Wednesday, January 28, 2015

आवारापनः कर्नाटक में ग्रोथ की अकथ कथा

अभी तो बंगलोर के उस लाल बाग का जिक्र, जहां हम भरी दोपहरी में गए थे।

गरम धूप चेहरे पर तीखी किरचों की तरह लग रही थी, लेकिन गरमी के बावजूद कुछ फूल अपने अंदाज में मुस्कुरा रहे थे।

इस गरमी में भी कुछ लोग लाल बाग में घूम रहे थे, जाहिर है वो हम जैसे दीवाने तो नहीं थे कि बिना छतरी और टोपी के घूमें। वैसे हमारे कैमरा सहायक टोपी लगाए हुए थे, लेकिन यह जरूरी भी था, सीधी धूप उनके खल्वाट सर पर पड़ती तो मस्तिष्क गरम हो सकता है।

पूरे बाग़ में माहौल पारिवारिक ही था, दिल्ली के लोदी गार्डन या बुद्ध जयंती पार्क या कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल से अलहदा।थोड़ा सूरज तिरछा हुआ, वक्त के साथ, तो बादलों को मौका मिल गया। तालाब जैसी बेकार की चीजें और गुलमोहर जैसे रोज मुलाकात होने वाले पेड़ों और बांस की झुरमुटों को देखकर हमें लगा कि अब हमें बैठ जाना चाहिए।

एक पहाड़ी जैसा है, उस पर कोई मंदिर बना है। जाहिर है, हमारे काम का न था। पत्थर पर बैठे तो लगा कि पिछवाड़ा रोटी की तरह सिंक गया हो, आखिर पत्थर तवे की तरह गरम भी थे। बहरहाल, हम बंगलोर में बहुत तो घूम नहीं पाए, क्योंकि वक्त काफी कम था। लेकिन, हवाखोरी कर ही ली थी।

गुलबर्गा में मेरी बालकनी में झांकता इमली के पत्ते शिकायत कर रहे हैं। कहां गुलबर्गा कहां बंगलोर। मैं डांटने की मुद्रा में हूं, मैं क्या करूं...दिल्ली तक बात नहीं पहुंचती तो मैं क्या करूं...ये कहानी तुम्हारी ही नहीं है, झारखंड, बुंदेलखंड, जंगल महल, दंतेवाड़ा, अबूझमाड़, मेवात, कालाहांडी...विकास की खाई हर जगह मौजूद है।
कर्नाटक के जबार्गी के पास एक जनजातीय महिला। फोटोः मंजीत ठाकुर
इमली का पेड़ आशाभरी निगाहों से देख रहा है। मैं कहता हूं, मैं महज क़िस्साग़ो हूं, कहानी कह दूंगा, इसके असरात पर मेरा क्या मेरे बाप का भी बस नहीं।


भाप भरी गरमी से पेड़ भी हलकान है..मैं भी। उफ़् गुलबर्गा।

गरमी झेलता हुआ, गुलबर्गा में अपनी बालकनी से डूबते सूरज को देखता हूं। गुलबर्गा में डूबता हुआ सूरज भी दहकता हुआ लगता है।

दिल्ली से बंगलुरु को चले थे, तो मन में कर्नाटक के विकास की एक तस्वीर थी। कर्नाटक का मतलब ही बंगलुरू था।

लेकिन बंगलुरू ही पूरा कर्नाटक नहीं है। बंगलुरू का तो मौसम भी पूरे कर्नाटक से अलहदा है और विकास की गाथा भी।

कर्नाटक के विकास को हमेशा एक मिसाल के तौर पर पेश किया जाता है लेकिन विकास की अंतर्गाथा कुछ और ही है। उत्तरी कर्नाटक के जबर्गी और गुलबर्गा के इलाको में पीने का पानी एक बड़ी समस्या है। इस तस्वीर की तस्दीक करते हैं सूखे हुए खेत, जिनका अनंत विस्तार देखने को मिलता है।
उत्तरी कर्नाटक में साल में ज्यादातर वक्त सूखी रहती हैं नदियां फोटोः मंजीत ठाकुर
कपास की फसल पिछले दो साल से खराब हो रही है, क्योंकि दो साल से बारिश ने साथ नहीं दिया। अब तो आस पास के इलाके के लोगों को पीने के पानी के लिए मशक्कत करनी होती है।

