Tuesday, December 15, 2020

पंचतत्वः गाफिल गोता खावैगा

बारिशें हमेशा चाय-पकौड़े, गीत-गजलें और शायराना अंदाज लेकर नहीं आतीं. कुछ बरसातों में दिल तोड़ने वाली बात भी हुआ करती हैं. नहीं, आप मुझे गलत न समझें. पंचतत्व में रोमांस की बातें मैं अमूमन नहीं करता.

दिल्ली में बैठे पत्रकारों को दिल्ली से परे कुछ नहीं दिखता. किसान आंदोलन से भी सुरसुराहट तभी हुई है जब किसान राजधानी में छाती पर चढ़कर जयकारा लगा रहे हैं. बहरहाल, दिल्ली में बादल छाए हैं और सर्दियों में बरसात हैरत की बात नहीं है. हर साल, पश्चिमी विक्षोभ से ऐसा होता रहता है. पर, खबर यह है कि मुंबई और इसके उपनगरों में पिछले 2 दिनों में हल्की बारिश हुई है और अगले 48 घंटों में और अधिक बारिश होने की उम्मीद है. बारिश को लेकर हम हमेशा उम्मीद लिखते हैं, जबकि हमें यहां सटीक शब्द आशंका या अंदेशा लिखना चाहिए.

बहरहाल, मौसम का मिजाज भांपने वाली निजी एजेंसी स्काइमेट कह रहा है कि लगातार 2 दिनों तक हवा गर्म रहने से मुंबई गर्म हो गया है और दिन का तापमान 36 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला गया, जो सामान्य से लगभग 4 डिग्री सेल्सियस अधिक था. न्यूनतम तापमान भी औसत से 5-6 डिग्री सेल्सियस अधिक चल रहा है.

मुंबई अमूमन दिसंबर से अप्रैल तक सूखा रहता है. दिसंबर, 2017 को छोड़ दीजिए जिसमें सामान्य औसत 1.6 मिमी की सामान्य के मुकाबले 76 मिमी वर्षा हुई थी. वजह था चक्रवात ओखी.

मुंबई की बारिश से मैं आपका ध्यान उन असाधारण मौसमी परिस्थितियों की ओर दिलाना चाहता हूं, जो मॉनसून सिस्टम में बारीकी से आ रहे बदलाव का संकेत है. पिछले साल, यानी 2019 में देशभर में 19 असाधारण मौसमी परिस्थितियां (एक्स्ट्रीम वेदर कंडीशंस) की घटनाएं हुईं, जिनमें डेढ़ हजार से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवा दी. इनमें से साठ फीसद से अधिक जानें मूसलाधार बारिश और बाढ़ की वजह से गईं.

बिहार की मिसाल लें, जहां की जनता ने साबित किया उनको ऐसी मौतों से फर्क नहीं पड़ता, सूबे में 2019 में 11 जुलाई से 2 अक्तूबर के बीच भारी बारिश और बाढ़ से 306 लोग मारे गए. आकाशीय बिजली गिरने से 71 और लू लगने से 292 लोग मारे गए. अब आप पर निर्भर है कि आप उस राज्य के सुशासन पर हंसे या रोएं जहां लू लगने से लगभर तीन सौ लोग मर जाते हों.

पड़ोसी राज्य झारखंड में स्थिति अलग नहीं है. वहां बाढ़ से मरने वालों की गिनती नहीं है क्योंकि राज्य की भौगोलिक स्थिति ऐसी नहीं है कि बाढ़ आए. बहरहाल, आकाशीय बिजली गिरने से 2019 में वहां 125 लोग मारे गए और लू लगने से 13 लोग मारे गए.

महाराष्ट्र का रिकॉर्ड भी इस मामले में बेदाग नहीं है. वहां बाढ़ से 136, बिजली गिरने से 51 और अप्रैल-जून 2019 में लू लगने से 44 लोग जान गंवा बैठे.

भारत सरकार के गृह मंत्रालय के आपदा प्रबंधन महकमे के आंकड़े बताते हैं कि 2013 से 2019 के बीच लू चलने वाले दिनों की संख्या में करीबन 70 फीसद की बढ़ोतरी हुई है. आपने किसी टीवी चैनल पर इसकी चर्चा सुनी है? खैर, वहां तो आप मसीहाओं को देखते-सुनते हैं.

वैसे गौर करने लायक बात यह है कि रेगिस्तानी (क्लीशे) राज्य राजस्थान में बाढ़ और भारी वर्षा में मरने वालों की संख्या 2019 में 80 रही. आकाशीय बिजली गिरने से मरने वालों की संख्या भी 14 रही.

वैसे, आपदा प्रबंधन विभाग ने लू की तरह ही शीत लहर में मरने वालों की संख्या भी बताई है और जिक्र किया है कि 2017 से 2018 के बीच शीत लहर के दिनों की संख्या में भी 69 फीसद की बढ़ोतरी हुई है.

