Monday, July 6, 2015

हम नाशुकरे भारतीय!

भारतीय क्रिकेट टीम बांग्लादेश में सीरीज़ हार गई। सारी उंगलिया एक साथ एक ऐसे शख्स की ओर उठ गईं जिसने क्रिकेट की तीनों विधाओं में भारत को सरताज बनाया। जिसके हेलिकॉप्टर शॉट की विरूदावलियां गाईं जाती रही हैं और जिसके लंबे बालों को लेकर पाकिस्तानी हुक़्मरान भी हैरत में थे। महेन्द्र सिंह धोनी आज उसी परिस्थिति में हैं जिसमें कभी सौरभ गांगुली थे। हमारे लिए बांगलादेश से सीरीज हारते ही हीरो धोनी खलनायक सरीखे हो गए हैं।

लोकप्रियता और कप्तानी के पद के मामले में विराट कोहली धोनी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। उन्हें रवि शास्त्री की सरपरस्ती हासिल है। रवि शास्त्री आज भारतीय टीम के निदेशक हैं। वह एक अच्छे क्रिकेटर तो खैर क्या रहे, रेकॉर्ड की किताबें सारा सच बयां कर देती हैं, लेकिन राजनीतिज्ञ तो हैं ही। हर वक्त ऐसे क्रिकेटर जरूर हुए हैं, जो बड़े सितारों पर नकारात्मक टिप्पणियां करके खबरों में आने की कोशिश करते हैं। मुझे याद आते हैं, संजय मांजरेकर जो बहुधा सचिन के खिलाफ बयानबाज़ी करते पाए जाते थे। साल 2005 में ही मांजरेकर ने सचिन को संन्यास की सलाह दी थी. यह बात और है कि सचिन ने उनकी सलाह पर ग़ौर नहीं किया। उसके बाद सचिन में कितना क्रिकेट बाकी था यह सबको पता है।

धोनी के खिलाफ विराट ने मोर्चा खोला है। संभवतया रवि शास्त्री के उकसावे पर। इससे पहले गौतम गंभीर और सहवाग धोनी की सत्ता को अस्थिर करने की कोशिश करते रहे। इससे उनके खेल पर बुरा असर पड़ा। नतीजतन दोनों टीम से बाहर हैं और रणजी में भी उनका प्रदर्शन उनकी नाकामी का किस्सा बयान कर रहा है।

धोनी की कप्तानी को सिफ़र बनाने के लिए विराट भी वैसा ही कुछ कर रहे हैं। विश्व कप से लेकर बांगलादेश दौरे तक विराट कोहली की राजनीति उनके प्रदर्शन में साफ झलक रही है।

धोनी के खिलाफ दिल्ली वाले खिलाड़ियो की राजनीति बस वर्चस्व का लड़ाई है। और इसका खामियाज़ा भारतीय क्रिकेट को भुगतना पड़ रहा है। अब जिम्बाब्वे जाने वाली टीम में एक दो नहीं पूरे आठ खिलाड़ियो को आराम दिया गया है। कप्तान भी अजिंक्य रहाणे बने हैं। टीम में न तो धोनी हैं न विराट। वैसे कमजोर टीमों के खिलाफ बड़े खिलाड़ियों को आराम दिया जाता है, लेकिन आठ खिलाड़ियों को पहली बार टीम से बाहर बिठाया गया है।

लेकिन क्या सचमुच धोनी को बाहर करने की ज़रूरत थी? धोनी का रन औसत ठीक-ठाक क्या, बल्कि बेहतर रहा है। और वह टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहने के बाद सिर्फ टी-20 और वनडे खेला करते हैं। इस जिम्बाव्बे सीरीज़ के बाद सीमित ओवरों वाला अगला कोई खेल भारत को अक्तूबर में ही खेलना है। इसलिए धोनी को खिलाया जा सकता था। इसके साथ ही धोनी अपनी बल्लेबाज़ी को भी ऩए तरीके से निखारने में लगे हैं, तो इस नई टीम को न सिर्फ धोनी के तजुर्बे का सहारा मिलता बल्कि धोऩी भी नंबर 4 पर उतरकर अपनी बल्लेबाज़ी को नए हरबे-हथियारों से लैस कर सकते थे।
महज बल्लेबाज़ी की भी बात नहीं। इस टीम में, कोई नियमित विकेट कीपर भी नहीं है। केदार जाधव, रॉबिन उथप्पा और अंबाती रायडू विकेट कीपिंग कर सकते हैं, लेकिन वह नियमित विकेटकीपर नहीं हैं।

वैसे भी, क्रिकेट एक दुधारू गाय है। इसमें राजनीति होगी ही। जब क्रिकेट संघों के मुखिया शरद पवार से लेकर तमाम राजनेता हों, वहां राजनीति भी होगी ही। और पैसा तो खैर है ही, जो यहां पानी की तरह बहता है।