लोग छोटे ठेलों पर प्लास्टिक के रंग-बिरंगे मटके लेकर आते हैं। कोई पांच किलोमीटर ले जा रहा है पानी ढोकर, तो कोई सात किलोमीटर, एक बंधु ने तो मोपेड ही खरीद ली है पानी ढोने के लिए ।

पूरा उत्तरी कर्नाटक, खासकर हैदराबाद-कर्नाटक के इलाके में सूखी नदियां और सूखी नहरें सूखे की कहानी कह रही हैं।
पानी का रोना फोटोः मंजीत ठाकुर
नलों के किनारे लगे प्लास्टिक के घड़ों की कहानी भी अजीब है, प्लास्टिक युग में मोबाइल तो उपलब्ध है लेकिन पीने का पानी मयस्सर नहीं। लोगबाग तालाब का पानी पीने पर मजबूर हैं, यह पानी भी तभी आता है जब बिजली हो। बिजली का भी अजीब रोना है, जो दोपहर बाद डेढ़ घंटे के लिए आती है और अलसुबह डेढ़ घंटे के लिए।

दरअसल, लोगों ने तालाब में पानी का मोटर लगवा रखा है। हैंडपंप खराब हैं तो कम से कम तालाब का पानी तो मिले। भूमिगत जल तो न जाने कब पाताल जा छुपा है।

बिजली आती नहीं तो मोटर कैसे चले। ऐसे में दोपहर से ही, मटके नलों के किनारे जमा होने शुरू हो जाते हैं। उस दुपहरिया में जब छांव को भी छांव की जरूरत थी।
किसी दल के घोषणापत्र में नहीं था पानी का वादा फोटोः मंजीत ठाकुर
चुनाव का वक्त था, जब हम वहां थे। कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए स्थायित्व एक अजेंडा था, लेकिन उत्तरी कर्नाटक के गांवों में पीने का पानी मुहैया कराना किसी पार्टी के घोषणापत्र में नहीं था।
जाहिर है कर्नाटक की विकास गाथा की पटकथा में कहीं न कहीं भारी झोल है।

हम पसीनायित हैं...लेकिन हम पानी खरीद कर पी रहे हैं। लेकिन गांववाले...चुनावी दौरे-दौरा में पता नहीं क्या-क्या सब्ज़बाग़ थे...जिक्र नहीं था तो किसानों के लिए सिंचाई के पानी का, न पीने के पानी का।

Tuesday, January 27, 2015

आवारापनः बंगलोर से गुलबर्गा, कुछ तस्वीरें

बंगलोर का लाल बाग, यह है मेरा वाला एंगल फोटोः मंजीत ठाकुर

लाल बाग, बंगलुरू के किसी कोने में खिला था यह फूल, पत्रकार की नज़र तो पड़नी ही थी। फोटोः मंजीत ठाकुर

बंगलुरू से चित्रदुर्ग की तरफ बढ़े, तो मिले सुपारियों के ऐसे झुरमुट, ये समां, समां है ये....फोटोः मंजीत ठाकुर

गुलबर्गा का क़िला, जैसे ढल रहा है सूरज वैसे ही ढल रही है इस क़िले की खूबसूरती भी फोटोः मंजीत ठाकुर

Saturday, January 24, 2015

आवारापनः उफ़! गुलबर्गा

रात गहरा गई है। नीम के पत्तों में गरम हवा सरसरा रही है। मैं काले कोलतार की सड़क पर घूम रहा हूं, अमलतास की पीली पंखुड़ियां पैरों के नीचे कभी-कभी कराह उठती हैं...चांद टेढ़े मुंह के साथ आसमान के कोने में ठिनक रहा है। हवा चल रही है, आसमान में बादल भी हैं...लेकिन आज दिन में गेस्ट हाउस का अटेंडेंट कह रहा था, ये गुलबर्गा है जनाब...गरमी में यहां पत्थर चटकते हैं।

