Sunday, October 28, 2012
क्या तरेगना ही है आर्यभट्ट की कर्मस्थली?
Sunday, August 26, 2012
अवतार कृष्ण का जाना, इतना सन्नाटा क्यों है भई?
आज के भारत को देखिए, कोकराझार है, मुंबई में उन्माद है, बेंगलुरु से पलायन करते पूर्वोत्तर के लोग हैं...धार्मिक चरमपंथ है, दिल्ली में प्रधानमंत्री के घर के सामने प्रदर्शन करते और पानी की बौछारें झेलते राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से भरे सामाजिक कार्यकर्ता हैं...देश अनिर्णय और संभ्रम का शिकार है। ऐसे ही वक्त में एक प्रतीक पुरुष आता है या फिर अंधियारे को और गहरा देने के लिए चला जाता है। अवतार कृष्ण हंगल की मौत ऐसे ही अमावस का प्रतीक है।
उन्माद को कम करने वाला वह बुजुर्ग मौलाना ही ए के हंगल है, जो गांववालों को कहता है कि पूछूंगा ख़ुदा से उसने मुझे गांव पर क़ुरबान करने के लिए दो-तीन और बेटे क्यों न दिए। यह एक दृश्य महज एक फिल्म का दृश्य नहीं, इसमें लेखक-निर्देशक ने चाहे जो सोच कर उनसे करवाया हो, लेकिन सच है कि यही बाव उनकी निजी जिंदगी का सच भी था।
उनकी आत्मकथा पढ़ रहा था, उनने ज़िक्र किया है संभवतः बाबरी विध्वंस की घटनाओं के दौरान किसी चमरपंथी ने कार्यकर्ताओं को कहा था कि ए के हंगल मत बनो और सदभावना के उपदेश मत झाड़ो, चलो आगे बढ़ो। यह वाकया ही ए के हंगल की छवि के लिए काफी है।
ऐसा नहीं कि ए के हंगल की यह सिनेमाई छवि बस परदे तक ही सीमित थी। निजी जिंदगी में भी उनके मकसद, उनकी विचारधारा हमेशा सांप्रदायिक सद्भाव की थी और वामपंथ के प्रति उनका झुकाव तो खैर जगजाहिर ही है। रंगमंच के लिए प्रतिबद्ध इस कलाकार ने हमेशा इप्टा के लिए काम किया, उसके लिए चंदा जुटाया और कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव से लगातार संपर्क में बने रहे थे।
उनकी अदाकारी कहीं से लाउड नहीं थी, संवाद रट कर अदा करने की बजाय हमेशा उसे समझ कर बोला हंगल साहब ने, अपने जीवन के शुरुआत में उन्होंने टेलरिंग में कौशल हासिल किया था। कताई की उनकी हाथ की सफाई उनकी अदाकारी में भी दिखती रही और निजी जीवन में भी, जहां आखिर तक एक भी वैचारिक सूत उनने उधड़ने न दिया।
अब जबकि सिनेमा में ज्यादातर औसत प्रतिभा वाले सितारों की भीड़ है और उनमें से भी अधिकतर की बौद्धिक क्षमता भी औसत से खराब ही है...ए के हंगल जैसे प्रतिबद्ध बौद्धिकों का जाना, सिनेमा का नुकसान भी है और रंगमंच का भी।
Sunday, July 29, 2012
एक था टाइगर का असली टाइगर
अगर आपने भी इस फिल्म को देखने का प्लान बनाया है तो पहले आपको ये पोस्ट पढ़नी चाहिये ।
फोटो मेँ दिखाया गया ये शख्स सलमान खान की तरह बहुत मशहूर तो नहीँ है और शायद ही कोई इनके बारे मेँ जानता हो या किसी से सुना हो - इनका नाम था रवीन्द्र कौशिक ये भारत की जासूसी संस्था RAW के भूतपूर्व एजेन्ट थे राजस्थान के श्रीगंगानगर मेँ पले बढ़े रवीन्द्र ने 23 साल की उम्र मेँ ग्रेजुएशन करने के बाद RAW ज्वाइन की थी ,भारत पाकिस्तान और चीन के साथ एक-एक लड़ाई लड़ चुका था और पाकिस्तान भारत के खिलाफ एक और युद्ध की तैयारी कर रहा था।... जब भारतीय सेना को इसकी भनक लगी उसने RAW के जरिये रवीन्द्र कौशिक को भारतीय जासूस बनाकर पाकिस्तान भेजा, रवीन्द्र ने नाम बदलकर यहाँ के एक कालेज मेँ दाखिला लिया यहाँ से वो कानून की पढ़ाई मेँ एक बार फिर ग्रेजुएट हुए और उर्दू सीखी और बाद पाकिस्तानी सेना मेँ जासूसी के लिये भर्ती हो गये कमाल की बात है पाकिस्तान को कानोँ कान खबर नहीँ हुई कि उसकी सेना मेँ भारत का एक एजेँट है !
