Tuesday, July 23, 2013

कर्नाटक के विकास की अंतर्गाथा



गरमी झेलता हुआ, गुलबर्गा में अपनी बालकनी से डूबते सूरज को देखता हूं। गुलबर्गा में डूबता हुआ सूरज भी दहकता हुआ लगता है। 

दिल्ली से बंगलोर को चले थे, तो मन में कर्नाटक के विकास की एक तस्वीर थी। कर्नाटक के मायने बंगलोर था। 

लेकिन बंगलोर ही पूरा कर्नाटक नहीं है। बंगलोर का तो मौसम भी पूरे कर्नाटक से अलहदा है और विकास की गाथा भी। 

कर्नाटक के विकास को हमेशा एक मिसाल के तौर पर पेश किया जाता है लेकिन विकास की अंतर्गाथा कुछ और ही है। उत्तरी कर्नाटक के जबर्गी और गुलबर्गा के इलाको में पीने का पानी एक बड़ी समस्या है। इस तस्वीर की तस्दीक करते हैं सूखे हुए खेत, जिनका अनंत विस्तार देखने को मिलता है। 

अप्रैल में गुलबर्गा के पास सूखी नदी, फोटोः मंजीत ठाकुर

कपास की फसल पिछले दो साल से खराब हो रही है, क्योंकि दो साल से बारिश ने साथ नहीं दिया। अब तो आस पास के इलाके के लोगों को पीने के पानी के लिए मशक्कत करनी होती है।

लोग छोटे ठेलों पर प्लास्टिक के रंग-बिरंगे मटके लेकर आते हैं। कोई पांच किलोमीटर ले जा रहा है पानी ढोकर, तो कोई सात किलोमीटर, एक बंधु ने तो मोपेड ही खरीद ली है पानी ढोने के लिए ।

पूरा उत्तरी कर्नाटक, खासकर हैदराबाद-कर्नाटक के इलाके में सूखी नदियां और सूखी नहरें सूखे की कहानी कह रही हैं। 

नलों के किनारे लगे प्लास्टिक के घड़ों की कहानी भी अजीब है, प्लास्टिक युग में मोबाइल तो उपलब्ध है लेकिन पीने का पानी मयस्सर नहीं। लोगबाग तालाब का पानी पीने पर मजबूर हैं, यह पानी भी तभी आता है जब बिजली हो। बिजली का भी अजीब रोना है, जो दोपहर बाद डेढ़ घंटे के लिए आती है और अलसुबह डेढ़ घंटे के लिए।
 
जाबार्गी में नलों के पास दुहपरिया से ही मटकों की लग जाती है कतार, फोटोः मंजीत ठाकुर


दरअसल, लोगों ने तालाब में पानी का मोटर लगवा रखा है। हैंडपंप खराब हैं तो कम से कम तालाब का पानी तो मिले। भूमिगत जल तो न जाने कब पाताल जा छुपा है। 

बिजली आती नहीं तो मोटर कैसे चले। ऐसे में दोपहर से ही, मटके नलों के किनारे जमा होने शुरू हो जाते हैं। उस दुपहरिया में जब छांव को भी छांव की जरूरत थी।

चुनाव का वक्त था, जब हम वहां थे। कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए स्थायित्व एक अजेंडा था, लेकिन उत्तरी कर्नाटक के गांवों में पीने का पानी मुहैया कराना किसी पार्टी के घोषणापत्र में नहीं था। 

जाहिर है कर्नाटक की विकास गाथा की पटकथा में कहीं न कहीं भारी झोल है। 

हम पसीनायित हैं...लेकिन हम पानी खरीद कर पी रहे हैं। लेकिन गांववाले...चुनावी दौरे-दौरा में पता नहीं क्या-क्या सब्ज़बाग़ थे...जिक्र नहीं था तो किसानों के लिए सिंचाई के पानी का, न पीने के पानी का।

 

Sunday, July 21, 2013

कुछ तस्वीरें--रोहन सिंह

फोटॉग्रफी की कला अपने आप में पूरी पत्रकारिता है। हमारे साथी रोहन सिंह हाल ही में कच्छ के रन गए थे, वहां डॉक्युमेंट्री शूट के दौरान कुछ तस्वीरें भी उतार लाए हैं। आपसे साझा कर रहा हूं।
United We Stand...हम एक हैं! फोटोः रोहन सिंह

bells and their Music..रुनझुन! फोटोः रोहन सिंह

One For All, All For One! एकोहम्  फोटोः रोहन सिंह

Monday, July 15, 2013

सुनो मृगांका:38: जलते हैं जिसके लिए, मेरी आंखो के दिए

पटना से झारखंड में अभिजीत का गृहनगर बहुत दूर नहीं।

ट्रेन की बजाय, भरत किस्कू ने ज़ोर दिया कि सड़क मार्ग से यात्रा की जाए। मृगांका अभिजीत के गांव गई थी तो सड़क के दोनों तरफ देखने का खयाल तक नहीं आया था दिल में।