भारतीय क्रिकेट एक दफा फिर से उसी जगह खड़ा है, जहां से क्रिकेटर सौरभ गांगुली को अपमान सहते हुए संन्यास लेना पड़ता है। बेशक, धोनी ने सैकड़ो दफा भारतीय क्रिकेटप्रेमियों को सुर्खरू होने और जश्न मनाने के मौके दिए हैं, ताबड़तोड़ छक्कों से स्टेडियम गुंजा दिए हों, लेकिन राजनीति के आगे सब बेबस हैं।

हम सब क्रिकेट को बतौर भलेमानसो के खेल देखना चाहते हैं, बतौर राजनीति नहीं।


Saturday, July 4, 2015

पहले इंसान को स्मार्ट बनाया जाए


यह शीर्षक मैंने बतर्ज़ किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए लिखा है। मैं पैरोडी में यकीन रखता हूं। गानों की पैरोडी पर चुनावी नारे लिख लिए जाते हैं और विचारों की पैरोडी पर विचार। जिस वक्त मैं यह स्तंभ लिख रहा हूं, चालीस साल पहले यही वक्त रहा होगा, रात के 11 बज 20 मिनट का जब, इंदिरा गांधी के निजी सचिव आर के धवन प्रधानमंत्री की वह चिट्ठी लेकर राष्ट्रपति फख़रूद्दीन अली अहमद के पास पहुंचे थे, और उसी चिट्ठी में देश में आपातकाल लगाने की सिफ़ारिश थी।

बहरहाल, चालीस साल बाद इसी दिन एक और प्रधानमंत्री ने कुछ ऐलान किए हैं। इनमे से एक है हर बेघर परिवार को घर मुहैया कराने की। प्रधानमंत्री इसे सरकार का दायित्व मानते हैं और इस जरूरत को पूरा करने के लिए आने वाले सालों में शहरों में दो करोड़ आवास बनाए जाने की योजना को अमलीजामा पहनाया जाना है।

इसके साथ ही शहरी विकास मंत्रालय के स्मार्ट सिटी, अटल शहरी विकास परियोजना और साल 2022 तक सबके लिए आवास योजना की शुरूआत भी हो गई है।

सुबह में एक तरफ प्रधानमंत्री इन तीन परियोजनाओं की शुरुआत की, उधर, निवेशकों उत्साहित हो उठे। उधर घोषणा हुई इधर, जोरदार लिवाली की बदौलत शेयर बाजार जून महीने के उच्चतम स्तर पर बंद हुआ।

प्रधानमंत्री मोदी ने शहरों और गांवों को एक दूसरे का पूरक बनने की सलाह भी दी और कहा कि शहरों के गंदे जल को शुद्ध कर यदि इसे गांवों को लौटा दिया जाए तो इससे फसलों की सिंचाई की जा सकेगी जिससे अच्छी पैदावार होगी।

इससे पैदा होने वाली जैविक सब्जियों को शहरों के लोग सस्ते दर पर खरीद सकते हैं। मोदी ने कहा कि ऐसा देखा गया है कि शहरों के आसपास के गांवों में सब्जियों की खेती अधिक होती है यदि थोड़ा सा बदलाव लाया जाए तो दोनों जगहों के लोगों को लाभ मिल सकता है।

चलिए विचार के तौर पर यह काफी अच्छे हैं। लेकिन स्मार्ट शहर बनाने से पहले क्या इंसान को स्मार्ट बनाना बेहतर विकल्प नहीं है? मैं गाज़ियाबाद के वैशाली में रहता हूं। दिल्ली से सटा हुआ है। लेकिन टूटी-फूटी सड़के, सड़कों पर फैली गंदगी, भरे और उफनते हुए नाले, बदबू फैलाते हुए गाजीपुर का लैंडफिल...इन सबको आप ठीक कर सकते हैं। लेकिन किसी शनीचर या रविवार की शाम आप इस पत्रकारबहुल रिहाइशी इलाके का दौरा करेंगे तो पाएंगे कि यहां तीन लेन की सड़क में एक लेन पर ट्रैफिक सरक रहा होता है, बाकी में लोगों ने अपनी कार पार्क की होती है। इन कार पार्क करने वाले महानुभावों में वह पत्रकार भी होते हैं, जो अपने चैनलो पर इस दुरवस्था पर चीखते हुए पाए जाते हैं।

