Tuesday, April 30, 2013

इतिहास का भूगोल, भूगोल का इतिहासः सुशील झा

 
सुशील झा, पत्रकार

सुशील झा, पेशे से तो पत्रकार हैं, लेकिन उनके अंदर एक रचयिता भी है। सामाजिक विषयों खासकर, समाज के वंचित तबके को लेकर उनकी कविताएं जोरदार तरीक़े से अपनी बात कहती है, गद्य भी कविता की शैली में लिखते हैं, यूं तो वर्चुअल स्पेस में लगातार लिखते हैं, लेकिन लेखन की उनकी शैली दिल को बाग-बाग कर देती है। इतिहास और भूगोल के मेटाफर के इस्तेमाल करते हुए,फेसबुक पर स्टेटस के तौर पर लिखा गया उनका ये अद्भुत लेखन पेशे-नज़र है---- 



1. हर लड़की का इतिहास होता है और हर लड़के का भूगोल...वैसे, हर लड़की को लडके के इतिहास में और हर लड़के को लड़की के भूगोल में रुचि होती है...इन भूगोल-इतिहास की चट्टानों पर प्रेम की दूब उग जाती है...इधर उधर छितर बितर।

2. इतिहास और भूगोल की लड़ाई जहां खत्म होती है वहां दर्शन पैदा होता है....बाल-दर्शन।

3.मैं इतिहास में पीछे था...वो भूगोल में आगे थी...दूब ने दोनों को पीछे छोड़ दिया...और हम फ्रायड की बांहों में झूल गए.

4. धड़कते-धड़कते दिल दीवार हुआ जाता है...लिखते लिखते लिखना लाचार हुआ जाता है...। हम तो पड़े थे उसके भूगोल में, और वो अब इतिहास हुआ जाता है।

5. भूगोल में बैठ कर इतिहास लिखना कैसा होता होगा...और इतिहास में बैठ कर भूगोल के बारे में सोचना

6. एक दिन इतिहास ने भूगोल को गोल कर दिया...भूगोल के गोल होते ही दोनों गार्डन के इडेन में पहुंच गए......
भूगोल के गोल होने से दूब सूख गई और फिर गोल गणित का जन्म हुआ जिससे फिर आगे चलकर लॉजिक, फिजिक्स और मेटाफिजिक्स की शुरुआत हुई।

7. बड़े शहर में हर बात छोटी होती है और छोटे शहर में हर बात बड़ी......वैसे बड़े शहर में हर बात भूगोल पर अटकती है....छोटे शहर में हर बात इतिहास पर।

8. भूगोल बदलता है तो इतिहास बनता है और नया भूगोल पुराना इतिहास ज़रूर पूछता है लेकिन इतिहास को सिर्फ भूगोल में रुचि होती है. इतिहास भूगोल का इतिहास कभी नहीं पूछता। 

9. इतिहास की नियति है भूगोल के पीछे भागना..उसे पकड़ना और फिर उसे इतिहास में बदल देना

10. एक दिन इतिहास ने भूगोल के सामने अपने इतिहास के पन्ने पलटने शुरु किए. भूगोल ने ये देखकर अंगड़ाई ली और अपना जुगराफिया बदला. जुगराफिया बदलते ही इतिहास का मुंह खुला का खुला रह गया और फिर दोनों मिलकर दूब उगाने लगे..

11. ...और फिर एक दिन भूगोल ने कहा इतिहास से कि मुझे तुम्हारा इतिहास पढ़ना है. इतिहास के पास इसका कोई जवाब नहीं था. उसे अपने पुराने भूगोल की याद सताने लगी और वह सामने के भूगोल को ताकते हुए सोचने लगा काश कि दूब उगने लगे फिर से...

12 .नया भूगोल मिलते ही इतिहास अपना पुराना इतिहास भूलना चाहता है लेकिन भूगोल को हमेशा इतिहास के पुराने इतिहास में रुचि होती है

13. इतिहास हमेशा भूगोल भूगोल खेलना चाहता है और भूगोल हमेशा इतिहास इतिहास . इस खेल में नुकसान हमेशा दूब का होता है.

14. भूगोल इतिहास की रगड़ में सबकुछ खत्म हो चुका था. बरसों बीत गए थे. झुर्रियों पड़े हाथों में हाथ थे. इतिहास भूगोल के इतिहास में गुम था और भूगोल इतिहास के भूगोल के इश्क में उलझा हुआ-सा था.






Friday, April 26, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः कुशीनारा, जहां बुद्ध ने ली थी अंतिम सांस


बनारस के बाद हमारा अगला पड़ाव था, कुशीनगर। हमारी महापरिनिर्वाण एक्सप्रैस तो गोरखपुर में जाकर रूक गई। और इस दफा अलसभोर में ही पहुंच गई। बस से हम कुशीनगर पहुंचे। 
प्राचीनकाल में कुशीनगर का नाम कुशीनारा था।
 
ईसा से 483  साल पहले भगवान बुद्ध ने यहां पर अपनी देहत्याग की थी। इस घटना को महापरिनिर्वाण कहा जाता है। 

कुशीनगर में सबसे प्रमुख स्तूप है वो है निर्वाण स्तूप। ईंट और रोड़ी से बने इस विशाल स्तूप को 1876 में कार्लाइल ने खोजा था। इस स्तूप की ऊंचाई पौने तीन मीटर है। 

खुदाई से यहां एक एक तांबे की नाव मिली। इस नाव में खुदे अभिलेखों से पता चलता है कि इसमें महात्मा बुद्ध की चिता की राख रखी गई थी।


महानिर्वाण या निर्वाण मंदिर कुशीनगर का प्रमुख आकर्षण है। इस मंदिर में महात्मा बुद्ध की 6.10 मीटर लंबी प्रतिमा स्थापित है। 1876 में खुदाई के दौरान यह प्रतिमा प्राप्त हुई थी। यह सुंदर प्रतिमा चुनार के बलुआ पत्थर को काटकर बनाई गई थी। प्रतिमा के नीचे खुदे अभिलेख के पता चलता है कि इस प्रतिमा का संबंध पांचवीं शताब्दी से है। कहा जाता है कि हरीबाला नामक बौद्ध भिक्षु ने गुप्त काल के दौरान यह प्रतिमा मथुरा से कुशीनगर लाया था।
महात्मा बुद्ध की लेटी प्रतिमा, कुशीनारा


