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Wednesday, April 16, 2025

व्यंग्यः ट्रेन में एटीएम, बिहार के चुनाव के लिए मास्टर स्ट्रोक


खबर है कि ट्रेनों में अब एटीएम लगा करेगा. पंचवटी एक्सप्रेस में शायद लग भी गया है. यह अच्छा है. सरकार सबका भला चाहती है, ट्रेन लुटेरों का भी.

पहले लुटेरे लोग कट्टा-चाकू दिखाकर घड़ी-चेन-बटुआ निकालते थे. मोबाइल छीनते थे. गहना-गुरिया तो अब ज्यादा लोग पहनते नहीं. और बाकी का माल सेकेंडहैंड जवानी की तरह कौड़ी के दाम बिकती थी. तो सरकार ने लूट के काम को बूस्ट करने के वास्ते ट्रेन में एटीएम लगाने का काम किया है. अब लुटेरे प्रो-लेवल पर आएंगे. मुसाफिरों को भी कष्ट नहीं होगा.


ट्रेन में एटीएमः AI इमेज



लुटेरे आए, आपको कट्टा या चाकू जो भी उनके पास उपलब्ध हो दिखाया, आपको उठाकर ले गए दरवाजें के पास लगे एटीएम के पास. फिर बैलेंस चेक करवा कर दूसरी बार में सारा माल-मत्ता निकलवा लिया. यह सब आसानी से कर लेंगे.

इससे मुसाफिर भी खुश रहेंगे कि भारतीय रेल में सफर करते हुए पहले जब लुटते थे--और लुटते तो थे ही काहे कि सुरक्षा की स्थिति तो आप जानते ही हैं--तो कुछ न मिलने की सूरत में डाकू लोग चाकू-वाकू मार देते थे. अब चाकू तो नहीं मारेंगे कम से कम.

आप में से कोई शक्की यह कह देगा कि भाई सारी ट्रेनें तो नहीं लूट ली जातीं है. अरे भाई, सुरक्षा के मद्देनजर संभावनाएं तो हर ट्रेन में हैं कि जब चाहे तब लूटी जा सकती हैं. लेकिन वह तो लुटेरों का अभी वर्क फोर्स कम है--कुछ लोग असल में राजनीति में चले गए हैं, कुछ पत्रकार बन गए हैं--और कुछ तो उनकी भलमनसाहत है. दूसरी, मूड का मसला है कि जाओ जी, इस ट्रेन को नहीं लूटेंगे.

बिहार जाने वाले यात्रियों से अनुरोध है भैय्ये जरा धेयान से, सूबे में इलेक्शन आने वाला है. इलेक्शन के टाइम में उधर ट्रेने बहुत लूटी जाती हैं. लूटी नहीं जाएंगी तो क्या लोग घर के खर्चे से इलेक्शन लड़ेंगे? घर फूंक कर तमाशा देखने कह रहे हैं आप लोग! जनसेवा क्या घर की बचत से होगी? तो चुनावी खर्चे के लिए ट्रेन नहीं लूटी जाएगी तो क्या डाकू घर-घर जाकर वोट और नोट दोनों छीनें! हां नीं तो!

यह तो सरकार ने अच्छा किया है कि ट्रेनों में एटीएम लगवा दिया. चुनाव को सपोर्ट करने का यह अच्छा सिस्टम है. सरकार चुनावी लोकतंत्र को मजबूत करना चाहती है. सरकार का पूरा भरोसा है कि सिर्फ मछली पकड़ना सिखाना ही किसी को सपोर्ट करना नहीं होता, कई दफे उसकी झोरी में पांच किलो का रोहू सीधे-सीधे भी डाल दिया जाना चाहिए.

#ठर्राविदठाकुर

Wednesday, February 12, 2025

वैलेंटाइन पखवाड़ाः हग डे पर पाखाने वाली पोस्ट

जिनको शीर्षक गंदा लग रहा हो, आगे न पढ़ें. पर क्या करें, नामी-गिरामी, कमाई, सुपरस्टार यूट्यूबर अपने-अपने चैनलों पर रोज हग दे रहे हैं, आई मीन हग डे मना रहे हैं. रैना के नाम पर मैं सिर्फ सुरेश रैना, एम के रैना जैसे काबिल लोगों को जानता था. समय रैना ने उस प्रतिष्ठा पर बट्टा लगा दिया.

यह देश अभिव्यक्ति की आजादी, माफ कीजिएगा 'स्वच्छंदता' वाला देश है जो ‘कुछ भी बक दो साणू की’ के सिद्धांत पर चलता है. पर क्यों न चले. देश में सबको छूट है. होनी भी चाहिए.

असल में किसी ने कहा है, “ए लॉट ऑफ पीपल बिकम अनएट्रैक्टिव वन्स यू फाइंड आउट व्हॉट दे थिंक.” सोच का पता चलते ही बहुत सारे लोग अनाकर्षक लगने लगते हैं. मेरी इस फेहरिस्त में बहुत सारे नेता-अभिनेता पहले से थे, अब हजारों यूट्यूबर और सोशल मीडिया सेलिब्रिटी हैं. मुझे सोशल मीडिया पर पोस्ट्स पढ़ने और अलग किस्म की शख्सियत बनाने के मारे बहुत सारे लोग अनाकर्षक और भद्दे लगने लगे हैं. जाहिर है, वह निजी रूप से टन टना टन होंगे पर सोशल मीडिया पर उनकी प्रोफाइल किसी न किसी पेशेवर दवाब में होगी. खैर. बात हगने आई मीन हग डे की हो रही थी.

यार इतनी अंट-शंट बातों में दिमाग फिर गया है कि गू (आई मीन पाखाना) की बात रह जा रही है. असल में सोशल मीडिया पर समय रैना और रणबीर इलाहाबादिया ने ऐसा ‘चिरक’ दिया है कि उसको समेटना मुश्किल हो रहा है. केस-पेस, संसदीय समिति आदि की बातें उठ रही है.

मैं इस बात से सहमत हूं कि सोशल मीडिया कंटेंट का नियमन करने की सख्त जरूरत है और बेशक इससे ‘कोलैटरल डैमेज’ होगा पर अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा वहीं तक है जहां तक किसी और की निजता की सरहद न हो.

इलाहाबादिया से याद आया कि इलाहाबाद आई मीन प्रयागराज में महाकुंभ पर लोग अपनी गोटी लाल करने में लगे हैं. कोई कह रहा है इससे गरीबी दूर नहीं होगी. ठीक है, दूर नहीं होगी. तो आप बताइए कि कैसे दूर होगी? और जब आपको तरीका पता था तो अब तक दूर क्यों नहीं की?

खैर, जब चंद्रयान-2 लॉन्च होने वाला था तो मेरे एक मित्र ने (नाम लेना समुचित नहीं) इसरो के चेयरमैन की तिरुपति मंदिर जाने की तस्वीर पोस्ट की थी. साथ में उनकी टिप्पणी का मूल भाव था कि एक वैज्ञानिक मंदिर कैसे जा सकता है!

असल में, कथित उदारवादियों को किसी वैज्ञानिक के मंदिर (या मस्जिद, दरगाह आदि) जाने पर बहुत हैरत होती है. वहां उनके लिए 'चॉइस' का विकल्प सीमित हो जाता है. स्थिति यह है कि वाम विचारक इस बात पर हमेशा हैरत जताते हैं कि एक वैज्ञानिक या डॉक्टर या इंजीनियर, एक ही विषय के बारे में वैज्ञानिक नजरिए के साथ ‘धार्मिक’ भी कैसे हो सकता है!

असल में, हमें यह सिखाया जाता है कि वैज्ञानिक होने का मतलब उद्देश्यपरक होना है. यह उद्देश्यपरकता लोगों को खालिस वस्तुनिष्ठ बनाती है यानी दुनिया को एक मानव के रूप में या मनुष्यता के तौर पर नहीं देखने का गुण विकसित करना ही नहीं, बल्कि खुद को एक अवैयक्तिक पर्यवेक्षक के रूप में तैयार करना भी.

वैसे, ज्यादातर मामलों में यह हैरत सिर्फ मंदिर जाने पर जताई जाती है. पर मुझे नहीं लगता कि विज्ञान के मामले में धर्म के अस्तित्व से डरना चाहिए. धर्म की अपनी स्थिति और अवस्थिति है, विज्ञान की अपनी. वैज्ञानिक सोच को अपनाना है तो आपको जीवन में उसे हर क्षेत्र में अपनाना होगा. विज्ञान इस मामले में निर्दयी होने की हद तक ईमानदार है.

पर, विज्ञान की आड़ में धर्म पर फर्जी एतराज जताने वाले लोग न तो वैज्ञानिक सोच वाले हैं और न ही, उनको विज्ञान में कोई आस्था है.

