Monday, January 5, 2026

फिल्म समीक्षाः मानवीय संबंधों पर बनी बेहतरीन फिल्म केडी

इन दिनों मुझे तमिल फिल्में देखने का चस्का लग गया है. बेशक, दक्षिण भारतीय फिल्मों में पर लाउड होने का आरोप लगता है और ज्यादातर मामलों में सही हो होता है. पर अब हिंदी फिल्में लाउड हो रही हैं और ज्यादातर हिंदी फिल्मों में कथानक गुम हो रहा है.

बहरहाल, मैंने एक तमिल फिल्म के.डी. देखकर खत्म की. फिल्म नई है, 2019 में रिलीज हुई थी. लेकिन मुझे नहीं पता कि हम उत्तर भारतीय लोगों में से कितने लोगों ने इसे देखा है.

मेरा सुझाव, और मेरी सिफारिश है आप इस फिल्म को देखें.

फिल्म केडी का एक दृश्य. तस्वीरः प्राइम वीडियो


असल में, यह फिल्म कुरुप्पु दुर्रै नाम के एक बुजुर्ग की कहानी है. दुर्रै लंबे समय से कोमा में होता है और उसके घर वाले उसकी बीमारी बर्दाश्त नहीं पा रहे होते हैं. उसके बेटे दुर्रै को मार डालने की योजना बनाते हैं, आप चाहें तो इसे मर्सी कीलिंग कर सकते हैं. संयोग से उसी वक्त दुर्रै होश में आ जाता है और इस पूरी योजना को अपने कानों से सुन लेता है. कुरुप्पा दुर्रै मरने के डर से कम और बेटों की इस योजना से व्यथित होता है और उसी वक्त घर छोड़ देता है.

अगर आप फिल्मों के मिजाज को रंग के जरिए सूंघने लायक दर्शक हैं तो आप इस वक्त बीमारी भरे पीलेपन के कलर टोन को देखकर खुद बहुत उदास-से हो जाएंगे. बहरहाल, फिल्म में यह रंग ज्यादा देर तक तारी नहीं रहता. फिल्म रोने-धोने वाली या नैतिक शिक्षा देने वाली विज्ञापन सरीखी नहीं है. आगे कड़वे-मीठे आते हैं. मजा तो इसके बाद आता है.

घर से निकले कुरुप्पु दुर्रै एक मंदिर में कुट्टी से मिलते हैं. नागा विशाल ने कुट्टी की भूमिका की है. कुट्टी अनाथ है और वह मंदिर के बारामदे पर ही रहता है. दोनों एक-दूसरे के अकेलेपन के दोस्त बन जाते हैं. कुट्टी ही कुरुप्पु दुर्रै का नाम केडी रखता है और वह उसका मानवीय संबंधों पर फिर से भरोसा जगाने का काम करता है. कई बार तो मुझे कुट्टी को देखते हुए प्रेमचंद के किरदार हामिद की याद आई जो बूढ़ी अमीना का दादा जैसा बर्ताव करता है. यहां भी कुट्टी केडी के लिए बकेट लिस्ट तैयार करता है और कहता है कि मरने से पहले इनको पूरा करना है.

यह फिल्म इन दोनों दादा-पोते जैसे रिश्ते को बिल्कुल निजी और जीवन के निकट लाकर परदे पर उकेरती है और इन दोनों किरदारों की यात्रा में हंसी, उदासी, प्रेम, डर, और यहां तक कि गुस्से से भरे पल भी हैं. कुल मिलाकर निर्देशक मधुमिता ने जीवन को परदे पर ही उकेर दिया है. केडी के किरदार में मु रामास्वामी बेहद सहज और विश्वसनीय हैं और खासकर बकेट लिस्ट की एक विश यानी पसंदीदा व्यंजन मटन बिरयानी खाते वक्त उनके चेहरे पर अव्यक्त तृप्ति के जो भाव आते रहते हैं, उससे बढ़िया भाव मैंने क्लोज शॉट में बेहद कम ही देखे हैं.

