Tuesday, April 21, 2015

दो -टूकः बंगाल में किसानी का मर्सिया

पिछले दिनों उत्तर भारत के किसान बारिश से हलकान रहे। खेतों में खड़ी फसल बरबाद हुई...साथ ही किसान भी। कश्मीर घाटी में तो खैर बाढ़ जैसी स्थिति पैदा भी हो गई थी। बारिश को रोमांटिक कहने वाले लोग भी किसानों की हालत पर चिंतित होते नज़र आए। यही हमारे देश की खासियत है। हम सब सामूहिक रूप से चिंतित होते हैं।

हम सब एक साथ किसानों की आत्महत्याओं पर चिंतित हो उठे हैं, लेकिन हममें से कोई अनाजों के न्यूनतम समर्थन मूल्य के बढ़ने पर खुश नहीं होता।

हम सब हमेशा किसानों की आत्महत्याओं पर दुख जाहिर करते हैं। हम खबरों में बुंदेलखंड और विदर्भ को पढ़ते हैं...और फिर एक आह भरकर  रह जाते हैं। सियासी तबका इन किसानों की जिंदगी बदल देने को लिए कटिबद्ध होने का दम भरता है।

बुंदेलखंड और विदर्भ के बाद किसानों की खुदकुशी की इस समस्या के लिए एक ज़मीन भी मिली है। पश्चिम बंगाल। जी हां, भूमि सुधारों की भूमि।

अक्तूबर 2011 से अप्रैल 2015 के बीच पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले में ही करीब 169 किसानों ने आत्महत्या की है। यह स्थिति उस ज़िले की है जिसे बंगाल में धान का कटोरा कहा जाता है। जी नहीं, ना तो विदर्भ की तरह यहां सामाजिक वजहों से किसानों ने आत्महत्या की, न ही बुंदेलखंड की तरह यहां के किसानों को लगातार डेढ़ दशक से सूखा झेलना पड़ा है। बल्कि यहां धान की उत्कृष्ट पैदावार हासिल की जाती है।

यहां के किसान लगातार इसलिए आत्महत्या कर रहे हैं क्योंकि अच्छी फसल के बावजूद खेती अब फायदे का सौदा नहीं रही और राज्य सरकार के पास किसानों के लिए कोई बीमा पॉलिसी नहीं है। सबसे पहले तो हमें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का वह बयान याद आता, जिसमें उन्होंने किसानों की आत्महत्या पर कहा कि मारे गए किसानों को राज्य सरकार ने मुआवज़ा दिया है और इन सब पर करोड़ो का कर्ज था।

फिर उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा कि आत्महत्या किए सुशांतो नाम का आदमी किसान नहीं करोड़पति था। असल में, वर्धमान जिले के गोलसी थाना के फुट्टा गांव में सुशांतो घोष नाम के किसान ऩे साल 2012 की सर्दियों में आत्महत्या कर ली थी। वह अपने पीछे दो बच्चों समेत एक बड़ा परिवार छोड़ गया था। सुशांतो पर महज 5 लाख रूपये का कर्ज़ था। लेकिन उसके कर्ज का एक तिहाई हिस्सा महाजनों का था।

बहरहाल, उसकी मौत के बाद सियासी बदनामी से पीछा छुड़ाने के लिए मुख्यमंत्री उस किसान को करोड़पति बता गईं। हम सुशांतो के घर पहुंचे थे। मुझे नहीं लगता कि कोई भी करोड़पति शख्स अचानक पहुंचे अभ्यागतों के लिए भी पहले से टूटी चारपाई बिछाकर रखेगा। फटे कपड़े पहन लेगा और अपने घर को झोंपड़ानुमा बना लेगा।

असली समस्या यह भी है कि किसानों के ऐसी आत्महत्याओं की ठीक से रिपोर्टिंग नहीं होती। टीवी चैनलों के लिए ऐसी खबर कोई मायने नहीं रखती।

खेती की बढ़ती लागत को देखकर फिलहाल तो यही चिंता है कि जिसतरह देश के बाकी के हिस्सों में भी खेती-किसानी का हालत ठीक नहीं, उसमें उत्पादन लागत को कम करना ही होगा। उर्वरक, बीज, कीटनाशकों की कीमत कम करनी ही होगी। फसलों का बीमा और न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाना ही होगा।

सियासी झूठ हमने बहुत देखे और सुने हैं। लेकिन ममता जिस मां, माटी और मानुष के नारे पर सवार होकर राइटर्स बिल्डिंग पहुंची हैं...उसका खयाल उनको जरूर करना चाहिए। हालांकि यह भी तय है कि अभी ममता की राजनीतिक ज़मीन बेहद मजबूत बनी हुई है, बल्कि बंगाल का उनका क़िला दुर्जेय है। बंगाल में भाजपा अभी सिर्फ वोटशेयर बढ़ा पाई है और वाम से अभी भी अवाम दूर है।

फिलहाल तो हमेशा की तरह अदम गोंडवी याद आ रहे हैं,
भुखमरी की ज़द में है या दार के साए में है
आदमी गिरती हुई दीवार के साए में है।।



Wednesday, April 15, 2015

दो टूकः जाति क्यों नहीं जाती?



