Thursday, March 30, 2017

अवैध खनन भी अवैध बूचड़खाना ही है।

उत्तर प्रदेश में खनन माफियाओं का तिलिस्म कभी कोई सरकार नहीं तोड़ पाई या यों कहें कि पिछले एक दशक में सियासी दलों के आकाओं ने जान-बूझकर इस ओर से अपनी आंखें बंद किए रखीं। खासकर बुंदेलखंड की बात करूं, तो इलाके में कोई पहाड़ी, कोई नदी नहीं बची जहां खनन का काम न चल रहा हो। ऊपरी तौर पर शायद तस्वीर बहुत गंभीर नहीं दिखेगी, लेकिन इसका असली खेल तब समझ में आता है, जब पता चलता है कि समूचा धंधा अब तक राजनेताओं के संरक्षण में फल-फूल रहा था।

हर रोज़ हजारो की संख्या में ट्रक बांदा और आसपास के इलाकों से नदियों से रेत लेकर निकलते हैं। जबकि रेत के खनन पर एनजीटी और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रोक लगा रखी है। यहां की केन, बागे और रंज नदियों से रेत निकालने का काम किया जा रहा है। बांदा के गांवों से हर रोज़ ट्रैक्टर के ज़रिए, रेत लाकर फिर बड़े ट्र्कों से दूरदराज को भेजा जाता है। हर रोज जिले से हजारों ट्रक रेत को बाहर ले जाने का काम करते हैं, वह भी प्रशासन की ठीक नाक के नीचे से।

पत्थरों के अवैध खनन के खिलाफ हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में याचिका दायर कर चुके राजकुमार हों या नदियों में रेत के अवैध खनन के खिलाफ राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) का दरवाज़ा खटखटाने वाले ब्रजमोहन यादव, दोनों पर झूठे केस बनाए गए और उन पर जानलेवा हमले भी हुए हैं।

अब एनजीटी ने रेत के अवैध खनन को लेकर बांदा प्रशासन को नोटिस भेजा है। बुंदेलखंड में पिछले एक दशक में रेत का अवैध खनन का व्यापार काफी फला-फूला है और इसको किस कदर सियासी संरक्षण हासिल है यह बांदा के पुलिस सुपरिटेंडेंट आर के पांडे की डीएम को लिखी चिट्टी से भी साफ हो जाता है, जिसमें उन्होंने कांग्रेस के विधायक दलजीत सिंह और सपा नेता लाखन सिंह के नाम का उल्लेख किया है। जाहिर है, पिछले एक दशक में खनन माफिया के सिर्फ दल बदले हैं, काम नहीं बदला और इसका खामियाजा बुंदेलखंड के पर्यावरण के साथ-साथ सरकार के खज़ाने को भी भुगतना पड़ रहा है।

ऐसा नहीं है कि खनन माफियाओं पर नकेल कसने के लिए कानूनों की कमी हो, धन-बल के प्रभाव ने हर कानून की सीमाओं को छोटा कर दिया है। खनन माफिया नेताओं और अफसरों को पैसों से अपने पक्ष में कर लेते हैं और इसके अलावा प्रतिरोध में उठी आवाजों को बाहुबल से बंद कर देते हैं।

सीएजी रिपोर्ट कहती है कि उत्तर प्रदेश में करीब साढ़े चार सौ मामलों में जिलाधिकारियों ने एनओसी जारी की थी, लेकिन खनन का राजस्व नहीं दिया। इससे सरकार को करीब 238 करोड़ का नुकसान हुआ। इसकी बड़ी वजह है कि प्रदेश में बड़ी संख्या में बाहुबली कहीं न कहीं अवैध खनन के धंधें में लिप्त हैं। अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसे बड़े बाहुबलियों का नाम भी किसी न किसी रूप में इससे जुड़ा रहा है।

उल्लेखनीय है कि बुंदेलखंड के सभी जनपदों से सालाना बालू और पत्थर खनिज से 510 करोड़ रूपए राजस्व की वसूली होती है। सीएजी की रिपोर्ट 2011 पर नजर डाले तो 258 करोड़ रुपए सीधे राजस्व की चोरी की गई है। वहीं वन विभाग की लापरवाही से जारी की गई एनओसी के बल पर वर्ष 2009 से 2011 के मध्य जनपद महोबा, हमीरपुर, ललितपुर में परिवहन राजस्व वन विभाग को न दिए जाने के चलते सरकार को 3 अरब की राजस्व क्षति का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा है।

एक लाइसेंसधारी आपूर्तिकर्ता राज्य को रॉयल्टी चुकाने के बाद ऊंची कीमत, करीब 20,000 रुपये प्रति डंपर के हिसाब से बालू बेचता है। इतना ही बालू एक गैरकानूनी आपूर्तिकर्ता 8000 रुपये में ट्रांसपोर्टरों को मुहैया कराता है, जो भवन निर्माताओं को 10,000 रुपये में बेचते हैं।

माफियाओं ने कभी मिर्जापुर-सोनभद्र में एक लाल पत्थर के पहाड़ को इस बेदर्दी से खोद डाला कि पूरा का पूरा पहाड़ ही ध्वस्त हो गया। ऐसे ही दृश्य आप बांदा के कुलपहाड़ और कबरई इलाके में देख सकते हैं। नदियों मे रेत के खनन से उसकी तली में गाद जमा हो जाती है और उसका प्रवाह बाधित होता है। बालू के अवैध खनन का मामला केवल अपराध से जुड़ा नहीं है. इससे न केवल सरकार को बड़े पैमाने पर राजस्व की हानि हो रही है, बल्कि पर्यावरण और जैव विविधता भी खतरे में हैं। पर्यावरणविद् मानते हैं कि अगर इसी तरह खनन होता रहा, तो नदी की मौत हो जाएगी और जैव विविधता भी नष्ट हो जाएगी। नदी में बालू फिल्टर की तरह काम करता है और इससे छन कर शुद्ध पानी भूमि में जाता है, लेकिन बालू के अवैध खनन से न केवल भू-जल स्तर घटता है बल्कि इसके प्रदूषित होने का खतरा भी बढ़ जाता है।

