Saturday, September 15, 2012

रजनी सेन की एक कविताः तेरी मेरी बात मिले

(रजनी सेन डीडी न्यूज़ में एंकर हैं, लेकिन उनके भीतर एक मखमली कवयित्री भी है। आज उनकी एक कविता आप लोगो ंके साथ शेयर कर रहा हूं)



न की दीवारें जब भी दरकीं
न थामने वाले हाथ मिले,
खुद में उलझे उलझे रहे वो
जब भी मेरे साथ मिले

                            भरी दुपहरी जब भी देखा
                             देखा अजनबी आंखों से
                             कहने को सपनों से उनके
                             सपने मेरे हर रात मिले

पूछती है दुनिया ये सारी कौन हूं मैं
और   कौन है  वो?
सुबह जिनके तकिये के सिहराने
मेरे भीगे जज़बात मिले

                      अफसानों का लंबा रस्ता
                      सफर अभी करना है बहुत
                       क्या जाने किस मोड़ पर फिर से
                       तेरी मेरी बात मिले।

माननीय पीएम के नाम एक खत

माननीय प्रधानमंत्री जी, 

सुना आपने कुछ सुधार किए हैं।

कहते हैं कि सुधार बहुत जरूरी हैं, देश में सुधार लाने के लिए मंहगाई बढ़ानी जरूरी है। अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह का अर्थशास्त्र अनर्थशास्त्र में बदल गया लगता है। कई बीट रिपोर्टर बताते हैं कि अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बढ़ती कीमतों के मद्देनजर डीज़ल के दाम बढ़ाने की मजबूरी थी।

किसको बेवकूफ समझ रहे हैं। अगर सरकार डीज़ल की सब्सिडी का बेजा फायदा उठाने वाले कार मालिकों से हलकान थी तो क्यों नहीं आपने डीज़ल कारों की कीमतें बढ़ी दीं? गांव का किसान तो डीज़ल वाली कार लेकर नहीं जाएगा ना? आपने डीज़ल कारों पर शेस क्यों नहीं लाद दिय़ा। आपको कीमत बढ़ानी थी आपने बढ़ा दी।

महंगाई, मुद्रास्फीति पर देसी मीडिया चीखता-चिल्लाता रहा, आपको कुछ नहीं सूझा। विदेशी मीडिया में आपकी आलोचना हुई, आपको अंडरअचीवर कहा गया, तो चुभ गया? पश्चिम  जिन सुधारों की अपेक्षा आपसे कर रहा था, आपने किए नहीं थे। गठबंधन धर्म निभाने के नाम पर, या महज आलस्य के मारे होकर, तो पश्चिम की आलोचना कौन झेलेगा?

अब आपने ठान लिया कि सारे सुधार एकसाथ लागू कर दिए जाएं। एकाएक सिंह अवतार ले लिया आपने। मुझे एफडीआई से कोई दिक़्क़त नहीं है। हालांकि होनी चाहिए थी। लेकिन रसोई गैस की कीमत आपने यह सोचते हुए बढ़ा दी कि एक गरीब परिवार को सिर्फ छह सिलिंडर की जरूरत होगी साल भर में।

प्रधानमंत्री जी कहीं आपको यह पता तो नहीं चल गया कि गरीब लोग (यह मान लीजिए कि देश के आधे लोग  गरीब है, और चौथाई लोग ऐसे हैं जो टेकेदार और नेता हैं, और नेता कभी गरीब नहीं हो सकते) एक ही सांझ खाते हैं। इसलिए पकाएंगे भी एक ही जून?