मुद्दे पर वापस आइए, एक बात पर आपने गौर किया है? हग डे के बाद किस डे आता है!

मेरे एक दोस्त हैं जो शराबनोशी से पहले फारिग होकर आते हैं. मतलब फ्रेश होने जाते हैं और वैज्ञानिक भाषा में कहें तो पाखाना करके पेट साफ करके आते हैं ताकि पीते समय शर-आब यानी पानी की चिनगारी के सिवा कोई और चिनगारी महसूस न हो.

वैलेंटाइन पखवाड़े में किस क्लाइमेक्स वाले हिस्से से ऐन पहले की बात है. मतलब सिनेमा की भाषा में सत्रहवां रील. (अगर फिल्म अठारह रील की मान ली जाए). तो किस के नशे से पहले हग लेना (आलिंगन मरदे, आलिंगन.) बहुत आवश्यक कर्मकांड है.

किस, जिसे आप अपनी सौंदर्यदृष्टि के मुताबिक चुंबन, पुच्ची, चुम्मा आदि नामों से अभिहीत कर सकते हैं. इसमें जब तक सामने वाले को पायरिया न हो, बू नहीं आती. लेकिन पाखाने की बू आप क्या खाते हैं उस पर निर्भर करती है. वैसे यह निजी काम शुचिता से जुड़ा है पर इस विचार में कई पेच हैं. पर यह शरीर का ऐसा धर्म है जिसका इशारा भी सभ्य समाज में अटपटा माना जाता है. राजा हो या भिखारी, कपड़े खोलकर कोई इंसान जब मलत्याग करने बैठता है तो सभ्यता और सांस्कृतिक विकास की धारणाएं फीकी पड़ जाती हैं.

कम से कम हिंदी में ‘मलत्याग’ के दैनिक कर्म के लिए सीधे शब्द नहीं है. ‘पाखाना’ फारसी से आया है, जिसका अर्थ होता है ‘पैर का घर’. ‘टट्टी’ आमफहम हिंदी शब्द है जिसका मतलब है कोई ‘पर्दा या आड़’ जो फसल की ठूंठ आदि से बना हो. खुले में शौच जाने को ‘दिशा-मैदान’ जाना कहते हैं. कुछ लोग ‘फरागत’ भी कहते हैं जो ‘फारिग’ होने से बना है. ‘आब’ को ‘पेश’ करने से बना ‘पेशाब’ तो फिर भी सीधा है पर ‘लघु शंका’ और ‘दीर्घ शंका’ जैसे शब्द अर्थ कम बताते हैं, संदेह अधिक पैदा करते हैं.

मलत्याग के लिए ‘हगना’ और ‘चिरकना’ जैसे शब्द भी हैं, मूलतः ये क्रिया रूप हैं और इनका उपयोग पढ़े-लिखे समाज में करना बुरा माना जाता है. इस हगने के साथ मैंने हग डे पर वर्ड प्ले किया है मितरों. जाहिर है आप अब तक मुझे सौ गालियां दे चुके होंगे क्योंकि इन शब्दों के साथ घृणा जुड़ी हुई है.

बहरहाल, सोचिएगा इस बात पर कि जिन सरकारी अफसरों और संभ्रांत लोगों को गरीबों की दूसरी समस्याओं से ज्यादा मतलब नहीं होता वे उनके शौचालय बनाने की इतनी चिंता क्यों करते हैं. क्या खुले में शौच जाना रुक जाए तो समाज स्वच्छ हो जाएगा?

सोशल मीडिया पर कुछ ‘छंटे हुए बुद्धिजीवी’ अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर वाचिक पाखाने को छूट देना चाहते हैं. खुलेआम चुम्माचाटी को प्रेम का प्रतीक बताते हुए लोग कह रहे हैं कि 'किस' निजी चीज है. बिल्कुल. हम भी तो वही कह रहे हैं. किस निजी चीज है तो हगना भी निजी है. चुंबन के साथ-साथ सार्वजनिक स्थलों पर हगने की भी छूट क्रांतिकारियों को दी जाए. (अगेन हगना शब्द पढ़े-लिखों को बुरा लग सकता है आप उस हर जगह पर मलत्याग पढ़ें जहां मैंने हगना लिखा है)

वैसे, पाखाने से जुड़ी एक और बात. आपको याद होगा कि चांद पर अपोलो 11 को गए 50 साल हो गए हैं. नील आर्मस्ट्रांग के कदमों के निशान तो अब भी चांद पर हैं जिसमें कोई परिवर्तन नहीं आया होगा. काहे कि चांद पर न तो हवा है न अंधड़-बरसात.

लेकिन इस पदचिन्ह से भी बड़ी (और बदबूदार) निशानियां इंसान चांद पर छोड़ आया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इंसानों ने छह अपोलो मिशनों से पाखानों से भरे 96 बैग चांद की राह (ऑर्बिट) में फेंके हैं और इनमें से कुछ चांद पर भी पड़े हैं. तो अंतरिक्ष में, इंसान की गैरमौजूदगी में भी उसकी निशानियां (पता नहीं अब किस रंग की होंगी, और बदबू तो खैर हवा ने होने से फैलती भी नहीं होगी, पर गू तो गू है भई.) उसके आने की गवाही चीख-चीखकर दे रही हैं.

चांद पर इब्न-ए-सफ़ी का लिखा सुंदर-सा शेर याद आ रहा है

चाँद का हुस्न भी ज़मीन से है
चाँद पर चाँदनी नहीं होती

इस शेर में आप चाहें तो ‘हुस्न’ लफ्ज को ‘पाखाने’ या ‘गू’ से बदलकर पढ़ सकते हैं और तब जाकर आपको मेरे लेख का ऊपर वाली बात शायराना अंदाज में समझ में आएगी.

Thursday, May 3, 2018

महाभारत का युद्ध असल में स्पैक्ट्रम हासिल करने की लड़ाई थी!

ठर्रा विद ठाकुर

गुड्डू भैया को आज अलग धज में देखकर मैं चौंक गया. क्या भैया, आज यह पूरे माथे पर त्रिपुंड और यह रामनामी चादर...क्या हो गया है आपको? और इस कमंडली में क्या है?

गुड्डू ने कमंडली में झांका और मुस्कुराते हुए कहाः कमंडली में तो वही है जो होना चाहिए. पूरे अद्धे में गंगाजल मिलाकर शुद्धोदक बना लिया है.

यह परिवर्तन कैसे भैया...

अरे, देख नहीं रहे हो. वामपंथ के पंथ पर चलने वाले राज्य त्रिपुरा के दक्षिणपंथी मुख्यमंत्री ने क्या कहा सुना तुमने? बिप्लव देब का बयान एक दम विप्लवी है. कह रहे हैं कि महाभारत काल में भी इंटरनेट था. उन्होंने कहा कि देश में महाभारत युग में भी तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध थीं, जिनमें इंटरनेट और सैटेलाइट भी शामिल थे. यह वह देश है, जिसमें महाभारत के दौरान संजय ने हस्तिनापुर में बैठकर धृतराष्ट्र को बताया था कि कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध में क्या हो रहा है. संजय इतनी दूर रहकर आंख से कैसे देख सकते हैं, सो, इसका मतलब है कि उस समय भी तकनीक, इंटरनेट और सैटेलाइट था.

सच क्या? मैं हैरत में पड़ गया. तो फिर उसके केबल किधर डले थे? मैंने सहज जिज्ञासा में मजाक कर दिया. गुड्डू भैया बोल पड़े, केबल वगैरह नहीं भी हो सकते हैं. लेकिन मेरी जिज्ञासा इस बात में अधिक है कि कौन कंपनी उस वक्त फ्री डेटा मुहैया करा रही थीं? सेवा 4जी थी या 3जी. स्पैक्ट्रम बंटवारे का ही झंझट कौरवों-पांडवों में था या कुछ और भी. नेट की स्पीड कैसे मापते थे?

गुड्डू भैया रुके नहीं. सुनो तो सही. बयानवीर ने और भी बहुत कुछ कहा है. बिप्लब के मुताबिक, डायना हेडन इंडियन ब्यूटी नहीं हैं. डायना हेडन की जीत फिक्स थी. उन्होंने कहा कि डायना हेडन भारतीय महिलाओं की सुंदरता की नुमाइंदगी नहीं करतीं. ऐश्वर्या राय करती हैं.

मैंने गुड्डू को रोकाः भैया, उन्होंने तो अपने बय़ान पर खेद जताया है बाद में.

