Tuesday, June 26, 2012

सुनो मृगांका:15: तन्हाईयां गुफ़्तगू करती हैं अक्सर...

अभिजीत के आंखों के आगे का अंधेरा छंटा, तो दर्द भी थोड़ा काबू में आता लगा। गाड़ी जसीडीह स्टेशन के बाद अजय नदी को भी पार कर चुकी थी। इस रास्ते से न जाने कितनी दफा गुज़रा है अभिजीत। सब कुछ पहचाना-सा, लेकिन फिर भी पराया-पराया।

जब पतरो नदी पार हुई तो गाड़ी अचानक तेज़ मोड़ पर बाईँ ओर मुड़ रही थी। झारखंड का पठारी टांड़...(उच्च भूमि) जिस पर बरसाती दिनों में घास के सिवा कुछ नहीं उगता। अप्रैल के आखिरी दिन वह घास भी जल गई थी।

अभिजीत कुछ सोच रहा था और यह सोच एक दृढ़-निश्चय की तरह उसक आंखों में आ बसा था।

वह घर पहुंचा तो उसके हाथों में मिठाई का एक डब्बे के सिवा और कुछ भी न था। गले में गमछा। लाल रंग का। भाभी ने देखा तो उनकी भाव-भंगिमाओं  से पता लग गया कि पांचेक साल बाद आए देवर के आगमन से उन्हें कोई खास खुशी हुई नही है। उनके शब्द और उनकी भाव-भंगिमाओं में कोई तारतम्य न था।

मां बीच के बड़े कमरे में दीवान पर बैठी पंखा झल रही थी। भाई साब स्कूल में थे। अभिजीत के नहाते-धोते भाभी ने खाना परोस दिया था।

मां ने पूछा था, कैसे आए इधर..काम से छुट्टी कैसे मिल गई। भाभी ने बताया कि अब अखबार में उसका कॉलम नहीं दिखता। अभिजीत ने बताया कि वह लगातार बाहर रहा है और साल भर के लिए बाहर जाने वाला है। विेदश।

मां ने एक बार फिर पूछा, किस देश

अभिजीत पेशोपेश में पड़ गया...जर्मनी।

क्यों..
रेडियो में नौकरी मिली है..जर्मनी का रेडियो है। अखबार छोड़ दिया है।

फिर इसके बाद कोई बात नहीं हुई। खाना खाकर अभिजीत बाहर निकल गया। दोपहर की धूप सीधे सिर पर पड़ रही थी। अब वह घर तभी वापस आने वाला था, जब भाई साहब लौट आएं। पढ़े लिखे आदमी हैं और एक हद तक अभिजीत को जानते भी हैं।

उसके अपने शहर में भले ही दुपहरी थी, लेकिन उसको सब कुछ अनजाना लग रहा था। सब कुछ बदल गया, घर के ठीक सामने का पोखरा पाटकर घर बना दिए गए थे। जब उसने शहर छोड़ा था, उसके दिमाग में वही सब तस्वीरें अब भी चिपकी थीं...हालांकि बीच में कई दफा वो घर आया भी था।

सामने के अहाते में से बांस के झुरमुट गायब हो गए थे, तबरेज़ के घर के पपीते के पेड़ भी खत्म हो गए थे...शंकर की दुकान के पीछे के अहाते में से यूकेलिप्टस का वो पेड़, जिसमें अभिजीत हमेशा कभी अनिल कपूर तो कभी हनुमान जैसी आकृतियां देख लिया करता...वह भी आरे की भेंट चढ़ चुका था।

आसपास के सारे पेड़ जिनसे उसकी दोस्ती थी, वक्त का आरा उनको काट कर गिरा चुका था। अभिजीत ने सोचा, देखे वक्त का आरा उसकी जिंदगी पर कब चलता है शायद....छह महीने...या उससे पहले। वक्त बहुत कम बचा है।

दिल्ली, मृगांका का कमरा, वक्त वहीं है...

वक्त बहुत कम बचा था। मृगांका जल्दी-जल्दी तैयार हो रही थी। उसे कल रात के बम धमाके में घायलों को देखने अस्पताल जाना था। राम मनोहर लोहिया अस्पताल...।

बिस्तर पर उसी की डायरी पड़ी थी। बीच में एक कलम था...वही पेज जिसे वो रात को पढ़ रही थी। उसने फिर से पढ़ना शुरु किया।

" द परपीचुअल पर्वर विदिन मी.....मेरे भीतर की वो शाश्वत व्यग्रता रोज़-ब-रोज़ अपने उतुंग शिखर की ओर बढ़ रही है। मेरे अंदर  तुम्हारा प्यार दिन-ब-दिन मेरी मानस संतान की तरह बढ़ रहा है--अपने अस्तित्व का आभास कराता हुआ, मानो अब वह बाहर ही निकलना चाहता हो। कभी कभी तो यह अहसास अलौकिक हो जाता है, कभी दुश्वार..कभी-कभी अपने आसपास हर चीज़ में तुम्हारे होने का अनुभव होता है , लगता है हर शै में तुम ही हो...तुम ही।

मैं तुम्हारी मौजूदगी को नकारना चाहती हूं, तुम्हारे इस पाश से निकलना चाहती हूं,लेकिन जितना ही मैं तुम्हारे अस्तित्व से इनकार करना चाहती हूं, तुम मेरे ही अंदर मजबूत होते जा रहे हो, जिसे मैं कभी दूर जाने की सोच भी नहीं सकती। मैं चाहती हूं कि तुम्हारे होने का यह अहसास ताजिंदगी मेरे अंदर रहे।

पता नहीं क्यों, तुम मुझे एक दूर के सपने की तरह लग रहे हो, डर लगता है कि शायद यह कभी पूरा नहीं होगा। पता नहीं क्यो... एक ऐसा सपना जिसे में अपनी उंगलियों के बीच फंसा कर हमेशा के लिए अपना बना लेना चाहती हूं...तुम्हे अपनी पलकों के बीच बसा लेना चाहती हूं...ताकि मैं तुम्हें और तुम्हारी याद को अपनी काजल से स्याह हुए आंखो में अगली सुबह को भी पा सकूं....मेरी आंखे...जो दुनिया भर के लिए आग्नेय हो सकती हैं,लेकिन  तुम जो हमेशा गुल-गपाड़ा मचाते हो, तो हल्ला-गुल्ला करते हो उसके सामने यह पता नहीं क्यों निर्निमेष हो जाती हैं...