स्थिति असल में चिंताजनक इसलिए है क्योंकि 2014-15 से हर साल असाधारण मौसमी परिस्थितियों की वजह से जान गंवाने वालों की संख्या हर साल बढ़ती ही जा रही है. 2014-15 में मरने वालों की संख्या करीब 1664 थी जो 2018-19 में बढ़कर 2044 हो गई. इन मौसमी परिस्थितियों में सवा लाख मवेशी मारे गए, 15.5 लाख घरों को मुक्सान पहुंचा और 17.09 लाख हेक्टेयर खेती के रकबे में फसलें चौपट हो गईं.

पर, मैं ये आंकड़े किसलिए गिना रहा हूं!

मैं ये आंकड़े इसलिए गिना रहा हूं क्योंकि सरकार को इन कुदरती आपदाओं की परवाह थोड़ी कम है. इस बात की तस्दीक भी मैं कर देता हूं.

भारत सरकार ने 2015-16 में करीब 3,273 करोड़ रुपए असाधारण मौसमी परिस्थितियों से लड़ने के लिए खर्च किया था. 2016-17 में करीब 2,800 करोड़ रुपए हो गया और 2017-18 में और घटकर 15,985.8 करोड़ रुपए रह गया.

2018-19 में संशोधित बजटीय अनुमान बताता है कि ये 37,212 करोड़ रुपए हो गया जो 2019-20 में करीब 29 हजार करोड़ के आसपास रहा.

2018 से 2019 के बीच तूफानों और सूखे को ध्यान में रखें तो बढ़ी हुई रकम का मामला समझ में आ जाएगा. लेकिन हमें समझ लेना चाहिए (2015 से 2017 तक) कि कुदरत के कहर से निबटने के लिए सरकार किस तरह कमर कसकर तैयार है.

तो अगर आपके इलाके में बेमौसम बरसात हो, बिजली कड़के तो पकौड़े तलते हुए पिया मिलन के गीत गाने के उछाह में मत भर जाइए, सोचिए कि पश्चिमी राजस्थान में बारिश क्यों हो रही है, सोचिए कि वहां ठनका क्यों गिर रहा है. कुदरत चेतावनी दे रही है, हम और आप हैं कि समझने को तैयार नहीं हैं.


 


Monday, December 7, 2020

पंचतत्वः मिट्टी की यह देह मिट्टी में मिलेगी या जहर में!

 हम बहुत छोटे थे तब हमने कवि शिवमंगल सिंह सुमन की एक कविता पढ़ी थी

आशा में निश्छल पल जाए, छलना में पड़ कर छल जाए

सूरज दमके तो तप जाए, रजनी ठुमकी तो ढल जाए,

यों तो बच्चों की गुडिया सी, भोली मिट्टी की हस्ती क्या

आँधी आये तो उड़ जाए, पानी बरसे तो गल जाए! 

निर्मम कुम्हार की थापी से

कितने रूपों में कुटी-पिटी,

हर बार बिखेरी गई, किंतु

मिट्टी फिर भी तो नहीं मिटी! 


यह आखिरी पंक्ति ऐसी है जो असलियत नहीं है, बस हमारा विश्वास भर है. हमें हमेशा लगता है कि माटी से बनी हमारी देह माटी में मिल जाएगी. माटी अजर है, अमर है. पर ऐसा है नहीं. 

आज यानी 5 दिसंबर को विश्व मृदा दिवस है. सोचा, आपको याद दिला दूं, काहे कि इसी की वजह से हम हैं. हमारी सारी फूटानी मिट्टी की वजह से है. 

वरना, हमलोग इतने आधुनिक तो हो ही गए हैं कि मिट्टी शरीर से लग जाए तो शरीर गंदा लगने लगता है, कभी हम इसको धूल कहकर दुत्कारते हैं, कभी इसको कूड़ा कहते हैं, कभी बुहारकर फेंकते हैं कभी चुटकियों से झाड़ते हैं.  हमें एक बार उस चीज को लेकर कुदरत का धन्यवाद देना चाहिए कि तमाम तकनीकी ज्ञान के बावजूद हमलोग प्रयोगशाला में मिट्टी नहीं बना सकते.

जैसा मैंने कहा, मिट्टी शाश्वत नहीं है. इसका क्षरण हो रहा है.

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) की 2016 की एक रिपोर्ट कहती है कि देश का 36.7 फीसद या करीबन 12.07 करोड़ हेक्टेयर कृषियोग्य और गैर-कृषि योग्य भूमि विभिन्न किस्म के क्षरण का शिकार है जिसमें से सबसे अधिक नुक्सान जल अपरदन से होता है. जल अपरदन की वजह से मृदा का नुक्सान सबसे अधिक करीब 68 फीसद होता है.

पानी से किए गए क्षरण की वजह से मिट्टी में से जैविक कार्बन, पोषक तत्वों का असंतुलन, इसकी जैव विविधता में कमी और इसका भारी धातुओं और कीटनाशकों के जमा होने से इसमें जहरीले यौगिकों की मात्रा बढ़ जाती है. 

दिल्ली के नेशनल अकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (एनएएएस) का आंकड़ा कहता है कि देश में हर साल करीबन 15.4 टन मिट्टी बर्बाद हो जाती है. इसका सीधा  असर फसलों की पैदावार पर पड़ता है यह कोई कहने की बात नहीं है. 