जी हां, ये गुलबर्गा है।

लोगों की बोली में हैदराबादी पुट है। इलाका भी हैदराबाद-कर्नाटक ही कहा जाता है। वही इलाका, जिसके बारे में मैंने गूगल पर छानबीन बहुत की थी, दिल्ली से चलने से पहले...लेकिन ज्यादा कुछ हाथ नहीं आया था।

दिल्ली से चला था तो महीना अप्रैल का था, दिल्ली में गरमी दस्तक दे ही रही थी। कर्नाटक में चुनावी गरमाहट बढ़ गई थी। मुझे चुनाव कवर करना था।

हमने अपना प्यारा लाल गमछा साथ ले लिया था। दोस्त कहते हैं ये एक स्टाइल स्टेटमेंट बन सकता है। हमें स्टाइल से ज्यादा परवाह है अपने आप को उस कड़क धूप से बचने की, जो यहां इस मौसम में पागल कर देने की हद कर तीखी है।

19 अप्रैल की सुबह को हम बंगलोर स्टेशन उतरे तो लगातार दो रात एक दिन के सफ़र ने रीढ़ की हड्डियों पर असर डाल दिया था। बदन का जोड़-जोड़ और पोर-पोर पिरा रहा था।

बंगलोर की सुबह बहुत प्यारी होती है। शायद शामें भी होती हों...हम शाम तक रुके नहीं। फेसबुक पर हमने स्टेटस डाला भी था, कोई मित्र हों तो मिलें...कई एक मित्र असमर्थ थे, एक अभिनय जी ने शाम की चाय का न्योता दिया था....लेकिन उनकी चाय हमारी नसीब में नहीं थी।

दोपहर तीन बजे तक हम बंगलोर से चल चुके थे। आगे भाषा की समस्या आऩे वाली थी...लेकिन हमारा ड्राइवर मणि अच्छा दुभाषिया है। जब वो हंसता है, तो ठहाके में एक खिलखिलाहट होती है। उसके दांत चमकते हैं। उसका हंसना अच्छा लगता है।

रास्ते में बनवारी जी इसरार करते हैं कि कर्नाटक आए तो स्थानीयता का पुट तभी आएगा, जब हम स्थानीय भोजन पर ध्यान दें। नारियल का पानी कर्नाटक में होने की पुष्टि करता है...मैं पके कटहलों की तरफ ध्यान दिलाता हूं। कैमरा सहायक, विनोद बिहार से हैं। उनको कटहल का स्वाद पता है।

बनवारी जी ने भी कटहल लिया है। कटहल की मीठी-मादक गंध...मुझे बचपन याद आ गया। मेरा मधुपुर...सड़क के किनारे नारियल गुल्मों की छटा है, सूरज का रंग बदल रहा है। लेकिन मंजिल दूर है...साढ़े पांच सौ किलोमीटर, भारतीय सड़कों पर। ठठ्ठा नहीं है सफ़र।

लेकिन दक्षिण कर्नाटक हो या उत्तर, सड़कों की हालत नब्बे फीसद तक सही है। अस्सी की रफ़्तार सामान्य है...। रास्ते में आता है, पहाड़ियों की कतार है, शिखरों पर पवनचक्कियों का घूमना जारी है। चित्रदुर्ग हवा की ताकत से पैदा हुई बिजली से रौशन है...रौशनी की कतारें पीछे छूट जाती हैं...

रौशनी की कतार यहां नीचे भी है, गेस्ट हाउस के सुनसान अहाते में...मेरी बालकनी से इमली का एक पेड़ सटा हुआ है। पेड़ पर नई पत्तियों की बहार है, जिनका रंग अभी ललछौंह ही है। मेरे आंगन के सामने मधुपुर में भी इमली का पेड़ था...पोखरे और हमारे घर की दीवार के बीच।

हमको बताया जाता था कि इमली के पेड़ पर भूत हुआ करते हैं, कभी दिखा नहीं। यहां गेस्ट हाउस के अहाते में नागराज का एक छुटका-सा मंदिर नुमा चबूतरा है। सुना है, अहाते में सांप भी बहुत है।
लेकिन इमली के उस पेड़ को हौले से छूकर दुलराता हूं...लगता है अपने ही घर में हूं,। मेरा मधुपुर गुलबर्गा पहुच गया है। मेरा मन उड़ता है, बादलों के साथ। आसमान में बादल हैं, चांद के लुका छिपी जारी है।

गुलबर्गा जिस दिन पहुंचा था, सुबह थी। सुबह में तो कहीं का मौसम बड़ा प्यारा होता है। दिल्ली का भी। सुबह-सुबह पहुंचे और जिस रास्ते से पहुंचे उसके किनारे पेड़ लगे हुए थे। हरियाली थी थोड़ी...

