Tuesday, December 24, 2019

झारखंड में हर बार हारते हैं पदासीन विधानसभा अध्यक्ष

भले ही इसे चुनावी आंकड़ों का अंधविश्वास कहा जाए, पर ट्रेंड है कि झारखंड गठन के बाद से हर बार पीठासीन विधानसभा अध्यक्ष अपना अगला चुनाव हार जाते हैं. इस बार भी निवर्तमान विधानसभा स्पीकर दिनेश उरांव पराजय की कगार पर खड़े हैं

झारखंड में विधानसभा चुनावों के नतीजे आ चुके हैं. आने वाली विधानसभा की तस्वीर भी तकरीबन साफ हो चुकी है कि सूबे की कमान अब झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता हेमंत सोरेन के हाथ ही आएगी. इस पोस्ट के लिखे जाने तक राज्य की 81 सीटों में से 47 पर झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन आगे चल रहा था और भाजपा 24 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है. ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) 3 सीटों पर और बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा (पी) 3 सीटों पर आगे चल रही है. चार पर निर्दलीय या अन्यों की बढ़त है. इन चार अन्य में एक बड़ा नाम सरयू राय का है, जो मुख्यमंत्री रघुबर दास को पटखनी देने की तैयारी में हैं.

लेकिन एक दिलचस्प बात है कि सन् 2000 में झारखंड राज्य के अस्तित्व में आने के बाद से यहां की सियासत में कई उतार-चढ़ाव आए. 10 बार नेतृत्व परिवर्तन हुआ यानी मुख्यमंत्री पद पर बदलाव हुए. लेकिन एक बात हर बार सही होती रही. चुनाव के समय पीठासीन विधानसभा अध्यक्ष अपना अगला चुनाव हारते रहे. ऐसा 2005, 2009 और 2014 में हो चुका है. अब तक सारे पीठासीन विधानसभा अध्यक्ष अपना चुनाव जीतने में नाकाम रहे हैं. इस वक्त तक, सिसई विधानसभा सीट से किस्मत आजमा रहे निवर्तमान विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव करीब 29 हजार मतों से पीछे चल रहे हैं. (आखिरकार पराजित भी हुए)

2005 में झारखंड में विभाजन के बाद पहले चुनाव हुए थे और तब विधानसभा अध्यक्ष के पद पर एम.पी. सिंह बैठे थे. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उन्हें टिकट नहीं दिया था, क्योंकि जमशेदपुर पश्चिम सीट से पार्टी ने सरयू राय को टिकट दे दिया था. एम.पी. सिंह बगावत पर उतर आए और उन्होंने पार्टी छोड़कर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का दामन थाम लिया और उसके टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे. पर उन्होंने चुनाव मैदान में मात खानी पड़ी थी.

इसी तरह, 2009 के चुनाव से पहले विधानसभा अध्यक्ष की कुरसी पर आलमगीर आलम काबिज थे. पर उस चुनाव में कांग्रेस, राजद और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने गठबंधन की बजाए अलग-अलग चुनाव लड़ा था और पाकुड़ सीट से आलमगीर आलम चुनाव हार गए थे. पाकुड़ में झामुमो ने जीत दर्ज की थी. इसी तरह 2014 में झामुमो कांग्रेस और राजद फिर से किसी गठजोड़ के समझौते पर नहीं पहुंच पे थे और तब के स्पीकर शशांक शेखर भोक्ता देवघर जिले की सारठ विधानसभी सीट से चुनाव हार गए.

हालांकि, यह महज एक संयोग हो सकता है पर हर चुनावी हार के पीछे एक तर्क और मजबूत कारण तो होते ही हैं.

बहरहाल, विधानसभा के निवर्तमान अध्यक्ष दिनेश उरांव सिसई सीट से भाजपा उम्मीदवार हैं. इस खबर के लिखे जाने तक दिनेश उरांव को 42,879 वोट मिले थे जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी और झारखंड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार जीगा सुसरन होरो ने 71737 वोट हासिल कर लिए थे. करीब 29 हजार वोटो का यह अंतर इस वक्त पाटना मुश्किल ही लग रहा है.

ऐसे में भले ही पीठासीन विधानसभा अध्यक्ष के चुनावी प्रदर्शन को अंधविश्वास से जोड़ा जाए, पर लगातार चौथी बार आए नतीजे इस बात को पुष्ट ही करते हैं. आखिर, चुनावी नतीजे आंकड़ों के आधार पर ही तो विश्लेषित किए जाते हैं.

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Thursday, December 19, 2019

नदीसूत्रः सोने के कणों वाली नदी स्वर्णरेखा की क्षीण होती जीवनरेखा

स्वर्णरेखा नदी में सोने के कण पाए जाते हैं, पर मिथकों में महाभारत से जुड़ी स्वर्णरेखा की जीवनरेखा क्षीण होती जा रही है. उद्योगों और घरों से निकले अपशिष्ट के साथ खदानों से निकले अयस्कों ने इस नदी के जीवन पर सवालिया निशान लगा दिया है. यह नदी सूखी तो झारखंड, बंगाल और ओडिशा में कई इलाके जलविहीन हो जाएंगे

हर नदी के पास एक कहानी होती है. स्वर्णरेखा नदी के पास भी है. झारखंड की इस नदी को वैसे ही जीवनदायिनी कहा जाता है जैसे हर इलाके में एक न एक नदी कही जाती है. पर झारखंड की यह नदी, अपने नाम के मुताबिक ही सच में सोना उगलती है.

यह किस्सा स्वर्णरेखा के उद्गम के पास के गांव, नगड़ी के पास रानीचुआं के लोकमानस में गहराई से रचा-बसा है कि अज्ञातवास के समय पांडव यहां आकर रहे थे, इसीलिए गांव का नाम पांडु है. खास बात यह है कि स्वर्णरेखा के उद्गम का नाम रानी चुआं इसलिए पड़ा क्योंकि एकबार जब इस निर्जन इलाके में रानी द्रौपदी को प्यास लगी तो अर्जुन ने बाण मारकर इसी स्थल से पानी निकाला था, जो आज भी मौजूद है. समय के साथ नदी का नाम स्वर्णरेखा पड़ गया.