इसकी बताई जानकारियोँ के बलबूते पर भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ हर मोर्चे पर रणनीति तैयार की !
पाकिस्तान तो भारत के खिलाफ कारगिल युद्ध से काफी पहले ही युद्ध छेड़ देता पर रवीन्द्र के रहते ये संभव ना हो पाया केवल एक आदमी ने पाकिस्तान को खोखला कर दिया था !
ये बात बहुत कम लोगोँ को पता है कि पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाईयोँ का असली हीरो रवीन्द्र कौशिक है रवीन्द्र के बताये अनुसार भारतीय सेना के जवानोँ ने अपने अतुल्य साहस का प्रदर्शन करते हुये पहलगाम मेँ घुसपैठ कर चुके 50 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकोँ को मार गिराया।
ये सिला मिला रवीन्द्र कौशिक को 30 साल की देशभक्ति का , भारत सरकार ने भारत मेँ मौजूद रवीन्द्र से संबंधित सभी रिकार्ड मिटा दिये और RAW को धमकी दी कि अपना रवीन्द्र के मामले मे अपना मुँह बंद रखे
उसके परिवार को हाशिये मेँ ढकेल दिया गया और भारत का ये सच्चा सपूत गुमनामी के अंधेरे मेँ खो गया।
एक था टाइगर नाम की ये फिल्म रवीन्द्र कौशिक के जीवन पर ही आधारित है जब इस फिल्म का निर्माण हो रहा था तो सरकार के दखल के बाद इसकी स्क्रिप्ट मेँ फेरबदल करके इसकी कहानी मे बदलाव किया गया पर मूल कथा वही है !
इस देशभक्त को गुमनाम ना होने देँ इस पोस्ट को शेयर एवं टैग करेँ इस पोस्ट को और ज्यादा से ज्यादा लोगोँ को बतायेँ और हाँ जब भी ये फिल्म देखने जायेँ तब इस असली टाइगर को जरूर याद कर लेँ।
Thursday, December 22, 2011
चंद्रशेखर आजाद की दुर्लभ तस्वीर
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| क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की मृत देह का ब्रिटिश पुलिस ने सार्वजिनक प्रदर्शन किया था |
क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की ये तस्वीर बेहद दुर्लभ है। उनकी पार्थिव देह को ब्रिटिश पुलिस ने सार्वजनिक तौर पर पेश किया था। यह चेतावनी थी उन क्रांतिकारियों के लिए जो ब्रिटिश सरकार के लिए परेशानियां पैदा कर रहे थे। 27 फरवरी 1931 को एक धोखेबाज मुखबिर की वजह से इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश टुकडी ने चंद्रशेखर आजाद को घेर लिया।
चंद्रशेखर आजाद आखिरी गोली तक लडते रहे। कोई विकल्प सामने न पाकर चंद्रशेखर आजाद ने आत्मसमर्पण की बजाय ने अपनी जान देनी बेहतर समझी। उनने आखिरी गोली खुद को मार ली थी।
समाज के बेहद अराजक दौर में चंद्रशेखर आजाद जैसे सपूतों को प्रणाम। इस तस्वीर को शेयर करें, ब्लॉग लिखे...मेल करें।
(तस्वीरः फेसबुक पर जितेन्द्र रामप्रकाश सर के सौजन्य से)
Tuesday, January 18, 2011
क्या आप गायक बालेश्वर को जानते हैं?
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| बालेश्वर का जानाः आज भोजपुरी अचल उदास है |
Friday, January 14, 2011
याद शहर...
