Thursday, December 27, 2012

ले बलैया...इ साल भी गया!

ससुरा इहौ साल बीत गया।  हम मान कर चल रहे हैं कि बीत गया। सब निगोड़े रोते रहे। वही महंगाई, वहीं मुद्रास्फीति, वही 32 लाख रूपये का गुसलखाना...सॉरी मूत्रालय...वही मैंगो पीपल, जो 32 रुपये में शहर में रह लें, 26 रूपये में गांव में बसर कर लें।

समस्या कहां है?

समस्या तब आती है जब देवी महात्म्य का पाठ करने वाले देश में फोटो को फेवीकोल से चिपकाय लिया जाता है। जब सप्तशती का पाठ करने वाले देश में छह लोग एक छात्रा के साथ रेप करते हैं।

समस्या अब भी नहीं है। आम आदमी अब एक क्लीवलिंग न होकर (संस्कृत वाला क्लीव लिंग जिसे अंग्रेजी में न्यूट्रल जेंडर कहते हैं) एक पार्टी बन गई है। ये नहीं पता कि इस संगठन में कितने मैंगो पीपल हैं।

यह साल हमेशा याद रहेगा। इस साल के बारे में एक ज्योतिषी ने मुझसे कहा कि तुम विश्वप्रसिद्ध हो जाओगे। हम नहीं भए। हां, उस ज्योतिषी को हमने बहुत ठोंका।

इस साल भी हम उसी तरह गरीब रहे, जितने 2010 में थे। इस साल भी हम पर कर्ज उतना ही रहा, जितना पिछले साल के आखिर में था। इस साल भी हमारे सपनों की मेढ़ उतनी ही कच्ची रही, जितनी पिछले बरस रही थी।

इस साल सपने देखने की आदत छुड़ा दी, तो सपनों के बीज भी रोप दिए।

यह साल भी ऐसा ही रहा। उसी तरह बेसिरपैर की फिल्में, उसी तरह रोज रोज की नौकरी, उसी तरह मॉनसून कमजोर होना, उसी तरह मंदी, उसी तरह ओबामा, उसी तरह ईरान, इराक़, मिस्र (सुना था मिस्र में तहरीर चौक पर कुछ हुआ...अब हंसी आती है उस पर। हमारे यहां एक बात कही जाती है, फॉर ऐनी रिवॉल्यूशन यू नीड टू हैव अ रिवॉल्यूशनरी आईडियोलजी एंड अ रिवॉल्यूशनरी पार्टी, किसी भी क्रांति के लिए एक क्रांतिकारी पार्टी और क्रांतिकारी विचारधारा की जरूरत होती है)

ये दोनों रामलीला मैदान के कारपोरेट आंदोलन और दिल्ली गैंप रेप में नदारद रहे।

सरकार से बलात्कारियों को तुरंत फांसी पर लटकाने की बेसिर-पैर की मांगे की गईँ। पहली मांग सुषमा स्वराज ने की, जो खुद वकील रह चुकी हैं। उन्हें भी पता होगा कि धारा 376-जी में अधिकतम सज़ा उम्र क़ैद हो सकती है।

खैर...। अगले मंगलवार को, जब नए साल का आग़ाज़ होगा तो यक़ीन मानिए कुछ नहीं बदलेगा। चौराहे पर वही कड़े दिखने वाले घूसखोर पुलिस अधिकारी मिलेंगे, अस्पताल में वही चिड़चिड़े से डॉक्टर मिलेंगे, दफ्तर में वही राजनीति पर उतारू मुंह पर मीठा बोलने वाले सुगरकोटेड लोग मिलेंगे, वही बॉस मिलेगा, जिसको हमेशा आपकी क्षमता पर संदेह होगा....सब्जी भाजी वाले उसी तरह हर रोज आलू प्याज दाम बढ़ाकर बेचते नजर आएंगे।

संसद में अगले साल भी सांसदो का वेतन वृद्धि वाला विधेयक सर्वसम्मति से पारित होगा। अगले साल भी मुलायम पिछड़ो और मुसलमानों को गोलबंद करते दिखेंगे, मायावती दलित कार्ड खेलेंगी, अगले साल मोदी अपने किले की नींव मजबूत करते दिखेंगे, ताकि उसी किले के बुर्ज से 15 अगस्त 2014 को राष्ट््र को संबोधित कर सकें।

नक्सल समस्या जस की तस बनी रहेगी, पाक से हम क्रिकेट खेल लें, दोस्ती दुश्मनी की सरहद बनी रहेगी, हमारे पीएम भी ओबामा की फोटो देखकर ही मुस्कुराएंगे, वरना साल भर उनकी मुस्कुराहट भी ईद का चांद बनी रहेगी....

