Thursday, May 2, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः कर्नाटक में

रात गहरा गई है। नीम के पत्तों में गरम हवा सरसरा रही है। मैं काले कोलतार की सड़क पर घूम रहा हूं, अमलतास की पीली पंखुड़ियां पैरों के नीचे कभी-कभी कराह उठती हैं...चांद टेढ़े मुंह के साथ आसमान के कोने में ठिनक रहा है। हवा चल रही है, आसमान में बादल भी हैं...लेकिन आज दिन में गेस्ट हाउस का अटेंडेंट कह रहा था, ये गुलबर्गा है जनाब...गरमी में यहां पत्थर चटकते हैं।

जी हां, ये गुलबर्गा है।

लोगों की बोली में हैदराबादी पुट है। इलाका भी हैदराबाद-कर्नाटक ही कहा जाता है। वही इलाका, जिसके बारे में मैंने गूगल पर छानबीन बहुत की थी, दिल्ली से चलने से पहले...लेकिन ज्यादा कुछ हाथ नहीं आया था।

दिल्ली से चला था तो महीना अप्रैल का था, दिल्ली में गरमी दस्तक दे ही रही थी। कर्नाटक में चुनावी गरमाहट बढ़ गई थी। मुझे चुनाव कवर करना था।

हमने अपना प्यारा लाल गमछा साथ ले लिया था। दोस्त कहते हैं ये एक स्टाइल स्टेटमेंट बन सकता है। हमें स्टाइल से ज्यादा परवाह है अपने आप को उस कड़क धूप से बचने की, जो यहां इस मौसम में पागल कर देने की हद कर तीखी है।

19 अप्रैल की सुबह को हम बंगलोर स्टेशन उतरे तो लगातार दो रात एक दिन के सफ़र ने रीढ़ की हड्डियों पर असर डाल दिया था। बदन का जोड़-जोड़ और पोर-पोर पिरा रहा था।

बंगलोर की सुबह बहुत प्यारी होती है। शायद शामें भी होती हों...हम शाम तक रुके नहीं। फेसबुक पर हमने स्टेटस डाला भी था, कोई मित्र हों तो मिलें...कई एक मित्र असमर्थ थे, एक अभिनय जी ने शाम की चाय का न्योता दिया था....लेकिन उनकी चाय हमारी नसीब में नहीं थी।

दोपहर तीन बजे तक हम बंगलोर से चल चुके थे। आगे भाषा की समस्या आऩे वाली थी...लेकिन हमारा ड्राइवर मणि अच्छा दुभाषिया है। जब वो हंसता है, तो ठहाके में एक खिलखिलाहट होती है। उसके दांत चमकते हैं। उसका हंसना अच्छा लगता है।
चित्रदुर्ग के पास मनमोहक छटा


रास्ते में बनवारी जी इसरार करते हैं कि कर्नाटक आए तो स्थानीयता का पुट तभी आएगा, जब हम स्थानीय भोजन पर ध्यान दें। नारियल का पानी कर्नाटक में होने की पुष्टि करता है...मैं पके कटहलों की तरफ ध्यान दिलाता हूं। कैमरा सहायक, विनोद बिहार से हैं। उनको कटहल का स्वाद पता है।

बनवारी जी ने भी कटहल लिया है। कटहल की मीठी-मादक गंध...मुझे बचपन याद आ गया। मेरा मधुपुर...सड़क के किनारे नारियल गुल्मों की छटा है, सूरज का रंग बदल रहा है। लेकिन मंजिल दूर है...साढ़े पांच सौ किलोमीटर, भारतीय सड़कों पर। ठठ्ठा नहीं है सफ़र।

विनोद ओझा, कटहल चाभते हुए
 लेकिन दक्षिण कर्नाटक हो या उत्तर, सड़कों की हालत नब्बे फीसद तक सही है। अस्सी की रफ़्तार सामान्य है...। रास्ते में आता है, पहाड़ियों की कतार है, शिखरों पर पवनचक्कियों का घूमना जारी है। चित्रदुर्ग हवा की ताकत से पैदा हुई बिजली से रौशन है...रौशनी की कतारें पीछे छूट जाती हैं...

रौशनी की कतार यहां नीचे भी है, गेस्ट हाउस के सुनसान अहाते में...मेरी बालकनी से इमली का एक पेड़ सटा हुआ है। पेड़ पर नई पत्तियों की बहार है, जिनका रंग अभी ललछौंह ही है। मेरे आंगन के सामने मधुपुर में भी इमली का पेड़ था...पोखरे और हमारे घर की दीवार के बीच।

हमको बताया जाता था कि इमली के पेड़ पर भूत हुआ करते हैं, कभी दिखा नहीं। यहां गेस्ट हाउस के अहाते में नागराज का एक छुटका-सा मंदिर नुमा चबूतरा है। सुना है, अहाते में सांप भी बहुत है।

लेकिन इमली के उस पेड़ को हौले से छूकर दुलराता हूं...लगता है अपने ही घर में हूं,। मेरा मधुपुर गुलबर्गा पहुच गया है। मेरा मन उड़ता है, बादलों के साथ। आसमान में बादल हैं, चांद के लुका छिपी जारी है।


जारी




Wednesday, May 1, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः शांति के अधिष्ठाता की जन्मभूमि लुंबिनी