दरअसल, इस प्रतिमा की खासियत है कि इसमें बुद्ध लेटे हुए हैं। पैर की तरफ से देखे तो वह मृत शरीर की भंगिमा वाली है, जिसे निर्वाण मुद्रा कहते हैं। छाती के पास से देखें, तो बुद्ध आशीर्वाद देने की मुद्रा में नजर आते हैं, और सिर की तरफ से देखे तो यह प्रतिमा मुस्कुराती हुई नजर आती है।

यहीं से थोड़ी दूर पर, माथाकौर मंदिर भी है। 

भूमि स्पर्श मुद्रा में महात्मा बुद्ध की प्रतिमा यहां से प्राप्त हुई है। यह प्रतिमा बोधिवृक्ष के नीचे मिली है। इसके तल में खुदे अभिलेख से पता चलता है कि इस मूर्ति का संबंध 10-11वीं शताब्दी से है। इस मंदिर के साथ ही खुदाई से एक मठ के अवशेष भी मिले हैं।

बुद्ध के काल में कुशीनगर, बाद में कसिया बन गया। यह मल्लों की राजधानी थी, जिसका वर्णन महाभारत के भीष्म पर्व में भी है।
निर्वाण स्तूप का अगला हिस्सा, कुशीनगर


बौद्ध साहित्य में कुशीनगर का विशद वर्णन मिलता है। इसमें कुशीनगर के साथ 'कुशीनारा, कुशीनगरी और कुशीग्राम  जैसे दूसरे नामों का भी उल्लेख है। बुद्ध-पूर्व युग में यह कुशावती के नाम से विख्यात थी। 

बुद्ध को भी कुशीनगर से कुछ ज्यादा ही लगाव था। कुछ बौद्ध साहित्यों में सात बोधिसत्वों के रूप में बुद्ध ने मल्लों की इस राजधानी पर शासन किया था। आखिरी बार जब बुद्ध यहां आए को मल्लों ने उनका खूब स्वागत किया और उनके स्वागत-सत्कार में शामिल न होने वाले पर 500 मुद्राओं का दंड निर्धारित किया गया था।

गौरतलब है कि बुद्ध के निर्वाण के संदर्भ में कई किस्से चलते हैं। लेकिन वहां के स्थानीय गाइड ने हमें बताया कि बुद्ध को एक लुहार के हाथों शूकर (इसके दो अर्थ हैं, सू्अर का मांस और शकरकंद) खाने से अतिसार हो गया। 

तब उन्हें लग गया कि विदाई की वेला आन पड़ी है। फिर, बुद्ध ने महापिरनिर्वाण हासिल किया। तब उनके शरीर को सात दिनों तक दर्शनो के लिए रखा गया और फिर मुकुटबंधन चैत्य के स्थान पर उनका दाह संस्कार किया गया। 

दाह-संस्कार के पश्चात् अस्थि-विभाजन के संदर्भ में विवाद उत्पन्न हो गया। इस अवसर पर उपस्थित लोगों में वैशाली के लिच्छवी, कपिलवस्तु के शाक्य, अल्लकप के बुली, रामग्राम के कोलिय, पावा के मल्ल, मगधराज अजातशत्रु तथा वेठ-द्वीप (विष्णुद्वीप) के ब्राह्मण मुख्य थे। कुशीनगर के मल्लों ने विभाजन का विरोध किया। 

प्रतिद्वंद्वी राज्यों की सेनाओं ने उनके नगर को घेर लिया। युद्ध प्राय: निश्चित था, किन्तु द्रोण ब्राह्मण के आ जाने से अस्थि अवशेषों का आठ भागों में विभाजन संभव हुआ। विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि अस्थि अवशेषों को अपनी राजधानियों में ले गए और वहाँ नवर्निमित स्तूपों में उन्हें स्थापित किया गया।

आवारेपन का रोज़नामचा जारी है, कुछ कुशीनगर का किस्सा कुछ लुंबिनी का, जहां बुद्ध का जन्म हुआ था।

Saturday, April 20, 2013

सुनो! मृगांकाः 30: झल्ला की लब्दा फिरे...


आसमान बादलों से घिरा था, लेकिन धरती प्यासी थी। धरती की प्यास और अभिजीत की प्यास का पैमाना तकरीबन एक सा था।

हवा तेज़ चल रही थी...। काले मेघ, इन्ही हवाओं से टकरा कर दूर चले जाने वाले थे।

अचानक न जाने क्या सूझा अभिजीत को...अंदर जाकर, अपनी ह्विस्की की बोतल उठा लाया। शाम होने में अभी देर थी। दिन अभी ढला नहीं था। अभिजीत को हैरत हो रही थी, अपनी इस दशा पर। गांव में अपने मन का बहुत कुछ किया था उसने।

पहला पैग अंदर गया। अभिजीत का अपने मन पर से नियंत्रण हट गया। ऐसी ही नम हवा चल रही थी, जेएनयू के अहाते में गंगा ढाबा के आसपास कहीं किसी पत्थर पर बैठकर चाय सुड़कते  हुए अभिजीत ने मृगांका को फोन किया था।

याद वहीं।

दूसरा पैग बना, खतम हुआ। याद आया कि एक बार मृगांका ने पूछा था, मेरी कौन सी तस्वीर तुमको अच्छी लगती है....खटाके से अभिजीत ने उसको बांहो में भरते हुए कहा था, जिसमें तुम्हारे ब्रा के स्ट्रेप्स दिखते हैं।

झल्ला...मृगांका चीखी थी। छीः शर्म नहीं आती तुम्हें।
 अभिजीत ने बिना शरमाए कहा था, तुमसे क्या शरमाना।  मृगांका नक़ली ग़ुस्से से दांत पीसती रही और अभिजीत का गाल चुंबनों से भर दिया था...अभिजीत के गालों पर लिपस्टिक के दाग़...और अभिजीत ने बहुत देर तक चेहरा नहीं धोया था।