सवाल ये है कि नाश हुई यह मिट्टी कहां जाती है. कहीं नहीं जाती, नदियों की तली में या बांध-पोखरों-तालाबों की तली मैं बैठ रहती है और इससे हर साल सिंचित इलाके में 1 से 2 फीसद की कमी आती जाती है. बरसात के टाइम में यही बाढ़ का इलाका बढ़ा देती है. एनएएएस का अनुमान है कि जल अपरदन की वजह से 1.34 करोड़ टन के पैदावार की कमी आती है. रुपये-पैसे में कूता जाए तो ये करीबन 206 अरब रुपए के आसपास बैठता है. 

इस शहरीकरण ने मिट्टी में जहर घोलना भी शुरू कर दिया है. जितना अधिक म्युनिसिपल कचरा इधर-उधर असावधानी से फेंका जाता है, उतना ही अधिक जहरीलापन मिट्टी में समाती जाती है. मिसाल के तौर पर, कानपुर के जाजमऊ के एसटीपी की बात लीजिए.

जाजमऊ में चमड़ा शोधन के बहुत सारे संयंत्र लगे हैं. हालांकि, सरकारी और गैर-सरकारी आंकड़ों में कई सौ का फर्क है फिर भी आप दोनों के बीच का एक आंकड़ा 800 स्थिर कर लें. 

तो इन चमड़े के शोधन में क्रोमियम का इस्तेमाल होता है. क्रोमियम भारी धातु है और चमड़े वाले महीन बालों के साथ ये एसटीपी में साफ होने जाता है (अभी कितना जाता है और कितना साफ होता है, इस प्रश्न को एसटीपी में न डालें. उस पर चर्चा बाद में) 

तो साहब, एसटीपी के पॉन्ड में चमड़े की सफाई के बाद वाले बाल कीचड़ की तरह जमा हो जाते हैं और उनकी सफाई करके उनको खुले में सूखने छोड़ दिया जाता है. एसटीपी वालों के कर्तव्यों की इतिश्री हो जाती है. 

गरमियों में वो बाल हवा के साथ उड़कर हर तरफ पहुंचते हैं. बरसात के पानी के साथ क्रोमियम रिसकर भूमिगत जल और मिट्टी में जाता है और फिर बंटाधार हो जाता है. 

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सॉइल साइंस, भोपाल का 2015 का एक अध्ययन बताता है कि देश के कई शहरों में कंपोस्ट में भी भारी धातु की मौजूदगी है. एनपीके उर्वरकों का बेहिसाब इस्तेमाल तो अलग से लेख का विषय है ही. अपने देश की मिट्टी में नाइट्रोजन कम है. एनपीके का अनुपात वैसे 4:2:1 होना चाहिए लेकिन एक अध्ययन के मुताबिक, 1960 में 6.2:4:1 से 2016 में 6.7:2.7:1 हो गया है. खासतौर पर पंजाब और हरियाणा में यह स्थिति और भयावह हो गई है. जहां ये क्रमशः 31.4:8.0:1 और 27.7:6.1:1 है. 

आज के पंचतत्व में आंकड़ों की भरमार है.

पर यकीन मानिए, हर बार किस्सा सुनाना भी मुमकिन नहीं होता. खासकर तब, जब बात माटी की हो. मरने के बाद तो सुपुर्दे-खाक होते समय आदमी चैन से सोना चाहता होगा, अगर वहां भी प्रदूषित और कलुषित माटी से साबका हो, तो रेस्ट इन पीस कहना भी बकैती ही होगी.

Sunday, September 13, 2020

हैप्पी हिंदी डे ड्यूड

हिंदी के साथ कई समस्याएं हैं. पहली समस्या इसके दिवस का मनाया जाना है.

अंग्रेजी भाषा का भी कोई दिवस है इस बारे में मुझे ज्ञात नहीं. हो, तो समझदार लोग ज्ञानवर्धन करें. यह कुछ वैसे ही है जैसे महिला दिवस तो मनाया जाता है पर संभवतया कोई मर्द दिवस नहीं है. एक मतलब यह है कि अपेक्षया कमजोर दिखने वाले के नाम एक दिवस अलॉट कर दो. एनीवे.

हिंदी के साथ दूसरी समस्या यह है कि हिंदी में सामान्य पाठक वर्ग का घनघोर अभाव है. हिंदी में पढ़ते वही हैं जो लिखते हैं यानी लेखक हैं. यानी, या तो साहित्य या राहित्य, जो भी मुमकिन हो लिख डालते हैं.

हिंदी क्षेत्र का सामान्य छात्र हिंदी में लिखे को पढ़ना प्रायः अपमानजनक, या अति अपमानजनक या घोर अपमानजनक मानता है. 

इसको आप पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण की तरह अधिक इंटेंस मानते चलें. वह अंग्रेजी में चेतन भगत पढ़ लेगा पर हिंदी में अज्ञेय, जैनेंद्र या ऐसे ही किसी दूसरे लेखक का नाम सुनकर हंस देगा.