कुशीनगर में हमारे लिए देखने लायक चीज़ें बची नहीं थीं...दिलो-दिमाग़ में बस बुद्ध और उनके संदेश घूम रहे थे। फक्कड़ों का एक अलग संप्रदाय होता है, कबीर, बुद्ध, नानक...और न जाने कितने संत। जिनने कभी नहीं कहा कि धर्म का अर्थ कुछ लोगों को ज्यादा लोगों का शोषण होता है...जिन्होंने तब के धर्मों में सुधार के लिए अपनी बातें रखीं...।

दिन में खेत देखने के शौक़ीनों ने खेत तक घूम आने का प्रस्ताव रखा। हम किसी भी प्रस्ताव का विरोध कत्तई नही करते, जब तक कि वो घूमने-फिरने से जुडा़ हो।

हर किसी को सरसों के खेत में शाहरूख की तरह आड़े खड़े होकर, और हाथ फैलाते हुए तस्वीरें खिंचवाने का शौक़ सवार था। कतार में खड़े फोटो खिंचवाने पर उतारू लोग। गन्ने का स्वाद भी लिया गया। अंगरेजीदां पत्रकारों के लिए इससे बढ़िया पॉवर्टी टूरिज़म और कुछ हो सकता था क्या।

कुशीनगर में हमें शांति के इस जज्बें को सेलिब्रेट करना था, आप जानते ही हैं सेलिब्रेट करने के लिए क्या चाहिए जाड़े के दिनों में..आह, दिनों में नहीं, जाड़े की शाम में।

होटल के मैनेजर ने होटल की विस्तृत छत पर बोन फायर का जुगाड़ किया था। भुने हुए मांसाहार का उत्तम प्रबंध। अग्नि के चारों तरफ मानव वलय...नृत्यरत लोग।

बुद्ध ने कहा होगा, यही जीवन है, जहां हर पल ही आनंद है। जहां उम्मीदें नहीं हों, जहां जमा करने की अभिलाषा न हो, तो दुख नहीं होगा। लोग बड़ी सादगी से नाच रहे थे। गाने जरूर पंजाबी, अंग्रेजी के लिए नृत्य तो आदिम भंगिमा है ना..।

अलसभोर में, बस में भरकर हम निकले तो चारों तरफ कोहरे का साम्राज्य था। बस के केबिन में जाकर बैठ गया। ड्राइवर और कंडक्टर से मेरी गाढ़ी दोस्ती हो गई थी, वो लोग सरेसा खैनी के शौक़ीन थे। इप्सिता मैडम सारे रास्ते कोहरे से ढंके, सफेद चादर में लिपटे हरे-भरे खेतों को कैमरे में क़ैद करती रहीं।

लुंबिनी में, मुख्य मंदिर के सामने

नेपाल भारत सीमा पर, मुझे स्थानीय पकौड़े की खुशबू मिलने लगी थी। थोड़ा ट्रैपिक जाम था, तो हम उतरकर मुरमुरे (मूढ़ी) और पकौड़े खरीदे जिसके साथ मिर्च की लहसुन वाली चटनी थी...अद्भुत स्वाद था।

लुंबिनी पहुंचते-पहुंचते साढे तीन बज गए। हमारे साथ फ्रांस के एक साथी भी थे, जिनके पासपोर्ट-वीजा़ के चक्कर में घंटा भर लग गया था सीमा पर।

बहरहाल, नेपाल के लुंबिनी जाएंगे तो स्थापत्य से लेकर हवा तक में तिब्बती, चीनी या जापानी खुनक मिलती है। भारतीय नहीं।

मंदिर के भीतर वीडियोग्रफी की मनाही थी...मुख्यमंदिर के अंदर तो स्टिल फोटोग्रफी भी मना थी। बहरहाल, हमने कांच से चारों तरफ से बंद एक पत्थर देखा, जिसे देखने के लिए लंबी कतार लगी थी। वह पत्थर, मान्यता है कि इसी पर सिद्धार्थ का जन्म हुआ था।

सिद्धार्थ की मां का नाम माया देवी थी। प्रसूति का वक्त आने पर माया देवी मायके को जाने लगी थीं, तो साल के एक पेड़ के नीचे उन्हें प्रसूति दर्द हुआ और एक पत्थर पर उनने सिद्धार्थ को जन्म दिया था। कुछ ही दिनों में माया देवी की मृत्यु हो गई। शुद्धोधन के पुत्र सिद्धार्थ का पालन-पोषण किया गौतमी ने, जिसकी वजह से सिद्धार्थ को गौतम भी कहा जाता है।

सिंहली अनुश्रुतियों,  खारवेल के अभिलेख, अशोक के सिंहासनारूढ होने की तिथियों की गणना के आदार पर सिद्धार्थ के जन्म की तिथि ईसा के जन्म से 563 साल पहले आंकी गई है।

सिद्धार्थ के जन्म से पहले उनकी मां ने विचित्र सपने देखे थे। पिता शुद्धोदन ने 'आठ' भविष्यवक्ताओं से उनका अर्थ पूछा। सबने कहा कि महामाया को अद्भुत पुत्ररत्न की प्राप्ति होगी। यदि वह घर में रहा तो चक्रवर्ती सम्राट् बनेगा और यदि उसने गृहत्याग किया तो संन्यासी।

