Saturday, November 23, 2013

किष्किन्धा कांडः दूसरी किस्त

तथा स बालिनं हत्वा सुग्रीवमभिषच्य च वसन् माल्यवतः पृष्ठे रामो लक्ष्मणब्रवीत्', वाल्मीकि. किष्किंधा पर्व 27,1। एतद् गिरेमल्यिवतः पुरस्तादाविर्भवत्यम्बर लेखिश्रृंगम्, नवं पयो यत्र घनैर्मया च त्वद्धिप्रयोगाश्रु समं विसृष्टम्', रघुवंश 13,26।
 
यानी यही वह पर्वत माल्यवंत है जिसपर राम रूके थे। उत्सुकता बढ़ गई थी। सामने ऋष्यमूक भी दिख रहा था। बनवारी लाल जी अभिभूत हुए जा रहे थे। अगर राम को भगवान न भी मानें, सिर्फ एक दिलेर इंसान भी मान लें, तो भी इन सभी किताबों में वर्णित जुगराफिये का कायल हुआ जा रहा था।



माल्यवन्त रघुनाथ मंदिर। भई, क्या ही खूबसूरत पत्थर...उनके बीच झुलसती गरमी में उठती दाह..। ज़मीन पर गरमी की वजह से जो तरंगे उठ रही थीं, वो दिख सी रही थीं। परछाईयां हिल रही थी। तकरीबन डेढ़ हज़ार साल पुरानी मंदिर की उस भव्य इमारत में घुसा तो सबसे पहले साए की खोज की हमने। 


कैमरे पर खटाखट तस्वीरें लिए जा रहा था मैं। स्टिल कैमरा घुमाने में कोई लफड़ा नहीं था। मंदिर के गोपुर से भीतर गया तो एक प्रशस्त आंगन था। ऐन सामने मंदिर...मंदिर में स्पीकर पर बजता रामधुन। लेकिन थोड़ा अलग सा। 


गौर किया तो हमारे उत्तर भारत की तरह मानस पाठ नहीं था। 


ठीक सामने तुलसी का पौधा, हरा। तुलसी के पौधे पर उसके मंजर (फूल) लगे थे। ऐसी तुलसी बड़ी गजब की दिखती है। मुख्य मंदिर के बाईं तरफ नीम का पेड़ था। फूलों के कुछ पौधे थे जो गरमी से हलकान हो  रहे थे। मौसमी फूलों की जगह स्थायी किस्म के फूलों को तरजीह मिली थी। जिनको पानी-वानी, देख-रेख की ज्यादा चिंता नहीं रहती। 


मंदिर का चबूतरा चार सीढियों ऊपर था। माथे पर तिलक-त्रिपुंड रचाए दो नौजवान पुजारी रामायण पाठ में लीन थे। शायद दोपहर की वजह से, या शायद गरमी  की वजह से, शायद प्यास से, या उनको नींद सी आ रही थी, या फिर भूख लग आई थी, कतिपय कारणों से पाठ का स्वर धीमा था।

पुजारियों के सुर में ऊब या झल्लाहट थी। पता नही क्यों। पता नहीं शिकायत राम से ही, इत्ती दूर क्यों आ गए थे पहाड़ पे? 

बहरहाल, मंदिर के अंदर हम गए तो हम ही तीन लोग सैलानी के रूप में थे। मैं, कैमरामैन बनवारी जी और कैमरा सहायक विनोद। माल्यवन्त रघुनाथ मंदिर में दक्षिण भारतीय स्थापत्य की सारी विशेषताएं हैं। मंदिर में बहुत सारे खंभे हैं। और पुजारी ने अचानक हमारे लिए गर्भगृह का पट भी खोल दिया। 

हमने कहा, दोपहर में पट कैसे खोला तो बुजुर्ग मुख्य पुजारी का कहना था कि आप इतनी दूर से आए हैं राम के लिए तो राम का कर्तव्य है कि आपके लिए दोपहर में जगे। मैं मुस्कुरा उठा...बहरहाल, मैं उस गर्भगृह में मूर्ति देखना चाहता था। 

बुजुर्ग पुजारी ने बताया कि माल्यवन्त रघुनाथ मंदिर में न जाने कितने वर्षों से अखंड वाल्मीकी रामायण का पाठ होता है। मंदिर के गर्भगृह में राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान की मूर्तियां हैं। इन मूर्तियों की खासियत है कि इनमें राम बुद्ध की तरह भूमि स्पर्श योग मुद्रा में हैं, यानी उनका बायां हाथ भूमि को स्पर्श कर रहा है। दूसरा नाभि स्थल को। सीता यहां कमलेश्वरी के रूप में हैं। 

कमला लक्ष्मी को कहा जाता है। सीता के चार हाथ हैं, जिनमें लक्ष्मी की तरह कमल वगैरह हैं। लक्ष्मण भी यहां धनुषबाण के स्थान पर आशीर्वाद की मुद्रा में हैं। यह आश्चर्यजनक था। मैंने इससे पहले कहीं, लक्ष्मण को बैठे हुए और इस तरह आशीर्वाद की मुद्रा में नही देखा था।