लेकिन ठाकुर, वह रुके कहां हैं. बेरोजगारों को दी पान की दुकान खोलने और गाय पालने की नसीहत दे डाली और बाद में कहा कि

मैकेनिकल नहीं सिविल इंजीनियर्स दें सिविल सर्विसेज की परीक्षा बाकियों को समाज निर्माण में लगना चाहिए.

मुझसे रहा नहीं गया, भैया ये भाजपा के नेता अक्सर अपने बयान और अजीबो-गरीब वैज्ञानिक तर्कों को लेकर विवादों में रहते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कई मंत्री सार्वजनिक मंचों पर ऐसी बातें कह चुके हैं कि जिनके कारण उनको हंसी का पात्र बनना पड़ा है.

मुझे हंसी तो आ रही थी कि लेकिन क्या पता ऐसा ही हुआ हो. आखिर मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठे नेता को तरी-घटी का ज्यादा पता होगा न किसी आम आदमी की तुलना में?

गुड्डू के माथे से पसीना बह निकला और उनके त्रिपुंड का कुछ हिस्सा धुल सा गया, हथेली से उसे पोंछते हुए बोले, ये तो सिर्फ सीएम हैं. पीएम की मानो तो जलवायु परिवर्तन कुछ नहीं होता है. बढती उम्र के कारण लगती है ठंड. और यह बात नरेंद्र मोदी जी ने 5 सितंबर, 2014 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए देश भर के स्कूली बच्चों से सवाल-जवाब सत्र में कहा था. असम के एक छात्र ने पर्यावरण में आ रहे बदलावों को लेकर अपनी चिंता जाहिर की और प्रधानंत्री से पूछा कि उनकी सरकार इसे रोकने के लिए क्या कदम उठा रही है. इस पर मोदी ने कहा कि हमारे बुजुर्ग हमेशा यह शिकायत करते हैं कि इस बार पिछले साल से अधिक ठंड है. असल में यह उनकी बढ़ती उम्र और सहने की कम होती शक्ति की वजह से उन्हें ज्यादा ठंड महसूस होती है.

इतना ही नहीं 2014 में एक निजी अस्पताल का उद्घाटन करते हुए तुम्हारे लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि, 'विश्व को प्लास्टिक सर्जरी का कौशल भारत की देन है. दुनिया में सबसे पहले गणेश जी की प्लास्टिक सर्जरी हुई थी, जब उनके सिर की जगह हाथी का सिर लगा दिया गया था.

गुड्डू भैया अभी चुप होने के मूड में नहीं थे.

तुम्हारे मंत्रियों ने तो चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत तक को गलत साबित कर दिया. वह भी ऐसे मंत्री ने जो पहले आईपीएस अधिकारी रह चुके हैं. केंद्र में मंत्री सत्यपाल सिंह एक कार्यक्रम के दौरान यह दावा करते नजर आए थे कि मानव के क्रमिक विकास का चार्ल्स डार्विन का सिद्धांत ‘वैज्ञानिक रूप से गलत है’ और स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम में इसे बदलने की जरूरत है.

बाप रे, मेरे मुंह से निकल ही गया.

गुड्डू भैया ने कमंडल से शुद्धोदक का लंबा घूंट भरा और कहाः आगे सुनो. राजस्थान के शिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी ने न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत पर ही दावा जता दिया था. उन्होंने कहा था कि, 'हम सब ने पढ़ा है कि गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत न्यूटन ने दिया था, लेकिन गहराई में जानने पर पता चलेगा कि गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत न्यूटन से एक हजार वर्ष पूर्व ब्रह्मगुप्त द्वितीय ने दिया था.

बेचारे स्टीफन हॉकिंग कुछ दिन पहले गुजर गए. लेकिन भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने दावा किया था कि महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग भारतीय वेदों को अल्बर्ट आइंस्टाइन की महान थिअरी और सिद्धांत E=mc2 से काफी बेहतर मानते थे. हालांकि, जब हर्षवर्धन से इस दावे का प्रमाण मांगा गया, तो उन्होंने कहा, 'आप लोग सोर्स ढूंढें. इस बात का रेकॉर्ड है कि स्टीफन ने कहा था कि वेदों में इंस्टाइन के दिए फॉर्म्युले से बेहतर फॉर्म्युला है.

मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह ने आइआइटी के छात्रों को कहा था कि पुष्पक विमान से ही दुनिया में विमान बनाने का आइडिया आया. उन्होंने कहा कि 'राइट ब्रदर्स' से पहले ही एक भारतीय शिवकर बाबुजी तलपड़े ने एयरप्लेन का आविष्कार कर दिया था. कहा जाता है कि तलपड़े ने वैदिक ग्रंथों से ही उन्हें सबसे पहले एअरक्राफ्ट का आइडिया दिया था. दावा किया जाता है कि तलपड़े ने साल 1895 में मुंबई के जुहू बीच पर भीड़ के सामने इसका प्रदर्शन भी किया था. वहां बड़ौदा के राजा भी मौजूद थे. एयरक्राफ्ट 1500 फीट की ऊंचाई पर गया था और वहां कुछ मिनट रुका.

गुड्डू भैया, आप मजाक में कुछ कह दें, लेकिन सीधे-सीधे खारिज तो मत कीजिए भारतीय ज्ञान-विज्ञान को. प्राचीन भारत का साहित्य बेहद विपुल और विविधतासंपन्न है. हमारी विरासत में धर्म, दर्शन, भाषा, व्याकरण के साथ ही गणित, ज्योतिष, आयुर्वेद, रसायन, धातुकर्म, सैन्य विज्ञान जैसे विषयों का भी उल्लेख है. मिसाल के तौर पर, वैदिक साहित्य शून्य के कांसेप्ट, बीजगणित की तकनीकों तथा कलन-पद्धति, वर्गमूल, घनमूल के कांसेप्ट से भरा हुआ है. ऋग्वेद (2000 ईसापूर्व) में खगोलविज्ञान का उल्लेख है. 600 ईसापूर्व के भारतीय दार्शनिक कणाद ने परमाणु एवं आपेक्षिकता के सिद्धान्त का स्पष्ट उल्लेख किया है. इत्र का आसवन, गन्दकयुक्त द्रव, वर्ण और रंजकों (डाई और पिगमेंट्स) का निर्माण, शर्करा का निर्माण हमारी विरासत में रहा है. 800 ईसापूर्व में भारत में सुश्रुत और चरक ने आयुर्विज्ञान एवं शल्यकर्म पर पूरा ग्रंथ लिखा है.

सामवेद में सुरों का पूरा उल्लेख है. यानी वैदिक काल में ही ध्वनि और ध्वनिकी का सूक्ष्म अध्ययन शुरू हो चुका था. ग्रीक इतिहासकारों ने भारत में चौथी शताब्दी ईसापूर्व में ही धातुओं की स्मेल्टिंग का जिक्र किया है. हम लोहा बनाते थे भैया.

मुएनजोदड़ो एवं हड़प्पा से प्राप्त नगरीय सभयता उस समय में उन्नत सिविल इंजीनियरी एवं आर्किटेक्चर के अस्तित्व को प्रमाणित करती है. मैंने अपनी बात पूरी की तो गुड्डू मेरी तरफ मुस्कुराते हुए देख रहे थे.

अच्छा हुआ जो तुमने परमाणु विज्ञान का जिक्र करते हुए एटम बम और ब्रह्मास्त्र को हाइड्रोजन बम नहीं बताया. पुष्पक विमान को हेलीकॉप्टर न बता दिया. तर्क वाली बात करोगे तो दुनिया सहमत होगी, लेकिन उन्हीं ज्ञान-विज्ञान की चीजों को धर्म से जोड़कर मूर्खतापूर्ण बयान दोगे तो सोशल मीडिया पर खिंचाई होगी ही.

मैं हैरत से गुड्डू का बात सुन रहा था. गुड्डू कुछ पलों के लिए रुके और बोले, देखो बे पत्रकार, ज्ञान की चार अवस्थाओं में से तीसरा और चौथा बड़ा खतरनाक होता है. तीसरा है, आप नहीं जानते हैं कि आप क्या जानते हैं और चौथा होता है आप नहीं जानते हैं कि आप क्या जानते हैं.

ददा, मैं प्रणाम की मुद्रा में झुककर बोलाः जाते-जाते जरा ज्ञान की पहली और दूसरी अवस्थाएं भी उचारिए.

गुड्डू मुस्कुरा उठेः शाम को चखने के साथ हवेली पर पधारो. रही बात बिल्लवी मुख्यमंत्री की, तो सुना है इस बयानवीर को दिल्ली से बुलावा आया है. पीएम से मिलकर शायद उनके बयान कम हो जाएं या कम से कम अनाप-शनाप तो न आएं. वह खीसें निपोरते हुए चल दिए और जाते-जाते मुनीश्वरलाल चिंतामणि की कविता गुनगुनाते गएः

मेरे भाई भोलेराम, तुम मूर्ख बने रहना,

कल्याण इसी में है तुम्हारा.