मुख्तसर यह कि, शहर को स्मार्ट बनाने से पहले यहां रहने वाले लोगों को सिविक सेंस सिखाना होगा। इसके लिए एक अलग आंदोलन और अभियान की जरूरत पड़े तो वह भी कर लेना चाहिए।
अब जरा मैं उन बातों पर ध्यान दिलाना चाहता हूं जो शहरों के गंदे पानी को साफ करके खेती में इस्तेमाल किए जाने से जुड़ी हैं। सुनने में यह बात बेहद उम्दा है, लेकिन इसके सही तरीके से क्रियान्वयन पर मुझे शक है। कानपुर इसकी मिसाल है। कानपुर के शहर के तरल अपशिष्ट को, जो करीब 430 एमएलडी (मिलियन लीटर) रोजाना है, उपचारित करके खेती के लिए दिया जाता है।
लेकिन कानपुर के नजदीक शेखपुर जैसे डेढ़ दर्जन गांवों में देखा जाए तो इसी उपचारित पानी में मौजूद कैडमियम, लेड और सीसा जैसे भारी धातुओं ने सब्जियों के जरिए आहार श्रृंखला में जगह बना ली है। यह भारी धातु भूमिगत जल में भी चला गया है और लोगों में त्वचा के कैंसर से लेकर तमाम किस्म के रोग पैदा कर रहा है।

हम शहरों को स्मार्ट बना रहे हैं। बनाना चाहिए। आखिर शहरों में रहने वाले लोगों को सुविधाएं तो मिलनी ही चाहिए। लेकिन शहरों में जो नियोजन होगा, जो निर्माण होगा उससे क्या शहर का मिज़ाज तय होगा? क्या देश के सारे शहर एक जैसे मकानों वाले नहीं हो जाएंगे? क्या सरकारी योजनाओं के नक्शे पर तैयार हो रहे सारे शहर एक जैसे नहीं दिखेंगे? जोधपुर, बंगलुरू और मुजफ्फरपुर में क्या अंतर रह जाएगा?

अभी ही किसी शहर में चले जाइए, बने हुए सारे मकान अपने स्थानीय जरूरतों की बजाय एक जैसी शैली में बन रहे हैं। बड़े पैमाने पर मकान बनाने के दौरान दोहराव की इस वास्तु शैली से हमें बचना होगा।

उस स्मार्ट शहर में रहने वाले लोग भी स्मार्ट हो, इसकी तैयारी कर लें, तो आने वाले शहर आज के शहरों की तरह अनियोजित नहीं होंगे।


Tuesday, June 30, 2015

कमज़ोर मॉनसून से क्या हिम्मत हार दें?

मौसम विभाग ने लगातार दूसरे साल भी औसत से कम बारिश की भविष्यवाणी की है। ऐसा दो बार लगातार सिर्फ 28 साल पहले हुआ था। सोलह साल के बाद ऐसा होगा कि देश को सबसे अधिक खाद्यान्न पैदा करके देने वाले दो राज्य पंजाब और हरियाणा में सबसे कम बारिश होने वाली है। इन निराशाजनक आंकड़ों में फंसने की बजाय मैं कुछ उम्मीद से भरी बातें करना चाहता हूं।

प्रधानमंत्री मॉनसून में इस कमी को एक मौके के रूप में लेने की बात कह गए हैं और कहा है कि सूखाग्रस्त इलाकों में माइक्रोसिंचाई योजनाओं का विकास किया जाना चाहिए। दशकों से सिर्फ सरकारें बदलती रही हैं और अब तक हर सरकार गांवों में सिंचाई के लिए एक असरदार और विस्तृत तंत्र बना पाने में नाकाम रही हैं।

हमारे पास आज सिंचाई के नाम पर जो सुविधा है वह बस दशकों पुरानी सिंचाई व्यवस्था का हिस्सा भर है। मौजूदा नहरें कई दशक पुरानी हैं और इनमें गाद की समस्या के साथ-साथ पानी का काफी नुकसान भी होता है।

विख्यात पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र ने एक किताब लिखी है, आज भी खरे हैं तालाब। वह किताब पढ़ें तो आप आसानी से समझ जाएंगे कि तालाबों, पोखरों, कुओं जैसे पारंपरिक जलसंग्रह साधनों को जिन्दा करना ही सबसे मुफीद है।

चावल, गेहूं और मोटे अनाजों को एफसीआई के गोदामों से बाहर निकालने की जरूरत है। देश के वैज्ञानिक पहले ही सूखाप्रतिरोधी बीजों का विकास कर चुके हैं, अब इन्हें सस्ती दरों पर किसानों को दिए जाने की जरूरत है। फिलहाल, जन-धन योजना में जो पंद्रह करोड़ खाते खोलने का दावा सरकार कर रही है, अब उस खाते के सही इस्तेमाल का वक्त आ गया है। सरकार किसानों के लिए राहत सीधे इन्ही खातों में डाल दे, तो बात बन जाए।