मनमोहन जी, आपने एक तरह से पर्यावरण को चुनौती दे दी है। रसोई गैस की बचत करने के लिए लोग अब सरकंडे-उपले और लकड़ियां जलाएंगे। वन काटे जाएंगे, तो आपको जो बाघ परियोजना बहुत प्यारी है, वे बाघ कहां रहेंगे।

आपकी घोषणा के बाद देख रहा हूं कि शेयर बाजार चार सौ अंक ऊपर खेल रहा है, अंबानी-टाटा-मुंजाल-बिड़ला-माल्या खुश होंगे,सीआईआई-एसोचैम-फिक्की खुश हैं...मित्तल-अम्बानी-मुंजाल-बिडला-माल्या सब खुश हैं...सब आपको को इस ‘साहसिक’, ‘दूरदर्शी’ और ‘ऐतिहासिक’ फैसले पर बधाई दे रहे हैं।

इसलिए डरिए मत प्रधानमंत्री जी,  किसी तृणमूल-सपा से लेकर भाजपा तक में इतनी हिम्मत नहीं है कि इस ‘राष्ट्रहित’ में काम करनेवाली सरकार को गिरा दे..?

यह तय है कि आपने यह काम राष्ट्रहित-किसानहित-उपभोक्ताहित में किया है। डीज़ल का क्या है, पश्चिमी देशों में तो वो पेट्रोल से ज्यादा महंगा बिकता है। है कि नहीं, प्रधानमंत्री जी। देखिए मेरे पेट में बल पड़ रहे है, हंसाइए मत।

Wednesday, September 12, 2012

पुस्तक समीक्षाः भारतः गांधी के बाद

अकादमिक रूप से इतिहास को अगर कोई पढ़ना चाहे, तो सारी पाठ्य-पुस्तकें सन 47 में यूनियन जैक उतारकर और लाल किले पर तिरंगा लहरा कर चुप बैठ जाती हैं। रामचंद्र गुहा की किताब इस आजादी के दौर से शुरु होकर आज तक की कहानी को विश्वसनीय तरीके से बयान करती है।

रामचंद्र गुहा ने जो किताब मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी थी, उसका हिंदी अनुवाद नहीं,रूपांतर किया है सुशांत झा ने। मैं इस किताब को अनुवाद नहीं, रूपांतर इसलिए कह रहा हूं क्योंकि अनुवाद जैसी बोझिलता किताब के किसी अनुच्छेद में दिखती नहीं।
इस किताब का हिंदी रूपांतर सुशांत झा ने किया है।


मूल किताब में एक ही खंड है और उसका नाम भी एक ही है, इंडियाः आफ्टर गांधी। लेकिन सुविधा को ध्यान में रखते हुए हिंदी में किताब के दो खंड हैं, पहला है भारतःगांधी के बाद और दूसरा है भारतः नेहरू के बाद।

हिंदी में यह किताब प्रवाहमान भाषा में लिखी गई है। एक अनुच्छेद से दूसरे अनुच्छेद तक कथ्य बहता-सा लगता है। भाषा में भी साहित्यक कड़ापन या गाढ़ापन नहीं है। शायद, भारतीय जनसंचार संस्थान से रेडियो टीवी पत्रकारिता का डिप्लोमा कर चुके सुशांत की यह आसान लेकिन असरदार भाषा उनके टेलिविज़न में काम करने के तजुरबे से हासिल हुआ है।

यह किताब उन वाकयो से शुरु होती  जहां से लगता है कि आजाद भारत सांप्रदायिकता , अभावों और गृहयुद्ध जैसे हालातों में बिखर कर रह जाएगा। लेकिन अपने पहले ही अध्याय '...और कारवां बनता गया' से लेखक स्थापित करते हैं कि भारत पहले विचार और बाद में मूर्त रूप में जरूर आया लेकिन यह विचार एक मजबूत लोकतांत्रिक सच्चाई में बदल चुका है।

गुहा ने अपनी किताब में क़द्दावर सूबाई क्षत्रपों के जीवन पर भी रोशनी डाली है। ये ऐेसे इलाकों के नेता थे जो यूरोपीय देशों से भी बड़े थे। वैसे, नेता के तौर पर रामचंद्र गुहा नेहरू के प्रेम में दिखते हैं और पटेल की भी तारीफ की गई है। वैसे हिंदू कोड बिल को लेकर लेखक अंबेदकर के पक्ष में दिखते हैं। फिर भी, लेखक ने पूरी किताब में इतिहासकारनुमा निष्पक्ष नज़रिया बरकरार रखा है , जो उनकी किताब को ऑथेंटिक बनाता है।