अब तो भरत उसे दिखाता हुआ ले जाएगा। पटना से उसकी एसयूवी निकली भी न थी कि प्रशांत का फोन आ गया, भाभी, मैंने छुट्टी बढ़वा ली है। अभिजीत के पास अंकल जी भी हैं और चाची भी। उसके भैया-भाभी भी आ ही चुके हैं। क्यों न मैं चलूं आपके साथ। मैं भी देख लूंगा झारखंड।

मृगांका को भला क्या उज्र हो सकता था। उसके बैग में कुछ कपड़े थे, और दो छोटे वीडियो कैमरे, बैटरी, चार्जर, मेमरी कार्ड वगैरह। डायरी तो खैर थी ही...।

एनएच पर जब प्रशांत मिला तो उसके साथ थी एक हसीं सी लड़की भी। सांवला रंग, सुतवां नाक, नाक में सानिया मिर्जा-कट नथ, लहरदार बाल, भूरी-सी आंखो में चमक...उस वक्त तो इतना भर देख पाई मृगांका।
तय रहा कि पहले सड़क के किनारे नामचीन ब्रांड के रेस्तरां में पहले कॉफी पी जाए, आगे की बात बाद में तय करेंगे।

भाभी, ये हैं अनन्या। हमारे मेडिकल कॉलेज की बैचमेट. ये यहीं पटना में प्रैक्टिस करती हैं। फेसबुक पर बातें होती रहती थी, लेकिन यहां मुलाकात भी हो गई।

मृगांका ने नजरों से तौला। नः, बात इतनी ही नहीं है।

दी, मैं सोच रही थी कि कुछ दिन चलूं आपके साथ, बहुत सुना है मैंने। थोड़ा वक्त भी गुजर जाएगा मेरा।--अनन्या ने अपनी कोमल आवाज़ मे कहा।

अनन्या, हम पिकनिक पर नहीं जा रहे।

जी पता है, आप अपनी रिपोर्टिंग करते रहिएगा दी, मैं जरा गांवों में कुछ बच्चों का इलाज कर दिया करूंगी...अनन्या अनुनय कर रही थी।

मृगांका ने देखा, प्रशांत की नजरों में कुछ था। उसे लगा कि इन दोनों को एक दूसरे का साथ चाहिए, तो यही सही।

निर्णायक स्वर में उसने कहा, चलो।

अब भरत किस्कू ड्राइव कर रहा था, अनन्या प्रशांत पिछली सीट पर बैठे और अगली सीट पर बैठी मृगांका खोई नजरों से सामने काली सड़क को देखती रही, एकटक।

बगल के लेने से किस्कू ओवरटेक कर दे रहा था, बारिश शुरू हो गई थी, लेकिन बारिश में भींगते पेड़ भी पीछे छूटते जा रहे थे।

बारिश बहुत गहरे ज़ख्म़ देती है।

अभिजीत, बिना तुम्हारे कितनी बेरहम लग रही है ये बारिश। मन का कोई कोना सूखा नहीं लग रहा।अनन्या और प्रशांत दोनों थोड़ी देर के लिए खामोश बैठे रहे।

किस्कू गाड़ी तेज़ चला रहा था, लेकिन बारिश का व्यवधान था। वाइपर सपा-सप चल रहा थे। बारिश की मोटी बूंदें पायल जैसा संगीत बजा रही थीँ। बस वही आवाज़, इंजन की घरघराहट, पहिए के जोर से छपाक से उड़ता सड़कों पर जमा पानी...

किस्कू ने इस असहज-सी होती शांति को तोड़ने के लिए स्टीरियो चला दिया, तलत महमूद एकदम उदास होती आवाज़ में गा रहे थे, जलते हैं जिसके लिए, मेरी आंखों के दिए...

आवाज़ की उदासी मृगांका को तर करती गई। आंखों में उदासी के मंजर...कितना बेचारा लग रहा है वह अभिजीत...जिसकी बढ़ी हुई शेव वाली झलक पाने को वो बेताब रहा करती थी। जिसकी बदतमीज निगाहों को वह निहारा करती थी हरदम...जिसके आत्मविश्वास और उसूलों ने मृगांका के मन में उसके लिए प्रेम के साथ-साथ इज़्ज़त भी पैदा की थी।

अनन्या ने तोड़ा इस सन्नाटे को। हमलोग झारखंड में किधर चल रहे हैं।

अभिजीत सर के घर।

लेकिन, वहां तो कोई होगा नहीं, फिर..