संन्यासी भी ऐसा कि अपने ज्ञान के प्रकाश से पूरी दुनिया को चकाचौंध कर देगा।

शुद्धोदन ने सिद्धार्थ को चक्रवर्ती सम्राट बनाना चाहा, उसमें क्षत्रियोचित गुण उत्पन्न करने के लिये समुचित शिक्षा का प्रबंध किया, किंतु सिद्धार्थ सदा किसी चिंता में डूबे दिखाई देते थे। अंत में पिता ने उन्हें विवाह बंधन में बांध दिया।

खैर, यही जगह लुंबिनी है या नहीं इसके बारे में थोड़ा विवाद है, लेकिन कपिलवस्तु से यह करीब 14 किलोमीटर दूर पड़ता है, जैसा ह्वेनसांग ने वर्णित किया है और अशोक का स्तंभलेख भी है, जिसपर लिखा है---'देवानं पियेन पियदशिना लाजिना वीसतिवसाभिसितेन अतन आगाच महीयते हिदबुधेजाते साक्यमुनीति सिलाविगड़भी चाकालापित सिलाथ-भेच उसपापिते-हिद भगवं जातेति लुम्मनिगामे उबलिके कटे अठभागिए च'----इस हिसाब से तो यही जगह लुंबिनी है।

लुंबिनी को नेपाल सरकार ने एक अच्छे पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया है, लेकिन कुछ बुनियादी सुविधाओं की कमी है।

लुंबिनी के उस ऐतिहासिक पत्थर के आसपास डॉलरों, येनों की बरसात थी, बारह-पंद्रह बोरे नोट तो होंगे ही...पता नहीं लोगों ने क्या सोच कर दान दिया था...जो भी सोचकर दिया हो, हमें शाम को वापस लौटने की जल्दी थी। गोरखपुर में महापरिनिर्वाण एक्सप्रैस हमारा इंतजार कर रही थी...हमारी टीम को आगरे के ताजमहल के दीदार करना था।

मुझे ताजमहल में कोई दिलचस्पी नहीं, पहली बार मैं ताजमहल गया। प्रेम के इस वैभवशाली शो-ऑफ को देखकर मुझे ताज्जुब नहीं हुआ। बादशाह था, ताजमहल तो बनाना ही था उसे....मुझे उस अदने से आदमी दशरथ मांझी की याद आई, जिसने फरहाद की तरह अपनी बीवी के लिए पहाड़ का सीना चीर दिया।

प्रेम हो तो दशरथ बाबा जैसा...जो कुछ कर गुजरे वो भी आपने हाथों से। न कि 22 साल में 20 हजार मजदूरों और सत्ता के दम पर। मुमताज को अगर चुनना होता तो शायद बादशाह के हाथों उगाया एक गुलाब ज्यादा पसंद आता...।

खैर. बुद्ध से जुड़े स्थानों का आवारापन की यह समापन किस्त है...अभी कर्नाटक में हूं। यहां की गरम हवा में आवारगी का अपना मजा है।



Tuesday, April 30, 2013

इतिहास का भूगोल, भूगोल का इतिहासः सुशील झा

 
सुशील झा, पत्रकार

सुशील झा, पेशे से तो पत्रकार हैं, लेकिन उनके अंदर एक रचयिता भी है। सामाजिक विषयों खासकर, समाज के वंचित तबके को लेकर उनकी कविताएं जोरदार तरीक़े से अपनी बात कहती है, गद्य भी कविता की शैली में लिखते हैं, यूं तो वर्चुअल स्पेस में लगातार लिखते हैं, लेकिन लेखन की उनकी शैली दिल को बाग-बाग कर देती है। इतिहास और भूगोल के मेटाफर के इस्तेमाल करते हुए,फेसबुक पर स्टेटस के तौर पर लिखा गया उनका ये अद्भुत लेखन पेशे-नज़र है---- 



1. हर लड़की का इतिहास होता है और हर लड़के का भूगोल...वैसे, हर लड़की को लडके के इतिहास में और हर लड़के को लड़की के भूगोल में रुचि होती है...इन भूगोल-इतिहास की चट्टानों पर प्रेम की दूब उग जाती है...इधर उधर छितर बितर।

2. इतिहास और भूगोल की लड़ाई जहां खत्म होती है वहां दर्शन पैदा होता है....बाल-दर्शन।

3.मैं इतिहास में पीछे था...वो भूगोल में आगे थी...दूब ने दोनों को पीछे छोड़ दिया...और हम फ्रायड की बांहों में झूल गए.

4. धड़कते-धड़कते दिल दीवार हुआ जाता है...लिखते लिखते लिखना लाचार हुआ जाता है...। हम तो पड़े थे उसके भूगोल में, और वो अब इतिहास हुआ जाता है।

5. भूगोल में बैठ कर इतिहास लिखना कैसा होता होगा...और इतिहास में बैठ कर भूगोल के बारे में सोचना

6. एक दिन इतिहास ने भूगोल को गोल कर दिया...भूगोल के गोल होते ही दोनों गार्डन के इडेन में पहुंच गए......
भूगोल के गोल होने से दूब सूख गई और फिर गोल गणित का जन्म हुआ जिससे फिर आगे चलकर लॉजिक, फिजिक्स और मेटाफिजिक्स की शुरुआत हुई।

7. बड़े शहर में हर बात छोटी होती है और छोटे शहर में हर बात बड़ी......वैसे बड़े शहर में हर बात भूगोल पर अटकती है....छोटे शहर में हर बात इतिहास पर।