सिंधी घोड़ीवालों से लेकर बेहूदा किस्म के विज्ञापनों के बीच...रेडियों ज़ॉकीज़ की बातों को झेलना आदत बनी..तो गानों के लिए लंबा इंतजार करना...पारंपरिक अनुष्ठान बन गया। गाने भी ऐसे थे जो सुन तो लें लेकिन गुनगुनाने के लिए बिलकुल मुफीद नहीं।
एफएम गोल्ड और रेनबो अपवाद था। लेकिन इसके जॉकी उपदेशक की मुद्रा अपनाए रहते। गानों और कथ्य का कोई तालमेल नहीं...बात कर रहे हों दार्जिलिंग के पर्यटन और आबोहवा की..गाना बिग ट्विस्ट। लफ्फाजियां..जोर-जोर से बकवास, फूहड़ किस्म के चुटकुले.. रात हो जाए तो शेरो-शायरी..फुसफुसाकर बातें करना...आधुनिक रेडियों ज़ॉकिइँग इसी के इर्द गिर्द घूमती नजर आती रही।
फिर कल, एक बेहद साधारण-सी शाम को एक रेडियों कार्यक्रम ने बेहद खास तजुरबेवाला बना दिया।
नीलेश कल शाम को नौ बजे बिग एफ एम पर किस्सा सुना रहे थे। किस्सा एक आलमारी से जुडी थी, तीन पुश्तों वाली आलमारी...।
कहानी से जुड़े गाने आप ही आप सिलसिलेवार ढंग से आते गए..। जगजीत सिंह से लेकर कैलाश खेर तक...और भूपिंदर की पुरकशिश आवाज से आशा तक....मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है...नीलेश की कहानी को आगे बढाते गए..उनके मूड के लिहाज से शानदार गानों का खूबसूरत चयन। नीलेश की किस्सागोई का तरीका सबसे अलहदा है..। नीलेश मिसरा को सुनकर महसूस होता है कि दरअसल अब तक हमारे यहां कायदे के रेडियो जॉकी हुए ही नहीं।
पत्रकारिता और लेखन में अपनी छाप छोड़ने के बाद नीलेश ने रेडियों जॉकिइंग में भी नई ज़मीन फोड़ी है। कुछ परिभाषाएं बदलनी शुरु होंगी अब। मेरे दोस्त विकास सारथी भी नीलेश के प्रशंसकों में से एक हैं। पूछने पर बताते हैं, कि नीलेश रेडियो के सबसे बेहतरीन और सेंसिबल बन कर सामने आए हैं।
मैं रोजाना इसके श्रोताओं में शामिल हो रहा हूं, इस कार्यक्रम की तारीफ में मेरे पास शब्द नही है। उम्मीद यही कि यह ऐसा ही बना रहे..।
Friday, April 23, 2010
अरुणाचल में परशुराम कुंड का सफर
यहां नदी की धारा हहराती-गरजती आती है। मुख्य सड़क जो कि हाइवे है, और महज 12 फुट चौड़ी है--आपको गाड़ी छोड़कर पैदल ही सीढियों से पहाडी पर चढना और फिर ढलान पर उतरना होगा फिर होंगे ब्रह्मपुत्र के दर्शन..
Saturday, November 14, 2009
बीस साल बाद

बीस साल पहले याद है मुझे, मैं प्राइमरी में पढ़ा करता था। तब, भी क्रिकेट को लेकर यहीं जुनून था। बड़े भाई साहब क्रिकेट खेलते भी थे, क्रिकेट सम्राट नाम की पत्रिका भी घर में आती थी। तो सचिन तेंदुलकर और अमोल मजूमदार नाम के दो शख्सों से परिचय हुआ। चौथी कक्षा में पढ़ता था, पाठ्य-पुस्तकों से ज्यादा मन क्रिकेट सम्राट में लगता था।