अभी 14 अप्रैल को बाबासाहब की जयंती है। सवा सौ साल हो जाएंगे एक युगप्रवर्तक को पैदा हुए। बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर को संविधान के जनक कहने के साथ दलितों-वंचितों के हितरक्षक के तौर पर जाना जाता है।

मैं अभी उनके जीवन पर एक डॉक्युमेंट्री के सिलसिले में पहले को उनके जन्मस्थान महू और फिर नागपुर की दीक्षाभूमि देखकर आया हूं। बाबासाहब दस लाख लोगों के साथ बौद्धधर्म में दीक्षित हुए थे। इससे पहले सन् 1935 में ही बाबासाहब ने कह दिया था कि वह हिन्दू धर्म से जाति-प्रथा और छुआछूत को खत्म करने के लिए बीस साल का वक्त दे रहे हैं और ऐसा नहीं होने पर, वह भले ही हिन्दू धर्म में जन्में हों लेकिन उनकी मृत्यु हिन्दू धर्म में नहीं होगी।

बाबासाहब ने अपनी मृत्यु से तीन महीने पहले बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। जातियां खत्म नहीं हुईं। आज भी देश में अंतरजातीय विवाहों का प्रतिशत महज 5.4 है। एक दशक पहले के सर्वेक्षण में भी आंकड़ा यही था। इसका मतलब यह है कि जाति तोड़ने के मामले में वैश्वीकरण नाकाम रहा है। और अगर कोई यह कहे कि आर्थिक वृद्धि जाति-व्यवस्था को तोड़ देगी, तो उस बयान पर सवालिया निशान लगाया जा सकता है।

जहां तक छूआछूत का प्रश्न है.। यह समाज से कहीं नहीं गया है। सर्वे के मुताबिक, गांव में हर तीसरा परिवार और शहरों में पांचवां परिवार छुआछूत मानता है। हमारे राजनीतिक दलों या आंदोलनों का अजेंडा अब अश्पृश्यता नहीं रह गया है।

नैशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकनॉमिक्स के सर्वेक्षण के आंकड़ों के लिहाज से मध्य प्रदेश (50%) छत्तीसगढ़ (48%) राजस्थान और बिहार (47%) और उत्तर प्रदेश (43%) छुआछूत मानने वालों में अव्वल हैं।

वैसे अमेरिका के राष्ट्रपति अपने हालिया दौरे पर भारत को जाति व्यवस्था पर सीख देकर गए हैं। उनको यह भी ध्यान देना चाहिए कि अमेरिका में 56 फीसद लोग रंगभेद करते हैं। और अश्वेत लड़को को देखकर श्वेत महिलाएं रास्ता बदल लेती हैं।

अपने देश में छुआछूत का यह मामला सिर्फ सनातनी हिन्दुओं तक नहीं है। उच्चवर्णीय मुसलमान अपने कब्रिस्तान में पसमांदा को कफ़न-दफन नहीं करने देते। सर्वे के मुताबिक जैनों, सिखो, इसाईयों और यहां तक कि बौद्धों में भी छुआछूत मौजूद है।

यकीन मानिए, ब्राह्मणों में तकरीबन 52 फीसद लोग छुआछूत मानते हैं तो उसके बाद ओबीसी जातियां हैं, जिनकी आबादी का 33 फीसद छुआछूत मानता है। गैर-ब्राह्मण अगड़ों में छुआछूत का आंकड़ा 24 फीसद है तो 23 फीसद आदिवासी छुआछूत बरतते हैं।