फिल्म में कुछ भी फ्लैशी नहीं है, बल्कि कैमरे और संपादन की गतियों ने फिल्म की गति बनाए रखी है. संपादन और पृष्ठभूमि का संगीत इतना जादुई है कि अगर आप इसका व्याकरण पकड़ पाए तो खो जाएंगे. कुट्टी के किरदार में नाग विशाल ने क्या सामर्थ्य दिखाया है! यह एक आत्मविश्वास से भरे अनाथ बच्चे की भूमिका है, आत्मविश्वास न रहे तो वयस्कों की यह दुनिया उसे जीने भी देगी?

इन दो मुख्य कलाकारों के साथ पटकथा में कहानी के प्रवाह को बनाए रखने में कई और किरदार आते हैं. इसमें कोथू कलाकार, बिरयानी दुकानवाला, मंदिर का पुजारी और यहां तक कि केडी का पता खोजने के लिए लगाए गए प्राइवेट जासूस, सबने प्रवाह को बनाए रखा है.

कहानी में आपको अगर कुछ चुभ सकता है कि केडी के बाल-बच्चे इनते हृदयहीन कैसे हो सकते हैं? उनके किरदारों की कुछ और परते हो सकती थीं, पर यह बहुत बारीक-सा सवाल है. फिर भी ऐसा लगता ही नहीं कि परिवार मे किसी को केडी की कोई फिक्र थी या उससे जरा भी प्यार था. जबकि बाकी के सभी लोग मानते हैं कि केडी एक अच्छा इंसान और एक अच्छा पिता था. 

एक झोल यह भी है कि जब परिवार वालों को पता लगता है कि केडी कोमा से बाहर आ गया तब भी वे लोग उसको खोजने के लिए जासूस लगवाते हैं, वह भी इसलिए ताकि उसको पकड़कर यूथेनेशिया वाला अधूरा कर्मकांड पूरा किया जा सके. बहरहाल, पटकथा की इस कमजोरी से आंखें मूंद सकें तो बाकी फिल्म आला दर्जे की है. हो सके तो देखिए और बताइए कि आपको कैसी लगी.

ओटीटी प्लेटफॉर्म प्राइमवीडियो पर फिल्म मौजूद है.

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Sunday, December 28, 2025

टेस्ट में टी-20 का मजा. बॉक्सिंग डे टेस्ट मैच दो दिन में फिनिश

बेशक, एशेज में चौथा टेस्ट् इंग्लैंड के लिए ऑस्ट्रेलिया में 14 साल बाद जीत की खुशबू लेकर आया पर मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड (एमसीजी) की पिच बॉक्सिंग डे एशेज टेस्ट के बाद जांच के दायरे में आ गई है, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच यह मैच महज़ दो दिनों के भीतर ही खत्म हो गया.

चारों पारियों में कोई भी टीम 175 रन का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई. इंग्लैंड को चौथी पारी में 175 रन बनाने थे, जो उन्होंने बैजबॉल के नाम पर टी-20नुमा आड़े-तिरेछे शॉट खेलकर खींच-तान कर बना लिए. मुझे इस मैच में इंग्लैंड के बल्लेबाजों में सूर्य कुमार यादव का अक्स दिखा, जिसमें कला कम और दम अधिक होता है. पर यह विकेट गेंदबाजों के लिए जन्नत थी.

विकेट पर 10 मिमी घास थी और टप्पा खाने के बाद गेंद केले की तरह घुमाव ले रही थी. करीबन 30 फीसद रन बल्ले की कन्नी लगकर स्लिप या लेग स्लिप में फिसलकर बने.

पूरे मैच के दौरान विकेट पर सीम मूवमेंट रही और बल्लेबाज़ों की नाक में दम रहा. मैच में कुल 142 ओवरों में 36 विकेट गिरे, जिसमें तेज़ गेंदबाज़ों का पूरी तरह दबदबा रहा और एक भी ओवर स्पिन गेंदबाज़ी का नहीं डाला गया.
हालांकि, पर्थ टेस्ट के मुकाबले इस टेस्ट में पांच गेंदे अधिक डाली गईं. इंग्लैंड के कप्तान बेन स्टोक्स ने अपनी राय बेबाकी से रखी है और संकेत दिया कि यदि ऐसी पिच दुनिया के किसी और हिस्से में तैयार की जाती, तो उस पर कड़े सवाल खड़े होते.