दंतेवाड़ा, सांरडा में फिर कुछ पुलिस कर्मी शहीद होंगे, फिर उन्हें कुछ सम्मान दिया जाएगा। यानी अगले दिसंबर की इन्हीं आखिरी तारीखों में यही-यही सब लिखना होगा, जो हम इस साल लिख चुके हैं। हां, कुछ आंकड़ों में फेरबदल हो सकता है, कुछ तारीखों में बदलाव होगा।

लेकिन हम बदलेगे नहीं, क्या आपको लगता है कि गैंप रेप से जुड़े मसलों पर फांसी दे देने से भी बाकी के छुपे अपराधियों की मानसिकता बदल जाएगी? जनाब, हम लोग बदलने वाली क़ौम नहीं हैं।

 हम कष्ट सहते रहेंगे, बिना हैंड पंप के रह लेगें, हमारे गांव में भले ही चलने को सड़क न हो...लेकिन हम वोट तो अपनी ही जाति में देंगे।

साल 2012 और 2013 में कुछ खास अंतर नहीं होगा, सिवाय अंकों के...और हां, मैं सुनो मृगांका के कुछ और सिसकते पन्ने इस बेव की वर्चुअल दुनिया में डाल चुका होऊंगा।



Wednesday, December 12, 2012

...और क़यामत नहीं आई


क़यामत भी नेताओ और माशूकाओं की तरह धोखेबाज़ है। आते, आते नहीं आती है। वायदा करती है और नहीं आती है। कई साल से टीवी वाले चीख रहे थे, 12 दिसम्बर 2012 को क़यामत आएगी। हम भी बड़ी शिद्दत से क़यामत का इंतज़ार कर रहे थे। हम बहुत नजदीक से देखना चाहते थे कि क़यामत आखिर होती कैसी है। सुना था क़यामत के रोज़ क़ब्र से मुरदे उठ खड़े होंगे और सबके पाप-पुण्य का हिसाब-किताब होना है।

हम डरे हुए थे, बड़ा एंडवेंचरस से विचार आ रहे थे। काहे कि हम पापियों की श्रेणी में गिने जाते हैं।

फिर मन में बड़े गहन विचार उत्पन्न हुए आखिर क़यामत है क्या..। लोगों ने समझाया कि इस के बाद धरती पर सारे लोग खत्म हो जाएंगे। धरती लोगों के रहने लायक नहीं रह जाएगी। एक सवाल अपने आप सेः धरती अभी लोगों के रहने लायक है क्या?

कुछ लोग अपनी महबूबा को क़यामत सरीखा मानते हैं, कुछ अपनी पत्नी को कहते तो शरीक-ए-हयात हैं लेकिन मानते क़यामत ही हैं। पहले पत्नियों वाली बात। बीवी को क़यामत ने मानने वालों के लिए, श्रीमतीजी का जन्मदिन, उनके भाई का जन्मदिन, अपनी शादी की सालगिरह की तारीख़ भूलकर देखिए (यद्यपि हमारा विचार है कि यह तारीख़ भूलने योग्य ही हुआ करती है।) आपके लिए वही तारीख़ क़यामत सरीखी हो जाएगी। उस दिन कायदे से क़यामत बरपा होगा आप पर।

आपकी महबूबा ने फोन पर आपसे कहा, फलां दिन मिलते हैं। किस जगह, किस वक़्त, ये बाद में बताने का वायदा। फिर आप तैयार होना शुरु करते हैं...सिगडी़ पर दिल सेंकते हुए, तेरा रास्ता देख रहा हूं, गुनगुनाते हुए...आपकी क़यामत सरीखी महबूबा, जिनकी आंखों, भौंहों, पलकों, अलकों (बाल की लटों) बालों, गालों, गाल पर के तिल, होठों, मुस्कुराहट, गरदन, ठोड़ी, कलाइयों, कलाई के ऊपर के एक और तिल, कमर सबको एक-एककर क़यामत बता चुके हैं।