पता है, मैंने पहले भी कहा है ना, जितना मैं तुम्हे बिसराना चाहती हूं, तुम्हारा अस्तित्व मेरे मन में एक वास्तविकता की तरह मजबूत और व्यापक होता जाता है..कुछ इस तरह जिसे में इनकार करना भी नहीं चाहती।''

(यह मृगांका की डायरी का हिस्सा है जो मूल रूप से अंग्रेजी में था, और जिसका हिंदी तर्जुमा करने की कोशिश लेखक ने की है)
मृगांका के सामने अभिजीत का पूरा अस्तित्व आकर खड़ा हो गया। ओह अभिजीत कितना प्यार करती हूं तुमसे..कहां हो तुम? मुझे पता है तुम मुझे सता रहे हो...आओ अभि..कहां हो अपनी सफेद कमीज़ में, पता नहीं कब से धुलने को बेताब जीन्स पेंट में...अपने ट्रेड मार्क लाल गमछे में।

मृगांका ने आगे पढ़ा, ''मेरे शब्द शायद कम पड़ जाएं, खत्म हो जाएं, मैं शायद आगे ना बढूं, कुछ भी न करूं, लेकिन  मैं अपने दिल को कैसे रोकूं...जो बार बार तुम पर ही आ रहा है। इसका कोई मतलब नहीं, कि मैंने तुम्हारे प्यार को रोकने के लिए  न जाने कैसी दीवार अपने चारों तरफ खड़ी करने की कोशिश की है, लेकिन हमेशा तुम्हारी यादें मेरे सीने में गरम भोथरे छुरे की तरह उतरती रहती हैं...और मैं असहाय खड़ी रह जाती हूं।

सच है कि मेरा दिल हर पल तुम्हारी हसरत में रहता है, मेरे लिए इससे बड़ी दिली आजादी और गौरव का कोई पल आ ही नहीं सकता.....हां ये सच है, वाकई सच है!!"

मृगांका ने डायरी बंद कर दी। उसे आलमारी पर रख कर और कार की चाबी उठाकर वह दरवाजे की तरफ भागी।

कहीं देर न हो जाए।


अभिजीत का गृहनगर, वक्त वही, दोपहर का, वक्त कहां सरकता है...

कहीं देर न हो जाए। अभिजीत सोच रहा है। शहर में नए किसिम की दुकाने खुल गईं है। छोटा सा कस्बा शहर के तेवर ले रहा है। सुना है नक्सलियों की आमद बढ़ गई है।  थाने के चारों ओर कंटीले तारों की बाड़ लगाई गई है।

थाने को छोड़कर सब कुछ सुरक्षित है।

पानवाले ने पान लगाकर दिया। उंगलियों में सुलगी सिगरेट तब तक राख होने को आ गई थी। पानवाले ने पहचानने की कोशिश की थी। अभि भैया हो ना तुम....अभिजीत मुस्करा दिया, चलो, अनजाने हो चले शहर में तुमने तो पहचान लिया।

पानवाले से इस वायदे पर कि वह पेट्रोल डलवा देगा, अभिजीत ने उसकी मोटरसाइकल दो घंटे के लिए उधार ले ली। सब घूम आया। नदी के किनारे के जंगल, जो बहुत कम रह गए हैं। नदियों में ग्रेनाइट की चट्टानें...जंगल जितने थे...हरे तो नहीं थे। गरमी बहुत है, जीवन में भी मौसम में भी।

आगे श्मशान है। नगरपालिका ने विकसित किया है, नाम दिया है बैकुंठधाम। अब लोग श्मशान भी विकसित करने लगे हैं। पीपल के कुछ पेड़ बेहद बड़े हैं, कुछ बड़े हो रहे हैं। इसी श्मशान में अभिजीत के पिता की चिता चली थी।

एक चायवाले के यहां रुका, सोचा बस यहां से आगे ठीक नहीं होगा। मोटरसाइकिल भी लौटानी है। चायवाले के यहां रुकगया। उसने चायवाले से पूछ ही डाला, आखिर, जंगल कैसे कम होते गए भैया। पहले तो बहुत होते थे यहां थे। मैंने तो सोचा था उधर आगे वाली पहाड़ी जो उजाड़ हो गई है उसे हरियाली से भर दूंगा। लेकिन...कटते-कटते तो जंगल कहां चले गए  हैं, पता ही नहीं लगता।

चायवाले ने कहा, इधर पत्थर की खुदाई होने लगी है तब से कहां जंगल और कैसा जंगल....। जहां तक हरियाली की बात है, कुछ लोग लगा तो रहे हैं लेकिन काटने वाले ज्यादा हैं लगाने वाले बेहद कम। वो जो शेखपुरा वाली पहाड़ी की बात कर रहे हैं ना आप...उंगली दिखाते हुए वो बोला--वहां कुछ लोग पेड़ लगा रहे हैं।

अभिजीत आश्वस्त हुआ। कुछ लोग तो हैं, जो जंगल की सोचते हैं। वह लौट पड़ा।

घर लौटा तो सूरज की शिफ्ट खत्म होने को आई थी। आंगन में भैया के साथ बैठा तो भाई साब ने कहा कि भाभी ने उसे सब कुछ बता दिया है और वह कहां जा रहा है और कब लौटेगा। उसने अपनी कमीज में से एक काग़ज़ निकाला, भाई साब को देते हुए जो कहा,उसका सारांश था कि विदेश जा रहा हूं तो पता नहीं कब लौटूं, या फिर लौटूं भी या नहीं, कुछ ठीक तो है नहीं। भाई साब तो उसके यायावर स्वभाव को जानते है ही। सोचा कुछ है उसे बेचने की बजाय दे दिया जाए। आपने मेरे पालन-पोषण पर जितना खर्च किया है, उतना तो शायद ही दे पाऊं लेकिन...इसी बीच चाय लेकर भाभी आ गई थीं।

चाय के दौरान ही अभिजीत ने अपनी कार की चाबी भाई साब के सुपुर्द कर दी थी। दिल्ली वाला अपना फ्लैट मां के नाम कर दिया था, जिसका किराया मां को हमेशा मिलता रहेगा। अपनी जमापूंजी में से कुछ लाख अपने लिए बचाकर सारी रकम भाभी के नाम कर दी थी।

भाभी का चेहरा खिल गया था। वही भाभी, सिर्फ दो घंटे पहले, जिनकी भाव-भंगिमाएं कुछ अलग थीं...अब कुछ और ही कहानी बयां कर रही थी। अभिजीत ने सोचा, मार्क्स सही कहते थे। वेल्थ इज द प्राइम मूवर.....लेकिन मां का चेहरा कुछ मुरझाने-सा लगा था। उसे कुछ खटक रहा था।

भाभी ने भैया को इसरार करके मछली लाने भेज दिया था बाजार। खुद खाने की तैयारियों में जुट गई थीं। अभिजीत ने कह दिया था वो रात को ही निकल जाएगा। रात दस बजे की ट्रेन से।

रात को जब अभिजीत निकलने लगा था तो अकेले में मां ने उसे पकड़ लिया, सच-सच बता, ये क्या कर रहा है तू। शादी कर ले घर बसा ले। ये विदेश क्यों जा रहा है कब लौटेगा.

मां, मैं सच में जा रहा हूं...

कहां...

पहले गांव जाऊंगा..

और उसके बाद...?