इस जाति व्यवस्था की कई परते हैं। जैसे कि सिर्फ उत्तर भारतीय ब्राह्मणों में ही कान्यकुब्ज, सरयूपारीण और मैथिल जैसे कई क्षेत्रीय वर्ग हैं। इन क्षेत्रीय जाति वर्गों में भी कई उपजातियां हैं। मिसाल के तौर पर मिथिला के ब्राह्मणों में श्रोत्रीय और जेबार जैसी कई उपजातियां हैं और हर उप-जाति अपने जाति वर्ग में खुद को श्रेष्ठ मानती है। इसके पीछे के तर्क समझ से परे होते हैं। मसलन, दोबैलिया तेली, यानी वैसे तेली जो कोल्हू में तेल निकालने के लिए दो बैलों का इस्तेमाल करते हैं खुद को एकबैलिया तेली यानी ऐसी तेली जो कोल्हू में एक बैल से तेल निकालते हैं—से श्रेष्ठ मानते हैं। इसी तरह यादवों में कृष्णैत और कंसैत होते हैं। इऩमें आपस में शादी ब्याह का भी परहेज होता है।

फिलहाल तो देश के कानून में भी विभिन्न धार्मिक समूहों के दलितों के लिए किसी फायदे का प्रावधान नहीं है। दलित इसाईयों या दलित मुसलमानों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता। विभिन्न समाजवादी पार्टियां इसका पुरजोर विरोध भी करती हैं। विभिन्न धर्मों में समानता एक सिद्धांत है और इसके तहत वर्ग या जाति को माना नहीं जा सकता। लेकिन असली जिंदगी में सिद्धांत अलग और व्यवहार तो अलग होता है ना?



Wednesday, April 8, 2015

दो टूकः पढ़ाई-लिखाई हाय रब्बा

अप्रैल का महीना आता है तो मेरे जैसे आम इंसानों को कई तनावों के साथ एक और तनाव झेलना होता है, अपने संतानों को स्कूल में दाखिला कराने का। एडमिशन का मिशन हर अभिभावक के लिए कितना कष्टकारी होता है, सिर्फ वही जानता है जिसने अपने बच्चों के दाखिले के लिए दौड़-भाग की है।

बच्चों के साथ मां-बाप का इंटरव्यू जरूरी हो गया है। अंग्रेजी स्कूलों से निकले हमारे साथी जरुर, बाबा ब्लैक शीप, हम्प्टी-डम्प्टी और चब्बी चिक्स जानते होंगे, लेकिन स्टेट बोर्ड से निकले मित्रों की अंग्रेजी से मुठभेड़ छठी कक्षा में हुआ करती थी।

मेरा बेटा दूसरी कक्षा में गया है, लेकिन स्कूल के विकास के लिए और उसके दोबारा एडमिशन के एवज़ में जो रकम मुझसे वसूली गई है वह मेरी मासिक आमदनी की तकरीबन ड्योढ़ी है। उसके किताबों की कीमत साढ़े तीन से चार हजार के बीच रही।

सच कहूं तो मुझे अपना वक्त याद आ गय़ा। मुझे लगता है कि हम न जाने कितनी दूर चले आए हैं। बहुत-सी बातें एकदम से बदल गईं हैं। सारे बदलाव सकारात्मक से लगते तो हैं लेकिन पढाई के स्तर और लागत के बारे में सकारात्मक टिप्पणी सूझ नहीं रही।

हमारे शहर में हिन्दी और अंग्रेजी माध्यम के दो निजी स्कूल थे। हमारा दाखिला सरस्वती शिशु मंदिर में हुआ था, दाखिले की फीस थी 40 रुपये और मासिक शुल्क 15 रुपये। चार साल उसमें पढ़ने के बाद जब फीस बढ़कर 25 रुपये हो गया, और तब घरवालों को लगा कि यह शुल्क ज्यादा है।
फिर मैं एक सरकारी मिड्ल स्कूल जाने लगा था, जहां एडमिशन फीस 5 रुपये, और सालाना शुल्क 12 रुपये था। इस गांधी स्कूल में ब्रिटिश जमाने के फर्श पर ही बैठना होता था।

उस वक्त भी, जो शायद 1988 का साल था, किताबों की कीमत हमारी ज़द में हुआ करती थीं। छठी क्लास में विज्ञान की किताब सबसे मंहगी थी और उसकी कीमत थी महज 6 रुपये 80 पैसे। बिहार टेक्स्टबुक पब्लिशिंग कॉरपोरेशन किताबें छापा करती थी, सबसे सस्ती थी संस्कृत की किताब जो शायद डेढ़ रूपये के आसपास की थी।

उसमें भी घरवालों की कोशिश रहती कि किसी पुराने छात्र से किताबें सेंकेंडहैंड दिलवा दी जाएं। आधी कीमत पर। किताब कॉपियां हाथों में ले जाते। सस्ते पेन...बॉल पॉइंट में भी कई स्तर के...35 पैसे वाले मोटी लिखाई के बॉलपॉइंट रिफिल से लेकर 75 पैसे में पतले लिखे जाने वाले बॉल पॉइंट पेन 
तक।

