Saturday, August 27, 2016

स्वर्ण-(अ)काल

ओलिंपिक खत्म हो गया है और पदक तालिका में भारत 67वें पोजीशन पर रहा। अगर मैं इस पर कुछ लिखूं तो जाहिर है यह सांप निकलने के बाद लकीर पीटने सरीखा होगा, लेकिन 119 खिलाड़ियों के दल ने जब सिर्फ दो पदक भारत की झोली में डाले, तो यह आत्मनिरीक्षण करना ज़रूरी होगा कि आखिर यह कौन सा सांप है जो हमें डस रहा है। ओलिंपिंक के बाद, शून्य स्वर्ण का यह लकीर हमें पीटनी होगी।

वैसे भारत का प्रदर्शन इसके चाल-ढाल और रवैए के लिहाज़ से खराब नहीं ठहराया जा सकता। चीनी मीडिया में हमारा मज़ाक बना तो हम तिलमिला उठे, लेकिन आपकी तिलमिलाहट उस वक्त कहां खो गई थी, जब हमने मैराथन थावक जेशा को बिना पानी के ट्रैक पर धराशायी होते देखा।

ठीक भी है, अपने देश में तो ‘खेलोगे-कूदोगे बनोगे खराब’ का मुहाविरा बहुत पॉपुलर है। तो हम पूरी कोशिश करते हैं कि हमारे बच्चे खेलते-कूधते खराब न हो जाएं। वैसे मुहाविरे का दूसरा हिस्सा हैः पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नव्वाब। अलबत्ता, भारत में नव्वाबों की गिनती भी बेहद कम ही है।

चुनांचे, ऐसे नवाबों ने फेसबुक पर मेरी गत बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ ऱखी। मैं भारत के इस बदतरीन प्रदर्शन से नाखुश था और मैंने कहा कि भारत का यह शून्य काल है और भारत ने चूंकि, शून्य की खोज की है इसलिए भारत भी शून्य पदक ही लाएगा। बहरहाल, मेरे इन जानी दोस्तों ने, सबसे पहले साक्षी मलिक और फिर पी वी सिंधु के पदक तालिका में जगह पक्की करते ही मुझे तस्वीरों में टैग करके गरियाना शुरू किया।

लेकिन यकीन मानिए, मैं अभी भी कह रहा हूं यह भारतीय खेलों का शून्यकाल ही है। यह न कहिएगा कि जनता की खेलों में रूचि नहीं है। जीतने वाले खिलाड़ी पर सबकी निगाहें टिकती हैं। खुद मैंने रियो से पहले कभी बैडमिन्टन का मैच पूरा नहीं देखा था। साइना नेहवाल का मैच भी नहीं। लेकिन सिंधु ने उम्मीद जगाई तो सारा देश टीवी की ओर स्वर्ण पदक के सूखे के खत्म होने की बेकरारी से देख रहा था।

हॉकी और तमाम ऐसे ही खेलों के भारत में बहुत ज्यादा लोकप्रिय नहीं होने, जाहिर है इसमें मानक क्रिकेट है, के लिए क्रिकेट की अपार लोकप्रियता को दोषी ठहराया जाता है। लेकिन क्या यह सच नहीं कि भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता अपने सर्वोच्च पायदान की तरफ तब बढ़ी जब भारत ने पहली बार विश्वकप 1983 में जीता था?

पदक हो या कप, आपको जीतकर दिखाना होगा।

जहां तक इन पदकों के लिए सुविधाओं की बात है, अगर इस मामले में सच में ईमानदारी होती और शून्य नहीं होता, और खिलाड़ियों के चयन में ही ईमानदारी अपनाकर भाई-भतीजावाद नहीं होता, उसी से हमारी प्रतिभाएं हमें विश्व बिरादरी में सर उठाकर चलने लायक बना देतीं। फिर आता है, खेलों के गैर-बराबरी का बरताव और सुविधाओं का अभाव। जाहिर है, खेल संघों में जबरदस्त राजनीति, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार ने हमारे देश में खेलों को नुकसान पहुंचाया है।

खैर, खेल संघों की छोड़िए, वह तो होते ही है राजनीतिज्ञों के लिए नेट प्रैक्टिस करने की जगह। जरा अपने आसपास ही नजर दौड़ाइए। क्या आपके मुहल्ले में खेल का मैदान है? क्या आपने दिल्ली, मुंबई समेत तमाम महानगरों में नगर प्लानिंग में इमारतों के जंगल के बीच छुटके पार्कों के अलावा कहीं खेल मैदान की जगह देखी भी है? क्यों होगी? खेल के मैदानों से बिल्डरों को कोई फायदा नहीं होता। शायद समाज को होता है और बिल्डरों का समाज से कोई लेना-देना नहीं।

मुहल्ला छोड़िए, आप आसपास के कॉलेजों में ही नजर डाल लें, तो आपको गिनती के कॉलेजों में खेल की सुविधाएं या मैदान दिखेंगे। कभी पास के मॉल में विंडो शॉपिंग करने वालों पर नज़र डालिएगा, तकरीबन हर तीसरा आदमी आपको स्पोर्ट्स शू और ट्रैक सूट में नजर आएगा। चाहे वह कभी भी कसरत न करे लेकिन ट्रैक सूट जरूर पहनेगा। चाय मे चीनी पीना छोड़ देगा लेकिन व्यायाम नहीं कर पाएगा।

भारतीय लोगों के पास खेल के लिए वक्त की खासी कमी होती है। असल में यही शून्यवाद है। फेसबुक पर मेरे ऐसे ही पोस्ट्स की वजह से एक शख्स ने मुझसे कहाः भारत को नीचा दिखाते वक्त तुम्हें शर्म नहीं आती? तुमने जीवन में क्या किया है, कभी कोई पुरस्कार जीता? तो देश के खिलाड़ियों से पदक की उम्मीद क्यों?