वैसे भी मिथक सच या झूठ के दायरे से वह थोड़े बाहर होते हैं. यह पता नहीं कि पांडु गांव, पांडवों के अज्ञातवास और अर्जुन के बाण से निर्मित रानी चुआं की कहानी कितनी सच है? लेकिन यह मिथक कतई नहीं है कि स्वर्णरेखा झारखंड की गंगा की तरह है और गंगा की तरह ही इसको देखना अब रोमांचकारी कम और निराशाजनक ज्यादा हो गया है.

पर स्वर्णरेखा नदी से सोना निकलता जरूर है, पर यह कोई नहीं जानता कि इसमें सोना आता कहां से है. स्वर्णरेखा नदी में स्वर्णकणों के मिलने के कारण इस क्षेत्र के स्वर्णकारों के लिये इस नदी की खास अहमियत है. किंवदन्ती है कि इस इलाके पर राज करने वाले नागवंशी राजाओं पर जब मुगल शासकों ने आक्रमण किया तो नागवंशी रानी ने अपने स्वर्णाभूषणों को इस नदी में प्रवाहित कर दिया, जिसके तेज धार से आभूषण स्वर्णकणों में बदल गए और आज भी प्रवाहमान है.

आज भी आप जाएं तो नदी में सूप लिए जगह-जगह खड़ी महिलाएं दिख जाएंगी. इलाके के करीब आधा दर्जन गांवों के परिवार इस नदी से निकलने वाले सोने पर निर्भर हैं. कडरूडीह, पुरनानगर, नोढ़ी, तुलसीडीह जैसे गांवों के लोग इस नदी से पीढियों से सोना निकाल रहे हैं. पहले यह काम इन गांवों के पुरुष भी करते थे, लेकिन आमदनी कम होने से पुरुषों ने अन्य कामों का रुख कर लिया, जबकि महिलाएं परिवार को आर्थिक मदद देने के लिए आज भी यही करती हैं.

नदी की रेत से रोज सोना निकालने वाले तो धनवान होने चाहिए? पर ऐसा है नहीं. हालात यही है कि दिनभर सोना छानने वालों के हाथ इतने पैसे भी नहीं आते कि परिवार पाल सकें. नदी से सोना छानने वाली हर महिला एक दिन में करीब एक या दो चावल के दाने के बराबर सोना निकाल लेती है. एक महीने में कुल सोना करीब एक से डेढ़ ग्राम होता है. हर दिन स्थानीय साहूकार महिला से 80 रुपए में एक चावल के बराबर सोना खरीदता है. वह बाजार में इसे करीब 300 रुपए तक में बेचता है. हर महिला सोना बेचकर करीब 5,000 रुपए तक महीने में कमाती है.

395 किलोमीटर लंबी यह बरसाती नदी देश की सबसे छोटी अंतरराज्यीय (कई राज्यों से होकर बहने वाली) नदी है जिसके बेसिन का क्षेत्रफल करीब 19 हजार वर्ग किमी है. यह रांची, सरायकेला-खरसावां, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी मेदिनीपुर (पश्चिम बंगाल) और बालासोर (ओडिशा) से होकर बहती है. पर जानकारों का कहना है कि यह नदी अब सूखने लगी है और इसके उद्गम स्थल पर यह एक नाला होकर रह गई है. जानकारों के मुताबिक, इस नदी में कम होते पानी की वजह से भूजल स्तर भी तेजी से गिरता जा रहा है. काटे जा रहे जंगलों की वजह से मृदा अपरदन भी बढ़ गया है.

हालांकि इस नदी पर बनने वाले चांडिल और इछा बांध का आदिवासियों ने कड़ा विरोध किया और यहां 6 जनवरी, 1979 को हुई पुलिस फायरिंग में चार आदिवासियों ने अपनी जान दे दी. परियोजना चलती रही और 1999 में इस परियोजना पर भ्रष्टाचार की कैग की रिपोर्ट के बाद इसे पूरे होने में 40 साल का समय लगा. परियोजना तो पूरी हुआ लेकिन इसमें चस्पां स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और बिजली मुहैया कराने के वायदे पूरे नहीं हुए.

इस नदी की बेसिन में कई तरह के खनिज हैं. सोने का जिक्र हम कर ही चुके हैं. पर इन सबने नदी की सूरत बिगाड़ दी. खनन और धातु प्रसंस्करण उद्योगों ने नदी को प्रदूषित करना भी शुरू कर दिया है. अब नदी के पानी में घरेलू और औद्योगिक अपशिष्टों के साथ-साथ रेडियोसक्रिय तत्वों की मौजूदगी भी है. खासकर, खुले खदानों से बहकर आए अयस्क इस नदी की सांस घोंट रहे हैं.

ओडिशा के मयूरभंज और सिंहभूम जिलों में देश के तांबा निक्षेप सबसे अधिक हैं. 2016 में किए गिरि व अन्य वैज्ञानिकों के एक अध्ययन के मुताबिक, सुवर्ण रेखा नदी में धात्विक प्रदूषण मौजूद है. अब नदी और इसकी सहायक नदियों में अवैध रेत खनन तेजी पर है. इससे नदी की पारिस्थितिकी खतरे में आ गई है.

इस नदी बेसिन के मध्यवर्ती इलाके में यूरेनियम के निक्षेप है. यूरेनियम खदानों के लिए मशहूर जादूगोड़ा का नाम तो आपने सुना ही होगा. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रेडियोसक्रिय तत्व इस खदान के टेलिंग पॉन्ड से बहकर नदी में आ रहे हैं.

जमशेदपुर शहर, जो इस नदी के बेसिन का सबसे बड़ा शहर है, का सारा सीवेज सीधे नदी में आकर गिरता है. और अब इसके पानी में ऑक्सीजन की मात्रा घटती जा रही है और नदी के पानी में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) तय मानक से अधिक हो गया है, जबकि बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड मानक से कम होना चाहिए. झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने स्वर्णरेखा नदी के पानी के नमूने की जांच कराई तो पता चला कि अधिकतर जगहों पर पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम पाई गई.

स्थिति यह है कि स्वर्णरेखा नदी का पानी जानवरों और मछलियों के लिए सुरक्षित नहीं है. जानवरों और मछलियों के लिए पानी में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड की मात्रा 1.2 मिलीग्राम से कम होनी चाहिए, जबकि 7.0 मिलीग्राम प्रति लीटर तक है. इसकी वजह से काफी संख्या में मछलियां नदी में मर रही हैं इसके साथ ही साथ जानवरों को भी कई तरह की बीमारियां हो रही हैं.