अंग्रेजी में गुहा कि भाषा निश्चित रूप से उन लोगों को अपली करेगी जिनके पास अंग्रेजी के संदर्भ होंगे और जिनके पास एक इतिहासबोध होगा, लेकिन सुशांत की हिंदी इस किताब को उन हिंदीवालों के लिए संदर्भ-पुस्तक के तौर पर खड़ी करती है, जो प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करते हों, या फिर आजादी के बाद के भारत की राजनीतिक घटनाओं पर अपनी बारीक निगाह रखना चाहतें हों।

सामान्य लोगों, यानी जिनकी हिंदी की समझ बहुत क्लिष्ट या साहित्यक  किस्म की नहीं है वो भी गांधी के बाद के भारत की घटनाओं पर अपनी समझ पैनी कर सकते हैं। दरअसल, रूपांतरकार ने संस्कृतनिष्ठ हिंदी की बजाय हिंदुस्तानी लिखने को तरज़ीह दी है, जो स्वागतयोग्य है।

हालांकि, कई जगह प्रूफ की गलतियां हैं और हालांकि को हलांकि और ऐसी ही कई हिज्जे की गलतियां है। लेकिन छपाई बढ़िया है और कलेवर भी। अंग्रेजी वाली मूल किताब की तुलना में हिंदी रूपांतर का कवर ज्यादा बेहतर बन पड़ा है और रंग संयोजन भी। उम्मीद है प्रकाशक इस किताब के अगले संस्करण में हिज्जे संबंधी गलतियों को सुधार देंगे।

किताबः भारतःगांधी के बाद
लेखकः रामचंद्र गुहा
हिंदी रूपांतरकारः सुशांत झा
प्रकाशक- पेंग्विन
मूल्यः 399 रुपये (फ्लिपकार्ट और होमशॉप 18 पर 33 फीसद छूट के साथ उपलब्ध)

Friday, August 31, 2012

...और अब गर्भाशय घोटाला!

(रजनीश प्रकाश प्रखर पत्रकार हैं, पुरुषों में गर्भाशय की खोज और निकाले जाने की घटना के बाद से काफी झल्लाए हुए हैं, उनका एक लेख छाप रहे हैं।)
 
घोटाला , करप्शन , स्कैम सुनते सुनते माथा पक गया है । कभी-कभी दिमाग झल्ला उठता है तो लगता है होने दो साले को , कुछ तो कहीं हो रहा है।... लेकिन मंगल ग्रह का मामला होता तो चलो जाने दो कह के चाय की चुस्कियों में डूबते-उतराते, लेकिन मामला पास-पड़ोस का है... आंखों को कब तक ताखे पर रखा जाए। यहां तो साला क्या आकाश (स्पेक्ट्रम) , क्या पाताल (कोयला ) सबको लोग-बाग बेचने में लगे है , मानो मंगल का हाट है शाम-रात तक बेचकर रफूचक्कर होना है। 
 
समस्तीपुर मेरा गृह जिला है , कई रिपोर्टें देखी है कि डॉक्टरों और अधिकारियों ने मिलकर हजारों गर्भाशय निकाल लिए... लिंगभेद का आरोप न लगे इसलिए केवल महिलाओं के ही नही बल्कि ढूंढ़-ढ़ांढ़ कर 12 पुरुषों तक के गर्भाशयों को भी अपनी चपेट में ले लिया उन्होंनें। 
 
पहले किडनी चोरी का हो-हल्ला था , डर इतना कि हॉस्पीटल से डिस्चार्ज होने तलक लोग-बाग सर से पांव तलक टटोल लेते कही कुछ गायब तो नही है ,कोई सिलाई-विलाई तो नही है , धागे का कोई छोर शरीर से बाहर तो नही लटक रहा । खैर बात समस्तीपुर और बिहार की ... बीमारी का भूत दिखाकर डॉक्टरों ने 16000 गरीब महिलाओं का गर्भाशय गायब कर दिया (अधिकांश रिपोर्टों में अधिकांश मामले संदेहास्पद की ओर ही इशारा कर रहे हैं , कुछ जेनुइन भी हो सकते हैं) । वजह इंश्योरेंस के पैसे को गड़प करना था। 
 
