Wednesday, January 17, 2018

अब सबको चाहिए हिंदू वोट

नया साल सियासी दलों के लिए अपनी ताकत आजमाने का साल है. इस साल को सियासी दंगल का सेमीफाइनल भी कहा जा सकता है. गुजरात और हिमाचल के बाद राजनीतिक पार्टियां इस साल 8 राज्यों के चुनाव के लिए कमर कस रही हैं.

लेकिन, नया साल भूमिकाएं बदलने का साल भी है. गुजरात में कड़ी टक्कर दे चुकी कांग्रेस ही नहीं, बाकी की पार्टियां सॉफ्ट-हिंदुत्व का दामन थाम रही हैं. एक तरफ तो कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैय्या ही हैं, जिन्होंने जनसभा में कहा कि वे हिंदू हैं. उन्होंने अपने नाम में राम के जुड़े होने का हवाला दिया और कहा कि सिर्फ भाजपा के लोग ही हिंदू नहीं हैं. अब कर्नाटक में मार्च में ही विधानसभा के चुनाव होने हैं. सूबे में करीब 85 फीसदी हिंदू वोटर हैं. इनमें से 20 फीसदी लोग लिंगायत हैं, जो भगवान शिव के उपासक हैं.

दूसरी तरफ, गुजरात में राहुल गांधी के बाइस मंदिरों की पूजा-अर्चना खबरों में रही ही थी. इसका अर्थ यह है कि कांग्रेस अपनी हिंदुत्व विरोधी छवि को तोड़ने की जुगत में लगी है.

याद करिए, जब गो-वध के खिलाफ देश भर में भाजपाईयो ने हवा बनाई तो केरल में युवा कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं ने खुलेआम बछड़े का मांस बनाया और खाया था.

कांग्रेस के लिए यह नुकसानदेह था क्योंकि सेकुलर से सेकुलर हिंदू भी खुले तौर पर बीफ को लेकर कुछ ऐसा कहने से बचता है. यह बात और है कि भाजपा के अपने शासन वाले राज्यों में बीफ को लेकर अलग किस्म की रस्सा-कस्सी है.

असल में, अब सभी पार्टियों की नजर हिंदू वोटरों पर है. गुजरात में, भाजपा मोदी के करिश्मे के बूते सरकार और साख बचाने में कामयाब रही थी. लेकिन मानना होगा कि कांग्रेस ने सॉफ्ट हिंदुत्व अपनाकर कड़ी टक्कर दी. अब इस फॉर्मूले को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस गुजरात में148 राम मंदिरों में पूजा किट बांटने वाली है.

कोई भी दल, यहां तक कि खुद को काफी सेकुलर दिखाने और जताने वाली तृणमूल कांग्रेस भी इस आरोप से बाहर निकलना चाहती है.

पश्चिम बंगाल में पिछले कुछ महीनों में हुए सांप्रदायिक विवादों में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर मुसलमानों के पक्ष में खड़े होने के आरोप लग रहे हैं. दुर्गा पूजा और मुहर्रम के बीच विसर्जन को लेकर विवाद में आरोप लगा कि वह मुस्लिम तुष्टिकरण में जुटी हैं. अब मुकुल रॉय पार्टी छोड़कर भाजपा में जा चुके हैं तो ममता को अपने वोट बैंक साधने की याद आई है.

ऐसे में उन्होंने पहले तो गाय पालने वालों को गाय देने की योजना शुरू की और अब उनके करीब माने जाने वाले अनुब्रत मंडल ने वीरभूम जिले में ब्राह्मण सम्मेलन में आठ हजार ब्राह्रमणों की गीता बांटी. साथ में अलग उपहार भी थे. ममता भी इससे पहले खुद को हिंदू बता ही चुकी हैं.

असल में, इस कवायद के पीछे की वजह जानना कोई रॉकेट साइंस नहीं है. भाजपा ने मुकुल रॉय के पार्टी में आने के बाद से अभी से2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है.

कोलकाता में भाजपा ने एक अल्पसंख्यक सम्मेलन किया था. इस सम्मेलन में अच्छी खासी भीड़ जुटी थी. पिछले तीन महीने में यह भाजपा दूसरा अल्पसंख्यक सम्मेलन था.


इसका मतलब है कि एक तरफ कथित सेकुलर पार्टियां हिंदू वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिए बेचैन हैं तो दूसरी तरफ भाजपा इन वोटरों को अपना मानकर चल रही है और वह 2019 में अपनी मजबूती राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश के अलावा पश्चिम बंगाल जैसे इलाके में भी दिखाना चाह रही है.

आखिर, पश्चिम बंगाल में आज तक भाजपा ने 2 से अधिक लोकसभा सीटें नहीं जीती हैं. बंगाल में वाम मोर्चा बेहद कमजोर स्थिति में है और अगर ममता बनर्जी की टीएमसी कमजोर पड़ती है उस सत्ता-विरोधी रूझान को झपटने के लिए भाजपा खुद को दूसरे विकल्प के तौर पर तैयार करना चाहती है.

पश्चिम बंगाल भाजपा के दफ्तर में सोशल मीडिया के कमरे में पीछे फ्लैक्स बोर्ड पर लगा मिशन 148 हालांकि विधानसभा के लिए तय किया टारगेट है. जो अभी तो शायद दूर की कौड़ी लगे, लेकिन सियासत में कुछ भी अचंभा नहीं होता. आखिर, 2011 के विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में भाजपा को महज 4.5 फीसदी वोट मिले थे. लेकिन लोकसभा में दो सीटों के साथ यह वोट शेयर बढ़कर 16फीसदी हो गया था. 2016 के विधानसभा में, फिर पिछले विधानसभा की तुलना में वोट शेयर बढ़ा था, लेकिन लोकसभा से थोड़ा कम था. यह आंकड़ों में बढोत्तरी और वाम दलों की सुस्ती भाजपा को चुस्ती से घेरेबंदी करने के लिए उत्साहित कर रही है.