सोमवार को आपने उनके चलने को क़यामत कहा था। मंगलवार को उनकी मुस्कुराहट से क़यामत आई थी। गुरुवार को उऩकी आवाज़ क़यामत सरीखी थी। शुक्रवार को वो क़यामत का पूरा पैकेज लग रही थी। मतलब सर से पैर तक क़यामत ही क़यामत। बहरहाल, आपने तय किया था कि इसी क़यामत से मिलकर क़यामत की घटना को सत्य ही घटित करना...लेकिन असली क़यामत की बारी तो अब आती है।

आप टापते रह जाते हैं। आपके जिगर पर छुरी चल जाती है। लड़को का जिगर प्रायः छुरियों के नीचे ही पड़ा रहता है। आपकी उनने कुछ किया या न किया, आपकी तरफ देखा, नहीं देखा, आपसे समय पूछा, हंसी, नहीं हंसी, आज उनने जीन्स पहनी है, आज उनने सलवार सूट पहना है, आज उन्होंने आपकी तरफ देखा, आज उनने आपकी तरफ देखकर थूका नहीं...आपको वह क़यामत लगेगी। आपके दिल पर छुरियां चल जाएगी।

बहरहाल, ये तो बहुत निजी क़िस्म की क़यामतें हैं। जहां प्रेमिकाएं अपने प्रेमी से फायरब्रिगेड मंगवाने की इल्तिजा करती हों, जहां प्रेमी को प्रेमिका का प्यार हुक्काबार लगे, या तस्वीर को फेविकोल से चिपका लिया जाए वहां बाकी की क़यामतों पर क्या नज़र जाएगी।

पिछले दिनों राज्यसभा में रिटेल में एफडीआई पर बहस के दौरान क़यामत आती-सी लगी। आई नहीं, ये बात और है। विपक्ष सरकार पर टूट पड़ा, रिटेल में एफडीआई आ गया तो हुजूरेआलिया क़यामत आ जाएगी। सरकार की तरफ से मंत्रियों ने कहा, अगर एफडीआई नहीं आय़ा तो क़यामत होगी।

दीपेन्द्र हुडा ने सुषमा को कहा आंटी जी हम हरियाणा में 24 इंच का आलू उगाएंगे, यह भी कम क़यामत न था। इन सबपर भारी था मनमोहन सिंह करीब डेढ़ सेकेन्ड तक मुस्कुराते रह गए थे। सामने अमेरिका का कोई राष्ट्रपति नहीं था, फिर भी मुस्कुरा रहे थे। प्रधानमंत्री की मुस्कुराहट आधा या पौन सेकेन्ड और जारी रहती तो अल्लाहक़सम क़यामत उसी रोज़ आ जाती...।

क़यामत भी नेताओ और माशूकाओँ की तरह धोखेबाज़ है। आते, आते नहीं आती है। वायदा करती है और नहीं आती है। हमको लगा अब न्याय होगा। लेकिन क़यामती न्याय की झलक नहीं दिखती। क़यामती पत्रकारिता करने वाले, स्वर्ग की सीढी खोजकर दुनिया को सीधे स्वर्ग स्थानांतरित करने वाले महान् पत्रकारों की जमात किसी और सीढ़ी की तलाश कर रही है।

खैर...लोग कहते हैं क़यामत नहीं आई। लेकिन, महंगाई के दौर में, रसोई गैस से लेकर पानी तक पहुंच से दूर पहुंचने के दौर में, और उस दौर में जब क़यामत वायदा करे और न आए...हम बाकायदा ज़िंदा है यह क्या कम क़यामत है?