कमज़ोर मॉनसून की भविष्यवाणी पर हालांकि लोग शक कर रहे है और मौसम की भविष्यवाणी करने वाली एक निजी वेबसाईट का जिक्र कर रहे हैं जो अल नीनो वर्ष होने के बावजूद दावा कर रही है कि इस साल 102 फीसद बरसात होगी। मेरा मन है कि ऐसा ही है। भारतीय मौसम विभाग 88 फीसद की बात कर रहा है।

लेकिन मॉनसून कमजोर हो तो भी मेरे खयाल में पांच ऐसी बातें हैं जो उम्मीदें बनाए रखने के लिए उजाले की आस सरीखी है। पहली तो यही कि मौसम की भविष्यवाणियां बाज़दफ़ा ग़लत भी साबित हो जाती हैं। ऐसा साल 2006, 2007, 2011 और 2013 में हो चुका है। दूसरी, उत्तर और पश्चिम के ऐसे इलाकों में ठीक-ठाक बरसात की भविष्यवाणी की गई है जहां अनाज की बढ़िया पैदावार होती है, और जहां पिछले साल बारिश खराब हुई थी। यानी, उत्तर-पश्चिम का इलाका जहां पिछली बार 79 फीसद बारिश हुई थी वहां इस बार 85 फीसद होने की उम्मीद है। मध्य भारत में 90 के मुकाबले 90 फीसद, पूर्वोत्तर में 88 फीसद के मुकाबले 90 फीसद, दक्षिण भारत में 93 फीसद के मुकाबले 92 फीसद बरसात की भविष्यवाणी है।

उम्मीद की तीसरी वजह है कि खाद्यान्न की पैदावार पर असर सिर्फ तभी पड़ता है जब बारिश बेहद कम हो। साल 2009 और 2014 ही ऐसा साल रहे हैं जब क्रमशः सामान्य से 21.8 फीसद और 12 फीसद कम बारिश की वजह से खाद्यान्न की पैदावार पर असर पड़ा था।

चौथी वजह यह है कि जाड़े में हुई ठीक-ठाक बारिश की वजह से देश के जलाशयों में 43.14 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी है। यह पिछले दस वर्षों के औसत का 136 फीसद है। तो पानी की कमी नहीं होगी यह भरोसा है।

पांचवी और आखिरी वजह यही कि मॉनसून में देरीकेरल तट पर यह देर से पहुंचा हैका मतलब यह नहीं कि सूखा पड़ेगा ही। साल 2005 में मॉनसून 7 जून को शुरू हुआ था, बारिश महज 1.3 फीसद कम हुई थी। साल 2009 में 25 मई को ही केरल तट से मॉनसून टकराया था, बारिश 21.8 फीसद कम हुई थी।


मुख़्तसर यह कि बारिश का कम होना, या मॉनसून का केरल तट पर कम आना, यह चिंता का विषय तो है लेकिन इस चुनौती को हम मौके में बदल पाए, तो देश की माली हालत के साथ-साथ किसानों के लिए भी राहत की बात होगी।


Tuesday, June 9, 2015

भूख का भूगोल

चलिए, एक चीज में हमने चीन को भी पीछे छोड़ दिया। जनसंख्या की बात नहीं कर रहा, क्योंकि मौजूदा दर से बढ़ते रहे तो भी हम 2030 में ही चीन को पीछे छोड़ पाएंगे। विकास दर की बात भी नहीं कर रहा क्योंकि इसके आधार वर्ष में मामूली फेरबदल से आंकड़े उलट जाते हैं।

मैं भूख की बात कर रहा हूं। हमारे महान भारतवर्ष में भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या दुनिया में सबसे अधिक है। यह आंकड़े संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन ने अपनी रिपोर्ट द स्टेट ऑफ फूड इनसिक्युरिटी इन द वर्ल्ड 2015 में जारी किए हैं। इस रिपोर्ट में विश्व भुखमरी सूचकांक भी जारी किया गया है, जिसमें 79 देशों के आंकड़े लिए गए हैं। निराशा इस बात की है कि भारत को इसमें 65वां स्थान दिया गया है। हमसे कहीं कम विकसित देश पाकिस्तान 57वें और श्रीलंका 37वें पायदान पर हैं। यानी इस मामले में पाकिस्तान और श्रीलंका हमसे बेहतर हैं।

संयुक्त राष्ट्र की भूख संबंधी सालाना रपट के अनुसार दुनिया में सबसे अधिक 19.4 करोड़ लोग भारत में भुखमरी के शिकार हैं। इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में भुखमरी के शिकार लोगों की गिनती कम हुई है। नब्बे के दशक में, 1990 से 1992 के बीच दुनिया भर में यह संख्या एक अरब थी और 2015 में यह संख्या घटकर 79.5 करोड़ रह गई है।