स्वर्णरेखा और खरकई नदियों का संगम, जमशेद पुर के ठीक पास में है और यहां आप लौह अयस्क के कारखानों से निकले स्लग को देख सकते हैं. हालांकि, भाजपा नेता (अब बागी) सरयू राय ने 2011 में इसे लेकर जनहित याचिका दायर की थी, और तब टाटा स्टील ने जवाब में कहा कि यह स्लग शहर की जनता को स्वर्णरेखा की बाढ़ से बचाने के लिए जमा किया गया है. हाइकोर्ट ने टाटा को यह जगह साफ करने को कहा था. हालांकि इस पर हुई कार्रवाई की ताजा खबर नहीं है.

इस इलाके में मौजूद छोटी और बड़ी औद्योगिक इकाइयों, लौह गलन भट्ठियों, कोल वॉशरीज और खदानों ने नदी की दुर्गति कर रखी है.

बहरहाल, खेती, पर्यटन और धार्मिक-आध्यात्मिक केंद्र के नजरिए से सम्भावनाओं से भरे स्वर्णरेखा नदी में उद्गम से लेकर मुहाने तक, इस इलाके में पांडवों से लेकर चुटिया नागपुर के नागवंशी राजाओं से जुड़े मिथकों का प्रभाव कम और हकीकत के अफसाने ज्यादा सुनाई पड़ते हैं. मृत्युशैय्या पर पड़ी जीवनरेखा स्वर्णरेखा की आखिरी सांसों में फंसे अफसाने.

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Wednesday, December 18, 2019

ऋषभ पंत के लिए साल का अंत भला तो सब भला

ऋषभ पंत एक संभावनाओं से भरे खिलाड़ी हैं, पर इस पूरे साल उनके पैर क्रीज पर कंक्रीट में जमे से लगे. आड़ा-तिरछा शॉट चयन और लापरवाही भरा रवैया उनके बल्ले पर जंग लगाता गया. पर अब वेस्टइंडीज के खिलाफ पहले वनडे में पचासा ठोंककर पंत की वापसी की उम्मीदें जागी हैं

यह साल विकेटकीपर-बल्लेबाज ऋषभ पंत के लिए वाकई बेहद बुरा था. ऋषभ पंत एक संभावनाओं से भरे खिलाड़ी हैं, पर इस पूरे साल उनके पैर क्रीज पर कंक्रीट में जमे से लगे. आड़ा-तिरछा शॉट चयन और लापरवाही भरा रवैया उनके बल्ले पर जंग लगाता गया. पर अब वेस्टइंडीज के खिलाफ पहले वनडे में पचासा ठोंककर पंत की वापसी की उम्मीदें जागी हैं. टीम में सम्राट की हैसियत रखने वाले महेंद्र सिंह धोनी की जगह लेने वाले पंत ने वेस्ट इंडीज के खिलाफ खेले गए तीन मैचों की सीरीज के पहले एकदिवसीय मैच में अपने स्वभाव के उलट खेलते हुए अर्धशतक जमाया.

साल की शुरुआत में जनवरी में ऑस्ट्रेलिय़ा के खिलाफ सिडनी टेस्ट का शतक छोड़ दें तो पूरे साल में पंत वनडे क्रिकेट में महज एक अर्धशतक लगा पाए थे. 2019 में पंत ने (वेस्टइंडीज सीरीज से पहले) कुल 9 वनडे मैच खेले थे और इनमें 23.55 की औसत से महज 188 रन बना पाए थे. जबकि 16 टी-20 मैचों में वे 252 रन ही बना पाए थे. टी-20 में 65 के उच्चतम स्कोर के बावजूद उनका औसत महज 21 का था.

जाहिर है, साल के आखिरी समय में पंत ने बताया कि वह स्थिति के मुताबिक खेल सकते हैं. आलोचकों के साथ ही सोशल मीडिया पर लोग लापरवाह रवैये के लिए पंत की काफी आलोचना करते रहे हैं. लेकिन पंत ने इस पारी के बाद कहा कि वह हर दिन अपने खेल में सुधार करने की कोशिश कर रहे हैं.

मैच के बाद पंत ने कहा, "स्वाभाविक खेल जैसा कुछ नहीं होता. हमें स्थिति के हिसाब से खेलना होता है. अगर आप स्थिति के हिसाब से खेलेंगे तो आप अच्छा कर सकते हैं. मेरा ध्यान एक खिलाड़ी के तौर पर बेहतर होने और सुधार करने पर है. आपको अपने आप में विश्वास रखना होता है. मैं सिर्फ इस बात पर ध्यान दे रहा हूं कि मैं क्या कर सकता हूं."

पंत ने जब से सीमित ओवरों में महेंद्र सिंह धोनी का स्थान लिया है तब से उनकी बल्लेबाजी और विकेटकीपिंग के लिए उनकी आलोचना की जाती रही है. पहला वनडे धोनी के दूसरे घर चेन्नै में ही था और इस मैदान पर दर्शकों ने पंत-पंत के नारे लगाए. इसके उलट इससे पहले पंत जब मैदान पर उतरे थे तो धोनी-धोनी के नारे लगे थे.

इस पर पंत ने कहा, "कई बार जब आपको दर्शकों का समर्थन मिलता है तो वो आपके लिए काफी अहम होता है क्योंकि मैं निजी तौर पर बड़ा स्कोर करने की सोच रहा था लेकिन कर नहीं पा रहा था. मैं यह नहीं कह रहा कि मैं उस मुकाम तक पहुंच गया लेकिन मैं कोशिश जरूर कर रहा हूं. एक टीम के नजरिए से, मैं टीम की जीत में जो कर सकता हूं वो करूंगा. मेरा ध्यान इसी पर है और अंत में मैंने कुछ रन किए."

पंत ने बेशक कुछ रन बनाए हैं पर उन्हें अपने नजरिए में सुधार करना होगा. उन्हें उस विरासत का भी खयाल रखना होगा कि जिस जगह को उनके लिए खुद सम्राट धोनी ने खाली किया है, उस पर लोगों की उम्मीद भरी निगाहें जमी हुई हैं.