बचे हिंदी के राइटर्स. उनके बच्चे अंग्रेजी स्कूल में पढते हैं (गलत नहीं है अंग्रेजी पढ़ना) अंग्रेजी बोलते हैं (यह भी गलत नहीं) अंग्रेजी से मुहब्बत करते हैं (किसी भी भाषा से मुहब्बत करें गलत नहीं है) पर अपने ही हिंदी में लिखने वाले बाप के लेखन को कुछ तुच्छ-सा, घटिया या दोयम दर्जे का या अत्यधिक शास्त्रीय समझते हैं (हिंदी वाले पिता को चाहिए कि वह अपने ऐसे घातक पुत्रों को जूता सेवन करवाएं, पर भाषा से ज्यादा गाढ़ा पुत्र प्रेम होता है, यह जगसाबित है)

तो स्मार्ट फोन पर पॉर्न वीडियो देखने में ज्यादा दिलचस्पी हिंदी प्रदेश के बालको में है (अन्यों में भी होगी, पर बात हिंदी की हो रही) सो उनका जरा भी मन हिंदी पढ़ने में नहीं लगता. जाहिर है, इतनी देर में आप समझ गए होंगे कि हिंदी से मेरा मतलब महज हिंदी व्याकरण या कविता संग्रह या अभिव्यक्ति की आजादी को सातवे आसमान तक ले जाने वाले उपन्यास से नहीं है. मेरा तात्पर्य हिंदी में लिखे कुछ भी से है. विज्ञान भी, राजनीति भी और इतिहास भी.
पर सामान्य जन का मन हिंदी में लगे भी कैसे? हिंदी में लिखने का मतलब सीधे-सीधे साहित्य वह भी दुरूह भाषा का लगा लिया जाता है.

जो हिंदी में लिखता है वह क्या सिर्फ कविता लिखेगा, या कहानी? या उपन्यास? यह मानिए कि हिंदी में स्तरीय नॉन-फिक्शन खासकर इतिहास, भूगोल, अर्थव्यवस्था, विज्ञान, राजनीति पर लेखन कम होता है. जो होता है उसकी कीमत औसत हिंदी पाठक की जेब से बाहर की होती है. 

एक मिसाल देता हूं, इंडिया टुडे के संपादक अंशुमान तिवारी और पूर्व आइआइएस अफसर अनिंद्य सेनगुप्ता ने एक किताब लिखी. लक्ष्मीनामा. ब्लूम्सबरी ने छापी. हिंदी संस्करण की कीमत थी, 750 रुपए. मुझे बुरी तरह यकीन है कि इतनी महंगी किताब हिंदी का आम पाठक (अगर कोई ऐसा वर्ग है तो) नहीं खरीदेगा. (वैसे मुझे लगता है कि हिंदी में आम क्या, अमरूद, अनानास, केला कोई पाठक नहीं है, जो है सो दस हजार लोगों का एक समूह है.)

एक अन्य बात हिंदी पट्टी के लोगों की मुफ्तखोरी की है. हिंदी वाले जो लोग पढ़ना चाहते हैं, वह खरीदना नहीं चाहते. वह चाहते हैं रिपब्लिक डे परेड या प्रगति मैदान के ट्रेड फेयर के पास की तरह किताब भी उनको मुफ्त में मिल जाए. वह एहसान जताएंः देखो मैंने तुम्हारी किताब पढ़ी.

एक अन्य बड़ी समस्या भाषा की है. हिंदी के ज्यादातर लेखक ऐसी भाषा लिखते हैं (मेरा मतलब दुरूह से ही है) कि सामान्य पाठक सर पकड़कर बैठ जाता है. (ऐसी समस्या अंग्रेजी में नहीं है) हिंदी के विरोधी ज्यादा हैं इसलिए हिंदी में सरल लिखने का आग्रह टीवी और डिजिटल माध्यम में अधिक रहता है. यह आग्रह कई बार दुराग्रह तक चला जाता है.

देश में 3 फीसद अंग्रेजी बोलने वाले लोगों के लिए सामग्री परोसने वाली अंग्रेजी मीडिया में मीडियाकर्मियों की तनख्वाह हिंदी वालों से कर लें तो उड़ने वाले सभी हिंदी पत्रकार भी औकात में आ जाएंगे. अंग्रेजी में फां-फूं करने वाले औसत छात्र भी इंटरव्यू में शीर्ष पर बैठते हैं. बाकी देश में हिंदी की स्थिति क्या है यह वैसे किसी बालक से पूछिएगा जो हिंदी माध्यम से यूपीएससी वगैरह की परीक्षा में बैठता है. वैसे यूपीएससी में हिंदी की हालत जब्बर खलनायक की बांहों में जकड़ी नरम-नाजुक सुकन्या नायिका से अधिक नहीं है.

खैर, शुक्रिया कीजिए हिंदी सिनेमा का कि हिंदी का प्रसार किया. टीवी का भी. बुरा लगेगा पर, हिंदी के प्रसार खासकर, अंग्रजी की अकड़-फूं में रहने वाले सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों के भाषणों में हिंदी लाने का अहम काम नरेंद्र मोदी ने किया है. आप को चुभेगी यह बात पर सच है. (वैसे, यह काम मुलायम ने भी किया था, जब वह रक्षा मंत्री थे)

आखिरी बात, ऊंचे दर्जे के साहित्यकारों ने हिंदी के प्रसार के लिए कुछ भी नहीं किया है. हो सकता है समृद्धि आई हो हिंदी के खजाने में. पर प्रसार तो नहीं हुआ. आजकल नई वाली हिंदी भी है, जिसमें मैं नयापन खोजता रह गया.