सचिन का चयन टीम में हुआ था। लेकिन स्कूल के दिनों मे मेरा दोस्त सचिन की बजाय अमोल को ज्यादा टैलेंटेड बताता रहा। लेकिन शारदाश्रम के इस बच्चे को लेकर मेरे मन में एक मोह-सा हो गया।
कुछ दिनों बाद भाई ने बताया कि पहले टेस्ट मैच मे यह लड़का कुछ खास नहीं कर पाया..पहले वनडे में भी सिफर। फिर भी मन नहीं माना।
बड़े भाई साहब उन दिनों वेंगसरकर, शास्त्री और कपिल के दीवाने थे। अज़हर की कलाई की लोच पर फिदा थे, और मैदान पर अज़हर जैसा ही दिखना और खेलना पसंद करते थे। लेकिन फिर हमने अखबार में पढ़ा कि सचिन नाम के इस लडके ने अजीबोगरीब एक्शन वाले अब्दुल कादिर के धुनक दिया। मेरे मन को ठंडक पहुंची।
सचिन का कारवां बढ़ निकला था। मेरे खपरैल घर में सचिन का एक पोस्टर विराजमान हो गया। सन ९१ का साल था, बूस्ट वाला कोई विग्यापन था। गले में सोने की चेन, घुंघराले बाल। सोफे पर पसारा हुआ सचिन..। उन दिनों नवजोत सिंह सिद्दू ६ शतक मार कर वनडे भारतीय बल्लेबाज़ी में शीर्ष पर थे। उनका लाठीचार्ज मशहूर हुआ करता था।
सन ९४ में सिंगर कप में सचिन का पहला शतक आया तो हमने यही सोचा कि क्या यह सिद्धू के ६ शतकों की बराबरी कर पाएगा? डेसमंड हेंस के १७ शतकों को तो हम अजेय मान चुके थे। उन दिनों सचिन की तुलना अपने समकालीनों इंजमाम और लारा से होने लगी थी।
लेकिन इसके बाद क्या हुआ, इसके लिए मुझ अपने ब्लॉग पर लिखने की ज़रुरत नहीं। सारे समुद्र के पानी को स्याही बनाकर और सारे जंगलों की लकड़ी को कलम बनाकर सारी पृथ्वी क कागज बना कर पीटर रीबॉक से लेकर गावस्कार तक ढेर सारा लिख चुके हैँ। कमेंट्री में जेफरी बायकॉट वॉट अ शॉट, वाट अ शॉट चिल्ला-चिल्ला कर अपना गला बैठा चुके हैं।
लेकिन मुझे साल ९८ का शारजाह याद है। सेमिफाइनल में १४३ और फाइनल में १३६ बनाकर जीतने वाले सचिन की तारीफ में उन्ही के हाथों कुटने-पिसने वाले वॉर्न और माइकल कास्परोविच ने पुल नही फ्लाई ओवर बांध दिए। हमारी सहयोगी विनीता उनकी बड़ी फैन हैं। कहती हैं, जबतक सचिन क्रीज पर रहता है, जीत की उम्मीद बंधी रहती है। वह इसकी ताकीद करती हुई ऑस्ट्रेलिया के साथ पिछले मैच का हवाला भी देती हैं, जिसमें सचिन ने १७५ रन ठोंके थे।
बहरहाल, मैं कोई सचिन के आंकडो का बड़ा जानकार नहीं। लेकिन उनकी विनम्रता और जमीन से जुड़ाव का कायल हूं। सचिन और रहमान जैसी बड़ी शख्सियते मुझ पर असर करती हैं, और उन्हें मिलता हुआ सम्मान मुझे खुद को मिलता सम्मान लगता है। कई बार तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
सचिन किसी की रगो में एड्रिनलीन दौड़ाने के लिए काफी नहीं है?