हरियाली और खूबसूरती में बंगलोर ज्यादा बेहतर है। कर्नाटक में जैसे-जैसे उत्तर की तरफ जाएंगे, हरियाली भी कम होती जाती है और संपन्नता भी। उत्तरी कर्नाटक सूखे से त्रस्त होता है। लेकिन वो किस्सा फिर कभी।

आवारापनः किष्किन्धा से बहमनों की धरती की ओर

उस वक्त हम गुलबर्गा में थे। कर्नाटक का हैदराबाद की तरफ वाला इलाका। हंपी से उत्तर। मेरे कमरे में बालकनी है, सामने एक इमली का पेड़। 

मौसम बेहद गर्मी का था। इमली का पेड़ झुलस रहा था...गरमी में। दिल्ली में भी गरमी रही होगी।...झुलसाने वाली तो नहीं...लेकिन उत्तराखंड की बाढ़ के बाद बारिश से सहमे हुए लोगों के बीच उमस की मार है। 


गुलबर्गा की गरमी अजीब है। पत्थर भी चटक जाते हैं। लेकिन फारसी में तो गुल का मतलब है "फूल" और "बर्ग" का मतलब है पत्ता। जाहिर है, जमाना रहा होगा जब गुलबर्गा विलासिता भरे जीवन का केन्द्र रहा ही होगा। 

हमारे गेस्ट हाउस के नजदीक ही है गुलबर्गा का किला...14वीं सदी का। मजबूत रहा होगा किला। लेकिन कई दशकों तक उपेक्षित रहे इस किल में अब कई घर बस गए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन  होने के बावजूद किले के भीतर अवैध अतिक्रमण है। और किले की हालत का तो कहना ही क्या।

हालांकि कुछ हिस्सों में हालत में सुधार है वो भी सिर्फ एएसआई के कारण। 

वैसे गुलबर्गा की कहानी तो 13वी और 14वीं सदी तक पीछे ले जाती है। दक्कन के इस इलाके में जब बहमनी सल्तनत का प्रभुत्व हुआ। इससे पहले यह इलाका हिंदू राजाओं के अधीन था। इस सूखाग्रस्त इलाके को बहमनी सुल्तानों ने खूबसूरत महलों, किलेबंदियों और सरकारी इमारतों से भर दिया।

आज के गुलबर्गा में भी वही मध्यकालीन किले, अस्तबल, टूट-फूट रहे मकबरे, बड़े दरबार और प्राचीन मंदिर हैं। 

किले के भीतर का जामा मस्जिद की खासियत इसका विशाल गुंबद है। इसके चारों तरफ छोटे-छोटे गुंबद भी हैं। इसका निर्माण सन 1367 में स्पेनी वास्तुविद् ने किया था जिसमें मेहराबदार प्रवेशद्वार है। बताया जाता है कि ऐसी ही कलाकृति स्पेन में कार्दोवा के मकबरे की भी है। 

गुलबर्गा अब किलों, दरबारों और मकबरों को विरासत के रूप में देखता है। मुसलमान आबादी में एक नवाबी ठसक है...लेकिन गांव की आबादी जूझ रही है। रोज़ रोज़ की लड़ाई है, पानी की, खाने की...

इस इलाके की इन कहानियों और तस्वीरों को अगली पोस्ट में शेयर करूंगा। 

Tuesday, January 20, 2015

आवारापनः किष्किन्धा कांड!