फिर क्या, आप चलिए तो सही.भाभी जी, अभिजीत सर ने पता नहीं पैसा कितना कमाया, या नहीं कमाया। लेकिन इस इलाके के लोग मानते बहुत हैं अभिजीत सर को। वो इस इलाके में तब से आते रहे हैं जब उनकी किताब छपी भी नहीं थी। तब से, जब से आपसे जुड़े भी नहीं थे वो।

लाल मिट्टी के इस इलाके, साल-सागवान के इन जंगलों, पलाश के फूलों, ग्रेनाइट के इन काले पत्थरों...केंदू पत्तों, बेर, बेल, शरीफे के फलों, कितना प्रेम करते थे वो।

थे नहीं भरत, हैं। अभिजीत अभी भी प्रेम करता है इनसे।

हां, भाभी, वही। उसके सधे हुए हाथ स्टीयरिंग वील पर घूम रहे थे। उनकी गाड़ी बरही वाले रास्ते पर एनएच 2 पर आ गई थी। उधर से ही गिरिडीह...और पीरटांड प्रखंड। नक्सलियों का इलाका...

*

जमुई के पहले से ही मिट्टी का रंग बदलने लगा था। धूसर मिट्टी पहले हल्की पीली और फिर गहरी लाल हो गई। समतल मैदान में पहले छोटे टीले दिखे, और अब पहाड़ियां दिखने लगीं थी। इलाका पठारी था, मैदानी हरियाली की जगह थी तो हरियाली ही, लेकिन झाडि़यां ज्यादा थीं।

मिट्टी में कड़ापन आ गया था।

...अभिजीत भैया, इस इलाके का बारंबार दौरा करते थे। कुछ नहीं, बस कंधे पर टंगा एक झोला, एक डायरी, पेन। चाय के शौकीन। भूखे रहे तो, मूढ़ी (मुरमुरे) और चाय पर भी कोई दिक्कत नहीं...।

भरत किस्कू चालू था। सड़क संकरी हो गई। चौड़ी सड़क अब दसफुटिया प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना वाली सड़क में तब्दील हो गई थी।

..यहां की जनजाति संताल है। बाहरी लोगों ने उनका बहुत शोषण किया है। उनको दीकू कहते हैं ये। मैं भी संताल ही हूं...सरहुल , सोहराय मनाते हैं हम। साल की पूजा करते हैं, महुए की भी। प्रकृति पूजक हैं। लेकिन अंग्रेजों के वक्त जो शोषण शुरू हुआ, हमें जंगलों से भगाने का सिलसिला शुरू हुआ वो आज तक जारी है...भरत तैश में आ गया था।

सड़क और पतली हो गई। डामर वाली सड़क अब सीमेंट वाली सड़क में तब्दील हो गई थी। जिसपर गांव वालों ने हर पचास मीटर पर बंपर बना रखे थे। गाड़ी चलती कम हिचकोले ज्यादा खाने लगी थी।

हम पर और हमारे लोगों पर क्या बीती, हम क्या बताएं आपको ...बताएंगे कभी बाद में, लेकिन अभिजीत भैया ने बागी हो चुके सैकड़ों लोगों को एकतरह से नई जिंदगी भी दी और ऩया तरीका भी बताया जीने का...सिर्फ लड़ना-भिड़ना ही नहीं, जीना भी।

तो क्या अभिजीत नक्सल बन गया था? मृगांका पूछ बैठी।

गाड़ी ने हिचकोला खाया, सड़क एक तरफ मुड़ रही थी, गाड़ी दूसरी तरफ मुडकर कच्चे रास्ते पर आ गई थी। लाल मिट्टी का कीचड़ पहिए पर लग रहा था, कुछ गए हुए लोगों के निशां बने थे।

मृगांका को लगा, शायद उनमें एक निशान अभिजीत का भी हो।


...-जारी 




Thursday, July 4, 2013

लालू-नीतीश-पासवान पुराण भाग-दो

कुमार आलोक लेख को किस्सागोई के अंदाज़ में कहना जानते हैं। लालू की शैली और उनकी राजनीति पर न जाने कितना कुछ लिखा गया है, लेकिन कुछ किस्से ऐसे हैं, जो सुने नहीं गए, या कम सुने गए। यह लालू पर उनके अपने तजुर्बे का कुछ हिस्सा है।--गुस्ताख




लालूजी के बारे में ज्यादा लिखने की आवश्यकता नहीं। वे खुद में एक बडे आइकन हैं। 90 में सत्तासीन हुए लालू के बारे में छह-सात साल तक कोइ सोच भी नहीं सकता था कि बिहार की गद्दी से कोई इस आदमी को जुदा कर सकता है।