बुंदेलखंड में तो बेतवा नदी पर पूर्व में सत्ता में रही दोनों सियासी पार्टियों के कुछ नेताओं के गुर्गो ने कब्जा ही कर रखा है। यहां से निकली महीन और मोटी मोरंग की मांग पूरे देश में है। हैरत की बात है कि बाजार में चालीस हजार रुपये प्रति ट्रक बिकने वाली मोरंग का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा खनन के समय ही इन गुर्गों द्वारा वसूल लिया जाता है।

बेतवा से मोरंग का अवैध खनन करने के बाद ट्रकों को माफिया के लोग सुरक्षित रूप से 50 से सौ किलोमीटर के दायरे तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी लेते हैं।

उत्तर प्रदेश में जिस तरह अवैध बूचड़खाने बंद हुए हैं अब रेत के इस अवैध खनन को भी रोकने की ज़रूरत है। आखिर, अवैध रूप से रेत और पत्थर निकालकर पहाड़ों और नदियों के बेमौत मारने की ही तो काम किया जा रहा है।

मंजीत ठाकुर

Saturday, March 18, 2017

कांग्रेस का अवसान

धराशायी होना एक शब्द है और इसका अगर मौजूदा परिप्रेक्ष्य में एक राजनीतिक अर्थ खोजा जाए, तो इस शब्द को चरितार्थ किया है, कांग्रेस और राहुल गांधी ने।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में चार में हार कांग्रेस के लिए कोई नई बात नहीं है। इस साल उत्तराखंड और मणिपुर में उसे अपनी सरकार गंवानी पड़ी है तो 403 विधानसभा वाले देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में उसके हाथ महज 7 सीटें आईं। एक के बाद एक लगातार हार से कांग्रेस नेताओं का धैर्य भी चुकने लगा है। कांग्रेसी भले राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर चुप हों, लेकिन वक्त आ गया ह कि सवाल उठाए जाएं।

राहुल गांधी 2013 में कांग्रेस के उपाध्यक्ष बने, तब से लेकर आजतक वह 24 चुनाव हार चुके हैं। जब वह उपाध्यक्ष बने थे तब देश में 13 राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी। लेकिन आज स्थिति ये है कि पार्टी न तो लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल बन पाई, और अधिकतर राज्यों में पार्टी सत्ता से बाहर हो चुकी है।

सियासी पार्टियों का अंत कैसे होता है? इसे समझने के लिए लंबे समय से धीरे-धीरे अंत की ओर बढ़ रही कांग्रेस पर निगाह डालने की जरूरत है। 1885 में स्थापित कांग्रेस आजादी के बाद से अभी तक महज तीन बार ही सत्ता से बाहर रही है। लेकिन, मौजूदा परिस्थितियों से साफ है कि यह पार्टी खत्म भले न हो, लेकिन राष्ट्रीय शक्ति के तौर निष्क्रिय जरूर हो रही है। कांग्रेस के पास अपने बुनियादी जनाधार वाले वोटरों के लिए के लिए भी स्पष्ट राजनीतिक संदेश नहीं है।

2009 के लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस 2004 के मुकाबले और ज्यादा मजबूत होकर सामने आई तो उसका ज्यादातर श्रेय राहुल गांधी को ही दिया गया। खासकर यूपी में कांग्रेस को 21 सीटें मिलीं तो प्रचारित किया गया कि यह राहुल गांधी का ही करिश्मा है। इसके बाद मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल का जब भी विस्तार हुआ, राहुल गांधी के मंत्री बनने के कयास लगाए गए। 2013 में तो खुद प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह ने यह कह दिया कि वो राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने को तैयार हैं।

लेकिन उसी वक्त से पासा पलटना शुरू हो गया कांग्रेस के खाते में हार के बाद हार लिखी जाने लगी।

2012 में कांग्रेस चार राज्यों में हारी। यूपी में महज 28 सीटें कांग्रेस जीत पाई तो पंजाब और गुजरात में सत्ता में वापसी की उम्मीद धूल-धूसरित हुई। गोवा भी हाथ से फिसल गया।

2013 में कांग्रेस को त्रिपुरा, नगालैंड, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कारारी हार मिली। मिजोरम और मेघालय को छोड़ दिया जाए तो उसके लिए खुशखबरी महज कर्नाटक से आई।

2014 के लोकसभा चुनावों में तय था कि कांग्रेस हारेगी, लेकिन महज 44 सीट तक सिमट जाना हैरतअंगेज रिजल्ट था। फिर हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, जम्मू-कश्मीर में भी उसकी करारी हार हुई। 2015 में उसे असली झटका दिल्ली में मिला जहां उसे एक भी सीट नहीं मिली। 2016 भी कांग्रेस के लिए कोई अच्छी खबर लेकर नहीं आया। इस साल उसके हाथ से असम जैसा बड़ा राज्य चला गया। केरल में भी उसकी गठबंधन सरकार हार गई जबकि पश्चिम बंगाल में लेफ्ट के साथ चुनाव लड़ने के बावजूद उसका सूपड़ा साफ हो गया। हालांकि पुड्डुचेरी में उसकी सरकार बनी।

