मुस्लिम उम्मीदवार विजेता
1. जोकीहाट- AIMIM – मोहम्मद मुर्शिद आलम- मार्जिन- 28803
2. बहादुरगंज- AIMIM- मोहम्मद तौसीफ आलम- मार्जिन- 28726
3. कोचादामन- AIMIM- मो. सरवर आलम- मार्जिन- 23021
4. अमौर- AIMIM- अख्तरूल ईमान- मार्जिन- 38928
5. बैसी- AIMIM- गुलाम सरवर- मार्जिन- 27251
6. किशनगंज- कांग्रेस- मो. कमरूल होदा- मार्जिन- 12794
7. बिस्फी- राजद- आसिफ अहमद- मार्जिन- 8107
8. रघुनाथपुर- राजद- ओसामा साहब- मार्जिन- 9248
9. ढाका- राजद- फैजल रहमान- मार्जिन- 178
10. अररिया- कांग्रेस- अबीदुर रहमान- मार्जिन- 12741
11. चैनपुर- जेडीयू- मो. ज़मां खान- मार्जिन 8362
दूसरे स्थान पर रहे मुस्लिम उम्मीदवार
1. अमौर – सबा जफर- जद-यू
2. बहादुरगंज- मो. मुसव्वर आलम – कांग्रेस
3. बरारी- मो. तौकीर आलम- कांग्रेस
4. बेतिया- वशी अहमद- कांग्रेस
5. बिहार शरीफ- ओमैर खान- कांग्रेस
6. गौरा बौराम- अफजल अली खान- राजद
7. जमुई- मोहम्मद शमसाद आलम- राजद
8. जोकीहाट- मंजर आलम- जद-यू
9. कदवा- शकील अहमद खान- कांग्रेस
10. कसबा- मोहम्मद इरफान आलम- कांग्रेस
11. केओटी- फराज फातमी- राजद
12. कोचादामन- मोजाहिद आलम- राजद
13. नरकटिया- शमीम अहमद- राजद
14. नाथनगर- शेख जियाउल हसन- राजद
15. प्राणपुर- इशरत परवीन- राजद
16. रफीगंज- गुलाम शाहिद- राजद
17. समस्तीपुर- अख्तरूल इस्लाम शाहीन- राजद
18. सिकटा- खुर्शीद फिरोज अहमद- निर्दलीय
19. सिमरी बख्तियारपुर- युसुफ सलाउद्दीन- राजद
20. सुरसंड- सैय्यद अबू दोजाना- राजद
21. ठाकुरगंज- गुलाम हसनैन- AIMIM
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Friday, November 14, 2025
बिहार विधानसभा चुनावः एनडीए की प्रचंड जीत में नीतीश के पीछे क्यों खड़ी है महिला शक्ति?
मंजीत ठाकुर
बकौल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बिहार में जनता ने गरदा उड़ा दिया. बिहार में गरदा उड़ाने का मतलब चुनावी है प्रचंड बहुमत हासिल करना. 2020 के विधानसभा चुनावों में जहां जनता दल युनाइटेड को 43 सीटें और 15.39 फीसद वोट शेयर हासिल हुआ था, वहीं 2025 के चुनावों में नीतीश कुमार भले ही भाजपा से कम सीटें हासिल कर पाएं हों पर उनके वोट शेयर में अच्छी खासी बढ़ोतरी हुई है.
2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग के आंकड़े के मुताबिक जनता दल युनाइटेड को इस खबर के लिखे जाने तक 78 सीटें और 7 पर बढ़त यानी कुल 85 सीटें (यह अंतिम आंकड़े आने पर बदल सकते हैं) और 19.27 फीसद वोट मिले हैं. यानी सीधे-सीधे सीटों की संख्या दोगुनी और वोट शेयर में करीबन 4 फीसद का इजाफा!
बेशक, भाजपा ने पिछले चुनाव के अपने प्रदर्शन में सुधार किया है और तब के 74 सीटों के मुकाबले 2025 में 87 सीटों पर जीत चुकी है और 2 पर आगे है (यानी कुल 89). पर उसके वोट शेयर में मामूली बढ़त है.
2020 में भाजपा ने 19.46 फीसद वोट हासिल किए थे और 2025 में 20.07 यानी उसके वोट शेयर में आधे फीसद का इजाफा ही हुआ है.
बेशक, नीतीश कुमार महिलाओं में खासे लोकप्रिय हैं और उन्होंने सभी जाति और धर्मों की महिलाओं में अपना खास वोटर तबका तैयार किया है.
आखिर बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार अब भी महिला मतदाताओं के बीच सबसे भरोसेमंद नेता क्यों हैं?
बिहार की राजनीति में एक दिलचस्प सामाजिक बदलाव पिछले दो दशकों में उभरा है, महिलाएँ अब सिर्फ़ वोटर नहीं, बल्कि चुनावी नतीजों को मोड़ने वाली निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं।
बिहार की राजनीतिक समझ रखने वाले लोग जानते हैं कि राज्य की चुनावी दिशा अब सिर्फ़ जातीय समीकरणों पर नहीं चलती। पिछले 20 साल में एक नया समीकरण उभरा है- लैंगिक समीकरण। और उसमें नीतीश कुमार ने एक स्थायी जगह बनाई है।
लेकिन सवाल यह है कि आख़िर क्यों बिहार की महिला मतदाता, बार-बार और बड़े पैमाने पर, नीतीश कुमार को प्राथमिकता देती हैं?
इसका उत्तर सिर्फ़ किसी एक योजना में नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक ढांचे में किए गए उन बदलावों में छिपा है, जिन्हें उन्होंने 2005 के बाद से लगातार आगे बढ़ाया।
आइए, नीतीश कुमार के इस वोट बैंक के “महिला समर्थन मॉडल” की परतें समझने की कोशिश करते हैं.
यह न केवल एक योजना भर नहीं थी, यह कल्याणकारी हस्तक्षेप था, बल्कि इसे एक व्यावहारिक हस्तक्षेप कहना होगा जिसकी वजह से ‘स्कूल घर के करीब’ आ गया.
बिहार की इस मुख्यमंत्री साइकिल योजना के मॉडल को जाम्बिया समेत सात अफ्रीकी देशों ने अपनाया और संयुक्त राष्ट्र ने इसे स्कूली दाखिले को बढ़ावा देने और महिला सशक्तिकरण का शानदार तरीका बताया.
हालांकि, शुरू में यह योजना सिर्फ लड़कियों के लिए थी, लेकिन बाद में लड़कों को भी साइकिल योजना में शामिल किया गया और योजना का विस्तार हुआ.
बिहार सेंकेंडरी एजुकेशन डिपार्टमेंट के आंकड़ों के मुताबिक, 2007 से 2024 के बीच कुल 97,94,445 (यानी लगभग 97.9 लाख) छात्राओं को मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना के अंतर्गत साइकिल प्रदान किया जा चुका है.
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असल में बिहार में शिक्षा और साक्षरता का स्तर राष्ट्रीय औसत से काफी कम थे. ऐसे में, 2005 में सुशासन के नाम पर सत्ता में आई नीतीश कुमार की सरकार ने शिक्षा में सुधार लाने के लिए कुछ योजनाएं शुरू कीं. इनमें से एक था, हर पंचायत में एक हाई स्कूल खोलना और उन हाई स्कूलों तक पहुंचने के लिए बच्चों को साइकिल देना ताकि स्कूल और घर की दूरी घट सके.
बिलाशक, राज्य सरकार की इन कोशिशो ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया.
एनुएल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) के साल 2006 से 2014 के बीच के आंकड़े इस बात को साबित करते हैं कि स्कूली शिक्षा में दाखिले के स्तर पर बिहार ने ऊंची छलांग लगाई थी.
2006 में यह दर 72.2 फीसद थी, जो 2011 में 90.1 फीसद हो गई. 2006 में बिहार उन सात राज्यों में शुमार था जहां 11 से 14 साल की लड़कियों में दस से अधिक प्रतिशत लड़कियां स्कूल नहीं जाती थीं. 2006 में बिहार में 17.6 फीसद लड़कियों का दाखिला स्कूल में नहीं हुआ था लेकिन 2014 में यह घटकर 5.7 फीसद और 2024 में घटकर 2.5 फीसद रह गया है.
बात इतनी ही नहीं रही, बीच में 2012-13 में पहली बार स्कूली दाखिले के मामले में लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक हो गई थी.
एक अन्य आंकड़ा काफी सुखद रूप से चौंकाने वाला भी है. 2005 की दसवीं की परीक्षा में जहां छात्राओं की संख्या केवल 25,413 थी वहीं, 2025 की मैट्रिक-परीक्षा के पहले दिन की रिपोर्ट के अनुसार उस दिन उपस्थित कुल छात्रों में 8,18,122 लड़कियाँ थीं.
शिक्षा का नकद-नारायण
नीतीश कुमार की लोकप्रियता सिर्फ साइकिल बांटने वाली योजना तक सीमित नहीं है. मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना जन्म से लेकर स्नातक होने तक क्रमिक किस्तों में लड़कियों को सहायता देती है; जिसकी राशि 94,100 रुपए है। ग्रेजुएट पास करने वाली लड़कियों के लिए स्नातक-प्रोत्साहन की अलग कैटेगरी भी है।
मुख्यमंत्री स्नातक प्रोत्साहन योजना के तहत ग्रेजुएट होने वाली लड़कियों को 50 हजार रुपए का नकद प्रोत्साहन दिया जाता है, जबकि बारहवी पास करने वाली लड़कियों के लिए अलग कैटेगरी में 10 हजार रुपए की प्रोत्साहन दिया जाता है.
बिहार में लड़की की पढ़ाई अक्सर आर्थिक कारणों से छूट जाती थी, कॉपी-किताब से लेकर कॉलेज फीस तक हर पड़ाव पर मुश्किलें थीं। इस स्थिति को बदलने के लिए सरकार ने एक पूरा पैकेज तैयार किया. यह उस राज्य में बड़ा बदलाव था जहाँ माता-पिता अक्सर कहते थे, “लड़की है, ज़्यादा पढ़ाई का क्या फायदा?”
बहरहाल, अब जब डिग्री मिलने पर बैंक खाते में सीधा 50 हजार नकद आता है, तो परिवार का नज़रिया भी बदलता है। इसका राजनीतिक असर यह हुआ कि लाखों युवा महिलाएँ और उनके परिवार नीतीश कुमार को ‘लड़कियों का भविष्य सुरक्षित करने वाले नेता’ के रूप में देखने लगे।
आधी आबादी को सत्ता की चाबी
2006 में नीतीश कुमार ने पंचायतों में महिलाओं को 50 फीस आरक्षण दिया। यह कदम भारतीय राजनीति में पहली बार देखा गया था। इसका प्रभाव सिर्फ़ चुनावी नहीं था, इसने गाँवों की राजनीति को घरों तक पहुँचा दिया।
नीतीश कुमार के इस नीतिगत फैसले से हज़ारों महिलाएँ मुखिया, वार्ड सदस्य, जिला परिषद सदस्य बनीं। घर-गृहस्थी संभालने वाली महिलाएँ अब सार्वजनिक मुद्दों पर बोलने लगीं. स्थानीय सत्ता में महिलाओं की निर्णायक भूमिका बनी.
नतीजतन, ग्रामीण इलाकों की महिलाओं ने नीतीश कुमार को सिर्फ़ मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक अस्तित्व का निर्माता माना। उनका यह समर्थन आज भी कायम है।
महिला वोटरों के बीच नीतीश कुमार की इमेज अलग शराबबंदी की वजह से भी बनी है. सूबे की लाखों महिलाओं के घरों में शराबबंदी की वजह से शांति आई है. इसके अलावा, हर घर नल का जल, हर घर शौचालय, बिजली-कनेक्शन और गृह निर्माण सहायता जैसी योजनाओं ने नीतीश कुमार के लिए अपनी जाति-बिरादरी के बाहर महिलाओं का एक ऐसा वोटबैंक तैयार करने में मदद की, जो वोट देते समय जाति और धर्म नहीं देखती (या कम से कम नीतीश कुमार का यही दावा है)
नीतीश कुमार के साल 2000 में सात दिन और फिर 2005 के बाद से बिहार के हर चुनाव और हर सरकार में प्रासंगिक बने रहने के पीछे इसी नारीशक्ति का कमाल है.
बकौल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बिहार में जनता ने गरदा उड़ा दिया. बिहार में गरदा उड़ाने का मतलब चुनावी है प्रचंड बहुमत हासिल करना. 2020 के विधानसभा चुनावों में जहां जनता दल युनाइटेड को 43 सीटें और 15.39 फीसद वोट शेयर हासिल हुआ था, वहीं 2025 के चुनावों में नीतीश कुमार भले ही भाजपा से कम सीटें हासिल कर पाएं हों पर उनके वोट शेयर में अच्छी खासी बढ़ोतरी हुई है.
2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग के आंकड़े के मुताबिक जनता दल युनाइटेड को इस खबर के लिखे जाने तक 78 सीटें और 7 पर बढ़त यानी कुल 85 सीटें (यह अंतिम आंकड़े आने पर बदल सकते हैं) और 19.27 फीसद वोट मिले हैं. यानी सीधे-सीधे सीटों की संख्या दोगुनी और वोट शेयर में करीबन 4 फीसद का इजाफा!
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| 14 नवंबर को मतगणना के बाद एनडीए-मय हुआ बिहार |
बेशक, भाजपा ने पिछले चुनाव के अपने प्रदर्शन में सुधार किया है और तब के 74 सीटों के मुकाबले 2025 में 87 सीटों पर जीत चुकी है और 2 पर आगे है (यानी कुल 89). पर उसके वोट शेयर में मामूली बढ़त है.
2020 में भाजपा ने 19.46 फीसद वोट हासिल किए थे और 2025 में 20.07 यानी उसके वोट शेयर में आधे फीसद का इजाफा ही हुआ है.
अब जानकार कह रहे हैं कि महागठबंधन ने अपने लिए जिस एमवाई समीकरण पर भरोसा किया था उस पर नीतीश कुमार का एम (महिला) और वाई (यूथ) का समीकरण अधिक भारी पड़ा.
बेशक, नीतीश कुमार महिलाओं में खासे लोकप्रिय हैं और उन्होंने सभी जाति और धर्मों की महिलाओं में अपना खास वोटर तबका तैयार किया है.
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| बिहार विधानसभा चुनाव 2025 पार्टीवार वोट शेयर |
आखिर बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार अब भी महिला मतदाताओं के बीच सबसे भरोसेमंद नेता क्यों हैं?
बिहार की राजनीति में एक दिलचस्प सामाजिक बदलाव पिछले दो दशकों में उभरा है, महिलाएँ अब सिर्फ़ वोटर नहीं, बल्कि चुनावी नतीजों को मोड़ने वाली निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं।
बिहार की राजनीतिक समझ रखने वाले लोग जानते हैं कि राज्य की चुनावी दिशा अब सिर्फ़ जातीय समीकरणों पर नहीं चलती। पिछले 20 साल में एक नया समीकरण उभरा है- लैंगिक समीकरण। और उसमें नीतीश कुमार ने एक स्थायी जगह बनाई है।
लेकिन सवाल यह है कि आख़िर क्यों बिहार की महिला मतदाता, बार-बार और बड़े पैमाने पर, नीतीश कुमार को प्राथमिकता देती हैं?
इसका उत्तर सिर्फ़ किसी एक योजना में नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक ढांचे में किए गए उन बदलावों में छिपा है, जिन्हें उन्होंने 2005 के बाद से लगातार आगे बढ़ाया।
आइए, नीतीश कुमार के इस वोट बैंक के “महिला समर्थन मॉडल” की परतें समझने की कोशिश करते हैं.
तालीम का रास्ता बदलने वाली ‘साइकिल’
आज की तारीख में बिहार के किसी भी सुदूर देहाती इलाके में चले जाइए, वहां की सड़कों पर एक चीज सामान्य रूप से दिखेगी. लड़कियां. साइकल चलाती स्कूली यूनिफॉर्म में सजी-धजी लड़कियां.
2005 से पहले यह अनुभव विरला ही था. अगर गांवों में स्कूल घर से दूर हुए तो लड़कियों का स्कूल से नाम कटा दिया जाता था. लेकिन बिहार में एक सरकारी योजना ने लड़कियों की शिक्षा का रास्ता बदल दिया और बिलाशक वह योजना नीतीश कुमार की थी. नीतीश ने बिहार में छात्राओं को मुख्यमंत्री साइकिल योजना के तहत स्कूल जाने के लिए साइकिलें देनी शुरू की थी.
आज की तारीख में बिहार के किसी भी सुदूर देहाती इलाके में चले जाइए, वहां की सड़कों पर एक चीज सामान्य रूप से दिखेगी. लड़कियां. साइकल चलाती स्कूली यूनिफॉर्म में सजी-धजी लड़कियां.
2005 से पहले यह अनुभव विरला ही था. अगर गांवों में स्कूल घर से दूर हुए तो लड़कियों का स्कूल से नाम कटा दिया जाता था. लेकिन बिहार में एक सरकारी योजना ने लड़कियों की शिक्षा का रास्ता बदल दिया और बिलाशक वह योजना नीतीश कुमार की थी. नीतीश ने बिहार में छात्राओं को मुख्यमंत्री साइकिल योजना के तहत स्कूल जाने के लिए साइकिलें देनी शुरू की थी.
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| स्रोतः बिहार सेकेंडरी एजुकेशन डिपार्टमेंट |
नीतीश कुमार साल 2005 के अक्तूबर-नवंबर के चुनाव में जीत के बाद सत्ता में आए थे और साल 2006 में नीतीश ने यह नया प्रयोग शुरू किया था. बिहार सरकार ने नवीं कक्षा में दाख़िल लड़की छात्राओं को साइकिल या साइकिल खरीदने के लिए नकद देने की नीति शुरू की तो मकसद साफ था: स्कूल तक का समय और दूरी घटाकर लड़कियों की स्कूली शिक्षा में दाखिले की दर और उनकी पढ़ाई बीच में न छूटे इसके दर को बेहतर करना.
यह न केवल एक योजना भर नहीं थी, यह कल्याणकारी हस्तक्षेप था, बल्कि इसे एक व्यावहारिक हस्तक्षेप कहना होगा जिसकी वजह से ‘स्कूल घर के करीब’ आ गया.
साल 2006 में इस योजना के तहत लड़कियों के साइकिल खरीदने के लिए नकद 2000 रुपए दिए जाते थे. लेकिन बाद में, जब डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर का चलन बढ़ा तो पैसे सीधे छात्राओं के खाते में जमा किए जाने लगे.
इस पहल को बाद में कई अर्थशास्त्रियों और विकास-विश्लेषकों ने अध्ययन का विषय बनाया. इस योजना को देश के कई अन्य राज्यों ने अपनाया. इसके असर पर दुनियाभर में अध्ययन हुए. अध्ययनों ने बताया कि साइकिल बांटने की यह योजना कन्या शिक्षा को बढ़ावा देने में कारगर रही है और न सिर्फ स्कूली शिक्षा में लड़कियों के दाखिले की दर बढ़ी है बल्कि ड्रॉप आउट दर भी कम हुई है.
इस पहल को बाद में कई अर्थशास्त्रियों और विकास-विश्लेषकों ने अध्ययन का विषय बनाया. इस योजना को देश के कई अन्य राज्यों ने अपनाया. इसके असर पर दुनियाभर में अध्ययन हुए. अध्ययनों ने बताया कि साइकिल बांटने की यह योजना कन्या शिक्षा को बढ़ावा देने में कारगर रही है और न सिर्फ स्कूली शिक्षा में लड़कियों के दाखिले की दर बढ़ी है बल्कि ड्रॉप आउट दर भी कम हुई है.
बिहार की इस मुख्यमंत्री साइकिल योजना के मॉडल को जाम्बिया समेत सात अफ्रीकी देशों ने अपनाया और संयुक्त राष्ट्र ने इसे स्कूली दाखिले को बढ़ावा देने और महिला सशक्तिकरण का शानदार तरीका बताया.
हालांकि, शुरू में यह योजना सिर्फ लड़कियों के लिए थी, लेकिन बाद में लड़कों को भी साइकिल योजना में शामिल किया गया और योजना का विस्तार हुआ.
बिहार सेंकेंडरी एजुकेशन डिपार्टमेंट के आंकड़ों के मुताबिक, 2007 से 2024 के बीच कुल 97,94,445 (यानी लगभग 97.9 लाख) छात्राओं को मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना के अंतर्गत साइकिल प्रदान किया जा चुका है.
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असल में बिहार में शिक्षा और साक्षरता का स्तर राष्ट्रीय औसत से काफी कम थे. ऐसे में, 2005 में सुशासन के नाम पर सत्ता में आई नीतीश कुमार की सरकार ने शिक्षा में सुधार लाने के लिए कुछ योजनाएं शुरू कीं. इनमें से एक था, हर पंचायत में एक हाई स्कूल खोलना और उन हाई स्कूलों तक पहुंचने के लिए बच्चों को साइकिल देना ताकि स्कूल और घर की दूरी घट सके.
बिलाशक, राज्य सरकार की इन कोशिशो ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया.
एनुएल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) के साल 2006 से 2014 के बीच के आंकड़े इस बात को साबित करते हैं कि स्कूली शिक्षा में दाखिले के स्तर पर बिहार ने ऊंची छलांग लगाई थी.
2006 में यह दर 72.2 फीसद थी, जो 2011 में 90.1 फीसद हो गई. 2006 में बिहार उन सात राज्यों में शुमार था जहां 11 से 14 साल की लड़कियों में दस से अधिक प्रतिशत लड़कियां स्कूल नहीं जाती थीं. 2006 में बिहार में 17.6 फीसद लड़कियों का दाखिला स्कूल में नहीं हुआ था लेकिन 2014 में यह घटकर 5.7 फीसद और 2024 में घटकर 2.5 फीसद रह गया है.
बात इतनी ही नहीं रही, बीच में 2012-13 में पहली बार स्कूली दाखिले के मामले में लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक हो गई थी.
एक अन्य आंकड़ा काफी सुखद रूप से चौंकाने वाला भी है. 2005 की दसवीं की परीक्षा में जहां छात्राओं की संख्या केवल 25,413 थी वहीं, 2025 की मैट्रिक-परीक्षा के पहले दिन की रिपोर्ट के अनुसार उस दिन उपस्थित कुल छात्रों में 8,18,122 लड़कियाँ थीं.
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| बिहार की साइकिल योजना का अनुकरण 7 अफ्रीकी देशों में किया जा रहा है और संयुक्त राष्ट्र ने भी इसकी तारीफ की है |
शिक्षा का नकद-नारायण
नीतीश कुमार की लोकप्रियता सिर्फ साइकिल बांटने वाली योजना तक सीमित नहीं है. मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना जन्म से लेकर स्नातक होने तक क्रमिक किस्तों में लड़कियों को सहायता देती है; जिसकी राशि 94,100 रुपए है। ग्रेजुएट पास करने वाली लड़कियों के लिए स्नातक-प्रोत्साहन की अलग कैटेगरी भी है।
मुख्यमंत्री स्नातक प्रोत्साहन योजना के तहत ग्रेजुएट होने वाली लड़कियों को 50 हजार रुपए का नकद प्रोत्साहन दिया जाता है, जबकि बारहवी पास करने वाली लड़कियों के लिए अलग कैटेगरी में 10 हजार रुपए की प्रोत्साहन दिया जाता है.