वैसे, दिलचस्प बात यह है कि पिछले महीने पर्थ में खेले गए टेस्ट को ,जो तीसरे दिन तक भी नहीं पहुँच सका आईसीसी ने “बहुत अच्छी” पिच की रेटिंग दी थी, जो सर्वोच्च रेटिंग है.

बहरहाल, मैं यह तय नहीं कर पा रहा था कि मैं लाइव मैच देख रहा हूं या हाइलाइट. यह भी हो सकता है कि आइसीसी टी-20 के दौर में टेस्ट मैचों को जीवन्त और प्रासंगिक बनाए रखने के लिए ही ऐसे विकेट तैयार करवाने के निर्देश दे रहा हो.

Saturday, December 13, 2025

भूतों की अभूतपूर्व कथा- भाग एक

 


भूतों के बारे में आपने सुना तो होगा ही. लेकिन कुछ दिलचस्प बातें मैंने इकट्ठी की है. हॉरर स्टोरी नहीं सुना रहा, सिर्फ परंपराएं इकट्ठी कर रहा हूं. मसलन, भूतों की परिभाषा क्या है? भूत कौन होते हैं?

असल में, भूत एक आम शब्द है जिसमें कई तरह की बुरी आत्माएँ शामिल हैं जिन्हें अलग-अलग करके समझने की कोशिश करेंगे. हालाँकि, पहले आम तौर पर भूतों में पाए जाने वाले कुछ आम लक्षणों के बारे में बात करना अधिक दिलचस्प होगा.

परिभाषा के मुताबिक, "प्रॉपर भूत ऐसी आत्मा है जो हिंसक तरीके से मरे हुए लोगों की होती है. चाहे वह मौत दुर्घटना से हो, आत्महत्या से हो या मौत की सज़ा पाए लोगों से।"

ऐसी आत्माएं भी भूतों की श्रेणी में आती हैं अगर मौत के बाद उसका ठीक से अंतिम संस्कार न किया गया हो.
बहरहाल, बहुत सारी ऐसी आत्माओं का (भय से) कई इलाकों में पूजा-पाठ भी किया जाता है. कई स्थान पर उन्हें मनुख देवा का दर्जा मिला है. बाघ का शिकार हुए लोगों का अस्थान बघौत कहा जाता है. बिजली गिरने से मरे लोगों का अस्थान 'बिजलिया बीर' के नाम से प्रसिद्ध है. ताड़ के पेड़ से गिरे इंसान का अस्थान 'ताड़ बीर' के नाम से और सांप काटने से मरे व्यक्ति का अस्थान नगैया बीर के नाम से जाना जाता रहा है.

जनरल कनिंघम ने (मैं एक किताब के अनुवाद के सिलसिले में उनके विवरणों को देख रहा था), हाथी के महावत के अस्थान (श्राइन) का जिक्र किया है, जो पेड़ से गिरकर मर गया था, उसी तरह, एक ब्राह्मण की मौत गाय के ढूंसने से हो गई थी, उसका भी अस्थान बनाया गया था, एक कश्मीरी महिला, जिसका एक पैर था और जिसकी मृत्यु दिल्ली से अवध जाते समय थकान से हो गई थी, उसके भी अस्थान का जिक्र कनिघम ने किया है.

भूतों के कई प्रकार हैं. चुड़ैल, किच्चिन, बैताल, प्रेत, जिन्न, ... इनके बारे में आपकी क्या राय और क्या जानकारी है और क्या आपका कोई अनुभव रहा है? भूतों के प्रकार या उनसे जुड़े किस्से हो तो वह भी साझा करें.


(नोटः पोस्ट के साथ चस्पां भूत की तस्वीर एआइ जनरेटेड है. भूत का फोटो आजतक ले नहीं पाया हूं, अतएव तस्वीर को प्रतीकात्मक ही समझें.)








Thursday, December 11, 2025

15 करोड़ की किताब, साहित्य है या पब्लिसिटी का मजाक!