बंगाल में भाजपा के पास ले-देकर ढाई चेहरे थे. रूपा गांगुली, दिलीप घोष और राहुल सिन्हा. बाबुल सुप्रियो जरूर आसनसोल से चुनाव जीते हैं लेकिन उनका जनाधार अपने लोकसभा क्षेत्र में भी कुछ खास नहीं है. अब मुकुल रॉय जैसे पुराने नेता को पाले में लाकर भाजपा के लिए राह आसान हुई न हो, लेकिन लड़ने के लिए अब उसके पास एक चेहरा जरूर है.

अब, बंगाल ही क्यों, देश भर में तीन तलाक जैसे मुद्दों पर उदारवादी मुस्लिमों का समर्थन पाकर भाजपा उत्साहित है. लेकिन लोकसभा चुनाव के मद्देनजर देश के पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी इलाकों में छवियां बदलने के खेल की शुरुआत हो चुकी है.

इसके साथ ही शुरुआत हो चुकी है ध्रुवीकरण की भी. इसको आप चाहें तो भूमिकाएं बदलना कह लें, लेकिन उससे अधिक यह बस दूसरे के सुविधा के क्षेत्र में सेंधमारी ही है.

यह समीकरण अगर दस फीसदी भी कारगर होते हैं तो 2019 से पहले, इसी साल के चार बड़े राज्यों और चार छोटे सूबों के चुनावी दंगल के दांव बड़े हो जाएंगे.

Sunday, January 14, 2018

ये जो देश है मेरा

मित्रों, मेरी किताब 'ये जो देश है मेरा' छपकर आ गई है. यह किताब  पांच लंबी रिपोर्ताज का संकलन है. मेरी यह किताब मेरी लंबी यात्राओं का परिणाम है.इनमें बुंदेलखंड, नियामगिरि, सतभाया, कूनो-पालपुर और जंगल महल जैसे हाशिए के इलाकों की कहानियां हैं.

बुंदेलों की धरती बुंदेलखंड को अपनी प्यास बुझाने लायक पानी हासिल हो पाएगा या दशकों लंबा सूखा हमेशा के लिए आत्महत्याओं और पलायन के अंतहीन सिलसिले में बदल जाएगा? 

मध्य प्रदेश के कूनो-पालपुर के जंगलों के सरहदी इलाके में बसा टिकटोली गांव डेढ़ दशक में दोबारा जमीन से उखड़ेगा या बच जाएगा? उड़ीसा का नियामगिरि पहाड़ अपनी उपासक जनजातियों के बीच ही रहेगा या अल्युमिनियम की चादरों में ढल कर मिसाइलों और बमबार जहाजों के रूप में देशों की जंग की भट्ठी में झोंक दिया जाएगा? 
उड़ीसा का ही सतभाया गांव अपनी जादुई कहानियों के साथ समुद्र की गोद में दफ्न हो जाएगा, या उससे पहले ही उसे बचा लिया जाएगा? मैंने इन्ही सवालों के जवाब खोजने की कोशिश की है. कोशिश की है कि इसे दिलचस्प तरीके से लोककथाओं के सूत्र में पिरोकर आप तक पहुंचाया जाए.

आप इसे पढ़कर फीडबैक देंगे तो मेरा उत्साहवर्धन होगा.

दिल्ली के विश्व पुस्तक मेला में किताब के साथ प्रवीण कुमार झा

Wednesday, January 10, 2018

जेल में भी चल रहा है लालू का 'हथुआ राज'

#ठर्राविदठाकुर
(मेरा यह लेख आइचौक.इन में प्रकाशित हो चुका है)

ठंड में सिकुड़ता हुआ मैं अंग्रेजी के आठ की तरह हुआ जा रहा था. फिजां में धूप थी लेकिन देश की व्यवस्था की तरह होते हुए भी नहीं थी. बिलकुल नाकाफी किस्म की धूप. देश की पुलिस की तरह बेअसर.

मैंने देखा, गुड्डू भैया झूमते हुए अपनी देह में सरसों का तेल मल रहे हैं. उनकी तेल पिलाई लाठी बगल में रखी है. मैं भौंचक्का रह गयाः "क्या भिया, इस ठंड में मारपीट की तैयारी?"

"करना नहीं है, सिर्फ दिखाना है. वह भी हम नहीं करेंगे हमारे दोनों नौकर लडेंगे. "

मेरे हैरत की सीमा न रही, "काहे भिया."

गुड्डू मुस्कुराएः "पत्रकार महोदय, फ्रेंडली फाइट का नाम सुना है? चुनाव में होता है. "

मैंने हामी भरी तो गुड्डू ने कहा, कि पड़ोसी के मटर के खेत में उनकी भैंस घुस गई थी. तो अब इसके एवज़ में उनके जेल जाना पड़ रहा है.

मैं समझ गया कि गुड्डू निरे काहिल हैं और उनके जेल प्रवास के दौरान सुविधाओं के लिए अपने सेवकों की जरूरत होगा.

मैंने बस इतना पूछाः "य़ह आइडिया कहां से आया भैय्या? "

गुड्डू लंगोट कसकर योगमुद्रा में विराजमान हो चुके थेः "देखो बे ठाकुर, इस देश में आइडियों की कमी नहीं है. चुराने से लेकर उस चोरी को लॉजिक देने तक. पहले अपराध करो, फिर पकड़े जाओ तो कहो कि मैं अमुक जाति से हूं इसलिए फंसाया जा रहा है. फिर भी सज़ा-वज़ा मिल जाए, तो सेवकों को ले जाओ. यह मैंने अपने नेताओं से सीखा है. एक तर्क यह भी है कि आप दोषी साबित होने पर और दूसरे के छूट जाने पर तर्क दे सकते हैं कि पंडिज्जी को बेल हमको जेल...जैसा लालूजी ने किया. "

"लेकिन वह तो कह रहे हैं कि उनको पिछड़ी जाति का होने की वजह से परेशान किया जा रहा है"...मैंने कहा.