ये तीनों मूर्तियां काले ग्रेनाइट की बनी थीं। मूर्तियों के  बदन पर पर्याप्त, बल्कि पर्याप्त से भी ज्यादा जेवरात थे। माल्यवन्त रघुनाथ मंदिर का गर्भगृह एक ही पत्थर को काटकर बनाया गया है। इसी पत्थर में उभार कर उकेरे गए हैं, हनुमान। माल्यवन्त रघुनाथ मंदिर के इस एकाश्म गुहा में हनुमान राम दरबार की तरह विनीत भाव में तो हैं, लेकिन वह अपने हाथ से सीता की चूड़ामणि देते दिखाए गए हैं। 

पुजारी जी ने कहा कि प्राचीन मंदिर में सिर्फ हनुमान राम और लक्ष्मण थे। लेकिन बाद में सीता को प्रतिष्ठित किया गया। और एकाश्म मंदिर के ऊपर विशाल माल्यवन्त मंदिर का निर्माण करीब डेढ़ हज़ार साल पहले सन् 650 ईस्वी के आसपास पल्लव राजा नरसिंह वर्मन् प्रथम ने करवाया। 

बहरहाल,  जब रामायण पाठ कर रहे पुजारियों की शिफ्ट बदली, तो पाठ करके उठे पुजारी से मैंने बात करनी चाही। पहले तो नाम जानकर ही हैरत हुई, और बात करने में उच्चारण का लहज़ा। युवा पुजारी की मूंछें अभी कायदे से उगी भी नहीं थी, नाम था मधुसूदन शास्त्री। मैंने चौंककर कहा कि कहां के हो, तो उसने बिहार का नाम लिया। पता चला, साहब बेगूसराय के हैं। 

वाल्मीकी जी को गर्व होता होगा, बेगूसराय के युवा कर्नाट्क की किष्किंधा में रामायण पाठ कर रहे हैं। माल्यवन्त रघुनाथ मंदिर में बातें करने पर पता चला कि युवा पुजारियों का एक समूह तिरूपति ट्रस्ट की देखरेख में मंदिरों की देखभाल और पूजा पाठ करता है। ये सभी पुजारी  तिरूपति से प्रशिक्षित थे। 

तभी हमें मुख्य पुजारी ने बातचीत का न्यौता दिया। बातों-बातों में यह भी पता चला कि रामनवमी को छोड़कर माल्यवन्त रघुनाथ मंदिर में लोगों का आना इक्का-दुक्का ही होता है। हम जैसा कोई आवारा सैलानी ही उधर आ निकलता है। लेकिन रामनवमी में काफी भीड़ होती है।

हमने पूछा कि आपका खाना खर्चा कैसे चलता है, तो मुख्य पुजारी ने कहा कि घरबार तो है नहीं, रूपया पैसा क्यों चाहिए। बाकी बचा, मंदिर की देखभाल,तो वह एएसआई के जिम्मे है। ऐतिहासिक इमारत वाला हिस्सा। और जो मंदिर वाला सामान्य हिस्सा है, वहां के पूजा पाठ प्रसाद के खर्चे अगल बगल के किसान खुद साल में एक बार दे जाते हैं अनाज-दालें वगैरह।

विश्राम शाला में कंप्यूटर भी था। मुझे हैरत में पड़ा देखकर मुख्य पुजारी ने कहा था, हिसाब किताब साफ रखने के लिए। एक पैसे की बेईमानी बर्दाश्त नहीं। देश भर में बाबाओं की करतूत ऐसी घिनौनी हो चुकी है,कि पुजारी की ऐसी बातों का सहसा भरोसा नहीं हो पा रहा था।

हमने जाने की इजाज़त मांगी तो बुजुर्गवार पुजारी ने कहा प्रसाद पाते जाओ(खाना खाने का न्यौता था जनाब)। अब आदतन कहें या जन्मना ब्राह्मण होने की वजह से, हम प्रसाद पाने या कुछ भी खाने में कभी संकोच नहीं करते। हम प्रसाद पाने के लिए बैठे, तो भूख, गरमी..या शुद्धता जो भी कारक सबसे प्रबल हो, हमने जो स्वाद पाया उसका जिक्र किया नहीं जा सकता। बस एक ही शब्द हैः दिव्य।

दाल में नमक कम थी, तो छोटू पुजारी जी रामरस ले आए, जो नमक का सधुक्कड़ी नाम है। ऐसी ही कई चीज़े, जिनका नाम सधुक्कड़ी था, पर स्वाद वही था, बिहार के हमारे गांव का। कर्नाटक में घूमते-घूमते नारियल के तेल में पकी सब्जी, और खट्टी सब्जी, रसम खाते-खाते खाना हमारे लिए एक रस्म भर रह गया था। यहां खाने में भात था, दाल थी, लौकी आलू की तरकारी थी, हरी मिर्च थी, और आम का अचार...मित्रो, ऐसा अदुभत स्वाद था कि हमें लगा हमने बरसों से कुछ खाया ही नहीं।