हालांकि, भारत में भी तब से अबतक भूखे पेट सोने वालों की संख्या में गिरावट आई है। 1990-92 में भारत में यह संख्या 21.01 करोड़ थी, जो 2014-15 में घटकर 19.46 करोड़ रह गई। लेकिन विकास की रफ्चार के मद्देनज़र और समावेशी विकास के ढोल-तमाशे के बीच भुखमरी के शिकार इतनी बड़ी आबादी का होना ही नीतियों को पुनर्भाषित करने की जरूरत की तरफ इशारा करता है।

हालांकि भारत ने अपनी आबादी में खाने से महरूम लोगों की संख्या घटाने में महत्वपूर्ण कोशिशें की हैं लेकिन संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट के मुताबिक अब भी और कोशिशों की जरूरत है। रिपोर्ट में उम्मीद जताई गई है कि भारत के अनेक सामाजिक कार्यक्रम भूख और गरीबी के खिलाफ जिहाद छेड़े रहेंगे।

लेकिन गौर करने बात है कि इन पचीस सालों में चीन ने अपनी आबादी में से भुखमरी के शिकार लोगों की गिनती में उल्लेखनीय कमी की है। 1990-92 में चीन में यह संख्या 28.9 करोड़ थी जो अब घटकर 13.38 करोड़ रह गई है। एफएओ की निगरानी दायरे में आने वाले 129 देशों में से 72 देशों ने गरीबी उन्मूलन के बारे में सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों को हासिल कर लिया है।

विश्व भुखमरी सूचकांक में अफ्रीकी देशों में सुधार आया है और भूख पर काबू पाने में अफ्रीकी देशों ने एशियाई देशों की तुलना में कहीं अधिक कामयाबी हासिल की है। लेकिन इरीट्रिया और बुरूंडी जैसे देशों में स्थिति अभी भी चिंताजनक है और वहां खाने की किल्लत और कुपोषण जैसी स्थितियां बनी हुई हैं।

एक तरफ तो हम भारत की मजबूत आर्थिक स्थिति के बारे में विश्व भर में कशीदे काढ़ रहे हैं लेकिन सच यह भी है कि हम विश्व भुखमरी सूचकांक में पिछड़कर फिसलते जा रहे हैं। 1996 से 2001 के बीच स्थितियों में कुछ सुधार देखने को मिला था लेकिन अब स्थिति वापस वहीं पहुंच गई जहां 1996 में थी।

इस मसले पर मुझे ज्यादा कुछ नहीं कहना है, मैं बस दो घटनाओं को याद कर रहा हूं। पंजाब विधानसभा चुनाव कवर करने के दौरान मैंने देखा था जालंधर में आलू उत्पादक किसानों ने अपनी फसल सड़को पर फेंक दी थी। दूसरे, मुझे यूपी के ललितपुर जिले के पवा गांव की बदोलन बाई याद आ रही है, जिसका पति 2011 में भुखमरी का शिकार होकर चल बसा था, और अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर उसने कहा थाः सब राजकाज होत दुनिया मा, बस हमरे सुध ना लैहे कोय।

राजकाज चलता ही रहता है, लेकिन जनता-जनार्दन की ऐसी हाय बहुत भारी पड़ती है। मायावती गवाह हैं।


Saturday, June 6, 2015

दो टूकः सबसे कठिन किसानी रामा...

किसानों के लिए दूरदर्शन ने अपना एक खास चैनल शुरू कर दिया है। डीडी किसान। यह काम सिर्फ दूरदर्शन ही कर सकता है। किसान खुद बाज़ार नहीं है। भोंडे से भोंडे गीत-संगीत, कार्टून, फिल्म सबके लिए बाजार है, किसान के लिए नहीं है। किसानों के उत्पादों के लिए भी नहीं।

प्रसार भारती पर बाज़ार का ऐसा कोई दबाव नहीं है। लिहाजा किसानों के लिए चौबीस घंटे का चैनल खुल गया। उम्मीद है कि किसानों के लिए बना यह चैनल कृषि दर्शन के दर्शन को नई ऊंचाई तक ले जाएगा, और नई तकनीक के साथ उनके मनबहलाव का साधन भी मुहैया कराएगा।

देश की जीडीपी में किसान का हिस्सा घट रहा है। गांव की गोरी और किसान फिल्मों में हमेशा रूमानी तरीके से पेश किए जाते रहे हैं। असल स्थिति इसके उलट है।

बेमौसम बारिश के बाद छह सप्ताहों में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के 150 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। हद तो यह है कि राज्य सरकारें अब भी सच्चाई से मुंह मोड़ने की कोशिश कर रही हैं। वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि इन घटनाओं का कारण कृषि क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही समस्याएं हैं। आपको याद होगा, इसी स्तंभ में मैंने बंगाल में किसान आत्महत्याओं पर ममता की बयानबाज़ी का मसला उठाया था। ममता ने मरने वाले किसानों को धनपति बताया था।

