परंपराओं के लिहाज से, कम से कम तीन ऐसे अचूक टेस्ट हैं जिनसे आप भूत को पहचान सकते हैं. सबसे पहले, भूतों की कोई परछाई नहीं होती. मतलब यह कि तेज धूप या रोशनी में भी भूतों का साया नहीं बनता. इसी बात पर एकठो शेर याद आ रहा है, जिसे सवा सेर एक्टर-डायरेक्टर गुरुदत्त ने फिल्म 'प्यासा' में माला सिन्हा को देखते हुए कहा थाः जो मैं चलूं तो साया भी अपना साथ न दे...
जलील मानिकपुरी का है शायद, इच्छा हो तो कमेंट में इस शेर को पूरा कर दें. बहरहाल, दत्त साहब भूत नहीं थे, भले ही 'साया' उनके साथ नहीं था. पर 'प्रॉपर भूतों' की परछाईं नहीं बनती.
दूसरी बात, भूत अपने आसपास हर अल्लम-गल्लम चीज बर्दाश्त कर सकता है, लेकिन जलती हुई हल्दी की गंध नहीं बर्दाश्त कर सकता. भारत और दुनिया के कई हिस्सों में हल्दी से भूत भगाए जाते हैं.
तीसरी बात, एक जेनुइन भूत हमेशा नकिया कर बोलता है. हो सकता है इसी वजह से मध्ययुगीन नाटकों और आधुनिक अंग्रेजी में 'बकवास' के लिए 'पिशाच भाषा' (लैंग्वेज ऑफ गॉब्लिन) शब्द का इस्तेमाल किया जाता है.
कुछ भूतों का गला सुई जितना पतला होता है, लेकिन वे एक बार में कई गैलन पानी पी सकते हैं. मादा भूतों (सॉरी दैनिक भास्कर, आप फीमेल टीचर लिखते हैं इसीलिए मैंने मादा भूत लिखा है, वरना फीमेल टीचर को 'शिक्षिका' और मादा भूत को 'भूतनी' कहा जाता है). हां, तो मादा भूतों, ओह भूतनियों का एक प्रकार होता है, चुड़ैल और चुड़ैलों के के पैर पीछे की ओर मुड़े होते हैं.
कुछ भूतों का गला सुई जितना पतला होता है, लेकिन वे एक बार में कई गैलन पानी पी सकते हैं. मादा भूतों (सॉरी दैनिक भास्कर, आप फीमेल टीचर लिखते हैं इसीलिए मैंने मादा भूत लिखा है, वरना फीमेल टीचर को 'शिक्षिका' और मादा भूत को 'भूतनी' कहा जाता है). हां, तो मादा भूतों, ओह भूतनियों का एक प्रकार होता है, चुड़ैल और चुड़ैलों के के पैर पीछे की ओर मुड़े होते हैं.
तो जिस नकियाती हुई औरत ने आपको हद से ज्यादा सताने की चेष्टा की हो, उसके पैर अवश्य देखने की कोशिश करें. लेकिन सावधानी से.
कुछ, जैसे ब्राह्मण भूत (ब्रह्मराक्षस टाइप के) गेहुंआ रंग के होते हैं या कुछ, जैसे किसी गोरे यूरोपियन का भूत काले दिखते हैं, और जरूरत से ज्यादा डरावने होते हैं.
इस तरह के एक मशहूर भूत का ठिकाना कलकत्ता की एक गली में था और वह ब्रिटिश काल में चर्चा में था और उस गली को उसी भूत के नाम पर जाना जाता था. बहरहाल, भूतों के कई प्रकार भी होते हैं. मसलन, बंगाल में ऑर्डिनरी भूत क्षत्रिय, वैश्य, या शूद्र वर्ग का सदस्य होता है. ब्राह्मण भूत, या ब्रह्मदैत्य, बिल्कुल अलग तरह का होता है. सामान्य किस्म के भूत ताड़ के पेड़ों जितने लंबे होते हैं, आमतौर पर पतले और बहुत काले होते हैं. वे पेड़ों पर रहते हैं लेकिन उन पेड़ों की तरफ रुख नहीं करते जहां ब्रह्मराक्षस या ब्रह्मदैत्य रहते हैं.
भूतों के प्रकारों पर अगली पोस्ट में चर्चा करूंगा.
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