गरमियों में कर्नाटक जाना हुआ था। लेकिन आवारगर्दी कहिए या फिर खानाबदोशी की मेरी आदत, एक जगह टिककर रहना नहीं हुआ। बीजापुर, गुलबर्गा वगैरह में सूखे और किसानों की आत्महत्या की ख़बरें कर चुका था, मन और तन दोनों क्लांत हो चुके थे।

हॉसपेट थोड़ा दक्षिण है गुलबर्गा से। बेल्लारी ज़िले में। अरे, वही बेल्लारी ज़िला, अवैध खनन और रेड्डी बंधुओं के लिए आप उत्तर भारत में जानते होंगे। हॉसपेट में हमें राहुल गांधी और जगदीश शेट्टर की रैलियां कवर करनी थी। मेरा लालच कुछ और था। मैं विजयनगर साम्राज्य के खंडहर देखना चाहता था। हंपी में।
हंपी जाते वक्त सड़क के दोनों तरफ मिलते हैं ऐसे पहाड़

हंपी, यानी वह जगह जहां विजयनगर साम्राज्य के अवशेष हैं, हॉसपेट से महज सोलह किलोमीटर दूर है। राहुल की रैली के बाद शेट्टार की रैली थी, और जगदीश शेट्टार की रैली सुबह-सुबह निपट गई थी। अपने ऑफिस के काम से फारिग होने के बाद हम विजयनगर के भग्नावशेष देखने चल दिए थे।
पहाड़ी पर का भग्नावशेष
चाय की दुकानपर किसी दोस्ताना से स्थानीय शख्स ने बताया, कि अगर असल में विजयनगर की झलक देखना चाहते हो तो सीधे हंपी पर धावा मत बोल दो। दोपहर की तेज़ धूप में चाय का आस्वाद लेते हुए हम स्थानीय ज्ञान भी लेते रहे, चाय का भी। क्योंकि चाय का तो क्या है, टी इज़ कूल इन समर....एंड वॉर्म इऩ विंटर।

तो कर्नाटक में होसपेट में उस दिन तकरीबन 46 डिग्री सेल्सियस तापमान था। खाल झुलसी जाती थी, चाय ने पसीने की बूंदों का आमंत्रित कर खाल को सुरक्षा कवच दिया।

उन मित्र ने यह भी बताया कि आप इधर आए हैं तो रीछों की एक सेंचुरी भी देखते जाएँ। लेकिन तपते दोपहर में जब हम दोर्जे में स्थित उस सेंचुरी गए तो वन संरक्षकों ने बताया कि अव्वल तो गेट से अंदर जाने को नहीं मिलेगा। जाने भी दिया तो कुछ दिखेगा नहीं, क्योंकि रीछ दोपहर को आराम करते हैं। इसलिए इधर सुबह को आने का।

हम सुबह की योजना बनाकर खाली हाथ, खाली आंख लौट चले।

बहरहाल, जब उस अपरिचित मित्र के बताए अनुसार हम पचीस किलोमीटर के दायरे में घूमने निकले, तो सड़क के किनारे कई ऐसी खंडहर देखने को मिले, जो हमने किताबों में देखे थे। विजयनगर मार्का अवशेष।

हर जगह गाड़ी रोकी जाती, हम उतर कर फोटो उतारते। फिर गाड़ी आगे बढ़ती।
मंदिर जाने का रास्ता
अचानक एक जगह मेरी नजर गई, तेज़ धूप में सड़क के किनारे बोर्ड लगा था--माल्यवन्त रघुनाथ मंदिर। मंदिरो में मेरी दिलचस्पी तभी होती है जब वहां भीड़ हो। हमारे कैमरामैन बनवारी लाल का नज़रिया अलग है, बुजुर्ग हो चले हैं। पुण्य कमाने का कोई मौका नहीं छोड़ते।

हमारी गाड़ी चढाई पर चल दी। एक बोर्ड और लगा था, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का था। बोर्ड में लिखा था कि मान्यता के अनुसार, रामायण में वर्णित किष्किन्धा यही था...।
सामने वाला पर्वत है ऋष्यमूक, सुग्रीव का आश्रय

मंदिर अभी कुछ दूर था। रास्ते में एक प्रवेश द्वार टाइप का बन रहा था। वहां एक बुजुर्गवार भी मिले जो एएसआई की तरफ से उस मंदिर का प्रवेश द्वार बनवा रहे थे।