स्याही का इस्तेमाल धीरे धीरे कम तो हो रहा था, लेकिन फैशन से बाहर नहीं हुआ था। उस वक्त बिहार सरकार द्वारा वित्त प्रदत्त सब्सिडी वाले कागजों से वैशाली नाम की कॉपियां आतीं थीं...जिन पर जिल्द चढा होता। अब हमारी गुरबत पर न हंसिएगा...वैशाली की कॉपी में नोट्स बनाना मेरे और मेरे दोस्तों का बड़ा ख्वाब हुआ करता। मध्यम मोटाई की कॉपी दो रुपये की आती थी...हमारी सारी बचत वही खरीदने में खर्च होती।

बेटे के स्कूल में कंप्यूटरों की भरमार देखकर आया हूं, हर कक्षा में ग्रीन बोर्ड और डिस्प्ले बोर्ड दोनों है, प्रोजेक्टर हैं, म्युजिक सिस्टम है। फीस की रकम देखी...पढाई मंहगी हो गई है या वक्त का तकाजा है...या लोग संपन्न हो गए है या पढाई सुधर गई है...कस्बे और शहर का अंतर....वही सोच रहा हूं।

आजकल बच्चों की पढ़ाई पर महानगरों के माता-पिता कमाई का 40 फीसदी हिस्सा खर्च कर रहे हैं। एसोचैम ने एक सर्वे किया है। दो हज़ार अभिभावको पर किया गया सर्वे है। विषय, ‘शिक्षा पर बढ़ती लागत से परेशान अभिभावकथा। इसमें कहा गया कि सिर्फ एक बच्चे की प्राथमिक या माध्यमिक शिक्षा पर अभिभावकों का खर्च करीब 94,000 रूपए तक हो जाएगा।

यह खर्च फीस, स्कूल आना-जाना, किताबें, पोशाक, स्टेशनरी, किताबें, टूर, टयूशन और पढ़ाई से जुड़ी चीजों पर होगा। एसोचैम के इस सर्वे के निष्कर्ष में सामने आया है स्नातक तक की पढ़ाई में एक बच्चे पर अभिभावकों के 18-20 लाख रूपए खर्च हो जाते हैं।

56 फीसद अभिभावकों का यह भी कहना था कि उन्हें बच्चों के भविष्य की चिंता है और महंगी शिक्षा के कारण उन्हें बच्चों को एक्स्ट्रा-करिकुलर एक्टिविटीज से वंचित करने को बाध्य होना पड़ रहा है।


बहरहाल, हम बाध्य हैं कि बच्चे अच्छे (?) स्कूलों में पढ़ें और आम भारतीय की मान्यता है कि महंगे स्कूल अच्छे होते हैं। इसी तर्ज पर किताबें भी महंगी हो रही हैं। लेकिन, देश में शिक्षा का स्तर क्या है इसकी ताकीद वैशाली और हरिय़ाणा में पऱीक्षा के दौरान सीनाजोरी की तस्वीरों से साफ हो जाता है। 

Friday, March 27, 2015

तीन आखर के नक़ल से...

देश में आजकल एक तस्वीर को लेकर बहुत हाहाकार मचा। तस्वीरें थीं बिहार के वैशाली में चारतल्ला इमारत तक चढ़ गए लोगों की, जो अपने नौनिहालों को दसवीं की परीक्षा पास कराने को लेकर उतारू थे।

इस तस्वीर ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत ख्याति बटोरी। असली मज़ा तो यह, कि दयालु पुलिसवाले उनके पीठ पीछे हो रही घटना को नज़रअंदाज कर रहे थे। बिहार की पुलिस चोरी-चकारी के मामलों में बहुत दयालु है।

टीवी और सोशल मीडिया पर जितनी मुमकिन हो सकती थी, उतनी चिंता जताई गई कि बिहार में शिक्षा का स्तर बिलकुल गिर गया है। बाद में, शायद डेढ़-दो हजार बच्चे और अभिभावक गिरफ्तार करके जेल भेजे गए। साबित हो गया अपराध तो दो हजार रूपये का जुर्माना या छह महीने की जेल या दोनों हो सकता है।

कुछ लोग बिहार को डिफेंड भी कर रहे हैं। यह कहते हुए कि यह बिहार के बच्चों की नहीं वहां की व्यवस्था की कमी है। नकलचियों में आम मान्यता है कि समाजवादी टाइप दलों के शासन में नक़ल को छूट मिलती है। राजनाथ सिंह यूपी के मुख्यमंत्री थे तो नक़लविरोधी कानून के वजह से उनको मशहूरियत मिली थी, बाद में मुलायम ने छात्रों में फैले असंतोष का फायदा उठाया था।