Wednesday, August 12, 2009
रहमान अनप्लग्डः पर श्रोता निराश

दूरदर्शन के पचास साल इसी १५ सितंबर को पूरे हो रहे हैं। ऐसे में इतने बड़े संस्थान के स्वर्ण जयंती समारोह के लिए आयोजन भी उतना ही बड़ा होना चाहिए। सो, कल यानी ११ अगस्त से एक कार्यक्रम श्रृंखला की शुरुआत हुई है और सही ही इसका उद्घाटन कार्यक्रम रहमान साहब के कार्यक्रम से हुआ।
बहरहाल, रहमान अनप्लग्ड की शुरुआत बेहतर रही।
फिर आए शिवमणि. और इस ड्रमर ने पहले जालियां और सूटकेस बजाया। शिवमणि को बहुत दिनों से देखता आ रहा हूं लेकिन उनकी हर प्रस्तुति पहले से अलग होती है। शिवमणि के ड्रम को सुनना अद्भुत है। उंगलियां ही सुमिरनी बना ली हैं मणि ने। मणि तो सचमुच मणि हैं भारत मां की ताज के ।
फिर आए हरिहरन...तू ही रे.. से शुरु किया। सूदिंग कहते हैं ना जिसे अंग्रेजी में, उनकी आवाज़ से कुछ वैसा ही लगता है। मखमली.. या कहें शहद टपकती-सी आवाज़। कैलाश खेर की आवाज़ मे अगर पहाड़ी नदी सी चंचलता और जलप्रपात सी ऊंचाई है तो हरिहरन की आवाज में वह नदी मैदानी हिस्से में कलकल करती बहती लगी। गहराई और वॉल्यूम के लिहाज से भी।
आखिर में, हरिहरन ने रोजा का भारत हमको जान से प्यारा है गाया। साधना सरगम ने किसना फिल्म का भजन गुगुनाया ..बस हो गया खत्म। रहमान पता नहीं क्यों गाने स्टेज पर नहीं आए। जय हो..तो जाने दीजिए वंदे मातरम् भी नहीं गाया। हम इंतजार करते रहे। वैसे रहमान कंसर्ट के दौरान पियानो बजाते रहे लेकिन हम तो उनकी जादुई आवाज़ सुनने के लिए बेताब थे।
बड़ी निराशा हुई। वह निराशा अभी तक तारी है। वैसे रात में हम घर गए १२ बजे के आसपास तो वंदे मातरम प्लेयर पर चला कर सुन ज़रुर लिया, लेकिन निराशा कम नहीं हुई। वो इसलिए कि रहमान की आवाज़ में लाइव सुनना अलग मज़ा देता और हम रहमान के प्रशंसकों में से एक हैं।
चलिए फिर कभी सही..।
Tuesday, August 4, 2009
जिंदगी की आवाज़ थे किशोर दा

मेरी पीढी़ की तरफ से किशोर दा के हुनर को प्रणाम..।
Wednesday, July 22, 2009
सूर्यग्रहण और मेरा तजुर्बा
स्कूल की इमारत की सबसे ऊपरवाली छत पर हम अपने कैमरे लिए तैनात थे। सुबह चार बजे से ही कि ज्यों ही सूरज उस्ताद दिखे, कैमरे में क़ैद कर लें। लेकिन बरसात ने पानी फेर दिया। फिर भी तजुर्बा बेहतरीन रहा। ६ बज के ४ मिनट पर सूरज को तयशुदा वक्त पर ड्यूटी पर आना था। वह आए भी। लेकिन ६.२१ पर राह में राहु के किरदार में चांद की एंट्री होनी थी। हो गई। कुदरत में ऐसी चीजें डायरेक्टर के कंट्रोल से बाहर नहीं जातीं। ये कोई नीरज वोरी की फिल्म शार्टकट-द क़ॉन इज़ ऑन तो थी नहीं कि चीजें निर्देशक के हाथ से बाहर हो जाए और पिट जाए फिल्म। बहरहाल, नायक और खलनायक तय थे। बाद में इंद्र देवता खलनायक के रुप में जगजाहिर हुए।
बच्चों ने मोमबच्ची जला कर सूरज को नमस्कार किया था। वह अंधेरा छाते ही केंडल लाईट ब्रेकफास्ट करने लगे। इसका इंतजामन स्कूल में किया गया था ताकि ग्रहण के दौरान न खाने के मिथक को तोड़ा जा सके। हालांकि सूरज को न देख पाने का मलाल सबको था लेकिन इसे एक हद तक हमारी टीम ने इंतजाम किया था। एक टीवी पर हमने अलग अलग जगहों में ग्रहण के लाइव दिखाने की व्यवस्था की थी। बच्चों ने इसे देककर संतोष कर लिया।