यादों का विस्तार होता रहा, पांच पैग के बाद, हिचकी आने लगी। गला सूखने लगा। लगा कि ब्लाडर फट जाएगा। वह घर के पीछे खेत की तरफ गया। गांव में उसे उस सुनसान खेत में पेशाब करने में मजा आता था। आसमान में बादल अभी भी थे ही, लेकिन बारिश की संभावना खतम हो गई थी।

कुछ सोचकर वह डगमगाते कदमों से अपनी बाइक की तरफ बढ़ा। कांपते हाथों से बाइक में चाबी डाली...नहीं डली। बेतरह लड़खड़ाते हुए, अभिजीत ने अपनी साइकिल को देखा...। गांव की सड़क पर, डगमगाती साइकिल खजौली की तरफ बढ चली।

कभी मृगांका ने कहा था उससे, मुझे साइकिल की सवारी नहीं कराओगे...। अभिजीत समझ गया था कि मृगांका मज़े ले रही है। मृगांका ने बहुत संजीदगी से कहा था कि उसे साइकिल की सवारी करनी है...लेकिन गांव में लड़कियां साइकिल चलाती हैं, नीतीश कुमार ने हर लड़की को साइकिल दिया है सरकार की तरफ से...लेकिन गांव की बहू चलाएगी?

अभिजीत इसी सोच में चल रहा था। कमला नदी की एक उपधारा उसके गांव से होकर गुजरती है...गरमियो में वह भी सूख जाती है। थोड़ा सा पानी बचा रहता है जिसमें भैंसे लोटमलोट किया करती है। अभिजीत उसी पुल पर से पार कर रहा था।

पूरे गांव की औरतें अभिजीत को इस तरह डगमग साइकिल चलाते हुए देखकर हंस-हंस कर दोहरी हुई जा रही थीं। कुछ ने तो हंसी छिपाने के लिए पल्लू मुंह में ठूंस लिया था...। वो अभिजीत की हालत पर नहीं, उसके साइकिल चलाने के अंदाज़ पर हंस रही थी। वरना अभिजीत तो उनके लिए एक ऐसा प्रतिष्ठित शख्स बन चुका था, जिसने गांव की जाती हुई रौनक को करीब-करीब लौटा दिया था।

गांव का हर विद्यार्थी उसका छात्र बन चुका था। स्कल से लेकर खेती तक, और नई तकनीकों से लेकर पोखरे में जलकुंभी की सफाई तक, पिछले दो महीने में अभिजीत ने मिशन की तरह काम किया था। सही रास्ते पर लेकर आने वाला अभिजीत आज खुद डगमग था।

खजौली पहुंच कर अभिजीत ने सीधे एसटीडी बूथ से प्रशांत का नंबर डायल किया। वह सोचकर कुछ आया था, सोचा उसने वही था...सीधे मृगांका से बात करेगा। लेकिन बूथ में घुसकर हिम्मत नहीं हुई।

हलो
हलो
प्रशांत...
अबे...अभिजीत। कैसा है बे।
ठीक हूं, तू बता
अच्छा है
और...सब
सब क्या, मां दिल्ली आकर मृगांका के घर पर टिक गई हैं। कहती हैं बेटा और बहू को साथ देखकर वापस जाएंगी, मृगांका भी बहुत परेशान है...
ओह...
...और तूने जरूर पी रखी होगी
नहीं
तुम्हारा आवाज से लग रहा है साले...सुन..एक बात  हो गई है
क्या
तुम्हारे पब्लिशर ने तुम्हारी नई किताब पर कुछ उल्टा लिख दिया है, फ्लैप पर।
क्या
लिखा है कि अभिजीत की आखिरी किताब है...
तो
लिखा है इसके बाद नहीं लिखेगा
हा, सही है
अबे नहीं यार। लौट आ।लौट आ ना यार...प्रशांत रो पड़ा। ...और सुन मैं मां को और मृगांका को गांव भेज रहा हूं..अब कोई बात नहीं सुनूंगा। बस

अबे सुन तो..

प्रशांत ने सुनने से पहले फोन रख दिया। अभिजीत का आधा नशा उतर गया...लेकिन मृगांका एक ऐसा नशा थी जो ताउम्र उस पर तारी थी। मानिजुआना से भी गजब का नशा...वह थोड़ा डरा हुआ था, तोड़ा खुश। वह चाहता भी तो ता मृगांका को जीभर देख पाए।








Wednesday, March 20, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः मैं कहता तू जागत रहियो


मही एक कलम के मज़दूर का गांव था। बनारस अपने आप में क्या है, प्रेमचंद, बिस्मिल्ला खां...बाबा विश्वनाथ, कबीर और इन जैसे फक्कड़ों का ही तो गुड़-शक्कर की तरह मेल ही तो। 

बनारस गए और लहरतारा नहीं गए, तो यात्रा अधूरी है। 
 
हम जब कबीर के गांव पहुंचे, तो हवा में अजब-सी आध्यात्मिकता घुली थी। १० फीट चौड़ी सड़क पक्की थी। लेकिन सड़कों का पक्का होना गांव की तरक्की का सुबूत नहीं था। गांव में पक्के मकान थे, लेकिन कुछेक ही। 

गांव के प्रधान का मोबाईल नंबर हमारे पास था। बनारस में ही एक जानकार से मिल गया था। 

बहरहाल, गांव के प्रायः हर घर से खटा-खटाखट की आवाज़ आ रही थी। हथकरघे की..। कबीर जी साकार हो गए। 

दूर किसी घर में किसी मरदाना आवाज़ ने स्वागत किया... झीनी-झीनी बीनी चदरिया बीनी रे बीनी.. काहे का ताना काहे का भरनी....देखा सफेद दाढी में शख्स। हमें देखते ही राम-राम। ताज्जुब हुआ। हमने कहा अस्सलामवालेकुम..। उत्तर आया राम-राम। 

हमारी हैरत पर और परदे डालते हुए उन्होंने कहा हम हिंदुओं और मुसलमानों का फरक नहीं करते। 

सिर झुक गया। असली हिंदोस्तां यहीं है, अयोध्या में है, न गोधरा में...न सोमनाथ में, न जामा मस्जिद में...न सांप्रदायिक रंग लिए किसी और जगह।