खाने के बाद हमारे जाने की बारी आई, तो मिष्टान्न का प्रबंध भी था...आगे जाने के लिए मुट्ठी भर मेवा भी...सबके हाथों में। मंदिर में खिले पीले कनेर, नीम की फर-फर पत्तियों, कोने के कुएं, माल्यवन्त रघुनाथ मंदिर के खंभो...इन सबकी परछाईं को मैंने जी भर कर देख लिया. इनकी परछाई में हमने दो घंटे बिताए थे। पता नहीं अब कब मुलाकात हो।

इनकी तस्वीरें अलग से पोस्ट में साझा करूंगा। 

माल्यवन्त रघुनाथ मंदिर के बाद हमारी मंजिल थी, हम्पी। जहां विजयनगर के खंडहर हमारा इंतजार कर रहे थे। बाहर का तापमान कोई 46 डिग्री सेल्सियस के आसपास था। लेकिन तारकोल की उबलती सड़के पर गाड़ी भागी जा रही थी-सर्रर्रर्रर्र....।

जारी...।

Friday, November 22, 2013

क्या मुलायम हैं अगले प्रधानमंत्री?

बहुत जाहिर सी बात है कि मुलायम सिंह यादव प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। इसमें कोई गलत बात भी नहीं। कौन सा नेता होगा जो प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहेगा। बहरहाल, तीन बार उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके नेता के लिए प्रधानमंत्री बनना कोई बड़ी बात नहीं होनी चाहिए।

लेकिन, मुलायम प्रधानमंत्री बनेंगे कैसे,क्या वो गफलत में है या हवाई किले बना रहे हैं। फिलहाल, लोकसभा में उनकी जेबी पार्टी समाजवादी पार्टी के बाईस सांसद हैं। चार तो उनके घर से ही हैं। और देवेगौड़ा जब बन सकते हैं तो मुलायम क्यों नहीं। दरअसल, बनना तो मुलायम को देवेगौड़ा वाले वक्त में ही था, लेकिन उस वक्त उनके दो यादव सजातीयों, शरद और लालू ने भांजी मार दी थी।

अब 2012 के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने मुलायम की महत्वाकांक्षाओं को नए पंख दिए। लेकिन जानना दिलचस्प होगा कि आखिर मुलायम के इस सपने की ज़मीनी हकीकत क्या है।

फिलहाल, तो जिसतरह की राजनीतिक गतिविधियां हैं देश की, और जिसतरह देश का मिजाज़ है--हालांकि लोकसभा चुनाव में अभी चार महीने का वक्त है और इतने में तो यमुना में न जाने कितना पानी बह जाना है--कांग्रेस जनाधार खो रही है, भाजपा की  सीटें बढ़ रही हैं, लेकिन मोदी के पास इतनी सीटें नहीं होगी कि वह खुद प्रधानमंत्री बन पाएँ।

खुद मोदी भी इस गफलत में नहीं होंगे कि बिना 200 का आंकड़ा पार किए, उनको कोई 7 रेसकोर्स के आसपास फटकने भी देगा। तो भाजपा अगर सरकार बनाने में नाकाम रही, तो बनेगा तीसरा मोर्चा। लेकिन तीसरे मोर्चे के नेता मुलायम तभी बन सकते हैं, जब उनके पास कम से कम 32-35 सीटें हों।

लेकिन, सपा को इतनी सीटें आएँगी कैसे। 2012 के विधानसभा चुनाव में और 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी फैक्टर काम करेगा, और पूर्वांचल, जहां सपा की अच्छा-खासा जनाधार है, वहां की चुनावी आबोहवा में बदलाव दिख रहा है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में26 जिलें हैं और 27 लोकसभा सीटें हैं, पिछली बार बुरे प्रदर्शन के बावजूद सपा ने इस इलाके में 9 सीटें हासिल की थीं।

मध्य उत्तर प्रदेश में कुल 21 में से 5 सीटें सपा के कब्जे में हैं, बुंदेलखंड से सपा के दो, और रूहेलखंड से एक सांसद है। पश्चिमी यूपी में सपा की हालत पिछली बार भी खस्ता ही थी। कुल 24 सीटों में से सपा केो सिर्फ 5 सीटें हासिल हुई थी।

इस बार सपा को पश्चिमी यूपी में मुजफ्फरनगर दंगों से बड़ा नुकसान झेलना पड़ सकता है। दंगो की आंच ने मुलायम की छवि को तार-तार किया है, जो शायद उनके प्रधानमंत्री बनने के इरादों को पलीता लगा सकता है।


--जारी

Sunday, November 10, 2013

एक ठो भारत रत्न हमको भी!