कांग्रेस का यह हश्र उसकी अपनी विचारधारा से विचलन की वजह से भी मानी जा सकती है। सेकुलर होने के एकमात्र गुणधर्म के अलावा राजीव गांधी के समय से ही कांग्रेस के पास कोई और बड़ा अजेंडा नहीं है और यही वजह है कि उसके जनादेश में धीरे-धीरे क्षरण आता गया है।

उत्तर भारत के बड़े हिस्से में वह स्थायी तौर पर विपक्ष में है। गुजरात में उसने तीन दशक से एक भी चुनाव नहीं जीता है। कई दूसरे बड़े राज्यों में, जहां बीजपी सत्ता में है या विपक्ष में है, वहां कांग्रेस चौथे या पांचवें स्थान पर है, यानी अप्रासंगिक है। वह जितना सोच रही है, उससे कहीं ज्यादा तेजी से दक्षिण में बीजेपी के हाथों अपनी जमीन हार रही है और हिंदुत्व तमिलनाडु और केरल में अनवरत आगे बढ़ रहा है।

कांग्रेस के क्षेत्रीय नेताओं ने काफी पहले इस पार्टी का अंत होते देख लिया था। उनमें से कुछ ने सफलतापूर्वक पार्टी को अपने कब्जे में लेकर अपनी जेबी पार्टियां खड़ी कर लीं। मिसाल के तौर पर, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी। हालांकि, शरद पवार जैसे दूसरे नेता भी थे लेकिन वे कम कामयाब रहे। फिर भी, उनके पास अपनी पार्टी का कांग्रेस में फिर से विलय का सवाल भी नहीं उठता।

हाल के स्थानीय निकाय चुनाव में महाराष्ट्र में कांग्रेस की जो दुर्दशा हुई है, उसका कारण उम्मीदवारों को पार्टी की तरफ से वित्तीय सहायता नहीं देना है। यह एक खतरनाक संकेत है। कांग्रेस के पास राहुल गांधी या थोड़ी देर के लिए मान लें तो प्रियंका वाड्रा के अलावा कोई और चेहरा जनता के सामने पेश करने के लिए नहीं है। एक ही परिवार कितने दिनों तक करिश्मा दिखा पाएगी, यह बात सवालों के घेरे में है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के तौर पर योगी आदित्यनाथ को आगे करके बीजेपी ने दूसरी पीढ़ी के नेताओं और संभवतया 2024 में केन्द्र में बीजेपी के अगले उम्मीदवारो को तैयाक करना शुरू कर दिया है।

कांग्रेस अभी भी सकते में है, और अभी रहेगी। कांग्रेस को राहुल गांधी से आगे सोचने की ज़रूरत है, इस काम में जितनी जल्दी वह करेगी, उतना जल्दी रिकवर कर पाएगी।




मंजीत ठाकुर

Saturday, March 11, 2017

यह लहर नहीं, सुनामी है

धराशायी होना अगर एक शब्द है, उसका चुनावी अर्थ यूपी चुनाव के नतीजों में यूपी के लड़के रहे। यूपी के लड़के यानी अखिलेश और राहुल गांधी। दोनों की मिली-जुली ताकत। यह ताकत फिसड्डी साबित हुई क्योंकि इन लड़कों को लोहा लेना था यूपी के लाडले से।

दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साबित किया इस दफा यूपी में मोदी लहर नहीं थी, 2014 की लहर अब ताकतवर तूफान बन चुका है। कांग्रेस-सपा गठजोड़ की क्रिएटिव टीम ने अखिलेश-राहुल गठजोड़ को लेकर नारा बनायाः यूपी को ये साथ पसंद है। नतीजों के साथ नारा भी धूल-धूसरित हो गया, यह कहने की बात ही नहीं। यूपी के इन लड़को का ज़ोर इस बात पर था कि प्रधानमंत्री मोदी बाहरी हैं, और सपा-कांग्रेस गठबंधन दो कुनबों का नहीं, दो युवाओं का है।

इस गठजोड़ का पूरा फोकस यूथ वोटर पर था। 18 लाख लैपटॉप बांट चुके अखिलेश ने युवाओं को स्मार्टफोन देने का वादा किया। अखिलेश ने कहा भी, जितने युवाओं ने स्मार्टफोन के लिए रजिस्ट्रेशन कराए हैं, अगर वो सब भी वोट देंगे तो यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार बनेगी। मगर नतीजे बताते हैं, यूपी को ही नहीं, यूथ को भी ये साथ पसंद नहीं।

दूसरी तरफ, राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी को यूपी के लिए बाहरी बताते वक्त भूल गए कि उनकी चुनाव फिल्मी डायलॉग से नहीं जीते जाते। कानून भारत के किसी भी नागरिक को देश में कहीं से भी चुनाव लड़ने की छूट देता है। आखिर इंदिरा गांधी ने चिकमंगलूर से चुनाव लड़ा था और इसके दो दशक बाद, 1990 में सोनिया गांधी ने भी बेल्लारी से चुनाव लड़ा था। ऐसे में मोदी को बाहरी बताने का प्रियंका और राहुल का दावा खोखला नज़र आया।

राहुल और अखिलेश ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी, चर्चा का केन्द्र बनने के लिए चाचा के साथ फ्रेंडली ड्रामाई फाइट भी किया, लखनऊ, इलाहाबाद, गोरखपु, आगरा कानपुर और वाराणसी में, बकौल अखिलेश ही, अच्छे लड़के राहुल के साथ रोड शो किए लेकिन इन सभी इलाकों में चाहे वह इलाहाबाद हो या आगरा, गोरखपुर हो या वाराणसी, रोड शो के बावजूद गठबंधन सड़क पर आ गया है।