ठीक है, मैं पदक की उम्मीद नहीं रखता। लेकिन फिर आप दर्शक पाने की उम्मीद भी न करें। खेल को बढ़ावा देने के लिए जीतने की आदत, किलर इंस्टिंक्ट पैदा करनी होगी, तमाम शाबासियां अपनी जगह, लेकिन दीपा करमाकर अगर चौथे की बजाय, कांसा, चांदी या सोने का तमगा जीत लाती तो क्या हमें और अच्छा नहीं लगता! लेकिन उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं नहीं मिलीं। मिलतीं तो उन्हें पदक भी मिलता। निजी प्रयासों से पदक जीतना प्रतियोगिता के इस गलाकाट दौर में मुश्किल ही नहीं, तकरीबन नामुमकिन है।

और हां, ओलिंपिक का ध्येय वाक्य चाहे लाख सब दोहराएं कि जीतने से अहम होता है खेल में हिस्सा लेना, लेकिन सिर्फ हारते रहने और हिस्सा लेते रहने की उबाऊ प्रक्रिया का अंग बने रहना भी कोई बहुत उम्दा बात नहीं है। और हां, पत्रकारिता पदकों के लिए नहीं की जाती है।

मंजीत ठाकुर

Tuesday, August 16, 2016

जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहां हैं...

शिकायत करना हम देशवासियों का शगल है। लेकिन मैं कोई शिकायत करने नहीं जा रहा। वाकिया तब का है, जब मैं उड़ीसा के एक दौर पर जा रहा था। हिलती-डुलती गाड़ी के एसी के दूसरे दर्ज़े में बैठा था। कोशिश कर रहा था कि मैं अपने लैपटॉप पर कोई फ़िल्म ही देख डालूं। सामने की सीट पर एक बुजुर्गवार बैठे थे। साथ में उनका घरेलू कामगार था, किसी उड़िया जनजाति का लड़का था। बच्चा ही था। बुजुर्गवार की पत्नी साथ में थीं। 

बुजुर्ग दंपत्ति के कपड़ों से लगता था, काफी साधारण घरों के रहे होंगे। खादी का मोटा कुर्ता, धोती कभी सफेद रही होगी। गले में खादी का मोटा गमछा। रंग ताम्रवर्णी। बाल श्वेत हो चले। भौंहे तक सफ़ेद। बीवी के हाथों में कांच की चूड़ियां। बैंगनी रंग की साधारण सूती साड़ी। दोनों के पांव में हवाई चप्पलें। नौकर के पैरों में जो हवाई चप्पल है उस पर फेसबुक लिखा है।

मैं भी गपोड़ हूं और शायद सामने बैठे बुजुर्गवार भी। ट्रेन अभी स्टेशन से बाहर निकल कर आईटीओ भी न पार कर पाई होगी कि हम दोनों के बीच बातचीत शुरू हो गई थी। और तब तक होती रही, जब तक हम भद्रक न पहुंच गए। पत्नी सारे रास्ते चुप बैठी रही। एक गंवई पत्नी की तरह।

कोच अटेंडेंट आता है। मुझसे बात करते वक्त उसके अंदर एक वित्तीय आदर है। उस आदर में शाम को मेरे उतरने के वक्त मिलने वाली टिप की उम्मीद का बोझ है। वही अटेंडेंट आकर उनसे ऐसे बात करता है मानो बहुत दिनों से जानता हो। पूछता है, बहुत दिनों बाद आए।

मैं पूछता हूं, आप दिल्ली बार-बार आते हैं क्या। हां। इसके बाद बातचीत महंगाई, नक्सल, जनजातियों की समस्या, वेदांता, कोरापुट, नक्सल, राहुल गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह तक पहुंच जाती है। बुजुर्गवार को महीन जानकारियां हैं।

मेरे बारे में बहुत पूछताछ करते हैं। कहां के हो, कौन है घर में...लेकिन इस पूछताछ में एक बुजुर्गाना लाड़ और आह्लाद है। अब मैं पूछता हूं आप..? तब बताते हैं कि उनका नाम अनादिचरण दास है। पांच बार सांसद रह चुके हैं। आखिरी बार सन् 91’ लोकसभा जीते थे। पहली बार 71’ में जीते थे। अपने बारे में बस इतना ही बताते हैं।

मैं सादगी देखकर दंग हूं। अब तो हाल यह है कि पहली बार विधायक बनकर लोग खदानें खरीद रहे हैँ। निर्दलीय मुख्यमंत्री ने सुना दक्षिण अफ्रीका में सोने की खान खरीद डाली थी। मेरे ही गृह राज्य का सीएम रहा था वह। और यहां, पांच बार सांसद चुना जा चुका शख्स हवाई चप्पल पहन रहा है! एसी के दूसरे दर्जे में सफर कर रहा है! चेहरे पर दबंगई का कोई भाव नहीं!