द हो गई है। कैसा देश है ये। छोड़िए देश के बारे में बाद में बात करें, मैं खोज रहा हूं कि इस सवा अरब की आबादी वाले देश में मेरा कोई दूर का रिश्तेदार हो जो सत्ता पक्ष में, विपक्ष में, कहीं भी, सिफारिश करने की पोजीशन पर हो। और सिफारिश ऐसी-वैसी नहीं कि रोज़गार सेवक लगाने वाला काम, या शिक्षा-मित्र की बहाली। भारत रत्न के लिए सिफारिश की जरूरत है। 

इस देश में भाई-भतीजावाद किस क्षेत्र में नहीं है! पता नहीं क्यों लोग फिर भी इसकी बुराई करते हैं। अब ताजा उदाहरण देखिए-इस साल पद्म पुरस्कारों के लिए की गई सिफारिशों की सूची में कुछ लोगों ने कई नाम सुझाए तो कुछ लोगों ने इस प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान के लिए अपने संबंधियों और दोस्तों के नामों को आगे बढाया।

अब पहली कोटि में वो लोग हैं, जो चाहते हैं कि भारत रत्न पुरस्कारों का सम्मान बचा रहना चाहिए। इसलिए वो लोग पता नहीं क्यों ईमानदारी दिखा जाते हैं।

जबकि होना ये चाहिए कि इसमें अपने रिश्तेदारों का नाम आगे किया जाना चाहिए। आखिर, परिवार के प्रति भी तो हमारा फर्ज है कुछ। अब एक सिरफिरे ने गृह मंत्रालय में आरटीआई डाल दिया कि किस महानुभाव ने किसके नाम की सिफारिश की है, भारत रत्न के लिए। 

ऐसे में जो जवाब आया उससे यही साबित होता है कि हम भारत के  लोग वसुधैव कुटुम्बकम् में भरोसा करें या न करें, अपने कुटुम्ब में बहुत भरोसा करते हैं।

गृह मंत्रालय ने आरटीआई आवेदन का जवाब दिया कि सार्वजनिक की गई 1300 नामों की सिफारिशें करने वाली सूची के अनुसार कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा, मंत्री राजीव शुक्ला, सांसद टी सुब्बरामी रेड्डी, शास्त्रीय गायक पंडित जसराज आदि ने इस पुरस्कार के लिए कई-कई नामों की सिफारिशें की थीं।

भारत रत्न से सम्मानित पार्श्व गायिका लता मंगेशकर ने पद्म पुरस्कारों के लिए जिन नामों की सिफारिश की हैं उनमें उनकी बहन उषा मंगेशकर, पार्श्व गायक सुरेश वाडकर और सामाजिक कार्यकर्ता राजमल पारख का नाम था। 


पद्म विभूषण से सम्मानित सरोद वादक उस्ताद अमजद अली ने छह नामों की सिफारिश की थी जिनमें उनके बेटों अमान और अयान के साथ हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायक कौशिकी चक्रबर्ती, तबला वादक विजय घाटे, कला प्रोत्साहक सूर्य कृष्णमूर्ति उर्फ नटराज कृष्णमूर्ति और सितार वादक निलाद्री कुमार के नाम सम्मलित थे। 

पूर्व सपा नेता अमर सिंह ने लोकसभा सदस्य जयाप्रदा को यह पुरस्कार देने की सिफारिश की थी। हालांकि, इस साल घोषितपद्म पुरस्कारों की सूची में उषा मंगेशकर, अमान या अयान जगह नहीं बना पाए। विख्यात शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने पद्म पुरस्कारों के लिए नौ नाम, राजीव शुक्ला ने पांच, मोतीलाल वोरा ने आठ, गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने रंगमंच से जुडे दो लोगों, विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने दो और कांग्रेस सांसद विजय दरडा ने तीन नामों की सिफारिश की थी।

अब आपको लग रहा होगा न कि आखिर मेरा नाम क्यों नहीं था इस सूची में...सोच रहा हूं जिस दिन सिफारिश करने लायक बनूंगा, अपने साले को भारत रत्न दिलवाऊंगा, आखिर सारी खुदाई एक तरफ...।

Tuesday, November 5, 2013

किताबः द लास्ट लिबरल एंड अदर एसेज़



किताबः द लास्ट लिबरल एंड अदर एसेज़

भारत और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में उदारवाद की तलाश कैसे करेंगे। रामचंद्र गुहा कि किताब द लास्ट लिबरल एंड अदर एसेज़ के निबंध आपको जानी-मानी हस्तियों से  लेकर फुटपाथ पर लगने वाली पुरानी किताबों की दुकान तक से परिचित करवाती है। अपने अपने तरीक़ों से धर्निरपेक्षता, उदारवाद, ईमानदारी और सामाजिक प्रतिबद्धता की मिसाल बने लोगों के जीवन पर रौशनी डाली गई है। लेकिन, सिर्फ प्रस्तावना को छोड़ दें, जिसमें नेहरू पर रामचंद्र गुहा का पक्षपात झलकता है तो बाकी के निबंध निर्द्वन्द्व होकर लिखे गए हैं।

किताब दो हिस्सों में है, पहला हिस्सा है लोग और जगहें। इसमें सेवाग्राम का जिक्र भी है और राजगोपालाचारी का भी। राजगोपालाचारी के बारे में लिखते समय रामचंद्र गुहा ने उनके परमाणु बम के बारे में विचारों को हवाला दिया है। निश्चित तौर पर एटम बम को लेकर सोचने वाले और उस पर भारतीय रूख को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेश करने वाले राजाजी पहले प्रामाणिक नेता थे। राजाजी एटम बम के विरोध में सेमिनारों में हिस्सा लेने अमेरिका गए, जहां उनकी मुलाकात राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी से भी होनी थी। वक्त मिला था 25 मिनट का। लेकिन केनेडी राजाजी से इस कदर प्रभावित हुए कि एक घंटे से ज्यादा वक्त तक बातें होती रहीं।