 उसके बाद, अभिजीत ठठा कर हंसने लगा...उसके बाद..उसके बाद बाबूजी के पास जाऊंगा। इसके बाद अभिजीत हाथ छुड़ाकर आगे बढ़ गया। मां चुपचाप खड़ी रह गई।


------- क्रमशः

Saturday, June 23, 2012

गैंग्स ऑफ़ वासेपुरः जियअ हो बिहार के लाला

गैंग्स ऑफ वासेपुर के प्रोमो देखकर कसम खाई थी कि फिल्म पहले ही दिन देखूंगा। देखी...और क्या दिखी। वाह। बहुत दिनों बाद फिल्म देखकर मजा आ गया।

अनुराग कश्यप की सभी फिल्में देखीं है। लेकिन संयुक्त बिहार या अब के झारखंड के अतीत गुंडई, लुच्चई, कमीनेपन को इस तरह किसी ने उभारा नहीं था। अपनी पहली रिलीज़ फिल्म ब्लैक फ्राइडे की तरह ही अनुराग ने एक बार फिर डॉक्यु-ड्रामा रच दिया है।

बदलते हुए लेंस, और पीय़ूष मिश्रा की कमेंट्री इस फिल्म को ऑथेंटिक बनाती है।

दरअसल, फिल्म का महीन रिसर्च इसे इस सब्जेक्ट पर बनी तमाम फिल्मों से जुदा जमीन पर खड़ी करती है। गैंग्स...को सिर्फ माफिया फिल्म समझना भूल होगी..और सिर्फ अपराध फिल्म भी नहीं है ये..ये बिहार में माफिया और राजनीति और कोयला खदानों की गड़्मड़ होती स्थितियों की कथा है।

जैसे ही आप किरदारों से रू-ब-रू होते हैं...आप उफ़-उफ़ करते जाते हैं। आपको सरदार खान हमेशा याद रह जाएगा, जो केन्द्रीय चरित्र तो है लेकिन वह नायक की शास्त्रीय परिभाषा में कहीं नहीं आता। वह लौंडियाबाजी करता है, ठरकी है, और तमाम किस्म का हरामीपना है उसके अंदर। फिर भी वह आपको मोहित करता है।

गज़ब की डिटेलिंग वाली फिल्म है गैंग्स...
माफिया के किरदार में मनोज वाजपेयी कई दफा आ चुके हैं। और सत्या का उनका किरदार भीखू म्हात्रे अब भी लोगों को याद है। लेकिन इस दफा उनके किरदार के रंग गजब के हैं...और विविध भी।

गैंग्स आफ वासेपुर एक राजनीतिक दस्तावेज़ है। लेकिन पहले सेंसर बोर्ड का शुक्रिया अदा करना नहीं भूलना चाहिए, कसाईखाने के बड़े-बड़े मांस के लोथड़ों के शॉट्स आपराधिक मिथक रचते हैं...

अनुराग कश्यप ने देश-काल (टाइम और स्पेस) में इतनी बारीकी बरती है कि दिल खुश हो जाता है, अगली दफा मिलेंगे कभी तो हाथ चम लूंगा। लेंस,  लाइटिंग, शेड्स,धूल,बाल ....क्या कंटीन्यूइटी है।

अस्पताल के दृश्य में लालटेन की रौशनी..उफ़, दिल लूट दिया गुरू।

और बात जरा डिटेलिंग की। आम तौर पर बिहार की भाषा को परदे पर लाने में बहुत हल्केपन से काम लिया जाता है। लेकिन इस काम में अनुराग उस्ताद हैं। यहां तक कि लौंडा गायक बने यशपाल शर्मा के गाने में (मुकद्दर का सिकंदर का गानाः यशपाल पहले सलामे इश्क़ मेरी जां...को लड़की की महीन आवाज में गाते हैं...कुछ इस तरह, सलामे इस्क मेरी जां जरा कूबूल कर लो...फिर किशोर की आवाज़ में गाते हैं...तू मसीहा मुहब्बत के माड़ो का है...गौरतलब है कि बिहार में 'र' को 'ड़' भी उच्चारित किया जाता है। अद्भुत इसी को तो कहते हैं। वरना बॉलिवुडिया तमाशे वाले तो बिहार के किरदार को दूधवाला या लाल मोजे पहना विलेन बना कर इतिश्री मान लेते थे।

डिटेलिंग उस वक्त मारक हो जाती है जब सवारी बिठाने के लिए मनोज, गिरिडिह- गिरिडिह बोलते हैं। नल्ला चूसते हैं, लड़की को कमीनगी से  ताकते हैं। उनकी कमीनगी भरी मुस्कुराहट पर आप न्योछावर हो जाएंगे।

सरदार और औरतों के बीच के रिश्तों के अलग से व्याख्या की जरूरत पड़ेगी। सरदार की पत्नी और उसके संरक्षक (पीयूष मिश्रा) के बीच जो संबंध होते होते रह गया और उससे जो फैज़ल पर असर पड़ा, वहीं से फैज़ल का किरदार शुरु होता है।

फिल्म में अगर महिला किरदारों की चर्चा न की जाए तो गलत होगा। नगमा या दुर्गा के किरदार संपूर्णता लिए हैं। दोनों ताकतवर है, एक  घर बार छोड़ कर बंगालन के प्रेम में पड़ने वाले रंडीबाज पति को भी खाना खिलाकर ताकतवर बनाती है, और घर आए पुलिसवालों के साथ सख्ती से निपटती है। दूसरी, सरदार से झापड़ खाकर उसके लिए अपने दरवाजे बंद कर लेती है और सैमसन और डेलिला कहानी की डेलिला की तरह अपने प्रेमी सरदार की मौत का कारण बनती है।


महिलाओं के किरदार सच में बहुत ताकतवर है। और दोनों किरदारों में उतरी अभिनेत्रियों ने भी कमाल का अभिनय किया है।
फिल्म की महिला किरदार जानदार हैं
'इक बगल में चाँद होगा' से 'कह के लूंगा' तक ‘वासेपुर का संगीत उसकी आत्मा है, जिसके बिना फ़िल्म मुमकिन नहीं थी। मनोज वाजपेयी इसलिए कि अपने किरदार की कमीनगी में इतना उतरते हैं कि आपको बार-बार बेहद विकर्षित करते हैं, लेकिन बस इतना ही कि जब वे अपना बदला ले रहे हों तो आप उनके बिल्कुल साथ खड़े हों।