मैं रत्नेश्वर जी से बहुत बार नहीं मिला हूं। इस बार सुना कि उन्होंने 15 करोड़ की किताब लिख डाली। उनके लिए यह कोई नई बात नहीं। पिछली बार रत्नेश्वर जी ने, जब हमारी मुलाकात हुई थी, तब तीन करोड़ रुपए एडवांस में लिए थे, ऐसा उन्होंने बताया था। अगर यह कदम महज खबर बनाने के लिए थी तो खबर बन गई। पर अब आगे की बात। 

कुछ महीने पहले शैलेश भारतवासी जी ने आदरणीय विनोद कुमार शुक्ल को तीस लाख रुपए का रायल्टी का चेक सौंपा था। चेक प्रदान करते हुए तस्वीरें थी। तीस लाख भी हिंदी साहित्यकार के लिए लगभग मूं बा देने की स्थिति थी। रत्नेश्वर जी भी स्पष्ट कर दें कि पंद्रह करोड़ का क्या मसला है? प्रकाशक ने दिए? आपने प्रकाशन के लिए दिए? इतने रकम की बिक्री? मतलब थोड़ा स्पष्ट कर देते तो हम ज्वलनशील लोगों के कलेजे को ठंडक पड़ती।

लोकसभा 2025- जब संसद में राहुल गांधी की बात पर अमित शाह को आया तेज गुस्सा


 

Monday, November 24, 2025

मारे तो धरमिन्दर


हिंदी मुंबइया सिनेमा के पर्दे पर सबसे ‘मर्दाना चेहरा’ सिर्फ एक था, धर्मेंद्र. मधुपुर में हमलोग अपने साथियों में मांसपेशीय शक्ति की सबसे ज्यादा नुमाइश और शेखी बघारने वाले साथी को ‘बड़का आया धरमिन्दर’ कहकर बुलाते थे.

धर्मेंद्र सिनेमा के परदे पर मसल पावर के प्रतीक थे.

यह तुलना ऐं-वईं नहीं थी. धर्मेंद्र परदे पर किसी को पीटते थे तो उनकी आंखों में गुस्सा नहीं, आग दिखती थी और वाकई लगता था कि अगर उनका घूंसा किसी को लगा, तो बंदा हफ्तों के लिए बिस्तर पर पड़ जाएगा.

उनकी चाल में अदा नहीं, आत्मविश्वास था. और उनकी मुस्कान में वह सादगी, जिसने दर्शकों को यह भरोसा दिलाया कि यह आदमी जब लड़ेगा, तो सच के लिए लड़ेगा.

लेकिन धर्मेंद्र का यह एक्शन हीरो बनना सिर्फ कैमरे का खेल नहीं था. यह उनके जीवन का संघर्ष था, मिट्टी, मेहनत और मोहब्बत से बना हुआ. धर्मेंद्र यानी पंजाब की माटी की सुगंध.

जहां तक मुझे खयाल है, पहली बार शर्ट फाड़कर गुंडों की पिटाई धर्मेंद्र ने ही की थी, फूल और पत्थर थी फिल्म. और इसी फिल्म के साथ धर्मेंद्र दर्शकों के चहेते बन गए थे.
 



इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसे बदमाश का किरदार निभाया, जो अंदर से नेकदिल है.

क्लाइमेक्स के उस सीन में, जिसका जिक्र मैंने किया है कि धर्मेंद्र शर्ट फाड़कर गुंडों को मारते हैं, सिनेमाघर सीटियों से गूंज उठता था. इसी फिल्म से पैदा हुए हीमैन.

असल में, इस समय तक परदे पर दांत पीसते और आंखों से गुस्सा बरपाते अमिताभ का आगाज नहीं हुआ था लेकिन एक्शन का दूसरा नाम धर्मेंद्र बन गए थे.

शोले का जिक्र तो जितनी बार किया जाए कम ही होगा. फिल्म का एक्शन उस समय के लिहाज से तकनीकी रूप से नया था, लेकिन धर्मेंद्र के स्टंट वास्तविक थे. उन्होंने ट्रेन के ऊपर से कूदने वाले दृश्य, और ठाकुर के साथ लड़ाई वाले सीन खुद किए. शोले में जय की मौत के बाद वीरू का दांत पीसकर, ‘गब्बर मैं आ रहा हूं’ कहना कौन भूल सकता है!

मनमोहन देसाई की 1977 की फिल्म धरम वीर एक फैंटेसी-एक्शन थी, जहाँ धर्मेंद्र ने ऐसे मध्यकाल के किसी योद्धा का किरदार निभाया था, जिसकी नकल करके आज भी कई हास्य कलाकारों की रोजी-रोटी चल रही है और जिसकी नकल फिल्म राजाबाबू में गोविन्दा ने भी की थी.

