता। हमेशा बढ़ी हुई शेव में रहने वाले, तीन दिन तक एक ही शर्ट में दफ्तर में आने वाले अभिजीत को कुछ सतर्कता बरतनी पड़ी। दरअसल, उसका शेव किया जाना भी, उसके बाकी के सहयोगियों के लिए बड़ी खबर की तरह थी।

शेव बनाकर आए अभिजीत को देखकर पता नहीं क्यों, लेकिन मृगांका मुस्कुराई थी। ऐसी मुस्कुराहटों के कई अर्थ निकाले जाते हैं। अभिजीत ने अपने मतलब का अर्थ निकाल लिया था। वैसे पता तो आजतक नहीं चला है कि शेव बनाने की उसकी दुर्लभ आयोजन के बारे में मृगांका को किसीने पहले ही बताया था या नहीं।

पास के वेटिंग रुम से खास किस्म की स्टेशनी गंध आ रही थी। शायद कल इधर भी बारिश हुई थी।

वेटिंग रुम में यहां-वहां पोटलियां पसरी थीं। मक्खियां भिनभिना रही थीं। औरतें आदतन गुलगपाडा मचा रही थीँ। कोई बूढा़ अपने फेफड़ों में जमा तकरीबन सारे बलगम को खांस-खांसकर वहीं सादर समर्पित किए दे रहा था। एक औरत अपने बच्चे को दुकान के आगे मचलते देखकर उसे थपड़ाने पर उतारू थी और गालियों से उसके खानदान का उद्धार किए दे रही थी।

मिथिला का वह गंवई समाज अपने ठेठ अंदाज में उस मुसाफिरखाने में मौजूद था। कोई परिवार शाम की चाय के साथ ठेकुआ या खुबौनी जैसे होममेड पकवान उड़ाने में व्यस्त था, तो कहीं सास अपनी पोतहू के सात पुश्तों की कुंडली बांच रही थी।  अभिजीत इऩ सारी बातों से असंपृक्त, असंबद्ध सा लग रहा था।

पता नहीं क्या सोचते हुए वह दरभंगा स्टेशन की गंदी जगह से बाहर निकल गया। यहां एक शिलालेख होना चाहिए.. अगर कहीं नरक है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है। उसने सोचा। अपनी हथेलियां रगड़ते हुए उसने सिगरेट सुलगा ली।
स्टेशन के अहाते से बाहर निकलते ही सामने था सवारी के लिए आवाज़ लगाते मिनी बस वाले, जो राहगीरों को तकरीबन बांह पकड़कर खींच लेने की जुगत में थे। शाम होते हुए भी भीड़ कम नहीं हुई थी और सब जल्द-से-जल्द अपने ठौर-ठिकानों को भाग लेने की फिराक में थे।

बसें, मुसाफिरों को भरकर दनादन निकल रही थीं। यहां दनादन शब्द का इस्तेमाल महज साहित्यिक संदर्भ में किया गया है। उम्मीद है कि पाठक इसका कत्तई बुरा न मानते हुए मुआफ़ करेंगे, क्योंकि इस सड़क की दशा महज प्राचीन काल में ऐसी रही होगी, जब उसपर गाडियां दनादन दौड़ सकती होंगी। वरना अभी तो सड़क कहीं बिला गई है और ऊबड़-खाबड़ ईंटों के ढेर पर बसें फुदकती-कुदकती चलती हैं। बहरहाल, उसी चिल्लपों और गुलगपाड़े से निकलता हुआ अभिजीत बस अड्डे को जाने के लिए तैयार हुआ।

अहाते के बाहर सड़की की दूसरी तरफ, कई होटलों (पढिए-ढाबों) के साईन बोर्ड, चाणक्य होटल, मिथिला होटल.. ऐसे ही नाम। कोई शुद्ध मांसाहार, कोई मिथिला का ठेठ माछ-भात खिलाने का दावा करता हुआ दिख रहा था तो किसी के इश्तिहार में शुद्ध बैष्णव ढाबा लिखा था। साईन बोर्ड पढ़ता वह सड़क पर आ गया।

इन्ही ढाबों के बगल में समोसे-जलेबियां खिलाने वाले नाश्ते की दुकानें हैं, जिनमें चाय भी मिलती है। फूस की दुकानें। बैठने के लिए बांस के फट्टों की तथाकथित बेंचें, जो आपके पैंट पर शायद ही रहम करें। इन्हीं दुकानों की पृष्ठभूमि में दिखता है एक पोखर। बडा-सा पोखर। फिर दुकानों की कतारों की बगल में दो-एक ट्रक खड़े थे। वह आगे बढ़ा।