बहरहाल, नई हो, पुरानी हो, तमिल, तेलुगू, बंगाली, बिहारी, मैथिली, ओडिया..चाहे जिस भी लहजे में हो, हिंदी हिंदी ही है. रहेगी. हो सकता है अगले 50 साल में हिंदी विलुप्त हो जाए. कम से कम लिपि तो खत्म हो ही जाए. लेकिन तब तक अगर बाजार ने इसे सहारा दिए रखा तो चलती रहेगी, चल पड़ेगी. 

तब तक के लिए हैप्पी हिंडी डे ड्यूड.

Thursday, June 25, 2020

पुस्तक समीक्षाः जन के खिलाफ लामबंद तंत्र का किस्सा है वैधानिक गल्प

यह वक्त, जिसे हम हड़बड़ियों में मुब्तिला लोगों का दौर कह सकते हैं, अधिकतर संजीदा लेखक या अप्रासंगिक होते जा रहे हैं या फिर समयबद्ध क्षरण का, विचारों को लंबे समय तक प्रासंगिक बनाए रखने के लिए उसका दस्तावेजीकरण जरूरी है. वैधानिक गल्प नामक उपन्यासिका इस कोशिश में खड़ी नजर आती है.


जमाना बदल गया है दुनिया के अधिकतर लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं और वहीं अपनी प्रतिबद्धताएं भी जाहिर कर रहे हैं. ऐसे वक्त में अधिकांश नवतुरिया लेखकों के सामने वह लड़ाई भी बची हुई है, जो जरूरी तो है पर सोशल मीडिया का क्षणभंगुर स्वरूप शायद उसको लंबे समय तो तक संजोकर नहीं रख पाए. ऐसे में जब दोनों पक्ष के लेखक अपनी विचारधाराओं की लड़ाई में ट्रोल्स की अवैधानिक भाषा का शिकार होते हैं, चंदन पांडेय वैधानिक गल्प के साथ पेश हैं.

यह वक्त, जिसे हम हड़बड़ियों में मुब्तिला लोगों का दौर कह सकते हैं, अधिकतर संजीदा लेखक या अप्रासंगिक होते जा रहे हैं या फिर समयबद्ध क्षरण का, विचारों को लंबे समय तक प्रासंगिक बनाए रखने के लिए उसका दस्तावेजीकरण जरूरी है. वैधानिक गल्प नामक उपन्यासिका इस कोशिश में खड़ी नजर आती है. 

वैधानिक गल्प का कवर

यह किताब, एक किस्से से शुरू होती है. यह कथा एक मशहूर लेखक के केंद्रीय पात्र उसकी पूर्व प्रेमिका और उसके आदर्शवादी पति की है. उपन्यास की कथाभूमि आज का दौर ही है, जब व्यवस्था का अर्थ पुलिसिया राज है, जब हमारे इर्द-गिर्द एक किस्म का जाल बुना गया है, जिसमें राजनेता हैं, जिसमें कानून है, जिसमें मीडिया भी है. और केंद्रीय पात्र लेखक है, जो खुद अपनी पत्नी के अधिकारी भाई के सामने हीनताबोध से ग्रस्त तो है ही, पर साथ में सुविधाजनक रूप से लिखाई भी कर रहा है. कंफर्ट जोन में रहकर लिखना उसकी नई सुविधा है.

उपन्यासिका के पहले बीसेक पन्नों में हमें लगता है कि चंदन पांडे शायद लव जिहाद की बात कर रहे हैं जिसमें उसकी प्रेमिका एक मुस्लिम शिक्षक से विवाह कर लेती है. फिर, धीरे-धीरे शिक्षा व्यवस्था में बैठे तदर्थवाद की झलक मिलती है, और फिर अगर आप रफीक में सफदर हाशमी की झलक देखते हैं तो क्या ही हैरत!

वैधानिक गल्प वैचारिक भावभूमि पर खड़े होकर किस्से को प्रतिबद्ध तरीके से कहन का तरीका है. वैसे, गुस्ताखी माफ, पर यह किताब आर्टिकल 15 की कतार में है, जिसमें चाहे-अनचाहे एक फिल्म की संभावना संभवतया लेखक ने देखी होगी. अगर इस विषय पर फिल्म बनती है तो यह फिल्म माध्यम के लिए बेहतर ही होगा, क्योंकि वैधानिक गल्प का विषय हमारे वक्त की एक जरूरी बात है. ये और बात है कि इस उपन्यास का अंत, फिल्मी नहीं है और बेहद यथार्थपरक होना किसी निर्देशक को भा जाए, निर्माता के लिए मुफीद नहीं होगा.