मेडिकल सांइस की ज्यादा जानकारी तो नही है लेकिन मेरे क्षूद्र भेजे में अब तक समझ नही आया कि गर्भाशय ही क्यो ? हो सकता है शायद गर्भाशय का भी ट्रांसप्लाट होता हो या फिर उन्हे फॉरेन एक्सपोर्ट कर दिया जाता हो। खैर अपना कंसर्न यह नही है , वैसे डॉक्टरों और क्लिनिकों ने सरकार पर 12 करोड़ का बिल ठोक दिया। 
 
हालांकि आंकड़ों के आकलन में नौसिखिया जैसा हूं लेकिन मैने सोचा आखिर चपत कितने की लगी है , अपने तई कुछ जोड़-घटाव-गुणा-भाग किया जाए। बीते कुछ महीने-सालों से कैग का हो हल्ला है और प्रीजंपटिव लॉस का जिक्र ही माहौल को खलबला देता है। गणित का कोई ज्ञाता नही हूं लेकिन बारहवीं तक पढ़ी है। मेरे दिमाग में ख्याल आया कि ऐसे में जबकि कोल और स्पेक्ट्रम की ठेलाठेली में किसी के पास फुरसत नही है तो कही प्रीजंपटिव लॉस के प्रीविलेज से गर्भाशय घोटाला सम्मानित होने से न बच जाए।
 
 देखिए मेरी आगे की कोशिश सामान्य गणित का सामान्य छात्र होने की है ।विशेषज्ञों को आपत्ति हो सकती है और होगी तो जायज ही होगी । खैर आंकड़ों के अभाव में कुछ चीजों को मोटा-मोटी मान लेते हैं , वैसे अगर किसी के पास कोई परफेक्ट आंकड़ा हो तो बता दे एकुरेसी का भला हो जाएगा । 
 
खैर इस दुर्घटना की शिकार यंग, ओल्ड और अंडरएज महिलाओं को मिलाकर मान लिया जाए कि इसकी शिकार एक महिला की औसत आयु 25 थी तो फिर बात आगे बढ़ाई जाए। जैसा कि सर्वविदित है प्रजनन योग्य आयुवर्ग के तहत विकासशील देशों में 15-44 उम्र की स्त्रियों को लेते है और भारत में औसत जीवन प्रत्याशा 64 साल के करीब है। 
 
देखिए मैं पहले ही बता दूं कि मैं जो कर रहा हूं , उसमें त्रुटियों की आशंकाएं पूरी पूरी है और संशोधनों की पूरी-पूरी गुंजाइश। खैर 25 साल से 44 साल के बीच एक महिला 19 बच्चे अधिकतम जन्म दे सकती है (कभी-कभी जुड़वा बच्चों के जन्म को यहां कंसीडर नही कर रहे हैं) । 
 
चूंकि गर्भाशय निकालने के अधिकांश मामले या कहे तो लगभग पूरे के पूरे ग्रामीण इलाके के बीपीएल तबके का ही प्रीविलेज मालूम होता है तो इस न्यायपूर्ण व्यवस्था में इस बात की लगभग पूरी-पूरी उम्मीद है कि ये संभावित बच्चे राष्ट्र निर्माण को अपनी मजदूरी के जरिए मजबूती देगें... और यदि मान लिया जाय कि ये अजन्मे बच्चे 14 साल बाद मनरेगा से जुड़ते है और फिर इसके साथ अपने रिश्तों को इतना प्रगाढ़ कर लेते है कि मृत्यु ही इन्हें मनरेगा से इन्हें मुक्त करती है तो बात अब आगे की कि जाय ।अब चूंकि केवल 100 दिन ही इसके जरिए इन्हें रोजगार मिलना है तो फिर आखिर कितने पैसे ये कमा लेते। मैने सोचा क्यूं न पहले एक सिंपल सा गुणा-भाग कर लूं।