दुकानों की गिनती अभी भी कम नहीं हुई थी और इसबार की दुकाने जूट और सीमेंट की बोरियों की थीं। जमीन पर बिछी बोरियां, जिनपर रखकर सामान बेचने की कोशिश की जा रही थी। कोई खिलौने बेच रहा था, कोई मकई के दाने भून रहा है। अभिजीत के दोस्त दिल्ली में इन्हें पॉपकॉर्न कहा करते, किसी मल्टीप्लेक्स में जाते तो कॉम्बो ऑफर में इन गंवई भुट्टों के भूंजे को कोक के साथ खाते।

 ...जारी

Friday, May 25, 2012

सुनो! मृगांकाः ज़िंदगी तन्हा सफ़र की रात है...

जिंदगी में जो होता है, कई बार किताबों में नहीं होता।

'डेस्टिनी! बाबू मोशाय डेस्टिनी!'

***

बाहर बरसात फिर से होने लगी थी। लेकिन इस बार बारिश में वो बात नहीं थी। अंधेरा घिरने ही वाला था। यह वक़्त अभिजीत को बहुत अजीब लगता है। तब तक डोर बेल बजी। कौन होगा, सोचता हुआ अभिजीत आगे बढ़ा और दरवाजा खोल दिया।

सामने प्रशांत खड़ा था।

'हट बे, दरवाजे से हट। ऐसे क्या देख रहा है, क्या मैं हमेशा के लिए दफ्तर चला गया था?'

'नहीं ऐसी बात नहीं...अकेलापन फील कर रहा था।'

'अच्छा, तो अब अकेलापन फील भी होने लगा।'--प्रशांत ने मोजे उतारते हुए कहा। उसके कहते न कहते कामवाली आ गई। इन दोनों के लिए पहले चाय और फिर सलाद काट कर रख दिया।

प्रशांत ने अपने लिए एक पूजा का छोटा-स मंदिर बना रखा था। प्रशांत ने ब्लेंडर्स प्राइड की बोतल पूजा वाले टेबल के ऐन सामने रख दी। धीरे से पैग सिप करते हुए अभिजीत मुस्कुराने लगा। बहुत पहले...कम से कम लगता तो ऐसा ही है कि बहुत पहले घटी हो ये बात...मृगांका ने टोका था, 'अभिजीत को, अरे ये क्या कर रहे हो, भगवान जी देख रहे होंगे। उनके सामने शराब...छीः छीः'

अभिजीत के मुंह से यह सुनकर प्रशांत भी मुस्कुरा उठा। अगर ईश्वर ने पूरी सृष्टि बनाई तो शराब बनाने का जिम्मा भी उनके ही सर। दोनों बहुत देर तक ईश्वर की इस गलती पर हो हो करते हंसते रहे।

पांचवे पैग तक दोनों कुछ नहीं बोले। आखिरकार, प्रशांत ने कहा, 'क्या बाबा आज मौनव्रत में हैं क्या?'
'नहीं यार कुछ सोच रहा हूं'
'वैसे ये काम कब से शुरु कर दिया'
'कौन सा काम'
'सोचने का'
'आज ही से, अभी से'
'क्या सोचा'

'देखो प्रशांत, मुझे लग रहा है मुझे आराम की जरुरत है।'
'वो तो मैं कब से कह रहा हूं। खाओपियो आराम करो।' प्रशांत ने जोड़ा।

स शाम को ब्लेंडर्स प्राइड की पांच पैग हलक में उड़ेल लेने के बाद अभिजीत ने घोषणा की कि अब वो दिल्ली में नहीं रहेगा और अपने गांव जाएगा, जहां आराम करता हुआ वह असल में देशसेवा करेगा, कि जहां के लोग अब भी जाहिल हैं और उन लोगों को अभिजीत जैसे पढ़े-लिखे लोगों की बहुत जरुरत है। पांच पैग के बाद अभिजीत आमतौर पर शाहरुख की फिल्म स्वदेश का मोहन भार्गव हो जाता था, या वैसा ही बिहेव करने लग जाता था।

प्रशांत उसको गौर से देखने लग गया। 'क्या हुआ बाबू, इस बार मैं सीरियस हूं'--अभिजीत ने टोका
'हां, लग रहा है'
'तो सोच क्या रहे हो'
'सोच रहा हूं--रुख़सत करो किसी को तो जीभर के देख लो, शायद हो उसकी तुमसे मुलाकात आखिरी

हां'  ये तो सच है। जब तक जियूंगा यह अफसोस रहेगा...जाते वक्त उसका चेहरा तक न देख पाया।'

'कब निकल रहे हो'
'कल ही...'