राहुल गांधी ने रायबरेली का दो बार दौरा किया। अमेठी में अपना पूरा दिन प्रचार में बिताते हुए तीन रैलियां की। इस इलाके को जागीर समझते हुए और प्रियंका महज एक बार गईँ, सोनिया गांधी तो गई भी नहीं। खामियाजाः अमेठी में भाजपा जीती तो रायबरेली में कांग्रेस किसी तरह इज्जत बचा पाई।

इधर, प्रचार करते वक्त प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें यूपी ने गोद लिया है, तो यूपी ने भी साबित किया कि मोदी सिर्फ गोद लिए हुए ही नहीं बल्कि यूपी के लाडले भी है। प्रधानमंत्री ने ताबड़तोड़ 23 रैलियों से बीजेपी के प्रचार को आक्रामक धार दी, जो जनता ने भी उतने ही प्यार से जवाब दिया, बीजेपी के खाते में करिश्माई 300 सीटों का आंक़ड़ा है।
मोदी लहर का जादू यह रहा कि उनके धुआंधार प्रचार ने 2014 की लहर को सुनामी और अंधड़ में बदल दिया। जिसमें बसपा तो खैर तिनके की तरह उड़ गई। कांग्रेस और सपा का सूपड़ा भी साफ हो गया. ऐसे में चुनाव के ऐन पहले जहां सपा-कांग्रेस गठबंधन को ओपिनियन पोल में बढ़त हासिल थी वहीं मोदी के चुनाव प्रचार शुरू करने के बाद माहौल बदलता गया. अंतिम दौर में तो पूर्वांचल की धुरी वाराणसी में पीएम नरेंद्र मोदी ने खुद आक्रामक प्रचार कर पूरी तरह से माहौल बीजेपी के पक्ष में कर दिया.

पूरा यूपी केसरिया रंग से सराबोर है। मोदी की अपील पर केसरिया होली के लिए जनता खुलकर मैदान में आ चुकी है। 2019 का सेमीफाइनल यूपी की जनता ने पीएम मोदी की झोली में डाल दिया है। ब्रांड मोदी भारतीय राजनीति का विश्वसनीय नाम साबित हुआ है। ये जीत इसलिए ही बड़ी नहीं है कि इसने 1991 में जीती गयी सीट के रिकॉर्ड तोड़े दिए। ये जीत इसलिए ऐतिहासिक है इसने इसने लोकसभा चुनाव में मिले वोट शेयर को भी मैच कर लिया है।

चुनाव के बाद जो प्रचंड मोदी लहर दिख रही है, वो पीएम मोदी की हर सभा में भी दिख रहा था लेकिन विरोधी मानने को तैयार नहीं थे। समाजवादी-और कांग्रेस पार्टी से तकरीबन 12 फीसदी वोट बीजेपी ने छीन लिए। बीएसपी से भी करीब 5 फीसदी वोट बीजेपी ने छीना है। पर, सबसे खास बात ये है कि पिछले चुनाव के मुकाबले बीजेपी ने अपना वोट लगभग दुगुना कर लिया है।

मोदी की लहर में विरोधी पार्टियां तिनके की तरह उड़ गईं हैं। सत्ताधारी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन को करारा झटका लगा है। अखिलेश यादव और राहुल गांधी के तमाम दावों को भी जनता ने नकार दिया। इसी के साथ ये साफ हो गया कि जनता को ये साथ पसंद नहीं है। वहीं बीएसपी ने अपने जन्म के बाद से अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन किया है।

लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने बड़े राजनीतिक पंडितों के आकलन को धता बताते हुए 80 में से 73 सीटें जीती थीं। अगर इसे विधानसभा सीटों में परिणत करते तो 43 प्रतिशत वोट के साथ सीटों की संख्या 337 होती। इस चुनाव में भी वोट प्रतिशत 43 प्रतिशत बरकरार रहा। यानी मोदी की लोकप्रियता अब भी कायम है।

यूपी चुनाव की जीत मोदी-शाह की जोड़ी की जीत मानी जा रही है। मोदी की लीडरशिप और अमित शाह के माइक्रो मैनेजमेंट ने इतनी बड़ी जीत दिलाई है। जाहिर है ये जीत दोनों के लिए मनोबल और ज्यादा बढ़ाने वाली साबित होगी। इन चुनावों में भी प्रचार का केंद्र बिंदु खुद पीएम मोदी ही रहे हैं। जाहिर है कि उसका क्रेडिट उन्हें ही मिलेगा।

मुख्तसर यही कि लड़के अभी तजुर्बे के लिहाज से कच्चे ही हैं, लाडले से भिड़ने के लिए सिर्फ हाथ मिलाना ही जरूरी नहीं। कारनामों की जगह काम करके भी दिखाना होता है।

मंजीत ठाकुर

Saturday, March 4, 2017

वोटबैंक का बंटवारा

उत्तर प्रदेश में अब बस आखिरी चरण की वोटिंग होनी बाक़ी है। बहुत कुछ हो गया, बहुत कुछ गुज़र गया। जुमलेबाज़ी, लफ्फाजी, वायदे, घोषणापत्र...सब कुछ हुआ। लेकिन सिर्फ भारत जैसे बड़े और अजूबे किस्म के किमियागरी वाले लोकतंत्र में ही मुमकिन है कि चुनाव घोषणा-पत्र में किए गए वादों की बजाय एक-दूसरे का खौफ दिखाकर जीते जाएं।