16000x19x50x100x150 = 40,00,00,00,00,000

देखिए ये रकम 50 सालों में प्रतिसाल केवल सौ दिनों की है और उसपर भी न्यूनतम मजदूरी । फिर आने वाले पचास सालों में मजदूरी भी कुछ न कुछ बढ़ेगी ही और फिर शायद कुछ दिन भी। फिर बाकी के दिन भी तो कुछ न कुछ कमाएंगें ही। एक बात और बिहार में अभी मुख्यतया तीन चार जिलों के ही मामले सामने आए है । यानि आशंका इस बात की है कि अकेलें बिहार में ही ये लाखों करोड़ों के नुकसान का मामला बनता है , पूरे देश को याद करके तो घिग्घी ही बंध जाती है।
 
क्या कोल और क्या स्पेक्ट्रम, सबकी इज्जत पानी में मिलाने की कूबत है इसमें।

पोस्टस्क्रिप्ट- पुरुषों में गर्भाशय ढ़ूंढ़ निकालने वाले सम्मान के पात्र है, जीव विज्ञान और चिकित्साविज्ञान को शायद नयी ऊंचाइआं मिले इससे ... और समाजशास्त्रियों और नृतत्वशास्त्रियों को भी नया रोजगार मिल जाएगा , स्त्री-पुरुष संबंधों को भी नए सिरे से व्याख्यायित करना होगा। 
 
विज्ञान और समाज विज्ञान दोनों को ही मूलभूत परिवर्तनों से जूझना होगा। एक बात और शादी ब्याह के समय पूछे जाने वाले सवालों में कुछ नए सवाल जुड़ सकते है। मसलन लड़के वाले पूछ सकते है कि आपकी बेटी के पास गर्भाशय तो है न , वही गर्भाशययुक्त पुरुषों को बिना गर्भाशय वाली महिलाओं की तलाश में जुटना होगा।
---रजनीश प्रकाश

Tuesday, August 28, 2012

सुनो ! मृगांका:20 : हादसों की ज़द पे हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें?

अब तक आपने पढ़ाः अभिजीत अपने सारे बैंक-बैलेंस वगैरह अपने रिश्तेदारों के नाम करके गांव लौट रहा होता है। खजली स्टेशन पर उसने रिक्शा पकड़ा, और जब घर गया तो पता चला गांव के बंद मकान की चाबी उसके पास नहीं..फिर वह रिक्शेवाले के ही घर पर रुकता है। रिक्शेवाले के घर पर सुबह उठकर अभिजीत गांव के पोखरे तक जाता है और महंत जी के घर के पास जाता है-मंजीत)
 
बिसेसर ने झुककर खाली चौकी को ही दंडवत् किया। 

उसे झुककर प्रणाम करता देख, अभिजीत के मन में एक अजीब सी भावना जगी। संभवतः उसके मन के किसी कोने में मृगांका की याद हो आई थी, और वह याद कुछ ऐसी थी कि उसका रोम-रोम मुस्कुरा उठा था। 

हादसों की ज़द पे है तो मुस्कुराना छोड़ दें
ज़लज़लों के ख़ौफ़ से क्या घर बनाना छोड़ दें,

तुमने मेरे घर न आने की कसम खाई तो है
आंसुओं से भी कहो आंखों में आना छोड़ दें.

बारिशें दीवार धो देने की आदी हैं तो क्या
हम इसी डर से तेरा चेहरा बनाना छोड़ दें! 