बिहार की इस तस्वीर के ऐन बाद एक तस्वीर झांसी से आई, जहां कुछ छात्र नेता एक प्रोफेसर को महज इसलिए थपड़ा रहे थे क्योंकि उस नाकाबिलेबर्दाश्त प्राध्यापक ने उनको नक़ल के मौलिक अधिकार से वंचित कर दिया था।

एकतरफ नीतीश बिहार की मेधा को बतौर ब्रांड पेश करना चाहते हैं, दूसरी तरफ ऐसी तस्वीरेंहा दैव! सोशल मीडिया में वैशाली की इस वाइरल हुई तस्वीर ने तकरीबन यह स्थापित कर दिया कि समूचे बिहार के बच्चे नक़ल करके ही पास होते हैं। इसने उन तमाम लोगों को भी एहसासेकमतरी से भर दिया है जिन्होंने हाल-हाल से ही बिहार के नाम पर सीना चौड़ा करके दिल्ली-मुंबई में घूमना शुरू किया था।

याद कीजिए बिहार-यूपी के बच्चे जब रेलवे और बैंकिंग की प्रतियोगिता परीक्षाओं में तमाम जगहों पर जाते थे, तो मुंबई जैसी जगहों पर उनकी मुखालफत की जाती थी। तब ऐसा लगता था कि क्षेत्रीय क्षत्रपों को बिहारियों की मेधा से घबराहट होती है। लेकिन, गौरव के उन क्षणों का क्षरण हो गया। मात्र एक तस्वीर से।

बिहार में नक़ल की इस स्वर्णिम विरासत कैसे तैयार हुईशायद इसमें से एक वजह है, आम बिहारियों का अंग्रेजी में थोड़ा कमजोर होना। इसकी जड़े पुरानी हैं, लेकिन जब लालू अपने चरम पर थे, उनने दसवीं की परीक्षा में से अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म कर अपने हिसाब से गरीब-गुरबों का दिल ही जीत लिया था। उसके बाद से तो आम बच्चों खासकर सरकारी स्कूल में पढ़ रहे बच्चों का अंग्रेजी पढना ही छूट गया।

इधर, तमाम विवादों के बाद लालू प्रसाद ने बयान दिया कि उनके जमाने में उन्होंने किताब खोलकर नक़ल करने की छूट दे दी थी। बकौल लालू, किताब खोलकर भी चोरी वही कर पाएगा जिसने किताबें पढ़ी होंगी। तर्क बहुत अच्छे हैं, लेकिन इससे बिहार की मेधा का जो कचरा भारत और विदेशो में हो गया है उसकी भरपाई कौन करेगा?

एक बात और, बिहार में प्राथमिक शिक्षकों से मुर्गी, सूअर, मवेशी के साथ जनगणना करवाई जाती है, उनसे मिड डे मील बनवाया जाता है, राज्य सरकार का कोई भी काम हो, उस काम में शिक्षक ही जोते जाते हैं। फिर उन शिक्षकों का अपना घरेलू जेनुइन काम भी है, मसलन धान की खेती, कटाई, दौनी, और लायक हुए तो प्राइवेट में ट्यूशन देना। नीतीश ने ऐरो-गैरों को शिक्षामित्र बनाकर शिक्षा का जो हाल किया है, उसके बाद परीक्षा में पास होने के लिए बच्चे चोरी नहीं करेंगे तो क्या करेंगे?

आधुनिक कबीर ने एक सूक्ति कही है,
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, साक्षर भया न कोय
तीन आखर के नकल से, हर कोई ग्रेजुएट होय।


Monday, March 23, 2015

दो टूकः धान पर ध्यान

चीन मे एक कहावत है- दुनिया की सबसे बेशकीमती चीज़ हीरे-जवाहरात और मोती नहीं, धान के पांच दाने हैं। यह कहावत तब भी सच थी, जब बनी होगी और आज भी उतनी ही सच है।
शायद इसीलिए पश्चिमी दुनिया जहां भेड़ों, सू्अरों, कुत्तों और इंसानों की क्लोनिंग पर ध्यान दे रही है, वहीं भूख से जूझ रहे एशिया में धान के जीनोम की कड़ियां खोजी जा रही हैं।