मैं सोचता हूं आजादी का जश्न पूरे भारत में मनाया गया होगा। लेकिन, पटवारी से लेकर विभिन्न मंत्री भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं। वह बुझे मन से कहते हैं, किसी ने कहा है राज्यसभा की सीट सौ करोड़ में बिकती है। हामी भरने के सिवा कोई चारा नहीं है मेरे पास।

रात में गूगल किया था मैंने, अनादि चरण दास को खोजा गूगल पर। मिल गए। उड़ीसा के जाजपुर सीट से सन् 1971, 1980 और 1984 में कांग्रेस के टिकट पर चुने गए थे, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस छोड़ी, विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ जनता दल गए, वहीं से दो बार 1989 और 1991 में चुनाव जीता। 1996 में फिर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े, लेकिन जनता दल की आंचल दास से चार हजार वोटों से हार गए। फिर उम्र के तकाजे के साथ राजनीति छोड़ दी। जाजपुर-कोरापुट इलाके में अनादिचरण दास एक मजबूत उम्मीदवार माने जाते थे। लेकिन, उनके पास आज दौलत के नाम पर कुछ नहीं।

कह रहे थे कि हर महीने वंचितों, गरीबों, जनजातियों के आर्थिक उत्थान के लिए हर महीने योजना आयोग (यात्रा के वक्त योजना आयोग था, नीति आयोग नहीं बना था) और सोनियां गांधी को चिट्ठी लिखते थे। पता नहीं पढ़ी भी जाती थी या नहीं। पेट्रोल के दाम बढ़ाने के पक्ष में हैं, कहते है इसका पैसा एससी-एसटी बच्चों की शिक्षा के लिए करना चाहिए।

गुरूदत्त की फिल्म प्यासा का एक गीत याद आ रहा है, जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहां हैं....ईमानदारी को गूगल पर खोजता हूं। इसे खोजने में तो गूगल भी नाकाम है।

Saturday, August 13, 2016

जड़ से उखड़े लोग

विस्थापन लोगों को जड़ो से उखाड़ता है। देश भर में और शायद दुनिया भर में भी विकास बनाम पर्यावरण, वन्य जीव बनाम इंसान जैसी बहसें चल रही हैं और शायद बुद्धिजीवी तबके से लेकर सरकारें और संयुक्त राष्ट्र समेत अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं तक पर्यावरण, विकास, वन्यजीवों के संरक्षण और मानव के कल्याण और उनके रहवास जैसे विषयों की प्राथमिकता पर एकमत होने की कोशिशों में लगे हैं।

आज मैं वन्य जीवों के संरक्षण से जुड़ी परियोजनाओं में से एक के बारे में बात करना चाहता हूं कि किसतरह वन्य जीवों के संरक्षण के क्रम में इंसानों को हाशिए पर धकेला गया है। यह ठीक है कि वन्यजीवों और उनकी नस्लों को बचाना बेहद ज़रूरी है, लेकिन उनको बसाने के लिए जिन लोगों को उजाड़ा जाता है, खासकर उनमें आदिवासी लोग और आदिम जनजातियां ही उजड़ती हैं, उनके पुनर्वास पर संवेदनशील तरीके से सोचने और उसे कार्यरूप में बदलने की जरूरत है।

भारत की बात करें, तो देश भर में हुए विस्थापनों के आंकड़े बताते हैं कि सन् 1950 के बाद से भारत में वन्य जीवों से जुड़ी परियोजनाओं में करीब 6 लाख लोग विस्थापित हुए हैं। यह बाक़ी सभी योजनाओं-परियोजनाओं की वजह से हुए विस्थापन का 2.8 फीसद ही है। इनमें से करीब 21 फीसदी यानी 1.25 लाख लोगों का पुनर्वास किया गया। इसका आंकड़े का दूसरा पहलू यह है कि 4.75 लाख लोगों का पुनर्वास नहीं हो पाया। यह वन्य जीवन विस्थापन की कुल आबादी का 79 फीसदी है। गौरतलब है कि कुल विस्थापितों में से 4.5 लाख लोग जनजातीय समुदाय के हैं। यानी करीब तीन चौथाई। सिर्फ एक लाख जनजातियों का ही पुनर्वास हो सका, यानी 78 फीसद विस्थापित जनजातियों का पुनर्वास आजतक नहीं हो पाया है।

मैं मध्य प्रदेश के एक जिले श्योपुर के गांव टिकटोली गया था। टिकटोली कूनो-पालपुर अभयारण्य की सरहद पर बसा है। यहां मिले थे मुझे रंगू। धंसे गालों वाले रंगू ने मुझे एक किस्सा सुनाया। उस किस्से का मुख्तसर यह कि सृष्टि की रचना के बाद ब्रह्मा जी ने सहरिया नाम के कबीले को धरती के आसन के ठीक बीच में बिठाया था। लेकिन सहरिया लोग सीधे-सादे थे। उनके बाद रचे गए लोग आते गए और सहरियाओं से थोड़ा खिसकने को कहते रहे। बहुत देर बाद जब ब्रह्मा जी आए, तो उन्होंने देखा जिस सहरिया को वह बीच में बिठाकर गए थे वह सबसे किनारे बैठा है।

इस कहानी को महज कहानी नहीं प्रतीक मानिए। कूनो-पालपुर जंगल में शेर-चीतों और बाघ को बसाने की सरकारी कोशिश में सहरिया जनजाति—जो कि भारत सरकार द्वारा आदिम जनजाति घोषित है—को जंगल से धकेलते-धकेलते किनारे बंजर-ऊसर ज़मीनों तक धकेल दिया गया है, जहां न उनके पास जोतने लायक खेत हैं, न सिंचाई के लिए कुआं, न खाने के ठीक अनाज।