पर, पांडेय का शिल्प निश्चित रूप से उनको नवतुरिया और समतुरिया लेखकों की कतार में अलग खड़ा करता है. उनकी भाषा समृद्ध है और वे कहीं से भी अपनी बात थोपते नजर नहीं आते हैं. हां, रफीक की डायरी के गीले पृष्ठों का ब्योरा खटकता जरूर है और थोड़ा बोझिल है, पर वह बेचैन करने वाला हिस्सा है

वैधानिक गल्प मौजूदा वक्त में लिखे जा रहे राजनैतिक कथाओं में प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराती है. लेखक को राजनीति के तहों की जानकारी है और उन्होंने अपनी रचना में इसे बखूबी निभाया भी है.

इस उपन्यास में हिंदू पत्नी और मुस्लिम पति, यानी लव जिहाद का जो शक आपको होता है, उपन्यास के मध्य में जाकर स्थानीय पत्रकार उसे मुद्दा बनाता भी है. पूरी किताब में ऐसी कई सारी घटनाएं हैं जिनसे आपको वास्तविक जीवन में और सियासत में घट रही घटनाओं का आभास मिलेगा. चाहे किसी छात्र का गायब हो जाना हो, चाहे एडहॉक शिक्षकों का मसला हो, चाहे वीडियो को संपादित करके उससे नई साजिशें रचने और किस्से गढ़ने का मसला हो, सड़े-गले तंत्र के बारे में आपको आभास होगा कि वाकई यह सड़ा-गला नहीं है. जन के खिलाफ एक मजबूत तंत्र के लामबंद होने का किस्सा हैः वैधानिक गल्प.

वैधानिक गल्प हमारे समय के यथार्थ को उघाड़कर रख देता है. पर इसके साथ ही अगर वैचारिक भावभूमि की बात की जाए, तो आपको यकीन हो जाएगा कि पांडे की यह किताब खालिस किस्सागोई नहीं है आपको महसूस होगा कि लेखक एक विचारधारा से प्रभावित हैं और यह उपन्यास उसके इर्दे-गिर्द बुनी गई है.

पर उपन्यासकार के तौर पर चंदन पांडे ने कोई हड़बड़ी नहीं बरती है. भाषा और शिल्प के मसले पर बड़े जतन किए गए हैं और वह दिखता भी है. सतही और लोकप्रिय लेखन के दौर में पांडे उम्मीद जगाते हैं और आश्वस्ति प्रदान करते हैं.

वैधानिक गल्प उपन्यास ही नहीं एक दस्तावेज भी है.

किताबः वैधानिक गल्प (उपन्यास)

लेखकः चंदन पांडेय

कीमतः 160 रुपए

प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन

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Tuesday, June 23, 2020

हमलावरो की वजह से पिछले 500 साल में 32 बार नहीं हो पाई है पुरी की रथयात्रा

आखिरकार, कुछ शर्तों के साथ रथयात्रा हुई ही. नहीं होती, तो एक परंपरा टूटती, भक्तों और श्रद्धालुओं को निराशा होती. पर ऐसा नहीं है कि पहले कभी रथयात्रा बाधित न रही हो.

पुरी की रथयात्रा पर बनी पेटिंग सौजन्यः गूगल

श्रीजगन्नाथ मंदिर के इतिहास के अनुसार, पिछले 500 साल में अब तक 32 बार रथयात्रा स्थगित करनी पड़ी है. इसके अलावा, 5 मौके ऐसे भी रहे जब रथयात्रा को ओडिशा में ही पुरी के बाहर आयोजित करना पड़ा.

सेवकों ने चतुर्धा विग्रहों को (श्रीजगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन चक्र) चुपके से बाहर ले जाकर पुरी और खोरदा जिले के गांवों में रथयात्रा आयोजित की थी.

काला पहाड़ के आक्रमण के कारण 1568 से 1577 तक नौ साल तक लगातार रथयात्रा नहीं हुई थी. 1601 में मिर्जा खुर्रम आलम के कारण और 1607 में हाशिम खान के हमले के कारण रथयात्रा का आयोजन नहीं हो सका था. 1611 में मुग़ल सेनापति कल्याण मल के हमले के कारण भी रथयात्रा नहीं हो सकी थी. 

2019 में पुरी की रथयात्रा का विहंगम दृश्य (गूगल)

1622 में मुस्लिम हमलावर अहमद बेग के हमले के कारण भी रथयात्रा रोकनी पड़ी थी. 1692 से लेकर 1704 तक आक्रमणकारी इकराम खान के हमले के कारण 13 साल तक रथयात्रा नहीं हो सकी थी. 1735 में तकी खान के हमले के कारण तीन साल तक रथयात्रा स्थगित रही थी.

जय जगन्नाथ.

Sunday, June 14, 2020

सुशांत सिंह राजपूत की खुदकुशी छोटे शहरों के सपनों के लिए झटका है

जानने वाले कहते हैं सुशांत सिंह राजपूत पूर्णिया के पास मलहारा नाम के किसी छोटी जगह के थे. मुंबई जैसी जगहों में, जहां मुंबई से बाहर की दुनिया बाहरगांव कही जाती है, मलहारा छोड़िए, पूर्णिया भी कम ही लोग जानते हैं. चमकदमक की उस दुनिया में सुशांत सिंह राजपूत पटनावाले कहलाते थे. सवाल यह नहीं है कि सुशांत पटना के थे या पूर्णिया के, महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि छोटे शहरों के प्रतिनिधि के रूप में, जो जाकर मुश्किल से मुश्किल चोटी पर परचम लहरा दे, एक चेहरा और कम हो गया है.