पूरी फिल्म में भोजपुरी बिरहा और बिदेसिया का सटीक इस्तेमाल है। आप पार्श्व संगीत के तौर पर बिहार के लोकगीतनुमा संगीत से दो-चार होते हैं और आपको लगने लगता है कि वाह इतना ऑथेंटिक तो बॉलिवुड कभी था ही नहीं।
एक दम से रीयल दृश्य, दिल को गुदगुदाने वाले संवाद..क्योंकि बचपन से हम ऐसी ही भाषा सुनते हुए बड़े हुए हैं। देखे-सुने जानेपहचाने लोकेशंस..बनारस, बरकाकाना का स्टेशन...फिल्म को देखकर लगता ही नहीं कि फिल्म देख रहे हैं।
हां, शुरु में भूंजे की तरह गोलियां चलती हैं तो आपको शुरुआत में ही असहज कर देती है। लेकिन फिर धीरे-धीरे आप अनुराग पर भरोसा कर के सीट पर पीठ टिका कर बैठते हैं...और एक दम यथार्थ सिनेमाई तजुर्बे से वाकिफ होते जाते हैं।
अगर आप को इऩ सबसे यानी सच्चाई, यथार्थ, कमीनेपन, हरामीपन, डकैती, बकैती, लौंडियाबाजी, रंडीबाज़ी...बम, कट्टे, कोयले, राजनीति, दंगई, खून वगैरह से डर लगे या उबकाई आती हो, या नफरत हो तो बेशक ये फिल्म न देखने जाएं। आपके लिए बेशक एक और फिल्म रिलीज़ हुई है, जिसमें शाहिद कपूर और प्रियंका चोपड़ा प्रेम-व्रेम को उसी मसाला अंदाज़ में दोहरा रहे होंगे, जो दशकों से हम आप बेहतर तरीके से परदे पर देख चुके हैं।
गैंग्स ऑफ वासेपुर, सिनेमाई जादू है। यथार्थ और कला का मेल...आखिर में सभी किरदारों के साथ और जिअ हो बिहार के लाला में मनोज तिवारी की लय पर सिर्फ  ठेले पर लटकता हुआ माउजर याद रह जाता है। जिसमें पहिए के बीचों बीच एक गोली छूटती है -- धांय।

Thursday, June 21, 2012

सुनो मृगांका:14: मैं कभी न मुस्कुराता, जो मुझे ये इल्म होता...

मैं कभी न मुस्कुराता जो मुझे ये इल्म होता कि हजारों ग़म मिलेंगे। मेहदी हसन की गाई इन पंक्तियों को याद करता हुआ अभिजीत प्लेटफॉर्म पर बैठा रहा। दारू धीरे-धीरे असर कर रही थी।

सुबह जब उसकी नींद खुली तो गाड़ी जमुई पार कर चुकी थी। माटी का रंग धीरे-धीरे गहरा होता जा रहा था...भूरेपन से पीले पन की ओर और फिर मिट्टी का रंग खूनी लाल हो गया। अभिजीत ने आंखें मलते हुए देखा...किसके दिल का खून है ये।

झाझा स्टेशन से पहले से ही दुनिया की सबसे खराब चाय की रट लगाता हुआ वही चाय वाला आ गया। अभिजीत इस आवाज़ को बचपन से पहचानता है...अब उस चाय वाले की उमर भी ढल गई है। कहता है कि वह सबसे खराब चाय बेचता है लेकिन दरअस्ल उसकी चाय होती बेहतरीन है।

टी-बैग वाली चाय पी-पीकर ऊब चुके अभिजीत को मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पीने की जोर की इच्छा हुई। चाय ढलते ही कुल्हड़ सोंधी खुशूबू से भर गया। ओह...मिट्टी की खुशबू। रास्ते में झालमुड़ी, चिनियाबादाम (मूंगफली) और तमाम किस्म के सामान बिकने आए। झाझा स्टेशन का तीखा-चरपरा आलू दम तो बहुत मशहूर है।

झाझा से गाड़ी चली तो कागज के दोने में चना-मसाला खाते हुए अभिजीत ने खिड़की की ओर देखा। तीखी धूप में दोनों तरफ घाटियों में पलाश के फूल खिले हैं। झाझा से आगे जसीडीह कर रेल लाईन तीखी चढ़ाई चढ़ती है, अभिजीत की खुद की जिंदगी की तरह। रेलवे पटरी के दोनों तरफ घने जंगल हैं...और गहरी घाटियां हैं।

गहरी घाटियों की वजह से नजर दूर तलक चली जाती हैं। टेसू या कहें पलाश के सारे पत्ते इस वक्त गिर जाते हैं और उसकी काली-गहरी शाखाओं पर सिर्फ लाल-पीले फूल नजर आते हैं। लगता है जंगल में आग लग गई हो।

दिल की आग को जंगल की आग में बदलते देखना...उफ़्...मृगांका मैंने तुमसे वायदा किया था कि मैं कभी तुम्हें पलाशों के इस दहकते जंगल का नजारा कभी दिखाऊंगा जरूर।

लेकिन किए गए वायदे कभी पूरे नहीं होते। अभिजीत की जिंदगी में पता नहीं मृगांका वापस आए भी या नहीं...और कभी आना भी चाहे तो अभिजीत जानता है...छह या सात महीने। ज्यादा वक्त नहीं अभिजीत के पास।

अभिजीत की निगाहें उस जंगल पर जम सी गईं। लगा सारा जंगल पीछे को भाग रहा है...और ट्रेन स्थिर है। पेट में तेज़ दर्द...उफ़ ये दर्द। अभिजीत ने कुछ ठान लिया था मन में। सिर्फ मृगांका की याद में देवदासत्व ओढ़ने से काम नहीं चलेगा।

प्रेम में घुटते रहने से क्या होगा। कुछ ऐसा किया जाए कि मृगांका को उस पर गर्व हो...उसके नहीं रहने पर भी, और मृगांका चाहे दुनिया के किसी भी कोने में हो। उसे लग रहा था कि मृगांका चाहे उसे अब प्यार करती हो न हो...लेकिन वह कहीं न कहीं से उसे देख जरूर रही होगी। चाहे जहां रहे खुश रहे वो, अभिजीत यही तो चाहता था। उसका पेट दर्द बढ़ता ही जा रहा था...कुछ इस कदर की उसकी आँखें खुद ब खुद मुंदती चली गईँ।

लगा चारों तरफ अंधेरा छा गया हो।

दिल्ली, अभिजीत का घर, अतीत का कोई दिन

काफी इसरार करने के बाद जब अभिजीत मृगांका को अपना घर दिखाने को राजी हुआ तो उस दिन बेहद तेज बारिश हो रही थी। बादल लगता था सारे के सारे , आज ही बरस लेंगे। अभिजीत एनसीआर के यूपी वाले हिस्से में रहता था और वहां बिजली का आना उत्सव का कारण बनता था।

अभिजीत ने दरवाज़ा खोला तो पहले तो मृगांका को बाहर ही रोक दिया। घर का कोई भी सामान अपने सही जगह पर नहीं था। जुराबें बिस्तर पर, बिस्तर पर अखबारों के ढेर...जूते टीवी टेबल के ठीक सामने...डीवीडी प्लेयर पर रखा कंघा...प्रिज पर चाय के तमाम जूठे कप...बस किताबों की आलमारी सजी थी।

घर के हर कोने में सिगरेट के टोटे फिंके पड़े थे। मृगांका मुस्कुरा उठी। ऐसे रहते हो...?