"लेकिन, जब सूबे के मुख्यमंत्री बने तब तो यह तर्क न दिया, जब रेल मंत्री बने और काम की तारीफ बटोरी तब तो यह तर्क न दिया"...गुड्डू खिसियाए से लग रहे थे.

"लेकिन सज़ा सुनाने वाले जज को क्या यह कहना चाहिए था कि ठंड लगती है तो तबला बजाइए! " मैंने पीछे हटना ठीक नहीं समझा.

"आपसी बातचीत को मीडिया में उछालना और उसको मुद्दा बनाना तुम मीडियावालों का काम है. किसने किसको कहां चुम्मा ले लिया, किस खिलाड़ी ने शादी में कितने खर्च किए, देश में ब्याह किया कि इटला जाकर इस पर विमर्श करो तुम लोग...बलिहारी है बे तुम पे. और अब जज साहब ने कह दिया कि लालूजी पशुपालन के एक्सपर्ट हैं तो उसको भी मुद्दा बना लो. अदालत जिसको सज़ा दे उसको शहीद बनाने के काम में लग गए हो. और तो और, जब जेल प्रशासन अभी तक सजायाफ्ता लालू के लिए काम तय नहीं कर पाया है. वहीं उनके जेल पहुंचने से दो घंटे पहले ही उनका रसोइया लक्ष्मण कुमार और सेवक मदन फर्जी केस के जरिए जेल पहुंच गए. अब इसका क्या अर्थ है? पता है, जेल जाने के लिए इन दोनों की ही चुना गया क्योंकि दोनों रांची के ही रहने वाले हैं और लालू के खास विश्वासपात्र हैं. मालिक से पहले सेवक के जेल जाने का यह मसला भी पहली बार नहीं हुआ. पहले भी होटवार जेल में बंद लालू के लिए मदन जेल पहुंच गया था. "

"इस बार तो क्या गजब का आइडिया चुना इन लोगों ने. दोनों ने मारपीट का एक फर्जी मामला गढ़ा. मदन ने पड़ोसी सुमित कुमार को इसके लिए तैयार किया. उसने लक्ष्मण पर मारपीट करके 10 हजार रु. लूटने का आरोप लगाते हुए डोरंडा थाने में शिकायत दर्ज कराई. फटाफट एफआइआर दर्ज हुआ, वकील ने दोनों का आत्मसमर्पण करवाया और जेल भी भेज दिए गए. भाई, जैसे जेल लालूजी गए वैसे सब जाएं. बुढ़ापे का तर्क देते हुए ओपन जेल में रहे, रसोइए से खाना बनवाएं, सारी सुविधाएं भोगे. ऐसा क्यों नही करते कि उनको जेल जाने से माफी ही दे दो. उनकी नेकचलनी के नाम पर! "

"गुड्डू भैया गुस्सा क्यों हो रहे हैं, आखिर वह जनता के सेवक हैं. "

"जनता का सेवक जब राजनीतिक बंदी होता है तब उसे ऐसा सुविधाएं दी जानी चाहिए, आपराधिक कृत्य के लिए नहीं. वित्तीय घोटाला कब से राजनीतिक मसला हो गया जी? "

"देखो बाबू, इस देश में किसी ने आम लोगों को कभी कैटल, कभी मैंगो पीपल कहा था, तब तो बहुत मिर्ची लगी थी तुम्हें. जरा बताओ कि जेल में ठंड क्या सिर्फ चारा घोटाले में सजायाफ्ता पूर्व-मुख्यमंत्री को ही लगती है या दूसरे कैदियों को भी ठंड लगती होगी? जब ठंड सबको लगती है तो सबको बजाने के लिए तबला क्यों नहीं मुहैया कराती सरकार? "

गुड्डू अब रंग में आ चुके थे. मेरे पास खिसक आए और लबनी से ताड़ी का बड़ा घूंट लगाते हुए बोलेः "देखो ठाकुर, आम आदमी हो तो औकात में रहा करो. कभी पुलिस और अदालत में चक्कर में पड़ोगे तब समझ में आएगा. समझे! लालूजी पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तभी अपनी मां को पद के बारे में समझाते हुए कह चुके हैं कि, माई हथुआ राज मिल गईल (मां, हथुआ राज मिल गया) तो समझो कि वह असल में राजा ही हैं. उनकी सुविधा का ख्याल रखना हम सबका परम-पावन और पुनीत कर्तव्य है. जब जेल में शशिकला, शहाबुद्दीन, कनिमोई, ए राजा सबको सुविधा मिल सकती है तो क्या सिर्फ लालू को न मिले क्योंकि वह पिछडी जाति से हैं! धिक्कार है बे तुम पे, धिक्कार है. "

गुड्डू भैया ने मुझ पर धिक्कारों की बौछार कर दी और सारे धिक्कार समेटता हुआ मैं चुपचाप अपनी राह चल दिया.

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Tuesday, January 9, 2018

पंचम दा की याद में

मुझे याद है कि मैं अक्षय कुमार की कोई मसाला फिल्म देख रहा था. शायद खिलाड़ी 786 थी. अक्षय अपनी कन्यामित्र असिन के साथ एक डिस्कोथे में जाते हैं और पंचम दा उर्फ राहुलदेव बर्मन की तस्वीर देखकर नाचने से पहले जूते उतार देते हैं.

पंचम दा को यह सम्मान वाकई पूरा फिल्मोद्योग देता है. वह उसके हकदार भी थे.

फिर याद आते हैं कुछ गाने, जो हममें से हरेक ने कभी न कभी, दोस्तों के कहने पर जबरिया या कभी अकेले में खुद ब खुद गुनगुनाए जरूर होंगे. चिनगारी कोई भड़के, तो सावन उसे बुझाए..यह गाना तो तकरीबन बेसुरे लोग भी गा ही लेते हैं. कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना..यह गाना भी बेहद लोकप्रिय है, और हर पाठक को याद होगा. इसी तरह, पिया अब तो आजा... की तड़कती-फड़कती धुन हर एफएम पर हफ्ते में चार बाज बज ही जाता है.