बहरहाल, धरमवीर में तलवारबाजी, घुड़सवारी और योद्धा वाली पोशाकों के बीच धर्मेंद्र का एक्शन पूरी तरह अलग था. उन्होंने अपने शरीर और चेहरे से जो जज्बात दिखाए, वह भारतीय सिनेमा में उस दौर की तकनीक से कहीं आगे थे.

उनका घोड़े पर कूदना, तलवार घुमाना और संवाद बोलते हुए अभिनय में ‘फिल्मीपन’ कम और फिजिकल रियलिज्म ज्यादा था.

1978 की शालीमार में धर्मेंद्र ने इंटरनेशनल स्टाइल में एक्शन किया. लड़कियों के लिए यह फिल्म उनकी ‘जेम्स बॉन्ड’ इमेज का प्रतीक बन गई. उनकी चाल, बॉडी लैंग्वेज और कैमरे पर पकड़—सबने उन्हें ग्लोबल एक्शन हीरो का लुक दिया.

1980 की राम बलराम में वे अमिताभ बच्चन के साथ थे. दो भाइयों की इस कहानी में धर्मेंद्र ने अमिताभ के बड़े भाई का किरदार निभाया, जिसमें उनका अनुभव और जोश दोनों दिखे.

यहां उनका हर फाइट सीन डांस की तरह तालमेल वाला था.

पर सबसे बड़ा एक्शन धर्मेंद्र ने पर्दे पर नहीं, अपने जीवन में किया. जब करियर शिखर पर था, तब आलोचना और निजी परेशानियों ने उन्हें तोड़ दिया. उन्होंने किसी इंटरव्यू में कहा था, ‘मैंने अपने दर्द को शराब में डुबोया, पर किसी को तकलीफ नहीं दी. मैं गिरा, मगर फिर उठा.’

धर्मेंद्र की यह स्वीकारोक्ति ही उनका सबसे बड़ा ‘एक्शन’ था. जहाँ एक हीरो खुद से लड़कर बाहर निकला.

आज जब हाई-टेक एक्शन, वायर वर्क और कंप्यूटर ग्राफिक्स फिल्मों में आम हैं, एआइ का इस्तेमाल असली को भी मात दे रहा है और वीएफएक्स ने सिनेमा के परदे को आश्चर्य लोक में बदल दिया है, धर्मेंद्र की पुरानी फिल्मों का एक्शन आज भी असली लगता है क्योंकि उसमें ईमानदारी थी.

धर्मेंद्र की पहचान सिर्फ एक्शन से नहीं, बल्कि उनके मानवीय स्पर्श से बनी. वह गुस्से में भी सज्जन थे, और लड़ाई में भी सच्चे. उनके स्टंट्स में हिंसा नहीं, इंसाफ की चाह थी. आज की पीढ़ी अगर धर्मेंद्र को ‘रेट्रो एक्शन स्टार’ कहती है, तो ये याद रखना चाहिए कि उन्होंने स्क्रीन पर वह किया था जो जिंदगी में हर किसी को करना पड़ता है- मुश्किल हालात से लड़कर मुस्कुराना.



स्मृतिशेषः धर्मेंद्र का हीमैन से परे गहराई से अभिनय वाला चेहरा

मंजीत ठाकुर

हिंदी सिनेमा के उस युग में जब एक्शन-हीरो, मसाला सिनेमा और बड़े स्टारडम का जोर था, धर्मेंद्र ने समय-समय पर ऐसी फिल्मों में अभिनय किया जो मुख्यधारा से हटकर थीं. आमतौर पर धर्मेंद्र को हम ‘बसंती, इन कुत्तों के सामने मत नाचना’ वाले गुस्सैल तेवर वाले नायक के रूप में जानते हैं. लेकिन उन्होंने अपने मसल ब्रांड के बाहर निकलकर संवेदनशीलता, अंतर्मन के उकेरने वाली और सामाजिक नियमों से टकराने वाले नायकों के किरदार निभाए.