अरे नहीं, कामवाली नहीं आई बहुत दिनों से न...अभिजीत सिर खुजलाने लगा। प्रशांत उसके साथ ही रहता था..उसी के फ्लैट में। लेकिन दस दिनों से वो भी नहीं था।

मृगांका ने गहरा नीला कुरता पहना था जिसपर सुनहरे त्रिकोण के डिजाइन बने थे। उसे पता है अभिजीत को उसकी ये ड्रेस बहुत पसंद है। साथ में हल्के पीले रंग का दुपट्टा। हमेशा की तरह मृगांका होठ दबाकर मुस्कुराई।

दस मिनट के अंदर कमरे में झाड़ू-पोंछा लग गया। अखबारों को सहेज दिया गया। कूड़ेदाने के लायक चीजें कूड़ेदान में पहुंच गईं। चाय बनकर अभिजीत के सामने थी। एश ट्रे चमचमा गई थी। कोने में सजाकर रखी गईं ह्विस्की और बीयर की बोतलों को भी एक कार्टन में बंद कर बालकनी में रख दिया गया।

मृगांका ने देखा, और कुछ हो न हो, अभिजीत ने पौधे ढेर सारे लगा रखे थे--"तुम्हें पेड़-पौधों से बहुत लगाव है?"
"हां, पेड़ पौधे कभी दगा नहीं देते...इनको रूपयों-पैसों का भी लालच नहीं।"---मृगांका उसका मुंह देखती रह गई।

अभिजीत का मुंह कसैला हो गया था।

उस रोज़ मृगांका ने अभिजीत के लिए रात का खाना बना दिया। अभिजीत कुछ लिख रहा था और मृगांका से उसने बैठे-बैठे ही पूछा था, मेरा ये छोटा घर पसंद आया तुम्हें। तुम तो उतने बड़े हवेली जैसे मकान में रहती हो...यहां दो कमरों के फ्लैट में कैसे रह पाओगी। न खुली हवा, न लॉन...न बड़ी डिजाइनर रसोई...

मृगांका आकर उसके पास बैठ गई, तुम रहोगे न यहां...मेरे साथ? बस इतने में ही मृगांका ने बहुत कुछ कह दिया था।

पैसा सब कुछ नहीं होता अभिजीत। वह जीने के लिए जरूरी है, लेकिन वह नंबर एक पर नहीं है प्राथमिकताओं की सूची में। जीने के लिए जिंदगी चाहिए...और मेरे लिए जिंदगी हो तुम। हम दोनों मिलकर इतनातो कमा ही लेंगे कि ठीक-ठाक गुजर बसर कर लेंगे।

...और तुम्हारे पापा मम्मी?

वो लोग तुम्हें पसंद करते हैं।

कैसे, कब उन्होंने तो मुझे देखा तक नहीं।

तुम भी न भोले शंकर हो अभि। ये जमाना कहां से कहां पहुंच गया और तुम अब भी टाइपराइटर बने हुए हो। फेसबुक पर तुम्हारी फोटो मैंने घर में सबको दिखा दी है। और अखबार में तुम्हारे साप्ताहिक कॉलम के तो सारे कटिंग पापा और मम्मी पढ़ चुके हैं।

अभिजीत चकित रह गया। उसे हैरत हो रही थी कि उसकी जिंदगी में भी स्वीकार्यता के ऐसे बेशकीमती क्षण आएंगे, जहां उसके लिखे हुए शब्द उसकी पहचान बन जाएंगे। जहां, उसे इस तरह से प्यार मिलेगा वो भी मुलायमियत के साथ....ग़ोकि उसकी जिंदगी में मुलायम लम्हे कम ही आए थे अब तक।

अभिजीत के चेहरे पर एक मुस्कुराहट खेल गई। मृगांका ने जाते-जाते एक हल्का सा किस किया था उसके माथे पर। लगा जैसे उसकी जीवन भर की साध पूरी हो गई।

उस नरम चुंबन की छाप अब तक है अभिजीत के माथे पर। वह मखमली अहसास...वो प्यार का गुनगुनापन। इसमें कुछ वैसी ही मासूमियत थी जैसे किसी बच्चे के माथे पर कोई हल्का सा प्यारा सा चुम्मा लेता है।



क्रमशः


Monday, June 18, 2012

दाढ़ी महात्म्यः हिस्ट्री-पॉलिटिक्स-सोशियोलजी

दाढ़ी केवल फिजिक्स-केमेस्ट्री-बॉयोलॉजी नही , हिस्ट्री-पॉलिटिक्स-सोशियो भी है...

बचपन में हीर-रांझा देखी थी , बेतरतीब-भगंदर टाइप दाढ़ी में राजकुमार जंगल झाड़ सूंघते-सर्च करते दिख रहे थे। लगा दाढ़ी प्रेम का पागलपन है। बैकग्राउंड से ह्रदय छीलती दर्दीली ध्वनि अविरल झरझरा रही था – “ये दुनिया , ये महफिल मेरे काम की नही… “। फिर कुछ दिनों बाद लैला-मंजनू देखी , चॉकलेटी रिषी कपूर सफाचट का इंतजार करते थक चु...की दाढ़ी ओढ़े पत्थर झेल रहे थे। रंजीता के लाख मनुहार के बावजूद पत्थर थे कि उछलते ही जा रहे थे , रंजीता की दर्द भरी आवाज अगल-बगल छोड़ काल और चौहद्दी से परे ऑडिएंस को भावुक किए जा रही थी – “कोई पत्थर से न मारे मेरे दीवाने को”। अब शक के कीड़े को मानो रिवाइटल का डोज मिल गया , विचार पुख्ता हो गया –दाढ़ी प्रेम की परिणति-परिणाम है।

कुछ साल पहले एक मित्र से मुलाकात हुई , करीब साल भर बाद। हमलोग बीते साल के अनुभव गाहे-बेगाहे उछाल रहे थे। वो एलएसआर पढ़ाने के सिलसिले में गया था … और गंवई भाषा में कहे तो छौरा-छपाटा समझ कर चलता कर दिया गया। एंट्री में ही तमाम पापड़ों से पाल पड़ गया उसका। कन्याओं की तो छोड़िए , गार्ड से भी तव्वजो न मिली। अनुभवियों और पके-पकाये , तपे-तपायों से प्रीसक्रिप्शन मिला- 1.मोटे फ्रेम का चश्मा 2. बढ़ी हुई दाढ़ी । दाढ़ी उसके लिए छात्र से शिक्षक के सफर का संवाद-तन्तु साबित हुई । अब रिस्पेक्टपुल हो गया है , इंटेल दिखने लगा है , था तो खैर बचपन से ही। लगा दाढ़ी मजबूरी है।

बीएचयू में पढ़ाई के दौरान एक शख्स से मुलाकात हुई- जहीन, नवीन , आधुनिक ... कमी केवल एक ही। सुबह से लेकर शाम-रात तक चांद हर समय उसके सर पर घोंसला बनाए मिलती। महोदय हर अगली सुबह दाढ़ी के नए ज्यामितिय रुप के साथ अवतरित होते – त्रिभुजाकार , वृत्ताकार , अर्धवृताकर ... दाढ़ी मुझे `अभाव के बीच मेरे प्रयोग` टाइटल आत्म-संस्मरण की विषयवस्तु सी लगी।