किसानों की आत्महत्या कोई ताजा मामला नहीं है। पिछले 20 वर्षों में करीब तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। हर साल औसतन 14 से 15 हजार किसान अपनी जान ले रहे हैं, जबकि देश में हर घंटे में दो किसानों की मौत हो रही है। आत्महत्या करने वाले ये किसान राजनीतिक तंत्र तक अपनी आवाज पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे,लेकिन उनकी मौतें भी संवेदनहीन हो चुकी व्यवस्था को तंद्रा से जगा नहीं सकी हैं।

मेरे खयाल से खेती से लगातार कम होती आमदनी आत्महत्याओ की बड़ी वजह है। साल 2014 की एनएसएसओ रिपोर्ट के अनुसार खेती के कामों से एक किसान परिवार को हर महीने केवल 3,078 रुपए की आमदनी होती है। मनरेगा जैसे गैर-कृषि कार्यों में लगने के बाद भी उनकी औसत मासिक आमदनी 6 हजार रुपए प्रतिमाह होती है। हैरत नहीं कि देश के 58 फीसदी किसान भूखे पेट सोने को मजबूर हैं तो 76 फीसदी रोजगार का विकल्प मिलने पर खेती छोड़ने को तैयार हैं।

साल 1970 में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 76 रुपए प्रति क्विंटल था। आज यह 1450 रुपए प्रति क्विंटल है यानी बीते 45 वर्षों में इसमें करीब 19 गुना वृद्धि हुई है। इससे किसानों की बढ़ी आमदनी की तुलना दूसरे तबकों के वेतन में हुए इजाफे से करें। इन वर्षों में केंद्र सरकार के कर्मचारियों की तनख्वाह 110 से 120 गुना, स्कूल शिक्षकों की 280 से 320 गुना और कॉलेज शिक्षकों की 150 से 170 गुना बढ़ी है। इस दौरान स्कूल फीस और इलाज के खर्चों में 200 से 300 गुना और शहरों में मकान का किराया 350 गुना तक बढ़ गया है।

इस साल भी गेहूं का समर्थन मूल्य 50 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाया गया है, जिससे खाद्यान्न की कीमतें नियंत्रित रहें। धान के मूल्य में भी इतना ही इजाफा किया गया है, जो पिछले साल के मुकाबले 3.2 फीसदी ज्यादा है। इसी बीच केंद्रीय कर्मचारियों को महंगाई भत्ते की दूसरी किस्त भी मिल गई, जो पहले से 6 फीसदी ज्यादा है। उन्हें जल्दी ही सातवें वेतन आयोग के अनुरूप वेतन और भत्ते भी मिलने लगेंगे। इसमें सबसे निचले स्तर पर काम करने वाले कर्मचारी का वेतन भी 26 हजार रुपए महीने करने की मांग हो रही है।

फसलों का समर्थन मूल्य बढ़ाने से खाद्यान्न की कीमतें बढ़ सकती हैं, लेकिन इसके लिए ज्यादा चिंतित होने की भी जरूरत नहीं है। खेती से होने वाली आमदनी में इजाफा नहीं हुआ तो किसानों के लिए कोई उम्मीद नहीं हो सकती। उत्पादकता बढ़ाने या सिंचाई के साधनों का बेहतर इस्तेमाल करने की सलाह देने से खास फायदा नहीं, क्योंकि ये सब तो नई तकनीकों को बेचने के तरीके भी हो सकते हैं।

आसान और कम ब्याज पर ऋण की सुविधाएं बढ़ाने से भी किसान कर्ज के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल सकते। किसान को कर्ज नहीं, आमदनी चाहिए।


Friday, May 29, 2015

दो टूकः किसानों की कब्रगाह भी है कर्नाटक


कर्नाटक का गुलबर्गा ज़िला। छोटे से क़स्बे जाबार्गी में दो चुनावी रैलियों की अचानक याद आ गई मुझे। बीजेपी के जगदीश शेट्टार और कांग्रेस के राहुल गांधी। शेट्टार की रैली जाबार्गी में हुई थी, राहुल की वेल्लारी के हासनपेट में। दोनों की रैलियां खचाखच भरी है।

मैंने आसपास अपनी गहरी नज़र से देखा था, क्या यह भीड़ खरीदी हुई है? लोगों के चेहरे से कुछ पता नहीं लगता। शायद हां, या नहीं।

हर चेहरा पसीने से लिथड़ा है...किसी चेहरे पर कुछ नहीं लिखा है। दोनों ने जनता से वोट मांगी, भावनात्मक अपीलें की थीं, जनता ने जवाब हुंकारे से दिया था। लेकिन मैं जब देहात का दौरा करने लगा था तो एक अजीब सा निराशा भाव था हरतरफ।