राहुल कोलकाता में जन्मे थे. इनके बारे में यही कहा जाता है बचपन में जब ये रोते थे तो इनकी रूलाई में संगीत का पांचवां सुर सुनाई देता था और शायद इसीलिए इनको पंचम कहा गया. इनको पंचम पुकारने वाले भी लीजेंड ही थे. अशोक कुमार.

पंचम दा की पीठ पर परंपरा का बक्सा लदा था. पिता सचिन देव बर्मन जैसे नामी-गिरामी संगीतकार थे, जिनकी धुनों में अमूमन त्रिपुरा और बंगाल के किसानों मछुआरों की करूण तान पहचानी जा सकती हैं. एसडी बर्मन की आवाज में भी वो दर्द था, कि जब वो ओ रे मांझी कहकर आलाप लेते, तो कलेजा बिंध जाता. उनमें लोकगीतों का सोंधापन था.

राहुलदेव को अपने पिता की साया से निकलना था. साथ ही, उस विरासत को साथ ले चलना था जो बालीगंज गवर्नमेंट हाई स्कूल कोलकाता से ली थी और बाद में उस्ताद अली अकबर खान से सरोद सिखते वक्त रखा था.

पंचम दा का संगीत देखिए तो उसमें जैज़, हिंदुस्तानी और सुगम का सुखद मिश्रण दिखेगा. आखिर हम में से कितने लोग हैं जिनके दिलों के तार जावेद अख्तर की लिखी और पंचम दा के सुरों में पिरोई, एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा से झनझना न जाते हों.

पिता सचिन देव बर्मन ने बचपन से ही आरडी को संगीत के दांव-पेंच सिखाने शुरू कर दिए थे. वरना, नौ साल का बच्चा क्या संगीत सुरों के पेचो-खम को साधकर धुन तैयार कर सकता है!

पंचम ने किया था.

उनका पहला कंपोजिशन महज नौ साल की उम्र में आया था. गीत था, ”ऐ मेरी टोपी पलट के”. इसे फिल्म “फ़ंटूश” में उनके पिता ने इस्तेमाल किया. छोटी सी ही उम्र में पंचम दा ने “सर जो तेरा चकराये …” की धुन तैयार कर लिया जिसे गुरुदत्त की फ़िल्म “प्यासा” में ले लिया गया.

लेकिन कहा न, जो चुनौती थी पिता के साए से निकलने की, उसे उन्होंने निभाया. उनका संगीत उनके पिता के संगीत से अलहदा था. दोनों की शैली अलग थी. आरडी हिन्दुस्तानी के साथ पाश्चात्य संगीत की मिलावट भी करते थे. तीसरी मंजिल के ओ हसीना जुल्फों वाली जाने जहां से शुरू करिए और शोले के महबूबा होते हुए 1942 अ लव स्टोरी तक आइए. आपको सब दिख जाएगा.

राहुलदेव ने क्या हिंदी क्या बंगला, न्होंने तो तमिल, तेलुगू, मराठी न जाने कितनी भाषाओं में गीतों को संगीतबद्ध किया. करियर की शुरूआत में वह अपने पिता के संगीत सहायक थे.

उनकी खुद की आवाज का जादू तो घलुए (फाव में) में है.

उन्होंने अपने पिता के साथ मिलकर कई सफल संगीत दिए, जिसे बकायदा फिल्मों में प्रयोग किया जाता था.

बतौर संगीतकार आर डी बर्मन की पहली फिल्म 'छोटे नवाब' (1961) थी जबकि पहली सफल फिल्म तीसरी मंजिल (1966) साबित हुई. जिसमें शम्मी कपूर के डांस स्टेप्स कहर बरपा कर रहे थे.

लेकिन असल में एक तिकड़ी थी. राजेश खन्ना, किशोर कुमार और आरडी बर्मन की. इस तिकड़ी ने 70 के दशक में पूरे भारत में धूम मचा दी थी.

इस दौरान सीता और गीता, मेरे जीवन साथी, बांबे टू गोवा, परिचय और जवानी दीवानी जैसी कई फ़िल्मों आईं और उनका संगीत फ़िल्मी दुनिया में छा गया.

सत्तर के दशक की शुरुआत तक आर डी बर्मन भारतीय सिनेमा जगत के एक लोकप्रिय संगीतकार बन गए थे. उन्होंने लता मंगेशकर, आशा भोंसले, मोहम्मद रफी और किशोर कुमार जैसे बड़े कलाकारों से अपने फिल्मों में गाने गवाए. 1970 में उन्होंने छह फिल्मों में अपना संगीत दिया, जिसमें कटी पतंग काफी कामयाब रही.

बाद में, यादों की बारात, हीरा पन्ना, अनामिका जैसी बड़ी कामयाब फिल्में भी राहुल देव के संगीत से सजी.

लेकिन आरडी बर्मन ने संगीत प्रेमियों को जितना दिया, उससे कहीं ज़्यादा देने के काबिल थे. हमें उनसे जो मिला वो तो उनके ख़ज़ाने का छोटा सा हिस्सा था.

असल में, जीनिसय लोगों के साथ ऐसा होता ही है कि गुजरते वक्त के साथ उनकी महत्ता बढ़ती जाती है. इसलिए झनकार बीट से लेकर खिलाड़ी 786 तक अगर फिल्मी दुनिया उनकी श्रद्धा के फूल भेंट कर रही है, तो इसमें हैरत की बात कुछ भी नहीं.

चलते-चलते उनकी संगीतबद्ध फिल्म इजाज़त के गीत की कुछ पंक्तियां आपके लिए, जो शायद उनकी परंपरा में अलहदा किस्म का इजाफा करती हैं,

एक सौ सोलह चांद की रातें,

एक तुम्हारे कांधे का तिल,

गीली मेंहदी की खुशबू,

झूठ-मूठ के शिकवे कुछ.