Monday, December 3, 2012

भोपाल गैस त्रासदीः दो कविताएँ

ह भीड़ नहीं - भेड़ें थी ।
कुछ जमीन पर सोए सांसें गिन रही थीं।
दोस्तों का रोना भी नसीब न था।
 

चांडाल नृत्य करता शहर,
ऐ दुनिया के लोग;
अपना कब्रगाह या श्मशान यहां बना लो।
 

अगर कुछ न समझ में न आए तो,
एक गैसयंत्र और यहां बना लो।
 

मुझे कोई अफसोस नहीं,
हम तो पहले से ही आदी थे इस जहर के,
फर्क सिर्फ इतना था,
कल तक हम चलते थे, आज दौड़ने लगे।
कफ़न तो मिला था,
पर ये क्या पता था?
एक ही कफ़न से दस मुर्दे जलेगें,
जलने से पहले बुझा दिये जायेगें,
और फिर
दफ़ना दिये जाएंगें।



कवि का नामः पता नहीं कर पाए,
[प्रकाशित- दैनिक विश्वमित्र, कोलकाता, 2 दिसम्बर, 1987]
 

लती ट्रेनों में,
जिन्दा लाशों को ढोनेवाला,
ऐ कब्रगाह- भोपाल!
तुम्हारी आवाज कहाँ खो गई?
 

जगो और बता दो,
इतिहास को।
तुमने हमें चैन से सुलाया है,
हम तुम्हें चैन से न सोने देगें।
 

रात के अंधेरे में जलने वाले,
ऐ श्मशान भो-पा-ल....
जगो और जला दो,
उस नापाक इरादों को।
जिसने तुम्हें न सोने दिया,
उसे चैन से सुला दो।



[प्रकाशित- दैनिक विश्वमित्र, कोलकाता, 28 दिसम्बर, 1987]


दोनों कविताएं सौमित्र भाई के सौजन्य से हासिल हुई हैं। भोपाल त्रासदी की बरसी पर मासूमों और निर्दोष जानों को समर्पित....

सुनो ! मृगांका :27: साक़ी शराब ला, कि तबियत उदास है...

अभिजीत की बांहो का घेरा कसता जा रहा था...मृगांका नींद के आगोश में डूबती चली गई। डूबती चली गई। इतनी गहरी और आश्वस्तिदायक नींद थी कि लगा मृगांका इतनी अच्छी नींद में पिछले दो साल से सोई ही न थी।

सुबह नींद से जगी तो कपैटड़े संभलाते हुए मृगांका ने देखा, अपनी देर तक सोने की आदत के विपरीत अभिजीत उठकर बिस्तर से बाहर था।

वह बाहर आई...देखा लॉन में बैठकर अभिजीत की मां और मम्मी चाय की घूटें ले रहे हैं।

मम्मा अभि कहां है, मां जी, उठ गया वो?

अभिजीत और उसकी मम्मी की आंखों में सवाल उभर आए...

बेटा, सपना देखा था कोई?


उधर, गांव में  क़िस्सा खत्म नहीं हुआ था, लेकिन बैठक खत्म होने को आई। गांव से जुड़ी कुछ समस्याओं को लेकर अभिजीत गांव का दौरा करना चाह रहा था। लेकिन अगले दिन न तो मुखिया जी खाली थे न ही महंत जी। महंत जी ने कहा, आपके साथ उगना चला जाएगा. इस पूरे इलाके का चप्पा-चप्पा इसको पता है।

अगले दिन अलसभोर में ही उगना ने अभिजीत को जगा दिया।

दोनों साथ निकल पड़े थे। पैदल ही।

चलते-चलते  बहुत देर हो गई। उगना भी चुप था और अभिजीत भी। अभिजीत कच्चे रास्ते की मैदे सी बारीक धूल को देखता चल रहा था। कुछ ही देर में उसे भूख लग आई।

अपने रिपोर्टिंग के दिनो में उसने भूख पर काबू पाने के नायाब तरीके खोज निकाले थे। लेकिन, मृगांका..वो ऊंचे दरज़े के खानदान की थी। उसे हाइज़ीन और सेहत से जुड़ी साफ-सफाई का बहुत ध्यान रहता था।

याद आया उसे दो दिनो केलिए मृगांका बाहर गयी थी। बात तब की है जब अखबार छोड़कर उसने एक बड़े से खबरिया चैनल में नौकरी कर ली थी।