नतीजतन, आज सहरिया समुदाय भारत का सबसे कुपोषित समुदाय है और सबसे कम साक्षर भी। भारत भर में जनजातीय साक्षरता जहां 41.2 फीसद है, वहीं सहरिया जनजाति में यह 28.7 फीसदी ही है। सहरिया महिलाओं में यह प्रतिशत तो 15 फीसद से थोड़ी ही अधिक है।

कूनो पालपुर से जिन 28 गांवों का विस्‍थापन हुआ है, उनमें 24 गांव सहरिया बहुल हैं। सहरिया वह जनजाति है, जिनकी आबादी में 2001 और 2011 की जनगणना के अनुसार लगातार कमी दर्ज की गई है। इसकी सबसे प्रमुख वजह है, इनकी जिंदगी का लगातार मुश्‍किल भरा होता जाना। भूख, कुपोषण, आजीविका का संकट और सबसे महत्वपूर्ण; जंगलों पर खत्‍म होती इनकी निर्भरता ने समुदाय के सामने पहचान का संकट खड़ा कर दिया है।

विस्‍थापन से पहले सहरिया कूनो पालपुर के 345 वर्ग किलोमीटर में फैले घने जंगलों में लघु वनोपज, कंद-मूल, जड़ी-बूटियां, गोंद, चिरौंजी और महुआ बीनकर उन्‍हें बाजार में बेचकर अच्‍छा-खासा मुनाफा कमा लेते थे। सहरिया अच्‍छे शिकारी भी होते हैं। जंगली खरगोश, बत्तख वगैरह का शिकार उनके लिए मांस का स्रोत हुआ करता था। इससे उनके लिए प्रोटीनयुक्त खाना मिल जाया करता था। इसके अलावा वे जंगलों में झूम खेती के जरिए अपने लिए मोटे अनाज, चना, कई तरह की साग-सब्‍जियां उगा लेते थे।

श्‍योपुर जिला अमूमन सूखा प्रभावित रहा है। इसके बावजूद सहरिया आदिवासियों में इस कदर कुपोषण और बच्‍चों की मौत के मामले देखने को नहीं मिलते थे। इनमें मवेशी पालने का भी अच्छा शऊर था, ऐसे में उन्‍हें खाने लायक दूध, दही, घी तो मिल ही जाता था। जंगलों पर उनका आश्रित होना इस बात से झलकता है कि उनकी आमदनी का पचास से पैंसठ फीसदी हिस्‍सा गैर-जलाऊ सामान को बाजार में बेचकर हासिल हो जाता था। इसके अलावा उन्‍हें जंगलों से सूखी लकड़ियां, चारा और घरेलू इस्‍तेमाल के सामान भी मिल जाते थे़।

विकास के क्रम में, या फिर वन्य जीव संरक्षण जैसी गतिविधियों में कई दफा विस्थापन अपरिहार्य बन जाता है। लेकिन, ऐसे में अपनी जड़ों से उजाड़े लोगों को ससमय, उचित मुआवाज़ा, ज़मीन, रोज़गार, स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाएं भी दी जानी चाहिएं। आखिर, शेर-चीतों को बचाते-बचाते हम अपने इंसानों को ब्रह्माजी की कहानी की तरह हाशिए पर धकेल तो नहीं सकते।

मंजीत ठाकुर

Thursday, July 28, 2016

एक चिंकारे की आत्महत्या

भई, सुलतान छूट गए। क़ातिल नहीं मिले। गवाह गायब हो गए। न्याय-व्यवस्था साफ कहती है, सौ दोषी छूट जाएं लेकिन किसी निर्दोष को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए। तो इस बिनाह पर, मियां सलमान निर्दोष साबित भये। हिरण बेचारा मारा गया। बंदूक भी थी, लाश भी थी, बस न था तो कोई क़ातिल।

अब कहां ढूढ़ने जाओगे हिरण के क़ातिल? यूं करिए कि क़त्ल का इल्जाम हिरण पर ही रख दीजिए।

सलमान खान रिहा हो गए। गज़ब की ख़बर हुई। सुल्तान, दबंग या फिर भाईजान, जाने कितने नामों से मीडिया को खुशी से बेहाल होते देखा। हाई कोर्ट ने छोड़ा है तो सुप्रीम कोर्ट में भी छूट ही जाएंगे।

न, न सहारा की मिसाल न दीजिएगाः वे संपत्ति नहीं बेच पाए हैं, वाला उनका बयान मार्केट में चला नहीं है। वैसे भी सवाल इस बात पर खड़ा नहीं होना चाहिए कि सलमान को रिहाई कैसे मिली। सवाल तो यह होना चाहिए कि असल में हिरण मरे या नहीं मरे?

बल्कि कायदे से तो उस जंगल के हिरणों को इस अपराध में सज़ा देनी चाहिए कि उनकी वजह से एक मासूम सुपरस्टार को परेशानी हुई। हरिण बिरादरी पर मानहानि का दावा करना चाहिए सलमान को। एक सजा यह भी हो सकती है कि सलमान खान को अब हिरणों के शिकार की इजाज़त दे देनी चाहिए।

हिरण मूर्ख ही हैं। मूर्ख नहीं तो क्या.. कि दबंग के हाथों मरने के लिए बेकरार नहीं हो रहे? भाईजान के हाथों? उनको तो कतार में आना चाहिए, भाईजान एक लात मुझे, सल्लू भाई एक गोली इधर भी।