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Wednesday, December 11, 2019

झारखंड में बाबूलाल मरांडी अभी नहीं तो कभी नहीं

झाविमो के नेता बाबूलाल मरांडी झारखंड के पहले मुख्यमंत्री रहे हैं. भाजपा छोड़ने के बाद उन्हें कुछेक सियासी कामयाबियां जरूर मिलीं पर 2009 के बाद से उन्होंने एक भी चुनाव नहीं जीता है. चार चुनावों में लगातार पराजय का मुंह देख चुके मरांडी के लिए झारखंड विधानसभा का यह चुनाव करो या मरो जैसी स्थिति है


झारखंड (Jharkhand) जब बिहार से अलग हुआ था तो पहले मुख्यमंत्री बने थे बाबूलाल मरांडी (babulal Marandi). तब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) (Bhartiya Janata Party) के वे झारखंड (Jharkhand) के कद्दावर नेता माने जाते थे. पर 2006 में उन्होंने गुटबाजी का आरोप लगाकर पार्टी छोड़ दी और तब से उके सियासी करियर पर ग्रहण लगना शुरू हो गया है. पिछले दस साल से यानी 2009 के बाद बाबूलाल मरांडी (babulal Marandi) कोई चुनाव नहीं जीत पाये हैं.

मरांडी (babulal Marandi) लगातार चार चुनाव हार चुके हैं. उन्होंने अपना आखिरी चुनाव 2009 में जीता था. तब वे कोडरमा से सांसद चुने गये थे. कोडरमा से 2004 और 2006 के उपचुनाव में जीतकर लोकसभा पहुंचे थे. 2014 के लोकसभा चुनाव में वे दुमका चले गये जहां शिबू सोरेन ने उन्हें हरा दिया था.

2014 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने धनवार और गिरिडीह से परचा दाखिल किया था पर दोनों ही जगह से उनको पराजय का मुंह देखना पड़ा था. 2014 के बाद उनकी पार्टी के छह विधायक टूटकर भाजपा (Bhartiya Janata Party) में शामिल हो गए थे. इससे उनकी पार्टी और छवि दोनों को गहरा धक्का लगा था. लगातार चुनाव हारने से भी मरांडी (babulal Marandi) की छवि कमजोर नेता के तौर पर बनती जा रही है और दिखने लगा है कि अब बाबूलाल मरांडी (babulal Marandi) वह नेता नहीं रहे जो झारखंड (Jharkhand) स्थापना के वक्त थे.

2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कोडरमा से फिर से किस्मत आजमाई पर भाजपा (Bhartiya Janata Party) की अन्नपूर्णा देवी ने उन्हें करारी शिकस्त दी थी. और इस बार यानी 2019 के झारखंड विधानसभा चुनाव (Jharkhand Assembly Election) में भी उनके लिए मुकाबला कोई बहुत आसान नहीं है.

झारखंड (Jharkhand) के गिरिडीह जिले के राजधनवार विधानसभा क्षेत्र में इस बार झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी (babulal Marandi) की प्रतिष्ठा दांव पर है. इस सीट पर उन्हें तीन मजबूत उम्मीदवारों से चुनौती मिल रही है. इन चुनौतियों को देखकर सवाल पूछा जा रहा है कि क्या बाबूलाल मरांडी को इस बार चुनावी जीत मिल पाएगी? यहां 12 दिसम्बर को मतदान होना है.

अब बाबूलाल मरांडी के सामने अपने राजनीतिक कद को बरकरार रखने के साथ ही अपनी पार्टी झाविमो का अस्तित्व कायम रखने की भी चुनौती है. इस कारण यहां का मुकाबला दिलचस्प बना हुआ है, जिस पर पूरे राज्य की नजर है.

राजधनवार सीट पर अभी तक जो स्थिति उभरकर सामने आई है, उसके मुताबिक इस बार इस क्षेत्र में मुख्य मुकाबला झाविमो के मरांडी और भाकपा (माले) के मौजूदा विधायक राजकुमार यादव के बीच माना जा रहा है. परंतु भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) (Bhartiya Janata Party) के लक्ष्मण प्रसाद सिंह, निर्दलीय अनूप सौंथालिया और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के निजामुद्दीन अंसारी इस मुकाबले को बहुकोणीय बनाने में पूरा जोर लगाए हुए हैं.

मरांडी को इस इलाके में 2014 के विधानसभा चुनाव (Jharkhand Assembly Election) में हार का सामना करना पड़ा था. भाजपा (Bhartiya Janata Party) ने वर्ष 2014 के तीसरे स्थान पर रहे पूर्व पुलिस अधिकारी लक्ष्मण प्रसाद सिंह को एक बार फिर उम्मीदवार बनाया है, जबकि झामुमो ने निजामुद्दीन अंसारी को अपना प्रत्याशी बनाया है. भाकपा (माले) की ओर से मौजूदा विधायक राजकुमार यादव एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं.

पिछले विधानसभा चुनाव (Jharkhand Assembly Election) में राजकुमार ने मरांडी को 10 हजार से अधिक मतों से पराजित किया था. असल में, राजधनवार ऐसी सीट है, जिस पर जातीय समीकरण को साधना बेहद अहम है. इस सीट पर यादव, मुस्लिम और भूमिहार के मतदाता यहां निर्णायक साबित होते हैं.

इस चुनाव में इस क्षेत्र में कुल 14 प्रत्याशी हैं. लेकिन चुनाव झाविमो, झामुमो, भाजपा, भाकपा (माले) और निर्दलीय अनूप सौंथालिया को ही जानकार प्रमुख उम्मीदवारों में गिन रहे हैं.

क्षेत्र में सभी प्रमुख उम्मीदवारों की पकड़ अलग-अलग क्षेत्रों में है. आइएएनएस के मुताबिक, इस विधानसभा क्षेत्र में गांवा इलाके में भाकपा (माले) के प्रत्याशी की चर्चा अधिक है तो तिसरी में झाविमो, धनवार बाजार और धनवार ग्रामीण में भाजपा, झामुमो और निर्दलीय अनूप सौंथालिया की चर्चा सर्वाधिक है.

झाविमो के प्रत्याशी और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी आइएएनएस से कहते हैं कि "इस क्षेत्र में विकास कार्य पूरी तरह ठप है. आज भी लोग पानी, सड़क, बिजली और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे हैं. ऐसे में जनता सब देख रही है और चुनाव में जवाब देगी."

लेकिन मौजूदा विधायक राजकुमार यादव जीत का दावा करते हैं. उनका कहना है कि पंचायतों और गांवों में किसानों के लिए तालाब बनाए गए हैं और गांवों में बिजली पहुंचाई गई है. सड़कें बनी हैं. उन्होंने हालांकि यह भी माना कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है.

