मुझे शक है कि यह सुनियोजित राजनैतिक कदम है. जिसमें ममता खुद को बलिदान करता हुआ दिखा रही हैं. अब अगर, ममता पर कोई कार्रवाई य कार्यवाही होती है तो शहीद की भूमिका ओढ़ने में उन्हें जरा भी वक्त नहीं लगेगा. आखिर, पैर पर प्लास्टर बांधकर और माथा फुड़वाकर बहते खून की धार के साथ चुनावी अभियान को नई शक्ल देनी वाली ममता इतनी सरल राजनीतिज्ञ तो नहीं.
हम और आप होते तो फूटे कपार को पहले रूमाल से पोंछते—और ममता के लिए रुमाल तो क्या धोती तक उपलब्ध हो जाती—और तब ही प्राथमिक चिकित्सा के लिए अस्पताल जाते. यह मिसाल इसलिए क्योंकि ममता छोटी बात को तूल देकर उसे ‘हूल’ में बदल देने की क्षमता वाली नेता हैं.
अगर टीएमसी के एक बड़े धड़े ने एनडीए को समर्थन देने की बात की है या ऐसा रुख दिखा रहे हैं, तो समझिए उनको बचाने की जद्दोजहद है.
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कुछ नेताओं और जनप्रतिनिधियों के रुख में जो बदलाव देखने को मिला है, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह सिर्फ राजनीतिक अवसरवाद है, या इसके पीछे कोई गहरी चिंता भी काम कर रही है.
इस पर ध्यान देना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बंगाल में कटमनी, तोलाबाजी और स्थानीय स्तर पर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर जनता का गुस्सा लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है और स्थानीय टीएमसी नेताओं की पिटाई से लेकर सर मूंडकर सड़क पर दौड़ाने तक के वीडियो सामने आ रहे हैं.
मैं दोहरा रहा हूं आंखों में काबा वाली सयोनी घोष से लेकर कित-कित-कित वाले कल्याण बनर्जी तक अचानक ममता के विरोधी हो गए, यह बात कम से कम मुझे पच नहीं रही है.
पार्टी के भीतर मचे इस 'महा-विखंडन' को महज एक राजनीतिक असंतोष कहना वास्तविकता को नजरअंदाज करना होगा. यह दरअसल अस्तित्व बचाने की वह जद्दोजहद है, जहाँ नेता अपनी विचारधारा से अधिक अपनी 'सुरक्षा' को प्राथमिकता दे रहे हैं.
इस विद्रोह का नेतृत्व चार बार की सांसद काकोली घोष दस्तीदार और शताब्दी रॉय जैसी वरिष्ठ नेता कर रही हैं, जो सीधे तौर पर संकेत देता है कि यह कोई छिटपुट असंतोष नहीं, बल्कि एक सुनियोजित पलायन है.
सत्ता परिवर्तन के बाद पाला बदलने वाले नेताओं की मंशा को समझना कठिन नहीं है. राजनीति के जानकार मानते हैं कि बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद, राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' नीति और 'बुलडोजर संस्कृति' (जो देश के अन्य हिस्सों में देखी गई है) के डर ने इन नेताओं को एनडीए के सुरक्षा घेरे में जाने के लिए मजबूर कर दिया है. इसे आप अपनी गर्दन बचाने के लिए पहना गया 'सुरक्षित कवच' कह सकते हैं.
आपके मन में सहज प्रश्न उठेगा कि ये लोग सीधे भाजपा में क्यों नहीं शामिल हो गए? आपको याद हो कि बंगाल भाजपा में नए नेताओं की भर्ती पर रोक लगा दी गई है. दूसरी तरफ, वॉशिंग मशीन वाली बात इतनी दफा कही जा चुकी है कि खुद भाजपा में जाने में इन्हें शर्म आ रही होगी और भाजपा वालों को इनको शामिल करने में. तीसरी और मार्के की बात है कि टीएमसी का यह धड़ा अपनी बार्गेनिंग पावर बनाए रखना चाहता है.
एनडीए में शामिल होकर टीएमसी के इस धड़े को कुछ न कुछ तो मिलता रहेगा. पार्टी में शामिल होने पर वैचारिक रूप से ‘हृदये मदीना’ और कित-कित भूल जाना होगा. भाजपा का नफा यह है कि राज्यसभा में शक्ति बढ़ेगी, राष्ट्रपति चुनाव आने वाले हैं उसमें किसी विशेष व्यक्ति के राष्ट्रपति चुने जाने के लिए जरूरी संख्याबल मिलेगा और हां, नीतीश और नायडू की बार्गेनिंग पावर को कम किया जा सकेगा.
तो, हृदय परिवर्तन सिर्फ गांधी के टाइम होते थे. अब सिर्फ स्टांस चेंज होता है. टीएमसी वालों का ये मूव सिर्फ कॉलगेट का सुरक्षा चक्र है. ममता शहीद के भाव में आएंगी और बंगाल के लोगों के ममत्व को अपने पाले में वापस लाने के लिए पहले एफआइआर के बाद सड़क पर आएंगी. आखिर जेपी की कार की बोनट पर कूद कर डांस करने वाली और भरी संसद में सपा सांसद दारोगा प्रसाद सरोज का गट्टा (कॉलर) पकड़ लेने वाली ममता दी अभी अपनी कला भूली तो नहीं होंगी.
सलमान काला हिरण खान की फिल्म सुल्तान का वह संवाद तो याद ही होगा आपकोः मैंणे पैलवाणी छोड्डी है, लड़ना नीं भूल्या.
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