डीयू में अध्ययनरत था तो रिसर्च मेथोडोलॉजी की योगेंद्र यादवीय पड़ताल का ज्ञान लेने साऊथ कैंपस जाना हुआ। उन्होंने एक बात बतायी जो कमोबेश `ऑल दैट ग्लीटर्स इज नॉट गोल्ड` के उलट टाइप लगी। बातों-बातों में उन्होंने एक बात बतायी कि बढ़ी हुई दाढ़ी और झोला लटकाए पाए जाने सज्जनों की अच्छी-खासी संख्या लेफ्टिस्ट लीनिंग वाली होती है। दाढ़ी मुझे विचारधारा का आकार लेती नजर आयी।

आजकल मुझे रोजाना फ्रेंचकटीय फुफेरे भाई से दो-चार होना पड़ता है। मेरा फ्लैट पार्टनर भी है। खांटी देहात से आईआईटी के बीच इसकी दाढ़ी ने भी न जाने कितने आकार बदले। दाढ़ी मुझे ग्रोथ की अनेकानेक भाव-भंगिमाओं में से एक लगी।

सच कहूं तो दाढ़ी मुझे किसी बहुरुपिए से कमतर नही लगता। दाढ़ी धर्म भी है , दाढ़ी समाज भी है , दाढ़ी कम्यूनल भी है , दाढ़ी सेक्यूलर भी है । पता नही क्यों लेकिन मैं अक्सर पाता हूं कि सिखों और हिंदू टाइप दाढ़ी तो पुलिस-सेना में `लोगों` की नजरें एडजस्ट कर लेती है , लेकिन मुसलमानों टाइप दाढ़ी पर यही नजरें सवाल करती नजर आती है।

अन्त में यही कहूंगा कि दाढ़ी विज्ञान ही नही समाजविज्ञान की विषय-वस्तु भी है। ये सरकारी और निजी ऑफिसो , लॉनों , गार्डनों में उग आया घास नही , जिस पर माली हर सुबह-शाम कतर-ब्यौंत करता है , यह जीवनधारा भी है।

----रजनीश प्रकाश (रजनीश प्रकाश के फेसबुक स्टेटस से बिना उन्हे आभार दिए छाप दिया है) 

Sunday, June 17, 2012

डियर डैड...एक खत दिवंगत बाबूजी के नाम

डियर डैड,
सादर प्रणाम,

कहां से शुरु करुं...आज से ही करता हूं।

आज अंग्रेजी के एक अख़बार के पहले पन्ने पर बिस्किट के एक ब्रांड का विज्ञापन है। विज्ञापन कुछ नहीं...बस एक खाली पन्ना. जिसमें एक चिट्ठी लिखी जा सकती है। अपने पिता के नाम....पीछे एक पंक्ति छपी है, कोई भी पुरुष बाप बन सकता है, लेकिन पिता बनने के लिए खास होना पड़ता है (मैंने नजदीकी तर्जुमा किया है, मूल पाठ हैः एनी मैन कैन बी अ फ़ादर, इट टेक्स समवन स्पेशल टू बी डैड)

मुझे नहीं पता, कि फ़ादर, डैड और पापा में क्या अंतर है। मुझे ये भी नहीं समझ में आता कि आखिर बाबूजी (जिस नाम से हम सारे भाई-बहन आपके याद करते हैं) पिताजी और बाकी के संबोधनों में शाब्दिक अर्थों से कहीं कोई फ़र्क पड़ता है क्या। क्या बाप पुकारना डेरोगेटरी है?

लेकिन बाबूजी, बाजा़र कहता है कि डैड होने के निहितार्थ सिर्फ फ़ादर होने से अधिक है। आप होते तो पता नहीं कैसे रिएक्ट करते और मेरी इस चिट्ठी की भ्रष्ट भाषा पर मुझे निहायत नाकारा कह कर शायद धिक्कारते भी। लेकिन बाबूजी, आपको अभी कई सवालों के जवाब देने हैं।

आपको उस वक्त हमें छोड़कर जाने का कोई अधिकार नहीं था, जब हमें आपकी बहुत जरूरत थी। जब हमें अगले दिन की रोटी के बारे में सोचना पड़ता था, आपको उस स्वर्ग की ओर जाने की जल्दी पड़ गई, जिसके अस्तित्व पर मुझे संशय है।

मां कहती है, कि आपके गुण जितने थे उसके आधे तो क्या एक चौथाई भी हममें नहीं हैं। आप ही कहिए बाबूजी, कहां से आएंगे गुण? दो साल के लड़के को क्या पता कि घर के कोने में धूल खा रहे सामान दरअसल आपके सितार, हारमोनियम, तबले हैं, जिन्हें बजाने में आपको महारत थी। दो साल के लड़के को कैसे पता चलेगा बाबूजी...कि कागज़ों के पुलिंदे जो आपने बांध रख छोड़े हैं, उनमें आपकी कहानियां, कविताएं और लेख हैं।... और उन कागज़ों का दुनिया के लिए कोई आर्थिक मोल नहीं। दो साल के लड़के को कैसे पता चलेगा बाबूजी कि आपने सिर्फ रोशनाई से जो चित्र बनाए, उनकी कला का कोई जोड़ नहीं।

बाबूजी, दो साल का लड़का जब बड़ा होता गया, तो उसका पेट भी बढ़ता गया। उसकी आँखों के सामने जब सितार, हारमोनियम तबले सब बिकते चले गए, कविता वाले कागज़ों के पुलिंदे और उसके बाबूजी के बनाए रेखा-चित्र दीमकों का भोजन बनते चले गए, तो बाबूजी ये गुण कैसे उसमें बढ़ेंगे।

मां कहती है, कि आप बहुत सौम्य, सुशील और नम्र आवाज़ में बातें करते थे। बाबूजी, मैं आपके जैसा नहीं बन पाया। मां कहती हैं मैं अक्खड़ हूं, बदतमीज हूं, किसी की बात मानने से पहले सौ बार सोचता हूं...बाबूजी अभी तो आप ऊपर से झांक कर सब देख रहे होंगे...जरा बताइएगा मैं ऐसा क्यों हूं?

बाबूजी जब आप इतने गुणों (अगर सच में गुण हैं) से भरकर भी एक आम स्कूल मास्टर ही बने रह गए, तो हम से मां असाधारण होने की उम्मीद क्यों पाले है? उसकी आंखों का सपना मुझे आज भी परेशान करता है। बाबूजी मां को समझाइए, आप जैसे आम आदमी के हम जैसे आम बच्चों से वो उम्मीद न पाले। उससे कहिए कि वो हमें नालायक समझे।

डियर डैड, ये संबोधन शायद आपको अच्छा नहीं लग रहा होगा। आज फादर्स डे है, कायदे से तो एक गुलदस्ता लेकर मुझे उस जगह जाना चाहिए था, जहां आपकी चिता सजाई गई थी, या उस पेड़ के पास जहां आपकी चिता के फूल चुनकर हरिद्वार ले जाने से पहले रखे गए थे। लेकिन बाबूजी, आपको याद करने के लिए मुझे किसी फादर्स डे या आपकी पुण्यतिथि, या मेरे खुद के जन्मदिन की जरूरत नहीं है। आप मेरे मन में है।