इस नई नौकरी के लिए अभिजीत ने बहुत जोर दिया था। गोकि मृगांका अखबार में नौकरी करते हुए अभिजीत से रोज ब रोज़ मिलने का वो मौका छोड़ना नहीं चाहती थी। अभिजीत की इच्छा थी कि मृगांका उसे एंकरिंग करती दिखाई दे।

मृगांका को अभिजीत की बात माननी ही पड़ी थी। लेकिन, दो दिनों के लिए बाहर गई मृगांका के लिए मुसीबत खड़ी हो गई। मृगांका बाहर न तो खा सकती थी न ही कुछ निवाला उसके हलक के नीचे गया।

दो दिनों तक सांस अटकी रही थी अभिजीत की भी...। कितनी बार कहा था मृगांका को, बैग में ड्राइ फ्रूट्स रखा करो, चॉकलेट रखा करो। लेकिन वो भी अपनी जगह जिद्दी ही थी।

अल्लसुबह घर से निकली मृगांका उस दिन देर रात गेस्टहाउस पहुंची थी, दिन भर की भूखी। अभिजीत ने सोचा था कि जब तक मृग खुद खाकर उसके बता नहीं देगी कि उसने खा लिया है, तब तक वह भी नही खाएगा...लेकिन ऐसा हो नहीं पाया था।

क्यों न हो पाया था. ये बड़ी हंसी वाली बात है। उस दिन असल में खाया तो सच में अभिजीत ने कुछ तो सही में नही, लेकिन पीने से खुद को रोक नहीं पाया था। पीने के साथ कुछ चबेना तो चाहिए ही था.....इसलिए जब तक मृगांका नहीं खाएगा वाला प्रण अधूरा रह गया था। सिगरेट की छल्लों वाले धुएं में उसे मृगांका का चेहरा दिखता रहा था रात भर।

उगना आगे आगे चल रहा था। उसके पैर पतले-पतले थे। चलते समय ऐड़ियां पैरों की बनिस्बत आसपास गिरती थीं...बिलकुल दुबला...। सिर के बाल भूरे, कुपोषण का शिकार।

पढ़ना जानते हो उगना...अभिजीत ने बातचीत का सूत्र पकडा.
नहीं।
पढ़ते क्यों नहीं..
पढने जाएंगे तो छोटी बहन का पेट कैसे भरेगा।

अभिजीत निरुत्तर रह गया। अच्चा तुमको वो उगना वाली कहानी याद है?

हां, सुनोगे क्या
सुनाओ

एक दिन महाकवि विद्यापति कहीं जा रहे थे, रास्ते में उनको प्यास लगी, यहां तक की कहानी तो आप जानते ही हैं। अभिजीत ने हामी भरी।

तो कवि विद्यापति ने उगना से कहा कि कहीं से पानी लेकर आओ। आसपास कहीं कोई कुआं नहीं, न को ई तालाब....चारों तरफ सूखा...

अभिजीत ने देखा, चारों तरफ सूखे खेत थे। धान की कटाई के बाद पौधों की ठूंठें थीं...। खेत की जमीन में दरारें पड़ी थीं।

उगना पानी पिलाओंगे।

हां मालिक।

उगना पानी लेने चला गया।

थोड़ी देर बाद लौटा तो लोटे में पानी था। अभिजीत ने पानी पिया, आठ सौ साल पहले महाकवि विद्यापति ने भी पानी पिया था। अभिजीत ने देखा, पानी एक दम साफ निर्मल और स्वच्छ था..उसे याद आया गंगोत्री गया था वो, अपनी बुलेट पर। पीछे थी मृगांका...तो गोमुख के पास गंगा का पानी भी इतना ही निर्मल था।

पानी कहां से लाए हो उगना। अभिजीत ने पूछा, इक्कीसवीं सदी में, विद्यापति ने पूछा था ग्यारहवीं सदी में।


...जारी





 

Friday, November 30, 2012

सुनो! मृगांका:27: तारे सब बबुना, धरती बबुनिया

अभिजीत खिड़की से कूद कर आया था, उसने कहा था कहा चोरी से मिलने का मज़ा हमेशा मीठा होता है।

अचानक मृगांका को लगा कि उसकी गरदन के पीछे किसी ने हल्का किस किया है। एक दम हल्का। कुछ ऐसा ही स्पर्श था, जैसे अभिजीत करता था। वह लेटी ही रही। फिर अचानक हाथ सरकता हुआ उसके कमर के इर्द-गिर्द लिपट गया। वह चिहुंकी, वह पलटी तो  देखा....