सच मानो बड़ी मस्ती है मूर्खता में,

कुछ रखा नहीं है विद्वता में.



***

Wednesday, January 10, 2018

जेल में भी चल रहा है लालू का 'हथुआ राज'

#ठर्राविदठाकुर
(मेरा यह लेख आइचौक.इन में प्रकाशित हो चुका है)

ठंड में सिकुड़ता हुआ मैं अंग्रेजी के आठ की तरह हुआ जा रहा था. फिजां में धूप थी लेकिन देश की व्यवस्था की तरह होते हुए भी नहीं थी. बिलकुल नाकाफी किस्म की धूप. देश की पुलिस की तरह बेअसर.

मैंने देखा, गुड्डू भैया झूमते हुए अपनी देह में सरसों का तेल मल रहे हैं. उनकी तेल पिलाई लाठी बगल में रखी है. मैं भौंचक्का रह गयाः "क्या भिया, इस ठंड में मारपीट की तैयारी?"

"करना नहीं है, सिर्फ दिखाना है. वह भी हम नहीं करेंगे हमारे दोनों नौकर लडेंगे. "

मेरे हैरत की सीमा न रही, "काहे भिया."

गुड्डू मुस्कुराएः "पत्रकार महोदय, फ्रेंडली फाइट का नाम सुना है? चुनाव में होता है. "

मैंने हामी भरी तो गुड्डू ने कहा, कि पड़ोसी के मटर के खेत में उनकी भैंस घुस गई थी. तो अब इसके एवज़ में उनके जेल जाना पड़ रहा है.

मैं समझ गया कि गुड्डू निरे काहिल हैं और उनके जेल प्रवास के दौरान सुविधाओं के लिए अपने सेवकों की जरूरत होगा.

मैंने बस इतना पूछाः "य़ह आइडिया कहां से आया भैय्या? "

गुड्डू लंगोट कसकर योगमुद्रा में विराजमान हो चुके थेः "देखो बे ठाकुर, इस देश में आइडियों की कमी नहीं है. चुराने से लेकर उस चोरी को लॉजिक देने तक. पहले अपराध करो, फिर पकड़े जाओ तो कहो कि मैं अमुक जाति से हूं इसलिए फंसाया जा रहा है. फिर भी सज़ा-वज़ा मिल जाए, तो सेवकों को ले जाओ. यह मैंने अपने नेताओं से सीखा है. एक तर्क यह भी है कि आप दोषी साबित होने पर और दूसरे के छूट जाने पर तर्क दे सकते हैं कि पंडिज्जी को बेल हमको जेल...जैसा लालूजी ने किया. "

"लेकिन वह तो कह रहे हैं कि उनको पिछड़ी जाति का होने की वजह से परेशान किया जा रहा है"...मैंने कहा.

"लेकिन, जब सूबे के मुख्यमंत्री बने तब तो यह तर्क न दिया, जब रेल मंत्री बने और काम की तारीफ बटोरी तब तो यह तर्क न दिया"...गुड्डू खिसियाए से लग रहे थे.

"लेकिन सज़ा सुनाने वाले जज को क्या यह कहना चाहिए था कि ठंड लगती है तो तबला बजाइए! " मैंने पीछे हटना ठीक नहीं समझा.

"आपसी बातचीत को मीडिया में उछालना और उसको मुद्दा बनाना तुम मीडियावालों का काम है. किसने किसको कहां चुम्मा ले लिया, किस खिलाड़ी ने शादी में कितने खर्च किए, देश में ब्याह किया कि इटला जाकर इस पर विमर्श करो तुम लोग...बलिहारी है बे तुम पे. और अब जज साहब ने कह दिया कि लालूजी पशुपालन के एक्सपर्ट हैं तो उसको भी मुद्दा बना लो. अदालत जिसको सज़ा दे उसको शहीद बनाने के काम में लग गए हो. और तो और, जब जेल प्रशासन अभी तक सजायाफ्ता लालू के लिए काम तय नहीं कर पाया है. वहीं उनके जेल पहुंचने से दो घंटे पहले ही उनका रसोइया लक्ष्मण कुमार और सेवक मदन फर्जी केस के जरिए जेल पहुंच गए. अब इसका क्या अर्थ है? पता है, जेल जाने के लिए इन दोनों की ही चुना गया क्योंकि दोनों रांची के ही रहने वाले हैं और लालू के खास विश्वासपात्र हैं. मालिक से पहले सेवक के जेल जाने का यह मसला भी पहली बार नहीं हुआ. पहले भी होटवार जेल में बंद लालू के लिए मदन जेल पहुंच गया था. "

"इस बार तो क्या गजब का आइडिया चुना इन लोगों ने. दोनों ने मारपीट का एक फर्जी मामला गढ़ा. मदन ने पड़ोसी सुमित कुमार को इसके लिए तैयार किया. उसने लक्ष्मण पर मारपीट करके 10 हजार रु. लूटने का आरोप लगाते हुए डोरंडा थाने में शिकायत दर्ज कराई. फटाफट एफआइआर दर्ज हुआ, वकील ने दोनों का आत्मसमर्पण करवाया और जेल भी भेज दिए गए. भाई, जैसे जेल लालूजी गए वैसे सब जाएं. बुढ़ापे का तर्क देते हुए ओपन जेल में रहे, रसोइए से खाना बनवाएं, सारी सुविधाएं भोगे. ऐसा क्यों नही करते कि उनको जेल जाने से माफी ही दे दो. उनकी नेकचलनी के नाम पर! "

"गुड्डू भैया गुस्सा क्यों हो रहे हैं, आखिर वह जनता के सेवक हैं. "

"जनता का सेवक जब राजनीतिक बंदी होता है तब उसे ऐसा सुविधाएं दी जानी चाहिए, आपराधिक कृत्य के लिए नहीं. वित्तीय घोटाला कब से राजनीतिक मसला हो गया जी? "

"देखो बाबू, इस देश में किसी ने आम लोगों को कभी कैटल, कभी मैंगो पीपल कहा था, तब तो बहुत मिर्ची लगी थी तुम्हें. जरा बताओ कि जेल में ठंड क्या सिर्फ चारा घोटाले में सजायाफ्ता पूर्व-मुख्यमंत्री को ही लगती है या दूसरे कैदियों को भी ठंड लगती होगी? जब ठंड सबको लगती है तो सबको बजाने के लिए तबला क्यों नहीं मुहैया कराती सरकार? "

गुड्डू अब रंग में आ चुके थे. मेरे पास खिसक आए और लबनी से ताड़ी का बड़ा घूंट लगाते हुए बोलेः "देखो ठाकुर, आम आदमी हो तो औकात में रहा करो. कभी पुलिस और अदालत में चक्कर में पड़ोगे तब समझ में आएगा. समझे! लालूजी पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तभी अपनी मां को पद के बारे में समझाते हुए कह चुके हैं कि, माई हथुआ राज मिल गईल (मां, हथुआ राज मिल गया) तो समझो कि वह असल में राजा ही हैं. उनकी सुविधा का ख्याल रखना हम सबका परम-पावन और पुनीत कर्तव्य है. जब जेल में शशिकला, शहाबुद्दीन, कनिमोई, ए राजा सबको सुविधा मिल सकती है तो क्या सिर्फ लालू को न मिले क्योंकि वह पिछडी जाति से हैं! धिक्कार है बे तुम पे, धिक्कार है. "

गुड्डू भैया ने मुझ पर धिक्कारों की बौछार कर दी और सारे धिक्कार समेटता हुआ मैं चुपचाप अपनी राह चल दिया.