सुशांत सिंह राजपूत उन चेहरों का स्पष्ट प्रतीक थे, जो कुंअर बेचैन की इन पंक्तियों को परदे पर अपने गालों पर पड़ने वाले खूबसूरत गड्ढों और कातिलाना मुस्कान से सजीव करते थे.

दुर्गम वनों और ऊंचे पर्वतों को जीतते हुए,

जब तुम अंतिम ऊंचाई को भी जीत लोगे,

जब तुम्हें लगेगा कि कोई अंतर नहीं बचा अब,

तुममें और उन पत्थरों की कठोरता में,

जिन्हें तुमने जीता है.

सुशांत सिंह राजपूत ने आज खुदकुशी कर ली. फोटोः ट्विटर

पर सुशांत सिंह राजपूत हैं से थे हो गए. फेसबुक पर उनके बारे में जब लिखा तो कई पाठकों ने टिप्पणी की कि काश, कोई 2020 के साल को इस डिलीट कर सकता!

राजपूत ने खुदकुशी की और अमूमन लोग खुदकुशी को कायरों का काम कह रहे हैं.

कुछ साल पहले भारतीय क्रिकेट टीम के विश्वविजयी कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के जीवन पर फिल्म बनी थी तो इन्हीं सुशांत सिंह राजपूत को रूपहले परदे पर धोनी का चेहरा बनाया गया था. चेहरा फिट बैठा था और फिल्म हिट हुई थी. इतिहास में अब जब तक महेंद्र सिंह धोनी का नाम रहेगा, परदे पर सुशांत सिंह राजपूत भी उनके चेहरे के प्रतिनिधि के रूप में जीवित रहेंगे.

सुशांत सिंह राजपूत के साथ दो विडंबनाएं हुईं. पहली, छोटे शहरों से आकर धाक जमाने वाले और दुनिया जीत लेने वाले जज्बे से भरे लोगों के एक प्रतीक पुरुष अगर खुद महेंद्र सिंह धोनी हैं, तो दूसरे प्रतीक खुद सुशांत सिंह राजपूत भी हैं. इसी तरह सुशांत सिंह राजपूत की एक और फिल्म छिछोरे भी आई थी.

फिल्म छिछोरे में वह अपने ऑनस्क्रीन बेटे के लिए प्रेरणा की तरह सामने आते हैं जो अवसाद में है. अपने उस बेटे को अवसाद से निकालने के लिए वह अपने सहपाठियों को खोज निकालते हैं. पर अपने जीवन के अवसाद, क्योंकि इस लेख के लिखे जाने तक कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सुशांत सिंह राजपूत अवसाद में थे, को कम करने के लिए वह कुछ नहीं कर पाए.

क्या सुशांत सिंह राजपूत जैसे फिल्मी नायकों के इस कदर आत्महत्या करने का असर पड़ेगा? हिंदुस्तान जैसी जगह में जहां आगे बढ़ने की राह में तमाम किस्म की दुश्वारियां दरपेश होती हैं, जहां अपनी दसवीं का नतीजा जानने से लेकर ग्रेजुएशन में परीक्षा के लिए फॉर्म भरने तक किसी किरानी की जेब गर्म करनी होती है, जहां चौथी श्रेणी के छोटी-छोटी नौकरियों के लिए पीएचडी जैसी उपाधियां हासिल करने वाले हजारों लोग आवेदन कर देते हैं, जहां नौकरी के लिए हुई परीक्षा में घोटाले और भ्रष्टाचार के मामले नित दिन उजागर होते रहते हैं, वहां हमारे बच्चों को, खासकर छोटे शहरों और गांवो के लोगों को प्रेरणा कहां से मिलेगी?

यह प्रेरणा इन्हीं विजेताओं से आती है, जो कभी धोनी के रूप में, कभी जहीर खान के रूप में, कभी सुशांत सिंह राजपूत के रूप में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हैं. टीवी से शुरुआत करके सीढी-दर-सीढ़ी सिनेमा की संकरी दुनिया में अपनी जगह बनाना और उस में पैर जमाकर अपने लिए अच्छी भूमिकाएं हासिल करना खासी मशक्कत का काम है.

सुशांत सिंह राजपूत ने यह सब किया था. पर, आज उनकी आत्महत्या की घटना से उनको अपना आदर्श मानने वाला एक बड़ा तबका यह जरूर सोचेगा कि क्या इस भीड़ में जगह बनाकर आगे खड़े होने की जद्दोजहद इतनी जानलेवा है?

हो सकता है कि सुशांत सिंह राजपूत की खुदकुशी के पीछे कोई और वजह हो. अवसाद न हो, निजी रिश्ते हों या शायद कोई ऐसा दवाब, जो जाहिर न किए जा सकते हो. पर, नायक होते ही से क्या जिम्मेदारी नहीं बढ़ जाती? भीड़ आपकी भूमिका पर सिर्फ तालियां बजाने नहीं आती, वह आपके किरदार का चोला ओढ़कर फिर अपने गांवो-कस्बों में उसे दूसरों तक ले जाती है.