बिहार में लड़की की पढ़ाई अक्सर आर्थिक कारणों से छूट जाती थी, कॉपी-किताब से लेकर कॉलेज फीस तक हर पड़ाव पर मुश्किलें थीं। इस स्थिति को बदलने के लिए सरकार ने एक पूरा पैकेज तैयार किया. यह उस राज्य में बड़ा बदलाव था जहाँ माता-पिता अक्सर कहते थे, “लड़की है, ज़्यादा पढ़ाई का क्या फायदा?”
बहरहाल, अब जब डिग्री मिलने पर बैंक खाते में सीधा 50 हजार नकद आता है, तो परिवार का नज़रिया भी बदलता है। इसका राजनीतिक असर यह हुआ कि लाखों युवा महिलाएँ और उनके परिवार नीतीश कुमार को ‘लड़कियों का भविष्य सुरक्षित करने वाले नेता’ के रूप में देखने लगे।
आधी आबादी को सत्ता की चाबी
2006 में नीतीश कुमार ने पंचायतों में महिलाओं को 50 फीस आरक्षण दिया। यह कदम भारतीय राजनीति में पहली बार देखा गया था। इसका प्रभाव सिर्फ़ चुनावी नहीं था, इसने गाँवों की राजनीति को घरों तक पहुँचा दिया।
नीतीश कुमार के इस नीतिगत फैसले से हज़ारों महिलाएँ मुखिया, वार्ड सदस्य, जिला परिषद सदस्य बनीं। घर-गृहस्थी संभालने वाली महिलाएँ अब सार्वजनिक मुद्दों पर बोलने लगीं. स्थानीय सत्ता में महिलाओं की निर्णायक भूमिका बनी.
नतीजतन, ग्रामीण इलाकों की महिलाओं ने नीतीश कुमार को सिर्फ़ मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक अस्तित्व का निर्माता माना। उनका यह समर्थन आज भी कायम है।
महिला वोटरों के बीच नीतीश कुमार की इमेज अलग शराबबंदी की वजह से भी बनी है. सूबे की लाखों महिलाओं के घरों में शराबबंदी की वजह से शांति आई है. इसके अलावा, हर घर नल का जल, हर घर शौचालय, बिजली-कनेक्शन और गृह निर्माण सहायता जैसी योजनाओं ने नीतीश कुमार के लिए अपनी जाति-बिरादरी के बाहर महिलाओं का एक ऐसा वोटबैंक तैयार करने में मदद की, जो वोट देते समय जाति और धर्म नहीं देखती (या कम से कम नीतीश कुमार का यही दावा है)
नीतीश कुमार के साल 2000 में सात दिन और फिर 2005 के बाद से बिहार के हर चुनाव और हर सरकार में प्रासंगिक बने रहने के पीछे इसी नारीशक्ति का कमाल है.
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Wednesday, June 7, 2023
लोकसभा चुनाव 2024- पश्चिम बंगाल में बिछ गई जातीय बिसात, कुर्मी और संताल आदिवासी आमने-सामने
पश्चिम बंगाल (West Bengal) में लगता है लोकसभा चुनाव (Loksabha Election 2024) की तैयारियां ग्यारह महीने पहले से शुरू हो गई हैं. और इस बार पहल सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (Trinmool Congress) ने की है. असल में, पश्चिम बंगाल (West Bengal) के कुर्मी समुदाय (Kurmi) ने आरोप लगाया है कि राज्य में संताल जनजातीय समुदाय को उनके खिलाफ भड़काया जा रहा है और यह साजिश प्रशासन की है.
गौरतलब है कि कुर्मी समुदाय (Kurmi) के लोग पश्चिम बंगाल (West Bengal) में अनुसूचित जनजाति के दर्जे के लिए इन दिनों प्रदर्शन कर रहे हैं. कुर्मी नेता अजीत महतो ने कहा एक न्यूज एजेंसी को बताया, “आदिवासी समुदाय के लोगों को हमारे खिलाफ भड़काने की साफ साजिश है. इस साजिश के पीछे प्रशासन है. इस साजिश के पीछे मुख्य दिमाग कोलकाता से चल रहा है.”
हालांकि, उन्होंने कोई नाम देने से इनकार कर दिया.
कुर्मी जाति (Kurmi) के लोगों और राज्य सरकार के बीच कुछ समय से तनाव बढ़ रहा है. पहले एसटी दर्जे की मांग को लेकर लगातार विरोध कार्यक्रम आयोजित किए गए और फिर हाल ही में तृणमूल कांग्रेस (Trinmool Congress) के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के काफिले पर हमला हो गया. इससे तनाव चरम पर पहुंच गया है.
आरोप लगाए जा रहे हैं कि कथित तौर पर इस हमले के पीछे कुर्मी समुदाय (Kurmi) के लोगों का हाथ था. उस हमले में बनर्जी के काफिले में चल रहे पश्चिम बंगाल के मंत्री बीरबाहा हांसदा के वाहन को क्षतिग्रस्त कर दिया गया था. इधर, संताल समुदाय से आने वाली मंत्री हांसदा ने उस समय हमलावरों के खिलाफ तीखा हमला किया और अंत तक अंजाम भुगतने की धमकी भी दी.
मामले में अब तक पुलिस ने तीन शीर्ष कुर्मी (Kurmi) नेताओं समेत कुल 11 लोगों को गिरफ्तार किया है. महतो ने कहा कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग के समर्थन में आंदोलन जारी रखने के अलावा गिरफ्तार किए गए कुर्मी नेताओं की रिहाई की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन आने वाले दिनों में और उग्र होगा.
महतो ने कहा, प्रदर्शन के तहत सांसद व विधायक जैसे निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के आवास तक बाइक रैली निकाली जाएगी. हम राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था के आगामी चुनावों के लिए जल्द ही अपनी रणनीति को अंतिम रूप देंगे. हम अपनी मांग को पूरा करने के लिए अंत तक लड़ेंगे.
जो भी हो, जातीय द्वेष के आधार पर बंगाल में आगामी लोकसभा चुनाव (Loksabha Election 2024) काफी दिलचस्प होने वाला है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस (Trinmool Congress) के पास पहले ही मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव है. यह पिछले विधानसभा चुनाव 2021 में स्पष्ट दिखा था.
जिस बंगाल (West Bengal) की राजनीति को वर्गीय चेतना की राजनीति का गढ़ माना जाता था वहां अब पहले धार्मिक और अब जातीय विभेद राजनीति की दिशा तय करेंगे.
गौरतलब है कि कुर्मी समुदाय (Kurmi) के लोग पश्चिम बंगाल (West Bengal) में अनुसूचित जनजाति के दर्जे के लिए इन दिनों प्रदर्शन कर रहे हैं. कुर्मी नेता अजीत महतो ने कहा एक न्यूज एजेंसी को बताया, “आदिवासी समुदाय के लोगों को हमारे खिलाफ भड़काने की साफ साजिश है. इस साजिश के पीछे प्रशासन है. इस साजिश के पीछे मुख्य दिमाग कोलकाता से चल रहा है.”
हालांकि, उन्होंने कोई नाम देने से इनकार कर दिया.
कुर्मी जाति (Kurmi) के लोगों और राज्य सरकार के बीच कुछ समय से तनाव बढ़ रहा है. पहले एसटी दर्जे की मांग को लेकर लगातार विरोध कार्यक्रम आयोजित किए गए और फिर हाल ही में तृणमूल कांग्रेस (Trinmool Congress) के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के काफिले पर हमला हो गया. इससे तनाव चरम पर पहुंच गया है.
आरोप लगाए जा रहे हैं कि कथित तौर पर इस हमले के पीछे कुर्मी समुदाय (Kurmi) के लोगों का हाथ था. उस हमले में बनर्जी के काफिले में चल रहे पश्चिम बंगाल के मंत्री बीरबाहा हांसदा के वाहन को क्षतिग्रस्त कर दिया गया था. इधर, संताल समुदाय से आने वाली मंत्री हांसदा ने उस समय हमलावरों के खिलाफ तीखा हमला किया और अंत तक अंजाम भुगतने की धमकी भी दी.
मामले में अब तक पुलिस ने तीन शीर्ष कुर्मी (Kurmi) नेताओं समेत कुल 11 लोगों को गिरफ्तार किया है. महतो ने कहा कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग के समर्थन में आंदोलन जारी रखने के अलावा गिरफ्तार किए गए कुर्मी नेताओं की रिहाई की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन आने वाले दिनों में और उग्र होगा.
महतो ने कहा, प्रदर्शन के तहत सांसद व विधायक जैसे निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के आवास तक बाइक रैली निकाली जाएगी. हम राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था के आगामी चुनावों के लिए जल्द ही अपनी रणनीति को अंतिम रूप देंगे. हम अपनी मांग को पूरा करने के लिए अंत तक लड़ेंगे.
जो भी हो, जातीय द्वेष के आधार पर बंगाल में आगामी लोकसभा चुनाव (Loksabha Election 2024) काफी दिलचस्प होने वाला है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस (Trinmool Congress) के पास पहले ही मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव है. यह पिछले विधानसभा चुनाव 2021 में स्पष्ट दिखा था.
जिस बंगाल (West Bengal) की राजनीति को वर्गीय चेतना की राजनीति का गढ़ माना जाता था वहां अब पहले धार्मिक और अब जातीय विभेद राजनीति की दिशा तय करेंगे.
Tuesday, December 24, 2019
झारखंड में हर बार हारते हैं पदासीन विधानसभा अध्यक्ष
भले ही इसे चुनावी आंकड़ों का अंधविश्वास कहा जाए, पर ट्रेंड है कि झारखंड गठन के बाद से हर बार पीठासीन विधानसभा अध्यक्ष अपना अगला चुनाव हार जाते हैं. इस बार भी निवर्तमान विधानसभा स्पीकर दिनेश उरांव पराजय की कगार पर खड़े हैं
लेकिन एक दिलचस्प बात है कि सन् 2000 में झारखंड राज्य के अस्तित्व में आने के बाद से यहां की सियासत में कई उतार-चढ़ाव आए. 10 बार नेतृत्व परिवर्तन हुआ यानी मुख्यमंत्री पद पर बदलाव हुए. लेकिन एक बात हर बार सही होती रही. चुनाव के समय पीठासीन विधानसभा अध्यक्ष अपना अगला चुनाव हारते रहे. ऐसा 2005, 2009 और 2014 में हो चुका है. अब तक सारे पीठासीन विधानसभा अध्यक्ष अपना चुनाव जीतने में नाकाम रहे हैं. इस वक्त तक, सिसई विधानसभा सीट से किस्मत आजमा रहे निवर्तमान विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव करीब 29 हजार मतों से पीछे चल रहे हैं. (आखिरकार पराजित भी हुए)
2005 में झारखंड में विभाजन के बाद पहले चुनाव हुए थे और तब विधानसभा अध्यक्ष के पद पर एम.पी. सिंह बैठे थे. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उन्हें टिकट नहीं दिया था, क्योंकि जमशेदपुर पश्चिम सीट से पार्टी ने सरयू राय को टिकट दे दिया था. एम.पी. सिंह बगावत पर उतर आए और उन्होंने पार्टी छोड़कर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का दामन थाम लिया और उसके टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे. पर उन्होंने चुनाव मैदान में मात खानी पड़ी थी.
इसी तरह, 2009 के चुनाव से पहले विधानसभा अध्यक्ष की कुरसी पर आलमगीर आलम काबिज थे. पर उस चुनाव में कांग्रेस, राजद और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने गठबंधन की बजाए अलग-अलग चुनाव लड़ा था और पाकुड़ सीट से आलमगीर आलम चुनाव हार गए थे. पाकुड़ में झामुमो ने जीत दर्ज की थी. इसी तरह 2014 में झामुमो कांग्रेस और राजद फिर से किसी गठजोड़ के समझौते पर नहीं पहुंच पे थे और तब के स्पीकर शशांक शेखर भोक्ता देवघर जिले की सारठ विधानसभी सीट से चुनाव हार गए.
हालांकि, यह महज एक संयोग हो सकता है पर हर चुनावी हार के पीछे एक तर्क और मजबूत कारण तो होते ही हैं.
बहरहाल, विधानसभा के निवर्तमान अध्यक्ष दिनेश उरांव सिसई सीट से भाजपा उम्मीदवार हैं. इस खबर के लिखे जाने तक दिनेश उरांव को 42,879 वोट मिले थे जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी और झारखंड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार जीगा सुसरन होरो ने 71737 वोट हासिल कर लिए थे. करीब 29 हजार वोटो का यह अंतर इस वक्त पाटना मुश्किल ही लग रहा है.
ऐसे में भले ही पीठासीन विधानसभा अध्यक्ष के चुनावी प्रदर्शन को अंधविश्वास से जोड़ा जाए, पर लगातार चौथी बार आए नतीजे इस बात को पुष्ट ही करते हैं. आखिर, चुनावी नतीजे आंकड़ों के आधार पर ही तो विश्लेषित किए जाते हैं.
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Wednesday, December 11, 2019
झारखंड में बाबूलाल मरांडी अभी नहीं तो कभी नहीं
झाविमो के नेता बाबूलाल मरांडी झारखंड के पहले मुख्यमंत्री रहे हैं. भाजपा छोड़ने के बाद उन्हें कुछेक सियासी कामयाबियां जरूर मिलीं पर 2009 के बाद से उन्होंने एक भी चुनाव नहीं जीता है. चार चुनावों में लगातार पराजय का मुंह देख चुके मरांडी के लिए झारखंड विधानसभा का यह चुनाव करो या मरो जैसी स्थिति है
झारखंड (Jharkhand) जब बिहार से अलग हुआ था तो पहले मुख्यमंत्री बने थे बाबूलाल मरांडी (babulal Marandi). तब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) (Bhartiya Janata Party) के वे झारखंड (Jharkhand) के कद्दावर नेता माने जाते थे. पर 2006 में उन्होंने गुटबाजी का आरोप लगाकर पार्टी छोड़ दी और तब से उके सियासी करियर पर ग्रहण लगना शुरू हो गया है. पिछले दस साल से यानी 2009 के बाद बाबूलाल मरांडी (babulal Marandi) कोई चुनाव नहीं जीत पाये हैं.
मरांडी (babulal Marandi) लगातार चार चुनाव हार चुके हैं. उन्होंने अपना आखिरी चुनाव 2009 में जीता था. तब वे कोडरमा से सांसद चुने गये थे. कोडरमा से 2004 और 2006 के उपचुनाव में जीतकर लोकसभा पहुंचे थे. 2014 के लोकसभा चुनाव में वे दुमका चले गये जहां शिबू सोरेन ने उन्हें हरा दिया था.
2014 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने धनवार और गिरिडीह से परचा दाखिल किया था पर दोनों ही जगह से उनको पराजय का मुंह देखना पड़ा था. 2014 के बाद उनकी पार्टी के छह विधायक टूटकर भाजपा (Bhartiya Janata Party) में शामिल हो गए थे. इससे उनकी पार्टी और छवि दोनों को गहरा धक्का लगा था. लगातार चुनाव हारने से भी मरांडी (babulal Marandi) की छवि कमजोर नेता के तौर पर बनती जा रही है और दिखने लगा है कि अब बाबूलाल मरांडी (babulal Marandi) वह नेता नहीं रहे जो झारखंड (Jharkhand) स्थापना के वक्त थे.
2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कोडरमा से फिर से किस्मत आजमाई पर भाजपा (Bhartiya Janata Party) की अन्नपूर्णा देवी ने उन्हें करारी शिकस्त दी थी. और इस बार यानी 2019 के झारखंड विधानसभा चुनाव (Jharkhand Assembly Election) में भी उनके लिए मुकाबला कोई बहुत आसान नहीं है.
झारखंड (Jharkhand) के गिरिडीह जिले के राजधनवार विधानसभा क्षेत्र में इस बार झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी (babulal Marandi) की प्रतिष्ठा दांव पर है. इस सीट पर उन्हें तीन मजबूत उम्मीदवारों से चुनौती मिल रही है. इन चुनौतियों को देखकर सवाल पूछा जा रहा है कि क्या बाबूलाल मरांडी को इस बार चुनावी जीत मिल पाएगी? यहां 12 दिसम्बर को मतदान होना है.
अब बाबूलाल मरांडी के सामने अपने राजनीतिक कद को बरकरार रखने के साथ ही अपनी पार्टी झाविमो का अस्तित्व कायम रखने की भी चुनौती है. इस कारण यहां का मुकाबला दिलचस्प बना हुआ है, जिस पर पूरे राज्य की नजर है.
राजधनवार सीट पर अभी तक जो स्थिति उभरकर सामने आई है, उसके मुताबिक इस बार इस क्षेत्र में मुख्य मुकाबला झाविमो के मरांडी और भाकपा (माले) के मौजूदा विधायक राजकुमार यादव के बीच माना जा रहा है. परंतु भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) (Bhartiya Janata Party) के लक्ष्मण प्रसाद सिंह, निर्दलीय अनूप सौंथालिया और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के निजामुद्दीन अंसारी इस मुकाबले को बहुकोणीय बनाने में पूरा जोर लगाए हुए हैं.
मरांडी को इस इलाके में 2014 के विधानसभा चुनाव (Jharkhand Assembly Election) में हार का सामना करना पड़ा था. भाजपा (Bhartiya Janata Party) ने वर्ष 2014 के तीसरे स्थान पर रहे पूर्व पुलिस अधिकारी लक्ष्मण प्रसाद सिंह को एक बार फिर उम्मीदवार बनाया है, जबकि झामुमो ने निजामुद्दीन अंसारी को अपना प्रत्याशी बनाया है. भाकपा (माले) की ओर से मौजूदा विधायक राजकुमार यादव एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं.
पिछले विधानसभा चुनाव (Jharkhand Assembly Election) में राजकुमार ने मरांडी को 10 हजार से अधिक मतों से पराजित किया था. असल में, राजधनवार ऐसी सीट है, जिस पर जातीय समीकरण को साधना बेहद अहम है. इस सीट पर यादव, मुस्लिम और भूमिहार के मतदाता यहां निर्णायक साबित होते हैं.
इस चुनाव में इस क्षेत्र में कुल 14 प्रत्याशी हैं. लेकिन चुनाव झाविमो, झामुमो, भाजपा, भाकपा (माले) और निर्दलीय अनूप सौंथालिया को ही जानकार प्रमुख उम्मीदवारों में गिन रहे हैं.
क्षेत्र में सभी प्रमुख उम्मीदवारों की पकड़ अलग-अलग क्षेत्रों में है. आइएएनएस के मुताबिक, इस विधानसभा क्षेत्र में गांवा इलाके में भाकपा (माले) के प्रत्याशी की चर्चा अधिक है तो तिसरी में झाविमो, धनवार बाजार और धनवार ग्रामीण में भाजपा, झामुमो और निर्दलीय अनूप सौंथालिया की चर्चा सर्वाधिक है.
झाविमो के प्रत्याशी और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी आइएएनएस से कहते हैं कि "इस क्षेत्र में विकास कार्य पूरी तरह ठप है. आज भी लोग पानी, सड़क, बिजली और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे हैं. ऐसे में जनता सब देख रही है और चुनाव में जवाब देगी."
लेकिन मौजूदा विधायक राजकुमार यादव जीत का दावा करते हैं. उनका कहना है कि पंचायतों और गांवों में किसानों के लिए तालाब बनाए गए हैं और गांवों में बिजली पहुंचाई गई है. सड़कें बनी हैं. उन्होंने हालांकि यह भी माना कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है.
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Wednesday, December 12, 2018
राजपूत, गुर्जर और जाट के गुस्से ने ढहाया महारानी का किला
अगर पार्टी ने वसुंधरा का साथ दिया होता तो तस्वीर थोड़ी और बेहतर होती. मोदी अपनी जनसभाओं में कांग्रेस, राहुल, नीम कोटेड यूरिया की बात करते रहे, लेकिन वसुंधरा का नाम लेने से बचते रहे. अमित शाह ने भरे मंच से कहा था कि वसुंधरा आपने काम तो किया है, लेकिन अपना काम बता नहीं पाईं.
राजस्थान में कुल 200 सीटें हैं, इसमें से 199 सीटों पर चुनाव हुए थे. एक उम्मीदवार की मौत हो जाने के कारण 1 सीट पर मतदान नहीं कराया जा सका था.
आंकड़ों के मुताबिक कांग्रेस और उसके साथी 101 सीटें जीत गए हैं. वहीं, बीजेपी 75 सीटों पर आगे चल रही है. राजस्थान में 26 सीटों पर निर्दलीय और छोटी पार्टियों के उम्मीदवार आगे हैं जिससे तय है कि भाजपा से नाराजगी वाले सारे वोट कांग्रेस को ट्रांसफर नहीं हुए हैं. अगर ऐसा होता तो कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिल सकता था.
दूसरा, ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि राजस्थान में भाजपा का सूपड़ा साफ हो जाएगा, वैसा भी होता नहीं दिख रहा है. रुझानों को देखकर तो ऐसा लग रहा है कि अगर पार्टी ने वसुंधरा का साथ दिया होता तो तस्वीर थोड़ी और बेहतर होती. मोदी अपनी जनसभाओं में कांग्रेस, राहुल, नीम कोटेड यूरिया की बात करते रहे, लेकिन वसुंधरा का नाम लेने से बचते रहे.
अमित शाह ने तो भरे मंच से कह दिया था कि वसुंधरा आपने काम किया है, लेकिन अपना काम बता नहीं पाईं. राजस्थान में कांग्रेस को सीटें भले ही ज्यादा मिलती दिख रही हों, लेकिन दोनों के वोट प्रतिशत में मामूली अंतर है. कांग्रेस को 39.2 फीसदी मत मिले हैं वहीं भाजपा को 38.8 फीसदी वोट मिले हैं.
तो फिर भाजपा की संभावित हार की वजहें क्या रही हैं?
वसुंधरा राजे और भाजपा ने राजस्थान में पिछले चार साल में अपने वोट बैंक (जाट, गुर्जर और राजपूत) को हर तरह से दुलारकर रखने की कोशिश की. पर यह तीनों ही जातियां (जो राजस्थान की आबादी में करीबन 20 फीसदी हैं और जिनका असर पड़ोसी राज्यों हरियाणा और मध्य प्रदेश में भी है) भाजपा से नाराज हैं. सचिन पायलट के आने से गुर्जर समुदाय भी भाजपा से दूर हो रहा है.
जाटः मारवाड़ क्षेत्र समेत राज्य के 100 विधानसभा सीटों पर जाटों का असर है. यह समुदाय भाजपा से गुस्सा है, क्योंकि पार्टी में इनकी कोई खास जगह नहीं है. किसान होने की वजह से कृषि संकट भी एक सबब है. राजपूतों के मुकाबले कम तवज्जो मिलने से भी इस समुदाय में नाराजगी थी.
राजपूतः यह समुदाय अमूमन भाजपा का वफादार रहा है. हर विधानसभा में 15-17 राजपूत भाजपा के टिकट पर विधायक बनते रहे हैं. 2013 में कुल 27 राजपूत विधायकों में से 24 भाजपा से थे. पर इस जाति में बेचैनी है क्योंकि राजपूत नेताओं के खिलाफ मुकदमे किए गए. गैंगस्टर आनंदपाल की मुठभेड़ में मौत के बाद भी इस समुदाय में रोष है और करणी सेना पद्मावत मसले के बाद से सरकार से नाराज है.
जाटों के साथ राजपूतों का संघर्ष भी चल रहा है. भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे जसवंत सिंह की उपेक्षा और मानवेंद्र सिंह का कांग्रेस में जाना भी बड़ा फैक्टर है. राजपूत समुदाय करीब 100 विधानसभा सीटों पर मौजूद है.