हरीश दुलानी का नाम आपने सुना ही होगा। इस मामले के चश्मदीद गवाह थे। लेकिन मीडिया को सलमान जितना ग्लैमर हरीश दुलानी में नहीं दिखा। दिखना भी नहीं चाहिए। सालों पहले जब इस खबर में हरीश दुलानी की कहानी शुरू हुई थी तो उसकी मां मिली थी एक मकान में बैठी हुई। बेटा गायब हो गया था। एक बार बयान देने के बाद गायब हो गया हरीश दुलानी। फिर सालों तक कहां रहा कुछ पता नहीं। एक दूसरा गवाह और था जो एक गांव में था, अच्छा-खासा आदमी पागलों की तरह बरताव कर रहा था और झोंपड़ी में उसकी हालत देख कर लगा था ज्यादा दिन जिंदा नहीं रहेगा। वही हुआ।

सलमान की राह के कांटे ज्यादा दिन टिकने वाले नहीं थे। सत्य की राह पर खड़े सलमान ने इसी वजह से शादी भी नहीं की। (ऐसा वह एक चैनल पर इंटरव्यू में बता रहे थे) हाय रे त्याग।

वैसे, कुछ साल बाद हरीश दुलानी वापस आ गया। दुलानी को अदालत ने कई बार सम्मन भेजे। कई बार उसकी तलाशी का नाटक हुआ। लेकिन किसी को उसका पता नहीं लगा। लेकिन किसी अदालत ने किसी अधिकारी को कठघरे में खड़ा करने की नहीं सूझी।

अदालतों की एक बात और सुंदर लगती है कि जब वो किसी को रिहा करती हैं तो जांच एजेंसी को काफी कोसती है लेकिन किसी के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं करती। हालांकि, ऐसा करना भी उनके अधिकार-क्षेत्र में आता है। लेकिन यह तरीका फायदेमंद है।

भई, सांप भी न मरे और लाठी भी टूट जाए, यह कहावत किसी अक्लमंद ने ही बनाई होगी।

केस की मजेदार बात यह थी कि बचाव पक्ष को अहम गवाह से जिरह की जरूरत ही नहीं महसूस हुई।

बहरहाल, देश के सभी हिरणों से मेरी गुजारिश है कि वह यह मान लें कि जन्म उनका अगर हिरण में हुआ है तो मरना नियति है उनकी। तय है, हिरण हुए हो तो मारे ही जाओगे। जंगल में रहोगे, शेर से, शेर स बचे तो किसी बंदूक से। फिर कोई अदालत सज़ा न दे पाएगी, काहे कि सुबूत ही न होंगे। हिरणों के पक्ष में भी कभी कोई सुबूत हुआ है?

हिरण, तुम फुटपाथ पर सोओगे, तो याद रखना बीएमडब्ल्यू की जमात सड़को पर बेहिसाब दौड़ रही है, दिशाहीन, अनियंत्रित, जिनका कोई ड्राइवर नहीं है। अगर ड्राइवर है भी तो किसी ताकतवर का नौसिखिया नाबालिग छोकरा है। पता नहीं नशे में गाड़ी हो, या गाड़ियों में पेट्रोल की जगह शराब डाली जा रही है...हिरणों का कुचला जाना तय-सा हो गया है। देश की हिरणों...गाओ, हुड हुड दबंग-दबंग।


मंजीत ठाकुर

Thursday, July 21, 2016

बीसीसीआई को कोर्ट का इनस्विंगर

भारत एक मात्र देश है जहां क्रिकेट की देखरेख करने वाली संस्था क्रिकेट को कंट्रोल करती है। आखिर, बीसीसीआई का पूरा नाम भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड है। देश की सबसे धनी खेल संस्था कालिख पुतकर बाहर निकली थी जब खेल पर सट्टेबाज़ी का साया था और उसके पास पूरा मौका था कि वह सुधरने की पहल करता। तब वह देश की दूसरी खेल संस्थाओं के सामने पारदर्शिता और जवाबदेही की मिसाल बन जाता। नब्बे के दशक के बाद से ही मैच फिक्सिंग, हितों के टकराव और आईपीएल में गड़बड़ियों की शिकायत के बाद से साफ-सफाई की जरूरत सिरे से महसूस की ही जा रही थी। 

जस्टिस मुकुल मुद्गल समिति की रिपोर्ट के बाद मामला शीशे की तरह साफ था। बाद में, जस्टिस आरएम लोढ़ा समिति की रिपोर्ट आई, वह क्रिकेट की सफाई के लिए थी लेकिन बीसीसीआई को उस पर भारी एतराज था। हो भी क्यों न, दशकों से क्रिकेट के प्रशासन पर कब्जा किए नेता-नौकरशाह-प्रशासकों को क्रिकेट में विकेट के 22 गज का होने के सिवा सिर्फ रूपयों का लेन-देन ही तो आता है। वरना उनमें से कोई भी यह बता दे कि क्रिकेट की गेंद का वज़न कितना होता है? और उसकी परिधि कितनी होती है?

अब सुप्रीम कोर्ट ने लोढ़ा समिति की अधिकांश सिफारिशों को लागू करने के आदेश दिए हैं। अब बीसीसीआई के सामने आदेश मानने के सिवा कोई चारा नहीं। लेकिन बीसीसीआई को सूचना के अधिकार के तहत लाने और सट्टेबाज़ी को कानूनी रूप देने की समिति की सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट ने संसद पर छोड़ दिया है।