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Monday, November 25, 2019

नदीसूत्रः कहीं गोवा के दूधसागर झरने का दूधिया पानी गंदला लाल न हो जाए

गोवा की नदियों के पारितंत्र पर खनन गतिविधियों ने बुरा असर डाला है. मांडवी और जुआरी जैसी प्रमुख नदियों में लौह अयस्क की गाद जमा होने लगी है इसके इन नदियों की तली में जलीय जीवन पर खतरा पैदा हो गया है


इन दिनों गोवा में अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव की धूम हुआ करती है. मांडवी के किनारे कला अकादमी और और पुराने मेडिकल कॉलेज के पीछे आइनॉक्स थियेटर में गहमागहमी होती है. फिल्मों के बीच थोड़ी छुट्टी लेकर लोगबाग मांडवी के तट पर टहल आते हैं. ज्यादा उत्साही लोग दूधसागर जलप्रपात भी घूमने जाते हैं. दूधसागर जलप्रपात पर ही मांडवी नदी थोड़ा ठहरती है और आगे बढ़ती है. दूधसागर यानी दूध का सागर. इस नाम के पीछे भी एक दिलचस्प किस्सा है.

बहुत पहले, पश्चिमी घाट के बीच एक झील हुआ करती थी जहां एक राजकुमारी अपनी सखियों के साथ रोज स्नान करने आती थी. स्नान के बाद राजकुमारी घड़ा भर दूध पिया करती थी. एक दिन वह झील में अठखेलियां कर ही रही थी, कि वहां से जाते एक नवयुवक की उन पर नजर पड़ गई और वह नौजवान वहीं रुककर नहाती हुई राजकुमारी को देखने लग गया.

अपनी लाज रखने के लिए राजकुमारी की सखियों ने दूध का घड़ा झील में उड़ेल दिया ताकि दूध की परत के पीछे वे खुद को छुपा सकें. कहा जाता है कि तभी से इस जलप्रपात का दूधिया जल अनवरत बह रहा है.

पर अब यह दूधिया पानी लाल रंग पकड़ने लगा है. लौह अयस्क ने मांडवी को जंजीरों में बांधना शुरू कर दिया है. लौह अयस्क का लाल रंग मांडवी के पानी को बदनुमा लाल रंग में बदलने लगा है.

माण्डवी नदी जिसे मांडोवी, महादायी या महादेई या कुछ जगहों पर गोमती नदी भी कहते हैं, मूल रूप से कर्नाटक और गोवा में बहती है. गोवावाले तो इसको गोवा की जीवन रेखा भी कहते हैं. मांडवी और जुआरी, गोवा की दो प्रमुख नदियां हैं. 

लंबाई के लिहाज से मांडवी नदी बहुत प्रभावशाली नहीं कही जा सकती. जिस नदी की कुल लंबाई ही 77 किलोमीटर हो और जिसमें से 29 किलोमीटर का हिस्सा कर्नाटक और 52 किलोमीटर गोवा से होकर बहता हो, आप उत्तर भारत की नदियों से तुलना करें तो यह लंबाई कुछ खास नहीं है. पर व्यापारिक और नौवहन की दृष्टि से यह देश की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक है और यह इसकी ताकत भी है और कमजोरी भी.

इस नदी का उद्गम पश्चिमी घाट के तीस सोतों के एक समूह से होता है जो कर्नाटक के बेलगाम जिले के भीमगढ़ में है. नदी का जलग्रहण क्षेत्र, कर्नाटक में 2,032 वर्ग किमी और गोवा में 1,580 वर्ग किमी का है. दूधसागर प्रपात और वज्रपोहा प्रपात, मांडवी के ही भाग हैं.

गोवा में खनिजों में लौह अयस्क सबसे महत्वपूर्ण हैं और राज्य के राजस्व का बड़ा हिस्सा भी. लेकिन लौह अयस्क के गाद ने राज्य की दोनों प्रमुख नदियों की सांस फुला दी है. गोवा की नदियों पर हुए एक हालिया अध्ययन कहता है कि लौह अयस्क की गाद से दोनों नदियां दिन-ब-दिन उथली होती जा रही हैं. और इसका असर नदियों की तली में रहने वाले जलीय जीवन पर पड़ने लगा है.

गोवा विश्वविद्यालय के सागर विज्ञान विभाग के एक अध्ययन में बात सामने आई है कि राज्य की बिचोलिम लौह और मैगनीज के अयस्कों की वजह से बेहद प्रदूषित है वहीं मांडवी नदी के प्रदूषकों में मूल रूप से लौह और सीसा (लेड) हैं.

बिचोलिम उत्तरी गोवा जिले में बहती है और मांडवी की सहायक नदी है. इस अध्ययन में इस बात पर चिंता जताई गई है कि दक्षिणी गोवा जिले में बहने वाली जुआरी नदी और उसके नदीमुख (एस्चुअरी) पर भी धात्विक प्रदूषण का असर होगा.

गोवा में खनिज उद्योग करीबन पांच दशक पुराना है और 2018 में मार्च में उस पर रोक लग गई थी जब सुप्रीम कोर्ट ने 88 लौह अयस्क खदानों के पट्टों का नवीकरण खारिज कर दिया था. गोवा विश्वविद्यालय के शोधार्थियों सिंथिया गोनकर और विष्णु मत्ता ने गोवा की नदियों और उसकी तली के पारितंत्र पर खनन के असर और जुआरी नदी की एस्चुअरी (जहां नदी समुद्र में मिलती है) पर धात्विक प्रदूषण के बारे में अध्ययन किया है.

यह अध्ययन रिसर्च जरनल इनवायर्नमेंट ऐंड अर्थ साइंसेज में छपा है और इसमें कहा गया है कि उत्तरी गोवा में रफ्तार से हुए खनन की वजह से प्रदूषण बढ़ा है. इस में गोवा की तीन नदियों बिचोलिम, मांडवी और तेरेखोल से नमूने लिए गए था.

अध्ययन के मुताबिक, बिचोलिम नदी में लौह और मैगनीज के साथ सीसे और क्रोमियम का भी प्रदूषण बडे पैमाने पर मौजदू है. इनमें से सीसा और क्रोमियम भारी धातु माना जाता है और इसके असर से कैंसर का खतरा होता है. जबकि मांडवी नदी में मैगनीज और सीसे का प्रदूषण है. तेरेखोल नदी (जो हाल तक प्रदूषण से पूरी तरह मुक्त थी) में तांबे और क्रोमियम (यह भी खतरनाक है) जैसे धातुओं की भारी मात्रा मौजूद है.