***

Thursday, September 14, 2017

ठर्रा विद ठाकुरः जलते हैं दुश्मन तो खिलते हैं फूल

गुड्डू भैया अपने दालान में लकड़ी की कुरसी पर उकडूं बैठे हुए थे. मेरे वहां जाते ही
चिल्लाएः ओ ठाकुर ब्रो, कम एंड हैव टी विद मी.
मैं चकरा गयाः भिया आज चौदह सितंबर है. हिंदी दिवस है आज अंग्रेजी क्यों छांट रहे हैं?गुड्डू मुस्कुरा उठे. बोले,
30 के फूल 80 की माला,
बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला
अरे, भैया हिंदी को बचाने वाले दिन आप क्या सड़कछाप शायरी कर रहे हैं. यह तो ट्रक और ऑटो वगैरह पर लिखा होता है. आपको तो पंत-निराला-प्रसाद-बच्चन जैसो की बात करनी चाहिए. इनकी वजह से हिंदी बची हुई है.
गुड्डू ने गिलास में मौजूद सोमरस का लंबा घूंट भरा और कहाः हिंदी कौन सी मर रही है बे? बाजार में कामयाब होगी तो हिंदी बची रहेगी. तुम सेमिनार करके हिंदी नहीं बचा पाओगे. अगर हिंदी का सिनेमा चल रहा है, तो हिंदी बची हुई है. अगर ट्रक, बसों और ऑटो के पीछे हिंदी में कविताएं लिखी जा रही हैं तो समझो आम आदमी की हिंदी वही है. बाकी तुम जो कर रहे हो वह हिंदी की चिंदी है.
क्या बात कर रहे हैं आप, इन गाड़ियों पर लिखे की आप उच्चस्तरीय साहित्य से तुलना कर रहे हैं?उन्होंने तपाक से जवाब दिया: क्यों न करें? सड़क पर लिखी हर इबारत का अपना समाजशास्त्र होता है. देश में इतनी भीड़ है तो लिखाः
जय शिव शंकर, भीड़ ज़रा कम कर
देश में इतनी नफरत है कि गाड़ियों के पीछे लिखना पड़ाः
देखो मगर प्यार से
मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता कि इन गाड़ियों पर लिखे कई जुमले बड़े पुराने और घिसे-पिटे हो चुके हैं. लेकिन तुम ड्राइवरों और कंडक्टरों में छिपे उस शायर के आगे क्यों सजदा नहीं करना चाहते जो ऐसी चीजों को चुनने की और उन्हें गाड़ी पर लिखवाने की नजर रखता है. तुम उनके अनगढ़ मगर सच्चे काव्यबोध से इत्तफाक क्यों नहीं रखते?
नीयत तेरी अच्छी है तो किस्मत तेरी दासी है
कर्म तेरे अच्छे हैं तो घर में मथुरा काशी है
या फिर यह देखो,
फानूस बनकर जीसकी हीफाजत हवा करे
वो शमां क्या बुझे जिसे रौशन खुदा करे
देखो ठाकुर, हिज्जे पर मत जाना पर सड़क के तनाव को कम करने में इन कविताओं का भारी योगदान है. रोड रेज से तपती सड़कों पर ये फुटकर शेर ठंडी छांव का काम करते हैं. हल्की, कच्ची और रूखी तुकबंदी ही सही, लेकिन कविता तो इन लाइनों में होती ही है. ये लोग अपने किस्म के कबीर हैं भाई. कहते तो थे कबीरः जो जो करूं सो पूजा. तो यह जो लिखें, सो कविता….
हमें जमाने से क्या लेना, हमारी गाड़ी ही हमारा वतन होगा
दम तोड़ देंगे स्टियरिंग पर, और तिरपाल ही हमारा कफन होगा…
यह क्या आत्मवंचना और दया नहीं है? क्या यह तुम्हारे साहित्य का के लघु मानव का बयान नहीं है? अनजान और अंदेशों से भरी लंबा यात्राओं में किस तरह ड्राइवर भाई सिर पर कफन बांध लेते हैं, इसका जायजा भी लोः
रात होगी, अंधेरा होगा और नदी का किनारा होगा
हाथ में स्टियरिंग होगा, बस मां का सहारा होगा….
पता नहीं यह पंक्ति जन्म देने वाली मां के लिए है या किसी देवी मां के लिए लेकिन उसके जोखिम कबूल करने का अंदाज तो देखो.चिलचिलाती धूप में जब तपते बोनट की बगल में बैठे ड्राइवरों-हेल्परों को देखो तो पता चलेगा कि सबसे मुश्किल, सबसे खानाबदोश नौकरी इनकी ही होती है. उनकी तकलीफ ‌सिर्फ जिस्मानी ही नहीं होती, उसमें बाल-बच्चों से दूर होने की टीस भी घुली मिली होती है… तुमने भी तो देखा ट्रकों के पीछे बनी तस्वीर में नदी किनारे एक युवती अपने घुटनों में सिर छिपाए बैठी है. साथ में लिखा होता है… घर कब आओगे…और शेर भी हैः
जब परदेस लिखा है किस्मत में
तब याद वतन की क्या करना…
भावनाओं की इस दुनिया में हमें भोगा हुआ यथार्थ और जीवन-दर्शन भी मिलता है, खूब सारी नसीहतें भी. कुल मिलाकर सड़कीय जीवन की सूक्तियां और सुभाषित हैं ये नारे, जिसमें 'स्ट्रीट-स्मार्ट विज़्डम' अर्थात गली-सुलभ बुद्धि है. सुनोः
अपनों से सावधान
दोस्ती पक्की, ख़र्चा अपना-अपना
मांगना है तो ख़ुदा से मांग बंदे से नहीं,
दोस्ती करनी है तो मुझसे कर, धंधे से नहीं.
देते हैं रब, सड़ते हैं सब,
पता नहीं क्यों.
'दुनिया मतलब की' जैसे नारे अगर ज़माने से ठोकर खाए लोगों का चीत्कार है, तो 'अपनों से बचकर रहेंगे, ग़ैरों को देख लेंगे' में एक साथ अपने अस्तित्व का निचोड़ है, तो धमकी भी.
मतलब की है दुनिया कौन किसी का होता है,
धोखा वही देते हैं जिन पर ऐतबार होता है.
नेकी कर जूते खा,
मैंने खाए तू भी खा.
ठाकुर, यह जो ट्रक-साहित्य है न, इसे हल्के में मत लो. इसमें विज़डम है तो मां-बाप जैसी हिदायतें भी. मोहल्लों में, जब ऑटो धीरे चल रहे होते हैं तो बच्चे उसमें लटकने की कोशिश करते हैं. उन्हें वैसे ही डांटा गया है, जैसे हमारे समाज में बच्चों को डांटते हैः
चल हट पीछे!
-लटक मत टपक जाएगा!
-लटक मत पटक दूंगी!
इसका एक झारखंडी संस्करण भी है:
बेटा छूले त गेले
सटले त घटले!
मुझे लगा कि गुड्डू को सही रास्ते पर लाने का यही एक वक्त है. उनसे शराब छुड़वाने वाली शायरियां बुलवा कर. मैंने कहाः भिया, आप शराब छोड़ दीजिए फिर तो, काहे कि गाड़ियों में हर जगह तो इसकी बुराई ही लिखी है.पीकर जो चलाएगा, परलोक को जाएगा
चलाएगा होश में तो ज़िंदगी भर साथ दूंगी,चलाएगा पीकर तो ज़िंदगी जला दूंगी.
बड़ी ख़ूबसूरत हूं नज़र मत लगाना,ज़िंदगी भर साथ दूंगी पीकर मत चलाना.
राम जन्म में दूध मिला, कृष्ण जन्म में घी,
कलयुग में दारू मिली, सोच समझ कर पी.
और भी है,
ऐ दूर के मुसाफ़िर, नशे में चूर गाड़ी मत चलाना।
बच्चे इंतजार में है, पापा वापस ज़रूर आना।।
गुड्डू हंसने लगे. इस ख़राब दुनिया में जो माशूकाएं दिल तोड़ती हैं तो पीसी बरुआ के देवदास से लेकर संजय लीला भंसाली के देवदास और अनुराग कश्यप के देवडी से मुझ जैसे आशिक तक, सहारा सिर्फ इसी मय का है ठाकुर. सुन लो,
शराब नाम ख़राब चीज़ है, जो कलेजे को जला देती है,
उसे बेवफ़ा से तो सही है, जो ग़म को भुला देती है.
ठाकुर तुम ख्वामखा शराब को बदनाम कर रहे हो. एक ट्रक के पीछे लिखा थाः
नशा शराब में होता तो नाचती बोतल.
और,
खुशबू फूल से होती है, चमन का नाम होता है,
निगाहें क़त्ल हैं, हुस्न बदनाम होता है.
बूझे? मैंने समझने का इशारा देते हुए सिर हिलाया. तो गुड्डू भैया बोले, जब तक आम आदमी के पास हिंदी जिंदा है तब तक हिंदी-फिंदी दिवस से कुछ नै होगा. हिंदी जिंदा है और जिंदा रहेगी. और तुम जो हर बात पर शराब की बुराई करते हो, जाओ पंकज उधास की आवाज में मशहूर गज़लें सुनोः जिसके बोल हैः
हुई महंगी बहुत ही शराब कि थोड़ी-थोड़ी पिया करो.
फूंक डाले जिगर को शराब, कि थोड़ी थोड़ी पिया करो...
मैं समझ गया कि गुड्डू भैया काले कंबल है. इन पर कोई रंग न चढ़ेगा. मैं जाने के लिए मुड़ा तो गुड्डू भैया कि आवाज़ आई. अऱे ठाकुर गुस्सा हो कर जा रहे हो, तो एक ट्रक साहित्य का शेर पेश-ए-नजर हैः
चलती है गाड़ी तो उड़ती है धूल
जलते हैं दुश्मन तो खिलते हैं फूल !