दुनिया भर में करीब तीन अरब लोग चावल खाते हैं लेकिन धान के इस इलाके की आबादी का ज़्यादातर हिस्सा अभी भी भूखा है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, दुनिया भर में 80 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं और सालाना करीब 50 लाख लोगों की मौत की वजह कुपोषण है। दुनिया की आबादी में हर साल 8 करोड़ 60 लाख लोग जुड़ जाते हैं। इस इलाके में बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए अगले 20 साल में चावल की उपज को 30 फ़ीसदी तक बढ़ाना होगा।

उपज बढ़ाने के दो तरीके सर्वस्वीकृत हैं। पहला, खेती के लिए रकबा बढ़ाना या फिर पैदावार में बढ़ोत्तरी करना। साठ के दशक के पहले, पहलेवाले विकल्प पर अमल किया गया और विश्वभर में बहुमूल्य जंगल कटकर खेत बन गए। साठ के दशक में नॉर्मन बारलॉग जैसे वैज्ञानिकों ने स्थिति को नजाकत समझी और पैदावार बढ़ाने के लिए बीजों की गुणवत्ता सुधार और तकनीकी साधनों के विकास की ओर ध्यान दिया। उसी कोशिश का नतीजा रहा हरित क्रांति।

जैसे ही पौधों की नई किस्मे पहले मेक्सिको और फिर पूरे विश्व में बोई जाने लगी पैदावार में भारी बढ़ोत्तरी हुई। ख़ासकर एशिया में यह वृद्धि की दर 2 फीसदी सालाना के आसपास रही।

हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में उत्पादन में वृद्धि की दर मामूली रही, तो यह सोच लिया गया कि चावल उत्पादन अब अपने चरम पर पहुंच चुका है और इसमें अधिक विकास की अब संभावना नहीं बची। ऐसे में सीमांत भूमियों उत्पादन बढ़ाना एक बड़ी चुनौती रही है, जहां अधिकतर फसलें कीटों के प्रकोप, रोगों या सूखे की वजह से खत्म हो जाती हैं।

कई वैज्ञानिक मानते हैं कि दुनिया के सबसे गरीब व्यक्ति तक खाना पहुंचाने का उपाय जीएम फसलें ही हो सकती हैं। ये फसलें प्राकृतिक आपदाओं का सामा करने में अधिक सक्षम हैं।

जीएम फसलों की क्षमता तब एक बार फिर उजागर हुई जब एक चीनी अध्ययन में कीट प्रतिरोधी जीएम चावल की किस्म में दस फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज़ की गई।

यह सिर्फ उत्पादन बढ़ाने का ही मामला नहीं है, बल्कि यह कीटनाशकों के अत्यधिक हो रहे प्रयोग को नियंत्रित करने में भी सहायक होगा। चीन में ऐसे कीट प्रतिरोधी क़िस्में उगाने वाले किसानों में कीटनाशकों से होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं में नाटकीय सुधार देखा गया है।

अपने देश में दूसरे चरण की हरित क्रांति को कायदे से शुरू करने की जरूरत है। यद्यपि भारत आज खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर है और खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) खाद्यान्न दान करने दूसरा सबसे बड़ा संगठन है। फिर भी, पंजाब और हरियाणा में चावल की बढ़ती खेती और उसके बुरे असर से लग रहा है कि हमें चावल उत्पादन की दूसरी विधियों की खोज करनी चाहिए।

अब चूंकि चावल के जीनोम की सिक्वेंसिंग इंटरनेशनल राइस जीनोम सिक्वेंसिंग प्रोजेक्ट ने कर ली है और इसका डाटाबेस भारत समेत जापान, चीन ताईवान, कोरिया, थाईलैंड, अमेरिका, कना़डा, फ्रांस, ब्राजील, ब्रिटेन और फिलीपीन्स के वैज्ञानिकों के लिए निशुल्क उपलब्ध है।

दुनिया में करीब 120 करोड़ लोग रोजाना एक डॉलर से भी कम पर गुजारा करते हैं। ऐसे में, रोग, पे्स्ट, सूखा और लवणता प्रतिरोधी धान की फसल तीसरी दुनिया के कृषि परिदृश्य में क्रांति ला सकती है जाहिर है, यह भूखों के हित में होगा।


(यह लेख गांव कनेक्शन अखबार में मेरे स्तंभ दो-टूक में प्रकाशित हो चुका है)

Sunday, March 15, 2015

दो टूकः हा राष्ट्रहित! हाहा राष्ट्रहित!!