***

रभंगा स्टेशन। चार बजकर दस मिनट पर जयनगर के लिए चलने वाली ट्रेन छूट चुकी है। स्टेशन पर भीड़ होने के बावजूद एक शांति कायम है। अगले दो -ढाई घंटे तक न तो कोई गाड़ी यहां आने वाली है और न छूटने वाली। जाना ज़रूरी है। शाम गहराती जाएगी और मधुबनी की तरफ जानेवाली बसों और परिवहन के दूसरे साधनों की गिनती कम से कमतर होती जाएगी। वह लपककर बाहर की ओर निकला। इस जगह से उसे जानी-पहचानी गंध मिल रही है। प्लेटफॉर्म नंबर एक से बाहर निकलते हुए उसने देखा, लोगबाग ज़मीन पर ही बैठे हैँ।

सामाजिक न्याय की धारा प्रचंड वेग से बहने के बावजूद सामाजिक स्थिति में बहुत सुधार नहीं आ पाया है। हालांकि जातीय समीकरणो और जातिगत स्थिति में एक बदलाव आया है कि ज़मीन पर सब बैठे हैं, सभी जाति के लोग। अगल-बगल।

हिंदू हों या मुसलमान, एक ही भाषा बोल रहे थे- मैथिली। मान्यता है कि मैथिली मिठासभरी भाषा है। इतनी मीठी कि बोलने वाले और मुमकिन है कि सुनने वाले को भी मधुमेह यानी डायबिटीज हो जाए। इस मिठास की भी एक वजह है। यहां के लोग खाने में मीठे पर ज्यादा जोर देते हैं।

हर बार खाने में मीठेपन-गुड़ या चीनी ही क्यों न हो-का होना एक अपरिहार्य बात है। चूड़ा-दही-चीनी और गरमियों में उसके साथ आम जैसा फल भी यहां की फूड हैबिट है।

वह टहलता हुआ बाहर निकल आया। पान की दुकान तक। बेहद अस्त-व्यस्त सड़क। सड़क पर तरह-तरह की गाड़ियां। नहीं , महानगरों की तरह की किसिम-किसिम की कारें नहीं, बल्कि रिक्शे से लेकर साइकिलों तक, ठेलेगाड़ियों से लेकर मिनी बसें, बैलगाडि़यां, तांगे... ऐसी ही अर्ध-क़स्बाई और गंवई गाडि़यां। चिल्ल-पों। सबको जाने की जल्दी।

वह एक चाय की दुकान पर ठिठक गया। उसने पहले तो चाय और सिरगेट की डिब्बी मांगी। गोल्ड फ्लेक। चाय आई .. खूब उबली हुई महुआ दूध की।

...जारी

Thursday, May 24, 2012

इशक़ज़ादेः इश्क़ कम, कमअक़्ली ज़्यादा, और बेड़ा गर्क़

क शेर याद आ रहा है, बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का...सच साबित हो गया। इशकजादे ने अर्जुन कपूर, हबीब फैज़ल और खुद इस फिल्म को लेकर बहुत उम्मीदें पैदा कर दी थीं। प्रोमो ने फिल्म देखने पर मजबूर कर दिया। कई कन्याओं ने अर्जुन कपूर को लेकर आहें भरनी भी शुरु कर दी थीं...कई लड़कों ने परिणीति चोपड़ा को लेकर। हम फिल्म देखर दर्द भरी आह भरने पर मजबूर हुए।
बंदूक तो है प्यार नदारद

फिल्म में इशकजादे तो हैं लेकिन इश्क गायब है। यह फिल्म हमारे समाज की कड़वाहट हमारे चेहरे पर तेज़ाब की तरह फेंकती है। यह फिल्म उन हजारों इशकजादों की तलाश करती है जो कभी हजारों में हुआ करते थे, लेकिन अब जहानों में नहीं। वो हर साल मरते हैं, कभी खापों के हुक्म से, कभी परिवारों के सम्मान के लिए।