Tuesday, September 12, 2017

ठर्रा विद ठाकुरः हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर

पेड़ के नीचे बैठे गुड्डू भईया तकरीबन ध्यान की मुद्रा में थे. मैं गुजर रहा था तो सोचा चुपके से निकल लूं. आखिर गुड्डू भैया अभी ब्लेसिंग स्टेट में होंगे तत्व सेवन के बाद. सुबह-सुबह उठकर ह्विस्की के घूंट भर लेना गुड्डू जी की आदत थी और गुड्डू उसे आचमन कहते.

मेरे कदमों की आवाज सुनकर गुड्डू ने आंखें खोल दीः ठाकुर कहां भगे जा रहे हो, तनिक मैनाक पर विश्राम-सा कर लो. अब भागने की कोई राह न थी, मैं उनके कदमों में कुछ ऐसे बैठ लिया जैसे पुराने जमाने में छात्र गुरुओं के पैरों के पास बैठते थे. ज्ञान हासिल करने के लिए.

गुड्डू भैया अभी प्रकृतिस्थ हो पाते कि मैंने कहाः शिक्षक दिवस की मुबारकवाद हो गुड्डू भिया.

हैप्पी टीचर्स डे. मैं चौंका, अरे भिया आप और अंग्रेजी!

गुड्डू कुछ वैसे ही चौंके जैसे कबूतर की तरफ पत्थर उछालिए तो वह चौंकता हैः अबे ठाकुर, हम तो क्या चीज़ हैं चचा ग़ालिब तक अंग्रेजी के शौकीन थे. उनको तो एक स्कॉच से ऐसी मुहब्बत थी कि पटियाला नरेश के न्योते के बावजूद नहीं गए थे. वह स्कॉच सिर्फ दिल्ली छावनी में मिलती थी.

वह तो ठीक है गुड्डू भिया. आज शिक्षक दिवस के मौके पर भी शराबनोशी!

गुड्डू ने अपनी सींकिया काया को जितना मुमकिन था उतना फुलाकर कहाःल हर शब पिया ही करते हैं मय जिस कदर मिले...चचा ग़ालिब का ही कहा हुआ है. और तुम यह न दिवस वगैरह मना करके कैलेंडर मत बन जाओ. देखो यूं समझो कि जिस आदमी के लिए कुछ नहीं कर सकते उसका डे मना लो... सुनो कि एक दीवाने लेखक मंटो ने क्या लिखा है दुनिया में बड़े-बड़े सुधारक हुए हैं। उनकी शानदार शिक्षाएं भी रही हैं। शिक्षाएं वक्त के साथ घिस-मिट जाती हैं, खो जाती है। रह जाती हैं तो सलीबें, धागे, यज्ञोपवीत, दाढ़ियां, बग़लों के बाल...

लेकिन गुरुओं के योगदान को भुला सकता है कोई जीवन में?

क्यों भुलाएगा भाई? तुम्हारे जीवन में कोई ऐसा शिक्षक नहीं रहा जिसने तुमसे 27 का पहाड़ा न पूछा हो? खैर, जानना चाहते हो तो जानो कि शिक्षा का अधिकार कानून देशभर में अब तक नौ फीसदी से भी कम स्कूलों में लागू हो पाया है. यह कानून कहता है कि आठवीं तक तो सभी बच्चों को शिक्षा जरूरी तौर पर मुहैया कराई जाए. लेकिन यह तब होगा जब गांव-गांव स्कूल खुले, शिक्षकों की समस्याओं का समाधान हो, और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाया जाए.

देखो, देशभर में करीब 50 फीसदी शिक्षक संविदा आधारित हैं...संविदा नहीं समझते? ठेके पर काम करने वाले शिक्षक. चिंदी भर की तनख्वाह मिलती है, पिर क्या पढ़ाएगा वह? शुक्राचार्य, वृहस्पति और द्रोण को ठेके पर रखकर देखते तो कभी न दानव स्वर्ग जीत पाते, न देवता दानवों से स्वर्ग छीन पाते, न तुमको अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, दुर्योधन जैसे रणबांकुरे मिल पाते. संदीपनि सुखी थे तो कृष्ण वासुदेव बने. पढ़ाई लिखाई भी कोई अनुबंध और ठेके पर देने की चीज है? ऐसे करवाओगे देश के भविष्य का निर्माण?

गुरुओं को क्यों नाराज कर रहे हो तुम लोग? कबीर को सुनोः

कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥


गुड्डू भैया का सवाल सदी के सवाल की तरह छा गया. मैं चुप था कि गुड्डू भैया ज्ञानमुद्रा से वापस आएः पता है ह्विस्की की टीचर्स ब्रांड पौने दो सौ साल पुरानी है और इसको विलियम टीचर नाम के शख्स ने शुरू किया था.

मुझे नहीं मालूम था. मैंने कहाः आज के शिक्षक वेतन तो लेते है लेकिन पढ़ाने में फांकी मारते हैं.

गुड्डू उकडूं बैठ गएः देखो ठाकुर, हमारे यहां लोगों में यह गलतफहमी है कि शिक्षक को वेतन अधिक मिलता है, जबकि हालात इसके लट हैं. मौजूदा समय में देश के बजट का करीब 3.4 फीसदी शिक्षा पर खर्च किया जाता है. इसमें से करीब 65 फीसदी आमदनी सरकार को विविध उपकरों से होती है. यानी शिक्षा में हमारा खर्चा बहुत कम है. अच्छे वेतन की जो बात तुम कर रहे हो न, वैसे टीचर बहुत कम हैं...देशभर में 50 फीसदी शिक्षक वेतन से जूझ रहे हैं. जितने शिक्षक हैं उनमें से आधों को 6 हजार रु. से भी कम तनख्वाह मिलती है. शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए गठित किये गये कोठारी आयोग ने इस बात की सिफारिश की थी कि शिक्षक का वेतन कम-से-कम इतना तो हो ही कि उसे किसी तरह की आर्थिक परेशानियों से जूझना नहीं पड़े. आयोग ने शिक्षकों को एक सम्मानित वेतन देने की बात कही थी. लेकिन, सल में उनका वेतन न्यूनतम मजदूरी के बराबर है. अनुबंध पर काम करने वाले अधिकतर शिक्षकों की ट्रेनिंग नहीं हुई है. देशभर में करीब 11 लाख शिक्षक ट्रेंड नहीं हैं तो बताओ क्या पढ़ाएं ये लोग?

मैं संतुष्ट नहीं हुआः भिया, मास्टर लोग स्कूल छोड़कर धनरोपनी कराने निकल जाते हैं..

गुड्डू भिया मुस्कुरा उठेः वेतन दोगे मजदूर वाला और काम द्रोणाचार्य का लोगे? खाली मास्टर लोगों से उम्मीद करोगे कि वह पढ़ाई के बीच में धनरोपनी कराने न जाए. ग्रामीण इलाकों में अब भी करीब 10 फीसदी स्कूल ऐसे हैं, जहां एकमात्र शिक्षक हैं.

बेचारे एक ही मास्टर को बच्चों की हाजिरी देखनी होती है, सारे विषय और वर्गों को पढ़ाना होता है, अब तो दुपहरिया में खाने का इंतजाम भी करवाना होता है. और सरकार! एनसीइआरटी जैसे सरकारी शिक्षा संस्थानों को मजबूत बनाने के बजाय सरकार शिक्षा के लिए प्राइवेट सेक्टर की ओर देख रही है, इससे बेड़ा गर्क ही होगा न..

पता है सरकार ने 5 दिसंबर 2016 को लोकसभा में शिक्षा के आंकड़े पेश किए थे. उसके मुताबिक, सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में 18 फीसदी और माध्यमिक विद्यालयों में 15 फीसदी शिक्षकों के पद खाली हैं. देश भर में कुल मिलाकर करीब 10 लाख शिक्षकों की कमी है. देश के 26 करोड़ स्कूली छात्रों का करीब 55 फीसदी हिस्सा सरकारी स्कूलों में पढ़ता है. सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में माध्यमिक स्कूलों की सर्वाधिक रिक्तियां झारखंड में है, जो कि 70 फीसदी है. इस राज्य में प्राथमिक स्कूलों के लिए यह आंकड़ा 38 फीसदी है. उत्तर प्रदेश में माध्यमिक शिक्षकों के आधे पद खाली हैं, जबकि बिहार और गुजरात में यह कमी एक-तिहाई है. 60 लाख शिक्षकों के पदों में करीब नौ लाख प्राथमिक स्कूलों में और एक लाख माध्यमिक स्कूलों में खाली हैं.