 लेकिन आध्यात्मिकता के इस रंग को वास्तविकता ने थोड़ा हलका ज़रूर कर दिया। पूरा गांव बुनकरों का है। यहां के लोग अपने पुश्तैनी धंधे में जुटे हैं, दिनभर करघों की आवाज़ गूंजती है, लेकिन रात को नहीं...क्योंकि रात को बिजली नहीं होती। 

कम रौशनी में काम करने की वजह से कई लोगों की आँखें चौपट हो गई हैं। बिजली आती है लेकिन देर रात दो बजे के बाद... और सुबह होते ही फौरन चली जाती है। 

सांझ को काम गैसलाईट में होता है... रेणु जी की कहानी 'पंचलैट' याद आ गई। ऊपर से तुर्रा ये कि अमेरिका से शुरू हुई मंदी ने बनारस के बुनकरों पर असर दिखाना शुरू कर दिया है। 

दिहाड़ी मज़दूरी पर काम करने वाले बुनकरों को साहूकार पहले ही कम मज़दूरी देते थे, लेकिन मंदी की मार ने मज़दूरी की उस रकम को भी लील लिया है। ..

इसी धंधे में लगे मो. अल हुसैन हमसे मिले। कम होती मज़दूरी ने इन्हें इस लायक नहीं छोड़ा है कि वो अपनी बेटी को स्कूल भी भेज सकें। आखिरकार, इन्हें पेट और पढाई में से एक ही चीज़ चुननी थी और इन्होंने पेट को तरजीह दी।  देनी ही थी। उनकी बेटी पोलियोग्रस्त है.. उनकी शादी की चिंता भी है। 

हम नीम की घनी छाया में बैठे। नौजवान बुनकर भी कबीर ही गुनगुना रहे थे। एक ने फिल्मी रोमांटिक तान छेड़ी..। हमें भी अच्छा लगा।

तब तक कोक की बोतल में हैंडपंप का शीतल जल आ गया। कोक की पहुंच यहां तक हो गई है। 

लेकिन राहत ये कि सिर्फ बोतल था, पानी ऑरिजिनल था। अजब मिठास था, पानी में। एक बुजुर्ग प्लेट में दोलमोठ और बिस्कुट ले आए। हमें बहुत शर्म आई.. तकरीबन पूरा गांव शूटिंग देख रहा था, खिड़कियों से झांकती पर्दानशीं महिलाएं.. बकरियों के आगे पीछे खड़े नंग-धडग बच्चे।

 फुसफुसाते बतियाते नौजवान...। उनकी आंखों में उम्मीद की एक किरण थी। बैंक से कर्ज नहीं मिलता कि पावरलूम लगवाएं.. राशनकार्ड नहीं है...बीपीएल कार्ड प्रधानजी ने अपने नज़दीकियों को दिया है..समस्याओं का अंबार था। 

हमें लगा कि हम महज रिपोर्ट बनाने और लिखकर कहीं छाप देने से ज्यादा क्या कर सकते हैं। क्या हम इस समस्या के निदान के लिए किसी भी तईं जिम्मेदार हैं...या हमें तटस्थ रहना चाहिए।  

क्या हमारी बात उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार तक पहुंच पाएगीशंका मुझे भी है।

गांव में पीने के पानी की समस्या थी। पूरे गांव में एक मात्र हैंडपंप है जो नीम के पेड़ के नीचे है। मंदी के असर से खूबसूरत और दिलकश बनारसी साड़ियों की मांग पर असर पड़ा है। जाहिर है, बनारस के आसपास के गांव के बुनकर इससे परेशान हैं। 

बुनकरों की दिहाड़ी पहले 60-70 रूपये थी, घटकर अब वह 40 रूपये हो गई है। मंहगाई ने कमर पहले से तोड़ दी है। 

मलाल इस बात का है कि उनकी माली हालत पर किसी की नज़र नहीं। बिचौलियों और साहूकारों के कर्ज़ से दबे बुनकर अपनी शिकायत करें भी तो किससे। मंदी में साडियों की मांग में आई कमी ने उनकी हालत शोचनीय बना दी है।

कबीर ने पता नही कब निरगुन गाया था यहां...लेकिन बुनकरों की दशा ऐसी कि स्थिति खुद ब खुद निरगुन गवाने लग जाए। महात्रासदी के ग्रीक कोरस की आवाज़ लहरतारा में सुनाई दे रही है...झीनी-झीनी नहीं...मैं कहता तू जागत रहियो।

Tuesday, March 5, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः लमही में

हुत छोटा था, जब मैंने 'गोदान' पढ़ ली थी। उससे भी पहले छठी क्लास में हिंदी की पाठ्य पुस्तक में प्रेमचंद के बचपन का ज़िक्र था। तो मन में एक उत्कंठा थी कि आखिर प्रेमचंद का वह गांव, जहां का वर्णन वह इस तल्लीनता से करते हैं, होगा कैसा?

यात्रा के दौरान इस बात का मौका मिला कि लमही जाऊं। बनारस से मैंने सीधा रूख किया लमही का। थोड़ा वक्त था, तो मैंने राजीव (ड्राइवर ) को कहा सीधे लमही चलने के लिए।
राजमार्ग पर ही एक बड़ा से गेट बना है, मुंशी प्रेमचंद स्मारक गेट। उसके साथ ही दसफुटिया पक्की सड़क आपको लमही तक ले जाएगी।

गांव में घुसते ही पहले तो आपको एक बड़ा-सा बोर्ड नज़र आएगा। निर्मल ग्राम-लमही। यहां-वहां दीवारों पर मनरेगा के नारे। उसी बोर्ड के पीछे दिखेगा एक साफ-सुथरा पेयजल का इंतजाम। हैंडपंप नहीं... टैपवॉटर। पानी की टंकी और उससे लगे आठ नलकियां। यहीं उसके उलटे हाथ पर प्रेमचंद का पैतृक आवास है।

कुछेक साल पहले यह टूटी-फूटी हालत में था। लेकिन अभी ठीक-ठाक है। सफेद पुताई के साथ गरिमामय मौजूदगी। उससे ठीक पीछे है प्रेमचंद स्मृति भवन। ज़िला प्रशासन ने थोड़ा ध्यान तो दिया है। गोदान पढ़ें और आज के लमही को देखें, तो बड़ा अंतर है।