थोड़ी देर बाद अंदर से महंत जी आ गए। बिसेसर ने एक बार फिर से प्रणाम किया, शिष्टाचारवश अभिजीत के हाथ भी जुड़ गए। अभिजीत ने देखा महंत जी अब भी बहुत तेजस्वी व्यक्तित्व के स्वामी थे। 
 
अभिजीत ने हमेशा धार्मिक कर्मकांडो की खिल्ली उड़ाई थी, अपने जीवन में। हमेशा ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती दी थी। मंदिर देखकर उसे याद आया। 
 
किसी असाइनमेंट पर निकलने का वक्त था। अगले अलसभोर की कोई फ्लाइट थी, मृगांका ने उसे मिलने के लिए खान मार्केट बुलाया था। कैफे कॉफी डे में जब अभिजीत उससे मिलने के लिए पहुंचा, तब तक करीब एक घंटे इंतजार कर चुकी मृगांका का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया था। वैसे अगर कहावत में आठवें या नवें आसमान का ज़िक्र होता तो शायद गुस्सा भी वहां पहुंच गया होता। 
 
मृग, कॉफी?
नहीं पीनी कॉफी-वॉफी, पियो अपने दोस्त प्रशांत के साथ।
अरे ये क्या
दरअसल, प्रशांत, अभिजीत का खास दोस्त था। दोनों भयंकर दारूबाज़। लेकिन खासियत ये कि दोनों में से कोई कभी भी दारू का ग़ुलाम न था, न ही पी के कभी बहके दोनों, न किसी से गाली गलौज की। बल्कि, पीने के बाद दोनों के दोनों, शांत, संयत, सुशील और शिष्ट हो जाते थे। अभिजीत की सृजनात्मकता तत्वसेवन के बाद चरम पर आ जाती थी। खैर..ये तो किस्सा और है लेकिन फिलहाल प्रशांत के साथ लेट होने की वजह से मृगांका बहुत गरम थी।
 
बेहद मान-मनौव्वल के बाद मृगांका थोड़ी नरम पड़ी। लेकिन यह थोड़ी सच में थोड़ी ही थी। कैफे में सौ लोगों की मौजूदगी में कान पकड़ कर माफी मांगने के बाद ही अभिजीत छूट पाया था। साथ में, उस शाम की बातचीत में मृगांका ने जगत्, ईश्वर, ब्रह्म और चर अचर जैसे विषयों पर एक लंबा व्याख्यान दिया था। जबकि उस रोज अभिजीत की इच्छा मृगांका को अपने बांहों में समेट लेने की थी।

उसे लग रहा था कि मृगांका इतनी निष्ठुर कैसे हो सकती है। लेकिन सयाने अभिजीत ने देख लिया कि इन बातों से उसकी झुंझलाहट का वह पूरा मजा ले  रही है और अपनी ट्रेड मार्क होंठ दबा कर मुस्कुराने का कोई मौका नहीं छोड़ रही। बातों ही बातों में मृगांका की उंगलियां अपने ही केश की लटों से खिलवाड़ करने लग जातीं।

सीसीडी की सीढ़ियों से उतरते वक़्त अभिजीत ने उसकी कलाई पकड़ ली थी। सुनो, मृगांका...

हां, कहो अभि...
 
कुछ गिफ्ट लाना चाहता हूं तुम्हारे लिए...अभिजीत ने उसे और अपनी तरफ खींचते हुए कहा।
तो कुछ ऐसा लाना जिसकी तुमसे मुझे उम्मीद भी न हो।
 
जरूर, कुछ ऐसा लाऊंगा जिसकी तुम उम्मीद भी नहीं करती होओगी...कहकर अभिजीत ने हल्के से उसके गालों पर चुंबन ले लिया। मृगांका उसे परे धकेलती हुई सीढियों से नीचे ले गई। बहुत बड़े गधे हो तुम...पब्लिक प्लेस है ये।
 
जस्ट फॉरगेट द पास्ट। 
 
अभिजीत की आंखों में पूरा पानी भर गया। एक गलत समीकरण...और पूरा जीवन तहस-नहस। न सिर्फ उसका बल्कि मृगांका का भी। क्या लग रहा होगा...क्या कर रही होगी मृगांका। 

महंत जी के साथ चलता हुआ अभिजीत गांव की सड़क पर आ गया। कच्चा रास्ता...कभी धूप कभी छांव का सा माहौल था। माहौल में ऊमस थी। 