बाद में जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र संघ निशस्र्तीकरण परिषद् में राजा जी के बारे में अमेरिकी प्रतिनिधमंडल के एक सदस्य ने वी शिवाराव से कहा कि निशस्त्रीकरण पर भारत का पक्ष रखने के लिए आप इस शख्स को जेनेवा क्यों नहीं भेजते? शिवाराव ने इस बाबत नेहरू को खत भी लिखा। लेकिन तब तक नेहरू और राजाजी के संबंध खराब हो चुके थे, और नेहरू ने राजाजी को जेनेवा नहीं भेजा।

चिपको के प्रणेता चंडी प्रसाद भट्ट पर भी बढ़िया जानकारी परक लेख है। लेकिन बंगाली भद्रलोकः देशी मुरगी विलायती बोल खटकता है। वी पी कोईराला पर लिखे गए लेख में कोईराला पर दिया गया ब्योरा कम है। लेख पढ़ने के बाद पूरी संतुष्टि नहीं हो पाती।

किताब का आखिरी निबंध महात्मा गांधी की मार्क्सशीटें हैं। इसमें गुहा स्थापित करते हैं कि स्कूलों में हासिल किए गए बढ़िया अंक मेधाविता का परिचायक नहीं होते। मिसाल उन्होंने कई दिए हैं, मुझे मशहूर वैज्ञानिक आइन्स्टीन का याद आ रहा है। कि वह नौ साल की उम्र में बोलना सीख पाए थे। कि, वह डिप्लोमा हासिल नहीं कर पाए थे। कि म्युनिख में वह ल्योपॉल्ड जिम्नेजियम में पिछड़ गए थे। रामचंद्र गुहा इसी तरह मैट्रिक परीक्षा में गांधी के मार्क्सशीट का हवाला देते हैं, जिसमें कुल 40 फीसद अंक गांधी को हासिल हुए थे।

इस लेख के बाद मुझे गुहा की मार्क्सशीट देखने की जरूरत महसूस हो रही है, और लग रहा है कि वह भी मेरे, गांधी और आइंस्टीन की कतार के ही हैं।

बहरहाल, इस किताब को पेंग्विन ने छापा है और इसका हिंदी अनुवाद आख़री उदारवादी और अन्य निबंध नाम से मनीष शांडिल्य ने किया है। अनुवाद बाकी जगहों ठीक है लेकिन वर्तनी की अशुद्धियां खटकती हैं। मिसाल के तौर पर वीपी कोईराला के भाई मातृका प्रसाद कोईराला को माितृका लिखा गया है।

किताब 291 पृष्ठो की है, पेपरबैक संस्करण का मूल्य 399 रूपये मात्र है। खरीद कर न पढ़ने की इच्छा रखते हों तो किसी लाइब्रेरी से हासिल करें। किताब अच्छी है।


Wednesday, October 30, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः किष्किन्धा कांड!!

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान किसी जगह टिककर रहने का मौका नहीं मिला। बीजापुर, गुलबर्गा वगैरह में सूखे और किसानों की आत्महत्या की ख़बरें कर चुका था, मन और तन दोनों क्लांत हो चुके थे।

हॉसपेट थोड़ा दक्षिण है गुलबर्गा से। बेल्लारी ज़िले में। अरे वही बेल्लारी ज़िला, अवैध खनन और रेड्डी बंधुओं के लिए आप उत्तर भारत में जानते होंगे। हॉसपेट में हमें राहुल गांधी और जगदीश शेट्टर की रैलियां कवर करनी थी। मेरा लालच कुछ और था। मैं विजयनगर साम्राज्य के खंडहर देखना चाहता था।

हंपी, यानी वह जगह जहां विजयनगर साम्राज्य के अवशेष है, हॉसपेट से महज सोलह किलोमीटर दूर है। राहुल की रैली के बाद शेट्टार की रैली थी, और जगदीश शेट्टार की रैली सुबह-सुबह निपट गई थी। अपने ऑफिस के काम से फारिग होने के बाद हम विजयनगर के भग्नावशेष देखने चल दिए थे।

चाय की दुकानपर किसी दोस्ताना से स्थानीय शख्स ने बताया, कि अगर असल में विजयनगर की झलक देखना चाहते हो तो सीधे हंपी पर धावा मत बोल दो। दोपहर की तेज़ धूप में चाय का आस्वाद लेते हुए हम स्थानीय ज्ञान भी लेते रहे, चाय का भी। क्योंकि चाय का तो क्या है, टी इज़ कूल इन समर....एंड वॉर्म इऩ विंटर।

हंपी जाने के रास्ते में किसी पहाड़ी पर भग्नावशेष फोटोः मंजीत

तो कर्नाटक में होसपेट में उस दिन तकरीबन 46 डिग्री सेल्सियस तापमान था। खाल झुलसी जाती थी, चाय ने पसीने की बूंदों का आमंत्रित कर खाल को सुरक्षा कवच दिया।