वो भिजवा दो, मेरा वो सामान लौटा दो.



Monday, December 25, 2017

मधुपुर का तिलक विद्यालय

मधुपुर. अपने कस्बाई खोल से शहरी ढांचे में ढलने के लिए यह शहर ज़रूर छटपटा रहा होगा, लेकिन जो लोग शहरों में रहते हैं, वे ही बता सकते हैं कि महानगरों के जीवन में जो संकीर्णता और भागमभाग होती है, वह अपनी जड़ों की याद दिलाती है. दिलाती रहती है.

हर किसी को अच्छा लगेगा कि उनका शहर आगे बढ़े और तरक्की करे.

लेकिन अगर नगर नियोजन सही हो, तो भी सपनों और हकीकत में फासले कम रखने चाहिए. आखिर हर शहर, क़स्बे और गांव की एक आत्मा होती है. नकल में वह मर जाएगी. आपको अच्छा लगेगा कि आपके शहर के दूसरे मुहल्ले या अपने ही मुहल्ले को लोग आपसे अनजान रहें!

तो एक सवाल यही उठता है कि क्या सब ठीक ठाक है? क्या मधुपुर एक बेहतर शहर के रूप में विकसित हो रहा है? पर इसकी परीक्षा कभी कभी अतीत के उन 'टिप्स' से मालूम हो सकता है जो हमारे महान लोगों ने दिया था. खासकर जो लोग शहर का 'मास्टर प्लान' बनाते हैं, बनाना चाहते हैं या बना रहे हैं.

मुझे नहीं मालूम कि मधुपुर के लोग मधुपुर को कितना बड़ा शहर बनाना चाहते हैं, लेकिन मैं चाहता हूं कि मधुपुर सभी शहरी सुविधाओं से युक्त तो हो लेकिन उतना ही छोटा, उतना ही प्यारा, उतना ही हरा-भरा बना रहे. नदियों में पानी रहे, झरने बहते रहे, लोग प्यारे रहें, कुछ सड़कें कच्ची रहें, धान के खेत रहे, भेड़वा और गोशाला मेला बना रहे...

कुछ दिन पहले भाई रामकृपाल झा ने मधुपुर के इतिहास के बारे में जानने की इच्छा प्रकट की थी. इस विषय पर उमा डॉक्यूमेंटेशन सेंटर के सर्वेसर्वा उत्तम पीयूष ने बहुत काम किया है. लेकिन मैंने अपने स्तर पर जो जानकारी जुटाई है उसे साझा करने की कोशिश कर रहा हूं. अपने पहले के पोस्ट में मैं तिलक विद्यालय के दिनों की चर्चा कर रहा था, वह चर्चा जारी रहेगी और कोशिश करूंगा कि इसी बहाने कुछ इतिहास भी आए.

आपमें से अधिकतर को पता होगा कि अपने कस्बेनुमा शहर में कितनी विशिष्टता थी. सन् 1925 में जब महात्मा गांधी मधुपुर पधारे और उन्होंने तब एक 'राष्ट्रीय शाला '(नेशनल स्कूल) तिलक विद्यालय और नगरपालिका का उद्घाटन किया था. यह बड़ी और ऐतिहासिक घटना है मधुपुर के संदर्भ में. एक ज्ञान और राष्ट्रीयता का अलख जगाने वाले केंद्र और एक शहरी जीवन को सिस्टम देने वाला केंद्र. यह बड़ी बात थी. बड़ा संयोग.

तिलक कला विद्यालय अपने पीछे स्वर्णिम इतिहास लिए खड़ा है. बापू उस दौरान आजादी की लड़ाई के साथ-साथ लोगों में स्वदेशी और खादी अर्थशास्त्र के प्रति भी जागरूकता फैला रहे थे. एक पत्र से इस बात की जानकारी मिली है. इससे पता चलता है कि छात्रों के जरिए सूत कताई को लोकप्रिय बनाने के प्रति वे काफी संजीदा थे. पत्र के अनुसार, बापू आठ अक्टूबर 1934 को पहली बार मधुपुर आए थे. उन्होंने नौ अक्टूबर 1934 को ऐतिहासिक तिलक कला विद्यालय के विषय में पत्र लिखा था. उसमें इस विद्यालय के बारे में जिक्र किया गया है. कहा गया है कि यहां पर राष्ट्रीय शाला का आयोजन किया गया था. वहीं प्रधानाध्यापक ने अभिनंदन पत्र के माध्यम से तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था का जिक्र करते हुए विद्यालय की समस्याओं की ओर उनका ध्यान आकृष्ट किया था.

इसमें कहा गया था कि सूत कताई के कारण विद्यालय में लड़कों की उपस्थिति कम हो रही है. साथ ही लोगों की तरफ से विद्यालय को कम आर्थिक सहायता मिल रही है. कुछ लोगों ने अपने बच्चों को सिर्फ इसलिए हटा लिया है क्योंकि कार्यशाला में सूत कताई का विषय अनिवार्य कर दिया गया है. इस अभिनंदन पत्र में बापू से मुश्किलों से बाहर निकलने का मार्ग पूछा गया था.

बापू का जवाब थाः यदि शिक्षकों को अपने कार्य में श्रद्धा है तो उन्हें निराश नहीं होना चाहिए. सभी संस्थाओं को भले बुरे दिन देखने पड़ते हैं और यह स्वाभाविक ही है. उनकी ये कठिनाई उनकी परीक्षा है. दृढ़ विश्वास के बल पर भीषण तूफान का भी सामना किया जा सकता है. यदि शिक्षकों को पूर्ण विश्वास है कि वे पाठशाला के जरिए आसपास के लोगों को विकास का संदेश दे रहे हैं तो उन्हें बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए. कुछ ही दिनों में उन्हें वहां के अभिभावकों से अनुकूल सहयोग मिलने लगेगा. लेकिन यदि उनके इस कार्य में वहां के लोगों का जल्दी सहयोग नहीं मिले तो उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है. पाठशाला में एक भी छात्र रहे तो उन्हें उसे चलाते रहना है, क्योंकि नए विचार का शुरूआत में लोग विरोध जरूर करते हैं.