लेकिन ठाकुर, जनगणना करवाना हो, मुर्गी, मवेशी, सूअर गिनवाना हो, मिड डे मील का भोजन बनवाना हो, ...बिना छत वाले स्कूल में पढ़ाना हो, बिना ब्लैक बोर्ड और खड़िया के पढ़ाना हो...बीडीओ से लेकर पंचायत सदस्य तक की जूती चटवाना हो...सारे काम शिक्षकों से करवा लो...

इतने के बाद शिक्षक अगर जिंदा रहकर पढ़ा रहा है ना, तो इसके लिए इस देश के तमाम प्रतिभावान् और कामचोर दोनों वर्गों के शिक्षकों का मेरा नमन.

गुड्डू संजीदा हो गए. आज मैंने उनके लिए शेर पढ़ाः

आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में 'फ़िराक़'
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए


गुड्डू मुस्कुरा उठे, उनने अपने पैंताने छिपा रखी टीचर्स का एक खंभा निकाला और जोर से कहाः हैप्पी टीचर्स डे.



Friday, September 8, 2017

ठर्रा विद ठाकुरः एवरीबडी लव्स अ गुड बाढ़

एवरीबडी लव्स अ गुड बाढ़
ठर्रा विद ठाकुरः दूसरी किश्त 
(डिस्क्लेमरः पाठक अपना पव्वा-चखना साथ लाएं)

गुड्डू भैया पूरे ताव में थे. अपने छप्पर पर खड़े होकर जितना लाउडस्पीकर हुआ जा सकता था उतना होकर कृष्ण कल्पित की सूक्तिय़ों को चीखकर गा रहे थेः

स्वप्न है शराब!
जहालत के विरुद्ध
गरीबी के विरुद्ध
शोषण के विरुद्ध
अन्याय के विरुद्ध
मुक्ति का स्वप्न है शराब!

भाई गुड्डू आपने शराब को मुक्ति का स्वप्न बता दिया? गुड्डू ने इशारा किया कि 'इनकिलास जिंदाबाघ' कहने के लिए फूस की छत से मुफीद जगह कोई नहीं. गुड्डू आम आदमी थे और उनकी छत ही उनका मंच थी. हालांकि उनकी छत उनकी मजबूरी भी थी क्योंकि नीचे बाढ़ के पानी ने गजब का समां बांध रखा था और उनके घर का हर बरतन मछली हो चला था.

गुड्डू भैया तो महज नुमाइंदे हैं, जो यह सब झेल रहे हैं, वरना गुजरात, असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा समेत देश के 26 राज्य और केंद्रशासित क्षेत्र बाढ़-बारिश की चपेट में हैं और 508 जानें जा चुकी हैं, देश की 2.8 लाख हेक्टेयर फसली जमीन बाढ़ से आई आपदा की चपेट में है और 63 लाख से ज्यादा घर क्षतिग्रस्त हो गए हैं. सबसे ज्यादा जान-माल का नुक्सान इस बार गुजरात को उठाना पड़ा, जहां 200 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है.

ऐसा कैसे कह सकते हैं भिया?

गुड्डू ने जांघ पर जोर से तलहत्थी मारते हुए कहाः अपनी क्या औकात रे ठाकुर. इ तो कैग कह रहा है.

मेरा मन खिन्न हो गया. आदमी हर काम के लिए सरकार को दोषी क्यों ठहराता है? क्यों गुड्डू भिया, सरकार ने बाढ़ की सूचना देने के लिए टेलीमीट्री स्टेशन नहीं बनाए हैं?

बोतल में बची आखिरी बूंद को बोतल उल्टा करने के बाद उसे जीभ से हिलकोर कर चाटते हुए गुड्डू बोलेः बनाया क्यों नहीं है ठाकुर...बनाया तो है. लेकिन करीब 60 फीसदी स्टेशन काम ही नहीं कर रहे हैं. बारहवीं पंचवर्षीय योजना में 219 टेलीमीट्री स्टेशन लगाए जाने का लक्ष्य था. 2016 तक सिर्फ 56 स्टेशन ही लगाए गए. कुल 375 टेलीमीट्री स्टेशनों में से 222 ठप पड़े हैं, तो रियल टाइम डेटा के लिए एक ही जगह बचती हैः भगवान इंद्र का दफ्तर.

मैं अभी बहस खत्म करने के मूड में नहीं था. मैंने कहा गुड्डू भिया, तो क्या बाढ़ खत्म करने के लिए कोई उपाय नहीं किया गया है?

गुड्डू मेरी तरफ मुड़कर चुप हो गए. दो मिनट तक के नाटकीय सिनेमाई साइलेंस के बाद फूटेः शराब छोड़ दी तुमने कमाल है ठाकुर/ मगर ये हाथ में क्या लाल-लाल है ठाकुर

मेरे मुंह से वाह निकलने ही वाला था कि उन्होंने हाथ से रोक दिया. मेरे लिए वाह न करो, जाकर राहत इंदौरी के लिए वाह करो. उन्हीं का है.

मैं चुप.

देखो, संकट असल में पानी का नहीं, संवेदनशीलता का है. राज्य सरकारें और केंद्र एक पटरी पर चलते ही नहीं. अगस्त से लेकर सितंबर 2011 तक 20 दिनों में छत्तीसगढ़ और ओडिशा में भारी बारिश से महानदी का जलस्तर बढऩे की चेतावनी केंद्रीय जल आयोग ने कई बार जारी की थी लेकिन बांध के अफसरों ने ध्यान नहीं दिया और सितंबर में भारी बाढ़ आ गई, जिससे ओडिशा के 13 जिले प्रभावित हुए और दो हजार करोड़ रु. का आर्थिक नुकसान हुआ.

2014 में यही कहानी फिर दोहराई गई. नतीजा भी वही रहाः महानदी बेसिन में बाढ़ आ गई. जून 2013 में उत्तराखंड में अलकनंदा में बाढ़ की कोई पूर्वसूचना नहीं दी गई. मार्च 2016 तक 4,862 बड़े बांधों में से मात्र 349 (7 फीसदी) के लिए ही इमरजेंसी ऐक्शन प्लान/डिजास्टर मैनेजमेंट प्लान तैयार किया गया. इनमें से भी 231 (पांच फीसदी) में ही ऑपरेटिंग मैनुअल तैयार किया गया. उत्तर प्रदेश के 115 में से सिर्फ 2, मध्य प्रदेश के 898 में 2, महाराष्ट्र के 1,693 में से 181 जबकि ओडिशा, राजस्थान, तेलंगाना, त्रिपुरा, हरियाणा ने कोई इमरजेंसी ऐक्शन प्लान बनाया ही नहीं. 17 राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों में से सिर्फ दो ने मॉनसून के पहले और बाद में बांधों का पूरी तरह निरीक्षण कराया जबकि 12 राज्यों में किसी तरह का कोई निरीक्षण नहीं हुआ.

मेरा मन दुखी हो गया. तो क्या बाढ़ से बचा नहीं जा सकता?

देखो, बाढ़ कत्तई नुकसानदेह नहीं. खेतों के लिए तो फायदेमंद है. लेकिन तब, जब जान-माल सुरक्षित बना लिया जाए. फिर भी, जानलेवा बाढ़ से बचने के उपायों में कई अड़ंगे हैं, जैसे बांध सुरक्षा विधेयक 2010 से लटका हुआ है. राष्ट्रीय जल नीति के अलावा महकमे बहुत बन गए हैं, जैसे केंद्र सरकार के अधीन-केंद्रीय जल आयोग, गंगा फ्लड कंट्रोल मिशन (1972), ब्रह्मपुत्र बोर्ड (1980), राष्ट्रीय बाढ़ आयोग (1976), टास्क फोर्स (2004) नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी और राज्यों में स्टेट टेक्निकल एडवाइजरी कमेटी, राज्य बाढ़ नियंत्रण बोर्ड आदि, फिर भी बाढ़ का पानी हर साल सिर चढ़कर बोलता है.

गुड्डू भैया इस बीच फूस की छत से उतर गए थे. और मेरी नाव पर आकर चढ़ गएः ठाकुर, पत्रकार आदमी हो, थोड़ी-थोड़ी पिया करो. सुनो कल्पित की ही बात, खासकर तेरे लिए,

देवदास कैसे बनता देवदास
अगर शराब न होती.
तब पारो का क्या होता
क्या होता चंद्रमुखी का
क्या होता
रेलगाडी की तरह
थरथराती आत्मा का?
बाढ़ उतर जाए, तो अगले हफ्ते आना. काले चने की घुघनी (छोले) के साथ हंडिया पीने की कला सिखाऊंगा. चलो, एक पटियाला बना दो अभी. 