दोनों एक तालाब के मुहार पर खड़े हो गए। गांव के लोग इस भीड भी कहते हैं। उसी भीड़ पर एक स्कूल है और स्कूल के दूसरे तरफ चौक है। ऐसे चौक परंपरानुसार हर गांव में होते हैं। चौक की दुकानों पर जरुरत के कुछ सामान बिस्कुट, हवा-मिठाई और दालमोठ वगैरह मिल जाते हैं। चौक है तो चाय की दुकाने है और चाय है तो पान कैसे नहीं।

चाय और पान की इन दुकानों में विश्वस्तर की राजनीति पर चर्चा होती है। साथ ही यह गृह कलह निवारण केंद्र भी है। यहां स्थानीय राजनीति और ऐसे ही कई दूसरे शगल पूरे किए जाते हैं। 

गांव में पुस्तकालय भी है। गांव में एकाध पढे-लिखे बचे लोग और पढाकू बच्चे वहां पढ़ने जाते हैं-ऐसी मान्यता है। पढ़ने कौन जाता है, कब जाता है और क्या पढ़ता है, यह शोध का विषय है। हां, कुछ बच्चे ज़रुर कांख में लोटपोट, नंदन और चंपक जैसी पत्रिकाएं लेकर निकलते हैं। कुछ तो गुलशन नंदा और वेदप्रकाश शर्मा के शौकीन हैं। आजकल रीमा भारती और केशव पंडित का क्रेज़ है.. जैनेन्द्र और प्रेमचंद की कहानियां पाठ्य पुस्तकों में ही ठीक लगती हैं। कोई इस पर ध्यान नहीं देता।


उसी पोखरे के किनारे एक मंदिर भी था, शिव का। अभिजीत को याद आया, ऐसे ही महाकाल के मंदिर का प्रसाद उसने अपने फोटोग्रफर के जरिए मंगवाया था। महाकाल के मंदिर के सामने मार्केट में  खड़े होकर वह सिगरेट फूंकता रहा। फोटोग्रफर थोड़ा अधेड़ था, इतना तो था ही कि मंदिर जाने के विचार मन में आने लगें (अभिजीत के हिसाब से)....वापस आकर उसने बताया कि महाकाल का जो प्रसाद लिया है वो चार-पांच दिन में खराब हो सकता है।

अभिजीत के लिए इस घटना की कोई  अहमियत नहीं थी, लेकिन बात मृगांका से जुड़ी थी। वापस लौटकर उसने मृगांका से कहा था, तुम्हारे लिए प्रसाद लाया हूं।

मृगांका चौंकी थीं...अच्छा, तुमने की पूजा?

पूजा तो नहीं की, प्रसाद लाया हूं लेकिन...

ठीक है, मैं ले लूंगी। कल आ जाना आईएऩए...दिल्ली हाट। ठीक पांच बजे शाम को। आजकल छुट्टी पर चल रही हूं...दीदी-जीजा आए हैं।

ओके

लेकिन अगले सात दिनों तक पांच नहीं बजा, रोज़ अभिजीत जाकर दिल्ली हाट पर खड़ा होता रहा, लेकिन कभी मृगांका आई नहीं। हर रोज़ अपने उस काले बैग को उठाए अभिजीत दफ्तर चला जाता, जिसमें प्रसाद भरा था। शाम को जाकर वह प्रसाद फिर से फ्रिज की शरण में रख दिया जाता। लेकिन भले ही भगवान् का हो, लेकिन उस प्रसाद का भी एक जीवन था, और जिसका जीवन होता है उसकी मृत्यु भी होती है।

प्रसाद आखिरकार सड़ गया। अभिजीत ने उसे कूड़े के हवाले कर दिया।

आठवें दिन मृगांका का फोन आया तो घर में चहलकदमी करते हुए अभिजीत ने उसे प्रसाद के खराब होने की बात बताई। मृगांका ने पूछा, फैंक दिया तुमने..?