सुना है मधुपुर के इस ऐतिहासिक तिलक विद्यालय में महात्मा गांधी और भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ी कई स्मृतियां आज उपेक्षा की वजह से संकट में हैं. आजादी से पहले 1925 से 1942 तक तिलक विद्यालय मधुपुर के स्वतंत्रता सेनानियों की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब अंग्रेजों ने कुछ प्रमुख सेनानियों को कैद करने की कोशिश की थी तो वे लोग भूमिगत हो गए और गुस्से में अंग्रेजों ने विद्यालय के पुस्तकालय को ही जला दिया.

1936 में डॉ राजेंद्र प्रसाद मधुपुर आए थे. यहां उनको आजादी के दीवानों से मुलाकात करनी थी. इसी स्कूल में राजेंद्र बाबू ने एक रात बिताई थी. पुआल का बिछौना लगा और पाकशाला में भोजन बना. बाद में प्रांतीय चुनावों (1937) के वक्त भी राजेंद्र बाबू मधुपुर आए थे.

गांधी जी ने तिलक विद्यालय से जाकर उन्होंने मधुपुर, मधुपुर के कुदरती सौंदर्य और नगरपालिका पर जो कुछ लिखा वह आज भी 'संपूर्ण गांधी वांङमय', खंड- 28 (अगस्त-नवंबर 1925) में सुरक्षित है. आप और हम समझें कि कोई महानायक कैसे छोटी से छोटी लगती बातों पर गौर करते हैं, उसे समझते और लिखकर या बोलकर समझाते हैं. और उसके निहितार्थ आप भी समझें कि आखिर इस छटपटाते से शहर को कैसे विकसित करें. गांधीजी ने मधुपुर के संदर्भ में, नगरपालिका के दायित्व से जुड़ी बातें लिखी थी. क्या ये बातें जो मधुपुर के प्राकृतिक सौंदर्य और स्थानीय स्वशासन से जुड़ी हैं क्या आज भी प्रासंगिक हैं?

उन्होंने कहा था, "हमलोग मधुपुर गए. वहां मुझे एक छोटे से सुंदर नए टाउन हाल का उद्घाटन करने को कहा गया था. मैंने उसका उद्घाटन करते हुए और नगरपालिका को उसका अपना मकान तैयार हो जाने पर मुबारकबाद देते हुए यह आशा व्यक्त की कि वह नगरपालिका मधुपुर को उसकी आबोहवा और उसके आसपास के कुदरती दृश्यों के अनुरूप ही एक सुंदर जगह बना देगी. मुंबई व कलकत्ता जैसे बड़े शहरों को सुधार करने में बडी मुश्किलें पेश आती हैं मगर मधुपुर जैसी छोटी जगहों में भी नगरपालिका की आमदनी बहुत ही थोड़ी होते हुए भी उन्हें अपनी अपनी हद में आने वाले क्षेत्र को साफ सुथरा रखने में मुश्किलों का सामना भी नहीं करना पड़ता."

1925 के बाद शहर, साधन और सुविधाएं काफी बदल गयी है. जनसंख्या का दबाब और शहरीकरण की दिक्कतें भी बढ़ी हैं. नेता भी बदल गए हैं. आज का आक्रामक नेतृत्व क्या यह जानता भी है कि गांधी ने मधुपुर के बारे में क्या कहा था? नगरपालिका के कर्ता-धर्ताओँ ने कभी सोचा भी कि हमें महात्मा गांधी के मधुपुर के संदर्भ में कहे गए विचारों को न केवल वर्तमान 'नगरपर्षद' पर कहीं शिलालेख पर उत्कीर्ण कराना (लिखाना) चाहिए बल्कि उनके विचारों को समझने और अनुकरण करने का भी प्रयास करना चाहिए?

उन्हें न तो समझ होगी, न फुरसत होगी. होती तो करा दिए होते.

तिलक विद्यालय के मजेदार पलो पर पोस्ट अगली दफा.

Wednesday, December 20, 2017

भाजपा के हाथों से खिसक रही गांव की जमीन

गुजरात के चुनाव नतीजों को लेकर न जाने कितनी बातें कहीं जाएंगी. लेकिन नतीजों का रणनीतिक विश्लेषण अभी भी प्रासंगिक होगा क्योंकि अगले साल चार बड़े राज्यों में चुनाव होने हैं और लोकसभा चुनावों में महज अठारह महीने बाकी हैं. इस निगाह से देखें तो गुजरात के ग्रामीण इलाकों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को झटका खाना पड़ा है और उसमें भी सौराष्ट्र क्षेत्र उसके लिए दुःस्वप्न सरीखा ही रहा.

मिसाल के लिए, उत्तरी गुजरात के ग्रामीण इलाकों में जहां 2012 में मोदी की रैलियों के दौरान भारी-भरकम भीड़ जमा हुई थी वहां पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन नहीं किया. गुजरात में करीब दो साल पहले दिसंबर में हुए जिला पंचायत चुनाव में कांग्रेस ने 31 में से 23 सीटों पर भाजपा को शिकस्त दी.

तालुक चुनाव में भी भाजपा के मुकाबले कांग्रेस को अच्छी खासी सीटें मिलीं थीं. इन दोनों चुनाव के नतीजों को 2017 के नतीजों के मिला दें तो ग्रामीण गुजरात में भाजपा की खिसक चुकी जमीन का मसला सच साबित होता है. गुजरात के गांव भाजपा के लिए चुनौती बने और कांग्रेस के लिए गुजरात में वापसी बल्कि यह कहें कि पैर जमाने के मौके के तौर पर आए, और कांग्रेस एक हद तक उसमें कामयाब भी रही.