8. भूगोल बदलता है तो इतिहास बनता है और नया भूगोल पुराना इतिहास ज़रूर पूछता है लेकिन इतिहास को सिर्फ भूगोल में रुचि होती है. इतिहास भूगोल का इतिहास कभी नहीं पूछता। 

9. इतिहास की नियति है भूगोल के पीछे भागना..उसे पकड़ना और फिर उसे इतिहास में बदल देना

10. एक दिन इतिहास ने भूगोल के सामने अपने इतिहास के पन्ने पलटने शुरु किए. भूगोल ने ये देखकर अंगड़ाई ली और अपना जुगराफिया बदला. जुगराफिया बदलते ही इतिहास का मुंह खुला का खुला रह गया और फिर दोनों मिलकर दूब उगाने लगे..

11. ...और फिर एक दिन भूगोल ने कहा इतिहास से कि मुझे तुम्हारा इतिहास पढ़ना है. इतिहास के पास इसका कोई जवाब नहीं था. उसे अपने पुराने भूगोल की याद सताने लगी और वह सामने के भूगोल को ताकते हुए सोचने लगा काश कि दूब उगने लगे फिर से...

12 .नया भूगोल मिलते ही इतिहास अपना पुराना इतिहास भूलना चाहता है लेकिन भूगोल को हमेशा इतिहास के पुराने इतिहास में रुचि होती है

13. इतिहास हमेशा भूगोल भूगोल खेलना चाहता है और भूगोल हमेशा इतिहास इतिहास . इस खेल में नुकसान हमेशा दूब का होता है.

14. भूगोल इतिहास की रगड़ में सबकुछ खत्म हो चुका था. बरसों बीत गए थे. झुर्रियों पड़े हाथों में हाथ थे. इतिहास भूगोल के इतिहास में गुम था और भूगोल इतिहास के भूगोल के इश्क में उलझा हुआ-सा था.






Friday, April 26, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः कुशीनारा, जहां बुद्ध ने ली थी अंतिम सांस


बनारस के बाद हमारा अगला पड़ाव था, कुशीनगर। हमारी महापरिनिर्वाण एक्सप्रैस तो गोरखपुर में जाकर रूक गई। और इस दफा अलसभोर में ही पहुंच गई। बस से हम कुशीनगर पहुंचे। 
प्राचीनकाल में कुशीनगर का नाम कुशीनारा था।
 
ईसा से 483  साल पहले भगवान बुद्ध ने यहां पर अपनी देहत्याग की थी। इस घटना को महापरिनिर्वाण कहा जाता है। 

कुशीनगर में सबसे प्रमुख स्तूप है वो है निर्वाण स्तूप। ईंट और रोड़ी से बने इस विशाल स्तूप को 1876 में कार्लाइल ने खोजा था। इस स्तूप की ऊंचाई पौने तीन मीटर है। 

खुदाई से यहां एक एक तांबे की नाव मिली। इस नाव में खुदे अभिलेखों से पता चलता है कि इसमें महात्मा बुद्ध की चिता की राख रखी गई थी।


महानिर्वाण या निर्वाण मंदिर कुशीनगर का प्रमुख आकर्षण है। इस मंदिर में महात्मा बुद्ध की 6.10 मीटर लंबी प्रतिमा स्थापित है। 1876 में खुदाई के दौरान यह प्रतिमा प्राप्त हुई थी। यह सुंदर प्रतिमा चुनार के बलुआ पत्थर को काटकर बनाई गई थी। प्रतिमा के नीचे खुदे अभिलेख के पता चलता है कि इस प्रतिमा का संबंध पांचवीं शताब्दी से है। कहा जाता है कि हरीबाला नामक बौद्ध भिक्षु ने गुप्त काल के दौरान यह प्रतिमा मथुरा से कुशीनगर लाया था।
महात्मा बुद्ध की लेटी प्रतिमा, कुशीनारा


दरअसल, इस प्रतिमा की खासियत है कि इसमें बुद्ध लेटे हुए हैं। पैर की तरफ से देखे तो वह मृत शरीर की भंगिमा वाली है, जिसे निर्वाण मुद्रा कहते हैं। छाती के पास से देखें, तो बुद्ध आशीर्वाद देने की मुद्रा में नजर आते हैं, और सिर की तरफ से देखे तो यह प्रतिमा मुस्कुराती हुई नजर आती है।

यहीं से थोड़ी दूर पर, माथाकौर मंदिर भी है। 

भूमि स्पर्श मुद्रा में महात्मा बुद्ध की प्रतिमा यहां से प्राप्त हुई है। यह प्रतिमा बोधिवृक्ष के नीचे मिली है। इसके तल में खुदे अभिलेख से पता चलता है कि इस मूर्ति का संबंध 10-11वीं शताब्दी से है। इस मंदिर के साथ ही खुदाई से एक मठ के अवशेष भी मिले हैं।

बुद्ध के काल में कुशीनगर, बाद में कसिया बन गया। यह मल्लों की राजधानी थी, जिसका वर्णन महाभारत के भीष्म पर्व में भी है।
निर्वाण स्तूप का अगला हिस्सा, कुशीनगर