मुझे लगता है कि प्रेमचंद ने जब गोदान लिखा होगा तो लमही कहीं-न-कहीं उनके मन में साकार रहा होगा। ऐसे में मुझे लगा कि होरी, धनिया, गोबर और झुनिया से मिला जाए।  मैंने एक किसान खोज ही निकाला। चेहरे पर झुर्रियों वाले बुजुर्गवार से मिलते ही लगा, यही तो होरी है। एक पैर में चोट लगी थी सो थोड़ा लंगड़ा कर चल रहे थे। एक नौजवान ने कंधे का सहारा दे रखा था।

हमसे मिलते ही कहने लगे दरवाजे पर चलो, तो खटिए पर बैठ कर बातें करें। हमारे इस नए होरी के घर पर तीन गाएं बंधी थी , दो भैंसें भी थीं। उन्होंने बताया कि घर पर टीवी भी है, और डीटीएच भी। हां, ये सारा कुछ महज किसानी से नहीं आया। राजमार्ग के बगल वाली ज़मीन उनने निकाल दी (यानी बेच दी) और खेती तो है ही। दूध से भी कमाई हो जाती है। दूध बनारस चला जाता है। खाने-पहनने की कमी नहीं।

हमारी बातचीत के दौरान उनकी घरवाली (हमारे हिसाब से धनिया) चटख रंग की सा़ड़ी को कोर मुंह में दबाए मुस्कुराती रही।

झुनिया भी बदल गई है। होरी के गांव में झुनिया सिलाई-कढाई का स्कूल चलाती है। गोबर, अब गोवर्धन बन गया है। लखनऊ जाने की ज़रूरत नहीं। बदलते वक्त और बाजार ने गोबर के लिए मौके भी दिए है, और सम्मान भी। 

गांव के नौजवान के पास मोबाइल फोन है और उसका बेझिझक इस्तेमाल... मुझे फील गुड हो रहा था। (हालांकि आगे की यात्रा में यह एहसास कायम नहीं रह पाया।)


पूरे गांव की सड़कें लगभग साफ-सुथरी थी। नालियां भी साफ थी। एक आम भारतीय गांव से थोड़ा अलग लगा लमही। कम से कम पहली नज़र में ..। गांव में कई भारत मार्का हैंडपंप लगे थे। खेत में फसल भी थी ठीक ही थी। मसूर, अरहर, गेहूं और पीले सरसों के खेत।


लेकिन, साथ ही बहुत कुछ सालता भी है। प्रेमचंद इतने बड़े साहित्यकार हुए, उनके नाम पर देश भर में कोई विश्वविद्यालय तक नहीं, प्रेमचंद के नाम पर राजधानी दिल्ली में कोई सड़क नहीं। दिल्ली ने मार्शल टीटो से लेकर कर्नल नासिर तक के नाम पर सड़क बनाकर सम्मान जाहिर किया गया है।


पता नहीं क्यों प्रेमचंद सम्मान के हकदार नहीं हो पाए। जनता उन्हें कितना प्यार करती है ये बात और है।


मैंने सुना है कि लंदन में वह शहतूत का पेड़ आज तक सुरक्षित है, जिसे शेक्सपियर ने लगाया था। लेकिन, भारत को और भारतीयों को अपनी विरासत पर पता नहीं ज़रा भी गर्व नहीं होता। थाती को संभाल कर रखना तो दूर है।


जहां तक किसानों की बात है, लमही का हमारा तजुर्बा पूरे भारत की बदलती तस्वीर बयां नहीं करता। बाकी के भारत में होरी अभी भी मर ही रहा है। किस्से भले ही बाहर नहीं आ पाते..।  लमही अलहदा था...।

पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह गांव आपने आसपास के गांवों से अलग है। सौ किलोमीटर दूर ही बुंदेल खंड है..वहां की दास्तां अलग है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवो की जो दशा है लमही कम से कम पहली नज़र में अपवाद लगता है। मुझे बड़ी शिद्दत से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली जिले के किसान की याद आई जो संपन्न गांव में अपवाद था...जिसने राष्ट्रपति से आत्महत्या की अनुमति मांगी है।


अपवाद कितनी चटख रंगो के होते हैं, अपनी ओर फटाकदेनी से ध्यान खींचते हैं। है ना।

जारी

Monday, March 4, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः जो मज़ा बनारस में...

बनारस पहुंचने की बारी आई तो हम लेट नहीं हुए। अल्लसुबह ट्रेन बनारस स्टेशन पहुंच गई थी। बाहर काफी कोहरा था। एकदम सफ़ेद-झक्क चादर। 

बस के खिड़की का शीशा पनिया गया था। 

होटल पहुंचकर कमरे में जल्दी-जल्दी चाय पी गई और आधे घंटे में हम सारनाथ निकल गए।

सारनाथ को पहले हम लोग सामान्य ज्ञान की किताबों में पढ़ते थे। गौतम को बोधगया में महाबोधि हासिल हुई थी। उसके बाद उन्होंने अपने पांच पहले शिष्यों को पहली बार यहीं पर उपदेश दिए थे। इस घटना का उल्लेख बौद्ध साहित्य में धम्मचक्र प्रवर्तन के नाम से हुआ है।

बौद्ध ग्रंथों में सारनाथ के नाम का जिक्र ऋषिपत्तन, धर्मपत्तन और मृगदाय के रूप में हुआ है लेकिन ताज्जुब की बात ये है कि इसका नाम सारनाथ, महादेव शिव के एक नाम सारंगनाथ से आय़ा है।
  
सारनाथ पहुंचते ही हमारी बस सबसे पहले एक बड़ी ईंट की इमारत-से अवशेष के पास रूकी। यह चौखंडी स्तूप  था। इसके सबसे ऊपर की ओर देखें, तो एक आठ कोनों वाली आकृति की तरफ नजर जाती है, यह अकबर के काल में हुमायूं की याद में टोडरमल के बेटे गोवर्धन ने बनवाया था।