गुर्जरः 50 सीटों पर इस समुदाय की मौजूदगी है. आरक्षण के मुद्दे पर गूजर भाजपा से नाराज थे. पुलिस फायरिंग और आपसी संघर्ष में 2007 के बाद से 70 से अधिक गूजर मारे गए हैं. सचिन पायलट को भावी मुख्यमंत्री के रूप में संभावना से कांग्रेस की तरफ इनका चुनाव अभियान में झुकाव बढ़ता देखा गया था. इन सारे फैक्टर भाजपा की संभावनाओं में पलीता लगाने वाले साबित हुए हैं.
चुनावी लिहाज से राजस्थान को मोटे तौर पांच क्षेत्रों में बांटा जाता है.
इनमें से एक तो जयपुर ही है. इस क्षेत्र में 19 सीटें हैं जिनमें शाम 6 बजे तक के रुझानों के मुताबिक, भाजपा के पास 6, कांग्रेस के पास 11 और अन्य के पास 2 सीटें जाती दिख रही हैं.
दूसरे चुनावी क्षेत्र मध्य राजस्थान में भी तीन इलाके हैं. धूंधड़ इलाके में अजमेर, सवाई माधोपुर, करौली, टोंक और दौसा 5 जिले हैं. इस इलाके में मीणा फैक्टर प्रभावी है. ऐसा माना जाता है कि मीणाओं का झुकाव भाजपा की तरफ था लेकिन इस इलाके में भाजपा को 8, कांग्रेस को 13 और अन्य को 3 सीटों पर बढ़त/जीत हासिल हुई है. ऐसे में आंकड़े कुछ और ही कहानी बयान करते हैं.
मध्य राजस्थान के मत्स्यांचल में 3 जिले हैं, भरतपुर, अलवर और धौलपुर. इनमें 22 सीटें हैं. यह इलाका सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का इलाका है. मीणा फैक्टर भी यहां काम करता है. फिर भी, यहां भाजपा 4, कांग्रेस 10 और अन्य 7 सीटों पर आगे है. तो इसका अर्थ है कि मंदिर मुद्दा यहां चला नहीं.
तीसरे क्षेत्र हाड़ौती में 4 जिले हैं, जिनमें कोटी बूंदी बाराँ और झालावाड़ हैं. इसमें 17 सीटें हैं और कांग्रेस बनाम भाजपा के सीधी टक्कर वाली 13 सीटें हैं, 4 सीटें बहुकोणीय मुकाबले वाली रही हैं. लेकिन भाजपा 9 और कांग्रेस 8 सीटों पर जीतती दिख रही है. यानी बाकी को कोण वाली पार्टियों को कुछ खास हासिल नहीं हुआ है.
तीसरा चुनावी इलाका, दक्षिणी राजस्थान है, जिसे मेवाड़ भी कहा जाता है.
यह इलाका हर पांच साल पर जनादेश बदल देता है. माना जाता है कि जो पार्टी मेवाड़ जीत लेती है वही सरकार बनाती है. खासकर सालुम्बर सीट खास सलिए है क्योंकि 1977 से जो पार्टी यह सीट जीतती है सरकार उसी की बनती आई है. मेवाड़ में 7 जिले हैं और 35 सीटें हैं. इनमें उदयपुर, डुंगरपुर, भीलवाड़ा, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, बांसवाड़ा के इलाके हैं. यहां 27 सीटों पर सीधी टक्कर थी. भीलवाड़ा सीपी जोशी के प्रभाव का इलाका है. 2009 में यहां भाजपा 9 और कांग्रेस 24 सीटों पर जीती थी. लेकिन इस बार भाजपा 19, कांग्रेस 13, अन्य 3 सीटों पर जीतती नजर आ रही है.
पश्चिमी राजस्थान का इलाका कांग्रेस के दिग्गज नेता अशोक गहलोत का है. यहां किसी तीसरी सियासी पार्टी का कोई वजूद नहीं है. कुल 43 सीटें इस इलाके में हैं जिनमें से 33 सीटों पर सीधी टक्कर थी. इस इलाके में ओबीसी और जाट वोट बेहद निर्णायक होते हैं. इसके अलावा मेघवाल, राजपुरोहित और राजपूतों का वोट भी अहम होता है.
इस इलाके के तहत जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, नागौर, जालौर, पाली और सिरोही जिले आते हैं. 2008 में भाजपा को 19 और कांग्रेस को 20 सीटें मिली थीं. अन्य को 4 सीटें हासिल हुई थीं. लेकिन इस बार 2018 में भाजपा को 15, कांग्रेस को 26 और अन्य को 3 सीटें मिलती दिख रही हैं.
उत्तरी राजस्थान में शेखावटी और बीकानेर दो जोन हैं. शेखावटी में सीकर, झूंझनूं और चुरू जिले हैं जिनमें 21 सीटें हैं. इस जोन में कांग्रेस को 14, भाजपा को 5 और अन्य को 2 सीटें मिलती दिख रही हैं.
बीकानेर जोन में बीकानेर, गंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में कुल 18 सीटें हैं. यहां भाजपा को 9, कांग्रेस को 6 और अन्य को 2 सीटें मिलती दिख रही हैं.
इस इलाके के जाट वोटबैंक का कांग्रेस की तरफ झुकाव था जबकि राजपूत अमूमन भाजपा को वोट करते रहे है.
वैसे, राजस्थान में अब बहस यह है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बनेंगे या सचिन पायलट, लेकिन कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, सीटों की संख्या के मद्देनजर जादूगर कहे जाने वाले गहलोत को ही कमानी सौंपी जा सकती है. युवा सचिन थोड़ा और इंतजार करने के लिए कहे जा सकते हैं.
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आंकड़ों के मुताबिक कांग्रेस और उसके साथी 101 सीटें जीत गए हैं. वहीं, बीजेपी 75 सीटों पर आगे चल रही है. राजस्थान में 26 सीटों पर निर्दलीय और छोटी पार्टियों के उम्मीदवार आगे हैं जिससे तय है कि भाजपा से नाराजगी वाले सारे वोट कांग्रेस को ट्रांसफर नहीं हुए हैं. अगर ऐसा होता तो कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिल सकता था.
दूसरा, ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि राजस्थान में भाजपा का सूपड़ा साफ हो जाएगा, वैसा भी होता नहीं दिख रहा है. रुझानों को देखकर तो ऐसा लग रहा है कि अगर पार्टी ने वसुंधरा का साथ दिया होता तो तस्वीर थोड़ी और बेहतर होती. मोदी अपनी जनसभाओं में कांग्रेस, राहुल, नीम कोटेड यूरिया की बात करते रहे, लेकिन वसुंधरा का नाम लेने से बचते रहे.
अमित शाह ने तो भरे मंच से कह दिया था कि वसुंधरा आपने काम किया है, लेकिन अपना काम बता नहीं पाईं. राजस्थान में कांग्रेस को सीटें भले ही ज्यादा मिलती दिख रही हों, लेकिन दोनों के वोट प्रतिशत में मामूली अंतर है. कांग्रेस को 39.2 फीसदी मत मिले हैं वहीं भाजपा को 38.8 फीसदी वोट मिले हैं.
तो फिर भाजपा की संभावित हार की वजहें क्या रही हैं?
वसुंधरा राजे और भाजपा ने राजस्थान में पिछले चार साल में अपने वोट बैंक (जाट, गुर्जर और राजपूत) को हर तरह से दुलारकर रखने की कोशिश की. पर यह तीनों ही जातियां (जो राजस्थान की आबादी में करीबन 20 फीसदी हैं और जिनका असर पड़ोसी राज्यों हरियाणा और मध्य प्रदेश में भी है) भाजपा से नाराज हैं. सचिन पायलट के आने से गुर्जर समुदाय भी भाजपा से दूर हो रहा है.
जाटः मारवाड़ क्षेत्र समेत राज्य के 100 विधानसभा सीटों पर जाटों का असर है. यह समुदाय भाजपा से गुस्सा है, क्योंकि पार्टी में इनकी कोई खास जगह नहीं है. किसान होने की वजह से कृषि संकट भी एक सबब है. राजपूतों के मुकाबले कम तवज्जो मिलने से भी इस समुदाय में नाराजगी थी.
राजपूतः यह समुदाय अमूमन भाजपा का वफादार रहा है. हर विधानसभा में 15-17 राजपूत भाजपा के टिकट पर विधायक बनते रहे हैं. 2013 में कुल 27 राजपूत विधायकों में से 24 भाजपा से थे. पर इस जाति में बेचैनी है क्योंकि राजपूत नेताओं के खिलाफ मुकदमे किए गए. गैंगस्टर आनंदपाल की मुठभेड़ में मौत के बाद भी इस समुदाय में रोष है और करणी सेना पद्मावत मसले के बाद से सरकार से नाराज है.
जाटों के साथ राजपूतों का संघर्ष भी चल रहा है. भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे जसवंत सिंह की उपेक्षा और मानवेंद्र सिंह का कांग्रेस में जाना भी बड़ा फैक्टर है. राजपूत समुदाय करीब 100 विधानसभा सीटों पर मौजूद है.
गुर्जरः 50 सीटों पर इस समुदाय की मौजूदगी है. आरक्षण के मुद्दे पर गूजर भाजपा से नाराज थे. पुलिस फायरिंग और आपसी संघर्ष में 2007 के बाद से 70 से अधिक गूजर मारे गए हैं. सचिन पायलट को भावी मुख्यमंत्री के रूप में संभावना से कांग्रेस की तरफ इनका चुनाव अभियान में झुकाव बढ़ता देखा गया था. इन सारे फैक्टर भाजपा की संभावनाओं में पलीता लगाने वाले साबित हुए हैं.
चुनावी लिहाज से राजस्थान को मोटे तौर पांच क्षेत्रों में बांटा जाता है.
इनमें से एक तो जयपुर ही है. इस क्षेत्र में 19 सीटें हैं जिनमें शाम 6 बजे तक के रुझानों के मुताबिक, भाजपा के पास 6, कांग्रेस के पास 11 और अन्य के पास 2 सीटें जाती दिख रही हैं.
दूसरे चुनावी क्षेत्र मध्य राजस्थान में भी तीन इलाके हैं. धूंधड़ इलाके में अजमेर, सवाई माधोपुर, करौली, टोंक और दौसा 5 जिले हैं. इस इलाके में मीणा फैक्टर प्रभावी है. ऐसा माना जाता है कि मीणाओं का झुकाव भाजपा की तरफ था लेकिन इस इलाके में भाजपा को 8, कांग्रेस को 13 और अन्य को 3 सीटों पर बढ़त/जीत हासिल हुई है. ऐसे में आंकड़े कुछ और ही कहानी बयान करते हैं.
मध्य राजस्थान के मत्स्यांचल में 3 जिले हैं, भरतपुर, अलवर और धौलपुर. इनमें 22 सीटें हैं. यह इलाका सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का इलाका है. मीणा फैक्टर भी यहां काम करता है. फिर भी, यहां भाजपा 4, कांग्रेस 10 और अन्य 7 सीटों पर आगे है. तो इसका अर्थ है कि मंदिर मुद्दा यहां चला नहीं.
तीसरे क्षेत्र हाड़ौती में 4 जिले हैं, जिनमें कोटी बूंदी बाराँ और झालावाड़ हैं. इसमें 17 सीटें हैं और कांग्रेस बनाम भाजपा के सीधी टक्कर वाली 13 सीटें हैं, 4 सीटें बहुकोणीय मुकाबले वाली रही हैं. लेकिन भाजपा 9 और कांग्रेस 8 सीटों पर जीतती दिख रही है. यानी बाकी को कोण वाली पार्टियों को कुछ खास हासिल नहीं हुआ है.
तीसरा चुनावी इलाका, दक्षिणी राजस्थान है, जिसे मेवाड़ भी कहा जाता है.
यह इलाका हर पांच साल पर जनादेश बदल देता है. माना जाता है कि जो पार्टी मेवाड़ जीत लेती है वही सरकार बनाती है. खासकर सालुम्बर सीट खास सलिए है क्योंकि 1977 से जो पार्टी यह सीट जीतती है सरकार उसी की बनती आई है. मेवाड़ में 7 जिले हैं और 35 सीटें हैं. इनमें उदयपुर, डुंगरपुर, भीलवाड़ा, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, बांसवाड़ा के इलाके हैं. यहां 27 सीटों पर सीधी टक्कर थी. भीलवाड़ा सीपी जोशी के प्रभाव का इलाका है. 2009 में यहां भाजपा 9 और कांग्रेस 24 सीटों पर जीती थी. लेकिन इस बार भाजपा 19, कांग्रेस 13, अन्य 3 सीटों पर जीतती नजर आ रही है.
पश्चिमी राजस्थान का इलाका कांग्रेस के दिग्गज नेता अशोक गहलोत का है. यहां किसी तीसरी सियासी पार्टी का कोई वजूद नहीं है. कुल 43 सीटें इस इलाके में हैं जिनमें से 33 सीटों पर सीधी टक्कर थी. इस इलाके में ओबीसी और जाट वोट बेहद निर्णायक होते हैं. इसके अलावा मेघवाल, राजपुरोहित और राजपूतों का वोट भी अहम होता है.
इस इलाके के तहत जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, नागौर, जालौर, पाली और सिरोही जिले आते हैं. 2008 में भाजपा को 19 और कांग्रेस को 20 सीटें मिली थीं. अन्य को 4 सीटें हासिल हुई थीं. लेकिन इस बार 2018 में भाजपा को 15, कांग्रेस को 26 और अन्य को 3 सीटें मिलती दिख रही हैं.
उत्तरी राजस्थान में शेखावटी और बीकानेर दो जोन हैं. शेखावटी में सीकर, झूंझनूं और चुरू जिले हैं जिनमें 21 सीटें हैं. इस जोन में कांग्रेस को 14, भाजपा को 5 और अन्य को 2 सीटें मिलती दिख रही हैं.
बीकानेर जोन में बीकानेर, गंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में कुल 18 सीटें हैं. यहां भाजपा को 9, कांग्रेस को 6 और अन्य को 2 सीटें मिलती दिख रही हैं.
इस इलाके के जाट वोटबैंक का कांग्रेस की तरफ झुकाव था जबकि राजपूत अमूमन भाजपा को वोट करते रहे है.
वैसे, राजस्थान में अब बहस यह है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बनेंगे या सचिन पायलट, लेकिन कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, सीटों की संख्या के मद्देनजर जादूगर कहे जाने वाले गहलोत को ही कमानी सौंपी जा सकती है. युवा सचिन थोड़ा और इंतजार करने के लिए कहे जा सकते हैं.
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Thursday, November 15, 2018
राजनीतिक पार्टियों को आरटीआइ के दायरे में क्यों नहीं लाती सरकार?
अभी हाल ही में एक मीम आया था, जिसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लोगों से चंदा मांगते दिखते थे और बाद में वेलकम-2 का एक सीन और परेश रावल का एक संदे्श आता है. यह मीम अरविंद केजरीवाल की हंसी उड़ाने के लिए था. और कामयाब रहा था.
पर आपको और हमें, सोचना चाहिए कि आखिर राजनीतिक दलों को चंदा कौन देता है, उनका खर्च कैसे चलता है? आपने कभी किसी पार्टी को चंदा दिया है? कितना दिया है? चुनावों पर उम्मीदवार और सियासी दल कितना खर्च करते है? जितना करते हैं उतना आपको बताते है और क्या वह चुनाव आयोग की तय सीमा के भीतर ही होता है? और अगर आपके पसंदीदा दल के प्रत्याशी तय स्तर से अधिक खर्च करते हैं (जो करते ही हैं) तो क्या वह भ्रष्टाचार में आएगा? प्रत्याशी जितनी रकम खर्च करते हैं वह चुनाव बाद उन्हें वापस कैसे मिलता है? और आपके मुहल्ले को नेता, जो दिन भर किसी नेता के आगे-पीछे घूमता रहता है उसके घर का खर्च कौन चलाता है?
अभी चार महीनों के बाद लोकसभा चुनाव होने वाले हैं. इन दिनों छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में चुनाव प्रक्रिया चल रही है. नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले चुनावी वादा किया था, न खाऊंगा न खाने दूंगा. ऐसा नहीं कि सरकार ने शुचिता के दायरे में राजनीतिक दलों को लाने की कोशिश नहीं की, पर प्रयास नाकाफी रहे. सरकार के हालिया प्रयासों के बावजूद भारत में चुनावी चंदा अब भी अपारदर्शी और काले धन से जुड़ी कवायद बना हुआ है. इसकी वजह से चुनाव सुधारों की प्रक्रिया बेअसर दिखती है.
अभी आने वाले लोकसभा चुनाव में अनुमान लगाया जा रहा है कि 50 से 60 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे. यह खर्च 2014 में कोई 35,000 करोड़ रु. था. जबकि हाल के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में 9.5 से 10 हजार करोड़ रु. खर्च हुआ. 2013 में कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनाव में इसकी ठीक आधी रकम खर्च हुई थी.
जरा ध्यान दीजिए कि राजनैतिक पार्टियां चंदा कैसे जुटाती हैं. आमतौर पर माना जाता है कि स्वैच्छिक दान, क्राउड फंडिंग (आपने कभी दिया? मैंने तो नहीं दिया) कूपन बेचना, पार्टी का साहित्य बेचना (उफ) सदस्यता अभियान (कितनी रकम लगती है पता कीजिए) और कॉर्पोरेट चंदे से पार्टियां पैसे जुटाती हैं.
निर्वाचन आयोग के नियमों के मुताबिक, पार्टियां 2000 रु. से अधिक कैश नहीं ले सकतीं. इससे ज्यादा चंदे का ब्योरा रखना जरूरी है. ज्यादातर पार्टियां 2000 रु. से ऊपर की रकम को 2000 रु. में बांटकर नियम का मखौल उड़ाती हैं क्योंकि 2000 रु. तक के दानदाता का नाम बताना जरूरी नहीं होता. एक जरूरी बात है कि स्थानीय और ठेकेदार नकद और अन्य सुविधाएं सीधे प्रत्याशी को देते हैं न कि पार्टी को.
कंपनियां चुनावी बॉन्ड या चुनाव ट्रस्ट की मार्फत सीधे चंदा दे सकती हैं, दानदाता के लिए यह बताना जरूरी नहीं है चंदा कि पार्टी को दिया, पार्टियों के लिए भी किससे चंदा लिया यह जाहिर करना जरूरी नहीं है.
तो अब यह भी जान लीजिए कि सियासी दल पैसे को खर्च कहां करती हैं. दल, पार्टी और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में, चुनावी रैली, खाना, परिवहन, और ठहरने में, कार्यकर्ताओं को तनख्वाह देने में, प्रिंट, डिजिटल और टीवी में विज्ञापन देने में खर्च करते हैं. चुनाव के दौरान प्रत्याशी नकद, सोना, शराब और अन्य चीजें भी बांटते हैं. मसलन फोन, टीवी. फ्रिज वगैरह. नया तरीका लोगों के मोबाइल रिचार्ज कराना और बिल भरना भी है. अब आप बताएं कि यह किसी एजेंसी की पकड़ में नहीं आएगा.
मोदी सरकार के उपाय
नरेंद्र मोदी सार्वजनिक जीवन में शुचिता का समर्थन करते रहे हों, पर उनकी सरकार के उपायो से भी यह शुचिता आई नहीं है. मसलन, सरकार ने पार्टियों द्वारा बेनामी नकद चंदे की सीमा पहले के 20,000 रु. से घटाकर 2,000 रु कर दी लेकिन नकद बेनामी चंदा लेने के लिए पार्टियों के लिए एक सीमा तय किए बगैर यह उपाय किसी काम का नहीं है.
पहले विदेशों से या विदेशी कंपनियों से चंदा लेना अपराध के दायरे में था. कांग्रेस और भाजपा दोनों पर विदेशों से धन लेने के आरोप थे. मोदी सरकार ने 1976 के विदेशी चंदा नियमन कानून में संशोधन कर दिया है जिससे राजनीतिक दलों के विदेशों से मिलने वाले चंदे का जायज बना दिया गया. यानी 1976 के बाद से राजनैतिक पार्टियों के चंदे की जांच नहीं की जा सकती. राजनैतिक दल अब विदेशी कंपनियों से चंदा ले पाएंगे. लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि इससे दूसरे देश हमारे चुनावों में दखल देने लायक हो जाएंगे?
शायद भारतीय चुनाव अभी तक विदेशी असरात से बचा रहा है, लेकिन चुनावों पर कॉर्पोरेट के असर से इनकार नहीं किया जा सकता. पार्टियों को ज्ञात स्रोतों से मिले चंदे में 2012 से 2016 के बीच कॉर्पोरेट चंदा कुल प्राप्त रकम का 89 फीसदी है.
मोदी सरकार ने 2017 में कॉर्पोरेट चंदे में कंपनी के तीन साल के फायदे के 7.5 फीसदी की सीमा को हटा दिया. कंपनी को अपने बही-खाते में इस चंदे का जिक्र करने की अनिवार्यता भी हटा दी गई. हटाने से पार्टियों के लिए बोगस कंपनियों के जरिए काला धन लेना आसान हो जाएगा. लग तो ऐसा रहा है कि यह प्रावधान फर्जी कंपनियों के जरिए काले धन को खपाने का एक चोर दरवाजा है.
कुल मिलाकर राजनैतिक शुचिता को लेकर भाजपा से लेकर तमाम दलों में कोई दिलचस्पी नहीं है. इसको लेकर भी एक आंकड़ा है, 2016-17 में छह बड़ी राजनैतिक पार्टियों के कुल चुनावी चंदे का बेनामी स्रोतो से आया हिस्सा 46 फीसदी है. समझ में नहीं आता कि अगर सरकार वाक़ई पारदर्शिता लाना चाहती है तो सियासी दलों को आरटीआइ के दायरे में क्यों नहीं लाती?
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पर आपको और हमें, सोचना चाहिए कि आखिर राजनीतिक दलों को चंदा कौन देता है, उनका खर्च कैसे चलता है? आपने कभी किसी पार्टी को चंदा दिया है? कितना दिया है? चुनावों पर उम्मीदवार और सियासी दल कितना खर्च करते है? जितना करते हैं उतना आपको बताते है और क्या वह चुनाव आयोग की तय सीमा के भीतर ही होता है? और अगर आपके पसंदीदा दल के प्रत्याशी तय स्तर से अधिक खर्च करते हैं (जो करते ही हैं) तो क्या वह भ्रष्टाचार में आएगा? प्रत्याशी जितनी रकम खर्च करते हैं वह चुनाव बाद उन्हें वापस कैसे मिलता है? और आपके मुहल्ले को नेता, जो दिन भर किसी नेता के आगे-पीछे घूमता रहता है उसके घर का खर्च कौन चलाता है?
अभी चार महीनों के बाद लोकसभा चुनाव होने वाले हैं. इन दिनों छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में चुनाव प्रक्रिया चल रही है. नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले चुनावी वादा किया था, न खाऊंगा न खाने दूंगा. ऐसा नहीं कि सरकार ने शुचिता के दायरे में राजनीतिक दलों को लाने की कोशिश नहीं की, पर प्रयास नाकाफी रहे. सरकार के हालिया प्रयासों के बावजूद भारत में चुनावी चंदा अब भी अपारदर्शी और काले धन से जुड़ी कवायद बना हुआ है. इसकी वजह से चुनाव सुधारों की प्रक्रिया बेअसर दिखती है.
अभी आने वाले लोकसभा चुनाव में अनुमान लगाया जा रहा है कि 50 से 60 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे. यह खर्च 2014 में कोई 35,000 करोड़ रु. था. जबकि हाल के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में 9.5 से 10 हजार करोड़ रु. खर्च हुआ. 2013 में कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनाव में इसकी ठीक आधी रकम खर्च हुई थी.