मैंने उनसे पूछा कि यह कौन सी जगह है तो उनने बताया कि यह इलाका है किष्किन्धा का। और आप जिस जगह पर खड़े हैं वह है माल्यवान या प्रस्रवण गिरि। किष्किन्धा के राजा बालि को मार कर राम ने इसी पर्वत पर वर्षाकाल के चार महीने बिताए थे। मैंने पूछा, तब तो ऋष्यमूक भी होगा?
माल्यवन्त रघुनाथ मंदिर सभी फोटोः मंजीत ठाकुर

बुजुर्गवार ने तर्जनी सामने कर दी। सामने पत्थरों के आधिक्य वाला पर्वत था, जिसकी ऊंचाई तो बहुत अधिक नहीं थी, लेकिन वह वही पर्वत था जिसका वर्णन वाल्मीकी रामायण और रघुवंश में है।

'तथा स बालिनं हत्वा सुग्रीवमभिषच्य च वसन् माल्यवतः पृष्ठे रामो लक्ष्मणब्रवीत्',
--वाल्मीकि रामायण, किष्किंधा पर्व 27,1

एतद् गिरेमल्यिवतः पुरस्तादाविर्भवत्यम्बर लेखिश्रृंगम्, नवं पयो यत्र घनैर्मया च त्वद्धिप्रयोगाश्रु समं विसृष्टम्',
--रघुवंश 13,26

यानी यही वह पर्वत माल्यवंत है जिसपर राम रुके थे। उत्सुकता बढ़ गई थी। सामने ऋष्यमूक भी दिख रहा था। बनवारी लाल जी अभिभूत हुए जा रहे थे। अगर राम को भगवान न भी मानें, सिर्फ एक दिलेर इंसान बी मान लें, तो भी इन सभी किताबों में वर्णित जुगराफिये का कायल हुआ जा रहा था।


जारी।

Thursday, December 25, 2014

पीकेः धर्म का मर्म तो अब लुल्ल एलियन ही समझाएगा


किसी फिल्म को देखने के दो नज़रिए होते हैं। अव्वल तो यह कि समाज में मौजूदा घटनाओं के बरअक्स कोई फिल्म अपनी जगह कहां रखती है। दोयम, अपनी क़िस्सागोई की शैली और क्राफ्ट में फिल्म ने क्या ज़मीन फोड़ी। इसके अलावा तीसरा नज़रिया यह है कि उस फिल्म ने कितना कारोबार कर लिया और इस लिहाज से उसका साल की हिट फिल्मों की फेहरिस्त में वह कहां है।

बॉलिवुड की तमाम फिल्में तीसरे किस्म की फिल्म होने में फ़ख्र महसूस करती हैं।

पीके के लिहाज से सोचें तो पहला और तीसरा नज़रिया सही होगा। रामपाल और आसाराम प्रकरण के बरअक्स इस कहानी ने सामयिकता के मसले पर अपनी वक़त दिखाई है।

कुछ और कहने से पहले यह कह दूं कि पीके में मुझे विषय का दोहराव नज़र आय़ा। ईमानदारी से कहा जाए तो धर्म के कारोबार के इस विषय को उठाने में उमेश शुक्ला बाज़ी मार गए। ओह माय गॉड, इस विषय पर बनी पहली उल्लेखनीय फिल्म है, जिसका कारोबार भी उम्दा रहा था।
पीके कथानक के स्तर पर ओएमजी का दोहराव है।

मैं पीके की तारीफ करना चाहता हूं, क्योंकि कि मैं इस विषय पर ज्यादा फिल्में देखना चाहता हूं। राजकुमार हीरानी संभवतया आमिर को केन्द्र में रखकर बेहतर शैली में उसी कहानी को कहने के अति-आत्मविश्वास के शिकार हो गए हैं। असल में पीके, ओएमजी की कहानी को सलीके से कहती है।

उमेश शुक्ला की ओएमजी एक बरबाद हुए कारोबारी के तर्कों के कमाल पर बुनी तो गई थी, लेकिन धर्म का मामला कुछ ऐसा नाजुक है कि तर्क के ऊपर आस्था ने कब्जा जमाया, और कृष्ण बने अक्षय कुमार को आखिर में अपने अस्तित्व को बताने के लिए चमत्कार करना ही पड़ा।

पीके में भी किसी दूसरे ग्रह से आए आमिर को मानना पड़ा कि भगवान तो है जरूर, हां ये बात और है कि उस तक हम अपनी बात गलत लोगों के ज़रिए लुल्ल तरीके से पहुंचा रहे हैं।