बौद्ध साहित्य में कुशीनगर का विशद वर्णन मिलता है। इसमें कुशीनगर के साथ 'कुशीनारा, कुशीनगरी और कुशीग्राम  जैसे दूसरे नामों का भी उल्लेख है। बुद्ध-पूर्व युग में यह कुशावती के नाम से विख्यात थी। 

बुद्ध को भी कुशीनगर से कुछ ज्यादा ही लगाव था। कुछ बौद्ध साहित्यों में सात बोधिसत्वों के रूप में बुद्ध ने मल्लों की इस राजधानी पर शासन किया था। आखिरी बार जब बुद्ध यहां आए को मल्लों ने उनका खूब स्वागत किया और उनके स्वागत-सत्कार में शामिल न होने वाले पर 500 मुद्राओं का दंड निर्धारित किया गया था।

गौरतलब है कि बुद्ध के निर्वाण के संदर्भ में कई किस्से चलते हैं। लेकिन वहां के स्थानीय गाइड ने हमें बताया कि बुद्ध को एक लुहार के हाथों शूकर (इसके दो अर्थ हैं, सू्अर का मांस और शकरकंद) खाने से अतिसार हो गया। 

तब उन्हें लग गया कि विदाई की वेला आन पड़ी है। फिर, बुद्ध ने महापिरनिर्वाण हासिल किया। तब उनके शरीर को सात दिनों तक दर्शनो के लिए रखा गया और फिर मुकुटबंधन चैत्य के स्थान पर उनका दाह संस्कार किया गया। 

दाह-संस्कार के पश्चात् अस्थि-विभाजन के संदर्भ में विवाद उत्पन्न हो गया। इस अवसर पर उपस्थित लोगों में वैशाली के लिच्छवी, कपिलवस्तु के शाक्य, अल्लकप के बुली, रामग्राम के कोलिय, पावा के मल्ल, मगधराज अजातशत्रु तथा वेठ-द्वीप (विष्णुद्वीप) के ब्राह्मण मुख्य थे। कुशीनगर के मल्लों ने विभाजन का विरोध किया। 

प्रतिद्वंद्वी राज्यों की सेनाओं ने उनके नगर को घेर लिया। युद्ध प्राय: निश्चित था, किन्तु द्रोण ब्राह्मण के आ जाने से अस्थि अवशेषों का आठ भागों में विभाजन संभव हुआ। विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि अस्थि अवशेषों को अपनी राजधानियों में ले गए और वहाँ नवर्निमित स्तूपों में उन्हें स्थापित किया गया।

आवारेपन का रोज़नामचा जारी है, कुछ कुशीनगर का किस्सा कुछ लुंबिनी का, जहां बुद्ध का जन्म हुआ था।

Saturday, April 20, 2013

सुनो! मृगांकाः 30: झल्ला की लब्दा फिरे...


आसमान बादलों से घिरा था, लेकिन धरती प्यासी थी। धरती की प्यास और अभिजीत की प्यास का पैमाना तकरीबन एक सा था।

हवा तेज़ चल रही थी...। काले मेघ, इन्ही हवाओं से टकरा कर दूर चले जाने वाले थे।

अचानक न जाने क्या सूझा अभिजीत को...अंदर जाकर, अपनी ह्विस्की की बोतल उठा लाया। शाम होने में अभी देर थी। दिन अभी ढला नहीं था। अभिजीत को हैरत हो रही थी, अपनी इस दशा पर। गांव में अपने मन का बहुत कुछ किया था उसने।

पहला पैग अंदर गया। अभिजीत का अपने मन पर से नियंत्रण हट गया। ऐसी ही नम हवा चल रही थी, जेएनयू के अहाते में गंगा ढाबा के आसपास कहीं किसी पत्थर पर बैठकर चाय सुड़कते  हुए अभिजीत ने मृगांका को फोन किया था।

याद वहीं।

दूसरा पैग बना, खतम हुआ। याद आया कि एक बार मृगांका ने पूछा था, मेरी कौन सी तस्वीर तुमको अच्छी लगती है....खटाके से अभिजीत ने उसको बांहो में भरते हुए कहा था, जिसमें तुम्हारे ब्रा के स्ट्रेप्स दिखते हैं।

झल्ला...मृगांका चीखी थी। छीः शर्म नहीं आती तुम्हें।
 अभिजीत ने बिना शरमाए कहा था, तुमसे क्या शरमाना।  मृगांका नक़ली ग़ुस्से से दांत पीसती रही और अभिजीत का गाल चुंबनों से भर दिया था...अभिजीत के गालों पर लिपस्टिक के दाग़...और अभिजीत ने बहुत देर तक चेहरा नहीं धोया था।

यादों का विस्तार होता रहा, पांच पैग के बाद, हिचकी आने लगी। गला सूखने लगा। लगा कि ब्लाडर फट जाएगा। वह घर के पीछे खेत की तरफ गया। गांव में उसे उस सुनसान खेत में पेशाब करने में मजा आता था। आसमान में बादल अभी भी थे ही, लेकिन बारिश की संभावना खतम हो गई थी।

कुछ सोचकर वह डगमगाते कदमों से अपनी बाइक की तरफ बढ़ा। कांपते हाथों से बाइक में चाबी डाली...नहीं डली। बेतरह लड़खड़ाते हुए, अभिजीत ने अपनी साइकिल को देखा...। गांव की सड़क पर, डगमगाती साइकिल खजौली की तरफ बढ चली।

कभी मृगांका ने कहा था उससे, मुझे साइकिल की सवारी नहीं कराओगे...। अभिजीत समझ गया था कि मृगांका मज़े ले रही है। मृगांका ने बहुत संजीदगी से कहा था कि उसे साइकिल की सवारी करनी है...लेकिन गांव में लड़कियां साइकिल चलाती हैं, नीतीश कुमार ने हर लड़की को साइकिल दिया है सरकार की तरफ से...लेकिन गांव की बहू चलाएगी?