अब हम जैसे क्रिकेट प्रेमियों और दीवानों की उम्मीद है कि इन उपायों से क्रिकेट प्रशासन में बदलाव आएंगे। मसलन, अब आईपीएल को बीसीसीआई के नियंत्रण से अलग करना होगा, कोई मंत्री या नौकरशाह बीसीसीआई का सदस्य नहीं रहेगा, 70 साल से अधिक के व्यक्ति बीसीसीआई के पदाधिकारी नहीं बन सकेंगे और हर राज्य को बीसीसीआई में सिर्फ एक वोट देने का हक होगा। इसतरह बोर्ड पर गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों का अतिरिक्त प्रभाव खत्म होगा। गुजरात के पास बीसीसीआई में तीन और महाराष्ट्र में चार वोट हैं। बिहार के पास एक वोट और झारखंड के पास तो वह भी नहीं है।

साफ है, बीसीसीआई के रसूखदार और मनमाने ढंग से चलाने वाले लोग अब इसको चला नहीं पाएंगे।

वैसे, सरकार एक कानून बनाने की तैयारी मे तो रही लेकिन हुआ कुछ नहीं। वैसे डेढ़ दशक पहले जब दक्षिण अफ्रीका के कप्तान हैंसी क्रोनिये पर मैच फिक्सिंग का आरोप लगा था, तब 2001 में प्रिवेंशन ऑफ डिसऑनेस्टी इन स्पोर्ट्स बिल तैयार किया गया था, किंतु कुछ दिन बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। बता तो चुका ही हूं कि उस आरोप को डेढ़ दशक बीत गए, हुआ कुछ नहीं।

यूरोप की तरह हमारे देश में खेलों पर सट्टा नहीं लगाया जा सकता। फिक्की का अनुमान है कि भारत में हर साल सिर्फ क्रिकेट पर तीन लाख करोड़ का सट्टा लगता है, जो देश में काले धन का सबसे बड़ा ज़रिया है। अलग कानून न होने से सट्टेबाजों पर धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र की धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जाता है। ऐसे में वे अकसर बच जाते हैं या मामूली सजा पाकर छूट जाते हैं।

याद दिला दूं कि देशभर के खेल संगठनों की जवाबदेही तय करने और उनके चुनाव निष्पक्ष कराने के लिए मनमोहन सिंह सरकार ने स्पोर्ट्स डेवलपमेंट बिल पारित कराने का प्रयास किया था। इस बिल में बीसीसीआई को सूचना के अधिकार के तहत लाने का प्रावधान भी था, जिसका तब के कैबिनेट के करीब आधा दर्जन मंत्रियों ने कड़ा विरोध किया। ये सभी मंत्री सीधे-सीधे बीसीसीआई से जुड़े थे और किसी भी सूरत में देश के सबसे धनी खेल संगठन को जवाबदेही और पारदर्शिता की ज़द में लाने को राजी नहीं थे। लेकिन अब यदि सरकार पुराना विधेयक ही ले आए, तब उसका खुलेआम विरोध करने का साहस शायद ही कोई नेता कर पाए।

बताते चलें कि बीसीसीआई एक गैर-मुनाफे वाली निजी संस्था के तौर पर रजिस्टर्ड है, जिसका संचालन गैर-पेशेवर लोगों के हाथों में है। संस्था निजी है फिर भी जो टीम चुनती है, वह भारतीय क्रिकेट टीम कहलाती है। हिंदुस्तान दुनिया का अकेला ऐसा देश है, जिसके खिलाड़ी अपनी टोपी पर राष्ट्रीय चिह्न नहीं, बीसीसीआई का लोगो लगाते हैं। बोर्ड का मकसद मुनाफा कमाना नहीं है, फिर भी उसके खाते में अरबों रुपये हैं। वह हर साल अपनी इकाइयों को करोड़ों रूपये बांटता है, फिर भी उसकी दौलत बढ़ती जाती है।

जिस अनुपात में बोर्ड का मुनाफा बढ़ रहा है, उसी अनुपात में नेताओं और उद्योगपतियों की क्रिकेट में दिलचस्पी बढ़ रही है और इसी हिसाब से झगड़ों में इजाफा भी हो रहा है। अब बड़े मंत्रियों-नेताओ-नौकरशाहों में इतना अधिक क्रिकेट को लेकर दिलचस्पी इसी रूपये को लेकर है। सौरभ-सचिन-लक्ष्मण की तिकड़ी ने क्रिकेट का कोच चुनने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वक्त आ गया है कि खेल से जुड़े लोगों को ही अब बीसीसीआई चलाने की जिम्मेदारी भी दी जाए।

मंजीत ठाकुर

Sunday, July 17, 2016

पलायन के मर्ज़ की दवा क्या है!

बेहतर जिंदगी की उम्मीद में एक जगह से दूसरे जगह तक जाना, मनुष्य का स्वभाव रहा है। लेकिन आज के संदर्भ में स्थितियां उलट गई हैं। आज पलायन या प्रवास करने वालों की गिनती बहुत अधिक हो गई है। पलायन जहां प्रवास का नकारात्मक नज़रिए की तरफ इशारा करता है वहीं प्रवास अधिक सकारात्मक शब्द है।

आज, गांव से शहरों में आय़ा आदिवासी या दलित जब शहर में आता है तो उसे सांस्कृतिक रूप से एक खाई का सामना करना होता है। शहरों की परंपराएं और जीवन-मूल्य उसके गंवई परंपराओँ से अलग होते हैं। वैसे, पलायनों को कई दफा सकारात्मक भी माना जाता है। आखिर, शहरी उच्च और सुविधाभोगी मध्यवर्ग को
एक ऐसी आबादी चाहिए होती ही है, जो कम लागत पर उसके लिए घरेलू नौकर से लेकर मजदूरों तक का काम निबटाए। ऐसे में तर्क सामने आते हैं कि पलायन को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता और ऐसे पलायन को विकासवादी पलायन कहा जाता है। लेकिन सच तो यह है कि यह एक तरह से निराशावादी पलायन है क्योंकि
विकास की धारा में पीछे छूट गए लोग ही शहरों की तरफ पलायन करते हैं।