लालू के भदेसपन से चिढ़ते थे  बौद्धिक

शुरूआती दौर में जहां राजनीतिक हलके में उन्हें मसखरा कहा गया, वहीं बौद्धिक तबके ने ताश का तिरपनवां पत्ता करार दिया। लेकिन लालू की लोकप्रियता बढती ही गई।

आखिर, इस व्यक्ति में खास क्या है। सबसे खास था कि लालू ने अपने वोट बैंक की नब्ज थाम ली थी। एक वाकया है, सन् 2000 के आसपास गरीब रैली हुई थी। लालू इसके प्रचार-प्रसार के सिलसिले में बिहार में जगह जगह सभाओं के माध्यम से जनता को भारी संख्या में पटना आने की दावत दे रहे थे।

लालू मेरे कस्बे में भी आये। शाम हो गई, अंधेरा पसर रहा था। लालू ने ज्यादा भाषण नहीं दिया, भाषण समाप्त करते ही रथ पर सवार अपने सहयोगी से कहा, अरे जरा उ बिदेश से जो कैमरा लाए है दो हमको। वस्तुतः वो कैमरा नही बल्कि जापानी टॉर्च था जिसकी लाइट ब्लिंक करती थी और सायरन की-सी आवाज निकलती थी।

लालू ने अपने श्रोताओं से कहा, देखो भाई, ये कैमरा हम विलायत से लाए है और ये तुम लोगों का फोटू खिंचेगा। जब कल रैली समाप्त होगी तो मैं इसकी रिकॉर्डिंग देखूंगा। तब हमको पता चल जाएगा कि तुम लोगों में से कौन-कौन रैली में नही पहुंचा है। लालू ने उस टार्च को घुमाना शुरु किया।

मेरे साथ भीड़ में एक दूध बेचने वाला इन्सान पटना से अपना दूध बेचकर वापस अपने गांव जा रहा था। लालू जी चूंकि भाषण दे रहे थे तो बेचारा ठहरकर लालू जी का भाषण सुन रहा था।

जैसे ही टार्च की रौशनी उसके मुख पर पड़ी, उसने कहा अरे बाप रे बाप लालू जी फोटुकवा खिंच लिये कल बेटी के यहां जाना था ..अब तो हमें रैली में जाना ही होगा। खैर, पढे लिखे लोग तो लालूजी की इस नौटंकी को समझ रहे थे लेकिन भोली भाली जनता को झांसा देना कहां का न्याय है।

जब लालू सत्ता में थे, तो कहा जाता था कि लालू अगर कुत्ते के गले में भी लालटेन डाल देंगे तो वे सीधा संसद या विधानसभा पहुंच जाएगा। इसी क्रम में उन्होने पत्थर तोडने वाली औरत भगवतिया देवी को संसद में प्रवेश करा दिया।
लालू के मुख्यमंत्री बनते ही एकाएक कई मसखरे-भाट पैदा हो गये । उन्हीं में से एक चारण-भाट थे ब्रहदेव आनंद पासवान। पहले वो मच्छर चालीसा लिख चुके थे। बाबा चूहरमल जयंती पर उन्होने लालू चालीसा पढकर सुनाया।

लालू का ये चालिसा फुटपाथ से लेकर ट्रेन में फेरी लगाने वाले तक बेचने लगे। मशहूर गायक बालेश्वर का भी गीत खूब प्रचलित हुआ ..बोकवा वोलत नइखें ..केतनो खीयाइ हरियरी...। खैर बालेश्वर के गीत में आलोचनात्म तथ्यों की भरमार थी लालू के लिये।

लेकिन किस्मत चमकी मच्छर चालिसा के लेखक की। उन्हें लालू ने राज्यसभा के लिये नामित कर दिया। ब्रहदेव आनंद पासवान को लोग कुदरबेंट भी कहते थे। 18 महिने के बाद इस मसखरेबाज का टर्म ओवर हुआ और लालू ने फिर इन्हें बाबा चूहरमल के पास भेज दिया।

संसद में रिपोर्टिंग के लिये जाता हूं तो मच्छर चालीसाबाज वहां हमेशा मिल जाते है ...शायद पंशन-वेंशन के चक्कर में। वहीं 1991 में पटना लोकसभा सीट से प्रत्याशी थे पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल। लालू के वोट बैंक के लोगों ने कहा कि लालू जी इ तो पंजाबी हैं हमरे जात का नहीं है ..वोट कैसे दें इसको.....तब लालू ने कहा कि अरे गुजरलवा गुर्जर हैं माने दिल्ली के गोवार हैं,.वोट दो मजे में.. लालू के समर्थकों ने बैलेट बॉक्स में इतना वोट डाल दिया कि आज तक उसका परिणाम नही आया।