अभिजीत इसी सोच में चल रहा था। कमला नदी की एक उपधारा उसके गांव से होकर गुजरती है...गरमियो में वह भी सूख जाती है। थोड़ा सा पानी बचा रहता है जिसमें भैंसे लोटमलोट किया करती है। अभिजीत उसी पुल पर से पार कर रहा था।

पूरे गांव की औरतें अभिजीत को इस तरह डगमग साइकिल चलाते हुए देखकर हंस-हंस कर दोहरी हुई जा रही थीं। कुछ ने तो हंसी छिपाने के लिए पल्लू मुंह में ठूंस लिया था...। वो अभिजीत की हालत पर नहीं, उसके साइकिल चलाने के अंदाज़ पर हंस रही थी। वरना अभिजीत तो उनके लिए एक ऐसा प्रतिष्ठित शख्स बन चुका था, जिसने गांव की जाती हुई रौनक को करीब-करीब लौटा दिया था।

गांव का हर विद्यार्थी उसका छात्र बन चुका था। स्कल से लेकर खेती तक, और नई तकनीकों से लेकर पोखरे में जलकुंभी की सफाई तक, पिछले दो महीने में अभिजीत ने मिशन की तरह काम किया था। सही रास्ते पर लेकर आने वाला अभिजीत आज खुद डगमग था।

खजौली पहुंच कर अभिजीत ने सीधे एसटीडी बूथ से प्रशांत का नंबर डायल किया। वह सोचकर कुछ आया था, सोचा उसने वही था...सीधे मृगांका से बात करेगा। लेकिन बूथ में घुसकर हिम्मत नहीं हुई।

हलो
हलो
प्रशांत...
अबे...अभिजीत। कैसा है बे।
ठीक हूं, तू बता
अच्छा है
और...सब
सब क्या, मां दिल्ली आकर मृगांका के घर पर टिक गई हैं। कहती हैं बेटा और बहू को साथ देखकर वापस जाएंगी, मृगांका भी बहुत परेशान है...
ओह...
...और तूने जरूर पी रखी होगी
नहीं
तुम्हारा आवाज से लग रहा है साले...सुन..एक बात  हो गई है
क्या
तुम्हारे पब्लिशर ने तुम्हारी नई किताब पर कुछ उल्टा लिख दिया है, फ्लैप पर।
क्या
लिखा है कि अभिजीत की आखिरी किताब है...
तो
लिखा है इसके बाद नहीं लिखेगा
हा, सही है
अबे नहीं यार। लौट आ।लौट आ ना यार...प्रशांत रो पड़ा। ...और सुन मैं मां को और मृगांका को गांव भेज रहा हूं..अब कोई बात नहीं सुनूंगा। बस

अबे सुन तो..

प्रशांत ने सुनने से पहले फोन रख दिया। अभिजीत का आधा नशा उतर गया...लेकिन मृगांका एक ऐसा नशा थी जो ताउम्र उस पर तारी थी। मानिजुआना से भी गजब का नशा...वह थोड़ा डरा हुआ था, तोड़ा खुश। वह चाहता भी तो ता मृगांका को जीभर देख पाए।








Wednesday, March 20, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः मैं कहता तू जागत रहियो


मही एक कलम के मज़दूर का गांव था। बनारस अपने आप में क्या है, प्रेमचंद, बिस्मिल्ला खां...बाबा विश्वनाथ, कबीर और इन जैसे फक्कड़ों का ही तो गुड़-शक्कर की तरह मेल ही तो। 

बनारस गए और लहरतारा नहीं गए, तो यात्रा अधूरी है। 
 
हम जब कबीर के गांव पहुंचे, तो हवा में अजब-सी आध्यात्मिकता घुली थी। १० फीट चौड़ी सड़क पक्की थी। लेकिन सड़कों का पक्का होना गांव की तरक्की का सुबूत नहीं था। गांव में पक्के मकान थे, लेकिन कुछेक ही। 

गांव के प्रधान का मोबाईल नंबर हमारे पास था। बनारस में ही एक जानकार से मिल गया था। 

बहरहाल, गांव के प्रायः हर घर से खटा-खटाखट की आवाज़ आ रही थी। हथकरघे की..। कबीर जी साकार हो गए। 

दूर किसी घर में किसी मरदाना आवाज़ ने स्वागत किया... झीनी-झीनी बीनी चदरिया बीनी रे बीनी.. काहे का ताना काहे का भरनी....देखा सफेद दाढी में शख्स। हमें देखते ही राम-राम। ताज्जुब हुआ। हमने कहा अस्सलामवालेकुम..। उत्तर आया राम-राम। 

हमारी हैरत पर और परदे डालते हुए उन्होंने कहा हम हिंदुओं और मुसलमानों का फरक नहीं करते। 

सिर झुक गया। असली हिंदोस्तां यहीं है, अयोध्या में है, न गोधरा में...न सोमनाथ में, न जामा मस्जिद में...न सांप्रदायिक रंग लिए किसी और जगह।