जरा ध्यान दीजिए कि राजनैतिक पार्टियां चंदा कैसे जुटाती हैं. आमतौर पर माना जाता है कि स्वैच्छिक दान, क्राउड फंडिंग (आपने कभी दिया? मैंने तो नहीं दिया) कूपन बेचना, पार्टी का साहित्य बेचना (उफ) सदस्यता अभियान (कितनी रकम लगती है पता कीजिए) और कॉर्पोरेट चंदे से पार्टियां पैसे जुटाती हैं.
निर्वाचन आयोग के नियमों के मुताबिक, पार्टियां 2000 रु. से अधिक कैश नहीं ले सकतीं. इससे ज्यादा चंदे का ब्योरा रखना जरूरी है. ज्यादातर पार्टियां 2000 रु. से ऊपर की रकम को 2000 रु. में बांटकर नियम का मखौल उड़ाती हैं क्योंकि 2000 रु. तक के दानदाता का नाम बताना जरूरी नहीं होता. एक जरूरी बात है कि स्थानीय और ठेकेदार नकद और अन्य सुविधाएं सीधे प्रत्याशी को देते हैं न कि पार्टी को.
कंपनियां चुनावी बॉन्ड या चुनाव ट्रस्ट की मार्फत सीधे चंदा दे सकती हैं, दानदाता के लिए यह बताना जरूरी नहीं है चंदा कि पार्टी को दिया, पार्टियों के लिए भी किससे चंदा लिया यह जाहिर करना जरूरी नहीं है.
तो अब यह भी जान लीजिए कि सियासी दल पैसे को खर्च कहां करती हैं. दल, पार्टी और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में, चुनावी रैली, खाना, परिवहन, और ठहरने में, कार्यकर्ताओं को तनख्वाह देने में, प्रिंट, डिजिटल और टीवी में विज्ञापन देने में खर्च करते हैं. चुनाव के दौरान प्रत्याशी नकद, सोना, शराब और अन्य चीजें भी बांटते हैं. मसलन फोन, टीवी. फ्रिज वगैरह. नया तरीका लोगों के मोबाइल रिचार्ज कराना और बिल भरना भी है. अब आप बताएं कि यह किसी एजेंसी की पकड़ में नहीं आएगा.
मोदी सरकार के उपाय
नरेंद्र मोदी सार्वजनिक जीवन में शुचिता का समर्थन करते रहे हों, पर उनकी सरकार के उपायो से भी यह शुचिता आई नहीं है. मसलन, सरकार ने पार्टियों द्वारा बेनामी नकद चंदे की सीमा पहले के 20,000 रु. से घटाकर 2,000 रु कर दी लेकिन नकद बेनामी चंदा लेने के लिए पार्टियों के लिए एक सीमा तय किए बगैर यह उपाय किसी काम का नहीं है.
पहले विदेशों से या विदेशी कंपनियों से चंदा लेना अपराध के दायरे में था. कांग्रेस और भाजपा दोनों पर विदेशों से धन लेने के आरोप थे. मोदी सरकार ने 1976 के विदेशी चंदा नियमन कानून में संशोधन कर दिया है जिससे राजनीतिक दलों के विदेशों से मिलने वाले चंदे का जायज बना दिया गया. यानी 1976 के बाद से राजनैतिक पार्टियों के चंदे की जांच नहीं की जा सकती. राजनैतिक दल अब विदेशी कंपनियों से चंदा ले पाएंगे. लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि इससे दूसरे देश हमारे चुनावों में दखल देने लायक हो जाएंगे?
मोदी सरकार ने 2017 में कॉर्पोरेट चंदे में कंपनी के तीन साल के फायदे के 7.5 फीसदी की सीमा को हटा दिया. कंपनी को अपने बही-खाते में इस चंदे का जिक्र करने की अनिवार्यता भी हटा दी गई. हटाने से पार्टियों के लिए बोगस कंपनियों के जरिए काला धन लेना आसान हो जाएगा. लग तो ऐसा रहा है कि यह प्रावधान फर्जी कंपनियों के जरिए काले धन को खपाने का एक चोर दरवाजा है.
कुल मिलाकर राजनैतिक शुचिता को लेकर भाजपा से लेकर तमाम दलों में कोई दिलचस्पी नहीं है. इसको लेकर भी एक आंकड़ा है, 2016-17 में छह बड़ी राजनैतिक पार्टियों के कुल चुनावी चंदे का बेनामी स्रोतो से आया हिस्सा 46 फीसदी है. समझ में नहीं आता कि अगर सरकार वाक़ई पारदर्शिता लाना चाहती है तो सियासी दलों को आरटीआइ के दायरे में क्यों नहीं लाती?
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Monday, February 5, 2018
मध्य प्रदेश में किसानों बटाईदारों का भाजपाई वोट कैसे बचाएंगे शिवराज?
समर पर समर फतह करती जा रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) मध्य प्रदेश के नगर निकाय चुनाव के नतीजों के बाद शायद में कुछ कसमसाहट में आए. मध्य प्रदेश के नगर निकाय चुनावों में कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी है और मुकाबला बराबरी पर छूटा है. दोनों पार्टियों को 9-9 सीटें मिली हैं. एक सीट निर्दलीय के खाते में गई है.
भाजपा के लिए यह कोई अच्छी खबर नहीं है. खासकर चुनावी साल में.
इस सूबे में असंतोष की वजह क्या है? खासकर, किसानों के बीच गुस्से की वजह को जानना बेहद जरूरी है. पिछले कुछ साल में मध्य प्रदेश की छवि कृषि उत्पादन के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करने वाले सूबे की बनी है. यहां राज्य सरकार ने सिंचाई का रकबा बढ़ाने में भी जोरदार काम किया. फिर भी किसान दुखी और निराश क्यों है? पिछले साल जून के महीने से ही सूबे की किसान हितैषी छवि को धक्का लगना शुरू हुआ, जब मंदसौर में किसान आंदोलन पर उतर आए थे. पुलिस ने आंदोलनरत किसानों पर गोलीबारी भी की थी.
यह मानना गलत नहीं होगा कि भारत में खेती-बाड़ी अपने बुरे दौर से गुजर रही है और इसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को धक्का पहुंचाया है. जाहिर है, कृषि और किसानों की समस्या अब सियासत के केंद्र में है.
कृषि की इन समस्याओं की वजह से ही गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा को ग्रामीण सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा था. अब मध्य प्रदेश के निकाय चुनावों में औसत प्रदर्शन से भाजपा यह सोचने के लिए मजबूर होगी कि शिवराज सिंह चौहान के लगातार तीन बार के कार्यकाल से सत्ताविरोधी रुझान से निपटना एक चुनौती तो है ही, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लगे झटके के बाद ग्रामीण वोट संभाले रखना भी अहम है.
मध्य प्रदेश में करीब 72 फीसदी ग्रामीण वोट हैं. एक आंकड़ा बताता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में 49 फीसद से अधिक किसानों ने एनडीए को वोट दिया था. साथ ही, एक तिहाई भूमिहीन बटाईदारों का वोट भी एनडीए को ही मिला था.
इन्हीं वोटों के दम पर शिवराज सिंह चौहान पिछले दो चुनावों में सत्ता-विरोधी रुझान को थामने में कामयाब रहे थे. लेकिन उन्हें याद रखना होगा कि 230 सीटों वाली मध्य प्रदेश विधानसभा में से कम से कम 60-70 सीटें ऐसी थीं, जहां भाजपा ने थोड़े ही अंतर से जीत दर्ज की थी.
2013 के विधानसभा चुनाव के लिहाज से इलाकावार तरीके से अगर भाजपा और कांग्रेस के सीटों को देखें तो यह अंतर साफ दिख जाएगा, जहां भाजपा को मामूली बढ़त मिली थी. साथ ही यह भी साफ होगा कि उत्तरी मालवा कैसे भाजपा के मजबूत गढ़ के रूप में स्थापित हो गया था. 2013 में भाजपा को कुल 165, कांग्रेस को 58 और अन्य को 7 सीटें मिली थीं.
मध्य प्रदेश के चंबल इलाके में कुल 34 विधानसभा सीटें हैं जहां भाजपा ने 20 सीटें हासिल की थीं और कांग्रेस 12 सीटे लेकर आई थीं. लेकिन दोनों के वोट हिस्सेदारी में महज दो फीसदी का ही अंतर था. भाजपा को 37.9 फीसदी वोट मिले थे और कांग्रेस को 35.6 फीसदी.
विंध्य प्रदेश की 56 सीटों में से भाजपा को सीटें 36 सीटें और 39.1 फीसदी वोट मिले थे जबकि कांग्रेस कांग्रेस 18 सीटें और 33 फीसदी वोट हासिल करने में कामयाब रही थी.
महाकौशल इलाके में कुल 49 सीटें हैं. यहां वोट शेयर में दोनों पार्टियों में गहरा अंतर था. वोट शेयर में यह अंतर करीब दस फीसदी का था. यहां भाजपा ने 34 और कांग्रेस ने 14 सीटें जीती थीं.
उत्तरी मालवा में कुल 63 और जनजातीय मालवा इलाके में 28 सीटें हैं. इन दोनों इलाकों में भाजपा को क्रमशः 51.8 और 45.8 फीसदी वोट मिले थे. उत्तरी मालवा में भाजपा ने दबदबा कायम करते हुए 55 सीटें जीत ली थीं और कांग्रेस को महज 7 सीटों पर समेट दिया. कांग्रेस को वोट भी 37.8 फीसदी मिले. जनजातीय मालवा में भाजपा को 20 सीटें मिली थीं और कांग्रेस यहां भी सिर्फ 7 सीट ही जीत पाई थी. लेकिन उसे वोट करीब 40 फीसदी मिले थे.
लेकिन इस बार शिवराज सिंह चौहान के लिए चुनौती ज्यादा कठिन है क्योंकि ग्रामीण मध्य प्रदेश का बड़ा तबका उनसे नाराज है. खासकर, जिस सीमांत भूमिहीन किसान और छोटी जोत वाले किसानों ने भाजपा को वोट दिया था, वह उससे बिदके हुए लग रहे हैं.
असल में, मध्य प्रदेश के किसानों की आमदनी कम बारिश और बदलते मौसम की वजह से खराब होती फसलों की वजह से पिछले दो सालों से कम होती गई है. उनकी हालत 2013-14 से ही खराब होनी शुरू हुई है जब खेती का जीडीपी सिकुड़कर 1.14 फीसदी रह गया और उसके अगले साल यह बढ़कर 4.6 फीसदी तो हुआ लेकिन फिर 2015-16 में घटकर 1.7 फीसदी ही रह गया. अब आंकड़ों में एक जादुई उछाल दिखा, जब 2016-17 के आंकड़ों ने इस वृद्धि को 22 फीसदी से अधिक बता दिया.
इसके पीछे सामान्य वजह थी कि एक साल पहले के खराब उत्पादन के बाद बंपर उपज ने वृद्धि के आंकड़े को आसमान तक पहुंचा दिया. लेकिन नोटबंदी और फिर जीएसटी ने उपज की कीमतों को धराशायी कर दिया. ऐसे में किसान चाहते हैं कि सरकार उनकी लागत का डेढ़ गुना कीमत दिलवाने का आश्वासन दे और उनके सारे कर्ज माफ कर दिए जाएं.
हालांकि, शिवराज सिंह चौहान इस गुस्से को थामने के लिए कोशिश कर रहे हैं और उन्होंने मुख्यमंत्री भावांतर भुगतान योजना शुरू की है, जिसके तहत बादजार में उपज बेच पाने में नाकाम किसानों को सीधे सरकार मूल्य देगी. फिर भी किसान असंतुष्ट हैं और ऐसे मौके पर, जब चुनाव को बहुत ज्यादा वक्त नहीं बचा है, भाजपा को अपनी रणनीति को अलग नजरिए के साथ तैयार करना होगा.
आखिर कांग्रेसमुक्त भारत का सपना देखने वाली भाजपा के लिए शिवराज समस्यामुक्त मध्य प्रदेश तो बनाना ही चाहेंगे.
भाजपा के लिए यह कोई अच्छी खबर नहीं है. खासकर चुनावी साल में.
इस सूबे में असंतोष की वजह क्या है? खासकर, किसानों के बीच गुस्से की वजह को जानना बेहद जरूरी है. पिछले कुछ साल में मध्य प्रदेश की छवि कृषि उत्पादन के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करने वाले सूबे की बनी है. यहां राज्य सरकार ने सिंचाई का रकबा बढ़ाने में भी जोरदार काम किया. फिर भी किसान दुखी और निराश क्यों है? पिछले साल जून के महीने से ही सूबे की किसान हितैषी छवि को धक्का लगना शुरू हुआ, जब मंदसौर में किसान आंदोलन पर उतर आए थे. पुलिस ने आंदोलनरत किसानों पर गोलीबारी भी की थी.
यह मानना गलत नहीं होगा कि भारत में खेती-बाड़ी अपने बुरे दौर से गुजर रही है और इसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को धक्का पहुंचाया है. जाहिर है, कृषि और किसानों की समस्या अब सियासत के केंद्र में है.
कृषि की इन समस्याओं की वजह से ही गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा को ग्रामीण सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा था. अब मध्य प्रदेश के निकाय चुनावों में औसत प्रदर्शन से भाजपा यह सोचने के लिए मजबूर होगी कि शिवराज सिंह चौहान के लगातार तीन बार के कार्यकाल से सत्ताविरोधी रुझान से निपटना एक चुनौती तो है ही, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लगे झटके के बाद ग्रामीण वोट संभाले रखना भी अहम है.
मध्य प्रदेश में करीब 72 फीसदी ग्रामीण वोट हैं. एक आंकड़ा बताता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में 49 फीसद से अधिक किसानों ने एनडीए को वोट दिया था. साथ ही, एक तिहाई भूमिहीन बटाईदारों का वोट भी एनडीए को ही मिला था.
इन्हीं वोटों के दम पर शिवराज सिंह चौहान पिछले दो चुनावों में सत्ता-विरोधी रुझान को थामने में कामयाब रहे थे. लेकिन उन्हें याद रखना होगा कि 230 सीटों वाली मध्य प्रदेश विधानसभा में से कम से कम 60-70 सीटें ऐसी थीं, जहां भाजपा ने थोड़े ही अंतर से जीत दर्ज की थी.
2013 के विधानसभा चुनाव के लिहाज से इलाकावार तरीके से अगर भाजपा और कांग्रेस के सीटों को देखें तो यह अंतर साफ दिख जाएगा, जहां भाजपा को मामूली बढ़त मिली थी. साथ ही यह भी साफ होगा कि उत्तरी मालवा कैसे भाजपा के मजबूत गढ़ के रूप में स्थापित हो गया था. 2013 में भाजपा को कुल 165, कांग्रेस को 58 और अन्य को 7 सीटें मिली थीं.
मध्य प्रदेश के चंबल इलाके में कुल 34 विधानसभा सीटें हैं जहां भाजपा ने 20 सीटें हासिल की थीं और कांग्रेस 12 सीटे लेकर आई थीं. लेकिन दोनों के वोट हिस्सेदारी में महज दो फीसदी का ही अंतर था. भाजपा को 37.9 फीसदी वोट मिले थे और कांग्रेस को 35.6 फीसदी.
विंध्य प्रदेश की 56 सीटों में से भाजपा को सीटें 36 सीटें और 39.1 फीसदी वोट मिले थे जबकि कांग्रेस कांग्रेस 18 सीटें और 33 फीसदी वोट हासिल करने में कामयाब रही थी.
महाकौशल इलाके में कुल 49 सीटें हैं. यहां वोट शेयर में दोनों पार्टियों में गहरा अंतर था. वोट शेयर में यह अंतर करीब दस फीसदी का था. यहां भाजपा ने 34 और कांग्रेस ने 14 सीटें जीती थीं.
उत्तरी मालवा में कुल 63 और जनजातीय मालवा इलाके में 28 सीटें हैं. इन दोनों इलाकों में भाजपा को क्रमशः 51.8 और 45.8 फीसदी वोट मिले थे. उत्तरी मालवा में भाजपा ने दबदबा कायम करते हुए 55 सीटें जीत ली थीं और कांग्रेस को महज 7 सीटों पर समेट दिया. कांग्रेस को वोट भी 37.8 फीसदी मिले. जनजातीय मालवा में भाजपा को 20 सीटें मिली थीं और कांग्रेस यहां भी सिर्फ 7 सीट ही जीत पाई थी. लेकिन उसे वोट करीब 40 फीसदी मिले थे.
लेकिन इस बार शिवराज सिंह चौहान के लिए चुनौती ज्यादा कठिन है क्योंकि ग्रामीण मध्य प्रदेश का बड़ा तबका उनसे नाराज है. खासकर, जिस सीमांत भूमिहीन किसान और छोटी जोत वाले किसानों ने भाजपा को वोट दिया था, वह उससे बिदके हुए लग रहे हैं.
असल में, मध्य प्रदेश के किसानों की आमदनी कम बारिश और बदलते मौसम की वजह से खराब होती फसलों की वजह से पिछले दो सालों से कम होती गई है. उनकी हालत 2013-14 से ही खराब होनी शुरू हुई है जब खेती का जीडीपी सिकुड़कर 1.14 फीसदी रह गया और उसके अगले साल यह बढ़कर 4.6 फीसदी तो हुआ लेकिन फिर 2015-16 में घटकर 1.7 फीसदी ही रह गया. अब आंकड़ों में एक जादुई उछाल दिखा, जब 2016-17 के आंकड़ों ने इस वृद्धि को 22 फीसदी से अधिक बता दिया.
इसके पीछे सामान्य वजह थी कि एक साल पहले के खराब उत्पादन के बाद बंपर उपज ने वृद्धि के आंकड़े को आसमान तक पहुंचा दिया. लेकिन नोटबंदी और फिर जीएसटी ने उपज की कीमतों को धराशायी कर दिया. ऐसे में किसान चाहते हैं कि सरकार उनकी लागत का डेढ़ गुना कीमत दिलवाने का आश्वासन दे और उनके सारे कर्ज माफ कर दिए जाएं.
हालांकि, शिवराज सिंह चौहान इस गुस्से को थामने के लिए कोशिश कर रहे हैं और उन्होंने मुख्यमंत्री भावांतर भुगतान योजना शुरू की है, जिसके तहत बादजार में उपज बेच पाने में नाकाम किसानों को सीधे सरकार मूल्य देगी. फिर भी किसान असंतुष्ट हैं और ऐसे मौके पर, जब चुनाव को बहुत ज्यादा वक्त नहीं बचा है, भाजपा को अपनी रणनीति को अलग नजरिए के साथ तैयार करना होगा.
आखिर कांग्रेसमुक्त भारत का सपना देखने वाली भाजपा के लिए शिवराज समस्यामुक्त मध्य प्रदेश तो बनाना ही चाहेंगे.