गौरतलब है कि इन नदियों में बड़े पैमाने पर जहाजों के जरिए अयस्कों का परिवहन किया जाता है और इससे अयस्क नदी में गिरते रहते हैं. खुले खदानों से बारिश में घुलकर अयस्कों का मलबा भी आकर नदियों में जमा होता है. इससे नदियों की तली में गाद जमा होने गई है और इसने तली के पास रहने वाले या तली में रहने वाले जलीय जीवों का भारी नुक्सान किया है.

अध्ययन के मुताबिक, जुआरी नदी के पानी में ट्रेस मेटल्स (सूक्ष्म धातुओं) की मात्रा खनन के दिनों के मुकाबले खनन पर बंदिश के दौरान में काफी कम रही हैं. इससे साफ है कि यह प्रदूषण खनन की वजह से ही हो रहा है.

मांडवी पर गोवा के लोग उठ खड़े हुए हैं. सरकार भी सक्रिय हुई है और राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने भी आदेश दे दिया है. कोशिश यही होनी चाहिए कि मांडवी का जल गाद में जकड़ न जाए और दूधसागर प्रपात का जल दूधिया ही रहे, गंदला लाल न हो जाए.

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Friday, November 22, 2019

अगर चुंबन निजी काम है तो हगना भी, दोनों खुलेआम कीजिए

यह पोस्ट चुंबन पर है. पर साथ ही पाखाने पर भी है. पर मुझे उम्मीद है आप पढ़ेंगे जरूर. आज दो ऐसी बातों पर लिखना चाहता हूं जो निजी मानी जाती हैं. एक है किस. जिसे आप अपनी सौंदर्यदृष्टि के मुताबिक चुंबन, पुच्ची, चुम्मा आदि नामों से अभिहीत कर सकते हैं. इसमें जब तक सामने वाले को पायरिया न हो, बू नहीं आती.

दूसरा निजी काम बदबूदार है. जिसकी बू आप क्या खाते हैं उस पर निर्भर करती है. वैसे यह निजी काम शुचिता से जुड़ा है पर इस विचार में कई पेच हैं. पर यह शरीर का ऐसा धर्म है जिसका इशारा भी सभ्य समाज में अटपटा माना जाता है. राजा हो या भिखारी, कपड़े खोलकर कोई इंसान जब मलत्याग करने बैठता है तो सभ्यता और सांस्कृतिक विकास की धारणाएं फीकी पड़ जाती हैं.

कम से कम हिंदी में मलत्याग के दैनिक कर्म के लिए सीधे शब्द नहीं है. पाखाना फारसी से आया है, जिसका अर्थ होता है पैर का घर. टट्टी आमफहम हिंदी शब्द है जिसका मतलब है कोई पर्दा या आड़ जो फसल की ठूंठ आदि से बना हो. खुले में शौच जाने को दिशा-मैदान जाना कहते हैं. कुछ लोग फरागत भी कहते हैं जो फारिग होने से बना है. आब को पेश करने से बना पेशाब तो फिर भी सीधा है पर लघु शंका और दीर्घ शंका जैसे शब्द अर्थ कम बताते हैं, संदेह अधिक पैदा करते हैं.

मलत्याग के लिए हगना और चिरकना जैसे शब्द भी हैं, मूलतः ये क्रिया रूप हैं और इनका उपयोग पढ़े-लिखे समाज में करना बुरा माना जाता है. इन शब्दों के साथ घृणा जुड़ी हुई है.

बहरहाल, सोचिएगा इस बात पर कि जिन सरकारी अफसरों और संभ्रांत लोगों को गरीबों की दूसरी समस्याओं से ज्यादा मतलब नहीं होता वे उनके शौचालय बनाने की इतनी चिंता क्यों करते हैं. क्या खुले में शौच जाना रुक जाए तो समाज स्वच्छ हो जाएगा?

छोड़िए, इसी के उलट हम बस इतना ही कहना चाहते हैं कि जिस देश में खजुराहो और कोणार्क की परंपरा रही है वहां किस ऑफ लव का विरोध क्यों? सहमत? चुंबन तो प्रेम का प्रतीक है न. पर खुले में चुंबन लेने से समाज में प्रेम का विस्तार होता है? अगर हां, इस प्रेम को खुलेआम अपने पिता और माता के सामने भी प्रकट करिए. अपनी बहन को भी वही करने की छूट दीजिए जो आप कर रहे हैं और अपने पिता और माती जी को भी. जली? खैर बुरा न मानिए. असल में, मसला दो सभ्यताओं के प्रतीकों का हैं. भारत के हिंदू हो या मुसलमान, जब तक हद दर्जे का और छंटा हुआ क्रांतिकारी न हो तब तक खुलेआम चुंबन को तरजीह नहीं देगा.

खुलेआम चुम्माचाटी को प्रेम का प्रतीक बताते हुए लोग कह रहे हैं कि 'किस' निजी चीज है. बिल्कुल. हम भी तो वही कह रहे हैं. किस निजी चीज है तो हगना भी निजी है. चुंबन के साथ-साथ सार्वजनिक स्थलों पर हगने की भी छूट क्रांतिकारियों को दी जाए.

(अगेन हगना शब्द पढ़े-लिखों को बुरा लग सकता है आप उस हर जगह पर मलत्याग पढ़ें जहां मैंने हगना लिखा है)

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Tuesday, November 19, 2019

मधुपुर मेरा मालगुड़ी है

जेहन में एक धुंधली सी तस्वीर उभरती है-जंगलों से घिरा गांव। वह गांव मधुपुर अभी भी काफी हरा है, पहले तो यहां घने जंगल थे। जंगल भी ऐसा कि सूरज की रोशनी भी छन कर ही आती। महुआ, सखुआ, शीशम, जामुन, कटहल और पीपल बरगद के घने पेड़। पास में बहती नदियां पतरो (पात्रो), अजय, जयंती और कितनी ही जोरिया। जंगल ही जंगल। कहीं-कहीं खेत, कुछ झोपड़ियां, कुछ खपरैल की, कुछ ताड़ के पत्तों से ढंकी, पुआल-माटी के बने मकान। 

मेरा वह मालगुड़ी अब एक कस्बा है बल्कि अपने कस्बाई खोल से शहरी ढांचे में बदलने के लिए छटपटा रहा है। लेकिन मेरे मधुपुर के लोगों को नहीं पता कि मेट्रोपॉलिस जीवन में जो संकीर्णता और भागमभाग होती है, वह बारबार पुराने दिनों की याद दिलाती है।