यही वो जगह है जहां पर गौतम बुद्ध ने अपने पाँच शिष्यों को सबसे प्रथम उपदेश सुनाया था जिसके स्मारकस्वरूप इस स्तूप का निर्माण हुआ। इसका जिक्र ह्वेनसांग ने भी किया है।

ह्वेनसाँग ने इस स्तूप की स्थिति सारनाथ से करीब एक किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में बताई है, जो करीब 91 मीटर ऊँचा था। इस ब्योरे के मुताबिक चौखंडी स्तूप ही वह स्मारक है। जैसा मैंने बताया इसके सबसे ऊपर आठ कोनों वाली एक बुर्जी बनी हुई है, जिसके उत्तरी दरवाजे पर पड़े हुए पत्थर पर फ़ारसी में एक लेख है, वहां गाइड ने बताया, और शिलापट्ट पर भी अंकित है कि टोडरमल के बेटे गोवर्द्धन ने सन् 1589 ई. (996 हिजरी) में इसे बनवाया था। हुमायूँ ने इस जगह पर एक रात बिताई थी, जिसकी यादगार में इस बुर्ज का निर्माण हुआ था। 

जब हम पास में चाय पीने गए, तो चाय दुकान वाले ने इस मिसाल का जिक्र करते हुए कहा कि फैज़ाबाद (अयोध्या) में भी ऐसा ही हुआ होगा। 

बहरहाल...।  

बुद्ध के प्रथम उपदेश (लगभग 533 ई.पू.) से 300 वर्ष बाद तक का सारनाथ का इतिहास अज्ञात है। उत्खनन से इस दौर का कोई भी अवशेष नहीं मिला है। 

सारनाथ की समृद्धि और बौद्ध धर्म का विकास का उल्लेख सम्राट् अशोक के शासनकाल से दीखने लगता है। उसने सारनाथ में धर्मराजिका स्तूप, धमेख स्तूप और सिंह स्तंभ बनवाए थे। 

अशोक के बाद, सारनाथ फिर से अवनति की ओर अग्रसर होने लगा। ई.पू. दूसरी शती में शुंग वंश के राज्य की स्थापना हुई, लेकिन सारनाथ से इस काल का कोई लेख नहीं मिला है। प्रथम शताब्दी ई. के लगभग उत्तर भारत के कुषाण राज्य की स्थापना के साथ ही एक बार पुन: बौद्ध धर्म की उन्नति हुई। कनिष्क के राज्यकाल के तीसरे वर्ष में भिक्षु बल ने यहाँ एक बोधिसत्व प्रतिमा की स्थापना की। कनिष्क ने अपने शासन-काल में न केवल सारनाथ में वरन् भारत के विभिन्न भागों में बहुत-से विहारों एवं स्तूपों का निर्माण करवाया।
 
इसके बाद हम सीधे चले धमेख स्तूप की तरफ। यही वो जगह है जिसकी तस्वीरें आप गूगल पर सर्च करके पाते हैं। 

यहां का स्तूप एक ठोस गोलाकार बुर्ज जैसा है। करीब 28 मीटर व्यास का, और करीब चालीस मीटर ऊंचा। 

इस स्तूप की नींव अशोक के समय में पड़ी। इसका विस्तार कुषाण-काल में हुआ, लेकिन गुप्तकाल में यह पूर्णत: तैयार हुआ। यह साक्ष्य पत्थरों की सजावट और उन पर गुप्त लिपि में अंकित चिन्हों से निश्चित होता है।

खैर...इसके बाद हम सीधे होटल को लौट गए। कुछ भाई लोगों को गंगा स्नान करना था, वो होटल में भोजन के बाद गंगा को कूच कर गए। मुझे इप्सिता मुखर्जी ने कहा कि उनको पूजा करनी है। मेरा एकमात्र मकसद बनारसी मिष्टान्न ठूंसना था। हम आठ लोग, विश्वनाथ मंदिर की ओर चले।

श्रद्धालुओं ने विश्वनाथ की पूजा की, मैं बनारस की गलियों का जो वर्णन पढ़ आया था, उसमें और हक़ीक़त में मेल करने में व्यस्त था। 

विश्वनाथ मंदिर भारत के दूसरे हिंदू मंदिरों की ही तरह लूट का क़िला और गंदगी का पिटारा है। जहां तहां निर्माल्य, बेलपत्र, फूल...गेंदे की मालाएं, एक दूरे पर ही दूध का अर्घ्य ढाले दे रहे हैं...गंदगी का साम्राज्य और लूट-खसोट का माहौल ऐसा मानो महमूद गज़नवियों की सेना में घुल गए हों गलती से।

वहां से बच-बचा कर निकले, ऑटो वाले से कहा मिष्टान्न भंडार ले जाने को। तमाम किस्म की चंद्रकला, चंद्ररेखा नामधारी मिठाईयां, और स्वाद...पूछिए मत। लिखते वक्त भी, स्वाद साक्षात् ज़बान पर है। मतलब कम शब्दों में जान लीजिए कि आनंद अखंड घना था।

कई दफा़ खा चुकने के बाद भी (क्योंकि मेरे मिष्टान्न उदरस्थ करने के अभियान की प्रायोजक खुद इप्सिता थीं) जब मैंने रसमलाई का एक और कटोरा मांग लिया, तो मिठाई वाला भी मुस्कुरा उठा। इप्सिता के बिन पूछे ही मैंने  सफाई दे दी, कमिश्नर की गाडी़ आती है तो कैसा भी जाम छूट जाता है...