Monday, April 10, 2017
बंगाल में बीजेपी की उर्वर होती ज़मीन
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया, और पार्टी अब उन इलाकों में पैठ बनाना चाह रही है, जहां उसका प्रचार-प्रसार उतना ज्यादा नहीं है। उन राज्यों में केरल और पश्चिम बंगाल हैं। पिछले साल पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव ने वोट प्रतिशत के हिसाब से अपना अच्छा प्रदर्शन किया। हालांकि, यह 2014 के लोकसभा चुनाव के वोट प्रतिशत से कम था, लेकिन 2011 के विधानसभा चुनावों से तकरीबन दोगुना था।
पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव बीजेपी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि जिन दो लोकसभा सीटों पर बंगाल में बीजेपी ने जीत दर्ज की थी, अब उस आधार को बढ़ाना जरूरी है। 2014 के आम चुनाव में बीजेपी को मिली दो लोकसभा सीटें मूलरूप से उन इलाकों में है, जहां बंगलाभाषी जनता का बहुमत नहीं है। आसनसोल सीट में हिन्दी-भोजपुरी बोलने वाले गैर-बांगलाभाषी लोगों का वोट अधिक है, तो दूसरी सट दार्जिलिंग की है, जहां का समीकरण बाकी के बंगाल से अलहदा है।
पश्चिम बंगाल बीजेपी की राज्य इकाई ने पंचायत चुनावों के मद्देनजर उत्तर प्रदेश के अपने समकक्षों से सुझाव लेना शुरू कर दिया है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर उभरने के लिए उसने त्रिस्तरीय रणनीति भी बनाई है।
बीजेपी यूपी में शानदार जीत के बाद बंगाल पर ध्यान केन्द्रित कर रही है, जहां ममता बनर्जी सरकार की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई है। बीजेपी मुस्लिम तुष्टीकरण करके ध्रुवीकरण करने की अपनी नीति पर ही काम करेगी। दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस, बीजेपी की इस बढ़त को रोकने के लिए वामपंथी पार्टियों से भी हाथ मिला सकती हैं। वैसे, इस महाजोट (जिसमें कांग्रेस और तृणमूल तो स्वाभाविक रूप से होंगे) की संभावना दूर की कौड़ी है। लेकिन बीजेपी अपने जनाधार को बढ़ाने के लिए हरमुमकिन उपाय कर रही है।
वैसे भी, वाम के किले मे दरार के बाद बीजेपी के अंदरूनी रणनीतिकार तबके को लगने लगा है कि बंगाल में एक ऐसे राजनीति दल की आवश्यकता है जो तृणमूल को चुनौती दे सके। बंगाल में बीजेपी के पास फिलहाल कोई बड़ा चेहरा नहीं है। बाबुल सुप्रियो केन्द्र में मंत्री हैं, लेकिन जनाधार वाले नेता नहीं है। कम से कम आसनसोल के बाहर उनका असर अभी दिखता नहीं है। रूपा गांगुली ज़रूर उत्तर बंगाल में असर दिखा सकती हैं, और पार्टी के कैडर में उनकी स्वीकार्यता अगर बढ़ी तो वह स्वाभाविक नेतृत्व दे सकती हैं। राहुल सिन्हा और दिलीप घोष बंगाल बीजेपी के बड़े नेता तो हैं लेकिन असरहीन हैं।
इसलिए बंगाल में भी संभवतया उसी रणनीति पर काम किया जाएगा। यानी अगर दूसरे दलों के नेता भाजपा में शामिल होना चाहें तो पार्टी उनका स्वागत करेगी। राज्य इकाई
प्रशिक्षित और पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की एक फौज बना रही है, जो राज्य के प्रत्येक जिले में जा कर नरेंद्र मोदी सरकार की उपलब्धियों और तृणमूल सरकार के कुशासन के बारे में लोगों को बता सके।
बंगाल में बीजेपी अगर अपने इस नेताओं की कमी वाले संकट से निबट ले तो उसके लिए विस्तार की एक उर्वर ज़मीन तैयार है। उत्तर बंगाल में, जो कांग्रेस का पुराना और मजबूत गढ़ रहा है, तृणमूल ने सीटें तो जीती हैं, लेकिन वहां जड़ अभी भी कांग्रेस की ही जमी हुई है। दोनों ही पार्टियां अल्पसंख्यकों के वोटों के भरोसे चुनाव लड़ती हैं। हालांकि बहरामपुर हो या मुर्शिदाबाद, मालदा हो या रायगंज, मुस्लिम वोट वहां निर्णायक होता है। ऐसे में, समीकरण यही होगा कि मुस्लिम वोट, वाम मोर्चे (बड़े वामपंथी नेता मोहम्मद सलीम ने लोकसभा चुनाव उत्तर बंगाल से लड़ा था), कांग्रेस (क्यों कि उत्तर बंगाल की छह सीटें, एबीए गनी खान चौधरी और अधीर रंजन चौधरी समेट दीपा दासमुंशी के असर में है) और तृणमूल (उत्तर बंगाल में विधानसभा चुनाव में तूफानी प्रदर्शन किया) के बीच बंटेगा। बीजेपी, तुष्टीकरण और दंगों को मुद्दा बनाकर हिन्दुओं की पार्टी बनेगी। असल में, बंगाल में हाल के वर्षों में कुछ दंगे हुए हैं, मुख्यधारा की मीडिया ने भले ही इन दंगो को ठीक से कवरेज न दी हो, लेकिन यह बंगाल में बड़ा मुद्दा बना।
फिर, दुर्गा पूजा में ममता ने जिस तरह मूर्ति विसर्जन के वक्त खासी फजीहत कराई और फिर उन्ही दिनों उनकी नमाज पढ़ने वाली तस्वीर वायरल हुई, उससे लगता है कि बंगाल में ममता बनर्जी से नाराज हिन्दू वोट खिसककर बीजेपी की तरफ जाएगा। जाहिर है, अगर आने वाले वक्त में बीजेपी ने बंगाल में ठीक से होम वर्क किया तो पश्चिम बंगाल उसके लिए काफी उपजाऊ ज़मीन साबित होगी। देश की राजनीति में भी, 42 लोकसभा सीटें कम नहीं होती।
मंजीत ठाकुर
पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव बीजेपी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि जिन दो लोकसभा सीटों पर बंगाल में बीजेपी ने जीत दर्ज की थी, अब उस आधार को बढ़ाना जरूरी है। 2014 के आम चुनाव में बीजेपी को मिली दो लोकसभा सीटें मूलरूप से उन इलाकों में है, जहां बंगलाभाषी जनता का बहुमत नहीं है। आसनसोल सीट में हिन्दी-भोजपुरी बोलने वाले गैर-बांगलाभाषी लोगों का वोट अधिक है, तो दूसरी सट दार्जिलिंग की है, जहां का समीकरण बाकी के बंगाल से अलहदा है।
पश्चिम बंगाल बीजेपी की राज्य इकाई ने पंचायत चुनावों के मद्देनजर उत्तर प्रदेश के अपने समकक्षों से सुझाव लेना शुरू कर दिया है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर उभरने के लिए उसने त्रिस्तरीय रणनीति भी बनाई है।
बीजेपी यूपी में शानदार जीत के बाद बंगाल पर ध्यान केन्द्रित कर रही है, जहां ममता बनर्जी सरकार की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई है। बीजेपी मुस्लिम तुष्टीकरण करके ध्रुवीकरण करने की अपनी नीति पर ही काम करेगी। दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस, बीजेपी की इस बढ़त को रोकने के लिए वामपंथी पार्टियों से भी हाथ मिला सकती हैं। वैसे, इस महाजोट (जिसमें कांग्रेस और तृणमूल तो स्वाभाविक रूप से होंगे) की संभावना दूर की कौड़ी है। लेकिन बीजेपी अपने जनाधार को बढ़ाने के लिए हरमुमकिन उपाय कर रही है।
वैसे भी, वाम के किले मे दरार के बाद बीजेपी के अंदरूनी रणनीतिकार तबके को लगने लगा है कि बंगाल में एक ऐसे राजनीति दल की आवश्यकता है जो तृणमूल को चुनौती दे सके। बंगाल में बीजेपी के पास फिलहाल कोई बड़ा चेहरा नहीं है। बाबुल सुप्रियो केन्द्र में मंत्री हैं, लेकिन जनाधार वाले नेता नहीं है। कम से कम आसनसोल के बाहर उनका असर अभी दिखता नहीं है। रूपा गांगुली ज़रूर उत्तर बंगाल में असर दिखा सकती हैं, और पार्टी के कैडर में उनकी स्वीकार्यता अगर बढ़ी तो वह स्वाभाविक नेतृत्व दे सकती हैं। राहुल सिन्हा और दिलीप घोष बंगाल बीजेपी के बड़े नेता तो हैं लेकिन असरहीन हैं।
इसलिए बंगाल में भी संभवतया उसी रणनीति पर काम किया जाएगा। यानी अगर दूसरे दलों के नेता भाजपा में शामिल होना चाहें तो पार्टी उनका स्वागत करेगी। राज्य इकाई
प्रशिक्षित और पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की एक फौज बना रही है, जो राज्य के प्रत्येक जिले में जा कर नरेंद्र मोदी सरकार की उपलब्धियों और तृणमूल सरकार के कुशासन के बारे में लोगों को बता सके।
बंगाल में बीजेपी अगर अपने इस नेताओं की कमी वाले संकट से निबट ले तो उसके लिए विस्तार की एक उर्वर ज़मीन तैयार है। उत्तर बंगाल में, जो कांग्रेस का पुराना और मजबूत गढ़ रहा है, तृणमूल ने सीटें तो जीती हैं, लेकिन वहां जड़ अभी भी कांग्रेस की ही जमी हुई है। दोनों ही पार्टियां अल्पसंख्यकों के वोटों के भरोसे चुनाव लड़ती हैं। हालांकि बहरामपुर हो या मुर्शिदाबाद, मालदा हो या रायगंज, मुस्लिम वोट वहां निर्णायक होता है। ऐसे में, समीकरण यही होगा कि मुस्लिम वोट, वाम मोर्चे (बड़े वामपंथी नेता मोहम्मद सलीम ने लोकसभा चुनाव उत्तर बंगाल से लड़ा था), कांग्रेस (क्यों कि उत्तर बंगाल की छह सीटें, एबीए गनी खान चौधरी और अधीर रंजन चौधरी समेट दीपा दासमुंशी के असर में है) और तृणमूल (उत्तर बंगाल में विधानसभा चुनाव में तूफानी प्रदर्शन किया) के बीच बंटेगा। बीजेपी, तुष्टीकरण और दंगों को मुद्दा बनाकर हिन्दुओं की पार्टी बनेगी। असल में, बंगाल में हाल के वर्षों में कुछ दंगे हुए हैं, मुख्यधारा की मीडिया ने भले ही इन दंगो को ठीक से कवरेज न दी हो, लेकिन यह बंगाल में बड़ा मुद्दा बना।
फिर, दुर्गा पूजा में ममता ने जिस तरह मूर्ति विसर्जन के वक्त खासी फजीहत कराई और फिर उन्ही दिनों उनकी नमाज पढ़ने वाली तस्वीर वायरल हुई, उससे लगता है कि बंगाल में ममता बनर्जी से नाराज हिन्दू वोट खिसककर बीजेपी की तरफ जाएगा। जाहिर है, अगर आने वाले वक्त में बीजेपी ने बंगाल में ठीक से होम वर्क किया तो पश्चिम बंगाल उसके लिए काफी उपजाऊ ज़मीन साबित होगी। देश की राजनीति में भी, 42 लोकसभा सीटें कम नहीं होती।
मंजीत ठाकुर
Saturday, March 11, 2017
यह लहर नहीं, सुनामी है
धराशायी होना अगर एक शब्द है, उसका चुनावी अर्थ यूपी चुनाव के नतीजों में यूपी के लड़के रहे। यूपी के लड़के यानी अखिलेश और राहुल गांधी। दोनों की मिली-जुली ताकत। यह ताकत फिसड्डी साबित हुई क्योंकि इन लड़कों को लोहा लेना था यूपी के लाडले से।
दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साबित किया इस दफा यूपी में मोदी लहर नहीं थी, 2014 की लहर अब ताकतवर तूफान बन चुका है। कांग्रेस-सपा गठजोड़ की क्रिएटिव टीम ने अखिलेश-राहुल गठजोड़ को लेकर नारा बनायाः यूपी को ये साथ पसंद है। नतीजों के साथ नारा भी धूल-धूसरित हो गया, यह कहने की बात ही नहीं। यूपी के इन लड़को का ज़ोर इस बात पर था कि प्रधानमंत्री मोदी बाहरी हैं, और सपा-कांग्रेस गठबंधन दो कुनबों का नहीं, दो युवाओं का है।
इस गठजोड़ का पूरा फोकस यूथ वोटर पर था। 18 लाख लैपटॉप बांट चुके अखिलेश ने युवाओं को स्मार्टफोन देने का वादा किया। अखिलेश ने कहा भी, जितने युवाओं ने स्मार्टफोन के लिए रजिस्ट्रेशन कराए हैं, अगर वो सब भी वोट देंगे तो यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार बनेगी। मगर नतीजे बताते हैं, यूपी को ही नहीं, यूथ को भी ये साथ पसंद नहीं।
दूसरी तरफ, राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी को यूपी के लिए बाहरी बताते वक्त भूल गए कि उनकी चुनाव फिल्मी डायलॉग से नहीं जीते जाते। कानून भारत के किसी भी नागरिक को देश में कहीं से भी चुनाव लड़ने की छूट देता है। आखिर इंदिरा गांधी ने चिकमंगलूर से चुनाव लड़ा था और इसके दो दशक बाद, 1990 में सोनिया गांधी ने भी बेल्लारी से चुनाव लड़ा था। ऐसे में मोदी को बाहरी बताने का प्रियंका और राहुल का दावा खोखला नज़र आया।
राहुल और अखिलेश ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी, चर्चा का केन्द्र बनने के लिए चाचा के साथ फ्रेंडली ड्रामाई फाइट भी किया, लखनऊ, इलाहाबाद, गोरखपु, आगरा कानपुर और वाराणसी में, बकौल अखिलेश ही, अच्छे लड़के राहुल के साथ रोड शो किए लेकिन इन सभी इलाकों में चाहे वह इलाहाबाद हो या आगरा, गोरखपुर हो या वाराणसी, रोड शो के बावजूद गठबंधन सड़क पर आ गया है।
राहुल गांधी ने रायबरेली का दो बार दौरा किया। अमेठी में अपना पूरा दिन प्रचार में बिताते हुए तीन रैलियां की। इस इलाके को जागीर समझते हुए और प्रियंका महज एक बार गईँ, सोनिया गांधी तो गई भी नहीं। खामियाजाः अमेठी में भाजपा जीती तो रायबरेली में कांग्रेस किसी तरह इज्जत बचा पाई।
इधर, प्रचार करते वक्त प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें यूपी ने गोद लिया है, तो यूपी ने भी साबित किया कि मोदी सिर्फ गोद लिए हुए ही नहीं बल्कि यूपी के लाडले भी है। प्रधानमंत्री ने ताबड़तोड़ 23 रैलियों से बीजेपी के प्रचार को आक्रामक धार दी, जो जनता ने भी उतने ही प्यार से जवाब दिया, बीजेपी के खाते में करिश्माई 300 सीटों का आंक़ड़ा है।
दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साबित किया इस दफा यूपी में मोदी लहर नहीं थी, 2014 की लहर अब ताकतवर तूफान बन चुका है। कांग्रेस-सपा गठजोड़ की क्रिएटिव टीम ने अखिलेश-राहुल गठजोड़ को लेकर नारा बनायाः यूपी को ये साथ पसंद है। नतीजों के साथ नारा भी धूल-धूसरित हो गया, यह कहने की बात ही नहीं। यूपी के इन लड़को का ज़ोर इस बात पर था कि प्रधानमंत्री मोदी बाहरी हैं, और सपा-कांग्रेस गठबंधन दो कुनबों का नहीं, दो युवाओं का है।
इस गठजोड़ का पूरा फोकस यूथ वोटर पर था। 18 लाख लैपटॉप बांट चुके अखिलेश ने युवाओं को स्मार्टफोन देने का वादा किया। अखिलेश ने कहा भी, जितने युवाओं ने स्मार्टफोन के लिए रजिस्ट्रेशन कराए हैं, अगर वो सब भी वोट देंगे तो यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार बनेगी। मगर नतीजे बताते हैं, यूपी को ही नहीं, यूथ को भी ये साथ पसंद नहीं।
दूसरी तरफ, राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी को यूपी के लिए बाहरी बताते वक्त भूल गए कि उनकी चुनाव फिल्मी डायलॉग से नहीं जीते जाते। कानून भारत के किसी भी नागरिक को देश में कहीं से भी चुनाव लड़ने की छूट देता है। आखिर इंदिरा गांधी ने चिकमंगलूर से चुनाव लड़ा था और इसके दो दशक बाद, 1990 में सोनिया गांधी ने भी बेल्लारी से चुनाव लड़ा था। ऐसे में मोदी को बाहरी बताने का प्रियंका और राहुल का दावा खोखला नज़र आया।
राहुल और अखिलेश ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी, चर्चा का केन्द्र बनने के लिए चाचा के साथ फ्रेंडली ड्रामाई फाइट भी किया, लखनऊ, इलाहाबाद, गोरखपु, आगरा कानपुर और वाराणसी में, बकौल अखिलेश ही, अच्छे लड़के राहुल के साथ रोड शो किए लेकिन इन सभी इलाकों में चाहे वह इलाहाबाद हो या आगरा, गोरखपुर हो या वाराणसी, रोड शो के बावजूद गठबंधन सड़क पर आ गया है।
राहुल गांधी ने रायबरेली का दो बार दौरा किया। अमेठी में अपना पूरा दिन प्रचार में बिताते हुए तीन रैलियां की। इस इलाके को जागीर समझते हुए और प्रियंका महज एक बार गईँ, सोनिया गांधी तो गई भी नहीं। खामियाजाः अमेठी में भाजपा जीती तो रायबरेली में कांग्रेस किसी तरह इज्जत बचा पाई।
इधर, प्रचार करते वक्त प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें यूपी ने गोद लिया है, तो यूपी ने भी साबित किया कि मोदी सिर्फ गोद लिए हुए ही नहीं बल्कि यूपी के लाडले भी है। प्रधानमंत्री ने ताबड़तोड़ 23 रैलियों से बीजेपी के प्रचार को आक्रामक धार दी, जो जनता ने भी उतने ही प्यार से जवाब दिया, बीजेपी के खाते में करिश्माई 300 सीटों का आंक़ड़ा है।
मोदी लहर का जादू यह रहा कि उनके धुआंधार प्रचार ने 2014 की लहर को सुनामी और अंधड़ में बदल दिया। जिसमें बसपा तो खैर तिनके की तरह उड़ गई। कांग्रेस और सपा का सूपड़ा भी साफ हो गया. ऐसे में चुनाव के ऐन पहले जहां सपा-कांग्रेस गठबंधन को ओपिनियन पोल में बढ़त हासिल थी वहीं मोदी के चुनाव प्रचार शुरू करने के बाद माहौल बदलता गया. अंतिम दौर में तो पूर्वांचल की धुरी वाराणसी में पीएम नरेंद्र मोदी ने खुद आक्रामक प्रचार कर पूरी तरह से माहौल बीजेपी के पक्ष में कर दिया.
पूरा यूपी केसरिया रंग से सराबोर है। मोदी की अपील पर केसरिया होली के लिए जनता खुलकर मैदान में आ चुकी है। 2019 का सेमीफाइनल यूपी की जनता ने पीएम मोदी की झोली में डाल दिया है। ब्रांड मोदी भारतीय राजनीति का विश्वसनीय नाम साबित हुआ है। ये जीत इसलिए ही बड़ी नहीं है कि इसने 1991 में जीती गयी सीट के रिकॉर्ड तोड़े दिए। ये जीत इसलिए ऐतिहासिक है इसने इसने लोकसभा चुनाव में मिले वोट शेयर को भी मैच कर लिया है।
चुनाव के बाद जो प्रचंड मोदी लहर दिख रही है, वो पीएम मोदी की हर सभा में भी दिख रहा था लेकिन विरोधी मानने को तैयार नहीं थे। समाजवादी-और कांग्रेस पार्टी से तकरीबन 12 फीसदी वोट बीजेपी ने छीन लिए। बीएसपी से भी करीब 5 फीसदी वोट बीजेपी ने छीना है। पर, सबसे खास बात ये है कि पिछले चुनाव के मुकाबले बीजेपी ने अपना वोट लगभग दुगुना कर लिया है।
मोदी की लहर में विरोधी पार्टियां तिनके की तरह उड़ गईं हैं। सत्ताधारी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन को करारा झटका लगा है। अखिलेश यादव और राहुल गांधी के तमाम दावों को भी जनता ने नकार दिया। इसी के साथ ये साफ हो गया कि जनता को ये साथ पसंद नहीं है। वहीं बीएसपी ने अपने जन्म के बाद से अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन किया है।
लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने बड़े राजनीतिक पंडितों के आकलन को धता बताते हुए 80 में से 73 सीटें जीती थीं। अगर इसे विधानसभा सीटों में परिणत करते तो 43 प्रतिशत वोट के साथ सीटों की संख्या 337 होती। इस चुनाव में भी वोट प्रतिशत 43 प्रतिशत बरकरार रहा। यानी मोदी की लोकप्रियता अब भी कायम है।
यूपी चुनाव की जीत मोदी-शाह की जोड़ी की जीत मानी जा रही है। मोदी की लीडरशिप और अमित शाह के माइक्रो मैनेजमेंट ने इतनी बड़ी जीत दिलाई है। जाहिर है ये जीत दोनों के लिए मनोबल और ज्यादा बढ़ाने वाली साबित होगी। इन चुनावों में भी प्रचार का केंद्र बिंदु खुद पीएम मोदी ही रहे हैं। जाहिर है कि उसका क्रेडिट उन्हें ही मिलेगा।
मुख्तसर यही कि लड़के अभी तजुर्बे के लिहाज से कच्चे ही हैं, लाडले से भिड़ने के लिए सिर्फ हाथ मिलाना ही जरूरी नहीं। कारनामों की जगह काम करके भी दिखाना होता है।
मंजीत ठाकुर
पूरा यूपी केसरिया रंग से सराबोर है। मोदी की अपील पर केसरिया होली के लिए जनता खुलकर मैदान में आ चुकी है। 2019 का सेमीफाइनल यूपी की जनता ने पीएम मोदी की झोली में डाल दिया है। ब्रांड मोदी भारतीय राजनीति का विश्वसनीय नाम साबित हुआ है। ये जीत इसलिए ही बड़ी नहीं है कि इसने 1991 में जीती गयी सीट के रिकॉर्ड तोड़े दिए। ये जीत इसलिए ऐतिहासिक है इसने इसने लोकसभा चुनाव में मिले वोट शेयर को भी मैच कर लिया है।
चुनाव के बाद जो प्रचंड मोदी लहर दिख रही है, वो पीएम मोदी की हर सभा में भी दिख रहा था लेकिन विरोधी मानने को तैयार नहीं थे। समाजवादी-और कांग्रेस पार्टी से तकरीबन 12 फीसदी वोट बीजेपी ने छीन लिए। बीएसपी से भी करीब 5 फीसदी वोट बीजेपी ने छीना है। पर, सबसे खास बात ये है कि पिछले चुनाव के मुकाबले बीजेपी ने अपना वोट लगभग दुगुना कर लिया है।