(यह लेख आईचौक.कॉम में प्रकाशित हो चुका है)

Thursday, September 7, 2017

ठर्रा विद ठाकुरः पहली किस्त

ठर्रा विद ठाकुरः (अपना पव्वा साथ लाएं)
इंडिया@70 और घीसू का पसीना

(आईचौक पर 14 अगस्त को लिखा गया कॉलम)

आजादी का दिन आ रहा है. सत्तर साल बीत गए आजाद हुए. रामधारी सिंह दिनकर की बच्चों वाली वह कविता तो आपको याद ही होगी, जिसमें चूहा चुहिया से कहता हैः

सो जाना सब लोग लगाकर दरवाजे में किल्ली,
आज़ादी का जश्न देखने मैं जाता हूँ दिल्ली।

भारत में आम आदमी (पार्टी नहीं) कॉमन मैन ब्रो...की हैसियत चूहे जैसी है और बिल्लियों का उस पर राज है.

हमारे एक दोस्त हैं, गुड्डू भैया जो अपनी सींक-सरीखी काया में तब तक दारा सिंह होते हैं जब तक देसी का असर रहता है. इस मामले में पूरे देशभक्त हैं और उनका दावा है कि चाहे किसी की रगों रम का निवास हो उनकी धमनियों में कंट्री बहती है.
गुड्डू भैया आम आदमी हैं. तकरीबन अमिताभ के विजय दीनानाथ चौहान अवतार में आकार उसने हाथ नचाते हुए पूछा था मुझसेः क्या भाई, ये देश किसका है, आजादी किसकी है?

यह सवाल ऐसा शाश्वत है कि चाहे-अनचाहे सत्तर साल से देश का हर कोना एक बार और अमूमन कई बार पूछ ही लेता हैः आजादी किसकी है, किसके लिए है. जिसके लिए भी हो, हमारे आपके लिए आजादी का मतलब ही कुछ और है. अब जबकि हम पंद्रह अगस्त के पावन मौके पर फेसबुक, ट्वीटर और तमाम ऐसे ही सोशल साइट्स पर अपनी डीपी तिरंगा करने पर उतारू हैं, तमाम जगहों पर अपनी आजादी का जश्न मना रहे हैं.

फेसबुक पर लिखे, ट्वीट कीजिए, सराहा पर परदे के पीछे रहकर किसी को मन भर गरिया दीजिए, खुले में शौच जाइए, सड़क किनारे मूत्र-विसर्जन कीजिए..मल्लब हर तरीके से हम आजाद हैं. तो जैसी प्रजा वैसा राजा. नेताजी भी आजाद हैं. जब मन आए पार्टी बदलिए, अंतरात्मा बदलिए, जो जो मन हो सब बदलिए. दलाली खाइए. रोका किसने है, और कोई रोक भी कैसे पाएगा...

लेकिन यह गलत है. गुड्डू भैया चौथे पैग से हवा में उड़ने लगते हैः अब खरीद-फरोख्त के मामले में लोग दलाली नहीं खाएंगे तो क्या यज्ञ-हवन में खाएंगे? ...और दुनिया में बहुत सारे काम भविष्य सुरक्षित करने के लिए भी तो किए जाते हैं। कुछ लोग बचत करते हैं, कुछ बीमा करवाते हैं, कुछ अपने बेटे-बेटियों, नाती-पोतो के लिए घोटाले कर लेते हैं।

कुछ लोग आज फिर से बोफोर्स-बोफोर्स चिल्लाने लगे हैं. यह तो गलत है न ठाकुर. सरासर नाइंसाफी! बोफोर्स में 64 करोड़ का घोटाला हुआ था. इतने पैसे तो रेज़गारी के बराबर हैं। चिंदीचोरी जैसी बात है यह, और इस पर आप होहल्ला मचा रहे हैं। शराफत तो छू भी नहीं गई आपको! मधु कोड़ा को देखिए, उन पर 4000 करोड़ के घोटाले का आरोप है, लालू प्रसाद का चारा घोटाला तक 800 करोड़ का था।

ज़रा तुलना कीजिए। कुछ आंकड़े बता रहा हूं। आजादी के सत्तर बरस हुए अपने देश के, और तब से लेकर आज तक, भ्रष्टाचार की भेंट हुई रकम है, 462 बिलियन डॉलर। जी, यह रकम डॉलर में है। चूंकि हम हर बात पश्चिम से उधार लेते हैं, सो यह आंकड़ा भी उधर से ही है।

वॉशिंगटन की ग्लोबल फाइनेंसियल इंटीग्रेटी की रिपोर्ट के मुताबिक, आजादी के बाद से ही भ्रष्टाचार भारत की जड़ों में रहा है, जिसकी वजह से 462 बिलियन डॉलर यानी 30 लाख 95 हजार चार सौ करोड़ रूपये भारत के आर्थिक विकास से जुड़ नहीं पाए।

तो भ्रष्टाचार और घूसखोरी की हमारी इस अमूल्य विरासत पर, जो हमारी थाती रही है, आप सवाल खड़े कर रहे हैं? गुड्डू चौकी पर से नीचे उतर गए.

जब भी मैं भ्रष्टाचार की अपने देश की शानदार परंपरा का जिक्र करता हूं, हमेशा मुझे नेहरू दौर के जीप घोटाले से लेकर मूंदड़ा घोटाले, इंदिरा के दौर में मारुति घोटाले से लेकर तेल घोटाले, राजीव गांधी के दौर में बोफोर्स, सेंट किट्स, पीवी नरसिंह राव के दौर में शेयर घोटाला, चीनी घोटाला, सांसद घूसकांड, मनमोहन के दौर में टूजी से लेकर कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाला याद आता है। यह एक ऐसी फेहरिस्त है, जिसको इतिहास हमेशा संदर्भ की तरह याद रखेगा।

संयोग देखिए, अब इसमें कुछ ऐसे लोगों के नाम भी जुड़ रहे हैं, जिनकी समृद्धि देखकर पूरा देश रश्क़ करता था. विजय नाम से याद आया, एक विजय था, जिसको ग्यारह मुल्कों की पुलिस खोज रही थी और दूसरा विजय है जिसको देश के बैंक प्रबंधक खोज रहे हैं.

बहरहाल, मेरा मानना है कि घोटालों पर संसद में चर्चा कराना टाइम खोटी करना है। आजादी के बाद से संसद में 322 घोटालों पर चर्चा हो चुकी है, नतीजा क्या निकला, मैं आज भी जान नहीं पाया हूं।

यकीन मानिए, नतीजे आ भी गए तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा. इस देश में 400 लोगों के पास चार्टड विमान हैं, 2985 परिवार अरबपति से भी अधिक हैं, देश के किसानों पर ढाई हज़ार करोड़ का कर्ज है और वह आत्महत्या करते हैं तो देश के 6 हजार उद्योगपतियों ने सवा लाख करोड़ का कर्ज ले रखा है. उनमें से कोई आत्महत्या नहीं करता.

पाठकों, घोटाले हुए हैं। यकीनन हुए हैं। यह भी पता है कि लिया किसने है? बस सुबूत नहीं हैं. और सुबूत मिल भी जाए तो क्या होगा?

चूहा दिल्ली में आजादी का जश्न देखने आएगा, बिल्ली पीछे सब चट कर जाएगी. कुछ बरस पहले एक योजना आयोग था. उसके उपाध्यक्ष भी थे. वह कहते थेः शहर के आदमी के लिए 32 रु. और गांव के आदमी के लिए 26 रु. रोजाना की आमदनी काफी है. उपाध्यक्ष महोदय औरंगजेब रोड (तब के) पर एक बंगले में रहते थे जिसकी कीमत इतनी थी कि अगर लॉन के घास के दाम भा लगाए जाते तो हर घास की कीमत 32 रु. से ज्यादा बैठती. अस्तु. आज सड़कें फटाफट तैयार हो रही हैं. इमारतें और मॉल्स चमचमा रहे हैं. दाल-टमाटर-प्याज की कीमत बढ़ने पर हो-हल्ला है लेकिन बढ़ी हुई कीमत किसान को नहीं मिलती. किसान अपनी पैदावार सड़क पर फेंक रहा है. वह सड़कों पर दूध उड़ेल रहा है. आजादी के मौके पर राजा की पालकी जाने वाली है. एलइडी बल्बों से रोशनायित सड़कें हीरे-मोती की तरह चमकती है. और इस हर मोती के पीछे घीसू का पसीना है.

आज आईचौक पर खड़े होकर एक शेर बहुत जोर से आ रहा हैः

न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के नगीने से
तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से।


चलो. चखना निकालो यार. लगता है चढ़ गई.