अपने दौरे में उत्तरी कर्नाटक के जिस भी ज़िले में गया, चुनावी भागदौड़ के बीच हर जगह एक फुसफुसाहट चाय दुकानों पर सुनने को मिली। कन्नड़ समझ में नहीं आती थी, लेकिन स्वर-अनुतानों से पता चल जाता था कि खुशी की बातें तो हैं नहीं। कारवाड़, बीजापुर, गुलबर्गा, बीदर...हर तरफ सूखा था। किसानों की आत्महत्या के किस्से भी थे।

बीजापुर के एक गांव नंदीयाला गया। इस गांव में पिछले साल एक किसान लिंगप्पा ओनप्पा ने आत्महत्या की थी। उसके घर जाता हूं, दिखता है भविष्य की चिंता से लदा चेहरा। रेणुका लिंगप्पा का चेहरा। रेणुका लिंगप्पा की विधवा हैं। अब उनपर अपने तीन बच्चों समेत सात लोगों का परिवार पालने की जिम्मेदारी आन पड़ी है। पिछले बरस इनके पति लिंगप्पा ने कर्ज के भंवर में फंसकर और बार-बार के बैंक के तकाज़ों से आजिज आकर आत्महत्या का रास्ता चुन लिया।

लिंगप्पा ने खेती के काम के लिए स्थानीय साहूकारों और महाजनों और बैंक से कर्ज लिया था, लेकिन ये कर्ज लाइलाज मर्ज की तरह बढ़ता गया। बीजापुर के बासोअन्ना बागेबाड़ी में आत्महत्या कर चुके चार किसानों के नाम हमारे सामने आए। इस तालुके के मुल्लाला गांव शांतप्पा गुरप्पा ओगार पर महज 31 हजार रूपये का कर्ज था।

नंदीयाला वाले लिंगप्पा पर साहूकारों और बैंको का कुल कर्ज 8 लाख था। इंगलेश्वरा गांव के बसप्पा शिवप्पा इकन्नगुत्ती  और नागूर गांव के परमानंद श्रीशैल हरिजना को भी मौत की राह चुननी पड़ी।
पूरे बीजापुर जि़ले में 2012 अप्रैल से 2013 अप्रैल तक 13 किसानों ने आत्महत्या की राह पकड़ ली। पूरे कर्नाटक में यह आंकड़ा इस साल (साल 2013 में) 187 तो 2011 में 242 आत्महत्याओं का रहा था। 2013 में, बीदर में 14, हासन मे दस, चित्रदुर्ग में बारह किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। गुलबर्गा, कोडागू, रामनगरम, बेलगाम कोलार, चामराजनगर, हवेरी जैसे जिलों से भी किसान आत्महत्याओं की खबरें के लिए कुख्यात हो चुके हैं।

खेती की बढ़ती लागत और उत्तरी कर्नाटक का सूखा किसानों की जान का दुश्मन बन गया है। पिछले वित्त वर्ष में कुल बोई गई फसलों का 16 फीसद अनियमित बारिश की भेंट चढ गया। और कर्नाटक सरकार ने सूबे के 28 जिलों के 157 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया था। लेकिन राहत कार्यो में देरी ने समस्या को बढ़ाया ही।

किसानों की आत्महत्या कर्नाटक में नया मसला नहीं है। पिछले दस साल में 2886 किसानों ने अपनी जान दी है।

पिछले दशक में बारह ऐसे जिले हैं जिनमें सौ से ज्यादा किसान आत्महत्याएं हुई हैं, ये हैं. बीदर, 234 हासन 316, हवेरी 131, मांड्या 114, चिकमंगलूर 221, तुमकुर 146, बेलगाम 205, शिमोगा 170 दावनगेरे, 136, चित्रदुर्ग 205 गुलबर्गा 118, और बीजापुर 149

लेकिन, किसानों की आत्महत्याएं अब आम घटना की तरह ली जाने लगी हैं और विकास की अंधी दौड़ में हाशिए पर पड़े गरीब किसानों की जान की कीमत अखबार में सिंगल कॉलम की खबर से ज्यादा नही रही हैं।


उत्तरी कर्नाटक में पानी बड़ी समस्या है, खेतों के लिए भी और नेताओं के आंखों की भी। दोनों के लिए किसान मामूली हो गए हैं।