अरे, अभिजीत तुम?

अभिजीत की आंखों में शरारत नाच उठी थी। उसने देखा, मृगांका ने बहुत गहरे रंग की लिपस्टिक लगाई थी..लापरवाही से पहनी एक टी शर्ट...शायद हल्के पीले रंग का।

अभिजीत ने कहा, सरसों का फूल लग रही हो।

श्शशश....तुम्हारी मां आई है।
कहां
मेरी मां के कमरे में सो रही होंगी...या शायद गपें मार रही होंगी....लेकिन तुम्हें नहीं पता, अभि...मां तुमसे कितना प्यार करती हैं। तुमको हमेशा लगता रहा कि वो तुमसे प्यार नहीं करतीं...तुम हमेशा कहते रहे कि मां को अचार के मर्तबान मुझसे ज्यादा प्यारे हैं...तुम हमेशा अकेलेपन की शिकायत करते रहे...अभि...मां बहुत दुखी थीं...अभि...

और तुम मृग...

जवाब नहीं दिया मृगांका ने। बस फफक पड़ी।

कमरे में इस रुलाई से कोई भारी पन नहीं आय़ा था। मृगांका जारी रही, अभि, पता है तुम्हारे बिना मैं कितनी अधूरी थी। कहां चले गए थे, क्यों चले गए थे...तुमसे कभी कुछ नहीं कहा...तुमसे हमेशा कहा तुम अपनी तमाम अच्छाईयों और बुराईयों के साथ मेरे हो...फिर क्यों चले गए थे बिना बताए....

अभिजीत ने अपने दोनों हाथों में बस मृगांका का चेहरा पकड़ रखा था। मृगांका के गरम आंसू उसकी हथेलियों की कोर भिंगो रहे थे।

बाहर आसमान में चौदहवीं का चांद पूरे शबाब पर था। बादल का कोई आवारा टुकड़ा कहीं दूर तलक न था। साहिर लुधियानवी से लेकर गुलज़ार और जालेद अख्तर से लेकर सर्वेश्वरदयाल सक्सेना तक की,तमाम बड़े और शानदार कवियों की कविताएं एक साथ साकार हो रही थीं।

हवा में नमी थी। मौसम गरम था। अभिजीत के सीने को मृगांका भिगोए जा रही थी।

कमरे में बत्ती मद्धिम जल रही थी। मृगांका के घर के टैरेस पर कई पौधे थे, जिनको अभिजीत के कदमों की आहट की पहचान थी। हर पत्ते को अभिजीत को छुअन की याद थी। अभिजीत की आदत थी, किसी भी पेड़ के पत्तों को छूकर देखना, मृगांका के टैरेस की लता को, उसके हरेपन को अभिजीत की छुअन याद थी...।

दोनों टैरेस पर आ गए थे। तीन साल विरह के, तीन साल दूरियों के, शिकायतों के...कितना कुछ कहना है मृगांका को...कितनी सारी शिकायतें करनी है अभिजीत से...कितना पीटना है उसे उस तकिए से, जिससे मारने से वाकई बहुत चोट आती है। क्या करे मृगांका...रुठ जाए?

नहीं, कितना रोई है अभि के लिए, रूठेगी नहीं। तकिए से पीटेगी उसको...लाख मिन्नतें करे, इस वक्त चाय बनाकर नहीं देगी।

सुबह होते ही मां के सामने खड़ा कर देगी इसे...मां के सामने, जिनने कितने प्यार से सर फेरा था उसके सर पर। अभि के भाई-भाभी को भी अपने दल में कर लेगी, फिर देखेंगे अभिजीत को,....मृगांका न जाने क्या सोच रही थी। अभिजीत की बांहो का घेरा कसता जा रहा था।

...जारी


 