बाबूजी, मरने के लिए बयालीस की उम्र ज्यादा नहीं होती। उस आदमी के लिए तो कत्तई नहीं, जिसका एक कमजोर सा बेटा सिर्फ दो साल का हो, और बाद में उस कमजोर बेटे को समझौतों से भरी जिंदगी जीनी पड़ी हो। जब सारी दुनिया के लोग अपने पिता की तस्वीरें फेसबुक पर शेयर करते हैं, तो मुझे बहुत शौक होता था कि आप होते तो...बाबूजी मुझे पता है कि आप होते तो, जेठ की जलती दोपहरी में ज़मीन पर नंगे पांव नहीं चलना होता मुझे...आप मेरे पैर अपनी हथेलियों में थाम लेते।

आपको बता दूं बाबू जी, आपके निधन के कुछ महीनों बाद ही लोगों ने हम पर दया दिखानी शुरु कर दी थी...मुहल्ले वाली मामी ने जूठी दूध का गिलास भी देना चाहा था...मुझे पता है बाबूजी, आप होते तो किसी कि इतनी हिम्मत नहीं होती। अब तो आप जान गए होंगे न कि क्यों इतना अक्खड़ हो गया है आपका वो कमजोर दिखने वाला बेटा।

आप चले गए, नाना जी ने रुआंसा होकर कहा था उनकी उतनी ही उम्र थी। मैं नहीं मानता...आपको इस कदर नहीं जाना चाहिए था...चिलचिलाते जेठ में, ऐसे लू वाले समाज में आप छोड़ गए हमें...क्यों बाबू जी?

मुझे बहुत शिकायत है बाबूजी, बहुत शिकायत है....

आपका बेटा
(आज्ञाकारी नहीं , कत्तई नहीं)

Saturday, June 16, 2012

जंगल, बारिश, सम्मोहन और भूलभुलैया

मध्य प्रदेश के जिस इलाके में हूं, जंगल अपने शबाब पर है। इलाका अर्ध-शुष्क है। राजस्थान नजदीक है। यहां के जंगल भूगोल की भाषा में उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों में आते हैं। जब हम जंगलों से मिलने गए तो ज्यादातर पेड़ों ने अश्लील तरीके से कपड़े उतार रखे थे।

नहीं, अश्लील नहीं। शायद, वनवासी ऐसे ही रहते हैं। कूनो पालपुर के जंगल ठूंठ से खड़े हैं। एक अदद बारिश का इंतजार था उनको।


कूनो पालपुर के जंगल में, फोटोः नीलेश कालभोर

जमीन पथरीली है। खेती अनाथ है।

हम श्योपुर और शिवपुरी के बीच में हैं। सुना है रणथंबौर से टी-38 नाम का बाघ टहलता हुआ इधर आ गया है। कूनो नदी के आसपास होगा, हम उसकी एक झलक पाने को बेताब हैं। वन अधिकारी बता रहे हैं कि जंगल में तेंदुए हैं, भालू हैं, लकड़बग्घे हैं...सांभर, चीतल और मृग खानदान के सारे जानवर हैं (बारहसिंघे को छोड़कर) हमें शाकाहारी जानवर तो खूब मिले लेकिन मांसाहारी जानवर दिखे नहीं थे। (वो दिल्ली शिफ्ट हो गए हैं ऐसा मुझे एक गाइड ने बताया, हालांकि ये बात उसने हमें मुस्कुराते हुए  कही...अलबत्ता बात एक हद तक सही थी)

हमें एक तेंदुआ शिकार करता हुआ दिख गया। 47 डिग्री सेल्सियस के तापमान में गले में लाल गमछा लपेट कर और उबला हुआ पानी घूंटो में भरते हम कुछ और जीव देख लेने की उम्मीद में थे तभी हमें पहले एक सियार दिखा। सियार के किनारे एक गिद्ध भी दिखा।

गिद्ध भी विलुप्तप्राय जीवों की श्रेणी में है। बचपन में हमने बहुत देखे थे, लेकिन अब यहां उसे देखना सुकूनबख्श था। अचानक झाडि़यो में एक हिरन के छौने के पीछे हमने तेंदुआ भी देख लिया। कैमरे कि क्लिक अनवरत चलने लगी। शटर  की आवाज़ के सिवा कोई और आवाज़ नहीं।

हम सब बहुत खुश थे। सिर्फ एक बाघ को खोज पाना, वो भी 348 वर्ग किलोमीटर में फैले जंगल में...नामुमकिन है। हम तेंदुआ देखकर ही खुश थे। हां, जैसे-जैसे शाम होती गई...मृग परिवार हमें ज्यादा दिखे। मैदान में। गायें भी बहुत थीं, लगा इन गायों को यहां के भावी राजाओं (सिंहों) के भोजन के लिए ही पालपोस कर बड़ा किया गया है।

हम श्योपुर से कूनो की तरफ बढ ही रहे थे कि रास्ते में बूंदा-बांदी ने स्वागत किया। धीरे-धीरे बारिश जोर पकड़ती गई।

लगा विधवा जंगल की मांग किसी ने भर दी। लगा कि जिंदगी लौट आई। लगा कि अपने साजन के इंतजार में सूनी आंखों से निहारते जंगल का सजन लौट आया और उसने हुमक कर जंगल को आलिंगन में कल लिया हो।

मेरे मित्र नीलेश जी को कविता सूझने लगी। मेरे मन में अब भी पथरीला जंगल बसा था। उसका भी एक अग सौंदर्य है। बारिश से अघाए जंगल और जून की तपती-कड़क धूप में तने हुए जंगल के एटीट्यूड में अतर होगा ना। मुझे एटीट्यूड वाला जंगल पसंद आय़ा।

लड़ता हुआ जंगल, सहता हुआ जंगल अच्छा होता है।

बारिश गुजर गई तो एक अन्य मित्र अश्विनी कुमार बालोठिया स्थानीय हैं, श्योपुर के। उनने कहा चलिए आपको डूब दिखा आते हैं। डूब में वो पत्थर के पिजरे हैं जहां सिधिया खानदान के राजा बाघों को कैद करके रखते थे।

कराल से ऐन पहले वो जंगल में बाईँ ओर मुड़ गए, कहा कोई 7 किलोमीटर आगे जाकर पीएमजीएसवाई वाली सड़क पर बाईं ओर मुड़ना है, वहीं तीन किलोमीटर आगे है डूब।

अब क्या बताएं, सात किलोमीटर तो क्या सत्रह किलोमीटर बाद भी कोई सड़क वहां से नहीं निकली। बाईं ओर कोई कट ही नहीं मिला। बहरहाल, कुछ और आगे जाकर जब कट नहीं मिला तो निराशा होने लगी। अश्विनी जी की हिम्मत टूट गई। उनने कहा कि चलो आगे से सी दे कराल ही निकल लेते हैं..वहां से टिकटोली चलेंगे।

टिकटोली में हमें कुछ काम था। बादल छाए थे, और बारिश हमारा पीछा कर रही थी। नीलेश जी कविताई मूड में थे। यह प्रकरण उनको अभी मजेदार ही लग रहा था।