शीर्षक देखकर चौंकिए मत। मैं राष्ट्रहित की बात ही कर रहा हूं। राष्ट्रहित सबसे ऊपर होना चाहिए। पहले राष्ट्र, तब मैं की भावना का पाठ अति-आवश्यक है। बीते हफ्ते में तीन बातें हुईं, जिनसे मन-मयूर नाच उठा। तीनों बातें राष्ट्रहित में हुई। विश्व के अलग-अलग हिस्सों में हुईं। लगा, पूरी दुनिया राष्ट्रहित में सोचने लगी है।

पहली बात, बीबीसी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान ने भारत में महिलाओं की स्थिति के लिए केस स्टडी किया। निर्भया कांड के अभियुक्तों का साक्षात्कार लेकर वृत्त-चित्र बनाया और कहा अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन चलाएंगे।

कुछ लोगों को खल गया। कहा, यह राष्ट्रहित में नहीं है। जब भी भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने झुकने से इनकार करता है, बाहरी ताकतें ऐसे-ऐसे डॉक्यूमेंट्री बनाकर प्रसारित करने लगती हैं।

फिर कुछ लोगों ने कहा कि आखिर जेल में बंद अभियुक्तों का वीडियो साक्षात्कार कैसे लिया जा सकता है और तुर्रा यह कि उन अभियुक्तों और वकीलों ने पीड़िता को लेकर अपमानजनक टिप्पणियां की हैं! इन टिप्पणियों से भारत की छवि खराब हो रही है। राष्ट्रहित में इस वृत्तचित्र पर रोक लगनी चाहिए। विपक्षी दलों के हाहाकार के बाद सरकार ने राष्ट्रहित में बीबीसी के इस वृत्त चित्र पर ही बंदिश लगा दी। बीबीसी ने महिला दिवस के पहले ही दिखा दिया। सरकार ने सोशल मीडिया पर इसके प्रसार को रोक दिया। राष्ट्रहित की रक्षा हुई।

अब मुमकिन है कि सरकार राष्ट्रहित में इस बात की जांच कराए कि आखिर अभियुक्तों के साक्षात्कार की अनुमति दी किसने।

राष्ट्रहित का दूसरा मामला आया जम्मू-कश्मीर में सरकार गठन को लेकर। मुफ्ती मोहम्मद सईद ने सत्ता संभाली और एक अलगाववादी नेता को सत्ता संभालते ही रिहा कर दिया। याद कीजिए, यही मुफ्ती मोहम्मद सईद गृह मंत्री थे, जब रूबिया सईद का अपहरण आतंकवादियों ने किया था, और बतौर फिरौती आतंकियों को रिहा कर रूबिया छुड़ाई गईं थी। यह बात और है कि तब रूबिया को भारत की बेटी मानकर राष्ट्रहित में यह कदम उठाया गया था। हालांकि, आतंकी बाद में भी छोड़े जाते रहे। अलबत्ता, रूबिया सईद अपहरण कांड के वक्त सरकार में बीजेपी वाली सरकार नहीं थी। प्रधानमंत्री वीपी सिंह थे और भाजपा ने उस सरकार को समर्थन भर दिया था।

राष्ट्रहित का तीसरा मामला भारत से नहीं है। राष्ट्रहित का यह कांड बांगलादेश में हुआ है। वर्ल्ड कप में इंग्लैंड के खिलाफ शानदार जीत हासिल कर टीम को पहली बार क्वॉर्टर फाइनल में पहुंचाने वाले क्रिकेटर रूबेल हुसैन की दुनिया महीने भर के अंदर एक बार फिर उलट गई है। इसकी एकमात्र वजह हैः राष्ट्रहित

विश्वकप से ऐन पहले रूबेल हुसैन पर बांग्लादेशी अभिनेत्री नाज़नीन अख़्तर ने बलात्कार का आरोप लगाया और रूबेल को कुछ वक्त जेल में भी गुजारना पड़ा। लेकिन बलात्कार के आरोपी रूबेल हुसैन को विश्व कप में खेलने देने के लिए अदालत ने ज़मानत दे दी। वजहः राष्ट्रहित। बांग्लादेशी क्रिकेटर ने मैदान पर जौहर दिखाया, इंगलैंड को पटखनी दे दी, तो पीड़िता के वकील ने अपनी मुवक्किल का मुकद्दमा छोड़ दिया। वजहः राष्ट्रहित

क्रिकेट ने एक आपराधिक मुकद्दमे पर वरीयता हासिल कर ली। वजहः राष्ट्रहित। अंततः बलात्कार पीड़िता अभिनेत्री नाज़नीन अख्तर ने भी आपना आरोप वापस ले लिया। वजहः राष्ट्रहित। इधर सुना है आम आदमी पार्टी में भी कुछ स्यापा हो रहा है और डर्टी पॉलिटिक्स नाम की फिल्म भी हिट हो रही है। क्या पता उसकी वजह भी राष्ट्रहित ही हो?