 लेकिन आध्यात्मिकता के इस रंग को वास्तविकता ने थोड़ा हलका ज़रूर कर दिया। पूरा गांव बुनकरों का है। यहां के लोग अपने पुश्तैनी धंधे में जुटे हैं, दिनभर करघों की आवाज़ गूंजती है, लेकिन रात को नहीं...क्योंकि रात को बिजली नहीं होती। 

कम रौशनी में काम करने की वजह से कई लोगों की आँखें चौपट हो गई हैं। बिजली आती है लेकिन देर रात दो बजे के बाद... और सुबह होते ही फौरन चली जाती है। 

सांझ को काम गैसलाईट में होता है... रेणु जी की कहानी 'पंचलैट' याद आ गई। ऊपर से तुर्रा ये कि अमेरिका से शुरू हुई मंदी ने बनारस के बुनकरों पर असर दिखाना शुरू कर दिया है। 

दिहाड़ी मज़दूरी पर काम करने वाले बुनकरों को साहूकार पहले ही कम मज़दूरी देते थे, लेकिन मंदी की मार ने मज़दूरी की उस रकम को भी लील लिया है। ..

इसी धंधे में लगे मो. अल हुसैन हमसे मिले। कम होती मज़दूरी ने इन्हें इस लायक नहीं छोड़ा है कि वो अपनी बेटी को स्कूल भी भेज सकें। आखिरकार, इन्हें पेट और पढाई में से एक ही चीज़ चुननी थी और इन्होंने पेट को तरजीह दी।  देनी ही थी। उनकी बेटी पोलियोग्रस्त है.. उनकी शादी की चिंता भी है। 

हम नीम की घनी छाया में बैठे। नौजवान बुनकर भी कबीर ही गुनगुना रहे थे। एक ने फिल्मी रोमांटिक तान छेड़ी..। हमें भी अच्छा लगा।

तब तक कोक की बोतल में हैंडपंप का शीतल जल आ गया। कोक की पहुंच यहां तक हो गई है। 

लेकिन राहत ये कि सिर्फ बोतल था, पानी ऑरिजिनल था। अजब मिठास था, पानी में। एक बुजुर्ग प्लेट में दोलमोठ और बिस्कुट ले आए। हमें बहुत शर्म आई.. तकरीबन पूरा गांव शूटिंग देख रहा था, खिड़कियों से झांकती पर्दानशीं महिलाएं.. बकरियों के आगे पीछे खड़े नंग-धडग बच्चे।

 फुसफुसाते बतियाते नौजवान...। उनकी आंखों में उम्मीद की एक किरण थी। बैंक से कर्ज नहीं मिलता कि पावरलूम लगवाएं.. राशनकार्ड नहीं है...बीपीएल कार्ड प्रधानजी ने अपने नज़दीकियों को दिया है..समस्याओं का अंबार था। 

हमें लगा कि हम महज रिपोर्ट बनाने और लिखकर कहीं छाप देने से ज्यादा क्या कर सकते हैं। क्या हम इस समस्या के निदान के लिए किसी भी तईं जिम्मेदार हैं...या हमें तटस्थ रहना चाहिए।  

क्या हमारी बात उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार तक पहुंच पाएगीशंका मुझे भी है।

गांव में पीने के पानी की समस्या थी। पूरे गांव में एक मात्र हैंडपंप है जो नीम के पेड़ के नीचे है। मंदी के असर से खूबसूरत और दिलकश बनारसी साड़ियों की मांग पर असर पड़ा है। जाहिर है, बनारस के आसपास के गांव के बुनकर इससे परेशान हैं। 

बुनकरों की दिहाड़ी पहले 60-70 रूपये थी, घटकर अब वह 40 रूपये हो गई है। मंहगाई ने कमर पहले से तोड़ दी है। 

मलाल इस बात का है कि उनकी माली हालत पर किसी की नज़र नहीं। बिचौलियों और साहूकारों के कर्ज़ से दबे बुनकर अपनी शिकायत करें भी तो किससे। मंदी में साडियों की मांग में आई कमी ने उनकी हालत शोचनीय बना दी है।

कबीर ने पता नही कब निरगुन गाया था यहां...लेकिन बुनकरों की दशा ऐसी कि स्थिति खुद ब खुद निरगुन गवाने लग जाए। महात्रासदी के ग्रीक कोरस की आवाज़ लहरतारा में सुनाई दे रही है...झीनी-झीनी नहीं...मैं कहता तू जागत रहियो।

Tuesday, March 5, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः लमही में

हुत छोटा था, जब मैंने 'गोदान' पढ़ ली थी। उससे भी पहले छठी क्लास में हिंदी की पाठ्य पुस्तक में प्रेमचंद के बचपन का ज़िक्र था। तो मन में एक उत्कंठा थी कि आखिर प्रेमचंद का वह गांव, जहां का वर्णन वह इस तल्लीनता से करते हैं, होगा कैसा?