लालू ने बहुतो को बनाया लेकिन वैसे लोगों को बिसरा दिया जो लालू प्रसाद को देवता मानते थे। उन्हीं में से एक थी रामरती देवी।

शुरुआती दौर में लालू की हर सभा की शुरुआत रामरति के गीतों से होती थी। कबीरपंथी हैं वो। रात को लालू जी का सर दर्द करता था तो रामरती लालू के बाल में तेल लगाती थी और कबीर के भजन सुनाया करती थी। लालू उससे हर साल राखी बंधवाते थे।

चितकोहरा पुल के निचे मुसहरों की बस्ती में झोंपडा बनाकर रहती थी। सन 2000 में रामरति की बेटी की शादी थी, बतौर मुख्यमंत्री राबड़ी देवी गई भी थीं।

कहा जाता है कि राबडी जी ने पूछा रामरती दीदी बाथरुम कहां है। रामरति ने कहा कि दीदी हमलोग खुले में शौच करते है। फिर क्या था, अगले दिन रामरती का झोंपडा कोठे में तब्दील हो गया।

रामरती के एक बेटे को राबडी ने सरकारी नौकरी भी दी । मैने लालू के दल में ऐसा प्रतिबद्ध व्यक्तित्व नहीं देखा ।

जब 2005 में रामरति ने लालू जी से कहा कि सिंधिया विधानसभा सीट से हमरो लडा द साहेब। लेकिन साहेब ने रामरती को टिकट ना देकर एक माफिया को दे दिया। रामरति की श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई, साहेब के प्रति श्रद्धा आज भी पहले जैसी ही है।

---जारी
           


Tuesday, July 2, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः बहमनों की धरती पर



इमली का पेड़ झुलस रहा था...गरमी में। दिल्ली में भी गरमी है...झुलसाने वाली तो नहीं...लेकिन उत्तराखंड की बाढ़ के बाद बारिश से सहमे हुए लोगों के बीच उमस की मार है। 

गुलबर्गा की गरमी अजीब है। पत्थर भी चटक जाते हैं। लेकिन फारसी में तो गुल का मतलब है "फूल" और "बर्ग" का मतलब है पत्ता। जाहिर है, जमाना रहा होगा जब गुलबर्गा विलासिता भरे जीवन का केन्द्र रहा ही होगा। 

गुलबर्गा का क़िला, फोटोः मंजीत ठाकुर


हमारे गेस्ट हाउस के नजदीक ही है गुलबर्गा का किला...14वीं सदी का। मजबूत रहा होगा किला। लेकिन कई दशकों तक उपेक्षित रहे इस किल में अब कई घर बस गए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के बावजूद किले के भीतर अवैध अतिक्रमण है। और किले की हालत का तो कहना ही क्या।

हालांकि कुछ हिस्सों में हालत में सुधार है वो भी सिर्फ एएसआई के कारण। 

बहमनी याद्दाश्त, संध्या में फोटोः मंजीत ठाकुर


वैसे गुलबर्गा की कहानी तो 13वी और 14वीं सदी तक पीछे ले जाती है। दक्कन के इस इलाके में जब बहमनी सल्तनत का प्रभुत्व हुआ। इससे पहले यह इलाका हिंदू राजाओं के अधीन था। इस सूखाग्रस्त इलाके को बहमनी सुल्तानों ने खूबसूरत महलों, किलेबंदियों और सरकारी इमारतों से भर दिया।

आज के गुलबर्गा में भी वही मध्यकालीन किले, अस्तबल, टूट-फूट रहे मकबरे, बड़े दरबार और प्राचीन मंदिर हैं।
 
फोटोः मंजीत ठाकुर

जीवन संध्या फोटोः मंजीत ठाकुर

किले के भीतर का जामा मस्जिद की खासियत इसका विशाल गुंबद है। इसके चारों तरफ छोटे-छोटे गुंबद भी हैं। इसका निर्माण सन 1367 में स्पेनी वास्तुविद् ने किया था जिसमें मेहराबदार प्रवेशद्वार है। बताया जाता है कि ऐसी ही कलाकृति स्पेन में कार्दोवा के मकबरे की भी है। 

किले के अंदर अतिक्रमण, गुलबर्गा फोटोः मंजीत ठाकुर


गुलबर्गा अब किलों, दरबारों और मकबरों को विरासत के रूप में देखता है। मुसलमान आबादी में एक नवाबी ठसक है...लेकिन गांव की आबादी जूझ रही है। रोज़ रोज़ की लड़ाई है, पानी की, खाने की...चर्चा अगले पोस्ट में.