अब हम क्या कहें, कह तो अदम गोंडवी गए हैं—
जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिए
आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिए



Wednesday, March 11, 2015

बजट और घीसू का पसीना

जट भाषण बहुत बोरिंग होते हैं। और हर वित्त मंत्री उसमें कुछ शेरो-शायरी करके रंग भरने की कोशिश करता है। मैं वित्त मंत्री के भाषण-कला या शेरो-शायरी पर कुछ कहना नहीं चाहता। मैं इस स्तंभ के ज़रिए आपको बजट की नीरस बातों पर बिन्दुवार कुछ कहने की कोशिश भी नहीं करूंगा।
कईयों ने इस बजट को बहुत बेकार कहा, कईयो ने दूरमागी प्रभाव वाला। विपक्ष वालों के मुताबिक खेती किसानी के लिहाज से यह बजट कुछ खास नहीं रहा।

वित्तीय मामलों जैसे नीरस विषय पर कोई जानकार ही कायदे से अपनी बात समझा पाए। लेकिन जिस देश में रूखी त्वचा, खेतों में पड़ी दरारों से अधिक महत्वपूर्ण हों, जहां सिर में डैंड्रफ सूखी फसलों से अधिक पब्लिक स्पेस घेरती हो, जहां किसान आत्महत्या से अधिक चर्चा वॉर्डरोब मालफंक्शन की हो, वहां थोड़ी सी जगह कुछ चिंताओं को दिया जाना मैं बाजिव ही मानता हूं। 
प्रधानमंत्री देहातों को डिजिटल बना देना चाहते हैं। शायद बजट में डिजिटल इंडिया कार्यक्रम पर खासा जोर भी इसी वजह से दिया गया। दोयम यह कि सरकार देश में टेलिकॉम इन्फ्रास्ट्रक्चर और तकनीक पर विदेशी निवेश लुभाने की कोशिशों में है।

शहरों और गांवों के बीच की डिजिटल खाई को पाटने के लिए अगले साल दिसंबर तक सरकार ने देश के ढाई लाख गांवों तक ब्राडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है। अगर यह अपने तयशुदा वक्त पर, या छह महीने लेट भी, हो पाया तो भारतीय देहातों की सूरत बदल देगा। घरेलू बाज़ार के लिए तकनीक में 26 अरब डॉलर क सरकारी निवेश मौजूदा वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि का मूल रहेगा।

अपने बजट भाषण में जेटली ने कहा ही कि देश भर में नैशनल ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क को साढे सात लाख किलोमीटर की लंबाई में बिछाया जाएगा और सरकार गांवो में 100 एमबीपीएस ब्राडबैंड कनेक्टिविटी देगी।

ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी ठीक है। अब हमारे देहात ग्लोबल हो जाएंगे। मुझे देहातों के ग्लोबल होने में कोई दिक्कत नहीं है।

लेकिन, हम भारतीयो की दिक्कत है कि हम बहुत बुनियादी मसलों में उलझ कर रह जाते हैं। मिसाल के तौर पर, मैं खुद, कई बार बुंदेलखंड के इलाकों के चक्कर काट चुका हूं। मुझे पानी की समस्या बहुत बुनियादी और असल समस्या लगती है।

बांदा के पास एक जगह है अतर्रा। यह तीन दशक पहले तक अतर्रा देश का सबसे बड़ा चावल उत्पादक केन्द्र था और यहां धान की सैंतीस मिलें थीं। इस इलाके में नहरों का जाल बिछा था। मतलब नहरों की अच्छी कनेक्टिविटी थी। यहां बांधो की सघनता एशिया में सर्वाधिक थी। अतर्रा का सेला चावल देश भर में मशहूर था और यहां की स्थानीय चावल की बहुतेरी किस्में उगाई जाती थीं।
वक्त बदला। बांधों और नहरों में पैंसठ फीसद तक गाद भर गया। बुंदेलखंड वैसे भी कम बारिश के लिए बदनाम है। सरकारों ने सुध ही नहीं ली।

आज हालात यह हैं कि अतर्रा का आखिरी चावल मिल भी अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। काश...सरकार इधर भी तवज्जो देती कुछ। चावल की स्थानीय नस्लें खो गईं, उसका मुद्दा तो बाद में उठेगा, अतर्रा के किसानों की कई नस्लें बरबाद हो गईं इसका जवाब कौन देगा।

ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी बहुत जरूरी है। लेकिन नहरों की कनेक्टिविटी उससे ज्यादा जरूरी है। अदम गोंडवी कहते तो हैं,

न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के नगीने से
तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से।