संभवतया सुशांत सिंह राजपूत ने कुंअर बेचैन की कविता का बाकी आधा हिस्सा नहीं पढ़ा था, पढ़ा होता तो शायद हमारा मुस्कुराता हुआ बांका नायक हमारे बीच होता.

जब तुम अपने मस्तक पर बर्फ़ का पहला तूफ़ान झेलोगे,

और कांपोगे नहीं...

जब तुम पाओगे कि कोई फ़र्क नहीं

सब कुछ जीत लेने में..

और अंत तक हिम्मत न हारने में.

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Saturday, May 30, 2020

लॉकडाउन ढीला हो रहा है, पूजास्थलों में अब खैरियत मांगने का वक्त है

लॉकडाउन अब डाउन हो रहा है. कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं, पर लॉकडाउन से सरकार का मन भर गया है. 

भैया, सरकार ने कोशिश की. सरकार ने कोशिश की कि ढाई महीने का लॉकडाउन लगाकर कोरोना के प्रसार को रोका जाए. अब नहीं रुका तो क्या किया जाए? मुझसे आप कहेंगे कि ठाकुर, नाम तुम्हारा मंजीत है, तो मंजीत बावा की तरह पेंटिग करके दिखाओ. हमने भी ट्राई किया था, पर

पेंटिंग पूरी हुई तो लगा किसी ने कैनवास पर पान खाकर पीक कर दिया हो. पर सचाई यह है कि मैंने कोशिश की थी. मेरी कोशिश पर किसी को कोई शक नहीं हो सकता. यह बात और है कि मुझे कूची पकड़नी नहीं आती थी. जैसे, मुझे यह भी नहीं पता था तैल रंग पानी में नहीं घुलते, उसी तरह शायद सरकार को लॉकडाउन जैसी हालत में व्यवस्था करना नहीं आता था.
टेस्ट होंगे या नहीं, कितने होंगे. किट कहां से आएगी. चीन वाली नहीं, जापान वाली, जर्मनी वाली. आइसीएमआर ने तो इतनी बार गाइडलाइन बदले कि जीएसटी की गाइडलाइनें याद आ गईं. कसम कलकत्ते की, आंखें गीली हो गई. हाय रे मेरा जीएसटी, कैसा है रे तू....लॉकडाउन में किधर फंस गया रे तू...
ट्रेन चलेगी, या नहीं चलेगी. किराया लिया जाएगा या नहीं लिया जाएगा. राज्य कितना देंगे. मजदूर कितना देंगे. देंगे कि नहीं देंगे...इतनी गलतफहमी तो सरकार में होनी ही चाहिए. भाई, सरकार है कोई ठट्ठा थोड़ी है.
दारू बेचकर राजस्व कमाने का आइडिया तो अद्भुत था. मतलब बेमिसाल. भाई आया, पर देर से आया. लोगबाग फालतूफंड में छाती पीटते रहे मजदूर-मजदूर. भाई मजदूर तो मजदूर है, कोई कनिका कपूर थोड़ी हैं कि पांच बार टेस्ट कराया जाए?
मजदूरों का क्या है, सरकार क्या करे. गए क्यों थे भाई? मुंबई, नासिक, सूरत क्यों गए थे? सरकार ने निमंत्रण पत्र भिजवाया था क्या? फिर गए क्यों... गए तो वहीं रहो. देशहित में काम करो, थोड़ा पैदल चलो. देश के लिए जान कुर्बान करने वालो. थोड़ा पैदल ही चलकर जान दो.
अच्छा ये बताइए, सरकार शुरू से रेल चला देती, बस चला देती, तो देश को ज्योति की कहानी कैसे पता चलती? कैसे पता लगता कि देश में पिता को ढोकर गांव तक 1200 किमी साइकिल चलाने वाली लड़की की दास्तान? लॉकडाउन की वजह से ही न.
यह लॉकडाउन नहीं था, यह राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा थी.
मैं सिर्फ केंद्र सरकार की तारीफ नहीं कर रहा, मेरी तारीफ के ज़द में राज्य सरकारें भी हैं, जो अपने पूरे राज्य में खून पसीना बहाने वाले कुछेक लाख मजदूरों को दो जून खाना खिलाने लायक नहीं है. अब नेता कोई अपनी अंटी से तो निकाल कर नहीं देगा न. क्यों देगा भला! 

और सरकार को कलदार खर्च करने होंगे तो उसके लिए तमाम खर्चे हैं भाई. विधायकों के लिए स्कॉर्पियो खरीदना है, मंत्रियों के लिए हेलिकॉप्टर जुगाड़ना है, अपनी सरकार की उपलब्धियों को अखबार में भरना है. उस पैसे को दो टके के मजदूरों के लिए खर्चना कोई बुद्धिमानी थोड़ी है!
तो महाराज, 8 जून से खुलेंगे मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे-गिरजे. वहां जाकर टेकिए मत्था. अपने और अपने परिवार के लिए कुशलक्षेम की प्रार्थना कीजिए. सरकार को जो करना था कर लिया. जहान डूब चुका है, अब जान जाने की बारी है.