वैसे एक बात और पता लगी कि सूर्यग्रहण में पहले सूर्य का कोरोना भी नहीं दिखता था और पूरी तरह अंधेरा छा जाता था क्योंकि चांद धरती के ज्यादा पास था। लेकिन अभी स्थिति ये है कि धरती की परिक्रम करने वाली चांद की कक्षा हरेक साल ३.५ सेटीमीटर की दर से बढ़ रही है। अगले ६०० मिलियन साल के बाद चांद इतनी दूर हो जाएगा कि धरती पर पूर्ण सूर्य ग्रहण मुमकिन नहीं हो पाएगा। क्योंकि इसकी कक्षा २३,५०० किलोमीटर ज्यादा बड़ी हो जाएगी।
वैसे बता दें कि पूर्ण सूर्यग्रहण तभी मुमकिन हो पाता है जब धरती सूर्य की ओर चक्कर लगामे वाले अपने अंडाकार रास्ते में सूर्य से सबसे दूर हो (एपहेलियन) और इसी वक्त चांद अपने अंडाकार रास्ते में धरती के सबसे नज़दीक हो (पेरिजी)। इसके साथ ही धरती और सूर्य के बीच चांद एक सीध में आ जाए..यही स्थिति पूर्ण सूर्यग्रहण पैदा करती है और दुर्लभ भी मानी जाती है।
अब अगली बार, २१३२ इस्वी में जब अगवा पूर्ण सूर्यग्रहण लगेगा तो मैं हवाई जहाज से देखूंगा. अगर आप इच्छुक हैं तो बता दो, अभी एक पर एक फ्री टिकट मिल रहा है मुझे।
Tuesday, April 7, 2009
''अच्छे-अच्छे काम करते जाना-3
और जहां प्रसाद कम मिलता है? वहां तो उसका एक कण, एक बूंद भी भला कैसे बगरने दी जा सकती थी. देश में सबसे कम वर्षा के क्षेत्र जैसे राजस्थान और उसमें भी सबसे सूखे माने जाने वाले थार के रेगिस्तान में बसे हजारों गांवों के नाम ही तालाब के आधार पर मिलते हैं. गांवों के नाम के साथ ही जुड़ा है 'सर'. सर यानी तालाब. सर नहीं तो गांव कहां? यहां तो आप तालाब गिनने के बदले गांव ही गिनते जाएं और फिर इस जोड़ में 2 या 3 से गुणा कर दें.
जहां आबादी में गुणा हुआ और शहर बना, वहां भी पानी न तो उधार लिया गया, न आज के शहरों की तरह कहीं और से चुरा कर लाया गया. शहर ने भी गांवों की तरह ही अपना इंतज़ाम खुद किया. अन्य शहरों की बात बाद में, एक समय की दिल्ली में कोई 350 छोटे-बड़े तालाबों का जिक्र मिलता है.गांव से शहर, शहर से राज्य पर आएं. फिर रीवा रियासत लौटें. आज के मापदंड से यह पिछड़ा हिस्सा कहलाता है. लेकिन पानी के इंतज़ाम के हिसाब से देखें तो पिछली सदी में वहां सब मिलाकर कोई 5000 तालाब थे.
नीचे दक्षिण के राज्यों को देखें तो आज़ादी मिलने से कोई सौ बरस पहले तक मद्रास प्रेसिडेंसी में 53000 तालाब गिने गए थे. वहां सन् 1885 में सिर्फ 14 जिलों में कोई 43000 तालाबों पर काम चल रहा था. इसी तरह मैसूर राज्य में उपेक्षा के ताजे दौर में, सन् 1980 तक में कोई 39000 तालाब किसी न किसी रूप में लोगों की सेवा कर रहे थे.
इधर-उधर बिखरे ये सारे आंकड़े एक जगह रख कर देखें तो कहा जा सकता है कि इस सदी के प्रारंभ में आषाढ़ के पहले दिन से भादों के अंतिम दिन तक कोई 11 से 12 लाख तालाब भर जाते थे- और अगले जेठ तक वरुण देवता का कुछ न कुछ प्रसाद बांटते रहते थे. क्योंकि लोग अच्छे-अच्छे काम करते जाते थे.
आज भी खरे हैं तालाब एक किताब पढी है हाल में... गांधी शांति प्रतिष्ठान की, जानकारी भी बढ़ी। ऐसी जानकारियां जो मेरे घर की हैं लेकिन खुद नहीं जानता था मैं... सो सोचा कुछ आप लोगो से भी बांट
लूँ
अच्छे-अच्छे काम करते-2
समाज ने जिस काम को इतने लंबे समय तक बहुत व्यवस्थित रूप में किया था, उस काम को उथल-पुथल का वह दौर भी पूरी तरह से मिटा नहीं सका. अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के अंत तक भी जगह-जगह पर तालाब बन रहे थे.लेकिन फिर बनाने वाले लोग धीरे-धीरे कम होते गए. गिनने वाले कुछ जरूर आ गए पर जितना बड़ा काम था, उस हिसाब से गिनने वाले बहुत ही कम थे और कमजोर भी.