उन मित्र ने यह भी बताया कि आप इधर आए हैं तो रीछों की एक सेंचुरी भी देखते जाएँ। लेकिन तपते दोपहर में जब हम दोर्जे में स्थित उस सेंचुरी गए तो वन संरक्षकों ने बताया कि अव्वल तो गेट से अंदर जाने को नहीं मिलेगा। जाने भी दिया तो कुछ दिखेगा नहीं, क्योंकि रीछ दोपहर को आराम करते हैं। इसलिए इधर सुबह को आने का।

 हम सुबह की योजना बनाकर खाली हाथ, खाली आंख लौट चले।
सड़क किनारे बोर्ड दिखा तो रूक गए थे हम

बहरहाल, जब उस अपरिचित मित्र के बताए अनुसार हम पचीस किलोमीटर के दायरे में घूमने निकले, तो सड़क के किनारे कई ऐसी खंडहर देखने को मिले, जो हमने किताबों में देखे थे। विजयनगर मार्का अवशेष।

हर जगह गाड़ी रोकी जाती, हम उतर कर फोटो उतारते। फिर गाड़ी आगे बढ़ती।

अचानक एक जगह मेरी नजर गई, तेज़ धूप में सड़क के किनारे बोर्ड लगा था--माल्यवन्त रघुनाथ मंदिर। मंदिरो में मेरी दिलचस्पी तभी होती है जब वहां भीड़ हो। हमारे कैमरामैन बनवारी लाल का नज़रिया अलग है, बुजुर्ग हो चले हैं। पुण्य कमाने का कोई मौका नहीं छोड़ते।

हमारी गाड़ी चढाई पर चल दी। एक बोर्ड और लगा था, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का था। बोर्ड में लिखा था कि मान्यता के अनुसार, रामायण में वर्णित किष्किन्धा यही था....
सामने रहा सुग्रीव के छिपने का ठौर ऋष्यमूक फोटोः मंजीत
मंदिर अभी कुछ दूर था। रास्ते में एक प्रवेश द्वार टाइप का बन रहा था। वहां एक बुजुर्गवार भी मिले जो एएसआई की तरफ से उस मंदिर का प्रवेश द्वार बनवा रहे थे।


मैंने उनसे पूछा कि यह कौन सी जगह है तो उनने बताया कि यह इलाका है किष्किन्धा का। और आप जिस जगह पर खड़े हैं वह है माल्यवान या प्रस्रवण गिरि। किष्किन्धा के राजा बालि को मार कर राम ने इसी पर्वत पर वर्षाकाल के चार महीने बिताए थे। मैंने पूछा, तब तो ऋष्यमूक भी होगा?

बुजुर्गवार ने तर्जनी सामने कर दी। सामने पत्थरों के आधिक्य वाला पर्वत था, जिसकी ऊंचाई तो बहुत अधिक नहीं थी, लेकिन वह वही पर्वत था जिसका वर्णन वाल्मीकी रामायण और रघुवंश में है।
माल्यवन्त रघुनाथ मंदिर का गोपुर फोटो- मंजीत ठाकुर


'तथा स बालिनं हत्वा सुग्रीवमभिषच्य च वसन् माल्यवतः पृष्ठे रामो लक्ष्मणब्रवीत्', वाल्मीकि. किष्किंधा पर्व 27,1।

एतद् गिरेमल्यिवतः पुरस्तादाविर्भवत्यम्बर लेखिश्रृंगम्, नवं पयो यत्र घनैर्मया च त्वद्धिप्रयोगाश्रु समं विसृष्टम्', रघुवंश 13,26।

यानी यही वह पर्वत माल्यवंत है जिसपर राम रूके थे। उत्सुकता बढ़ गई थी। सामने ऋष्यमूक भी दिख रहा था। बनवारी लाल जी अभिभूत हुए जा रहे थे। अगर राम को भगवान न भी मानें, सिर्फ एक दिलेर इंसान बी मान लें, तो भी इन सभी किताबों में वर्णित जुगराफिये का कायल हुआ जा रहा था।



जारी।

Wednesday, October 23, 2013

किताबः द अलकेमी ऑफ़ डिज़ायर

किसी ने मुझे एक किताब उपहार में दिया था...द अलकेमी ऑफ डिज़ायर। लेखकः तरूण तेजपाल। पहली ही पंक्ति पढ़ी, दो जनों को बीच से जोड़ने वाला गोंद प्यार नहीं है, सेक्स है। ( लव इज़ नॉट द ग्रेटेस्ट ग्लू बीटविन टू पीपल। सेक्स इज़। )

किताब की पहली पंक्ति की इस स्थापना से हैरत हुई। पढ़ता चला गया। कुछ ऐसा हुआ कि अंग्रेजी की किताब को लगातार पढ़ नहीं पाया। व्यस्तताओं का दौर था। लेकिन पूरा पढ़ा, तो आखिरी पंक्ति, पहली पंक्ति की एंटी-थीसिस लगी।