हालांकि भाजपा ने पूरी कोशिश की थी कि ग्रामीण इलाके में उसका वोट बैंक नहीं टूटे, यदि किसी वजह से इन्हें टूटने से नहीं बचाया जा सके तो कम से कम वोटरों को कांग्रेस की तरफ एकजुट होने से तो रोका ही जाए. भाजपा की यह रणनीति ही बयान कर रही थी कि पार्टी रक्षात्मक मुद्रा में है. आखिर, जीएसटी, गन्ना और मूंगफली के मूल्यों को आखिर पलों में समर्थन देना ऐसा ही कदम था. जरा इलाकावार देखिएः

सौराष्ट्र इलाके में कुल 54 विधानसभा सीटें हैं. 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने यहां 35 सीटें हासिल की थीं, लेकिन इस बार उसे 23 सीटों से संतोष करना पड़ा. पूरे राज्य में सौराष्ट्र ही एकमात्र क्षेत्र रहा जहां भाजपा-कांग्रेस के बीच सीट शेयर का अंतर सकारात्मक से नकारात्मक की तरफ गया. तो इस बदलाव का क्या अर्थ है? क्या सिर्फ भौगोलिक विभाजन या इसके कोई आर्थिक संकेत भी हैं?

निश्चय ही, आर्थिक कारक अधिक मजबूत कारण बने. अब यह बात हर किसी को पता है कि गुजरात के गांवों में भाजपा के जनाधार को चोट पहुंची है. अगर क्षेत्रवार बात करें तो हर क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में मतदाता भाजपा से नाराज दिखा है.

उत्तर गुजरात में करीब 90 फीसदी सीटें ग्रामीण इलाके की हैं, जबकि दक्षिण गुजरात में सिर्फ 50 फीसदी. सौराष्ट्र में 75 फीसदी और मध्य गुजरात में ग्रामीण सीटों की संख्या 63 फीसदी है. जैसी कि उम्मीद थी कांग्रेस ने उत्तर गुजरात और सौराष्ट्र क्षेत्र में भाजपा पर सीटों की संख्या के मामले में बढ़त बना ली. इन दोनों इलाकों में कांग्रेस को क्रमशः 53.1 और 55.56 फीसदी सीटें हासिल हुईं.

दोनों पार्टियों के प्रदर्शन में क्षेत्रवार अंतर की वजहें सीटों की प्रकृति में छिपी हैं. कुछ नहीं, एक आसान सा आंकड़ा स्थिति स्पष्ट कर देता है. राज्य स्तर पर दोनों पार्टियों के बीच सीट शेयरिंग में करीब 12 फीसदी का फासला है. लेकिन इसी आंकड़े को इलाकावार देखें तो इसमें काफी उतार-चढाव भी है. शहरी और ग्रामीण सीटों पर अलग-अलग विश्लेषित करने पर इस अंतर में पर्याप्त कमी आती है.

क्षेत्रवार सीटों का अंतर ग्रामीण इलाकों में कम और शहरी इलाकों में अधिक है. इसका मतलब यह हुआ कि ग्रामीण गुजरात में भाजपा के खिलाफ असंतोष अधिक मुखर था. 2012 में ऐसा नहीं था. ग्रामीण इलाकों में भी भाजपा का प्रदर्शन सौराष्ट्र में कांग्रेस के प्रदर्शन से बेहतर था. तब उसे सौराष्ट्र की 40 ग्रामीण सीटों में से 24 और दक्षिण गुजरात में 15 में से 9 सीटें हासिल हुई थीं. तो इस बार क्या बदल गया?

गुजरात में सौराष्ट्र का इलाका कपास उत्पादक क्षेत्र है. 2012 के बाद से कपास की कीमतें औंदे मुंह गिरी हैं. शायद दक्षिण गुजरात के किसानों को सौराष्ट्र के किसानों जैसी मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ा हो क्योंकि वहां, कपास नहीं गन्ना प्रमुख फसल है. गन्ने के फसल की कीमत मूंगफली या कपास की तरह धड़ाम नहीं हुई थी. ऐसे में दक्षिण गुजरात में कांग्रेस और भाजपा के बीच ग्रामीण इलाकों में मुकाबला बराबरी पर छूटा है.

खैर, गुजरात में तो हाथी भी निकल गया और उसकी पूंछ भी, लेकिन भाजपा के सामने बड़ी चुनौती होगी राजस्थान और मध्य प्रदेश में अपनी सत्ता बचाए रखना. आखिर, गांवों के अपने छीजते जनाधार को बचाए रखन पाने में अगर भाजपा नाकाम रही तो 2019 में अपने बूते बहुमत में आऩा टेढ़ी खीर साबित होगा.



Tuesday, December 19, 2017

मेरा मधुपुरः शिक्षकों के हाफिज सईद थे हेड सर

तिलक कला मध्य विद्यालय सरकारी स्कूल था. जब हमने स्कूल की चौथी कक्षा में एडमिशन लिया था, वह सन् 87' का साल था. देश भर में सूखा पड़ा था. मास्टर साहेब लोग अखबार बांचकर बताते थे कि कोई अल-नीनो प्रभाव है. हमारे पल्ले कुछ नहीं पड़ता था. लेकिन उस अकाल के मद्देनजर सरकार ने यूनिसेफ से प्रायोजित दोपहर का भोजन किस्म की योजना चलाई थी.

हर दोपहर पांचवीं कक्षा के हमारे क्लास टीचर अशोक पत्रलेख पूरी कक्षा में हर बच्चे को कतार में खड़ा कर भिंगोया हुआ चना देते थे. हालांकि, ज्यादातर चना उनके घर में घुघनी (बंगाली में छोले को घुघनी कहते हैं) बनाने के काम आता था.