बिना किसी का पक्ष लिए कहूंगा कि यह (और पिछले कई चुनाव) मुद्दों (इस बार यूपी में मुद्दो की बात न कें) की बजाय किसी एक पार्टी को रोकने के नाम पर लड़े जा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के वोटों की चिंता कथिक सेकुलर पार्टियों को है। इन पार्टियों के नेता जब मुस्लिमों से मिलते हैं, तो आम वोटर उनसे यही पूछता है कि अल्पसंख्यक की शिक्षा, रोज़गार, तरक़्क़ी और सेहत के लिए, विकास की समस्याओं के हल के लिए उनके पास योजनाओं का क्या खाका है? नेता जी उंगली से वोटर को चुप कराते हैं और कहते हैं, चुप हो जाओ वरना बीजेपी आ जाएगी।

यह सच है कि सेकुलर कहे जाने वाली पार्टियों के पास अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा का नारा तो है, लेकिन उनका विकास कैसे होगा, इस बात का कोई ठोस रोडमैप नहीं है। यह नदारद है। जाहिर है, ठगा महसूस कर रहा मुसलमान अपने दुख-दर्द में शामिल छोटी पार्टियों पर भी भरोसा कर रहा है ।

इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि बहुजन समाज पार्टी—जिनकी सुप्रीमो मायावती ने खुलेआम मुसलमानों से उनकी पार्टी को वोट देने का आह्वान किया—और समाजवादी पार्टी, जिनके नेता खुद को मुसलमानों का एकमात्र रहनुमा मानते हैं, का यह वोटबैंक या तो बंट रहा है, या खिसक रहा है। यह वोटबैंक मजलिस-ए-इत्तिहाद उल मुस्लिमीन और पीस पार्टी को भी वोट दे रहा है। जाहिर है, इन छोटी पार्टियों की वजह से और वोटबैंक में हिस्सा बंटाने से 11 मार्च को कई दिग्गजों का खेल खराब होगा। यकीनन होगा।

इन दोनों छोटी पार्टियों को ज्यादा सीटें हासिल नहीं होंगी, लेकिन खेल खराब होगा।

इन कथित सेकुलर पार्टियों की दिक्कत है कि नोटबंदी का मसला भी हाथ से फिसल गया। आम जनता में नोटबंदी कोई बहुत बड़ा मसला नहीं है। जबकि, सपा और बसपा दोनों को बुरी तरह यकीन था कि नोटबंदी वोटरों के सामने बहुत बड़ा मसला साबित होगा। ऐसे में इन दलों ने बाकी सारे मुद्दे ठंडे बस्ते में डालकर नोटंबदी को उछाला। उन्हें लगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव के ऐन पहले, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। कांग्रेस और सपा तो यही समझती रही कि उन्हें बैठे-बिठाए हाथों में लड्डू थमा दिया गया है। लेकिन, सच यह है कि बीजेपी अगर चुनाव हारेगी भी (क्योंकि चुनाव परिणाम अनिश्चित हैं) तो उसकी वजह नोटबंदी नहीं होगी।

नोटबंदी के बाद के दौर में, कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने सेकुलर वोटों को इकट्ठा करने की रणनीति पर काम करना शुरू किया। मुस्लिम लीडरों क घास न डालने की सलाह उन्होंने अपने दल को दे दी। समाजवादी पार्टी की खुशफहमी की एक वजह यह भी रही कि उनके घरेलू सियासी ड्रामे पर समाजवादी पार्टी के अधिकांश कार्यकर्ता अखिलेश का साथ देते रहे, और उसे रणनीतिकारों ने उसे जनता का समर्थन मान लिया।

अब बात बसपा की। जिस वक्त में अखिलेश जनता के समर्थन की खुमारी में थे, मायावती ने नोटबंदी मुद्दे की व्यर्थता को भांप लिया था। उन्होंने नसीमुद्दीन सिद्दीकी को मुस्लिम उलेमा को साथ लाने के एकसूत्रीय काम पर लगा दिया। तो एक तरफ तो भारतीय जनता पार्टी के नेता नोटबंदी को अपनी उपलब्धि को तौर पर जनता के सामने ले जा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने तकरीबन हर चुनावी रैली में, काले धन के खिलाफ नोटबंदी के इस कदम की सराहना की और मायावती और मुलायम के नोटबंदी पर रूख की खिल्ली उड़ाई वहीं, समाजवादी पार्टी मुस्लिम वोटों के विभाजन को रोक पाने में नाकाम रही है।

नोटबंदी की वजह से जनता को जो परेशानी हुई थी, अब वह पुरानी बात हो गई और अब उनके सामने कुर्ते की फटी जेब से उंगलियां बाहर निकालकर दिखाने से जनता के ठहाके हासिल किए जा सकते हैं, वोट नहीं।

फिर अखिलेश यादव और उनकी टीम ने, मायावती को अपने युद्ध में निशाने पर रखा ही नहीं। लेकिन यकीन मानिए उत्तर प्रदेश में फैसला कुछ अनोखा भी आ सकता है। यह अनोखा चुनावी नतीजा, कुछ भी हो सकता है, त्रिशंकु विधानसभा भी। तब, मायावती और बीजेपी साथ आ जाएं तो क्या ताज्जुब! आखिर, सियासत गुंजाइश से ही शुरू होती है।


Sunday, February 26, 2017

चुनावी दलबदल में नारेबाज़ों की मुश्किल

उत्तर प्रदेश में बस पांचवे चरण की वोटिंग होनी है। चुनाव में ज़बानी जमा-खर्च और लफ्फाजियों के साथ नारों का होना जरूरी होता है। सिर्फ ज़रूरी नहीं, बहुत ज़रूरी।

इस बार चुनाव में घूमते वक्त कई नारे कान में पड़े। अश्वमेध का घोड़ा है, मोदीजी ने छोड़ा है। जिसका जलवा कायम है, उसका नाम मुलायम है। भ्रष्टाचार मिटाना है, राहुल ने यह ठाना है। जीत गया भई जीत गया, शेर हमारा जीत गया। कांशीराम का मिशन अधूरा, मायावती करेंगी पूरा।