दो लोगों को बीच से जोड़ने वाला गोंद प्यार है, सेक्स नहीं। (सेक्स इज़ नॉट द ग्रेटेस्ट ग्लू बिटविन टू पीपल, लव इज़।)

पूरी किताब इन्ही दो स्थापनाओं के बीच की कहानी है।

मैं शैली की इस किताब का नायक लेखक खुद ही लगते हैं, क्योंकि किताब के आखिरी पन्नों तक आते-आते नायक पोनी टेल वाला और दाढ़ी वाला हो जाता है। किताब प्रेम, कर्म, अर्थ, काम, सत्य के खंडों में बंटा है।

प्रेम से शुरूआत होती है, नायक और नायिका के हर पल के शारीरिक प्रेम से...इक दफा यौनसंबंध बनाने मे नाकाम नायक के साथ संबंध टूटने की शुरूआत होती है।

नायक लेखक ही है और उसकी नायिका फिज़ प्रेरणा। हर पल उसे लिखने की प्रेरणा देती हुई। इसी में बाद में आकर कैथरीन का प्रकरण भी जुड़ता है। शाही खानदान की गोरी अमेरिकन बहू अपने नौकर के साथ अराजक यौन संबंधों में लिप्त होती है। उस संबंध का अंत भी होता है।

इतिहास के एक टुकड़े को नायक जीता है और आखिरकार विभिन्न यौन आसनों, यौनांगो के विवरणों के बाद लेखक आखिरी पन्नों में स्थापित करता है कि सेक्स नहीं, प्रेम ही लोगों को जोड़ता है।

किताब की भाषा शैली सहज है, प्रवाहमान है। लेकिन कई जगह विवरण काफी बोझिल हो जाते हैं। और कई घटनाक्रम तो ऐसे हैं जिनका होना-न होना किताब के कथ्य पर कोई फर्क नहीं डालता। मसलन, एक लघु चित्र देने के लिए लेखक  का अमेरिका जाना।

सबसे बेहतर है, नायक और फिज़ का आपसी रिश्ता। किताब में एक जगह नायिक लेखक के लिए रोज़मर्रा के कामकाज की तालिका बनाती है, 

"सुनो तुम बहुत अच्छा लिखते हो, फिज़ ने लाल रंग की चमचमाती टाइपराइटर, बढिया कागज का रिम, पेंसिले जमाते हुए कहा। दैनंदिनी लिख कर टंग गई। हफ्ते में लेखन के पांच दिन, कोई फिल्म नहीं, काफ्का, जायस और फाकनर की रचनाएं नहीं पढ़नी हैं। सेक्स के बारे में नहीं लिखना है, क्यों कि इसका सही चित्रण मुश्किल है, हां गंदगी फैलाना आसान होता है। जो लिख रहे हो, उसकी चर्चा न करो...दुनिया में अपठनीय कूड़े की भरमार है, उसमें बढोत्तरी न करो। फिज़ की इस कठोर नियमावली के नीचे मैंने नोट लिख रखा था, लिखन जिंदगी नहीं, लेकिन फिज़ जिंदगी है। फिज़ ने पढ़ा, तो उसने 'नहीं' लफ्ज को काट दिया। दूसरे वाक्य में फिज़ जोड़ दिया। वाक्य बना, लिखना जिंदगी है, फिज़, फिज़ है।" --पुस्तक अंश।

नायक नायिका जब हिमालय की घाटी के गेथिया नामक जगह पर रहने के लिए आते हैं, तब उसे घर की पुरानी मालकिन की डायरियों से भरी पेटी मिलती है। तब खुलता है एक दूसरी दुनिया का, दूसरे वक्त का दरवाजा। अलकेमी ऑफ डिजायर एक दर्जन से ज्यादा भाषाओं में अनूदित हो चुका है। 

यह किताब सेक्स के बारे में बात करने से बचने की हमारी हिपोक्रेसी पर गहरे चोट करती है। यह एक ऐन्द्रिक किस्म का उपन्यास है। 

इस किताब का हिन्दी अनुवाद राजकमल ने छापा है, शिखर की ढलान नाम से. राजकमल से शिकायत इस बात की है कि अनुवादक का नाम महीन अक्षरों में कहीं छिपाकर छापा है, परिचय वगैरह भी नहीं है। दोयम, देवेन्द्र  कुमार ने अनुवाद तो तकरीबन ठीक किया है। लेकिन, यौनांगों के नाम जहां अंग्रेजी में धडल्ले से लिखे हैं, वहां उन्होंने डॉट्स छोड़ दिए हैं। 

हिंदी वालों को इस हिपोक्रेसी से बचना चाहिए। 

कुल मिलाकर अलकेमी ऑफ डिजायर को पढ़ना बनता है। आप चाहें, अंग्रेजी में पढ़ें या हिंदी में, बहुत ज्यादा फर्क नहीं है..लेकिन मूल अंग्रेजी की किताब अलग जायका देती है। अनुवाद तो अनुवाद है। 