सिनेमा में जिन ब्रांड्स की नाम होती है उसमें धर्मेंद्र की उपाधि हीमैन की थी. लेकिन धर्मेंद्र ने अपनी लोकप्रिय ब्लॉकबस्टर छवि से हटकर ‘आंखों से अभिनय’ करने वाली फिल्में भी की.

ऐसी फिल्मों में पहला नाम उभरता है बंदिनी का. 1963 में रिलीज हुई इस फिल्म में धर्मेंद्र करियर के शुरुआती दौर में थे.



जिस हुगली-किनारे के जेल सेटअप ने हमें यह एहसास दिलाया कि ‘स्वतंत्रता’ सिर्फ़ राजनीतिक नहीं, मानसिक भी होती है. बंदिनी में धर्मेंद्र ने डॉ. देवेंद्र का किरदार निभाया. यह भूमिका उनके लिए उस समय अप्रत्याशित थी, जहाँ ‘ही-मैन’ का टैग असर था. लेकिन एक जेल-डॉक्टर का शांत, संवेदनशील और नजरें मिलाने से पहले सोचने वाला स्वभाव उन्होंने सहजता से निभाया. इस फिल्म की समीक्षा करते हुए द क्विंट में एक फिल्म समीक्षक ने बाद में लिखा, “एक युवा, करिश्माई और संवेदनशील जेल डॉक्टर जो ‘गंदे कैदी’ वाली सोच में यकीन नहीं करता… मेरी पीढ़ी के लोगों के लिए, धर्मेंद्र और जेल, शोले में पानी की टंकी पर खड़े होकर ‘चक्की पीसींग’ चिल्लाने की इमेज है. लेकिन बंदिनी में, वह एक कमाल हैं.”

उनकी यह भूमिका बताती है कि धर्मेंद्र उस ब्लॉक को तोड़कर भी अभिनय कर सकते थे जहाँ उन्हें केवल ‘एक्शन-रॉबस्ट’ हीरो के रूप में देखा जाता था.

धर्मेंद्र के करियर में दूसरी ऐसी ही फिल्म थी 1966 की अनुपमा. निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी की इस फिल्म में धर्मेंद्र ने अशोक नामक शिक्षक-कवि की भूमिका निभाई थी. यह एक ऐसा किरदार था, जिसमें उन्होंने मजबूती और नजाकत का अद्भुत संयोजन दिखाया था. डॉ. स्नेहा कृष्णन ने इस फिल्म की समीक्षा में लिखा, “धर्मेंद्र ने अपने शुरुआती करियर में एक बेहतरीन परफॉर्मेंस दी है, जिसमें एक केयरिंग, प्रेरक और प्यारी स्क्रीन प्रेजेंस है.”

अनुपमा में एक शिक्षक-कवि के रूप में उनके संतुलित स्वभाव ने उनके अभिनेता होने की एक और तह खोली.

यह किरदार उनकी कद्दावर सिनेमाई छवि से बहुत दूर था: न कोई बड़ी मशीन-गन, न कोई फिसलता एक्शन-सिक्वेंस, बल्कि एक धीमी गति की संवेदना, एक सांस्कृतिक बेड़ियों से उबरने की कहानी. धर्मेंद्र की आंखों में और धैर्य में वह सादगी दिखी, जिसने उस समय के ‘नायक’ के प्रतिमानों को चुनौती दी थी.

धर्मेंद्र की ऑफबीट फिल्मों में एक फिल्म का नाम न लिखा जाए तो सारी सूची बेकार होगी और वह थी 1969 में आई सत्यकाम.

यह फिल्म धर्मेंद्र के अभिनय-सफर में एक मील का पत्थर मानी जाती है. उन्होंने सत्यप्रिय आचार्य नामक ईमानदार इंजीनियर की भूमिका निभाई थी. अपने उसूलों के लिए वह उस समय के साथ सामाजिक ताने-बाने, रिश्तों और व्यवस्था से टकरा जाता है. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने बाद में इस फिल्म का जिक्र करते हुए लिखा कि हृषिकेश मुखर्जी के सत्यकाम में धर्मेंद्र ने अपनी सबसे वास्तविक परफॉर्मेंस दी थी.