जारी

Sunday, June 30, 2013

लालू-पासवान-नीतीश पुराण भाग-एक

 ये आलेख कुमार आलोक का है। कुमार आलोक, राजनीति कवर करने वाले विचारवान पत्रकार हैं। खासकर वामपंथी राजनीति पर खास नजर भी रखते हैं और श्रद्धा भी। बिहार में लालू युग के बाद की घटनाओं पर अपने तजुरबे को हमारे साथ साझा कर रहे हैं। 
कुमार आलोक

शाहनवाज हुसैन ने पटना में एक रैली को संबोधित करते हुये कहा कि नीतिश सत्ता से बाहर रह ही नहीं सकते। वो सन् 1995 का हवाला दे रहे थे, जब समता पार्टी बिहार में लालू के मुकाबले बुरी तरीके से पिट गई थी। चुनाव परिणामों के बाद नीतिश ने कहा था कि अब वो राजनीति छोड़कर किताब लिखेंगे।

कुछ दिनों बाद खबर आई कि नीतिश बिहार में रहकर ही लालू सरकार के खिलाफ सड़क पर संघर्ष करेंगे। बात आई-गई हो गई। बिहार में उनका भाजपा के साथ गठबंधन हुआ और केंद्र में एनडीए की सरकार बनी।

नीतिश कुमार को अटल बिहारी बाजपेयी का आशीर्वाद प्राप्त था। उन्हें रेल मंत्री के पद से नवाजा गया। बिहार में रहकर संघर्ष करने की बात हवा में रह गई।

नीतिश और लालू के बीच आपसी वैमनस्य इतना था कि रेल डिब्बों में लालू की जाति के दूधिया लोगों को नीतिश के आदेश पर आरपीएसएफ डंडों से पीटते थे। रेल के विभिन्न मलाईदार पदों पर नीतिश ने अपनी जाति के लोगों को चुन-चुन कर बिठाया। हां, नीतिश को इतना आभास था कि लालू को भविष्य में पछाड़ा जा सकता है।

लालू कहा करते थे कि वोट के लिए विकास पैमाना नहीं, जातिगत समीकरण हैं। इस नब्ज को पकडकर नीतिश ने बिहार में रेल के विकास पर बहुत काम किया। पहली बार जब लालू पशुपालन घोटाले में जेल गये तो बेउर जेल उनके समर्थ उन्हें दूल्हे की तरह बिठाकर जेल के दरवाजे पर ले गये।

समर्थक नारे लगा रहे थे कि जेल का फाटक टूटेगा, लालू यादव छूटेगा। राजनीति में परिवारवाद की मुखालफत करने वाले लालू को अपनी पार्टी के किसी नेता पर विश्वास नहीं रहा। बातें हवा में चल रही थी। कयास लगाए जा रहे थे कि लालू के जेल जाने के बाद सीएम का पद कौन संभालेगा।

टाइम्स आफ इंडिया में एक खबर छपी कि रंजन प्रसाद यादव, जयप्रकाश नारायण यादव या आर के राणा में से किसी एक को लालू गद्दीनशीं करेंगे। अगले दिन जनसत्ता ने छापा कि अंदरखाने में लालू ने बिहार की कमान अपनी पत्नी को सौंप दी है।

इस खबर पर राजद और अन्य दलों के नेता खूब हंसे। अगले दिन विधायक दल की बैठक हुई। किसी को इसका आभास भी नहीं था कि राबड़ी देवी को नेता चुन लिया जाएगा। हालांकि सब पूर्व-नियोजित ही था। लालू के सबसे विश्वस्त श्याम रजक ने राबडी के नाम का प्रस्ताव किया ..भला किसमें दम था इसका विरोध करने का।
राबड़ी मुख्यमंत्री बनीं और लालू जेल-यात्रा पर निकल गये।

साहब के लिये खैनी मांगकर लाने वाली राबड़ी, सीएम क्वॉर्टर के आस-पास के लोगों से सीधे बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री बन गईं। अनपढ और सियासत की गलियों से अनजान राबड़ी के लिये ये एक डरावना मंज़र रहा होगा।

साथ ही रहा होगा, पार्टी के अंदर ही सीएम पद का ख्वाब देख रहे तमाम नेताओं के विद्रोह का डर। तब राबडी ने अपने दोनों प्यारे भाईय़ों के हाथों बिहार की कमान अघोषित रुप से सौंप दी। एक राजनीतिक अपराधी था तो एक शुद्ध गंवई अपराधी।