इस बार उत्तर प्रदेश के चुनावी बुखार में मौसम ने साथ दिया। वरना, गरमियों में होते तो हालत पतली होती। उम्मीदवारों की भी, वोटरों की भी और हम जैसे चुनाव कवर करने वाले पत्रकारों की भी। लेकिन, इसी मुद्दे पर एक पानवाले की राय अलग थी, न सरदी, न गरमी, चुनाव में हर मौसम गुलाबी लगता है।

लेकिन इस बार नारों में कुछ गड़बड़ हो गई। गड़बड़ की वजहः वह लोग बहुत मुश्किल में थे जिनके नेता ने हाल ही में दल बदल लिया था। वह नारे लगाने में वह बार-बार अटक रहे थे। बीच-बीच में पुराने दल का नारा जुबां पर आता और अगले ही पल उसे सुधारते।

सियासी दल कोई भी हो, हवा चाहे किसी की बहे, बुंदेलखंड में एक दर्जन नेता ऐसे हैं, जहां वे खड़े होते हैं राजनीति वहीं से शुरू होती है। बुंदेलखंड की राजनीति में गहरी पैठ बनाने वाले तमाम नेताओं ने यह साबित कर दिया है कि वह खुद में एक दल हैं। दल बदलकर दंगल लड़कर सियासी सूरमा आज बुंदेलखंड की राजनीति में दस्तक दे रहे हैं। सक्रिय राजनीति में आने के बाद इन नेताओ ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है।

सियासी पार्टियां कभी इनकी राह में रोड़ा बनीं, तो उनसे भी किनारा करने में गुरेज नहीं किया। हालांकि इस काम मे हर किसी को कामयाबी नहीं मिली, फिर भी आगे के चुनाव में पार्टियां इनसे किनारा नहीं कर सकीं।

ऐसे कई सियासी दिग्गज हैं जो दो से ज्यादा पार्टियां बदल चुके हैं। अरिमर्दन सिंह, सिद्धगोपाल साहू, आरके सिंह पटेल, अशोक सिंह चंदेल, विवेक कुमार सिंह कई बार पार्टियां बदलने के बाद भी राजनीति में मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।

2017 के विधानसभा चुनाव में कई दिग्गजों की साख दांव पर है। कांग्रेस छोड़कर सपा में आए सिद्धगोपाल साहू 2012 में चुनाव हार गए। अबकी सपा ने उन्हें फिर से प्रत्याशी बनाया। जनता दल से राजनीति की शुरूआत करने वाले अरिदमन सिंह सपा में रह चुके हैं। 2007 में वह बसपा में भी रह चुके हैं। 2012 में वह कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े थे। इस बार बसपा से महोबा सदर के प्रत्याशी हैं।

राकेश गोस्वामी बसपा से विधायक थे। 2012 में उनको टिकट नहीं मिला, इस बार भाजपा के प्रत्याशी हैं।

झांसी के मऊरानीपुर से परागीलाल पहले भाजपा से विधायक थे। वहां टिकट कटा तो बसपा से टिकट ले लिया। बिहारी लाल पहले कांग्रेस के विधायक थे और इस बार भाजपा के टिकट पर लड़ रहे हैं।

हमीरपुर सीट पर अशोक कुमार चंदेल जनता दल से विधायक रह चुके हैं। बाद में बसपा जॉइन की। एक बार निर्दलीय विधायक भी रह चुके हैं। इस बार भाजपा ने हमीरपुर सदर से प्रत्याशी बनाया है। राठ के विधायक गयादीन अनुरागी भाजपा और बसपा से गुजरते हुए पिछले विधानसभा में कांग्रेस में गए और जीते। इसबार फिर से कांग्रेस के टिकट पर किस्मत आजमा रहे हैं।

बांदा में विवेक सिंह 1996 में लोकतांत्रिक कांग्रेस से विधायक थे। 2002 में बीजेपी के टिकट पर लड़े और हार गए। 2007 और 12 में कांग्रेस के टिकट पर लड़कर जीते। इस बार भी कांग्रेस प्रत्याशी हैं। बबेरू के विधायक पहले बसपा में थे। फिर सपा में आए तो पिछला चुनाव जीता, इस बार भी मैदान में हैं।

मानिकपुर विधानसभा के चुनाव मैदान में उतरे आर के सिंह पटेल कई पार्टियां आजमा चुके हैं। वह बसपा से विधायक और सपा से सांसद रह चुके हैं। एक बार फिर 2014 में बसपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा था।

चुनावी व्यंजन में नारों का तड़का लगाना बहुत ज़रूरी होता है, लेकिन इस दल-बदल ने नारेबाज़ों का कम मुश्किल कर दिया है।

फिलहाल तो दलबदलू नेताओं के लिए एक मशहूर कवि की यह पंक्तियां—

पहले हवा का रुख़ देखना है

फिर यह तय करना है किस आले पर दिया रखना है।



मंजीत ठाकुर

Monday, February 13, 2017

बुंदेलखंड में ग्लैमरस डाकू और सियासत

एक फिल्म थी पान सिंह तोमर जिसमें पान सिंह कहता है कि चंबल में डकैत नहीं होते, बाग़ी होते हैं। लेकिन चुनावों के मद्देनज़र अगर चित्रकूट इलाके में इन डकैतों की सियासी चहलकदमी देखें तो कहा जा सकता है कि इस इलाके में डकैत नहीं, सियासत में घुसने की तमन्ना भी होती है।

यह बात और है कि खुद ददुआ ने अपने परिवार को और बाद में ठोकिया ने भी अपने परिवार को सियासत की राह दिखाई और दोनों ही इस इलाके के नामी और इनामी डकैत रहे हैं।