आज जंगल इतिहास हो गया और गांव जवान शहर। पर इस शहर के बसने, जंगलों के विनाश और एक नए भविष्य की नई इबारत के पीछे बरतानिया हुकूमत का षडयंत्र है। उन्हें दरअसल मधुपुर नहीं बसाना था। मधुपुर तो महज एक गांव था जैसे आज साप्तर है या फागो या कुर्मीडीह। पर अंग्रेज बहादुर जब सन 1855 और 1857 में संताल लड़ाकों और भारतीय फौजियों के विद्रोह से परेशान हो गए और हताशा फैलने लगी तब रेल ब्रिटिश हुकूमत का नया हथियार बन गई। 

ईस्ट इंडिया कंपनी की राजधानी कोलकाता से मुगलों की राजधानी दिल्ली तक रेल की पटरियां बिछने लगी। रेल की पटरियों को मधुपुर से गुजरना था, इसलिए वर्ष 1871 में मधुपुर के जंगल कटने लगे। धड़ाधड़ पेड़ काटे और गिराए जाने लगे और कोलकाता-आसनसोल-चित्तरंजन होते ट्रेन की पटरियां मधुपुर में भी बिछाई जाने लगी। 

अचानक एक गांव हरकत में आ गया। रेलवे कांट्रेक्टर नारायण कुण्डू ने मधुपुर में कैंप कर लिया। बाद में उन्होंने 1885 साल में एक अंग्रेज मि. मोनियर से एक रैयती मौजा ही खरीद लिया। फिर अमडीहा मौजा आदि खरीद कर वे जमींदार की हैसियत पा गए। उन्हीं के नाम पर आज भी मधुपुर में एक मुहल्ला ‘कुण्डू बंग्ला‘ के नाम से विख्यात है। एक बात यह भी है कि कुण्डू को पेट की कोई बीमारी थी, मधुपुर के पानी से उनकी बीमारी जाती रही और बंगाली बाबुओं में यहां बसने का क्रेज हो गया। अन्यथा 1855-1857 के इतिहास में मधुपुर कहीं नजर नहीं आता, जबकि 1857 के सैन्य विद्रोह में पड़ोस के गांव रोहिणी ने अपना नाम स्वर्णाक्षरों से अंकित करा लिया था।

मधुपुर का सौभाग्य है कि महात्मा गांधी मधुपुर पधारे और उन्होंने एक ‘राष्ट्रीय शाला ‘(नेशनल स्कूल), तिलक विद्यालय और नगरपालिका का उद्घाटन किया था। एक ज्ञान और राष्ट्रीयता का अलख जगाने वाले केंद्र और एक शहरी जीवन को सिस्टम देने वाला केंद्र। यह बड़ी बात थी। मैंने पांचवी से सातवीं यानी तीन साल की पढ़ाई उसी स्कूल में की है जिसे आज भी लोग गांधी स्कूल के नाम से जानते हैं। बापू उस दौरान आजादी की लड़ाई के साथ-साथ लोगों में स्वदेशी और खादी अर्थशास्त्र के प्रति भी जागरूकता फैला रहे थे। छात्रों में सूत कताई को लोकप्रिय बनाने के प्रति वे काफी संजीदा थे। 

बापू आठ अक्टूबर 1934 को पहली बार मधुपुर आए थे। उन्होंने नौ अक्टूबर 1934 को ऐतिहासिक तिलक कला विद्यालय के विषय में पत्र लिखा था। उसमें इस विद्यालय के बारे में जिक्र किया गया है। कहा गया है कि यहां पर राष्ट्रीय शाला का आयोजन किया गया था। वहीं प्रधानाध्यापक ने अभिनंदन पत्र के माध्यम से तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था का जिक्र करते हुए विद्यालय की समस्याओं की ओर उनका ध्यान आकृष्ट किया था। कहा गया था कि सूत कताई के कारण विद्यालय में लड़कों की उपस्थिति कम हो रही है। लोगों की तरफ से विद्यालय को कम आर्थिक सहायता मिल रही है। कुछ लोगों ने अपने बच्चों को सिर्फ इसलिए हटा लिया है क्योंकि कार्यशाला में सूत कताई का विषय अनिवार्य कर दिया गया है। इस अभिनंदन पत्र में इन मुश्किलों से बाहर निकलने का मार्ग बापू से पूछा गया था।

बापू का जवाब था कि यदि शिक्षकों को अपने कार्य में श्रद्धा है तो उन्हें निराश नहीं होना चाहिए। सभी संस्थाओं को भले-बुरे दिन देखने पड़ते हैं और यह स्वाभाविक ही है। दृढ़ विश्वास के बल पर भीषण तूफान का भी सामना किया जा सकता है। यदि शिक्षकों को पूर्ण विश्वास है कि वे पाठशाला के जरिए आसपास के लोगों को विकास का संदेश दे रहे हैं तो उन्हें बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए। कुछ ही दिनों में अभिभावकों से अनुकूल सहयोग मिलने लगेगा। लेकिन यदि उनके इस कार्य में वहां के लोगों का जल्दी सहयोग नहीं मिले तो उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है। पाठशाला में एक भी छात्र रहे तब भी उन्हें उसे चलाते रहना है क्योंकि शुरूआत में लोग नए विचार का विरोध जरूर करते हैं।

आजादी से पहले 1925 से 1942 तक तिलक विद्यालय मधुपुर के स्वतंत्रता सेनानियों की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब अंग्रेजों ने कुछ प्रमुख सेनानियों को कैद करने की कोशिश की थी तो वे लोग भूमिगत हो गए और गुस्से में अंग्रेजों ने विद्यालय के पुस्तकालय को ही जला दिया। 1936 में डॉ राजेंद्र प्रसाद मधुपुर आए थे। यहां उनको आजादी के दीवानों से मुलाकात करनी थी। इसी स्कूल में राजेंद्र बाबू ने एक रात बिताई थी। पुआल का बिछौना लगा और पाकशाला में भोजन बना। बाद में प्रांतीय चुनावों (1937) के वक्त भी राजेंद्र बाबू मधुपुर आए थे।