इस फिल्म को देखते हुए आप उनकी आँखों की गहराई, आवाज के उतार-चढ़ाव को देखिए ही, साथ में इस फिल्म में उनके मौन (या पॉज) भी अभिनय को नई ऊंचाइयों तक ले जाते हैं.

लेकिन, सत्यकाम की क्लाइमेक्स में, जब धर्मेंद्र का किरदार देखता है कि उसका आदर्श टूट रहा है—उनकी आँखों में निराशा, दृढ़ता और खुद से सवाल के भ्रम यह तीनों भाव एक साथ चलते दिखते हैं.

यह बात और है कि सिने आलोचकों ने इस फिल्म को सर-आंखों पर बिठाया, लेकिन जनता को थियेटर तक नहीं ला पाई. बेशक, बॉक्स-ऑफिस मार्केट के हिसाब से यह सफलता नहीं थी, पर अभिनय-दृष्टि से यह धर्मेंद्र का सर्वश्रेष्ठ माना गया है.

अभिनय के लिहाज से धर्मेंद्र की एक अन्य फिल्म है जिसे अमिताभ के साथ उन्होंने किया था और यह थी 1975 में रिलीज हुई फिल्म चुपके चुपके.

यह फिल्म भारी व्यावसायिक मसाले से अलग थी. फिल्म में कॉमेडी थी लेकिन सादगी और बुद्धिमत्ता भी थी. धर्मेंद्र ने प्रोफेसर परिमल त्रिपाठी और कार ड्राइवर प्यारे मोहन इलाहाबादी का किरदार निभाया.

हिंदुस्तान टाइम्स की टिप्पणी थीः ‘कालजयी कहानी... और धर्मेंद्र जिन्होंने अपने हास्य और गरमाहट भरी ऊर्जा से कॉमिडी को नया स्तर और परिभाषा दी.’

सत्तर के दशक का उत्तरार्ध अमिताभ बच्चन की धूम-धड़ाके वाली एक्शन फिल्मों का था. लेकिन गब्बर को हराने वाले धर्मेंद्र ने इस फिल्म में मुस्कुराहट और सादगी से शर्मिला टैगोर और दर्शकों दोनों का दिल जीत लिया,

चुपके चुपके में धर्मेंद्र ने संवाद-प्रवाह, शारीरिक हाव-भाव, टाइमिंग सबमें सहजता दिखायी और इस फिल्म ने जाहिर किया कि अभिनेता के रूप में उन्हें अपनी कला में महारत है.

लेकिन चुपके-चुपके से पहले 1966 में धर्मेंद्र की एक अन्य फिल्म थी फूल और पत्थर.

हालाँकि यह फिल्म व्यावसायिक रूप से भी कामयाब थी और इसे अक्सर धर्मेंद्र की सुपरस्टार बनने की फिल्म माना जाता है, लेकिन इस फिल्म को धर्मेंद्र की ‘ऑफ-बीट राह की शुरुआत’ भी माना जा सकता है क्योंकि इसमें उन्होंने परदे पर कमाल की संवेदनशीलता दिखाई थी.

फूल और पत्थर में उन्होंने “हीरो” होने के साथ-साथ मानव-कमज़ोरियों का स्वीकार दिखाया—यह कदम उस जमाने के हीरो इमेज के लिए साहसपूर्ण था.

धर्मेंद्र सुपरस्टार थे और आखिरी क्षणों तक सुपरस्टार ही रहे. बेशक, शोले, लोहा, हकीकत, धर्म-कांटा जैसी फिल्मों ने उनको दर्शकों के दिलों तक पहुंचाया.

धर्मेंद्र ने अपने करियर में दिखाया कि वे सिर्फ़ ही-मैन नहीं, बल्कि एक ऐसे अभिनेता हैं जो भूमिका में उतरने और किरदार के भीतर उतरने का हुनर रखते हैं. उसकी इस क्षमता ने उन्हें सिर्फ़ कमर्शियल स्टार नहीं, बल्कि अभिनय-सिद्ध कलाकार बना दिया.

सत्यकाम ने सिनेमा की दुनिया को अलविदा कह दिया है लेकिन जब तक भारत में सिनेमा और कला की बात होगी, धर्मेंद अपनी पूरी शख्सियत के साथ, अपनी एक्शन फिल्मों और कला की गहराइयों दोनों के लिए याद किए जाते रहेंगे.