चित्रकूट और आसपास के इलाके में पिछले तीन दशकों से डकैतों का राजनीति में प्रभाव रहा है। ददुआ यही कोई चार दशक पहले जरायम के पेशे में उतरा था और उसने इस इलाके में काफी आतंक मचाया था।

साल 1977-78 के आसपास अपने आंतक का राज कायम किया और सियासत में हर कोई उसके असर को अपने पक्ष में करना चाहता था। उसका राजनीति में इतना दखल था कि ग्राम प्रधान से लेकर सांसद तक, हर कोई चुनाव जीतने के लिए उसका आशीर्वाद चाहता था।

सबसे पहले कम्युनिस्ट पार्टी के रामसजीवन सिंह पटेल ने ददुआ के सहयोग से विधानसभा का चुनाव जीता था, पहले उनकी सीट कर्वी हुआ करती थी, बाद में चित्रकूट सीट हो गई। अगले दो चुनाव तक ददुआ की मदद कम्युनिस्ट पार्टी को मिलती रही।

उधर ददुआ ने मानिकपुर सीट पर दद्दू प्रसाद को मदद दी और वह लगातार तीन बार विधायक रहे। वह बीएसपी के थे।

1993 में कर्वी सीट पर आर के पटेल बीएसपी ने ददुआ का सहयोग लिया। इनका राजनीति में उदय तो हुआ लेकिन पहला चुनाव हार गए थे। 1996 से दो बार लगातार विधायक रहे, लेकिन उस समय ददुआ का नारा थाः वोट पड़ेगा हाथी पर, नहीं तो गोली खाओ छाती पर।

साल 2007 में भी इस सीट से बीएसपी ही जीती, लेकिन बीएसपी से टिकट मिला था दिनेश प्रसाद मिश्र को, जो ददुआ के सफाए के नारे पर वोट मांगने पहुंचे और चुनाव जीत भी गए। 2007 के चुनाव के बाद ददुआ पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। उनसे पहले कर्वी सीट पर जीत रहे आर के पटेल तब तक समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे और चुनाव हार गए। 2009 में पटेल ने लोकसभा का चुनाव सपा के टिकट पर जीता, लेकिन तब तक ददुआ मारा जा चुका था।

ददुआ के बाद इलाके में एक नए डकैत ठोकिया का आंतक कायम हो चुका था और सियासत में भी उसकी चलती बढ़ गई। ठोकिया ने अपने परिवार के लोगों को सियासत में उतारा और ज्यादातर अपने सजातीय उम्मीदवारों का ही समर्थन किया। उसने इस मामले में कभी बसपा को तो कभी सपा को समर्थन किया।

इलाके के तीन बड़े नेताओ आर के पटेल, रामसजीवन पटेल और दद्दू प्रसाद पर ददुआ को संरक्षण देने का मुकदमे भी दर्ज हुए थे।

आज की तारीख में यानी 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में ददुआ के समर्थने में जीतने वाले विगत के सारे प्रत्याशी जो कभी बसपा में थे, आज चार विभिन्न दलों से मैदान में है। सभी एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोंक रहे हैं।

इनमें से दो, आर के पटेल और दद्दू प्रसाद बसपा के सरकार में मंत्री भी रह चुके हैँ। इलाके में आतंक का पर्याय बन चुका ठोकिया 2008 में बसपा के शासनकाल में ही मार गिराय गया, लेकिन तब तक इलाके में नया डकैत बबली उभर चुका था। ददुआ, ठोकिया, रागिया, गुड्डा और बबली और गुप्पा ये सभी इस इलाके में सियासत में खासी दखल देते रहे हैं।

जब से उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव का बिगुल बजा, तभी से चित्रकूट और उसके आस-पास के क्षेत्रों में डकैतों ने अपनी चहलकदमी बढ़ा दी है। ददुआ, ठोकिया, बलखडिया और रागीया जैसे कुख्यात दस्यु सरगनाओं के खात्मे के बावजूद चुनाव में अपनी हनक दिखाने को लेकर चित्रकूट के कई इलाकों पर इनामी डकैतों में भी स्पर्धा है।

चित्रकूट जिले के चार इनामी सरगनाओं में बबली कोल, गोपा यादव, गौरी यादव और ललित पटेल ने अपने-अपने उम्मीदवारों को जिताने के लिए फतवे देने शुरू कर दिए हैं। मानिकपुर मऊ के जंगलों में इनका आना-जाना बढ़ गया है।

इलाके के लोगों का कहना है कि डकैतों ने पहले तो समझा-बुझाकर वोटरों को अपने-अपने प्रत्याशी को जिताने की बात कही है। कुछ ने धमकी भरे शब्दों का प्रयोग भी शुरू कर दिया है। ग्रामीणों के अनुसार बबुली, गौरी यादव, गोपा यादव और ललित पटेल गिरोह के बदमाश गांवों के चक्कर काट रहे है।

चित्रकूट की दोनों विधानसभाओं में लड़ने वालों में एक तरफ कुख्यात डकैत ददुआ का पुत्र वीर सिंह पटेल समाजवादी पार्टी से कर्वी विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी है। वहीं मऊ मानिकपुर विधानसभा से डकैतों का संरक्षण लेने के आरोपी रहे दद्दू प्रसाद, आर के सिंह पटेल, चंद्रभान सिंह पटेल चुनाव मैदान में हैं।

ठीक है, कि कभी पान सिंह तोमर में इरफान ने कहा था कि बीहड़ में बाग़ी होते हैं और डकैत तो संसद में होते हैं और हम सब को यह बात नागवार गुज़री थी, लेकिन कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि बाग़ी भले ही चित्रकूट के जंगल में हो लेकिन यूपी विधानसभा के कई सदस्य उनकी मदद लेकर ही विधायकी पाते हैं।