मित्रो इस जन्मना बामन ने बनारस में छककर मिठाई खाई। तत्पश्चात्, एक पान को गालो मेदबाने के बाद हम होटल को चले। पेट तन गया था। इच्छा हो रही थी कि अब एक मीठी नींद ली जाए..लेकिन अब शाम ढल रही थी, हमें गंगा आरती देखने जाना था। 

नाव में बैठे, तो बस क्या कहा जाए, शब्द कम पड़ जाएं। वही प्रदूषित गंगा यहां महिमामयी लगती है। किनारे की तऱफ घाटों की छटा ऐसी....ठीक ही लिखा है काशीनाथ सिंह ने, जो मज़ा बनारस में, न पेरिस में न फारस में।

नजरों के आगे से कई घाट गुज़रे, हरिश्चंद्र घाट भी, मणिकर्णिका और..भोंसले घाट भी..गंगा आरती होती है दशाश्वमेध घाट पर।

देशी-विदेशी सैलानी एक नदी की पूजा का अद्भुत नज़ारा देखने इकट्ठा होते हैं। हमारे साथ थाइलैंडके कुछ लोग थे, उनकी प्रतिक्रिया तो हैरतअंगेज़ थी। नाव पर बैठे तो काशी का अस्सी का पहला पेज याद हो आया, मैं ज़ोर से चिल्लाया हर हर महादेव...(और आहिस्ते से भों...के।)

मणिकर्णिका घाट पार करते वक्त कई दर्जन लाशें जलती देखी...थोड़ी देर के लिए तो श्मशान वैराग्य घर कर जाता है। धधकती हुई लाशें, हमारी उन्ही देहों को हमारे ही लोग बांस से पीट-पीटकर पूरी तरह जला डालते हैं, जिनको हम तेल-फुलेल, खुशबूओं, इत्रों, रंग-रोगन, डियो और न जाने किन-किन स्नो-पाउडरों से सजाते हैं, संवारते हैं।

जैसा कि हमेशा होता है श्मशान-वैराग्य भी इस देह की तरह क्षणिक होता है। गंगा की आरती देखी गई। गंगा को शुक्रिया कहने का यह धार्मिक तरीका अच्छा है। कुछ दर तक खुद को खोने का, खुद को आध्यात्म में डुबो देने का।

मुझे शारदा सिन्हा याद आ रही थीं, मैया ओ गंगा मैया...लेकिन यह पूजा-राधना...काश..ये नदियों को गंदा करते जाने की हमारी मानसिकता को थोड़ा बदल पाती।


खैर....अब हम चल रहे है वापस....अंधेरा घिर आया है। लेकिन माहौल आध्यात्मिक है....सब गंभीर थे। आसमां में चांद निकल आया था। याद आने लगा बचपन में वचनदेव कुमार के निबंध संग्रह में चांदनी रात में नौका विहार का लेख पढ़ते थे। 

परीक्षा में आया करता था, इस विषय पर लेख...। अब जीवन परीक्षा है तो चांदनी रात में नौका विहार बेकार लगता है। समय की बर्बादी...लेकिन खुद से मिलना हो तो कभी बनारस जाइए और चांदनी रात में नौका विहार ज़रूर कीजिए।

जारी 

Monday, February 25, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः नए-नवेले देवता के गांव में


भुवनेश्वर से हमारी ट्रेन हमें गया जंक्शन ले आई। इसके बाद हमें राजगीर और नालंदा देखने जाना था। ट्रेन को वैसे तो सुबह ही पहुंचना था, लेकिन भारतीय रेल की वही पुरानी कहानी, हम तकरीबन तीन बजे गया स्टेशन पहुंचे।

गया स्टेशन पर उतरे, तो हमारी टीम के दो भयंकर किस्म के लोग, प्लेटफॉर्म के दूसरे छोर पर जाकर खड़े हो गए। एक थे पीटीआई के संवाददाता और दूसरे अमर उजाला के चंडीगढ़ रिपोर्टर। हमारी मैथिली में कहावत है ना, कानी गाय के भिन्ने बथान।

इसका खामियाज़ा उन्हें भुगतना भी पड़ा। वो लोग प्लेटफॉर्म पर ही रह गए। खैर, बाकी की टीम बसों में बैठकर नालंदा की ओर चली। विदेशी तीर्थयात्रियों के लिए दो बसें थीं, हमारे लिए एक सुविधाजनक छोटी बस।

हमारी बस में कुछ अंग्रेजीदां महिला पत्रकार भी थीं, जिनने पहले कभी गांव नहीं देखा था। वो गया के बाहर निकलते ही खेत-खेत चीखने लगीं, और साथ में गरीबी-गरीबी भी। 

लेकिन मैंने उनको बताया कि बिहार का यह हिस्सा, बल्कि बिहार शरीफ, नालंदा, गया का इलाका सब्जी उत्पादन खासकर आलू की पैदावार में अगुआ है तो वो चौंक गए। खैर...गया से नालंदा जाएं, रास्ते का भूगोल छोटानागपुर के पठारी इलाके की झलक देता है।

इसी इलाके में हम एक जगह रूकते हैं...जगह है गहलौर। पहाड़ का सीना चीरकर रास्ता निकाल दिया गया है।

ये गांव दशरथ मांझी का है, जिसने पत्नी के लिए एक पहाड़ को बीचों बीच सिर्फ छेनी हथौड़े से काट डाला। वक्त बाईस साल का लगा...दशरथ मांझी की पूरी जिंदगी लग गई इसमें।

लेकिन शाहजहां के ताजमहल का जबाव एक आम आदमी इससे बेहतर क्या दे सकता था भला।

गहलौर का नाम बदलकर, अब दशरथनगर कर दिया गया है। गया से नालंदा जाने में हमें वैसे 105 किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता, लेकिन अब महज 85 किलोमीटर। 

दशरथ मांझी नहीं रहे, लेकिन उनकी समाधि स्थल बना दी गई है, किसी ने खड़िए से लिख भी दिया है दशरथ बाबा। पता नहीं, दशरथ बाबा कब देवता में तब्दील हो जाएं, मुमकिन है कुछ मन्नतें भी पूरी कर दें। लेकिन इतना तय है हिंदुओं के 33 करोड़ देवताओं में से सबसे कर्मठ देवता तो दशरथ मांझी ही होंगे। 

मेरी कहानी को  आशिमा वगैरह मुंह बाए सुनते रहे थे। फिर, उनने हिंदू धर्म शास्त्रों की विवेचना शुरुकर दी, जिसमें आस्था का इतना गहरा पुट था कि मेरे लिए नामुमकिन था उसमें हिस्सा लेना। दोयम, इस विषय पर मैं और सुशांत और ऋषि इतनी दफ़ा और इतने तरीके से बात कर चुके हैं पिछले सात साल में कि इसपर इन लोगों को कन्विंश करना बेकार और बेवजह था। 