गांधी जी ने तिलक विद्यालय से जाकर मधुपुर के कुदरती सौंदर्य और नगरपालिका पर जो कुछ लिखा, वह ‘संपूर्ण गांधी वांङमय‘, खंड- 28 (अगस्त-नवंबर 1925) में सुरक्षित है। उन्होंने कहा था, ‘‘हमलोग मधुपुर गए। वहां मुझे एक छोटे से सुंदर नए टाउन हाल का उद्घाटन करने को कहा गया था। मैंने उसका उद्घाटन करते हुए और नगरपालिका को उसका अपना मकान तैयार हो जाने पर मुबारकबाद देते हुए यह आशा व्यक्त की थी कि वह नगरपालिका मधुपुर को उसकी आबोहवा और उसके आसपास के कुदरती दृश्यों के अनुरूप ही एक सुंदर माहौल देगी। मुंबई व कलकत्ता जैसे बड़े शहरों में सुधार करने में बडी मुश्किलें पेश आती हैं, मगर मधुपुर जैसी छोटी जगहों में नगरपालिका की आमदनी बहुत ही थोड़ी होते हुए भी उन्हें अपनी सीमा में आने वाले क्षेत्र को साफ सुथरा रखने में मुश्किलों का सामना नहीं करना पडेगा।” लेकिन इधर मैंने सुना है कि मधुपुर के इस ऐतिहासिक तिलक विद्यालय में महात्मा गांधी और भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ी कई स्मृतियां उपेक्षा की वजह से नष्ट हो रही हैं।

1925 की तुलना में आज शहर, साधन और सुविधाएं काफी बदल गई है। जनसंख्या के दबाब और शहरीकरण की दिक्कतें भी बढ़ी हैं। नेता बदल गए हैं। आज का आक्रामक नेतृत्व क्या यह जानता भी है कि गांधी ने मधुपुर के बारे में क्या कहा था? नगरपालिका के कर्ताधर्ताओं ने कभी सोचा भी कि हमें महात्मा गांधी के मधुपुर के संदर्भ में कहे गए विचारों को न केवल वर्तमान ‘नगरपर्षद भवन’ में कहीं शिलालेख पर उत्कीर्ण कराना (लिखाना) चाहिए बल्कि उनके विचारों को समझने और अनुकरण करने का भी प्रयास करना चाहिए? उन्हें न तो समझ होगी, न फुरसत होगी। होती तो करा दिए होते।

मधुपुर में जितने चौक-चौराहे हैं, उन्हें मूर्तियों ने घेर लिया है। मधुपुर के बीच के चौक पर गांधी जी की मूर्ति है। इससे थोड़ा दक्षिण आज का जेपी चैक है। पहले आर्य समाज मंदिर की वजह से यह आर्य समाज चैक कहलाता था। यहां सन् 86 में जेपी की मूर्ति लगा दी गई-आवक्ष प्रतिमा। नीचे नारा भी लिखा है, संपूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है। नारा संगमरमर की पट्टिका पर शब्दों में दर्ज है बस। आम जनमानस में चैक अब भी आर्य समाज का ही है। 

इसके बाद थाना और थाने के आगे एक तिराहा। तिराहे के एक कोने पर लोहिया जी की मूर्ति है। यह भी आवक्ष, संगमरमर की। लोहिया की मूर्ति के नीचे एक और घोषणा, जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करती। इस लिहाज से हमारी कौमें कब की मर चुकी है। हर पांच साल बाद अपनी जाति के लोगों को संसद, विधानसभा भेजकर अपने कलेजे पर दुहत्थड़ मार कर अरण्य रोदन करती रहती है। लोहिया की मूर्ति और विचार दोनों उपेक्षित हैं। वैसे, खुद लोहिया ने भी कहा था कि किसी नेता की मूर्ति उसके मरने के सौ साल बाद ही लगानी चाहिए। सौ साल में इतिहास उसकी प्रासंगिकता का मूल्यांकन खुद कर लेगा। बहरहाल, वह तिराहा अब भी थाना मोड़ ही है।

सड़क के साथ मुड़कर दक्षिण की ओर चलते चलें, तो आधा किलोमीटर बाद ग्लास फैक्ट्री मोड़ आता है। झारखंड आंदोलन के दौरान शहीद हुए आंदोलनकारी निर्मल वर्मा के नाम पर इस चौक पर एक पट्टिका लगा दी गई है। बदलते वक्त में ग्लास फैक्ट्री-जिसमें लैंप के शीशे से लेकर जार और मर्तबान बनते थे, ग्लासें बनतीं थी-बंद हो गई। लोग बड़े पैमाने पर बेरोजगार हो गए, लेकिन ग्लास फैक्ट्री से लोगों का मोह भंग नहीं हुआ। निर्मल वर्मा के नाम पर उस तिराहे को कोई नहीं जानता। वह मोड़ अब भी ग्लास फैक्ट्री मोड़ ही है।

पता नहीं कैसे एक चौराहा जहां भगत सिंह की मूर्ति है उसे भगत सिंह चौक कहा जाने लगा है। भगत सिंह बिरसा की तरह ही मधुपुर की अवाम के मन में बसे हैं। आर्य समाज चौक से दाहिनी तरफ सिनेमा हॉल है-सुमेर चित्र मंदिर। लेकिन उससे पहले एक कोने पर बंगालियों की संस्था तरुण समिति ने सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति लगा दी है। आदमकद प्रतिमा ललकारती-सी लगती है। लेकिन आज की पीढी के लिए बोस की प्रतिमा पर नजर देना भी वक्त की बरबादी लगने लगा है। उधर, आर्य समाज चौक पर ही एक बहुत बड़ा स्कूल है। उसके बोर्ड पर नजर गई तो अजीब लगा। पहले यानी जब हम छात्र रहे थे तब वह स्कूल एडवर्ड जॉर्ज हाई स्कूल था, अब उसे डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी उच्च विद्यालय कर दिया गया है। काश, नाम बदलने की बजाय सरकार स्कूल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर कोई पुस्तकालय शुरु कर देती।

जिस वक्त हम शहर छोड़ गए उस वक्त की यादों और आज के हालात में ज्यादा फर्क नहीं। विकास और तरक्की के नाम पर कुछ फैशनेबल दुकानों और मोबाईल टॉवरों के अलावा मधुपुर में कुछ नहीं जुड़ा। हरियाली कम हो गई है, पानी का संकट खड़ा होने लगा है। हमेशा ताजा पानी मुहैया कराने वाले कुएं सूख चले हैं। बढ़ते शहर में पेड़ों की जगह मकानों ने ले ली है। सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहर में तनाव फैला है, यह तनाव सांप्रदायिक नहीं है, जीवन-शैली का तनाव है। दुखी होने के लिए इतना काफी है।