साधु तो राजनीति सीख गये थे लेकिन सुभाष को लगता था कि कमाने का तरीका रंगदारी, अपहरण और ट्रांसफर-पोस्टिंग से ही हो सकता है।

लालू के इन दो लाडले सालों ने गदर मचाया कि बिहार की जनता की नजरों में हीरो रहे लालू की छवि ज़ीरो की हो गई।

मुझे याद है कि सुभाष यादव का कार्यक्रम अगर बिहार के किसी कोने में आपको लेना है तो सुभाष की ये शर्त होती थी कि आने के बाद उन्हें सिक्कों से तौला जाये । 85 किलो के सुभाष यादव को अगर सिक्कों से तौला जाए तो आप उसकी कीमत का आकलन कर लीजिए।

हां, एक बात जरूर थी कि जिस किसी छुटभैये ने युवा हृदय-सम्राट (?) सुभाष यादव का कार्यक्रम ले लिया, वह उस इलाके या जिले का डॉन हो गया। अब वो अफसर से लेकर दुकानदारों तक से सारी वसूली इकट्ठा करता, और उसमें से अपना हिस्सा काटकर सुभाष बाबू को पहुंचाया करता।

जनता की नजरों में राजद की सरकार दिन-ब-दिन गिरती जा रही थी। इधर, नीतिश एनडीए में रहकर बतौर रेलमंत्री जो काम कर रहे थे, वो लोगों को दिखने लगा।

बिहार की जनता को विकास का पहला टेस्ट नीतिश ने रेल में काम करके चखाया। इसके बावजूद लालू इतने कमजोर नही हुए थे। फरवरी, 2005 में विधानसभा चुनावों में खंडित जनादेश मिला। नीतिश, सरकार बनाने की जुगत लगा रहे थे। अगर वो जोड़-तोड़कर सरकार बना लेते तो उनका भी हाल मधु कोडा सरीखा होता।
लालू को ये क़त्तई बर्दाश्त नहीं था। लालू को उस समय भी यह लग रहा था कि बिहार उनके परिवार की जागीर है। केंद्र में यूपीए के साथ सांठ-गांठ करके राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।

राष्ट्रपति शासन के दौरान बूटा सिंह और उनके दो पुत्रों बंटी और लवली ने मिलकर वही काम किया, जो साधु और सुभाष राबड़ी के लिये किया करते थे। यही कारण रहा कि अक्तूबर के चुनाव में जनता ने नीतीश के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की मुहर लगाकर लालू और पासवान को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

Sunday, June 16, 2013

दिवंगत बाबूजी के नाम बेटे का एक खत

डियर डैड, 
सादर प्रणाम,

कहां से शुरु करुं...आज से ही करता हूं।

आज अंग्रेजी के एक अख़बार के पहले पन्ने पर बिस्किट के एक ब्रांड का विज्ञापन है। विज्ञापन कुछ नहीं...बस एक खाली पन्ना. जिसमें एक चिट्ठी लिखी जा सकती है। अपने पिता के नाम....पीछे एक पंक्ति छपी है, कोई भी पुरुष बाप बन सकता है, लेकिन पिता बनने के लिए खास होना पड़ता है (मैंने नजदीकी तर्जुमा किया है, मूल पाठ हैः एनी मैन कैन बी अ फ़ादर, इट टेक्स समवन स्पेशल टू बी डैड

मुझे नहीं पता, कि फ़ादर, डैड और पापा में क्या अंतर है। मुझे ये भी नहीं समझ में आता कि आखिर बाबूजी (जिस नाम से हम सारे भाई-बहन आपके याद करते हैं) पिताजी और बाकी के संबोधनों में शाब्दिक अर्थों से कहीं कोई फ़र्क पड़ता है क्या। क्या बाप पुकारना डेरोगेटरी है?

लेकिन बाबूजी, बाजा़र कहता है कि डैड होने के निहितार्थ सिर्फ फ़ादर होने से अधिक है। आप होते तो पता नहीं कैसे रिएक्ट करते और मेरी इस चिट्ठी की भ्रष्ट भाषा पर मुझे निहायत नाकारा कह कर शायद धिक्कारते भी। लेकिन बाबूजी, आपको अभी कई सवालों के जवाब देने हैं।

आपको उस वक्त हमें छोड़कर जाने का कोई अधिकार नहीं था, जब हमें आपकी बहुत जरूरत थी। जब हमें अगले दिन की रोटी के बारे में सोचना पड़ता था, आपको उस स्वर्ग की ओर जाने की जल्दी पड़ गई, जिसके अस्तित्व पर मुझे संशय है।