यात्रा के दौरान इस बात का मौका मिला कि लमही जाऊं। बनारस से मैंने सीधा रूख किया लमही का। थोड़ा वक्त था, तो मैंने राजीव (ड्राइवर ) को कहा सीधे लमही चलने के लिए।
राजमार्ग पर ही एक बड़ा से गेट बना है, मुंशी प्रेमचंद स्मारक गेट। उसके साथ ही दसफुटिया पक्की सड़क आपको लमही तक ले जाएगी।

गांव में घुसते ही पहले तो आपको एक बड़ा-सा बोर्ड नज़र आएगा। निर्मल ग्राम-लमही। यहां-वहां दीवारों पर मनरेगा के नारे। उसी बोर्ड के पीछे दिखेगा एक साफ-सुथरा पेयजल का इंतजाम। हैंडपंप नहीं... टैपवॉटर। पानी की टंकी और उससे लगे आठ नलकियां। यहीं उसके उलटे हाथ पर प्रेमचंद का पैतृक आवास है।

कुछेक साल पहले यह टूटी-फूटी हालत में था। लेकिन अभी ठीक-ठाक है। सफेद पुताई के साथ गरिमामय मौजूदगी। उससे ठीक पीछे है प्रेमचंद स्मृति भवन। ज़िला प्रशासन ने थोड़ा ध्यान तो दिया है। गोदान पढ़ें और आज के लमही को देखें, तो बड़ा अंतर है।

मुझे लगता है कि प्रेमचंद ने जब गोदान लिखा होगा तो लमही कहीं-न-कहीं उनके मन में साकार रहा होगा। ऐसे में मुझे लगा कि होरी, धनिया, गोबर और झुनिया से मिला जाए।  मैंने एक किसान खोज ही निकाला। चेहरे पर झुर्रियों वाले बुजुर्गवार से मिलते ही लगा, यही तो होरी है। एक पैर में चोट लगी थी सो थोड़ा लंगड़ा कर चल रहे थे। एक नौजवान ने कंधे का सहारा दे रखा था।

हमसे मिलते ही कहने लगे दरवाजे पर चलो, तो खटिए पर बैठ कर बातें करें। हमारे इस नए होरी के घर पर तीन गाएं बंधी थी , दो भैंसें भी थीं। उन्होंने बताया कि घर पर टीवी भी है, और डीटीएच भी। हां, ये सारा कुछ महज किसानी से नहीं आया। राजमार्ग के बगल वाली ज़मीन उनने निकाल दी (यानी बेच दी) और खेती तो है ही। दूध से भी कमाई हो जाती है। दूध बनारस चला जाता है। खाने-पहनने की कमी नहीं।

हमारी बातचीत के दौरान उनकी घरवाली (हमारे हिसाब से धनिया) चटख रंग की सा़ड़ी को कोर मुंह में दबाए मुस्कुराती रही।

झुनिया भी बदल गई है। होरी के गांव में झुनिया सिलाई-कढाई का स्कूल चलाती है। गोबर, अब गोवर्धन बन गया है। लखनऊ जाने की ज़रूरत नहीं। बदलते वक्त और बाजार ने गोबर के लिए मौके भी दिए है, और सम्मान भी। 

गांव के नौजवान के पास मोबाइल फोन है और उसका बेझिझक इस्तेमाल... मुझे फील गुड हो रहा था। (हालांकि आगे की यात्रा में यह एहसास कायम नहीं रह पाया।)


पूरे गांव की सड़कें लगभग साफ-सुथरी थी। नालियां भी साफ थी। एक आम भारतीय गांव से थोड़ा अलग लगा लमही। कम से कम पहली नज़र में ..। गांव में कई भारत मार्का हैंडपंप लगे थे। खेत में फसल भी थी ठीक ही थी। मसूर, अरहर, गेहूं और पीले सरसों के खेत।


लेकिन, साथ ही बहुत कुछ सालता भी है। प्रेमचंद इतने बड़े साहित्यकार हुए, उनके नाम पर देश भर में कोई विश्वविद्यालय तक नहीं, प्रेमचंद के नाम पर राजधानी दिल्ली में कोई सड़क नहीं। दिल्ली ने मार्शल टीटो से लेकर कर्नल नासिर तक के नाम पर सड़क बनाकर सम्मान जाहिर किया गया है।


पता नहीं क्यों प्रेमचंद सम्मान के हकदार नहीं हो पाए। जनता उन्हें कितना प्यार करती है ये बात और है।


मैंने सुना है कि लंदन में वह शहतूत का पेड़ आज तक सुरक्षित है, जिसे शेक्सपियर ने लगाया था। लेकिन, भारत को और भारतीयों को अपनी विरासत पर पता नहीं ज़रा भी गर्व नहीं होता। थाती को संभाल कर रखना तो दूर है।


जहां तक किसानों की बात है, लमही का हमारा तजुर्बा पूरे भारत की बदलती तस्वीर बयां नहीं करता। बाकी के भारत में होरी अभी भी मर ही रहा है। किस्से भले ही बाहर नहीं आ पाते..।  लमही अलहदा था...।

पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह गांव आपने आसपास के गांवों से अलग है। सौ किलोमीटर दूर ही बुंदेल खंड है..वहां की दास्तां अलग है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवो की जो दशा है लमही कम से कम पहली नज़र में अपवाद लगता है। मुझे बड़ी शिद्दत से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली जिले के किसान की याद आई जो संपन्न गांव में अपवाद था...जिसने राष्ट्रपति से आत्महत्या की अनुमति मांगी है।


अपवाद कितनी चटख रंगो के होते हैं, अपनी ओर फटाकदेनी से ध्यान खींचते हैं। है ना।

जारी