Sunday, October 13, 2013

रामलीलाः चीर कर रख दूंगा लकड़ी की तरह

मंच  सजा था, बिजली की लड़ियों ने चकाचौंध मचा रखी थी। महागुन मेट्रो मॉल की विशाल इमारत की छत पर मैकडॉनल्ड का लाल रंग का निशान चमक रहा था। इस मॉल की आधुनिकता की चमक के ऐन पीछे मैदान में था मंच. बल्बों की नीली-पीली रौशनी के बीच भगवा रंग के कपड़ो में एक किशोर-सा अभिनेता लक्ष्मण बना हुआ था।

मंच पर मौजूद सारे अभिनेता, जिनमें एक विदूषक, कई वानर लड़ाके और कई राक्षस थे। हनुमान भी। सारे अभिनेता मंच पर हमेशा चलते रहते, तीन कदम  दाहिनी तरफ, फिर वापस मुड़कर, तीन कदम बाईं तरफ।

बीच बीच में कोई पंडितजीनुमा आदमी कोई निर्देश दे आता मंच पर जाकर। फिर मंच पर आवाज आती, उद्घोषक की, जिसे अपनी आवाज़ सुनाने में ज्यादा दिलचस्पी थी।

काले कपड़ो में सजे मेघनाद की आवाज़ में ज़ोर था, भगवा कपड़े में सजे लखन लाल की आवाज़ नरम थी। लेकिन तेवर वही...दोनों के बीच संवाद में शेरो-शायरी थी। एक ललकारता...दूसरा उसका जवाब देता।

लखन लाल चीखे, अरे क्या बक-बक करता है बकरी की तरह, चीर कर रख दूंगा, लकड़ी की तरह
भीड़ ने जोरदार ताली बजाई।  एकदिन पहले हुई बारिश की वजह से मैदान गीला था...लेकिन मैदान में खासी भीड़ थी।

सोच रहा था कि क्या दिल्ली में भी लोग इतने खाली हैं, या फिर कुछ तो ऐसा है इन आधुनिक शहरियों को अपनी ओर खींच रहा है। रामलीला के बगल में, एक जगह ऑरकेस्ट्रा का आय़ोजन है। लडकी बांगला गाने गा रही है, और लगभर सुर के बाहर गा रही है।

वह भीड़ से पूछती है, केनो, हिंदी ना बांगला...भीड़ के अनुरोध पर वह हिंदी में गाती है। लौंडिया पटाएंगे, फेविकोल से...मेरे मित्र सुशांत को पूजा के पवित्र पंडाल में यह शायद अच्छा नहीं लगा होगा। मैं तर्क देता हूं कि यह मास कल्चर है। मास को पसंद कीजिए, हर जगह तहज़ीब की पैकेजिंग नहीं चलेगी।

यह सही है। यही सही है। आम आदमी, जिसके लिए राम लीला के पात्रों ने हिंदुस्तानी बोलना शुरू  कर दिया। संवादों के बीच में ही, मानस की चौपाईयां आती है, जो माहौल में भक्ति का रंग भरने के सिवा कुछ और नहीं करतीं।

अगल बगल गुब्बारे, हवा मिठाई, गोलगप्पे...प्लास्टिक के खिलौने...चाट, भेलपूरी। मुझे मधुपुर की याद आई।

दृश्य़ दोः हमारे घर के पास ही एक दुर्गतिनाशिनी पूजा समिति है। दुर्गा की मूर्त्ति के सामने बच्चों के नाच का एक कार्यक्रम है। यह समिति पहले उड़िया समुदाय के लोगों के हाथ में थी, अब उस समिति में बिहारी, बंगाली, उड़िया, पंजाबी, यूपी के सभी समुदायों के लोग है।

सभी घरों के बच्चे नाच रहे हैं, महिलाएं हैं...मेयर साहब आते हैं..। जय गणेशा गाने पर नाचने वाला लड़का बहुत अच्छा नाच रहा है। मैं पहचानता हूं उसे, वह बिजली मिस्त्री है। रोज पेचकस कमर में खोंसे शिवशक्ति इलेक्ट्रिकल्स पर बैठा रहता है। मुसलमान है।

अब किसी को फर्क नहीं पड़ा कि  नाचने वाला लड़का किस धर्म का है। किसी को फर्क नहीं पड़ा कि दुर्गा जी ने जिस महिषासुर को मारा है मूर्ति में...उसकी जाति और उसके समुदाय को लेकर बौद्धिक तबका बहस में उलझा है। जनता को फर्क नही पड़ता कि दुर्गा ने किसको मारा है।

देश उत्सवधर्मियों का है, उत्सव मनाते हैं हम।

इसमें विचारधारा को मत घुसेडिए। दुर्गा पूजा को एक प्रतीक भर रहने दीजिए। इसके सामाजिक संदर्भों को देखिए, इसमें और समुदायों को मिलाइए...और सांप्रदायिकता, राम को सांप्रदायिक बना दिया है आपने, अब दुर्गा को भी मत बनाइए।

यह आम लोगों को उत्सव है...उत्सव ही रहे। ऑरकेस्ट्रा बजता रहे, सुर बाहर लगे, कोई दिक्कत नहीं, जय गणेसा पर नाचते रहें लोग...बस।