मां कहती है, कि आपके गुण जितने थे उसके आधे तो क्या एक चौथाई भी हममें नहीं हैं। आप ही कहिए बाबूजी, कहां से आएंगे गुण? दो साल के लड़के को क्या पता कि घर के कोने में धूल खा रहे सामान दरअसल आपके सितार, हारमोनियम, तबले हैं, जिन्हें बजाने में आपको महारत थी। दो साल के लड़के को कैसे पता चलेगा बाबूजी...कि कागज़ों के पुलिंदे जो आपने बांध रख छोड़े हैं, उनमें आपकी कहानियां, कविताएं और लेख हैं।... और उन कागज़ों का दुनिया के लिए कोई आर्थिक मोल नहीं। दो साल के लड़के को कैसे पता चलेगा बाबूजी कि आपने सिर्फ रोशनाई से जो चित्र बनाए, उनकी कला का कोई जोड़ नहीं। 

बाबूजी, दो साल का लड़का जब बड़ा होता गया, तो उसका पेट भी बढ़ता गया। उसकी आँखों के सामने जब सितार, हारमोनियम तबले सब बिकते चले गए, कविता वाले कागज़ों के पुलिंदे और उसके बाबूजी के बनाए रेखा-चित्र दीमकों का भोजन बनते चले गए, तो बाबूजी ये गुण कैसे उसमें बढ़ेंगे।

मां कहती है, कि आप बहुत सौम्य, सुशील और नम्र आवाज़ में बातें करते थे। बाबूजी, मैं आपके जैसा नहीं बन पाया। मां कहती हैं मैं अक्खड़ हूं, बदतमीज हूं, किसी की बात मानने से पहले सौ बार सोचता हूं...बाबूजी अभी तो आप ऊपर से झांक कर सब देख रहे होंगे...जरा बताइएगा मैं ऐसा क्यों हूं? 

बाबूजी जब आप इतने गुणों (अगर सच में गुण हैं) से भरकर भी एक आम स्कूल मास्टर ही बने रह गए, तो हम से मां असाधारण होने की उम्मीद क्यों पाले है? उसकी आंखों का सपना मुझे आज भी परेशान करता है। बाबूजी मां को समझाइए, आप जैसे आम आदमी के हम जैसे आम बच्चों से वो उम्मीद न पाले। उससे कहिए कि वो हमें नालायक समझे।

डियर डैड, ये संबोधन शायद आपको अच्छा नहीं लग रहा होगा। आज फादर्स डे है, कायदे से तो एक गुलदस्ता लेकर मुझे उस जगह जाना चाहिए था, जहां आपकी चिता सजाई गई थी, या उस पेड़ के पास जहां आपकी चिता के फूल चुनकर हरिद्वार ले जाने से पहले रखे गए थे। लेकिन बाबूजी, आपको याद करने के लिए मुझे किसी फादर्स डे या आपकी पुण्यतिथि, या मेरे खुद के जन्मदिन की जरूरत नहीं है। आप मेरे मन में है। 

बाबूजी, मरने के लिए बयालीस की उम्र ज्यादा नहीं होती। उस आदमी के लिए तो कत्तई नहीं, जिसका एक कमजोर सा बेटा सिर्फ दो साल का हो, और बाद में उस कमजोर बेटे को समझौतों से भरी जिंदगी जीनी पड़ी हो। जब सारी दुनिया के लोग अपने पिता की तस्वीरें फेसबुक पर शेयर करते हैं, तो मुझे बहुत शौक होता था कि आप होते तो...बाबूजी मुझे पता है कि आप होते तो, जेठ की जलती दोपहरी में ज़मीन पर नंगे पांव नहीं चलना होता मुझे...आप मेरे पैर अपनी हथेलियों में थाम लेते। 

आपको बता दूं बाबू जी, आपके निधन के कुछ महीनों बाद ही लोगों ने हम पर दया दिखानी शुरु कर दी थी...मुहल्ले वाली मामी ने जूठी दूध का गिलास भी देना चाहा था...मुझे पता है बाबूजी, आप होते तो किसी कि इतनी हिम्मत नहीं होती। अब तो आप जान गए होंगे न कि क्यों इतना अक्खड़ हो गया है आपका वो कमजोर दिखने वाला बेटा।

आप चले गए, नाना जी ने रुआंसा होकर कहा था उनकी उतनी ही उम्र थी। मैं नहीं मानता...आपको इस कदर नहीं जाना चाहिए था...चिलचिलाते जेठ में, ऐसे लू वाले समाज में आप छोड़ गए हमें...क्यों बाबू जी?

मुझे बहुत शिकायत है बाबूजी, बहुत शिकायत है....

आपका बेटा 
(आज्ञाकारी नहीं , कत्तई नहीं)