Monday, November 26, 2012

हा सचिन! हा हा सचिन

बात तब की है जब हमारी मूंछों के बाल उगे नहीं थे। तब तक सन् 94 नहीं आया था। तब तक सचिन ने सिंगर कप में पहला सैकड़ा नहीं जड़ा था। लेकिन तब भी, वो अपने खेल और अपने अंदाज़ और अपनी प्रतिबद्धता से इतने लोकप्रिय हो चुके थे कि बूस्ट का विज्ञापन करती और लोकप्रिय क्रिकेट पत्रिका क्रिकेट सम्राट में छपा उनका पोस्टर  हमारी पढ़ने की मेजो के सामने आकर चिपक गया था।

पोस्टर बनकर चिपकने वाले सचिन आज कहां चिपक रहा है, कहां खो गया है हमारा सचिन। हमें लग रहा था कि कुछ खराब प्रदर्शनों के बाद सचिन अपनी लय में लौटेंगे। न्यूज़ीलैंड के खिलाफ़ हमें लगा था कि सचिन शतक न जड़ें, लेकिन अच्छा खेलेंगे। हम 4-0 से हारे।

मैं पराजयों के आंकड़ो में यकीन नहीं करता। लेकिन सचिन का इस तरह पराजयी भाव दिखाना, एक राष्ट्र के रूप में हमें पस्त करता है। हमने महंगाई झेल ली, हम बेरोजगारी झेल गए, हम तस्करी घोटाले सब झेल गए, क्योंकि परदे पर पहले अमिताभ ने हमारे गुस्से को आवाज दी, और फिर इन्ही निराशा-हताशाओं से उबारने के लिए ज्यादा आक्रामक सचिन तेंदुलकर हमें मिला।

वही, तेंदुलकर, जिसने  ऑस्ट्रेलिया से लेकर इंगलैंड सबको धुना...पाकिस्तान के सामने, जिसे हम धुर विरोधी मानते आए हैं, हमारी पराजय का सिलसिला खत्म किया...आज घुटने टेक रहा है।

यह मसला सिर्फ एक शख्स के संन्यास का नही। चालीस की उम्र के पास पहुंच रहे व्यक्ति को जिसने राष्ट्र के लिए और अपने लिए भी ढेर सारी इज़्ज़त कमाई हो, उसे संन्यास का फ़ैसला खुद लेने देने की छूट मिलनी चाहिए। लेकिन, क्या सचिन 200 टेस्ट मैच खेलने का रेकॉर्ड कायम करने के लिए रूके हैं।

मैं सचिन को लेकर भावुक हो जाता हूं क्योंकि एक आम हिंदुस्तानी की तरह सचिन हमारे दिलों में बसते हैं। रणजी मैच में कितना अच्छा खेले थे सचिन। अब क्यों छीछालेदर करवा रहे हैं।

हम ये कत्तई नहीं चाहते कि सचिन हर मैच में सैंकड़ा ठोंके। हम चाहते हैं कि अगर लोग उन्हें सम्राट, या गॉड कहते हैं, तो उस पदवी के साथ वो खुद न्याय करें। जिस पिच पर पुजारा खेल सकते हैं, जिसपर गंभीर रूके रहे...इन दोनों क्रिकेटरों का कुल अनुभव सचिन के रणजी अनुभव से ज्यादा नहीं।

अब या तो सचिन ज्यादा सावधानी के चक्कर में पिट रहे हैं, या फिर उम्र उन पर हावी होती जा रही है।

अपने नायक की ऐसी दुर्गति मुझे बर्दाश्त नहीं हो रही...सचिन, मैं अपने बेटे को अज़हर, मोंगिया, या जडेजा नहीं बनाना चाहता था. मैं उसे धोनी या सहवाग भी नहीं बनाना चाहता था। आप ऐसे विहेब करेगे, तो मैं उसे कैसा बनने को कहूंगा।

याद रखिए सचिन, ईश्वर एक वर्चुअल पद है...और उसे भी एक दिन संन्यास ले लेना चाहिए, वो भी बाइज्ज़त।




Thursday, November 22, 2012

सुनो ! मृगांका :26: अब मुझको भी हो दीदार मेरा

मृगांका और प्रशांत जब ड्रॉइंग रूम में आए तो देखा सोफे पर एक महिला बैठी हैं। गौर वर्ण, हिमालय की बर्फ सी धवल केशराशि, भौंहे भी सफेद हो चलीं थीं, सफेद तांत (सूती) साड़ी में लिपटीं महिला...। मृगांका को देखते ही उठ खड़ी हुईं।

प्रशांत ने मिलवाया, भाभी, अभिजीत की मां हैं ये..