नहीं, नहीं मृगांका फेंकता कैसे...खा लिया मिठाई समझ कर खा लिया।

महंत जी के साथ चलते -चलते अचानक अभिजीत को पेट में आग का तेज़ गोला बनता महसूस हुआ...लगा कि मौत नजदीक है। वह सड़क पर गिर पड़ा।


 
 

Sunday, August 26, 2012

अवतार कृष्ण का जाना, इतना सन्नाटा क्यों है भई?

अवतार कृष्ण हंगल की मौत को लोग एक 95 साल के बुजुर्ग अदाकार की मौत मानते होंगे। मैं नहीं मानता। ए के हंगल को मैं मौजूदा भारत में एक प्रतीक की मौत के तौर पर देखता हूं। आप अगर सिनेमाई भाषा से परिचित हैं तो आप मेटाफर और सिंबल यानी बिंब और प्रतीक से भी परिचित होंगे...आज सिनेमा जगत से एक धर्मनिरपेक्ष और बौद्धिक मार्क्सवादी प्रतीक चला गया।

आज के भारत को देखिए, कोकराझार है, मुंबई में उन्माद है, बेंगलुरु से पलायन करते पूर्वोत्तर के लोग हैं...धार्मिक चरमपंथ है, दिल्ली में प्रधानमंत्री के घर के सामने प्रदर्शन करते और पानी की बौछारें झेलते राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से भरे सामाजिक कार्यकर्ता हैं...देश अनिर्णय और संभ्रम का शिकार है। ऐसे ही वक्त में एक प्रतीक पुरुष आता है या फिर अंधियारे को और गहरा देने के लिए चला जाता है। अवतार कृष्ण हंगल की मौत ऐसे ही अमावस का प्रतीक है।

उन्माद को कम करने वाला वह बुजुर्ग मौलाना ही ए के हंगल है, जो गांववालों को कहता है कि पूछूंगा ख़ुदा से उसने मुझे गांव पर क़ुरबान करने के लिए दो-तीन और बेटे क्यों न दिए। यह एक दृश्य महज एक फिल्म का दृश्य नहीं, इसमें लेखक-निर्देशक ने चाहे जो सोच कर उनसे करवाया हो, लेकिन सच है कि यही बाव उनकी निजी जिंदगी का सच भी था।

उनकी आत्मकथा पढ़ रहा था, उनने ज़िक्र किया है संभवतः बाबरी विध्वंस की घटनाओं के दौरान किसी चमरपंथी ने कार्यकर्ताओं को कहा था कि ए के हंगल मत बनो और सदभावना के उपदेश मत झाड़ो, चलो आगे बढ़ो। यह वाकया ही ए के हंगल की छवि के लिए काफी है।

ऐसा नहीं कि ए के हंगल की यह सिनेमाई छवि बस परदे तक ही सीमित थी। निजी जिंदगी में भी उनके मकसद, उनकी विचारधारा हमेशा सांप्रदायिक सद्भाव की थी और वामपंथ के प्रति उनका झुकाव तो खैर जगजाहिर ही है। रंगमंच के लिए प्रतिबद्ध इस कलाकार ने हमेशा इप्टा के लिए काम किया, उसके लिए चंदा जुटाया और कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव से लगातार संपर्क में बने रहे थे।

उनकी अदाकारी कहीं से लाउड नहीं थी, संवाद रट कर अदा करने की बजाय हमेशा उसे समझ कर बोला हंगल साहब ने, अपने जीवन के शुरुआत में उन्होंने टेलरिंग में कौशल हासिल किया था। कताई की उनकी हाथ की सफाई उनकी अदाकारी में भी दिखती रही और निजी जीवन में भी, जहां आखिर तक एक भी वैचारिक सूत उनने उधड़ने न दिया।

अब जबकि सिनेमा में ज्यादातर औसत प्रतिभा वाले सितारों की भीड़ है और उनमें से भी अधिकतर की बौद्धिक क्षमता भी औसत से खराब ही है...ए के हंगल जैसे प्रतिबद्ध बौद्धिकों का जाना, सिनेमा का नुकसान भी है और रंगमंच का भी।