दिल्ली की ही मिसाल लीजिए। यहां आने वाली आबादी में बिहार से आने वाले छात्र और नौकरीपेशा लोगों के साथ बुंदेलखंड के मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के हिस्सों से आने वाले लोग है। राजस्थान से दिल्ली आए लोग हों, या फिर उत्तराखंड है, यह सब तभी आए हैं जब उन्हें उनकी ज़मीन पर किसी न किसी किस्म की समस्या का सामना करना पड़ा है।

बिहार में शिक्षा की गत बुरी होने के बाद छात्रों ने बड़ी संख्या में दिल्ली का रूख किया था। राजद के शासन के पंद्रह साल के बदतरीन दौर में बिहार प्रतिभाशाली लड़कों का क़ब्रिस्तान जैसा हो गया था और फिर नौकरी के
लिए दिल्ली आने वाले युवाओं की तादाद बढ़ती गई। पिछले दो दशक में दिल्ली में रह रहे प्रवासियों की गिनती करीब 40 लाख के आस-पास पहुंच गई है।

दोनों राज्यों के बुंदेलखंड के लोग पानी और रोज़गार, अकाल और भुखमरी से दिल्ली का रास्ता नापने को मजबूर हुए। मैं यहां सिर्फ दिल्ली की मिसाल दे रहा हूं, इसका मतलब यह नहीं है कि सारे लोग सिर्फ दिल्ली ही आए हैं। ऐसा ही उत्तराखंड और राजस्थान के साथ भी हुआ।

पलायन का यह किस्सा असंतुलित विकास की वजह से हुआ है। देश के समग्र विकास में पीछे छूटे लोग ही पलायन करते हैं। इस विकास में न तो इस छूट गए वर्ग की न तो कोई हिस्सेदारी होती है और न ही कोई भूमिका। 

तो सवाल है कि इस समस्या को किस रूप में देखा जाना चाहिए? पहली बात तो यही कि हमें इस बात पर गौर करना चाहिए कि क्या यह पलायन परंपरागत है? या किसी नीतिगत योजना के तहत होने वाला विस्थापन? अगर विस्थापन अपरिहार्य है, बेहद जरूरी ही है तो क्या इसके तहत पुनर्वास की कोशिशें ईमानदार हैं?
इसकी पड़ताल मीडिया को तो करनी ही चाहिए जो अमूमन किसी स्कूप की तलाश में रहता है, साथ ही आला अधिकारियों को भी इसकी जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए।

दूसरा सवाल है कि क्या अगर पलायन रोकना मुमकिन नहीं है, तो इसे बेहतर प्रबंधन के ज़रिए नियंत्रित किया जा सकता है? अगर हां, तो कैसे? इसके लिए कौन से राजनीतिक और नीतिगत कदम उठाए जाने चाहिए? आखिर बड़े से बड़े शहर में भी विकास की संभावनाएं एक वक्त के बाद सीमित हो जाती हैं। छोटे शहरों
का ढांचागत विकास इंतजामों के अभाव में रूका पड़ा है। ऐसे में क्या हम इन सीमित शहरी संसाधनों के बूते पलायन को रोक सकते हैं? नहीं। तो इस समस्या के प्रबंधन की दिशा में कारगर बुनियादी नीतियां और व्यवस्थाएं क्या होंगी?

तीसरा सवाल यह है कि क्या महानगरों की तरफ बढ़ते पलायन से वहां के स्थानीय संसाधनों को हक को लेकर वर्ग विशेष के बीच टकराव की स्थिति नहीं बनेगी? जवाब हैः बनेगी। जैसा कि हम महाराष्ट्र खासकर मुंबई में उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को लेकर एक खास मानसिकता वाले लोगों की बातचीत में इस देख ही सकते हैं।

तो क्या पलायन को रोकने के लिए माइक्रो स्तर पर खाद्य सुरक्षा इत्यादि को बढ़ावा देकर और कमजोर तबकों को सामाजार्थिक शोषण से मुक्ति दिलाने के कड़े कदम नहीं उठाए जा सकते हैं? मोदी सरकार ने इस दिशा में कुछ कदम उठाए तो हैं लेकिन उनके नतीजे आने में वक्त लगेगा। और हां, यह काम सिर्फ मनरेगा के ज़रिए नहीं हो सकेगा। स्किल इंडिया के नतीजे आने में पांच साल का वक्त लेगा और अगर देश विनिर्माण में ठीक-ठाक प्रगति कर पाया तो ग्रामीण स्तर पर रोज़गार का प्रबंध हो पाएगा।

फिलहाल, तो बुंदेलखंड हो या बिहार का ठेठ गंवई शख्स, पलायन के बाद उसके लिए शहरी उपभोक्तावाद के नए झमेले में फंसने के सिवा कोई चारा नहीं, जो उनकी तहज़ीब, उनकी परंपराओं, मूल्यों सबको एक साथ लील रहा है। और हर चीज़ से महरूम यही शख्स हमारे-आपके यहां का शहरी गरीब है, जिसके शोषण का सिलसिला गांवों में होने वाले जातिवादी शोषण से कम खतरनाक नहीं।