जानती हूं...मृगांका मिली नहीं थी कभी अभिजीत की मां से। लेकिन तस्वीरों के जरिए पहचानती थी। मृगांका ने पैर छू लिए। बुजुर्ग महिला ने सिर पर हाथ फेर कर पता नहीं क्या आशीर्वाद दिया, लेकिन उसके ठीक बाद आंखों की कोर से मोतियां झिलमिलाने लगीं।,

बेटा अभि कहां है?

मृगांका चुप रही। प्रशांत ही बोला, चाचीजी, अभिजीत को लेकर ही हम भी परेशान हैं।

तुम क्यों परेशान हो, तुम तो साथ रहते थे, तुम्हें भी नहीं पता? अभिजीत की मां ने एक वक्र दृष्टि प्रशांत पर डाली, तो वह सकपका गया। लेकिन मृगांका से मुखातिब होते ही मां की आवाज़ में मुलायमियत आ गई।

बेटा तुम्हें तो पता होगा...दो महीने पहले घर आया था अभिजीत...अपनी सारी जमापूंजी हमें सौंप गया। बैंक-बैलेंस, फ्लैट की चाबी...उस वक्त तक तो मैं अपने धर्म-कर्म में ऐसी लीन थी, कि कभी याद ही नहीं रहा कि बेटे की तरफ, जवान बेटे की तरफ भी ध्यान देना मेरा धर्म ही है...पता नहीं कहां चला गया। न फोन मिलता है ना कुछ...

प्रशांत को लगा वह यहां से नहीं हटा, तो कलेजा फट जाएगा। मृगांका के पिताजी और प्रशांत किनारे जाकर खड़े हो गए। मृगांका, मां को अपने कमरे में ले गई।

रात के खाने के बाद जब अभिजीत का मां और मृगांका की मां अपने-अपने हिस्से की बातें करने लॉन में चले गए, तो मृगांका बिस्तर पर औंधी मुंह लेटी रही...और पता नहीं कब तक लेटी रही।

...फिर चांद निकल आया और कहीं से उड़ता आया एक बादल का टुकडा

औंधी मुंह ही लेटी थी मृगांका...चांद को चारों ओर से उस मेघ ने घेर रखा था...समझ लीजिए उजाला था भी नहीं भी...सन्नाटा-सा पसरा था। और दिल्ली में तो ससुरे झींगुर भी नहीं बोलते। एकदम चुप्पी...। मृगांका के घर से थोड़ी दूर सड़क पर कुछ अंतराल पर किसी बिगड़ैल रईसज़ादे की कोई कार सर्र से निकल जाती थी.

अचानक, मृगांका को खिड़की पर कोई आहट हुई।

मृगांका ने नजरअंदाज़ कर दिया। उसने अपनी खिड़की में ग्रिल नहीं लगा रखा था...और अभी खिडकी को दोनों पट खुले थे।

उसे याद आया, पापा-मम्मी से मिलने के बाद अभिजीत खिड़की के रास्ते ही मिलने आया था उससे। वेंलेटाईन डे था वो...रात 12 बजे मिलना जरूरी था..और उस समय तक पापा-मम्मी से उतना खुल नहीं पाई थी कि रात के 12 बजे अभिजीत से मिल ले।

अभिजीत खिड़की से कूद कर आया था, उसने कहा था कहा चोरी से मिलने का मज़ा हमेशा मीठा होता है।

अचानक मृगांका को लगा कि उसकी गरदन के पीछे किसी ने हल्का किस किया है। एक दम हल्का। कुछ ऐसा ही स्पर्श था, जैसे अभिजीत करता था। वह लेटी ही रही। फिर अचानक हाथ सरकता हुआ उसके कमर के इर्द-गिर्द लिपट गया। वह चिहुंकी, वह पलटी तो  देखा....

अरे, अभिजीत तुम?


...जारी