Sunday, February 5, 2017

चंदे पर फंदा

एक संस्था है असोसिएशन ऑफ डिमोक्रेटिक राइट्स यानी एडीआर और दूसरी संस्था है, नैशनल इलेक्शन वॉच। यह दोनों ही संस्थाएं भारत में राजनीतिक दलों और नेताओं की दौलत वगैरह का ब्योरा वक्त-वक्त पर पेश करती रहती हैं और चुनावों में काले धन के इस्तेमाल और भ्रष्टाचार पर भी उनकी निगाह रहती है। इन दोनों संस्थाओं ने 2004 से 2015 के बीच भारत में सियासी दलों को मिलने वाले चंदे के स्रोतों का व्यापक विश्लेषण किया है। इस विश्लेषण से तमाम सुबूत मिलते हैं कि अब सियासी दलों को मिलने वाले चंदे पर लगाम लगाने या कहिए कि उसमें पारदर्शिता लाने के लिए सख्त कानून की ज़रूरत है।

अब, इस बार के बजट में केन्द्र सरकार ने दो हज़ार से अधिक नकद चंदे पर रोक लगा दी है, तो इसे इसी वित्तीय गड़बड़ियों पर रोक की दिशा में एक कदम माना जाना चाहिए। कुछ लोग दलील देंगे कि सियासी दल ऐसी बंदिशों का तोड़ निकाल लेंगे, लेकिन इस बात से एक बेहतर कानून या नियम की ज़रूरत को कम नहीं किया जा सकता।

बजट में इस बात के उल्लेख से एक बात तो साफ है कि केन्द्र सरकार चुनावी प्रक्रिया को साफदामन बनाने के चुनाव आयोग के सुझावों पर अमल के लिए कदम उठा रही है।

ऐसे कदम इसलिए भी ज़रूरी हैं कि अगर सियासी दलों को मिले चुनावी चंदो की बात की जाए, तो एडीआर के ही मुताबिक, पिछले एक दशक में देश के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों को तककरीबन 11,367 करोड़ रूपये चंदे के रूप में हासिल हुए हैं। लेकिन इस राशि में से करीब 7,833 करोड़ की रकम अज्ञात स्रोतों से मिली है। अज्ञात स्रोतों से राशि हासिल करने में कांग्रेस सबसे आगे रही है और उसे करीब 3,323 करोड़ रूपये इन अज्ञात स्रोतों ने दिए। यह भी गौरतलब है कि पिछले एक दशक में (यानी एडीआर के अध्ययन की अवधि में) कांग्रेसनीत यूपीए ही सत्ता में थी।

वहीं, अज्ञात स्रोतों से बीजेपी को 2126 करोड़ रूपये हासिल हुए। यह उस पार्टी की कुल आमदनी का करीब 64 फीसद थी। सिर्फ यही दल नहीं, वामपंथी पार्टियों और ईमानदारी के मुद्दे पर चुनावी चौसर खेल रही आम आदमी पार्टी को भी चंदे में अज्ञात स्रोतो से मिली राशि ही सबसे अधिक रही है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को करीब 766 करोड़ चंदे में मिले और इसका 95 फीसद हिस्सा अज्ञात स्रोतों से मिला।

अब बात बसपा की, जिसने नोटबंदी के दौरान यह स्पष्ट कर दिया था कि उसे कभी 20 हजार से अधिक कोई रकम नकद चंदे के रूप में नहीं मिला। यानी उसकी तो तकरीबन सौ फीसद आय अज्ञात स्रोतो से ही रही। ज़रा आंकड़ो पर गौर करिए, बसपा की आमदनी 2004 में 5 करोड़ रूपये थी जो आज की तारीख में 112 करोड़ है। आमदनी में यह इजाफा तकरीबन दो हजार प्रतिशत का है।

चुनाव आय़ोग अब इस छूट के दुरूपयगो पर लगाम लगाने की कोशिश कर रहा है तो इसे स्वागतयोग्य इसलिए भी माना जाना चाहिए क्योंकि अब तक अगर किसी ने 20 हज़ार रूपये से कम का चंदा दिया हो तो उसका नाम गुप्त रखा जा सकता था।

अब इसी वजह से सियासी दल के खाते मोटे होते जाते हैं लेकिन किसने उन्हें यह रकम दी, इसका कोई पता ही नहीं चल पाता। 2014-15 के एडीआर के आंकड़ो ने स्पष्ट किया है भारत के राजनीतिक दलों की आमदनी का करीब 71 फीसद तो इन्ही अज्ञात स्रोतो से हासिल हुआ है।

जो लोग बेनामी रूप से चंदा देते हैं उसके बारे में यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि उन लोगों की यह कमाई या बचत काली कमाई का ही हिस्सा रही होगी। ऐसे में, चुनावी प्रक्रिया में इस काले पैसे को आने का एक लूपहोल बचा हुआ ही दिखता है।

इस छेद को बंद करने के बाद ही चुनावी प्रक्रिया को साफ-सुथरा बनाने की कोशिश को नख-दांत मिलेंगे। असल में, मज़ा तो तब आए, जब ईमानदारी को चुनावी मुद्दा बनाने वाली पार्टियां सबसे पहले चुनावी चंदे में मिली रकमों को नाम के साथ अखबारों या अपने साइट पर प्रकाशित करे।

नकद चुनावी चंदे को 2 हजार रूपये तक सीमित करके केन्द्र सरकार ने एक उम्मीद को नया जन्म दिया है। यह काम ठीक से चला, तो बात ऐसी है कि फिर दूर तलक जाएगी।