मंजीत ठाकुर

Saturday, July 16, 2016

अमरनाथ को केदारनाथ बनने मत दीजिए

बाबा बर्फानी यानी बाबा अमरनाथ लाखों हिन्दुओं की श्रद्धा के केन्द्र रहे हैं और भारत में श्रद्धा पर सवाल खड़े करना बेहद खतरनाक है। लेकिन इन दिनों मैं बाबा अमरनाथ की यात्रा को बड़े गौर से देख रहा हूं। 2 जुलाई को
जिस दिन यात्रा की शुरूआत हुई थी, नौ हज़ार यात्री थे, और श्रद्धालुओं की यह संख्या दूसरे ही दिन बढ़कर सोलह हजार हो गई।

जम्मू-कश्मीर के जिस हिस्से में बाबा अमरनाथ की पवित्र गुफा है, उसे पारिस्थितिकी के लिहाज़ से बेहद संवेदनशील माना जाता है। लोगों की बढ़ती तादाद से उस इलाके में, उस ऊंचाई पर सामान्य तापमान में बढोत्तरी हो जाती है। और बर्फ से बनने वाला शिवलिंग कई दफा पूरा नहीं बन पाता। 

इस इलाके में हरियाली बहुत तेज़ी से कम हो रही है और यात्रा के लिए नए रास्ते बनाए जा रहे हैं। रास्ते में अधबनी सड़कों की वजह से धूल के बगूले उठते हैं। असल में, बाबा अमरनाथ तक जाने के दो रास्ते हैं, एक है पारंपरिक पहलगाम-चंदनबाड़ी होकर जाने का रास्ता। इस रास्ते की लंबाई अधिक है, करीब 38 किलोमीटर का सफ़र तय करना होता है। लेकिन पारंपरिक रास्ता तो यही है। इसी रास्ते पर आतंकवादी हमले का खतरा भी अधिक होता है।

लेकिन दूसरा रास्ता भी बना लिया गया है। हालांकि, लोग बताते हैं कि इस रास्ते का उपयोग 18वीं सदी से होता आय़ा है लेकिन पिछले 15-16 साल में बालटाल होकर जाने वाला रास्ता अधिक लोकप्रिय हुआ है। बालटाल के रास्ते बाबा अमरनाथ की पवित्र गुफा तक जाने में सिर्फ 14 किलोमीटर की चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। सो, फटाफट पुण्य कमाने वालों के लिए यह रास्ता अधिक मुफीद साबित हो रहा है।

बालटाल से हेलिकॉप्टर भी उड़ते हैं। तो अमीर लोगों के लिए बाबा बर्फानी का दर्शन ज्यादा आसानी से उपलब्ध हो गया है। लेकिन यात्रा शुरू होने से पहले मेरी नजर उन कूड़ों पर पड़ ही गई जो पिछले साल के यात्रियों ने यहां छोड़ दिए थे। उनकी सफाई नहीं हो पाई थी।  अब इस साल का कूड़ा उस ढेर को और बड़ा कर देगा और इस कूड़े में प्लास्टिक-पॉलीथीन की थैलियां बहुतायत में हैं।

आखिर पर्यावरण की चिंता किसे है? श्रीनगर से बालटाल जाने के रास्ते में, आपको कंगन के बाद से ही दोनों तरफ ग्लेशियर दिखने लगते हैं। आपको इन ग्लेशियरों को देखकर स्वर्गीय आनंद आएगा और आपको इस बात का इल्म भी नहीं होगा कि सालों भर जमने वाली इस बर्फ की नदी (ग्लेशियर) में से तीन हमेशा के लिए खत्म हो चुके हैं।

बालटाल पहुंचकर हजारों गाड़ियां पार्किंग में लगी दिखती हैं। इनके डीज़ल के जलने से निकला धुआं, और अधजले कार्बन से इस साफ-सुथरी हवा में ज़हर घुल रहा है। कनाते और तंबू लगे हैं। बेस कैंप में 16 सौ तंबू हैं और हर तंबू में औसतन छह बिस्तर हैं। लेकिन पीने के पानी का सिर्फ एक नल। शौचालय के नाम पर सिर्फ एक ढांचा है। जिनमें पांच कमोड हैं। पांच में से एक कमोड टूटा-फूटा है, बाकी इतने गंदे हैं कि शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। ऐसे में यात्री कितना साफ-सुथरा होकर दर्शन के लिए आगे बढ़ेगा, यह कहना मुश्किल है।
यात्रियों में ऐसे लोगों की गिनती ज्यादा लग रही है मुझे जो पुण्य कमाने कम और पिकनिक मनाने आए लगते हैं। बेस कैंप में थोड़ा और आगे बढ़ें तो भारत की महान धार्मिक परंपरा का एक और उदाहरण मिलता हैः लंगर। यात्री, मीडियावाले कोई भी यहां आकर मुफ्त खा सकता है। जी नहीं, रूकिए, अगर आप दूर-दराज से आए ड्राइवर हैं तो आपका प्रवेश निषेध है।

फिर यह भी पता चला कि यह लंगर उन चंदों पर चलाकर पुण्य कमाए जाते हैं, जो पंजाब-हरियाणा के विभिन्न शहरों में पुण्य के अभिलाषी लोगों से जुटाए जाते हैं। तो यह लंगर भी एक तरह से घोटाला ही है। चंदे की रकम में से बाकी किधर जाती है, यह तो बगल में बहती झेलम ही बता पाए।

यह लूट-खसोट तो हर तरफ है, लेकिन बाबा अमरनाथ तक जाकर पुण्य बटोरने से पहले यह ध्यान रख लिया जाता कि उससे इस इलाके के पर्यावरण, नदियों और हिमनदियों को कितना नुकसान हो रहा है, तो अधिक पुण्य के भागीदार होते। हम सब।

मंजीत ठाकुर