शाम ढलते रही थी, सूरज का रंग भी पीले से ललछौंह में बदल गया था। लाल तो खैर क्या मान लीजिए कि तोड़ा पानी मिलाइए सूरज की किरनों में बस, गिलास में ढल जाने लायक हो जाए।

बहरहाल, सड़क को दोनों तरफ अब पुराने अवशेषों के चिह्न नज़र आने लगे थे। नालंदा, और राजगीर ये दोनों जगहें भारतीय इतिहास के सबसे पुराने पन्ने हैं।

राजगीर को पहले सुमतिपुर, वृहद्रथपुर, गिरिब्रज और कुशग्रपुर और राजगृह कहा जाता था।
घाटियों में बसा यह शहर सात पहाड़ों वैभरा, रत्ना, सैल, सोना, उदय, छठा और विपुला से घिरा है।

भगवान कृष्ण के कुख्यात मामा कंस के ससुर जरासंध, राजगृह के ही राजा थे।

जरासंध खुद बहुत प्रतापी और शक्तिशाली राजा था, उसने कृष्ण जैसे अवतार को मथुरा छोड़ने पर मजबूर कर दिया। उसके बाद कृष्ण ने गुजरात के तटीय इलाके में कुश क्षेत्र में द्वारका नगरी बसाई।

जरासंध पहलवान भी था, और इसका सुबूत है राजगीर में खुदाई से निकला जरासंध का अखाड़ा।

लिखित सुबूतों के लिहाज से भी राजगृह का इतिहास ईसा के जन्म से एक हज़ार साल तक पीछे जाता है।

जब मगध ने लोहे के दम पर ताक़त हासिल करनी शुरु की और प्राचीन भारत के सोलह महाजनपदो में सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बनकर उभरा तो उसके ताक़त का प्रतीक था उसकी राजधानी गिरिव्रज। लेकिन महात्मा बुद्ध के समकालीन राजा बिम्बिसार ने शिशुनाग या हर्यक वंश के राजाओं की पुरानी राजधानी को छोड़कर एक नई राजधानी पुराने शहर की दीवारों से बाहर बसाई, और नाम दिया राजगृह।

राजगीर गौतम बुद्ध की पसंदीदा जगहों में से एक था। आज के शहर पर भी बौद्ध धर्म की छाप को आसानी से देखा जा सकता है।

धर्म के लिहाज से राजगृह बौद्धों, जैनों और हिंदुओं के लिए बराबर अहमियत रखता है। इस जगह की मिट्टी में जैन और बौद्ध धर्म के संस्थापकों की यादें खुशबूओं की तरह मिली हुई हैं।

राजगीर में गृद्धकूट पर्वत है, जिसपर भगवान बुद्ध ने अपने उपदेश दिए थे। यहां के वेणुवन में महात्मा बुद्ध अपने वर्षाकाल का चातुर्मास बिताते थे। राजगीर ही वो जगह है जहां अजातशत्रु के शासनकाल में पहली बौद्ध संगीती यानी बौद्ध सम्मेलन हुआ था।


राजगीर के ही बगल में ही है....नालंदा।

किताबों और पढाई-लिखाई से जुड़े किसी भी शख्स के लिए एक सपनीली जगह।

प्रारंभिक बौद्ध साहित्य में नालंदा के लिए नल, नालक, नालकरग्राम आदि नाम आते हैं, और यहां बुद्ध के प्रमुख अनुयायी सारिपुत्त की जन्मभूमि होने का धुंधला साक्ष्य भी प्राप्त होता है।

देखने में तो नालंदा का ये अवशेष ईंटो का ढेर लगता है, लेकिन गौर से देखिए तो यहां की हर ईंट के पास कहने के लिए एक कहानी है।

नालंदा की स्थापना पांचवी सदी में गुप्तकाल के दौरान शक्रादित्य या कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल में की गई थी।

चीनी यात्री ह्वेनसांग संस्कृत और भारतीय बौद्ध धर्म का विशिष्ट अध्ययन करने के लिए 630 ई. के तुरंत बाद नालंदा विहार के विद्यापीठ में पहुंचा। सम्मानित विदेशी विद्वान होने के नाते नालंदा विहार के प्रमुख आचार्य शीलभद्र ने उसका स्वागत किया।

एक दूसरा चीनी यात्री इत्सिंग जो 673 ई. के आसपास भारत आया, नालंदा में रहकर बौद्ध धर्म से संबंधित पुस्तकों का गम्भीरतापूर्वक अध्ययन किया।

नालंदा का विश्वविद्यालय, हमेशा भारत का गौरव रहेगा। नालंदा पहुंचे तो बहुत शम घिर आई थी, राजगीर का वेणुवन हमने सबसे आखिर में रात में देखा...तालाब सा खुदा है एक। कुहरा छाया हुआ था...शांति ती। लेकिन वहां जाकर देख आना, मकसद तो आदा ही पूरी हो पाया।

जब तक आप इन जगहों पर शांति से बैठें नहीं तो क्या हासिल कर पाएंगे। नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहरों में मैने अजीब-सी शांति महसूस की थी। मन की साध थी, वहां जाकर नजदीक से देखने की वो पूरी हो गई थी। 
  
मुस्लिम इतिहासकार मिन्हाज़ और तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के मुताबिक, इस विश्वविद्यालय को तुर्कों के हमलों से बहुत नुकसान हुआ। तारानाथ के अनुसार तीर्थिकों और भिक्षुओं के आपसी झगड़ों से भी इस विश्वविद्यालय की गरिमा को भारी नुकसान पहुँचा। इसपर पहला आघात हुण शासक मिहिरकुल ने किया था। साल 1199 में हमलावर बख़्तियार ख़िलज़ी ने इसे जलाकर पूरी तरह नष्ट कर दिया।

लेकिन, आग बुझी नहीं...यहां का पुस्तकालय इतना समृद्ध था कि तीन महीनों तक आग जलती रही। आग को वो तपिश आज भी नालंदा के खंडहरों में महसूस की जा सकती है।

हमारे सफ़र का अगला पड़ाव है, बनारस और इसका ज़िक्र अगली पोस्ट में...