मोदी की लहर में विरोधी पार्टियां तिनके की तरह उड़ गईं हैं। सत्ताधारी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन को करारा झटका लगा है। अखिलेश यादव और राहुल गांधी के तमाम दावों को भी जनता ने नकार दिया। इसी के साथ ये साफ हो गया कि जनता को ये साथ पसंद नहीं है। वहीं बीएसपी ने अपने जन्म के बाद से अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन किया है।
लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने बड़े राजनीतिक पंडितों के आकलन को धता बताते हुए 80 में से 73 सीटें जीती थीं। अगर इसे विधानसभा सीटों में परिणत करते तो 43 प्रतिशत वोट के साथ सीटों की संख्या 337 होती। इस चुनाव में भी वोट प्रतिशत 43 प्रतिशत बरकरार रहा। यानी मोदी की लोकप्रियता अब भी कायम है।
यूपी चुनाव की जीत मोदी-शाह की जोड़ी की जीत मानी जा रही है। मोदी की लीडरशिप और अमित शाह के माइक्रो मैनेजमेंट ने इतनी बड़ी जीत दिलाई है। जाहिर है ये जीत दोनों के लिए मनोबल और ज्यादा बढ़ाने वाली साबित होगी। इन चुनावों में भी प्रचार का केंद्र बिंदु खुद पीएम मोदी ही रहे हैं। जाहिर है कि उसका क्रेडिट उन्हें ही मिलेगा।
मुख्तसर यही कि लड़के अभी तजुर्बे के लिहाज से कच्चे ही हैं, लाडले से भिड़ने के लिए सिर्फ हाथ मिलाना ही जरूरी नहीं। कारनामों की जगह काम करके भी दिखाना होता है।
मंजीत ठाकुर
Saturday, March 4, 2017
वोटबैंक का बंटवारा
उत्तर प्रदेश में अब बस आखिरी चरण की वोटिंग होनी बाक़ी है। बहुत कुछ हो गया, बहुत कुछ गुज़र गया। जुमलेबाज़ी, लफ्फाजी, वायदे, घोषणापत्र...सब कुछ हुआ। लेकिन सिर्फ भारत जैसे बड़े और अजूबे किस्म के किमियागरी वाले लोकतंत्र में ही मुमकिन है कि चुनाव घोषणा-पत्र में किए गए वादों की बजाय एक-दूसरे का खौफ दिखाकर जीते जाएं।
बिना किसी का पक्ष लिए कहूंगा कि यह (और पिछले कई चुनाव) मुद्दों (इस बार यूपी में मुद्दो की बात न कें) की बजाय किसी एक पार्टी को रोकने के नाम पर लड़े जा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के वोटों की चिंता कथिक सेकुलर पार्टियों को है। इन पार्टियों के नेता जब मुस्लिमों से मिलते हैं, तो आम वोटर उनसे यही पूछता है कि अल्पसंख्यक की शिक्षा, रोज़गार, तरक़्क़ी और सेहत के लिए, विकास की समस्याओं के हल के लिए उनके पास योजनाओं का क्या खाका है? नेता जी उंगली से वोटर को चुप कराते हैं और कहते हैं, चुप हो जाओ वरना बीजेपी आ जाएगी।
यह सच है कि सेकुलर कहे जाने वाली पार्टियों के पास अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा का नारा तो है, लेकिन उनका विकास कैसे होगा, इस बात का कोई ठोस रोडमैप नहीं है। यह नदारद है। जाहिर है, ठगा महसूस कर रहा मुसलमान अपने दुख-दर्द में शामिल छोटी पार्टियों पर भी भरोसा कर रहा है ।
इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि बहुजन समाज पार्टी—जिनकी सुप्रीमो मायावती ने खुलेआम मुसलमानों से उनकी पार्टी को वोट देने का आह्वान किया—और समाजवादी पार्टी, जिनके नेता खुद को मुसलमानों का एकमात्र रहनुमा मानते हैं, का यह वोटबैंक या तो बंट रहा है, या खिसक रहा है। यह वोटबैंक मजलिस-ए-इत्तिहाद उल मुस्लिमीन और पीस पार्टी को भी वोट दे रहा है। जाहिर है, इन छोटी पार्टियों की वजह से और वोटबैंक में हिस्सा बंटाने से 11 मार्च को कई दिग्गजों का खेल खराब होगा। यकीनन होगा।
इन दोनों छोटी पार्टियों को ज्यादा सीटें हासिल नहीं होंगी, लेकिन खेल खराब होगा।
इन कथित सेकुलर पार्टियों की दिक्कत है कि नोटबंदी का मसला भी हाथ से फिसल गया। आम जनता में नोटबंदी कोई बहुत बड़ा मसला नहीं है। जबकि, सपा और बसपा दोनों को बुरी तरह यकीन था कि नोटबंदी वोटरों के सामने बहुत बड़ा मसला साबित होगा। ऐसे में इन दलों ने बाकी सारे मुद्दे ठंडे बस्ते में डालकर नोटंबदी को उछाला। उन्हें लगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव के ऐन पहले, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। कांग्रेस और सपा तो यही समझती रही कि उन्हें बैठे-बिठाए हाथों में लड्डू थमा दिया गया है। लेकिन, सच यह है कि बीजेपी अगर चुनाव हारेगी भी (क्योंकि चुनाव परिणाम अनिश्चित हैं) तो उसकी वजह नोटबंदी नहीं होगी।
नोटबंदी के बाद के दौर में, कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने सेकुलर वोटों को इकट्ठा करने की रणनीति पर काम करना शुरू किया। मुस्लिम लीडरों क घास न डालने की सलाह उन्होंने अपने दल को दे दी। समाजवादी पार्टी की खुशफहमी की एक वजह यह भी रही कि उनके घरेलू सियासी ड्रामे पर समाजवादी पार्टी के अधिकांश कार्यकर्ता अखिलेश का साथ देते रहे, और उसे रणनीतिकारों ने उसे जनता का समर्थन मान लिया।
अब बात बसपा की। जिस वक्त में अखिलेश जनता के समर्थन की खुमारी में थे, मायावती ने नोटबंदी मुद्दे की व्यर्थता को भांप लिया था। उन्होंने नसीमुद्दीन सिद्दीकी को मुस्लिम उलेमा को साथ लाने के एकसूत्रीय काम पर लगा दिया। तो एक तरफ तो भारतीय जनता पार्टी के नेता नोटबंदी को अपनी उपलब्धि को तौर पर जनता के सामने ले जा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने तकरीबन हर चुनावी रैली में, काले धन के खिलाफ नोटबंदी के इस कदम की सराहना की और मायावती और मुलायम के नोटबंदी पर रूख की खिल्ली उड़ाई वहीं, समाजवादी पार्टी मुस्लिम वोटों के विभाजन को रोक पाने में नाकाम रही है।
नोटबंदी की वजह से जनता को जो परेशानी हुई थी, अब वह पुरानी बात हो गई और अब उनके सामने कुर्ते की फटी जेब से उंगलियां बाहर निकालकर दिखाने से जनता के ठहाके हासिल किए जा सकते हैं, वोट नहीं।
फिर अखिलेश यादव और उनकी टीम ने, मायावती को अपने युद्ध में निशाने पर रखा ही नहीं। लेकिन यकीन मानिए उत्तर प्रदेश में फैसला कुछ अनोखा भी आ सकता है। यह अनोखा चुनावी नतीजा, कुछ भी हो सकता है, त्रिशंकु विधानसभा भी। तब, मायावती और बीजेपी साथ आ जाएं तो क्या ताज्जुब! आखिर, सियासत गुंजाइश से ही शुरू होती है।
बिना किसी का पक्ष लिए कहूंगा कि यह (और पिछले कई चुनाव) मुद्दों (इस बार यूपी में मुद्दो की बात न कें) की बजाय किसी एक पार्टी को रोकने के नाम पर लड़े जा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के वोटों की चिंता कथिक सेकुलर पार्टियों को है। इन पार्टियों के नेता जब मुस्लिमों से मिलते हैं, तो आम वोटर उनसे यही पूछता है कि अल्पसंख्यक की शिक्षा, रोज़गार, तरक़्क़ी और सेहत के लिए, विकास की समस्याओं के हल के लिए उनके पास योजनाओं का क्या खाका है? नेता जी उंगली से वोटर को चुप कराते हैं और कहते हैं, चुप हो जाओ वरना बीजेपी आ जाएगी।
यह सच है कि सेकुलर कहे जाने वाली पार्टियों के पास अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा का नारा तो है, लेकिन उनका विकास कैसे होगा, इस बात का कोई ठोस रोडमैप नहीं है। यह नदारद है। जाहिर है, ठगा महसूस कर रहा मुसलमान अपने दुख-दर्द में शामिल छोटी पार्टियों पर भी भरोसा कर रहा है ।
इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि बहुजन समाज पार्टी—जिनकी सुप्रीमो मायावती ने खुलेआम मुसलमानों से उनकी पार्टी को वोट देने का आह्वान किया—और समाजवादी पार्टी, जिनके नेता खुद को मुसलमानों का एकमात्र रहनुमा मानते हैं, का यह वोटबैंक या तो बंट रहा है, या खिसक रहा है। यह वोटबैंक मजलिस-ए-इत्तिहाद उल मुस्लिमीन और पीस पार्टी को भी वोट दे रहा है। जाहिर है, इन छोटी पार्टियों की वजह से और वोटबैंक में हिस्सा बंटाने से 11 मार्च को कई दिग्गजों का खेल खराब होगा। यकीनन होगा।
इन दोनों छोटी पार्टियों को ज्यादा सीटें हासिल नहीं होंगी, लेकिन खेल खराब होगा।
इन कथित सेकुलर पार्टियों की दिक्कत है कि नोटबंदी का मसला भी हाथ से फिसल गया। आम जनता में नोटबंदी कोई बहुत बड़ा मसला नहीं है। जबकि, सपा और बसपा दोनों को बुरी तरह यकीन था कि नोटबंदी वोटरों के सामने बहुत बड़ा मसला साबित होगा। ऐसे में इन दलों ने बाकी सारे मुद्दे ठंडे बस्ते में डालकर नोटंबदी को उछाला। उन्हें लगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव के ऐन पहले, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। कांग्रेस और सपा तो यही समझती रही कि उन्हें बैठे-बिठाए हाथों में लड्डू थमा दिया गया है। लेकिन, सच यह है कि बीजेपी अगर चुनाव हारेगी भी (क्योंकि चुनाव परिणाम अनिश्चित हैं) तो उसकी वजह नोटबंदी नहीं होगी।
नोटबंदी के बाद के दौर में, कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने सेकुलर वोटों को इकट्ठा करने की रणनीति पर काम करना शुरू किया। मुस्लिम लीडरों क घास न डालने की सलाह उन्होंने अपने दल को दे दी। समाजवादी पार्टी की खुशफहमी की एक वजह यह भी रही कि उनके घरेलू सियासी ड्रामे पर समाजवादी पार्टी के अधिकांश कार्यकर्ता अखिलेश का साथ देते रहे, और उसे रणनीतिकारों ने उसे जनता का समर्थन मान लिया।
अब बात बसपा की। जिस वक्त में अखिलेश जनता के समर्थन की खुमारी में थे, मायावती ने नोटबंदी मुद्दे की व्यर्थता को भांप लिया था। उन्होंने नसीमुद्दीन सिद्दीकी को मुस्लिम उलेमा को साथ लाने के एकसूत्रीय काम पर लगा दिया। तो एक तरफ तो भारतीय जनता पार्टी के नेता नोटबंदी को अपनी उपलब्धि को तौर पर जनता के सामने ले जा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने तकरीबन हर चुनावी रैली में, काले धन के खिलाफ नोटबंदी के इस कदम की सराहना की और मायावती और मुलायम के नोटबंदी पर रूख की खिल्ली उड़ाई वहीं, समाजवादी पार्टी मुस्लिम वोटों के विभाजन को रोक पाने में नाकाम रही है।
नोटबंदी की वजह से जनता को जो परेशानी हुई थी, अब वह पुरानी बात हो गई और अब उनके सामने कुर्ते की फटी जेब से उंगलियां बाहर निकालकर दिखाने से जनता के ठहाके हासिल किए जा सकते हैं, वोट नहीं।
फिर अखिलेश यादव और उनकी टीम ने, मायावती को अपने युद्ध में निशाने पर रखा ही नहीं। लेकिन यकीन मानिए उत्तर प्रदेश में फैसला कुछ अनोखा भी आ सकता है। यह अनोखा चुनावी नतीजा, कुछ भी हो सकता है, त्रिशंकु विधानसभा भी। तब, मायावती और बीजेपी साथ आ जाएं तो क्या ताज्जुब! आखिर, सियासत गुंजाइश से ही शुरू होती है।
Sunday, February 26, 2017
चुनावी दलबदल में नारेबाज़ों की मुश्किल
उत्तर प्रदेश में बस पांचवे चरण की वोटिंग होनी है। चुनाव में ज़बानी जमा-खर्च और लफ्फाजियों के साथ नारों का होना जरूरी होता है। सिर्फ ज़रूरी नहीं, बहुत ज़रूरी।
इस बार चुनाव में घूमते वक्त कई नारे कान में पड़े। अश्वमेध का घोड़ा है, मोदीजी ने छोड़ा है। जिसका जलवा कायम है, उसका नाम मुलायम है। भ्रष्टाचार मिटाना है, राहुल ने यह ठाना है। जीत गया भई जीत गया, शेर हमारा जीत गया। कांशीराम का मिशन अधूरा, मायावती करेंगी पूरा।
इस बार उत्तर प्रदेश के चुनावी बुखार में मौसम ने साथ दिया। वरना, गरमियों में होते तो हालत पतली होती। उम्मीदवारों की भी, वोटरों की भी और हम जैसे चुनाव कवर करने वाले पत्रकारों की भी। लेकिन, इसी मुद्दे पर एक पानवाले की राय अलग थी, न सरदी, न गरमी, चुनाव में हर मौसम गुलाबी लगता है।
लेकिन इस बार नारों में कुछ गड़बड़ हो गई। गड़बड़ की वजहः वह लोग बहुत मुश्किल में थे जिनके नेता ने हाल ही में दल बदल लिया था। वह नारे लगाने में वह बार-बार अटक रहे थे। बीच-बीच में पुराने दल का नारा जुबां पर आता और अगले ही पल उसे सुधारते।
सियासी दल कोई भी हो, हवा चाहे किसी की बहे, बुंदेलखंड में एक दर्जन नेता ऐसे हैं, जहां वे खड़े होते हैं राजनीति वहीं से शुरू होती है। बुंदेलखंड की राजनीति में गहरी पैठ बनाने वाले तमाम नेताओं ने यह साबित कर दिया है कि वह खुद में एक दल हैं। दल बदलकर दंगल लड़कर सियासी सूरमा आज बुंदेलखंड की राजनीति में दस्तक दे रहे हैं। सक्रिय राजनीति में आने के बाद इन नेताओ ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है।
सियासी पार्टियां कभी इनकी राह में रोड़ा बनीं, तो उनसे भी किनारा करने में गुरेज नहीं किया। हालांकि इस काम मे हर किसी को कामयाबी नहीं मिली, फिर भी आगे के चुनाव में पार्टियां इनसे किनारा नहीं कर सकीं।
ऐसे कई सियासी दिग्गज हैं जो दो से ज्यादा पार्टियां बदल चुके हैं। अरिमर्दन सिंह, सिद्धगोपाल साहू, आरके सिंह पटेल, अशोक सिंह चंदेल, विवेक कुमार सिंह कई बार पार्टियां बदलने के बाद भी राजनीति में मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।
2017 के विधानसभा चुनाव में कई दिग्गजों की साख दांव पर है। कांग्रेस छोड़कर सपा में आए सिद्धगोपाल साहू 2012 में चुनाव हार गए। अबकी सपा ने उन्हें फिर से प्रत्याशी बनाया। जनता दल से राजनीति की शुरूआत करने वाले अरिदमन सिंह सपा में रह चुके हैं। 2007 में वह बसपा में भी रह चुके हैं। 2012 में वह कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े थे। इस बार बसपा से महोबा सदर के प्रत्याशी हैं।
राकेश गोस्वामी बसपा से विधायक थे। 2012 में उनको टिकट नहीं मिला, इस बार भाजपा के प्रत्याशी हैं।
झांसी के मऊरानीपुर से परागीलाल पहले भाजपा से विधायक थे। वहां टिकट कटा तो बसपा से टिकट ले लिया। बिहारी लाल पहले कांग्रेस के विधायक थे और इस बार भाजपा के टिकट पर लड़ रहे हैं।
हमीरपुर सीट पर अशोक कुमार चंदेल जनता दल से विधायक रह चुके हैं। बाद में बसपा जॉइन की। एक बार निर्दलीय विधायक भी रह चुके हैं। इस बार भाजपा ने हमीरपुर सदर से प्रत्याशी बनाया है। राठ के विधायक गयादीन अनुरागी भाजपा और बसपा से गुजरते हुए पिछले विधानसभा में कांग्रेस में गए और जीते। इसबार फिर से कांग्रेस के टिकट पर किस्मत आजमा रहे हैं।
बांदा में विवेक सिंह 1996 में लोकतांत्रिक कांग्रेस से विधायक थे। 2002 में बीजेपी के टिकट पर लड़े और हार गए। 2007 और 12 में कांग्रेस के टिकट पर लड़कर जीते। इस बार भी कांग्रेस प्रत्याशी हैं। बबेरू के विधायक पहले बसपा में थे। फिर सपा में आए तो पिछला चुनाव जीता, इस बार भी मैदान में हैं।
मानिकपुर विधानसभा के चुनाव मैदान में उतरे आर के सिंह पटेल कई पार्टियां आजमा चुके हैं। वह बसपा से विधायक और सपा से सांसद रह चुके हैं। एक बार फिर 2014 में बसपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा था।
चुनावी व्यंजन में नारों का तड़का लगाना बहुत ज़रूरी होता है, लेकिन इस दल-बदल ने नारेबाज़ों का कम मुश्किल कर दिया है।
फिलहाल तो दलबदलू नेताओं के लिए एक मशहूर कवि की यह पंक्तियां—
पहले हवा का रुख़ देखना है
फिर यह तय करना है किस आले पर दिया रखना है।
मंजीत ठाकुर
इस बार चुनाव में घूमते वक्त कई नारे कान में पड़े। अश्वमेध का घोड़ा है, मोदीजी ने छोड़ा है। जिसका जलवा कायम है, उसका नाम मुलायम है। भ्रष्टाचार मिटाना है, राहुल ने यह ठाना है। जीत गया भई जीत गया, शेर हमारा जीत गया। कांशीराम का मिशन अधूरा, मायावती करेंगी पूरा।
इस बार उत्तर प्रदेश के चुनावी बुखार में मौसम ने साथ दिया। वरना, गरमियों में होते तो हालत पतली होती। उम्मीदवारों की भी, वोटरों की भी और हम जैसे चुनाव कवर करने वाले पत्रकारों की भी। लेकिन, इसी मुद्दे पर एक पानवाले की राय अलग थी, न सरदी, न गरमी, चुनाव में हर मौसम गुलाबी लगता है।
लेकिन इस बार नारों में कुछ गड़बड़ हो गई। गड़बड़ की वजहः वह लोग बहुत मुश्किल में थे जिनके नेता ने हाल ही में दल बदल लिया था। वह नारे लगाने में वह बार-बार अटक रहे थे। बीच-बीच में पुराने दल का नारा जुबां पर आता और अगले ही पल उसे सुधारते।
सियासी दल कोई भी हो, हवा चाहे किसी की बहे, बुंदेलखंड में एक दर्जन नेता ऐसे हैं, जहां वे खड़े होते हैं राजनीति वहीं से शुरू होती है। बुंदेलखंड की राजनीति में गहरी पैठ बनाने वाले तमाम नेताओं ने यह साबित कर दिया है कि वह खुद में एक दल हैं। दल बदलकर दंगल लड़कर सियासी सूरमा आज बुंदेलखंड की राजनीति में दस्तक दे रहे हैं। सक्रिय राजनीति में आने के बाद इन नेताओ ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है।
सियासी पार्टियां कभी इनकी राह में रोड़ा बनीं, तो उनसे भी किनारा करने में गुरेज नहीं किया। हालांकि इस काम मे हर किसी को कामयाबी नहीं मिली, फिर भी आगे के चुनाव में पार्टियां इनसे किनारा नहीं कर सकीं।
ऐसे कई सियासी दिग्गज हैं जो दो से ज्यादा पार्टियां बदल चुके हैं। अरिमर्दन सिंह, सिद्धगोपाल साहू, आरके सिंह पटेल, अशोक सिंह चंदेल, विवेक कुमार सिंह कई बार पार्टियां बदलने के बाद भी राजनीति में मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।
2017 के विधानसभा चुनाव में कई दिग्गजों की साख दांव पर है। कांग्रेस छोड़कर सपा में आए सिद्धगोपाल साहू 2012 में चुनाव हार गए। अबकी सपा ने उन्हें फिर से प्रत्याशी बनाया। जनता दल से राजनीति की शुरूआत करने वाले अरिदमन सिंह सपा में रह चुके हैं। 2007 में वह बसपा में भी रह चुके हैं। 2012 में वह कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े थे। इस बार बसपा से महोबा सदर के प्रत्याशी हैं।
राकेश गोस्वामी बसपा से विधायक थे। 2012 में उनको टिकट नहीं मिला, इस बार भाजपा के प्रत्याशी हैं।
झांसी के मऊरानीपुर से परागीलाल पहले भाजपा से विधायक थे। वहां टिकट कटा तो बसपा से टिकट ले लिया। बिहारी लाल पहले कांग्रेस के विधायक थे और इस बार भाजपा के टिकट पर लड़ रहे हैं।
हमीरपुर सीट पर अशोक कुमार चंदेल जनता दल से विधायक रह चुके हैं। बाद में बसपा जॉइन की। एक बार निर्दलीय विधायक भी रह चुके हैं। इस बार भाजपा ने हमीरपुर सदर से प्रत्याशी बनाया है। राठ के विधायक गयादीन अनुरागी भाजपा और बसपा से गुजरते हुए पिछले विधानसभा में कांग्रेस में गए और जीते। इसबार फिर से कांग्रेस के टिकट पर किस्मत आजमा रहे हैं।
बांदा में विवेक सिंह 1996 में लोकतांत्रिक कांग्रेस से विधायक थे। 2002 में बीजेपी के टिकट पर लड़े और हार गए। 2007 और 12 में कांग्रेस के टिकट पर लड़कर जीते। इस बार भी कांग्रेस प्रत्याशी हैं। बबेरू के विधायक पहले बसपा में थे। फिर सपा में आए तो पिछला चुनाव जीता, इस बार भी मैदान में हैं।
मानिकपुर विधानसभा के चुनाव मैदान में उतरे आर के सिंह पटेल कई पार्टियां आजमा चुके हैं। वह बसपा से विधायक और सपा से सांसद रह चुके हैं। एक बार फिर 2014 में बसपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा था।
चुनावी व्यंजन में नारों का तड़का लगाना बहुत ज़रूरी होता है, लेकिन इस दल-बदल ने नारेबाज़ों का कम मुश्किल कर दिया है।
फिलहाल तो दलबदलू नेताओं के लिए एक मशहूर कवि की यह पंक्तियां—
पहले हवा का रुख़ देखना है
फिर यह तय करना है किस आले पर दिया रखना है।
मंजीत ठाकुर
Friday, December 23, 2016
क्या सिद्धू फुंके हुए कारतूस हैं?