इसलिए ठीक गिनती भी कभी हो नहीं पाई. धीरे-धीरे टुकड़ों में तालाब गिने गए, पर सब टुकड़ों का कुल मेल कभी बिठाया नहीं गया. लेकिन इन टुकड़ों की झिलमिलाहट पूरे समग्र चित्र की चमक दिखा सकती है.
लबालब भरे तालाबों को सूखे आंकड़ों में समेटने की कोशिश किस छोर से शुरू करें? फिर से देश के बीच के भाग में वापस लौटें.
आज के रीवा ज़िले का जोड़ौरी गांव है, कोई 2500 की आबादी का, लेकिन इस गांव में 12 तालाब हैं. इसी के आसपास है ताल मुकेदान. आबादी है बस कोई 1500 की, पर 10 तालाब हैं गांव में. हर चीज़ का औसत निकालने वालों के लिए यह छोटा-सा गांव आज भी 150 लोगों पर एक अच्छे तालाब की सुविधा जुटा रहा है. जिस दौर में ये तालाब बने थे, उस दौर में आबादी और भी कम थी. यानी तब ज़ोर इस बात पर था कि अपने हिस्से में बरसने वाली हरेक बूंद इकट्ठी कर ली जाए और संकट के समय में आसपास के क्षेत्रों में भी उसे बांट लिया जाए. वरुण देवता का प्रसाद गांव अपनी अंजुली में भर लेता था.
''अच्छे-अच्छे काम करते जाना,
''अच्छे-अच्छे काम करते जाना,'' राजा ने कूड़न किसान से कहा था. कूड़न, बुढ़ान सरमन और कौंराई थे चार भाई. चारों सुबह जल्दी उठकर अपने खेत पर काम करने जाते.दोपहर को कूड़न की बेटी आती, पोटली से खाना लेकर. एक दिन घर से खेत जाते समय बेटी को एक नुकीले पत्थर से ठोकर लग गई. उसे बहुत गुस्सा आया. उसने अपनी दरांती से उस पत्थर को उखाड़ने की कोशिश की. और फिर बदलती जाती है इस लंबे किस्से की घटनाएं बड़ी तेजी से. पत्थर उठा कर लड़की भागी-भागी खेत पर आती है. अपने पिता और चाचाओं को सब कुछ एक सांस में बता देती है.
चारो भाइयों की सांस भी अटक जाती है. जल्दी-जल्दी सब घर लौटते हैं. उन्हें मालूम पड़ चुका है कि उनके हाथ में कोई साधारण पत्थर नहीं है, पारस है. वे लोहे की जिस चीज़ को छूते हैं, वह सोना बन कर उनकी आंखों में चमक भर देती है.
पर आंखों की यह चमक ज्यादा देर तक नहीं टिक पाती. कूड़न को लगता है कि देर-सबेर राजा तक यह बात पहुंच ही जाएगी और तब पारस छिन जाएगा. तो क्या यह अच्छा नहीं होगा कि वे खुद जाकर राजा को सब कुछ बता दें.
किस्सा आगे बढ़ता है. फिर जो कुछ घटता है, वह लोहे की नहीं बल्कि समाज को पारस से छुआने का किस्सा बन जाता है. राजा न पारस लेता है, न सोना. सब कुछ कूड़न को वापस देते हुए कहता है : '' जाओ इससे अच्छे-अच्छे काम करते जाना, तालाब बनाते जाना.''
यह कहानी सच्ची है, ऐतिहासिक है- नहीं मालूम. पर देश के मध्य भाग में एक बहुत बड़े हिस्से में यह इतिहास को अंगूठा दिखाती हुई लोगों के मन में रमी हुई है. यहीं के पाटन नामक क्षेत्र में चार बहुत बड़े तालाब आज भी मिलते हैं और इस कहानी को इतिहास की कसौटी पर कसने वालों को लजाते हैं- चारों तालाब इन्हीं चारों भाइयों के नाम पर हैं. बुढ़ागर में बूढ़ा सागर है, मझगवां में सरमन सागर है, कुआंग्राम में कौंराई सागर है तथा कुंडम गांव में कुंडम सागर.