भारत ही नहीं दुनिया भर में धर्म का मसला इतना नाजुक है कि एक आम आदमी सीधे-सीधे सवाल पूछने की ताकत ही नहीं रखता। इसी के लिए भोजपुरी बोलने वाले हमारे हीरो को असल में एक एलियन होना पड़ता है।

सोचिए जरा, धर्म पर सवाल करने के लिए एलियन ही होना पड़ेगा। लेकिन जो सवाल पीके में आमिर पूछते हैं, वाजिब हैं या नहीं। मंदिर में चप्पल चोरी होने से लेकर, गाल पर भगवान का स्टिकर चिपकाने तक, चुटीले और छोटे संवादों के ज़रिए असली बात कही गई है।

फिल्म बड़ी समस्या का सरलीकरण है। यही इसकी खूबी भी है, और कमजोरी भी।

संगीत पक्ष सामान्य ही लगा मुझे। परफेक्शनिस्ट आमिर खान कई दफा मुझे उसी अंदाज में संवाद बोलते दिखे, जिस अंदाज में वो थ्री इडियट्स में बोलते थे।

अनुष्का कन्विशिंग लगीं। ओएमजी से एक तुलना और, टीवी चैनल और इंटरव्यू का ड्रामा दोनों में था। देखना होगा कि आइडिया के मसले पर उमेश शुक्ला (निर्देशकः ओएमजी) और हीरानी के बीच कोई समझौता हुआ था या नहीं।

हीरानी ने फिल्म के विषय का सरलीकरण किया, मैं इस फिल्म की कहानी का थोड़ा और सरलीकरण करते हुए कहना चाहता हूं।

मेरे खयाल से यह फिल्म किसी एलियन की नहीं है। इसका आमिर किसी और गोले से नहीं आया...वह इसी गोले के किसी ऐसे हिस्से से आया है, जहां गरीबी है, जहां से आने पर कोई चालाक आदमी उसका ताबीज जैसा रिमोट खींच ले जाता है। ठगा हुआ वह आदमी, सभ्य दुनिया की नजर में नंगा है क्योंकि ईमानदार है, क्योंकि वह झूठ बोलना नहीं जानता।

दिल्ली जैसे महानगर में घर वापस लौटने के उस रिमोट की तलाश में वह आता है, तो उसे धर्म की चाशनी मिलती है। उसका वह रिमोट किसी तपस्वी के कब्जे में है।

मीडिया की मदद मिलती है, लेकिन वह भी तपस्वी जैसों के त्रिशूल का दाग़ अपने चूतड़ पर लिए घूम रहा है।

लब्बोलुआब यह कि, पीके कुल मिलाकर कई बार देखी जाने लायक फिल्म है। लेकिन सिर्फ विषय के लिहाज से। क्राफ्ट, अभिनय या निर्देशन बाकी किसी चीज़ के हिसाब से इस फिल्म से राजकुमार हीरानी की छाप नदारद है।

वैसे भी, धर्म के बारे में फिल्म बनाने के लिए आपको सारा दोष किसी तपस्वी टाइप खलनायक पर डालना होगा। सीधे-सीधे धर्म की खाल तो किसी और गोले से आया एलियन भी नहीं कर सकता। आखिर निर्देशक कुशल कारोबारी है कोई लुल्ल बकलोल नहीं।







Thursday, November 27, 2014

नेपाल को फॉर ग्रांटेड न ले भारत

दक्षिण एशियाई देशों के संगठन-दक्षेस के शिखर सम्मेलन को कवर करने के लिए काठमांडू में हूं। काठमांडू हवाई अड्डे पर बुनियादी सुविधाओं की कमी है। वहां पर उकताए हुए किरानियों का जमावड़ा है, जो आपको सुविधाएं देने में आनाकानी करेंगे, कुछ वैसे ही जैसे भारतीय नौकरशाही को जनता को सुविधा मुहैया कराने में होता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कारवां जब त्रिभुवन हवाई अड्डे से सीधे उस जगह की ओर चला, जहां एक ट्रॉमा सेंटर का उन्हें उद्घाटन करना था, तो रास्ते के दोनों तरफ लोगों का हुजूम था। 