ठहाकों के सरदार नवजोत सिंह सिद्धू अब कांग्रेस का दामन थामेंगे। उनकी पत्नी डॉ. नवजोत कौर सिद्धू और हॉकी खिलाड़ी और सिद्धू के साथी परगट सिंह पहले ही कांग्रेस में शामिल हो चुकी हैं।
इसका मतलब यह हुआ कि नवजोत सिंह सिद्धू कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ेंगे और वह सीट अमृतसर-पूर्व की सीट भी हो सकती है, जहां से निवर्तमान विधायक उनकी पत्नी डॉ. नवजोत कौर रही हैं।
बीजेपी से दूरी बनाने की जो भई वजहें खुद सिद्धू गिनाएं और या फिर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस से पींगे बढ़ाने के पीछे उनकी मंशा क्या है यह साफ करें, लेकिन यह जानना बेहद दिलचस्प होगा कि आखिर पंजाब की राजनीति में सिद्धू को क्या ताकत हासिल है? आखिर, पंजाब में कांग्रेस के खेवनहार कैप्टन अमरिन्दर सिंह क्यों पहले सिद्धू के कांग्रेस में आने से नाखुश थे और अब क्यों उन्होंने सिद्धू के आने की खबरों का स्वागत किया है। (गुरूवार को सिद्धू की पत्नी कांग्रेस में जाने की खबरों की पुष्टि कर चुकी हैं)
नवजोत सिंह सिद्धू को अरुण जेटली ही राजनीति में लेकर आए थे। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में अमृतसर के सांसद नवजोत सिंह सिद्धू की जगह बीजेपी ने अरुण जेटली को वहां से उम्मीदवार बनाया। गुस्साए सिद्धू ने जेटली के लिए चुनाव प्रचार नहीं किया। हालांकि, इसी साल अप्रैल में बीजेपी ने सिद्धू को राज्यसभा की सदस्यता दी, लेकिन सिद्धू बजाय राज्यसभा जाने के एक कॉमिडी शो में सिंहासन पर बैठकर ठहाके लगाते और शेरो-शायरी करते देखे गए।
बहरहाल, ऐसा लग गया था कि यह क्रिकेटर विधानसभा चुनाव से पहले कुछ तो करेगा और पंजाब की राजनीति में उबाल आया तो सत्ताविरोधी लहर की और आम आदमी पार्टी की संभावनाओं के मद्देनज़र सिद्धू का नाम भी आप से जोड़ा जाने लगा। हालांकि, न तो आप ने और न कभी सिद्धू ने इसके बारे में किसी अंतिम फ़ैसले पर टिप्पणी की।
फिर सिद्धू ने 18 जुलाई को राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उनकी पत्नी और अमृतसर से विधायक नवजोत कौर सिद्धू ने भी इस्तीफ़ा दे दिया। यानी तस्वीर साफ होने लगी थी।
आम आदमी पार्टी में शामिल होने को लेकर बात यहां तक गई कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ उनकी कई बैठकें भी हुईं, लेकिन बात किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई।
कहा जाता है कि सिद्धू आप से अपने लिए, पत्नी और अपने कुछ लोगों के लिए विधानसभा चुनाव की टिकट मांग रहे थे. लेकिन आप का संविधान एक ही परिवार के दो लोगों को टिकट देने से रोकता है।
इसके बाद उन्होंने पूर्व हॉकी खिलाड़ी परगट सिंह और लुधियान के दो विधायक भाइयों के साथ 'आवाज़-ए-पंजाब' के नाम से एक राजनीतिक मंच बनाया।
उनका कहना था कि उनका मंच चुनाव में उन लोगों का साथ देगा जो पंजाब के लिए कुछ अच्छा करना चाह रहे हैं. लेकिन उन्होंने उन लोगों का नाम नहीं बताया जिनका वो साथ देना चाहते हैं. इस तरह उन्होंने अपने विकल्पों को खुला रखा।
बाद में 'आवाज़-ए-पंजाब' में सिद्धू के साथ आए लुधियाना के दोनों विधायकों ने आप में शामिल होने का फ़ैसला किया।
सवाल यह है कि आखिर नवजोत सिंह सिद्धू में ऐसा क्या ख़ास है कि आप हो या कांग्रेस उनके आने से खुश है और अपना हाथ ऊपर मान रही है। असल में, इसकी एकमात्र वजह है सिद्धू की पृष्ठभूमि क्रिकेटर की होना और यही वजह है कि सिद्धू भी अपने मशहूर ‘खड़काओ’ की तर्ज पर मंजीरा छाप होकर निकल लिए हैं। अब यह उनका अति-आत्मविश्वास ही है कि उन्हें लगता है कि वह बेहद कामयाब या करिश्माई शख्सियत हैं और पंजाब की राजनीति के लिए अपरिहार्य हैं।
वैसे, सिद्धू ने गोटी बड़े करीने से खेली है और इस बार चुनाव में उनने पंजाबी बनाम बाहरी का दांव चल दिया है। ठीक बिहार विधानसभा चुनाव की तरह और अगर यह दांव सही पड़ गया तो मूलतः हरियाणा के केजरीवाल को नुकसान हो जाएगा।
बहरहाल, सिद्धू को जब बीजेपी में खास तवज्जो नहीं मिली तो आप के ज़रिए उन्होंने सीएम की कुरसी पर निशाना साधने की कोशिश की और अब कम से कम इतना ज़रूर चाहते हैं कि वह किंग नहीं तो कम से कम किंगमेकर की भूमिका में ज़रूर रहें।
पंजाब की राजनीति पर नज़र रखने वालों का मानना है कि जिस समय नवजोत सिंह सिद्धू की आम आदमी पार्टी से बातचीत चल रही थी, उस समय अगर वो आप में शामिल हो गए होते तो शायद उन्हें बड़ी सफलता मिलती।
लेकिन जिस तरीके से पिछले तीन-चार महीने में सिद्धू और उनकी पत्नी नवजोत कौर अलग-अलग पार्टियों से बातचीत में मशगूल दिखाई दीं, तो लोगों में यही संदेश गया कि वे लोग सियासी मोल-भाव में व्यस्त हैं। जाहिर है, इससे उनकी चमक कम हुई है।
वैसे भी, सिद्धू के लिए इससे भयभीत होने की ज़रूरत नहीं। पंजाब की पार्ट-टाइम पॉलिटिक्स तो किसी भी स्टूडियो से हो सकती है।
मंजीत ठाकुर
इसका मतलब यह हुआ कि नवजोत सिंह सिद्धू कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ेंगे और वह सीट अमृतसर-पूर्व की सीट भी हो सकती है, जहां से निवर्तमान विधायक उनकी पत्नी डॉ. नवजोत कौर रही हैं।
बीजेपी से दूरी बनाने की जो भई वजहें खुद सिद्धू गिनाएं और या फिर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस से पींगे बढ़ाने के पीछे उनकी मंशा क्या है यह साफ करें, लेकिन यह जानना बेहद दिलचस्प होगा कि आखिर पंजाब की राजनीति में सिद्धू को क्या ताकत हासिल है? आखिर, पंजाब में कांग्रेस के खेवनहार कैप्टन अमरिन्दर सिंह क्यों पहले सिद्धू के कांग्रेस में आने से नाखुश थे और अब क्यों उन्होंने सिद्धू के आने की खबरों का स्वागत किया है। (गुरूवार को सिद्धू की पत्नी कांग्रेस में जाने की खबरों की पुष्टि कर चुकी हैं)
नवजोत सिंह सिद्धू को अरुण जेटली ही राजनीति में लेकर आए थे। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में अमृतसर के सांसद नवजोत सिंह सिद्धू की जगह बीजेपी ने अरुण जेटली को वहां से उम्मीदवार बनाया। गुस्साए सिद्धू ने जेटली के लिए चुनाव प्रचार नहीं किया। हालांकि, इसी साल अप्रैल में बीजेपी ने सिद्धू को राज्यसभा की सदस्यता दी, लेकिन सिद्धू बजाय राज्यसभा जाने के एक कॉमिडी शो में सिंहासन पर बैठकर ठहाके लगाते और शेरो-शायरी करते देखे गए।
बहरहाल, ऐसा लग गया था कि यह क्रिकेटर विधानसभा चुनाव से पहले कुछ तो करेगा और पंजाब की राजनीति में उबाल आया तो सत्ताविरोधी लहर की और आम आदमी पार्टी की संभावनाओं के मद्देनज़र सिद्धू का नाम भी आप से जोड़ा जाने लगा। हालांकि, न तो आप ने और न कभी सिद्धू ने इसके बारे में किसी अंतिम फ़ैसले पर टिप्पणी की।
फिर सिद्धू ने 18 जुलाई को राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उनकी पत्नी और अमृतसर से विधायक नवजोत कौर सिद्धू ने भी इस्तीफ़ा दे दिया। यानी तस्वीर साफ होने लगी थी।
आम आदमी पार्टी में शामिल होने को लेकर बात यहां तक गई कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ उनकी कई बैठकें भी हुईं, लेकिन बात किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई।
कहा जाता है कि सिद्धू आप से अपने लिए, पत्नी और अपने कुछ लोगों के लिए विधानसभा चुनाव की टिकट मांग रहे थे. लेकिन आप का संविधान एक ही परिवार के दो लोगों को टिकट देने से रोकता है।
इसके बाद उन्होंने पूर्व हॉकी खिलाड़ी परगट सिंह और लुधियान के दो विधायक भाइयों के साथ 'आवाज़-ए-पंजाब' के नाम से एक राजनीतिक मंच बनाया।
उनका कहना था कि उनका मंच चुनाव में उन लोगों का साथ देगा जो पंजाब के लिए कुछ अच्छा करना चाह रहे हैं. लेकिन उन्होंने उन लोगों का नाम नहीं बताया जिनका वो साथ देना चाहते हैं. इस तरह उन्होंने अपने विकल्पों को खुला रखा।
बाद में 'आवाज़-ए-पंजाब' में सिद्धू के साथ आए लुधियाना के दोनों विधायकों ने आप में शामिल होने का फ़ैसला किया।
सवाल यह है कि आखिर नवजोत सिंह सिद्धू में ऐसा क्या ख़ास है कि आप हो या कांग्रेस उनके आने से खुश है और अपना हाथ ऊपर मान रही है। असल में, इसकी एकमात्र वजह है सिद्धू की पृष्ठभूमि क्रिकेटर की होना और यही वजह है कि सिद्धू भी अपने मशहूर ‘खड़काओ’ की तर्ज पर मंजीरा छाप होकर निकल लिए हैं। अब यह उनका अति-आत्मविश्वास ही है कि उन्हें लगता है कि वह बेहद कामयाब या करिश्माई शख्सियत हैं और पंजाब की राजनीति के लिए अपरिहार्य हैं।
वैसे, सिद्धू ने गोटी बड़े करीने से खेली है और इस बार चुनाव में उनने पंजाबी बनाम बाहरी का दांव चल दिया है। ठीक बिहार विधानसभा चुनाव की तरह और अगर यह दांव सही पड़ गया तो मूलतः हरियाणा के केजरीवाल को नुकसान हो जाएगा।
बहरहाल, सिद्धू को जब बीजेपी में खास तवज्जो नहीं मिली तो आप के ज़रिए उन्होंने सीएम की कुरसी पर निशाना साधने की कोशिश की और अब कम से कम इतना ज़रूर चाहते हैं कि वह किंग नहीं तो कम से कम किंगमेकर की भूमिका में ज़रूर रहें।
पंजाब की राजनीति पर नज़र रखने वालों का मानना है कि जिस समय नवजोत सिंह सिद्धू की आम आदमी पार्टी से बातचीत चल रही थी, उस समय अगर वो आप में शामिल हो गए होते तो शायद उन्हें बड़ी सफलता मिलती।
लेकिन जिस तरीके से पिछले तीन-चार महीने में सिद्धू और उनकी पत्नी नवजोत कौर अलग-अलग पार्टियों से बातचीत में मशगूल दिखाई दीं, तो लोगों में यही संदेश गया कि वे लोग सियासी मोल-भाव में व्यस्त हैं। जाहिर है, इससे उनकी चमक कम हुई है।
वैसे भी, सिद्धू के लिए इससे भयभीत होने की ज़रूरत नहीं। पंजाब की पार्ट-टाइम पॉलिटिक्स तो किसी भी स्टूडियो से हो सकती है।
मंजीत ठाकुर
Saturday, November 19, 2016
बेपानी सियासत में पानी की राजनीति
चुनावी वक्त में पानी की तरह रूपया ज़रूर बहाया जाता है लेकिन पानी को पानी की ही तरह बहाना मुद्दा है। ताजा विवाद पंजाब बनाम हरियाणा का है, जहां मसला सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद गहरा गया। शीर्ष अदालत ने पंजाब सरकार को बड़ा झटका देते हुए सतलज का पानी हरियाणा को देने का आदेश दिया था। लेकिन, गुरूवार यानी 17 नवंबर को उच्चतम न्यायालय पंजाब द्वारा सतलुज-यमुना संपर्क नहर के लिए भूमि पर यथास्थिति बनाए रखने के शीर्ष अदालत के अंतरिम आदेश का कथित उल्लंघन करने के मामले में हरियाणा की याचिका पर 21 नवंबर को सुनवाई के लिए सहमत हो गया।
अदालत के सामने हरियाणा सरकार के वकील ने इस याचिका का उल्लेख करते हुए इस पर तुरंत सुनवाई का अनुरोध किया था। हरियाणा का कहना था कि नहर परियोजना के निमित्त भूमि पर यथास्थिति बनाए रखने का पंजाब सरकार को निर्देश देने संबंधी ऊपरी अदालत के पहले के आदेश का हनन करने के प्रयास हो रहे हैं।
हाल ही में पंजाब सरकार ने इस परियोजना के निमित्त अधिग्रहीत भूमि को तत्काल प्रभाव से अधिसूचना के दायरे से बाहर करने और इसे मुफ्त में इसके मालिकों को लौटाने का फैसला किया था। राज्य सरकार का यह निर्णय काफी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि न्यायमूर्ति दवे की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने पिछले सप्ताह पंजाब समझौता निरस्तीकरण, 2004 कानून को असंवैधानिक करार दिया था। इस कानून के जरिए ही पंजाब ने हरियाणा के साथ जल साझा करने संबंधी 1981 के समझौते को एकतरफा निरस्त कर दिया था।
शीर्ष अदालत ने राष्ट्रपति को भेजी अपनी राय में कहा था कि पंजाब समझौते को ‘एकतरफा’ निरस्त नहीं कर सकता है और न ही शीर्ष अदालत के निर्णय को ‘निष्प्रभावी’ बना सकता है।
वैसे, पंजाब और हरियाणा के बीच सतलुज यमुना के जल-बंटवारे को लेकर विवाद पचास साल से भी ज्यादा पुराना है। पंजाब सरकार का पक्ष है कि उनके सूबे में भूमिजल स्तर बेहद कम है। अगर पंजाब ने सतलुज-यमुना नहर के जरिए हरियाणा को पानी दिया तो पंजाब में पानी का संकट खड़ा हो जाएगा। वहीं हरियाणा सरकार सतलुज के पानी पर अपना दावा ठोंक रही है।
चुनावी वक्त में पानी ने पंजाब की राजनीति को गरमा दिया है। इस मुद्दे पर पंजाब के विधायकों और कुछ सांसदो ने इस्तीफे का दौर भी चला।
दरअसल, इस विवाद की शुरूआत तो सन् 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के साथ ही हो गई थी। इसी साल हरियाणा राज्य का गठन हुआ था। लेकिन पंजाब और हरियाणा के बीच नदियों के पानी का बंटवारा तय नहीं हो पाया था।
उस वक्त, केन्द्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी की थी, जिसके तहत कुल 7.2 एमएएफ (मिलियन एकड़ फीट) में से 3.5 एमएएफ पानी हरियाणा को दिया जाना था। इसी पानी को हरियाणा तक लाने के वास्ते सतलुज-यमुना नहर (एसवाईएल) बनाने का फैसला हुआ। इस नहर की कुल लम्बाई 212 किलोमीटर है।
हरियाणा को पानी की जरूरत थी, सो उसने अपने हिस्से की 91 किलोमीटर नहर तयशुदा वक्त में पूरी कर ली। लेकिन, पंजाब ने अपने हिस्से की 122 किमी लम्बी नहर का निर्माण को अभी तक लटकाए रखा है। यही नहीं, पंजाब ने इसी साल यानी 2016 के मार्च में नहर निर्माण के लिए अधिग्रहीत ज़मीनें किसानों को वापस करने का फैसला कर लिया। इसका एक मतलब यह भी है कि पंजाब ने हरियाणा को पानी न देने की अपनी नीयत साफ कर दी।
नतीजतन, हरियाणा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। शीर्ष अदालत ने पंजाब को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया। लेकिन अब इस मामले पर अन्तिम फैसला सुनाते हुए न्यायालय ने नहर का निर्माण को पूरा करने का फैसला सुना दिया है।
हालांकि इसी तरह के रोड़े अटकाए जाने के दौरान अदालत 1996 और 2004 में भी यही फैसला सुना चुकी है। इस दौरान कांग्रेस और अकाली दल भाजपा गठबन्धन की सरकारें पंजाब में रहीं, लेकिन नहर के निर्माण को किसी ने गति नहीं दी। मसलन एक तरह से न्यायालय के आदेश की अवमानना की स्थिति बनाई जाती रही।
ऐसा नहीं है कि इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिशें नहीं हुईं। 31 दिसंबर, 1981 को केन्द्र सरकार ने पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों की बैठक इसी मसले पर बुलाई थी। बैठक में रावी-व्यास नदियों में अतिरिक्त पानी की उपलब्धता का भी अध्ययन कराया गया।
इस समय पानी की उपलब्धता 158.50 लाख एमएएफ से बढ़कर 171.50 लाख एमएएफ हो गई थी। इसमें से 13.2 लाख एमएएफ अतिरिक्त पानी पंजाब को देने का प्रस्ताव मंजूर करते हुए तीनों राज्यों ने समझौता-पत्र पर हस्ताक्षर भी कर दिए थे। शर्त थी कि पंजाब सतलुज-यमुना लिंक नहर बनाएगा। काम को तेज़ी के लिए तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 8 अप्रैल, 1982 को पटियाला जिले के कपूरी गाँव के पास नहर की खुदाई का भूमि-पूजन भी किया। लेकिन तभी सन्त लोंगोवाल की अगुआई में अकाली दल ने नहर निर्माण के खिलाफ धर्म-युद्ध छेड़ दिया। नतीजतन पूरे पंजाब में इस नहर के खिलाफ एक आंदोलन जैसी स्थिति पैदा हो गई।
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव-लोंगोवाल समझौते पर हस्ताक्षर हुए। जिसकी शर्तों में अगस्त 1986 तक नहर का निर्माण पूरा करने पर सहमति बनी। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के जज की अध्यक्षता में प्राधिकरण गठित किया गया, जिसने साल 1987 में रावी-व्यास के अतिरिक्त पानी को पंजाब और हरियाणा दोनों ही राज्यों में बांटने का फैसला लिया। लेकिन यह फैसला भी ठंडे बस्ते में चला गया।
जब पंजाब के मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला था, तो उन्होंने राजीव-लोंगोवाल समझौते के तहत नहर का काम शुरू करवा दिया, लेकिन फिर पंजाब में उग्रवादियों ने नहर निर्माण में काम करने वाले 35 मजदूरों का नरसंहार कर दिया। बाद में नहर के दो इंजीनियरों की भी हत्या कर दी गई। इसके बाद काम रूक गया।
1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हुकुम सिंह ने केन्द्र सरकार की मदद से नहर का अधूरा काम किसी केन्द्रीय एजेंसी से कराने की पहल की। सीमा सड़क संगठन को यह काम सौंपा भी गया, किन्तु शुरू नहीं हो पाया। मार्च 2016 में तो पंजाब ने सभी समझौतों को दरकिनार करते हुए नहर के लिये की गई 5376 एकड़ भूमि के अधिग्रहण को निरस्त करने का ही फैसला ले लिया।
लेकिन पंजाब में सियासी दल जिस तरह के रूख पर अड़े हैं, उससे यह कावेरी मसले की तरह के विवाद में बने रहने की ही आशंका है। लगता नहीं कि यह मुद्दा फौरी तौर पर सुलझ भी पाएगा।
एक बात साफ है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में सियासतदानों की नज़रें सिर्फ वोटों पर ही हैं, समावेशी विकास में पंजाब और हरियाणा एक साथ नहीं आ सकते, यह बात भी स्पष्ट हो रही है।
मंजीत ठाकुर
अदालत के सामने हरियाणा सरकार के वकील ने इस याचिका का उल्लेख करते हुए इस पर तुरंत सुनवाई का अनुरोध किया था। हरियाणा का कहना था कि नहर परियोजना के निमित्त भूमि पर यथास्थिति बनाए रखने का पंजाब सरकार को निर्देश देने संबंधी ऊपरी अदालत के पहले के आदेश का हनन करने के प्रयास हो रहे हैं।
हाल ही में पंजाब सरकार ने इस परियोजना के निमित्त अधिग्रहीत भूमि को तत्काल प्रभाव से अधिसूचना के दायरे से बाहर करने और इसे मुफ्त में इसके मालिकों को लौटाने का फैसला किया था। राज्य सरकार का यह निर्णय काफी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि न्यायमूर्ति दवे की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने पिछले सप्ताह पंजाब समझौता निरस्तीकरण, 2004 कानून को असंवैधानिक करार दिया था। इस कानून के जरिए ही पंजाब ने हरियाणा के साथ जल साझा करने संबंधी 1981 के समझौते को एकतरफा निरस्त कर दिया था।
शीर्ष अदालत ने राष्ट्रपति को भेजी अपनी राय में कहा था कि पंजाब समझौते को ‘एकतरफा’ निरस्त नहीं कर सकता है और न ही शीर्ष अदालत के निर्णय को ‘निष्प्रभावी’ बना सकता है।
वैसे, पंजाब और हरियाणा के बीच सतलुज यमुना के जल-बंटवारे को लेकर विवाद पचास साल से भी ज्यादा पुराना है। पंजाब सरकार का पक्ष है कि उनके सूबे में भूमिजल स्तर बेहद कम है। अगर पंजाब ने सतलुज-यमुना नहर के जरिए हरियाणा को पानी दिया तो पंजाब में पानी का संकट खड़ा हो जाएगा। वहीं हरियाणा सरकार सतलुज के पानी पर अपना दावा ठोंक रही है।
चुनावी वक्त में पानी ने पंजाब की राजनीति को गरमा दिया है। इस मुद्दे पर पंजाब के विधायकों और कुछ सांसदो ने इस्तीफे का दौर भी चला।
दरअसल, इस विवाद की शुरूआत तो सन् 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के साथ ही हो गई थी। इसी साल हरियाणा राज्य का गठन हुआ था। लेकिन पंजाब और हरियाणा के बीच नदियों के पानी का बंटवारा तय नहीं हो पाया था।
उस वक्त, केन्द्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी की थी, जिसके तहत कुल 7.2 एमएएफ (मिलियन एकड़ फीट) में से 3.5 एमएएफ पानी हरियाणा को दिया जाना था। इसी पानी को हरियाणा तक लाने के वास्ते सतलुज-यमुना नहर (एसवाईएल) बनाने का फैसला हुआ। इस नहर की कुल लम्बाई 212 किलोमीटर है।
हरियाणा को पानी की जरूरत थी, सो उसने अपने हिस्से की 91 किलोमीटर नहर तयशुदा वक्त में पूरी कर ली। लेकिन, पंजाब ने अपने हिस्से की 122 किमी लम्बी नहर का निर्माण को अभी तक लटकाए रखा है। यही नहीं, पंजाब ने इसी साल यानी 2016 के मार्च में नहर निर्माण के लिए अधिग्रहीत ज़मीनें किसानों को वापस करने का फैसला कर लिया। इसका एक मतलब यह भी है कि पंजाब ने हरियाणा को पानी न देने की अपनी नीयत साफ कर दी।
नतीजतन, हरियाणा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। शीर्ष अदालत ने पंजाब को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया। लेकिन अब इस मामले पर अन्तिम फैसला सुनाते हुए न्यायालय ने नहर का निर्माण को पूरा करने का फैसला सुना दिया है।
हालांकि इसी तरह के रोड़े अटकाए जाने के दौरान अदालत 1996 और 2004 में भी यही फैसला सुना चुकी है। इस दौरान कांग्रेस और अकाली दल भाजपा गठबन्धन की सरकारें पंजाब में रहीं, लेकिन नहर के निर्माण को किसी ने गति नहीं दी। मसलन एक तरह से न्यायालय के आदेश की अवमानना की स्थिति बनाई जाती रही।
ऐसा नहीं है कि इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिशें नहीं हुईं। 31 दिसंबर, 1981 को केन्द्र सरकार ने पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों की बैठक इसी मसले पर बुलाई थी। बैठक में रावी-व्यास नदियों में अतिरिक्त पानी की उपलब्धता का भी अध्ययन कराया गया।