Tuesday, May 26, 2015

दो टूकः ताकि बहती रहे गंगा

नरेन्द्र मोदी की सरकार के एक साल पूरे हो रहे हैं और तमाम किस्म की योजनाओं के बीच मेरी दिलचस्पी खासतौर पर गंगा की सफाई से जुड़े नमामि गंगा मिशन पर है। दिलचस्पी इसलिए क्योंकि अव्वल तो पिछले साल इन्हीं दिनों मैं गंगा के किनारे सफाई को लेकर एक वृत्तचित्र की सीरीज़ के सिलसिले में सफ़र कर रहा था, दूसरे, नरेन्द्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान गंगा की सफाई को एक चुनावी मुद्दा बनाने में कामयाबी हासिल की थी।

गंगा सफाई में मेरी दिलचस्पी की तीसरी वजह है, कि इससे पहले गंगा को साफ करने की तमाम योजनाएं और परियोजनाएं नाकाम साबित हो चुकी हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों की हजारो करोड़ की रकम गंगा के पानी में उस कथित एक्शन प्लान से जुड़े लोगों ने घुलनशील बना दी। पैसा खर्च हो गया, प्रदूषण 1986 में गंगा एक्शन प्लान शुरू होने के वक्त की स्तर से 2013 तक कम होने 
की बजाय बढ़ ही गया।

अब केन्द्रीय कैबिनेट ने 20 हज़ार करोड़ रूपये की राशि नमामि गंगा परियोजना के लिए मंजूर कर दी है। चार बटालियन ग्रीन टास्क फोर्स की बनाने पर सहमति हो गई है, जो गंगा में प्रदूषण पर नजर रखेगी।

लेकिन मेरा ख्याल है कि गंगा को साफ रखने का एक सरल उपाय है निर्मल गंगा के साथ अविरल गंगा की नीति पर कायम रहने का। हम सिर्फ प्रदूषण की ही बात क्यों करते हैं? हम गंगा को देश की बाकी नदियों की तरह भी नहीं मान सकते क्योंकि गंगा की स्वयंशुद्धि क्षमता दूसरी नदियों की तुलना में अधिक है।

अविरल गंगा सिर्फ आस्था की वजह से भी आवश्यक नहीं है। यह आवश्यक इसलिए भी है क्योंकि अविरलता से ही इसमें घुलनशील ऑक्सीजन (डीओ) और बायो-ऑक्सीजन केमिकल डिमांड (बीओडी) को कायम रखा जा सकता है।

टिहरी के पास भागीरथी पर बड़ा बांध है। यहां बांध के बाद करीब तीन किलोमीटर लंबी सुरंग में नदी का पानी गुजरता है। अब परियोजना से जुड़े इंजीनियरों के लिए सुरंग से गुजरती गंगा को अचंभा और अजूबा नहीं, उन्हें कोई नुकसान भी नजर नहीं आता। पानी तो खैर पानी है, सुरंग से होकर ही गुजरे तो क्या कमी आ जाएगी भला?

लेकिन यकीन मानिए, कमी आ जाती है। ऑक्सीजन की। विज्ञान की सामान्य जानकारी रखने वाला शख्स भी बता सकता है कि किसी भी जल में ऑक्सीजन घुलने के महज दो माध्यम होते हैं। पहला, वातावरण की हवा से उसके संपर्क से ऑक्सीजन पानी में घुलता है। दूसरा, पानी में मौजूद हरित पादपों के प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया से। अब प्रकाश संश्लेषण तभी मुमकिन है जब सूर्य की रोशनी मौजूद हो। अंधेरी सुरंग में न तो सूरज की रौशनी जाती है न ही बाहरी हवा से पानी का संपर्क होता है। ऐसे में गंगा के पानी में ऑक्सीजन घुले भी तो कैसे। इसलिए गंगा को अविरल बनाने का तर्क सही लगता है।

गंगा को निर्मल बनाने में सभी लोग एक सुर में इसमें डाले जाने वाले पूजा के निर्माल्य और चिता जलाकर अस्थियों के प्रवाहित किए जाने को भी दोषी ठहराते हैं। यह बात भी एक हद तक सही है। सिर्फ बनारस में ही, सालाना 33 हजार मुर्दे फूंके जाते हैं और 300 टन अधजला मांस गंगा में प्रवाहित किया जाता है। पूरे देश में अंदाजन, 373 करोड़ लीटर अवशिष्ट सीवेज बिना ट्रीट किए सीधे गंगा में प्रवाहित होता है।

गंगा को साफ करने के बड़ा महत्वपूर्ण कदम उद्योगों के अपशिष्ट को गंगा में गिरने से रोकने का होगा। जब तक, उत्तर काशी से लेकर गंगा सागर तक किसी भी उद्योग का एक लीटर अपशिष्ट गंगा में गिरता है, चिता जलाने या पूजा के निर्माल्य को गंगा में डालने से रोकना अनैतिक होगा। पहले उद्योगों और शहरो का मलजल गिरना बंद हो, बाकी के काम खुद ब खुद रुक जाएंगे।