फिर भी, इशकजादे एक कमजोर फिल्म लगी। यह फिल्म समाज तो खैर जाने दीजिए, इश्क को भी कायदे से पहचान नहीं पाती। हां, परिणीती चोपड़ा ने अपनी अदाकारी से फिल्म ढोने की कोशिश जरूर की है, लेकिन एक हद तक ही। बाद को फिल्म मुंह के बल गिर जाती है।
उफ़्...जैसा पोस्टर में है वैसा फिल्म में भी होता
फिल्म की विचारधारा से मुझे सख्त शिकायत है, जहां लड़की शिकार की शौकीन है, जो बंदूक तनी होने पर भी हीरो को सख्ती से कहती है कि सॉरी बोल। लेकिन हमारा खलनायक टाइप हीरो जब उसका शिकार करता है तो तुरंत वह अबला भारतीय नारी बन जाती है।

फिल्म हीरोइन की दशा को लेकर बहुत कन्फ्यूज़ है।

हीरो कई दफा हीरोइन से कहता है कि वह उससे प्यार करता है लेकिन उसकी करतूतों से यह कहीं भी जाहिर नहीं होता। इंटरवल से पहले फिल्म एक उम्मीद की तरह देख सकते हैं, लेकिन धीरे-धीरे फिल्म बोझिल होती चली जाती है। जहां निर्देशक दर्शक को तकरीबन बेवकूफ (और मैं अपनी भाषा में कहूं तो चूतिया) समझता है।

इशकजादे अपने कथानक में भी बेहद कन्फ्यूज़ फिल्म है। इसमें परेश रावल की वो छोकरी और आमिर खान की क़यामत से क़यामत तक का घटिया घालमेल है। गंभीर सिनेमा और प्रकाश झा की फिल्मों की तरह इशकजादे भी एक ही साथ राजनीतिक भी होना चाहती है और ज़मीनी, यथार्थवादी और खुरदरी भी। लेकिन फिल्म यशराज की है तो उसे हल्की-फुल्की होने की जिम्मेदारी भी ओढ़नी है। नतीजाः बेड़ा गर्क।
परिणीति और अर्जुन दोनों ने मेहनत की, काश कोई कहानी भी होती
पूरी फिल्म में दो राजनीतिक परिवार है, शहर है, कॉलेज है, गलियां है। लेकिन समाज नहीं है। गलियां सूनी हैं। कॉलेज में छात्र नहीं है। अपराध है लेकिन कहीं पुलिस नहीं है। कहानी से सारे किरदार एक से हैं, तकरीबन बुद्धिहीन, अपने दिमाग के इस्तेमाल से बचनेवाले।

कई दफ़ा तो मुझे लगा कि इशकज़ादे में निर्देशक ने अपने विवेक की बजाय कमअक्ली का सुबूत दिया है।

गलियों में दौड़-भाग करते समय हमें मकान दिखते हैं, लेकिन कही भी एक आदमी नहीं दिखता। शहर छोटा है लेकिन एक रेहड़ी तक नजर नहीं आती। हद तो तब हो जाती है जब लड़की और लड़के के परिवारों के सैकड़ों गुंडे भूंजे की तरह गोलियां चलाते हैं। उनका जवाब भी हीरो सैकड़ों गोलियां चला कर देता है। हालांकि, मौत एक भी नहीं होती।

जीन्स पहने हुए हीरो के पास अनगिनत गोलिया हैं, जो कभी खत्म नहीं होतीं। आखिरी दृश्य में नायिका अपने पास बची तीन गोलियां नायक को दिखाती है। लेकिन खुदकुशी करने के फ़ैसले के बाद दोनों एक दूसरे को छह-छह गोलियां मारते हैं।

बहरहाल, इशकजादे के हबीब फैसल ने बैंड बाजा बारात और दो दूनी चार से उम्मीद जगाई थी, लेकिन अब लगता है वो भी भेड़चाल का हिस्सा बन गए हैं। अर्जुन कपूर की मुस्कुराहट अभिषेक बच्चन की खिलंदड़ेपन जैसी है। लेकिन उन्हें अगर नकल ही करनी थी तो किसी समर्थ अभिनेता की करते, फिर भी लगा कि वो मेहनती हैं। परिणीती चोपड़ा तो खैर संभावनाशील हैं ही।