इस समय पानी की उपलब्धता 158.50 लाख एमएएफ से बढ़कर 171.50 लाख एमएएफ हो गई थी। इसमें से 13.2 लाख एमएएफ अतिरिक्त पानी पंजाब को देने का प्रस्ताव मंजूर करते हुए तीनों राज्यों ने समझौता-पत्र पर हस्ताक्षर भी कर दिए थे। शर्त थी कि पंजाब सतलुज-यमुना लिंक नहर बनाएगा। काम को तेज़ी के लिए तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 8 अप्रैल, 1982 को पटियाला जिले के कपूरी गाँव के पास नहर की खुदाई का भूमि-पूजन भी किया। लेकिन तभी सन्त लोंगोवाल की अगुआई में अकाली दल ने नहर निर्माण के खिलाफ धर्म-युद्ध छेड़ दिया। नतीजतन पूरे पंजाब में इस नहर के खिलाफ एक आंदोलन जैसी स्थिति पैदा हो गई।
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव-लोंगोवाल समझौते पर हस्ताक्षर हुए। जिसकी शर्तों में अगस्त 1986 तक नहर का निर्माण पूरा करने पर सहमति बनी। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के जज की अध्यक्षता में प्राधिकरण गठित किया गया, जिसने साल 1987 में रावी-व्यास के अतिरिक्त पानी को पंजाब और हरियाणा दोनों ही राज्यों में बांटने का फैसला लिया। लेकिन यह फैसला भी ठंडे बस्ते में चला गया।
जब पंजाब के मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला था, तो उन्होंने राजीव-लोंगोवाल समझौते के तहत नहर का काम शुरू करवा दिया, लेकिन फिर पंजाब में उग्रवादियों ने नहर निर्माण में काम करने वाले 35 मजदूरों का नरसंहार कर दिया। बाद में नहर के दो इंजीनियरों की भी हत्या कर दी गई। इसके बाद काम रूक गया।
1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हुकुम सिंह ने केन्द्र सरकार की मदद से नहर का अधूरा काम किसी केन्द्रीय एजेंसी से कराने की पहल की। सीमा सड़क संगठन को यह काम सौंपा भी गया, किन्तु शुरू नहीं हो पाया। मार्च 2016 में तो पंजाब ने सभी समझौतों को दरकिनार करते हुए नहर के लिये की गई 5376 एकड़ भूमि के अधिग्रहण को निरस्त करने का ही फैसला ले लिया।
लेकिन पंजाब में सियासी दल जिस तरह के रूख पर अड़े हैं, उससे यह कावेरी मसले की तरह के विवाद में बने रहने की ही आशंका है। लगता नहीं कि यह मुद्दा फौरी तौर पर सुलझ भी पाएगा।
एक बात साफ है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में सियासतदानों की नज़रें सिर्फ वोटों पर ही हैं, समावेशी विकास में पंजाब और हरियाणा एक साथ नहीं आ सकते, यह बात भी स्पष्ट हो रही है।
मंजीत ठाकुर
Thursday, September 8, 2016
राहुल@2.0 की खाट चर्चा
कहावत है कि सियासत में जब कुछ नया हो तो उसकी पहल करने वाले नेता के बारे में एक बार ज़रूर सोचना चाहिए। राजनीति के अभिनव प्रयोग की शुरूआत हमेशा नेता करते हैं, और अमूमन जनता उस पहल पर अपनी मुहर लगाकर उसे पॉप्युलर बनाती है या खारिज़ कर देती है।
सत्ताइस साल से उत्तर प्रदेश की कुरसी से दूर कांग्रेस अपने युवराज राहुल गांधी औऱ चुनावी सलाहकार प्रशांत किशोर को लेकर चुनावी वैतरणी पार करने की जुगत में लगी है। प्रशांत किशोर का नाम 2014 लोकसभआ चुनाव में नरेंद्र मोदी के धारदार चुनावी अभियान के बाद चमका। बीजेपी की प्रचंड जीत प्रशांत किशोर चुनावी अभियान की रणनीति का नतीजा मानी जाती है। लेकिन साल 2014 के बाद बिहार चुनाव में नीतीश-लालू के लिए काम किया। उन्हें भी जीत दिलाकर प्रशांत किशोर ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
अब 2017 के लिए पंजाब और यूपी इलेक्शन में कांग्रेस के लिए प्रशांत किशोर मैदान में हैं। साल 2014 का इलेक्शन हो या बिहार इलेक्शन पीके चुनावी कैंपेन में माहिर माने जाते हैं। अब यूपी में 27 साल बाद कांग्रेस की जमीन को मजबूत करते दिख रहे हैं।
देवरिया से राहुल ने पैदल यात्रा की तो वहां खाट सभा की योजना भी, जाहिर है, उऩके सलाहकार प्रशांत ने ही बनाई। करीब-करीब दो हजार खाट भी रखी गई। यात्रा शुरू हुई राहुल गांधी जैसे ही आगे चले, पीछे से सभा में शामिल लोग अपने-अपने हिस्से की खाट लेकर चलने लगे। अब खाट के इस लूटपाट को भी पीके का राजनीतिक स्ट्रोक बोला जा रहा है। पीके ने ही खाट बिछाई और खाट लुटवाई इससे होने वाले राजनीतिक फायदे काफी गहरे हैं।
कांग्रेस ने अपना चुनावी अभियान तब शुरू किया है जब बसपा ने अपने पत्ते खोल दिए हैं, सपा अपने अभियान को शुरू करने वाली है और बीजेपी अभी मंथन की प्रक्रिया से गुजर रही है। यह तय है कि यूपी इलेक्शन में एक बार फिर से केन्द्रीय मुद्दा जाति ही होगी और कांग्रेस भी उसी नाव पर सवार होकर टिकट बांटेगी, लेकिन ढिंढोरा विकास, किसानों और गरीबों की हमदर्दी का ही पीटा जा रहा है। लोकसभा चुनाव में बीजेपी के और बिहार चुनाव में राजद-जेडीयू के रणनीतिकार प्रशांत किशोर की कोशिश यही है कि यूपी में कोई कांग्रेस को नज़र अंदाज न कर सके।
फिर भी सवाल ही है कि क्या इस अभियान से कांग्रेस और ब्रांड राहुल को प्रशांत किशोर चमका पाएंगे? वैसे, देवरिया से दिल्ली का यह अभियान पूरा हो गया तो दो करोड़ लोगों से कांग्रेस का संपर्क तो हो ही जाएगा, यह बात और है कि लोग कांग्रेस को और उसके इस खाट अभियान को कितनी संजीदगी से लेते हैं।
ऐसा भी नहीं है इससे पहले कभी राहुल ने गांव की पगडंडियां नहीं मापी, या दलितो और वंचितों के घर जाकर खुद को उनका हमदर्द साबित करने की कोशिश नहीं की है। पिछले चुनाव में राहुल ने 100 विधानसभाओं का दौरा किया था लेकिन जीत तो महज 28 पर मिली थी। राहुल का लॉन्च नाकाम माना गया था।
इस बार खाट सभाओं के ज़रिए राहुल को रीलॉन्च किया गया है वह भी वर्ज़न 2.0 के साथ। इस बार 39 जिलों और 59 लोकसभा क्षेत्रों और 2500 किलोमीटर की दूरी तय करेंगे।
कर्जदार किसानों की सूची के साथ राहुल उन सबको लिखकर दे रहे हैं कि कर्ज माफ किया जाएगा और बिजली का बिल आधा किया जाएगा। सूत्रों के हवाले से यह ख़बर मिली है कि यह सब पीके का किया कराया है। राहुल की खाट सभा औऱ महापदयात्रा दोनों को मीडिया कवरेज औऱ लोगों तक यह ख़बर पहुंचे इसलिए स्थानीय गांव वासियों को पहले से ही तैयार किया गया था। लुटपाट करने के लिए ही खाट सभा का आयोजन रखा गया था।
कयास यही हैं कि राहुल गांधी की यूपी में किसान पैदल यात्रा, किसानों के कर्ज माफ, बिजली बिल माफ, फसलों के समर्थन मूल्य का पूर्ण भुगतान जैसी किसानी मांगो को लेकर निकली है, खाटों की लूट के साथ खबर फैले और लोगों को पता चल जाए। राहुल की खाट सभा औऱ महापदयात्रा दोनों को मीडिया कवरेज औऱ लोगों तक यह ख़बर पहुंचे इसलिए स्थानीय गांव वासियों को पहले से ही तैयार किया गया था।
अंदाज़ा लगाइए कि राहुल की सभा बाढ़ग्रस्त देवरिया से ही शुरू क्यों हुई? अंदाजा़ लगाइए कि लूटे खाटों पर बैठे गांव के लोग आपस में खाट के बारे में चर्चा करेंगे तो क्या कांग्रेस और राहुल की चर्चा क्या नहीं होगी? जहां समाजवादी पार्टी पहले लैपटॉप बांट चुकी है और जहां इस बार वह स्मार्टफोन बांट रही है, वहां खाटों की लूट क्या जाहिर करती है? खाट गांव के लिए कितने जरूरी है इस पर भी ध्यान दीजिए। ज़मीन पर सो रहे तबके को खाट मिलना कितनी बड़ी बात है इसका अंदाज़ा आपको तभी लगेगा, जब आप गांव को बहुत नज़दीक से देखेंगे।
जो भी हो, सोशल मीडिया पर छाई इस खबर ने एक लहर पैदा की है और जो खाट, गांव और पगडंडी, लोटा और डोरी शहरी शब्दावली से गायब हो चुके थे, इसी बहाने उनकी चर्चा तो हुई। राहुल की खाट सभाओं को कमतर आंकना सियासी भूल होगी। प्रशांत किशोर ने सही निशाना लगाया है।
मंजीत ठाकुर
सत्ताइस साल से उत्तर प्रदेश की कुरसी से दूर कांग्रेस अपने युवराज राहुल गांधी औऱ चुनावी सलाहकार प्रशांत किशोर को लेकर चुनावी वैतरणी पार करने की जुगत में लगी है। प्रशांत किशोर का नाम 2014 लोकसभआ चुनाव में नरेंद्र मोदी के धारदार चुनावी अभियान के बाद चमका। बीजेपी की प्रचंड जीत प्रशांत किशोर चुनावी अभियान की रणनीति का नतीजा मानी जाती है। लेकिन साल 2014 के बाद बिहार चुनाव में नीतीश-लालू के लिए काम किया। उन्हें भी जीत दिलाकर प्रशांत किशोर ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
अब 2017 के लिए पंजाब और यूपी इलेक्शन में कांग्रेस के लिए प्रशांत किशोर मैदान में हैं। साल 2014 का इलेक्शन हो या बिहार इलेक्शन पीके चुनावी कैंपेन में माहिर माने जाते हैं। अब यूपी में 27 साल बाद कांग्रेस की जमीन को मजबूत करते दिख रहे हैं।
देवरिया से राहुल ने पैदल यात्रा की तो वहां खाट सभा की योजना भी, जाहिर है, उऩके सलाहकार प्रशांत ने ही बनाई। करीब-करीब दो हजार खाट भी रखी गई। यात्रा शुरू हुई राहुल गांधी जैसे ही आगे चले, पीछे से सभा में शामिल लोग अपने-अपने हिस्से की खाट लेकर चलने लगे। अब खाट के इस लूटपाट को भी पीके का राजनीतिक स्ट्रोक बोला जा रहा है। पीके ने ही खाट बिछाई और खाट लुटवाई इससे होने वाले राजनीतिक फायदे काफी गहरे हैं।
कांग्रेस ने अपना चुनावी अभियान तब शुरू किया है जब बसपा ने अपने पत्ते खोल दिए हैं, सपा अपने अभियान को शुरू करने वाली है और बीजेपी अभी मंथन की प्रक्रिया से गुजर रही है। यह तय है कि यूपी इलेक्शन में एक बार फिर से केन्द्रीय मुद्दा जाति ही होगी और कांग्रेस भी उसी नाव पर सवार होकर टिकट बांटेगी, लेकिन ढिंढोरा विकास, किसानों और गरीबों की हमदर्दी का ही पीटा जा रहा है। लोकसभा चुनाव में बीजेपी के और बिहार चुनाव में राजद-जेडीयू के रणनीतिकार प्रशांत किशोर की कोशिश यही है कि यूपी में कोई कांग्रेस को नज़र अंदाज न कर सके।
फिर भी सवाल ही है कि क्या इस अभियान से कांग्रेस और ब्रांड राहुल को प्रशांत किशोर चमका पाएंगे? वैसे, देवरिया से दिल्ली का यह अभियान पूरा हो गया तो दो करोड़ लोगों से कांग्रेस का संपर्क तो हो ही जाएगा, यह बात और है कि लोग कांग्रेस को और उसके इस खाट अभियान को कितनी संजीदगी से लेते हैं।
ऐसा भी नहीं है इससे पहले कभी राहुल ने गांव की पगडंडियां नहीं मापी, या दलितो और वंचितों के घर जाकर खुद को उनका हमदर्द साबित करने की कोशिश नहीं की है। पिछले चुनाव में राहुल ने 100 विधानसभाओं का दौरा किया था लेकिन जीत तो महज 28 पर मिली थी। राहुल का लॉन्च नाकाम माना गया था।
इस बार खाट सभाओं के ज़रिए राहुल को रीलॉन्च किया गया है वह भी वर्ज़न 2.0 के साथ। इस बार 39 जिलों और 59 लोकसभा क्षेत्रों और 2500 किलोमीटर की दूरी तय करेंगे।
कर्जदार किसानों की सूची के साथ राहुल उन सबको लिखकर दे रहे हैं कि कर्ज माफ किया जाएगा और बिजली का बिल आधा किया जाएगा। सूत्रों के हवाले से यह ख़बर मिली है कि यह सब पीके का किया कराया है। राहुल की खाट सभा औऱ महापदयात्रा दोनों को मीडिया कवरेज औऱ लोगों तक यह ख़बर पहुंचे इसलिए स्थानीय गांव वासियों को पहले से ही तैयार किया गया था। लुटपाट करने के लिए ही खाट सभा का आयोजन रखा गया था।
कयास यही हैं कि राहुल गांधी की यूपी में किसान पैदल यात्रा, किसानों के कर्ज माफ, बिजली बिल माफ, फसलों के समर्थन मूल्य का पूर्ण भुगतान जैसी किसानी मांगो को लेकर निकली है, खाटों की लूट के साथ खबर फैले और लोगों को पता चल जाए। राहुल की खाट सभा औऱ महापदयात्रा दोनों को मीडिया कवरेज औऱ लोगों तक यह ख़बर पहुंचे इसलिए स्थानीय गांव वासियों को पहले से ही तैयार किया गया था।
अंदाज़ा लगाइए कि राहुल की सभा बाढ़ग्रस्त देवरिया से ही शुरू क्यों हुई? अंदाजा़ लगाइए कि लूटे खाटों पर बैठे गांव के लोग आपस में खाट के बारे में चर्चा करेंगे तो क्या कांग्रेस और राहुल की चर्चा क्या नहीं होगी? जहां समाजवादी पार्टी पहले लैपटॉप बांट चुकी है और जहां इस बार वह स्मार्टफोन बांट रही है, वहां खाटों की लूट क्या जाहिर करती है? खाट गांव के लिए कितने जरूरी है इस पर भी ध्यान दीजिए। ज़मीन पर सो रहे तबके को खाट मिलना कितनी बड़ी बात है इसका अंदाज़ा आपको तभी लगेगा, जब आप गांव को बहुत नज़दीक से देखेंगे।
जो भी हो, सोशल मीडिया पर छाई इस खबर ने एक लहर पैदा की है और जो खाट, गांव और पगडंडी, लोटा और डोरी शहरी शब्दावली से गायब हो चुके थे, इसी बहाने उनकी चर्चा तो हुई। राहुल की खाट सभाओं को कमतर आंकना सियासी भूल होगी। प्रशांत किशोर ने सही निशाना लगाया है।
मंजीत ठाकुर
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Sunday, August 23, 2015
बिहारी अस्मिता का डीएनए
बिहार के चुनाव में इस बार किसिम-किसिम की बातें सुनी जा रही हैं। वैसे हमेशा से सुनी जाती हैं। लेकिन जिस राज्य में राजनीति लोगों को घलुए में मिलती है, उसमें मुद्दों को ज़मीन से हवा की तरफ कैसे मोड़ दिया जाता है, इस बार का चुनाव उसकी मिसाल है। बरसो पहले बीजेपी-जदयू गठजोड़ ने लालू के जंगल राज के खिलाफ नीतीश के विकास पुरुष की छवि गढ़ी थी। तब बिहार के लोग लालू-राबड़ी राज से दिक हो चुके थे और नीतीश कुमार में उनको अपना तारणहार नज़र आया था।
इस बार युद्ध में आमना-सामना मोदी और नीतीश का है। लालू सपोर्टिंग रोल में हैं। इस बार लालू को सपोर्टिंग रोल में कुछ अच्छा रिजल्ट नहीं मिला तो उनके लिए अगले कुछ साल के लिए परिदृश्य से गायब हो जाने का ख़तरा है।
तो विकास पुरुष नीतीश कुमार की मजबूती विकास का नारा था और उनके लिए यह जाति से ऊपर जगह रखता था। लेकिन, कुरमी-कोइरी उनका भी वोटबैंक था, और फिर उनका महादलित प्रयोग भी था, जिसमें बीजेपी सेंध लगाने की जुगत में है और सामाजिक अभियांत्रिकी का बारीक समीकरण भी नीतीश ने ही भिड़ाया था।
वही नीतीश इस दफा, सब कुछ छोड़छाड़ कर डीएनए सैंपल एकत्र कर रहे हैं। वह केन्द्र को 50 लाख डीएनए सैम्पल की बजाय नाखून और बाल लिफाफे में भिजवा रहे हैं।
नीतीश कुमार ने इस बार की लड़ाई में समझिए ब्रह्मास्त्र छोड़ा है, और वह है बिहारी अस्मिता का। डीएनए सैंपल भिजवाना उसी लड़ाई की घेराबंदी है। लेकिन इस अस्मिता अभियान की कई समस्याएं है। पहली तो यही कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे सूबे खुद को हिन्दुस्तान मानते हैं और ऐसे सूबों में अस्मिता का सवाल गौण हो जाता है।
दिल्ली में बिहार के लोगों को बिहारी कहा जाता है और तकरीबन गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन वहां अस्मिता का सवाल ही खड़ा नहीं होता। बिहार में सांस्कृतिक और भाषायी अस्मिता पर कभी बात नहीं होती। ऐसा मान लेना मुश्किल है कि बिहार में मिथिला के अलग राज्य (भाषायी आधार पर) के लिए कोई जबरदस्त आंदोलन कभी जड़ें जमा सकेगा।
आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु या कर्नाटक में भाषायी अस्मिता की तगड़ी पहचान है। लेकिन वहां अब चुनाव भाषा या अस्मिता के सवाल पर नहीं लड़े जाते। महाराष्ट्र में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना है, जो शिव सेना की कार्बन कॉपी बनने के जुगाड़ में थी। अस्मिता के प्रश्न पर तेलुगुदेशम, या असम गण परिषद् सत्ता में आई थी। लेकिन शिवसेना के शक्ति अर्जन या बाकी के सत्ता में आने के दशक से लेकर अब तक गंगा में काफी पानी बह गया है तो एक सीधा सवाल बनता है कि अस्मिता का प्रश्न अब इन राज्यों से बिहार की तरफ कैसे आ गया।
नीतीश कुमार के खिलाफ बिहार में एक तो सत्ता-विरोधी लहर है ही और हर सत्तारूढ़ पार्टी को इसे झेलना ही होता है। लेकिन वोटों के बिखराव को रोकने के लिए जिसतरह उन्होंने अपने ही धुर विरोधी के साथ कदमताल किया है। गठजोड़ बनाना सामान्य बात है लेकिन फिर ट्विटर पर उनका बयान कि उन्होंने ज़हर पिया है, शायद उनके पक्ष में नहीं रहा। नीतीश के उस बयान को नरेन्द्र मोदी ले उड़े, और गया की रैली में तो उन्होंने मज़ाकिया लहजे में पूछा भी कि आखिर इनमें भुजंग प्रसाद कौन है और चंदन कुमार कौन?
जाहिर है, मोदी विकास के अपने उन सपने के वायदों पर कायम हैं जो उन्होंने बिहार की जनता को लोकसभा चुनाव के दौरान दिए थे। वह कहते भी है कि चुनाव की वजह से हम घोषणा नहीं कर सकते। यानी उनके पत्ते अभी खुले नहीं हैं। लेकिन आंकड़ों में सटीक रहने वाले मोदी बीमारू राज्यों में बिहार की गिनती करते हुए यह भूल गए कि पिछले कुछ साल में बिहार की वृद्धि दर बेहद शानदार रही थी। राष्ट्रीय औसत से काफी बेहतर। लेकिन भावनात्मक मुद्दे उछालने का जो आरोप कभी बीजेपी पर लगता था, वह इस बार जेडी-यू पर लग रहा है।
मोदी ने कहा था लोकतंत्र नीतीश के डीएनए में नहीं है। नीतीश ने उसमें से सिर्फ डीएनए को उठाया। अब वह इस मसले को दलितो-महादलितों को कैसे समझाएंगे? शायद इस तरह कि, केन्द्र से आकर एक प्रधानमंत्री ने बिहारियों को गाली दी है।
लेकिन, नीतीश को पता होगा ही कि बिहारियों को गाली सुनने की आदत है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता में मजूरी कर रहे बिहारियों का अपमान होता रहा है, और 2005 से जब से नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री रहे, उन्होंने बिहार की अस्मिता का सवाल कभी नहीं उठाया था। शक तो जाहिर है होगा ही।
इस बार युद्ध में आमना-सामना मोदी और नीतीश का है। लालू सपोर्टिंग रोल में हैं। इस बार लालू को सपोर्टिंग रोल में कुछ अच्छा रिजल्ट नहीं मिला तो उनके लिए अगले कुछ साल के लिए परिदृश्य से गायब हो जाने का ख़तरा है।
तो विकास पुरुष नीतीश कुमार की मजबूती विकास का नारा था और उनके लिए यह जाति से ऊपर जगह रखता था। लेकिन, कुरमी-कोइरी उनका भी वोटबैंक था, और फिर उनका महादलित प्रयोग भी था, जिसमें बीजेपी सेंध लगाने की जुगत में है और सामाजिक अभियांत्रिकी का बारीक समीकरण भी नीतीश ने ही भिड़ाया था।
वही नीतीश इस दफा, सब कुछ छोड़छाड़ कर डीएनए सैंपल एकत्र कर रहे हैं। वह केन्द्र को 50 लाख डीएनए सैम्पल की बजाय नाखून और बाल लिफाफे में भिजवा रहे हैं।
नीतीश कुमार ने इस बार की लड़ाई में समझिए ब्रह्मास्त्र छोड़ा है, और वह है बिहारी अस्मिता का। डीएनए सैंपल भिजवाना उसी लड़ाई की घेराबंदी है। लेकिन इस अस्मिता अभियान की कई समस्याएं है। पहली तो यही कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे सूबे खुद को हिन्दुस्तान मानते हैं और ऐसे सूबों में अस्मिता का सवाल गौण हो जाता है।
दिल्ली में बिहार के लोगों को बिहारी कहा जाता है और तकरीबन गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन वहां अस्मिता का सवाल ही खड़ा नहीं होता। बिहार में सांस्कृतिक और भाषायी अस्मिता पर कभी बात नहीं होती। ऐसा मान लेना मुश्किल है कि बिहार में मिथिला के अलग राज्य (भाषायी आधार पर) के लिए कोई जबरदस्त आंदोलन कभी जड़ें जमा सकेगा।
आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु या कर्नाटक में भाषायी अस्मिता की तगड़ी पहचान है। लेकिन वहां अब चुनाव भाषा या अस्मिता के सवाल पर नहीं लड़े जाते। महाराष्ट्र में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना है, जो शिव सेना की कार्बन कॉपी बनने के जुगाड़ में थी। अस्मिता के प्रश्न पर तेलुगुदेशम, या असम गण परिषद् सत्ता में आई थी। लेकिन शिवसेना के शक्ति अर्जन या बाकी के सत्ता में आने के दशक से लेकर अब तक गंगा में काफी पानी बह गया है तो एक सीधा सवाल बनता है कि अस्मिता का प्रश्न अब इन राज्यों से बिहार की तरफ कैसे आ गया।
नीतीश कुमार के खिलाफ बिहार में एक तो सत्ता-विरोधी लहर है ही और हर सत्तारूढ़ पार्टी को इसे झेलना ही होता है। लेकिन वोटों के बिखराव को रोकने के लिए जिसतरह उन्होंने अपने ही धुर विरोधी के साथ कदमताल किया है। गठजोड़ बनाना सामान्य बात है लेकिन फिर ट्विटर पर उनका बयान कि उन्होंने ज़हर पिया है, शायद उनके पक्ष में नहीं रहा। नीतीश के उस बयान को नरेन्द्र मोदी ले उड़े, और गया की रैली में तो उन्होंने मज़ाकिया लहजे में पूछा भी कि आखिर इनमें भुजंग प्रसाद कौन है और चंदन कुमार कौन?
जाहिर है, मोदी विकास के अपने उन सपने के वायदों पर कायम हैं जो उन्होंने बिहार की जनता को लोकसभा चुनाव के दौरान दिए थे। वह कहते भी है कि चुनाव की वजह से हम घोषणा नहीं कर सकते। यानी उनके पत्ते अभी खुले नहीं हैं। लेकिन आंकड़ों में सटीक रहने वाले मोदी बीमारू राज्यों में बिहार की गिनती करते हुए यह भूल गए कि पिछले कुछ साल में बिहार की वृद्धि दर बेहद शानदार रही थी। राष्ट्रीय औसत से काफी बेहतर। लेकिन भावनात्मक मुद्दे उछालने का जो आरोप कभी बीजेपी पर लगता था, वह इस बार जेडी-यू पर लग रहा है।
मोदी ने कहा था लोकतंत्र नीतीश के डीएनए में नहीं है। नीतीश ने उसमें से सिर्फ डीएनए को उठाया। अब वह इस मसले को दलितो-महादलितों को कैसे समझाएंगे? शायद इस तरह कि, केन्द्र से आकर एक प्रधानमंत्री ने बिहारियों को गाली दी है।
लेकिन, नीतीश को पता होगा ही कि बिहारियों को गाली सुनने की आदत है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता में मजूरी कर रहे बिहारियों का अपमान होता रहा है, और 2005 से जब से नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री रहे, उन्होंने बिहार की अस्मिता का सवाल कभी नहीं उठाया था। शक तो जाहिर है होगा ही।
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