अशोक पत्रलेख से जुड़ा एक वाक़या हमारे सीनियर पंकज पीयूष ने फेसबुक पर शेयर किया है. पंकज भैया ने मुझे पढ़ाया भी है. वह भी तिलक विद्यालय के छात्र थे. मुझसे करीब एक दशक पहले. उनका दौर था सन् 1979 से 1982 तक. उन दिनों महेंद्र बाबू (अब स्वर्गीय) स्कूल के हेड मास्टर हुआ करते थे. उन दिनों गजानन सर, महानंद सर, अशोक पत्रलेख, विजय सिंह सर के अलावा आरिफ सर और मौलाना सर भी थे. और तब पंकज भैया शायद सातवीं क्लास में थे.

वह याद करते हुए बताते हैं कि उन दिनों यानी सन् 1981 में निर्मल सर और ख़ुशी सर ने हाल-हाल ही में जॉइन किया था. पंकज भैया ने लिखा है, "मुझे याद है कि जिस पूजा के दिन जैसे विश्वकर्मा पूजा, अनंत चतुर्दशी, कर्मा, सरहुल आदि के दिन स्कूल में छुट्टी घोषित नहीं रहती थी, तो क्लास में हाज़िरी बनने के बाद, अशोक सर मुझसे छुट्टी का आवेदन लिखवाकर हर क्लास के 5-5 बच्चों से हस्ताक्षर करवाने भेजते थे और फिर मैं डरते हुए उस आवेदन को लेकर हेड सर के चैम्बर में जाता था. वे मुझे और इस आवेदन को देखकर मुस्कराते हुए जानबूझ कर पूछते थे कि अशोक (सर) ने लिखवाया है?"

हालांकि पंकज भैया इनकार करते थे लेकिन सच तो सबको पता था.

उनके साथियों में यह भरोसा भी था कि स्कूल में छुट्टी जल्दी करानी हो तो दोनों आंख से पलकों के बाल निकाल कर टीचर के जूते में डाल दो... देखना छुट्टी की घंटी बज़ जाएगी,

यह फॉर्मूला कितना सही होता था यह तो पंकज भैया और उनके साथी ही जानें लेकिन एक दशक बाद के छात्रों में, यानी हम लोगों तक आते-आते मासूमियत थोड़ी क्रूरता में बदलने लगी थी. 1989 के दौर के छात्र तिलक विद्यालय के बड़े से अहाते में कभी कभार कबड्डी और अमूमन रबर की गेंद से एक दूसरे को पीटने वाला क्रूर खेल बम-पार्टी खेला करते थे. हमारी पीठ पर गेंदो की मार से निशान और चकत्ते उभर आते. लेकिन वो दाग़ अच्छे थे.

स्कूल के अहाते में यूकेलिप्टस के कई ऊंचे-मोटे पेड़ थे. जिनकी जड़ों के पास दो खोमचे वाले अपना खोमचा लगाते. ये खोमचे वाले भुने चने को कई तरह से स्वादिष्ट बनाकर बेचते. उनके पास मटर के छोले होते, खसिया (आधा उबले चने को नमक मिर्च के साथ धूप में सुखाने के बाद बनाया गया खाद्य) फुचका, जिसे गुपचुप कहा जाता या बाद में जाना कि असली नाम गोलगप्पे हैं. वैसे मधुपुर का गुपचुप लखनऊ में पानी बताशा, मुंबई में पानीपूरी, दिल्ली में गोलगप्पे और कोलकाता में फुचका के नाम से मशहूर है. लेकिन जो स्वाद गुपचुप में था वह इसके किसी और अपररूप में नहीं.

इन्हीं ठेलों पर बिकता था एक बेहद खट्टा नींबू जिसे काले नमक के साथ खाया जाता था. यह मुझे कत्तई पसंद न था. खट्टा खाना मुझे आज भी नापसंद है.

अहाते में कई पेड़ अमड़े के भी थे. अमड़ा जिसे अंग्रेजी में वाइल्ड मैंगो या हॉग प्लम भी कहते हैं. हिंदी में इसको अम्बाडा कहते हैं.

मधुपुर में बांगला भाषा का बहुत असर था, इसलिए हम इसे अमड़ा ही कहते. इसके फूल वसंत की शुरुआत में आते थे. इनके फूल भी हम कचर जाते. हल्का खट्टापन, हल्का मीठापन... सोंधापन फाव में.

अमडा जब फल जाता तो उसकी खट्टी और मीठी चटनी बनाई जाती. यह हमारे स्कूल के आसपास का खाद्य संग्रह था...डार्विन ने अगर शुरुआती मानवों को खाद्यसंग्राहक माना था तो हम उसे पूरी तरह सच साबित कर रहे थे.

लेकिन, इन खाद्यसंग्रहों के बीच पढ़ाई अपने तरीके से चल रही थी...पढ़ाई का तरीका कुछ वैसा ही था जैसा 19वीं सदी की शुरुआत में हुआ करता होगा.

हम लोग हाथों में मध्यावकाश तक पढ़ाई जाने वाली चार किताबें और कॉपियां लेकर स्कूल जाते. बस्ते का तो सवाल ही नहीं था. भोजनावकाश में दौड़कर घर जाते, खाना खाकर, वापस स्कूल लौटने की जल्दी होती.

हम जितनी जल्दी लौटते उतना ही वक्त हमें खेलने के लिए मिलता. लड़कियां इस खाली वक्त में पंचगोट्टा खेलतीं थी. पांच पत्थर के टुकड़े, हथेलियों में उंगलियों के बीच से बाहर निकालने का खास खेल, हम बम पार्टी या कबड्डी खेलते... क्रिकेट के लिए शाम का वक्त सुरक्षित रखा जाता.

इन्हीं में विभिन्न मास्टर साहबों के करतब थे, जिनकी चर्चा अगली पोस्ट में करूंगा. निर्मल सर, खुशी सर, विजय सर से लेकर चंद्रमौलेश्वर सिंह यानी हमारे वक्त के हेड मास्टर साहेब...

वह इन सभी आतंकवादी मास्टरों के सरगना थे. समझिए शिक्षकों के हाफिज सईद.