गाड़ी के म्युजिक सिस्टम में सीडी लगातार सुर अलापे हुई थी। अचानक हनुमान चालीसा आ गया उस सीडी में...हमने कहा ये वक्त हनुमान चालीसा पढ़ने का तो कत्तई नहीं है। अगला गाना, झूम बराबर झूम शराबी (कव्वाली) था। शब्द कह रहे थे...आजा अंगूर की बेटी से मुहब्बत कर लें, शेक साहब की नसीहत

लेकिन जिस कराल से जाकर हमें टिकटोली जाना था वह कराल ही नहीं आया। आगे जाकर सड़क खत्म हो गई, कच्चा रास्ता शुरु हो गया। एक घर के बुजुर्गवार से पूछा गया कराल जाने का रास्ता...अब तक अश्विनी जी का आत्मविश्वास खलास हो चुका था। एक दम्मे बुझ से गए।

हम रास्ता भटक गए थे। करीब बीस किलोमीटर तक हमें कच्चे रास्ते पर भटकते हुए हो गए। मैंने हतोत्साहित हो रहे लोगों का उत्साह बढ़ाने की कोशिश की। उनका कहना था कि हनुमान चालीसा का निरादर करने से ऐसा हुआ है।

ड्राइवर से कहा मैंने, हनुमान चालीसा चला लो फिर से, और गाड़ी खड़ी कर लो, रास्ता मिल जाएगा? ड्राइवर मुस्कुरा उठा। मुझे उसके मुंह पर यही मुस्कुराहट चाहिए थी। दरअसल, वो इलाका किडनैपिंग के इलाके के रूप से मशहूर है, और तेंदुए और जंगली जानवरों का भी डर है। मित्रों को टी-38 (बाघ) का भी खौफ था।

गाड़ी बदस्तूर चलने लगी। रास्ता गीला-सा था, डर था कि कहीं पहिए न फंस जाएं कीचड़ में। एक बार तो पूरी गाड़ी पत्थर पर कुछ इस तरह उछली की लगा हम हवा में तैर रहे हैं। मैं इस स्थिति का पूरा आनंद ले रहा था और अश्विनी और नीलेश के चेहरे पर उड़ती हवाइयों का भी।

नीलेश की कविता कपूर होकर हवा गई थी, और वो लगातार हंसने की कोशिश कर रहा था...खिसियानी हंसी थी वो...उस पर मेरा बदतमीज ठहाका गूंजता। हम दोनों की इस हंसी से सबसे ज्यादा शर्मसार अश्विनी बालोठिया हो रहे थे।

आखिरकार, फिक्र को धुएं में उड़ाते हुए हमें आखिरकार तीस किलोमीटर कच्चे रास्ते, यानी जंगल के बीच रास्ता खोजते और साढ़े तीन घंटे खर्च करने के बाद रास्ता मिल ही गया। सूरज अब भी बादलों की बीच छिपा था। खुद को बीयप ग्रिल्स से कम नहीं समझ रहा था।

झूबराबर झूम शराबी गाने ने हिम्मत दी, माहौल हल्का बनाए रखा। बीच में एक बार सौमित्र भाई के इसरार करने पर हनुमान चालीसा भी बजाया गया था। अब जंगल से सही सलामत लौटने के लिए या तो आप ड्राइवर को धन्यवाद दें, या फिर मेरे झूम बराबर झूम शराबी वाले गाने को श्रेय दें, या फिर हनुमान चालीसा के महात्म्य को...आप पर है।

मैंने तो इस खो जाने का खूब मजा लिया, लगा जंगल से प्यार हो गया है. जंगल ने सम्मोहित कर लिया। एक ऐसी जगह भी देखी जो इस सूखेपन के बीच हरेपन की मिसाल थी, जहां से आपको प्यार हो सकता है।

सम्मोहन की सी स्थिति में हूं। जंगल का ये सपना न टूटे।

Tuesday, June 12, 2012

मुसाफिर हूं यारो...एमपी में

कभी-कभी रतजगा उतना बेरहम नहीं होता। यूपी में रहते हों, रात में लगातार छह घंटे तक बिजली न आए, कहीं जाने के लिए सामान पैक करना हो, अँधेरा हो, कैंडल की औकात से ज्यादा घना अंधेरा...ट्रेन अलसभोर की हो...तब भी आपका अगर उत्साह बना रहता है, तो यकीन मानिए आप मुसाफिर किस्म के इंसान हैं, कहीं न कहीं यायावर हैं दिल से। आज मुझे भी ऐसा ही लगा।

रात कब सुबह में तब्दील हो गई, इसका पता नहीं चला। ऐसा नहीं कि बेकरारी किस्म की कोई चीज़ थी, बस यूं समझिए कि बेकरारी थी लेकिन वह कपार (कपाल) का पसीना गरदन-पीठ होते हुए इधर उधर बहते जाने की वजह से थी।

अस्तु, सुबह ऑफिस के गाड़ीवान् ने कॉल किया तो लगा कि अब निकल लेना चाहिए।

स्टेशन पहुंचा तो पूरब में लाली छा गई थी। नीलेश भाई ने फोन करके बताया कि वो पहाड़गंज की तरफ हैं। मैं अजमेरी गेट की ओर से आया था। सामान लेकर मॉर्निंग वॉक करने का मजा ही कुछ और है। सीढ़ियां चढ़ते -उतरते।

नीलेश भाई खासे ताज़े-दम दिख रहे थे। बहरहाल, हमें भोपाल शताब्दी से ग्वालियर पहुंचना था। ऐन सवा छह बजे गाड़ी छूट गई। मैं और नीलेश भाई बतियाने में मशगूल हो गए। फेसबुक से पता चला कि सुशील झा का टिकट कन्फर्म नहीं हो पाया। रेल को गरिया रहे थे। इतने दिन के बाद उन्हें रेल की असलियत पता क्यों चली।

ग्वालिर पहुंचने के बाद दैनिक भास्कर के पत्रकार विभावसु तिवारी से मुलाकात हुई। सज्जन व्यक्ति हैं। उनसे दुआ सलाम करके और सौमित्र भाई को साथ लेकर हम चल पड़े शिवपुरी की ओर निकल पड़े। ग्वालियर के आगे निकलते ही पेड़ों की आबादी बढ़ जाती है।

इधर उधर चाय पीते, ऊंघते झपकी लेते, और कुछ घाटों का मजा लेते हम शिवपुरी पहुंचे। शिवपुरी में हमें अश्विनी भालोटिया नहीं मिले। उन्हें हमारे लिए कैमरा चलाना था। वो मिले श्यौपुर में, जो करीब 120 किलोमीटर दूर है।

तीन बजे हमलोग श्योपुर पहुंचे। लेकिन हमारे कदमों में उलझ गए कैसे लाल फीते फिर कभी...। फिलहाल जंगलों में हमने सूरज को डूबते देखा, अँधेरा घिरते देखा। लेकिन सच में, एमपी गजब है।