सन् 1907 में गजेटियर के माध्यम से इस देश का 'व्यवस्थित' इतिहास लिखने घूम रहे अंग्रेज ने भी इस इलाके में कई लोगों से यह किस्सा सुना था और फिर देखा- परखा था इन चार बड़े तालाबों को. तब भी सरमन सागर इतना बड़ा था कि उसके किनारे पर तीन बड़े-बड़े गांव बसे थे. और तीनों गांव इस तालाब को अपने-अपने नामों से बांट लेते थे. पर वह विशाल ताल तीनों गांवों को जोड़ता था और सरमन सागर की तरह स्मरण किया जाता था. इतिहास ने सरमन, बुढ़ान, कौंराई और कूड़न को याद नहीं रखा लेकिन इन लोगों ने तालाब बनाए और इतिहास को किनारे पर रख दिया था.
देश के मध्य भाग में, ठीक हृदय में धड़कने वाला यह किस्सा उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम- चारों तरफ किसी न किसी रूप में फैला हुआ मिल सकता है और इसी के साथ मिलते हैं सैकड़ों, हजारों तालाब. इनकी कोई ठीक गिनती नहीं है. इन अनगिनत तालाबों को गिनने वाले नहीं, इन्हें तो बनाने वाले लोग आते रहे और तालाब बनते रहे.
किसी तालाब को राजा ने बनाया तो किसी को रानी ने, किसी को किसी साधारण गृहस्थ ने, विधवा ने बनाया तो किसी को किसी आसाधारण साधु-संत ने- जिस किसी ने भी तालाब बनाया, वह महाराज या महात्मा ही कहलाया. एक कृतज्ञ समाज तालाब बनाने वालों को अमर बनाता था और लोग भी तालाब बना कर समाज के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते थे.
समाज और उसके सदस्यों के बीच इस विषय में ठीक तालमेल का दौर कोई छोटा दौर नहीं था. एकदम महाभारत और रामायण काल के तालाबों को अभी छोड़ दें तो भी कहा जा सकता है कि कोई पांचवी सदी से पन्द्रहवीं सदी तक देश के इस कोने से उस कोने तक तालाब बनते ही चले आए थे. कोई एक हज़ार वर्ष तक अबाध गति से चलती रही इस परंपरा में पन्द्रहवीं सदी के बाद कुछ बाधाएं आने लगी थीं, पर उस दौर में भी यह धारा पूरी तरह से रुक नहीं पाई, सूख नहीं पाई.
Friday, March 27, 2009
गुलज़ार की एक नज़्म
यहीं पड़ी थी बालकनी में
गोल तिपाही के ऊपर थी
व्हिस्की वाले ग्लास के नीचे रखी थी
नज़्म के हल्के हल्के सिप मैं
घोल रहा था होठों में
शायद कोई फोन आया था
अन्दर जाकर लौटा तो फिर नज़्म वहां से गायब थी
अब्र के ऊपर नीचे देखा
सूट शफ़क़ की ज़ेब टटोली
झांक के देखा पार उफ़क़ के
कहीं नज़र ना आयी वो नज़्म मुझे
आधी रात आवाज़ सुनी तो उठ के देखा
टांग पे टांग रख के आकाश में
चांद तरन्नुम में पढ़ पढ़ के
दुनिया भर को अपनी कह के
नज़्म सुनाने बैठा था
Friday, October 3, 2008
राज़धानी के ड्राइवर को सलाम
हमारे अंदर का युवा इंसान और रिपोर्टर जाग गया, हमने गेट से बाहर झांका और गार्ड से पूछताछ की तो पता चला, रेल ट्रैक के बगल में कोई आदमी गिरा पड़ा था। हम भी वहां पहुंच गए, देखा एक बुजुर्ग थे। बाद मे पता चला कि पहले गई गोवा एक्सप्रैस में से गिर पड़े थे। बहरहाल, उन्हे गाड़ी में उठाकर अगले स्टेशन तक खबर पहुंचा दी गई। गोवा एक्सप्रैस उनका इंतजार करती रही थी। बुजुर्गवारक वैसे तो बेहौश थे, लेकिन कोई जानलेवा चोट नहीं आई थी।
मुझे हैरत इस बात की हुई कि राज़धानी जैसी एलीट कही जाने वाली गाड़ी एक आम आदमी के लिए रोक दी गी। ड्राइवर की नज़र की दाद देनी होगी कि उसकी निगाह उन पर पड़ गई। सबसे बडी बात ये कि ऐसा इंसानियत भरा कारनामा दिल्ली जैसे महानगर मंअभी तक देक नहीं पाया। आज याद आई है तो राज़धानी के उस ड्राइवर को सलाम करता हूं।