मुझे नहीं पता कि पाकिस्तान या सार्क के दूसरे सदस्य देशों के नेताओ के आने पर इतनी ही भीड़ थी या नहीं। लेकिन, हर मोड़ पर जब मोदी-मोदी के नारे लगने लगे, तो मुझे इल्म हुआ कि नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता भारत के बाहर भी है, और भारत से कम नहीं है।

तराई इलाके के एक नेता ने मुझे बाद में कहा भी, मोदी अगर नेपाल के मधेशी इलाके से चुनाव में खड़े हों तो यहां से भी जीत जाएंगे। 

फेसबुक पर मेरे कुछ मित्र यह आरोप लगाते हुए पोस्ट करते हैं कि मोदी ऐसी भीड़ प्रायोजित करवाते हैं। अब उनके पोस्ट पूर्वाग्रह और ईर्ष्याग्रस्त है, यह मानने की वाजिब वजह मुझे मिल गई।

ट्रॉमा सेंटर पर प्रधानमंत्री ने सब बातों के  साथ जिस बात का जिक्र किया वह था नेपाल के संविधान का तय समय सीमा पर बनकर तैयार हो जाना। उन्होंने भारतीय संविधान की नम्यता और अनम्यता का जिक्र करते हुए सर्वानुमति से संविधान तैयार करने पर जोर दिया। 

जाहिर है कि भारत ने नेपाल के साथ अपनी मैत्री को नए आयाम देने शुरू किए हैं। लेकिन ध्यान देने वाल बात यह है कि पहले प्रधानमंत्री को सड़क मार्ग से नेपाल आना था। यह कार्यक्रम बदल दिया गया। 

प्रधानमंत्री ने अपने किसी भाषण में इसका जिक्र भी किया। वजह हैः भारत की लापरवाही। सीमावर्ती इलाकों में सड़क बनाने की जिम्मेदारी भारत की है। (इस संदर्भ में समझौते भी है) लेकिन भारत ने इस काम का ठेका जिन कंपनियों को दिया था, (इनमें कोई एक कंपनी हैदराबाद की थी) उनने एडवांस तो लिया, लेकिन काम नहीं किया। 

प्रधानमंत्री को बिहार के शहर सीतामढ़ी से सड़क मार्ग से भिट्ठामोड़ (सरहदी शहर, आधा भारत में आधा नेपाल में) होते हुए जनकपुर जाना था। 

सुनने में आया कि बिहार सरकार ने प्रधानमंत्री की संभावित यात्रा के मद्देनज़र तकरीबन 30 करोड़ रूपये खर्च करके सड़क को ठीक करवा दिया। यद्यपि वह सड़क राष्ट्रीय राजमार्ग है तथापि खर्च बिहार सरकार ने किया। 

लेकिन भिट्ठामोड़ से लेकर जनकपुर तक 19 किलोमीटर तक सड़कमार्ग बेहद खराब है। और यह सड़क भारतीय कंपनियों को बनानी थी। यह लापरवाही है, बहुत बड़ी चूक। 

मोदी के जनकपुर लुम्बिनी और मुक्तिधाम न जाने के कई कारण  बताए गए। लेकिन बड़ा कारण सड़क का खराब होना भी था। हालांकि प्रधानमंत्री ने यहां के लोगों को निराश नहीं होने के लिए कहा, और कहा कि वह मौका मिलते ही इधर आएंगे। लेकिन मधेश इलाके के उन लोगों को ज़रूर निराशा हुई होगी, जो चाहते थे कि मोदी एक दफा इधर आएं, तो अब तक तरक़्की की राह में नेपाल सरकार की नजरअंदाजी का शिकार रहे तराई इलाके के दिन बहुरेंगे। 


जिस तरह से मोदी सरकार नेपाल के साथ अपने संबंध सुधारना चाहती है,  उसे पुरानी सरकार की ऐसी गलतियों को ठीक करना होगा। 

सार्क देशो के पर्यवेक्षकों में चीन भी है, और भारत की ऐसी गलतियां पाकिस्तान के मुखर सहयोगी रहे चीन को नेपाल में बढ़त दिला देंगी।

मंजीत